Tuesday, March 17, 2020

रंगों की मुठभेड़ (युवा चित्रकार मनोज कुमार ‘बच्चन’ की पेण्‍टिंग)



रंगों की मुठभेड़

युवा चित्रकार मनोज कुमार बच्चन’ की पेण्‍टिंग

फूल शृंखला में बनाए गए अपने चित्रों के सहारे, युवा चित्रकार मनोज कुमार बच्चनप्रेक्षकों के मन में अपनी जबर्दस्त उपस्थिति दर्ज करते हैं। किसी चित्रकार के लिए अपनी अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा उपकरण ब्रश और कैनवस होते हैं। रंग, रेखाएँ उनका सम्बल, और परिकल्पना उनकी जीवन-दृष्टि। इन्हीं पाँच के सम्मिलित प्रभाव से कोई चित्रकार अपने को, और अपनी धारणाओं को अभिव्यक्त करता है। इस अभिव्यक्ति का परिणाम ही उस चित्रकार की जीवन-दृष्टि और सामाजिक सरोकार के घनत्व का परिचय देता है।
फूल शृंखला की इस चित्रावली में कलाकार की अभिव्यक्ति को जानने के लिए इन तमाम बातों के मद्देनजर विश्लेषणात्मक दृष्टि आवश्यक है। इन चित्रों में उकेरे गए फूल प्रकृति में कहीं हैं या नहीं, देश अथवा देशान्तर के किसी भूखण्ड में ये फूल खिलते हैं या नहीं, रंग-रूप-पंखुरियाँ प्रकृति के किसी अवदान का अनुकरणात्मक आरेख हैं या नहीं... इन प्रश्नों पर विचार करना बचकानी बात होगी। कोई भी कलाकार अपनी पाँचो ज्ञानेन्द्रियों के प्राथमिक अथवा तात्कालिक अनुभव को अपनी कला में जस के तस नहीं उकेरता। असल में वह अपने और अपने परिवेश के लिए अपने अनुभवों के सहारे एक सपना गढ़ता है। सपनों को अपनी कला में अनूदित करने की कोशिश करता है और अपने सपनों के अनुकूल खुद को, अपने परिवेश को ढालने में लग जाता है। इस कोशिश में वह जितना सफल होता है, वह उसकी प्रतिभा, श्रम, कौशल और जीवन-दृष्टि का सूचक होता है। इन तमाम कोशिशों की परिकल्पना में कलाकार की जीवन-दृष्टि की अहम् भूमिका होती है। रंगों का चयन और घनत्व, रेखाओं का घुमाव, और परिदृश्य की अभिकल्पना चित्रकार की जीवन-दृष्टि के बारे में बहुत कुछ कहती है। हरेक चित्र की अभिव्यक्ति की अपनी खास भाषा, खास अभिनय, खास लय और खास गद्य होता है। ध्वनिविहीन और गतिविहीन होने के बावजूद उसके प्रभाव में ध्वनि, गति, लय और व्याख्या होती है। इन तमाम चित्रों में कलाकार की कोशिश अन्धकार के सागर, विपत्ति के पहाड़, शुष्कता के बंजर, असम्भाव्य चट्टान पर रोशनी, खुशी और फूल खिलाने की है।
इस चित्र शृंखला के माध्यम से चित्रकार मनोज कुमार बच्चनने अन्धकार और निराशा के विरुद्ध एक युद्ध छेड़ा है और एक हद तक उस युद्ध के सुखद परिणाम की घोषणा भी रंगों की प्रखरता और मुखरता से कर दी है। इस कलाकार की रचना उसके ध्येय और मनोविज्ञान को बारीकी से रखती है। कैनवस पर इतने प्रखर और मुखर स्वरूप के फूल खिलाने में क्यों इस चित्रकार को किसी जीवन्त पेड़, पौधे, बेल, पत्तियों की आवश्यकता नहीं पड़ी? क्यों इन फूलों की परिधि रेखा पर कहीं धारदार कोर अथवा तीक्ष्ण नोंक की जरूरत महसूस नहीं हुई? क्यों ये फूल हर जगह शुष्क काष्ठ, गहन अन्धकार को चीरकर अथवा ठसाठस भरे स्थान की काबिज सीमा को फोड़कर बाहर आए हैं? इन फूलों के रंग, इसकी प्रखरता और आक्रामकता क्यों इतनी मुखर और तीक्ष्ण है। क्यों ये फूल ज्वालामुखी की तरह खिलते हैं और रत्नगर्भा स्त्री के गर्भ के अन्तर्भाग में तब्दील हो जाते हैं? क्यों उस पुष्प-गर्भ में फिर से उतने ही तीक्ष्ण फूल खिल उठते हैं अथवा सिर ऊँचा की हुई स्त्रियाँ अथवा पुरुष खड़े होने को तत्पर हो जाते हैं। काले रंग, अन्धकार अथवा शिकस्त जगह का शिकंजा क्यों इन फूलों की प्रखरता अथवा मनुष्य की उन्मुक्तता को दबोचना चाहता है? क्यों इन फूलों की पंखुरियों का आकार और आनुवांशिकी इतनी भिन्न है? क्यों इन तमाम चित्रों में लाल, सफेद, हरे, पीले रंग की प्रखरता और काले रंग को दबाने की चेष्टा की गई है...सैकड़ों प्रश्न एक साथ भावक के मन में उठते हैं और ये चित्र आप से आप इन तमाम प्रश्नों के उत्तर देते जाते हैं।
दरअसल ये चित्र युवा चित्रकार मनोज कुमार बच्चनद्वारा अपने परिवेश के सम्बन्ध में दिए गए वक्तव्य और घोषणाएँ हैं कि अब कुछ भी सम्भावना बची नहीं रही, हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हमारे लिए अन्धकार, कालिमा, शुष्कता और निराशा के बीज इस कदर बो दिए गए हैं, कि हमारे लिए उजाले, खिलखिलाहट, हरीतिमा और आस्था की कोई जगह नहीं है। उनकी निरर्थक अभिलाषा और क्रूर अहंकार से जगह इतनी भर चुकी है कि हमारे अस्तित्व की उपस्थिति भी वहाँ मुश्किल है। मगर हम वहाँ जगह बनाएँगे, वहाँ रोशनी और सम्भावना के फूल खिलाएँगे, डंके की चोट पर वहाँ अपनी और अपनी सकारात्मक अभिलाषाओं की उपस्थिति एवं सफलता दर्ज करेंगे। आकाश भर उनके अन्धकार को हमारी चिनगारी भर अभिलाषा ध्वस्त कर देगी। यहाँ रंगों की उज्ज्वलता एवं उग्रता, एक तरफ चित्रकार के पावन उद्देश्य और आक्रामक साहस का परिचय देती है, तो दूसरी तरफ पंखुरियों के फैलाव में अधिकार प्राप्ति का क्षमतावान सन्धान, पंखुरियों के सम्मिलन एवं कलियों के गसाव में मुट्ठी बाँधने, पेशियाँ दिखाने की ललकार दिखती है, फूलों के खिलने और विकसित होने के उद्यम में वेगवान आक्रमण और छा जाने की इच्छा दिखती है।
आशा की जानी चाहिए कि इन चित्रों में चित्रकार ने अपनी जीवन-दृष्टि की जिस उज्ज्वलता और उग्रता को उजागर किया है...अपने समाज के सुभग स्वरूप की जैसी कामना की है, जो सपना देखा है, वह निश्चय ही पूर्ण होगी।
रंगों की मुठभेड़, पुष्पांजलि एलबम, पटना, 2009

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