Wednesday, July 19, 2023

नीम रोशनी में देश-दशा : दि‍खे पर न दि‍खे (मदन कश्‍यप की कवि‍ताओं का समीक्षात्‍मक अध्‍ययन) Country Plight in Ambiguous Light : May be Visible, May Not Be (A critical analysis if the Poems of Madan Kashyap)

नीम रोशनी में देश-दशा : दि‍खे पर न दि‍खे

प्रखर राजनीति‍क चेतना, गहन इति‍हास-बोध, संवेदनशील समाज-बोध, तत्त्‍वान्‍वेषी संस्‍कृति‍-बोध और अनुरक्‍त मानवीयता से सम्‍पन्‍न कवि‍ श्री मदन कश्‍यप का अपने समय के सामुदायि‍क परि‍वेश से सघन रचनात्‍मक सरोकार है। इन अवबोधों के बि‍ना कोई बड़ा कवि‍ तो हो नहीं सकता। मदन कश्‍यप बड़े कवि‍ हैं। केदारनाथ सिंह और कुँअर नारायण की बाद वाली पीढ़ी के वृहत्त्रयी हि‍न्‍दी कवि --राजेश जोशी, वि‍नोद कुमार शुक्‍ल और मदन कश्‍यप ही हैं। मंगलेश डबराल के रहते मैं वृहत्‍चतुष्‍टय की गणना करता था।

उल्‍लेखनीय है कि‍ बड़ा कवि कोई, अपनी कवि‍ताओं और संकलनों की बड़ी गि‍नती से नहीं; रचनात्‍मक दृष्‍टि‍कोण से होता है। क्‍योंकि‍ दृष्‍टि‍कोण से ही रचनाओं में वि‍षय-वि‍स्‍तार और कथ्‍य-संघनन होता है; शि‍ल्‍प और सम्‍प्रेषण प्रभावशाली होता है; मूल्‍य-बोध दृढ़ होता है; चेतना उन्‍नत होती है; जि‍सके बि‍ना कवि‍ता, कवि‍ता नहीं, वक्‍तव्‍य हो जाती है। अपने समय के ज्‍वलन्‍त प्रश्‍नों का सामना करना हर वि‍शि‍ष्‍ट कवि‍ का धर्म और दायि‍त्‍व होता है। इति‍हास, समाज और संस्‍कृति की सूक्ष्‍मता जाने बि‍ना कि‍सी की राजनीति‍क चेतना साफ नहीं होती, वह सामुदायि‍क परि‍वेश की सूक्ष्‍मता जान नहीं पाता। इसी सूक्ष्‍मता के अवबोध में -- प्रेम, क्रान्‍ति‍, घृणा, युद्ध, अहंकार, वर्चस्‍व...सब कुछ आता है।

समकालीन हि‍न्‍दी कवि‍ता के ऐसे अनि‍वार्य और अत्‍यन्‍त महत्त्‍वपूर्ण कवि, मदन कश्‍यप का जन्‍म भारतीय स्‍वाधीनता के पौने सात बरस बाद, 29 मई, 1954 को, अपने ननिहाल (भगवानपुर रत्ती, वैशाली, बिहार) में हुआ। उनकी प्रारम्‍भि‍क शि‍क्षा पैतृक गाँव (फुलाढ़) के प्राथमिक स्कूल में शुरू हुई। मात्र सात बरस की कच्‍ची आयु में, सन् 1961 के दुर्गापूजा के आसपास, उनकी माँ का निधन हो गया। सन् 1963 से उन्‍होंने ननिहाल में रहकर हायर सेकेण्डरी तक की शि‍क्षा हासि‍ल की और सन् 1970 में बिहार विश्वविद्यालय मुजफ़्फरपुर में बी.एस-सी. में प्रवेश लिया। अगले ही वर्ष वे अपनी ज्ञान-शाखा बदलकर कला संकाय में आ गए और सन् 1976 में वहीं से एम.ए. की डि‍ग्री हासि‍ल की। सन् 1978 में कुछ महीनों के लिए गुरुनानक कॉलेज धनबाद में अध्यापन भी कि‍या। सन् 1979 में धनबाद से प्रकाशि‍त दैनिक पत्र 'आवाज़' से पत्रकारिता की शुरुआत की। सन् 1981 में हिन्दुस्तान ज़िंक लि. धनबाद में हिन्दी अनुवादक की नौकरी की, सन् 1987 में भारत वैगन एण्‍ड इंजी कं. लि. (पटना) में राजभाषा कार्यपालक हुए और सन् 2000 में राजभाषा उपप्रबन्‍धक पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर वैचारि‍क लेखन करने लगे।

मदन कश्‍यप की अब तक कुल छह कविता-संग्रह --'लेकिन उदास है पृथ्वी' (सन् 1992 एवं 2019), 'नीम रोशनी में' (सन् 2000), 'कुरुज' (सन् 2006), 'दूर तक चुप्पी' (सन् 2014), 'अपना ही देश' (सन् 2016) और 'पनसोखा है इन्द्रधनुष' (सन् 2019); और आलेखों/टि‍प्‍पणि‍यों के तीन संकलन -- 'मतभेद' (सन् 2002), 'लहूलुहान लोकतन्‍त्र' (सन् 2006), 'राष्ट्रवाद का संकट' (सन् 2014), 'कोरोना डायरी' (सन् 2023) और 'बीजू आदमी' (सन् 2023) प्रकाशित हैं। इनके अलावा 'कवि ने कहा' काव्‍य-शृंखला में उनकी चुनी हुई कविताओं का भी एक संग्रह प्रकाशित है। इन छहो संग्रहों में कुल 298 कवि‍ताएँ संकलि‍त हैं; जि‍नमें से बीसवीं शताब्‍दी के आठवें दशक में 17, नौवें दशक में 58, अन्‍ति‍म दशक में 60, इक्‍कीसवीं शताब्‍दी के पहले दशक में 80 और दूसरे दशक में 67 कवि‍ताएँ है। कुल सोलह कवि‍ताओं का रचनाकाल अज्ञात है।

मात्र 15 वर्ष की आयु में सन् 1969 में ही 'महात्मा गाँधी की विचारधारा' पर उनका आलेख (पहली प्रकाशित रचना) स्कूल-पत्रिका में प्रकाशित हुआ। साहि‍त्‍य सेवा के लि‍ए वे शमशेर सम्मान, केदार सम्मान (सन् 2015), बिहार सरकार राजभाषा विभाग नागार्जुन पुरस्कार (सन् 2016), बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, बेंगलुरु की शब्द संस्था का 'अज्ञेय शब्द शिखर सम्मान' (सन् 2022) जैसे अनेक सम्‍मानों से सम्‍मानि‍त कि‍ए गए हैं। उनकी ढेरो कविताएँ अंग्रेजी समेत कई भारतीय भाषाओं के अलावा फ्रेंच एवं अन्‍य वि‍देशी भाषाओं में अनूदि‍त, प्रशंसि‍त एवं संकलनों में संकलि‍त हैं।

व्‍यावहारि‍क तथ्‍य के अनुसार बालापन में आई मातृवि‍हीनता की पीड़ा मनुष्‍य को घनीभूत अवसाद के चंगुल में दबोच लेता है; पर वही अवसाद उसकी चेतना और संवेदना को इतना ऊर्ध्‍वमुखी कर देता है कि‍ मातृ-प्रेम के सुख से वंचि‍त वह जातक पूरे परि‍वेश के प्राणि‍यों के लि‍ए प्रेम का अजस्र स्रोत बन जाता है। मदन कश्‍यप की पूरी कवि‍ताई अकारण ही प्रेम, क्रान्‍ति‍ और संघर्ष का आगार नहीं बन गई है। उनकी काव्‍य-दृष्‍टि‍ के ओर-छोर तलाशनेवाले भावकों को उनके बाल्‍यकाल की उस मनोदशा की पहचान करनी होगी, जि‍सके कारण अल्‍पायु में ही वे अपनी जीवन-दृष्‍टि‍ नि‍र्मि‍त करने लगे थे और ऊर्ध्‍वोन्‍मुखी चेतना का वि‍स्‍तार करने लगे थे। दारुण झंझावातों का सामना करते हुए भी, श्रमशील मनुष्‍य की आकांक्षाओं से उनका सरोकार सदैव बना रहा। ‍माँ के परोक्ष होने के बाद नवम्बर 1961 से 1962 तक वे झरिया (धनबाद) की एक कोलियरी गोलकडीह में अपने चचेरे नाना के घर लगभग एक वर्ष तक रहे। ननि‍हाल के लोगों की ऐसी तत्‍परता से अर्थ लगाना आसान है कि‍ उनकी माँ अपने मैके की दुलारी बेटी-भतीजी-बहन रही होंगी; और इसलि‍ए मदन कश्‍यप अपने नानाओं, नानि‍यों, मौसि‍यों, मामाओं के अति‍शय दुलारे हुए। ननि‍हालवालों की ओर से ऐसी व्‍यवस्‍था नि‍श्‍चय ही उनके मनोजगत से मातृवि‍हीनता का अवसाद मि‍टाने के लि‍ए कि‍या गया होगा। पर मातृ-वि‍छोह का अवसाद कि‍सी भी उद्योग से कहाँ मि‍ट पाता है! मातृशोक की पीड़ा मदन कश्‍यप के मनोजगत को सदैव ही कुरेदती रही। कुछ इस तरह कि‍ गोलकडीह से अपने ननिहाल भगवानपुर आने के बाद सन् 1963 में वसन्‍त ऋतु में कोकि‍ल की कूक सुनकर प्रश्‍न कि‍या 'कोकि‍ल तुम आ गई लौटकर, मेरी माँ कब आएगी/हँसते-खेलते आया वसन्‍त, मेरी खुशि‍याँ कब आएगी।' नौ बरस से भी कम आयु के बालक द्वारा कोकि‍ल से पूछे गए इस वेदनामय काव्‍य-प्रश्‍न का उत्तर तो कि‍सी के पास क्‍या होगा; कि‍न्‍तु बालक मदन कश्‍यप की काव्‍य-संवेदना जाग्रत हो उठी। 'माँ की तस्‍वीर' (कुरुज, पृ. 13) और 'माँ के गीत' (नीम रोशनी में, पृ. 14) शीर्षक उनकी कवि‍ताओं (रचनाकाल क्रमश: सन् 1988, 1992) में रेखांकि‍त यह काव्‍य-संवेदना भावकों को आज भी वि‍ह्वल कर देती है। माँ के लि‍ए उनकी वि‍ह्वलता वैसे अनेक कवि‍ताओं में उपस्‍थि‍त हुई है; पर इन दोनो कवि‍ताओं में चि‍त्रि‍त माँ के साथ संवेदना भी धन्‍य हो उठती है। बचपन में ही कहीं देखी वह माँ की इकलौती तस्वीर अब कवि‍ के पास नहीं है, ढूँढने पर उन्‍हें पिता के सन्‍दूक में कई मामूली कागजों के साथ जर-जमीन तथा बँटवारे के दस्तावेज़ बेशक मिले, वह तस्वीर नहीं मि‍ली। वैसे उनके '...ज़ेहन में/अब भी कुछ धुँधली तस्वीरें हैं माँ की/पलकें मूँदने पर आहिस्ता-आहिस्ता...।' उनकी आँखों में उनकी छाया उतरती है। कवि‍ डॉक्टर का वह चाकू देखना चाहता है, जि‍ससे हो रही शल्‍य-क्रि‍या के दौरान माँ गत हो गईं; लेकिन उन्‍हें उस डॉक्‍टर का नाम तक नहीं मालूम; पिता से पूछने पर भी कुछ हासि‍ल नहीं हुआ। देखते-देखते समय की क्रूर गति और वि‍स्‍मृति‍ की नि‍रन्‍तरता में सारी मनोहारी स्‍मृति‍याँ मि‍टती गईं। 'धीरे-धीरे मिटती रहीं माँ की निशानियाँ/कुछ साड़ियाँ थीं जो शादी में बहन को दे दी गईं/बक्सा टीन का था जंग लगते-लगते टूट गया/कुछ गहने थे जिनके बारे में भी पिता कुछ नहीं बताते...।' पि‍ता से उन्‍हें वैसे भी कोई बहुत आश नहीं थी, क्‍योंकि -- 'पिता ने जब माँ को ही नहीं सँभाला/तो भला तस्वीर को क्या सँभालते...।' संवेदनात्‍मक हृदय से पढ़ते हुए ही इस कवि‍ता के सही मर्म तक पहुँच पाना सम्‍भव है। पि‍ता के व्‍यवहारों पर ध्‍वनि‍त यह चि‍ढ़ पि‍ता के बारे में व्‍यक्‍त कवि-व्‍यक्‍ति‍त्‍व का चि‍ढ़ नहीं है; या कि‍ पि‍ता के समग्र व्‍यक्‍ति‍त्‍व का मूल्‍यांकन नहीं है; बल्‍कि‍ मातृ-ममत्‍व से क्रूरतापूर्वक वि‍लग हुए सात बरस के बालक की संवेदना और अपेक्षा की अनुरक्षण-प्रक्रि‍या का लेखा-जोखा है। एक बालक, जो अपनी माँ को 'पृथ्‍वी की सबसे सुन्‍दर स्‍त्री' ‍(लेकि‍न उदास है पृथ्‍वी/पृ. 16) मानता है; माँ के न रहने पर पि‍ता से ही सारी अपेक्षाएँ रखेगा। पि‍ता की व्‍यावहारि‍कता एवं अन्‍य जि‍म्‍मेदारि‍याँ अपनी जगह जायज हो सकती है; पर जागति‍क सत्‍य यही है कि‍ मातृ-ममत्‍व से वि‍लग हुए बालक की संवेदनाएँ साबुन के बुलबुले की तरह बात-बात में फूट जाती हैं। इस कवि‍ता में कवि‍ ने पुंशत्‍ववादी उस वृत्ति‍ पर भी तीक्ष्‍ण व्‍यंग्‍य कि‍या है, जि‍सके मद में वह अपनी अर्द्धांगि‍नी की कोई तस्‍वीर सुरक्षि‍त नहीं रख पाता, अलबत्ता अपने सन्‍दूक में चालीस वर्ष पुरानी फि‍ल्‍मी पत्रि‍काएँ और छि‍यालीस वर्ष पुराना डाक-टि‍कट सुरक्षि‍त रख लेता है। इस कवि‍ता की दि‍वंगत स्‍त्री, सात बरस के एक बालक की माँ और पुश्‍तैनी सम्‍पत्ति‍ की मुश्‍तैदी से रक्षा करते हुए एक पुरुष की अर्द्धंगि‍नी थीं। वह स्‍त्री अपने लि‍ए तो कुछ नहीं, पर इन दो पुरुषों के लि‍ए नेह और ममत्‍व का अक्षय भण्‍डार थीं। पर सोचने की बात है कि ऐसा क्‍या है कि‍ उनके परोक्ष होते ही उनकी स्‍मृति‍ की सरि‍ता एक के मन में नि‍रन्‍तर सूखती गई, दूसरे के मन में नि‍रन्‍तर उमड़ती गई।‍

चार वर्ष बाद फि‍र से मदन कश्‍यप 'माँ के गीत' की स्‍मृति‍ में उद्बुद्ध हुए। उम्मीदों को दुलार से पालती हुई अपनी माँ की बड़ी-बड़ी आँखें, उन्‍हें वि‍पन्‍नता में भी सम्‍पन्‍न दि‍खीं। व्‍याकरणवि‍दों की दृष्‍टि‍ में समय के तीन खण्‍ड होते हैं, भूत-वर्तमान-भवि‍ष्‍यत; पर जीवन-क्रि‍या में वर्तमान का कोई अर्थ नहीं होता; जि‍से वर्तमान समझकर जीना शुरू करें, नि‍मेष मात्र में अतीत हो जाता है। मनुष्‍य के पास वस्‍तुत: दो ही काल-खण्‍ड होते हैं -- अतीत और भवि‍ष्‍य। चि‍न्‍तनशील मस्‍ति‍ष्‍क में दो ही स्‍थि‍ति‍याँ होती हैं -- अतीत की स्‍मृति‍याँ और भवि‍ष्‍य के सपने। कुटुम्‍बों ने मदन कश्‍यप के बाल-मन से मातृ-शोक की पीड़ा को नि‍र्मूल करने की बड़ी चेष्‍टा की; पर उनके कि‍सी उद्यम को सफलता नहीं मि‍ली, बढ़ती उम्र के साथ मदन कश्‍यप की स्मृति‍यों और सपनों ने उनकी तर्कशीलता को इतना ठोस बना दि‍या कि‍ उनकी सारी सृजनशीलता प्राणि‍, प्रकृति‍ और परि‍वेश की सहजता की चि‍न्‍ता करने लगी। बचपन से ही वे जि‍स ममत्‍व से वंचि‍त रहे, वैसा ममत्‍व उन्‍हें पूरी दुनि‍या से हो गया। परि‍वेश की प्रकृतावस्‍था को लांछि‍त-बाधि‍त करनेवाले आततायि‍यों और उनके कीर्तन में लीन-तल्‍लीन बौद्धि‍कों की क्षुद्रता पर वे बेहि‍साब क्रोधि‍त हो उठे। ध्‍यातव्‍य है कि‍ इस क्रोध के बावजूद उनकी ऊर्जा सदैव सकारात्‍मक उद्यमों की तलाश करती रही; जीवन की सहजता के प्रेमि‍यों और मनुष्‍यता के रक्षकों के प्रति‍ वे सदैव अनुरक्‍त बने रहे। माँ के लाड़-दुलार में सुने 'ढेर सारे गीतों' की स्‍मृति‍यों से भी उन्‍होंने अपनी जीवन-दृष्‍टि‍ की नींव पुख्‍ता की। उनकी माँ के पास '...महल नहीं था/पर गीत थे कोठे-अटारियों के/गीत थे सोने की थाली के...।' उन गीतों में माँ का बेटा जब कभी रूठकर नदी के पार चला जाता, चाँदी की नाव लेकर मनाने पिता आते, बेटा सोने का मुकुट पहने चन्‍दन की पाटी पर मोती-से अक्षर लिखता, उन गीतों में बेटे के पाँव कभी नंगे नहीं होते। गीतों में बेटे की अपनी पूरी-की-पूरी पृथ्वी होती, अपना एक तारामण्‍डल होता, बेटे का सागर भी होता, कि‍ला भी होता, कि‍ले के सारे द्वार खुले होते, गीतों में बेटे के पाँव कभी किसी को देख कर काँपते नहीं, बेटा राक्षस को मार कर राजकुमारी से ब्याह कर लेता, ढेर सारा धन ले आता -- 'जीवन में चाहे हर बार जीतता हो/अत्याचारी कभी नहीं जीत पाता था गीतों में।' 'माँ के गीत' के सहारे इस कवि‍ता में कवि‍ ने स्मृति, स्‍वप्‍न, आचार और जीवन-दर्शन का ऐसा छतनार उगाया है कि‍ जीवन-क्रि‍या के एक-एक तार नि‍खर उठे हैं। अपने रचाव में यह कवि‍ता 'माँ' के बारे में अकेले मदन कश्‍यप की संवेदना हो सकती है; कि‍न्‍तु अपनी प्रभावान्‍वि‍ति‍ में यह कवि‍ता दुनि‍या भर की माँओं और माँ के ममत्‍वों की परि‍भाषा है। सचमुच, 'माँ की आँखों में गीतों का महासमुद्र' होता है और सचमुच वह 'दुख को भी गा लेती है।' माँ की स्‍मृति‍यों में 'एक-एक अनुष्ठान के लिए कई-कई गीत' होते हैं और उसकी युक्‍ति‍यों में 'कई-कई अनुष्ठानों के लिए एक ही गीत' होते हैं।

मदन कश्‍यप प्रेम के कवि‍ हैं; घृणा, युद्ध, अहंकार और वर्चस्‍व से उन्हें परहेज है। उनकी जीवन-दृष्‍टि उदार है। अपनी समकालीनता को भी वे आदि‍म सभ्‍यता से और क्षेत्रीयता को वैश्‍वि‍कता से अवि‍च्‍छि‍न्‍न नहीं मानते। उल्‍लेख सुसंगत होगा कि‍ क्रान्‍ति‍, प्रेम का ही अवयव है, प्रेम के अवरोधों को दूर हटाने के लि‍ए क्रान्‍ति‍ की जाती है; बेशक वह भौति‍क प्रेम हो या नैसर्गि‍क, मनुष्‍य-प्रेम हो या राष्‍ट्र-प्रेम। 'स्त्री-पुरुष' ('पनसोख है इन्‍द्रधनुष',पृ. 9, रचनाकाल सन् 2015) शीर्षक कवि‍ता में मदन कश्‍यप ने स्‍वीकार भी कि‍या है कि‍ 'हमें प्यार की उतनी ही जरूरत थी/जितनी क्रान्ति की/...क्रान्ति की तरह प्यार पर भी हमारा बस नहीं है।' उनकी कवि‍ताओं में दर्ज क्रान्‍ति‍ के संकेतों की सि‍द्धि‍ भी प्रेम के परि‍पाक से ही होती है। मनुष्‍य, समाज, मूल्‍य, नीति‍, वि‍वेक, राष्‍ट्र और वि‍श्‍व के जिस कि‍सी प्रसंग में जहाँ कहीं असंग‍त गति‍वि‍धि‍याँ उन्‍हें दि‍खीं, अपनी कवि‍ताओं में उन्‍होंने धज्‍जि‍याँ उड़ाते हुए व्‍यंग्‍य-प्रहार कि‍या है, और हर जगह उनका प्रेम ही प्रकट हुआ।

उन्‍हें अपने आत्‍म या अपनी भामि‍नी या अपनी सन्‍तानों से ही नहीं, पूरी दुनि‍या से प्रेम है। उन्‍हें केवल अपने घर नहीं, दुनि‍या के हर जीव-जन्‍तु के लि‍ए एक सुरक्षि‍त घर, व्‍यवस्‍थि‍त परवरि‍श और सकारात्‍मक सोच की चि‍न्‍ता रहती है। उन्‍हें केवल अपनी ही माँ नहीं, दुनि‍या के हर जीव-जन्‍तुओं के मातृत्‍व की रक्षा की चि‍न्‍ता रहती है। उनकी कवि‍ताओं के अवगाहन से उनकी यही धारणा स्‍पष्‍ट होती है कि‍ मनुष्‍य प्रेम भर करना सीख ले, तो बाकी सब कुछ उन्‍हें प्रेम सि‍खा देगा। प्रेम मि‍ल जाए, तो मनुष्‍य को क्रान्‍ति‍ का प्रयोजन नहीं होगा; और इससे इतर प्रसंग तो फि‍र कोश में आएँगे ही नहीं। स्‍पष्‍टत:‍ उनका यह 'प्रेम' केवल शरीरी नहीं है। यहाँ उनके छठे कवि‍ता संग्रह 'पनसोख है इन्‍द्रधनुष' में संकलि‍त दूसरी कवि‍ता 'एक अधूरी प्रेम कवि‍ता' का पाठ-वि‍श्‍लेषण प्रासंगि‍क होगा। इस कवि‍ता का लेखन-काल संग्रह में उल्‍लि‍खि‍त नहीं है, पर लि‍खे जाने के तत्‍काल बाद यह श्रेष्‍ठ कवि‍ता अक्‍टूबर 2015 में प्रकाशि‍त 'तद्भव' पत्रि‍का के बत्तीसवें अंक में छपी थी। भारतीय परि‍वेश से पूरी तरह अवगत दुनि‍या का हर संवेदनशील प्राणी इस दौर में हो रहे घृणा, द्रोह, आघात, छद्म, वंचना के अमानवीय उत्‍सव से परि‍चि‍त होगा।

इस अधूरी प्रेम कवि‍ता में कवि‍ अपने सारे परुष आचार त्‍यागकर अपने प्रेमाधार के समक्ष उपस्‍थि‍त हैं। अपने सारे उद्यमों का लेखा-जोखा और अनजाने में की गई सारी भूलों के लि‍ए स्‍वीकारोक्‍ति‍ व्‍यक्‍त करते हैं। इस स्‍वीकारोक्‍ति‍ में उनका 'मैं' पूर्वजों की सम्‍पूर्ण शृंखला का प्रतीक है, क्‍योंकि इस कवि‍ता की अधूरी प्रेम-कथा उनकी युवावस्‍था में नहीं, हड़प्पा काल की सिन्धु घाटी सभ्यता के ऐति‍हासि‍क स्‍थल, राजस्थान के कालीबंगा[1] और सिन्‍ध में अवस्‍थि‍त काँस्ययुगीन मुअनजोदड़ो[2] से शुरू हुई है। लगभग दो सौ दो पंक्‍ति‍यों की इस कवि‍ता में कवि‍ ने प्रेम के इतने रूप दि‍खाए हैं, कि‍ प्रेम की वि‍लक्षण परि‍भाषा नि‍र्धारि‍त हो गई है। प्रत्‍यक्ष समय के दारुण दैन्‍य और मानवीयता की अधोगति‍ देखकर उन्‍होंने सि‍न्‍धु घाटी सम्‍यता के आदि‍म रूप का स्‍मरण कि‍या है, और पुरा-काल के सारे दर्द से नि‍रपेक्ष हो गए हैं। अपनी सभ्‍यता से प्रेम करते हुए उन्‍हें स्‍मरण आया है कि‍ -- 'जब कच्ची ईंटों वाले/कालीबंगा के मकानों से/भागे थे हम/मोअनजोदड़ो की ओर/तब जो पाँव हमारे हुए थे लहूलुहान/आज भी टीसते हैं/रात के तीसरे पहर में/...कम नहीं हुआ दर्द ऋचाओं के पाठ से/बुद्ध की करुणा के लेप का असर भी/बहुत थोड़े दिनों तक रहा/और अपने पुरखे महावीर को तो/हमने पहले ही निर्वासित कर दिया था।'

दुनिया की सबसे प्राचीन, अपनी सभ्‍यता के प्रेम में, कवि‍ ऐसे समय के लि‍ए दुनिया की सबसे प्राचीन प्रेम-कविता उत्कीर्ण करना चाह रहे हैं, जब कालीबंगा से मुअनजोदड़ो तक के प्रवासन में मनुष्‍यों के लहूलुहान पाँव की टीस को सहलाने में वैदि‍क सभ्‍यता[3] की ऋचाओं के गान अपर्याप्‍त साबि‍त हुए थे, महात्‍मा बुद्ध[4] की अमि‍य-वाणी भी बहुत दि‍नों तक कायम नहीं रह सकी, महावीर जैन तो खैर याद भी नहीं रखे गए। गौर करना होगा कि‍ सनातन धर्म के जि‍न आडम्‍बरों और वंशानुगत अहमन्‍यताओं से उबारने का उद्यम बौद्ध-धर्म के वि‍चारों में था, उस वैचारि‍कता के प्रति‍ अस्‍वीकृति‍-भाव से भरे यूरोप ने ईर्ष्‍यावश अपने यहाँ 'अपने खास' प्रबोधन युग के शुरुआत की घोषणा लम्‍बे समय बाद सतरहवीं शताब्दी के अधोकाल में आकर सन् 1650-1780 के दशक तक में की। पश्चिमी यूरोप के सांस्कृतिक एवं बौद्धिक वर्ग ने इस अवधि में परम्परा से हटकर तर्क, विश्लेषण तथा वैयक्तिक स्वातन्‍त्र्य पर बल दिया। ऐसे प्रबोधन या कि‍ दार्शनिक प्रवचन की अवधि भारतीय सभ्‍यता में ई.पू. छठी शताब्‍दी में, अर्थात् महात्‍मा बुद्ध के समय में ही आ गई थी; और दुनि‍या के कई देश इस वैचारि‍कता के अनूदि‍त संस्‍करण से अपनी सभ्‍यता/व्‍यवस्‍था सुधारने में लग गए थे इस कवि‍ता की पृष्‍ठभूमि‍ में कवि‍ को यह सब कुछ याद आता है, अपनी प्राचीन सभ्‍यता का वह भव्‍य-दि‍व्‍य स्‍वरूप, सर्वधर्म समन्‍वय की धारणा, मानव-मूल्‍य की पहचान-पद्धति‍, यहाँ तक की 'अप्‍प दीपो भव' वाले आचरण के टूटते डोर तक याद आते हैं। इसीलि‍ए सम्‍भवत: उस प्राचीन सभ्‍यता का अपनी प्रेमि‍का के रूप में मानवीकरण कर उसके प्रेम में लीन हो जाते हैं; कुछ इस तरह कि‍ उसके प्रेम और अनुराग की स्‍वीकृति‍ में अपनी पहचान तय कर बैठते हैं। अपनी प्रेमि‍का को किंचि‍त उपालम्‍भ भी देते हैं कि‍ हे सभ्‍यते! तुम्हें याद हो कि‍ न हो, पर फूलों के गहनों और छालों के वस्त्रों से जब आगे बढ़ने लगी थी हमारी दुनिया, हमने (अर्थात् हमारे पूर्वजों ने) ही खोदा था पहला सीढ़ीदार कुआँ और जल की सतह के पास तुम्हारे बैठने की जगह बनाई थी, जिस पत्थर पर लेटकर तुम पानी की पीठ थपथपाया करती थी; मैं उसे अब भी तलाश रहा हूँ। सभ्‍यता द्वारा नागरि‍क उद्यम के प्रति‍फल की पीठ थपथपाने, या प्रेमि‍का द्वारा प्रेमी की पीठ सहलाने को एकमेक करते हुए कवि‍ ने अपनी जैसी वि‍राट दृष्‍टि‍ का परि‍चय दि‍या है, वह अनुपम है। यहाँ 'कुआँ खोदना' और 'जल-तल को थपथपाना' भी एक गूढ़ बि‍म्‍ब की तरह है। भारतीय लोक-परि‍वेश में ऐसे पदबन्‍ध मुहावरों की तरह प्रयुक्‍त होते हैं। गौरतलब है कि‍ कुआँ खोदना, सामुदायि‍क हि‍त में घोर श्रमसाध्‍य कार्य करना है, नि‍र्माण की चि‍न्‍ता और उद्यम का प्रतीक है; इसी तरह जल-तल थपथपाना, प्रेमानुराग है, या कोई काम न रहने पर अनुराग से समय बि‍ताने का प्रयास। ऐसे प्रति‍बि‍म्‍बन में कवि‍ की उस पीड़ा का अनुमान सहज है, जो उन्‍हें स्‍मरण कराता है कि‍ हमारी सभ्‍यता प्रेम और नि‍र्माण में इस तरह सन्‍नद्ध थी, कि‍ जनहि‍त के सि‍वा सारा कुछ उसके लि‍ए नि‍ष्‍प्रयोजनीय और अकर्तव्‍य था; उसी शृंखला की वर्तमान श्रेणी में ऐसा जनाचार कैसे आया कि‍ वह वि‍ध्‍वंस, घृणा और कि‍सी न कि‍ए गए अपराधों के लि‍ए प्रति‍शोध-भाव से भर गया। अपने समय ‍की ध्‍वंस-लीला (छवि‍-ध्‍वंस, इति‍हास-ध्‍वंस, वि‍रासत-ध्‍वंस, संस्‍कृति‍-ध्‍वंस, ज्ञान-ध्‍वंस, नीति‍-वि‍वेक-ध्‍वंस) और मूर्ति‍-भंजकता देखकर पूर्वजों के नि‍र्माण-कर्म और नि‍र्मि‍ति‍ को नेह से सहलानेवाली व्‍यवस्‍था को स्‍मरण करना कवि‍ की गहन पीड़ा का परि‍चायक है। कवि‍ जानते हैं कि‍ नि‍र्माण-वृत्ति‍ इति‍हास रचती है, ध्‍वंस-वृत्ति‍ वि‍स्‍मृति‍ की कोख में समा जाती है। जन-जन को ज्ञात है कि‍ क्रूरता और अत्याचार के कारण कंस-चाणूर-मुष्‍टि‍क-पूतना[5] या धनानन्‍द[6] का नामोल्‍लेख आज भी‍ कोई अलग से नहीं करता। या तो अत्‍याचारी के रूप में करता है, या कृष्‍ण-बलराम[7] और चाणक्य[8]/चन्‍द्रगुप्त[9] के साथ करता है।

ऐसा भी नहीं कि‍ मदन कश्‍यप अपने अतीत से इतने मोहावि‍ष्‍ट हैं कि‍ उन्‍हें उनमें कुछ व्‍यति‍क्रम दि‍खता ही नहीं; अतीत के कुछेक मति‍भ्रंशों का उन्‍हें भी क्‍लेश है। उन्‍हें दि‍खता है कि‍ हमारे जि‍न पूर्वजों की नीयत सर्वदा जागती आँखों से सपना देखने की होती थी, अपने कि‍ए के इति‍हासीकरण की कभी कोई लि‍प्‍सा नहीं होती थी, उन्‍हीं पूर्वजों ने लम्‍बे समय तक व्रात्यों के जीवन-दशा की सुधि‍ क्‍यों नहीं ली, महावीर/बुद्ध जैसे दार्शनि‍क क्‍यों बि‍सार दि‍ए गए। पर उन्‍हें आज की दुर्वह पीड़ा अधि‍क सताती है, जब वे अपने देश के 'लीलाधरों' में इति‍हास मि‍टाकर अपना नाम उत्‍कीर्ण करने की बेताबी देखते हैं। प्रति‍शोध की खूनी लि‍प्‍सा से बौखलाए सेनापति‍यों की दहाड़-हुँकार सुनते हैं। इति‍हास-हन्‍ता बने इन 'कर्मवीरों' के आचरण पर उनकी धारणा जायज है कि‍ हजारों वर्ष पुराने सच अचानक से इस नई सदी में सपने में तब्‍दील होने लगे; इस ख़तरनाक समय में सपनों के सच होने की कोई जगह नहीं रही, यहाँ सच को सपना बनाने का उद्योग चल पड़ा।

उल्‍लेखनीय है कि‍ शरीर की चर्चा करते हुए भी मदन कश्‍यप की यह अनूठी कवि‍ता किसी शरीरी प्रेम की कविता नहीं है। इसमें प्रेम के उज्‍ज्‍वल और प्रभावी स्‍वरूप की पहचान बनाई गई है, यहाँ प्रेम की अमूर्तता को विवरण की आकृति मि‍ली है। पर मजे की बात यह है कि इस विवरण से भी कोई आकृति मूर्त नहीं होती, बस अनुभव का एक संसार रच जाता है। यह प्रेम व्यक्ति, समूह, राष्ट्र, मानवीयता, सामूहिकता, सभ्यता, प्रकृति...हर उपादान से प्रेम का सन्‍देश देती है। पर सन् 2015 आते-आते देश के सामुदायि‍क परि‍वेश से प्रेम तथ्‍यत: इस तरह लुप्‍त हुआ, घृणा और प्रति‍शोध का भाव इस तरह फैला, नि‍र्मि‍ति‍ त्‍यागकर वि‍ध्‍वंस की ऐसी लि‍प्‍सा सवार हुई कि‍ कवि‍ को इति‍हास के अन्‍धकार और सभ्‍यता की अतल नींव तक जाने की इच्‍छा बलवती हो गई। बीसवीं-इक्‍कीसवीं सदी के जीवन-प्रेमी इस कवि‍ नागरि‍क को देव-दनुज, दिति-अदिति, कि‍सी के वंशज होने का अहंकार नहीं पालना है; वे न तो पुरुरवा के दम्भ पसन्‍द करते, न ही दुष्यन्त की अहमन्यता, न ययाति का यौवन-मद, न देवव्रत की इच्‍छा-मृत्‍यु; वे पूर्वजों की सारी दुष्‍कृति‍यों से परांग्‍मुख हैं; वे मनुष्‍य हैं, पूर्वजों की कुछेक अनचाही भूलों के स्‍वीकृति-‍बोध के बावजूद, उन्‍हें अपने आत्‍मबल पर आस्‍था है, वि‍वेकशील प्रयत्‍नों की लालसा है। वे कहते हैं कि‍ 'मैं तो बस जीना चाहता हूँ अपने हिस्से की जिन्‍दगी/करना चाहता हूँ अपने हिस्से का प्यार/लड़ना चाहता हूँ अपने हिस्से की जंग/जंग, हिंसा से जिसका रिश्ता अनिवार्य नहीं होता है/जंग जो सिर्फ जीतने के लिए नहीं लड़ी जाती है।'

इस कवि‍ता के अगले अंश में अपने अस्‍ति‍त्‍व का सारा श्रेय अपने प्रेमाधार (अर्थात् सभ्‍यता) को देते हुए कवि‍ ने प्रेम का ऐसा सन्‍दर्श रचा कि‍ अमूर्त सभ्‍यता और शरीरी प्रेमि‍का का भेद मि‍ट गया। मनोरम कौशल से प्रेमानुभूति‍ को साकार करने की इस शैली को अपनी अनुभूति‍ में रमाया तो जा सकता है, इसकी व्‍याख्‍या नहीं की जा सकती है -- 'पहली बार तुम्हारे होंठों पर होंठ रखते हुए/मैंने अपने होंठों का होना भी महसूस किया था/वह मेरी ही आँखें थीं तुम्हें निहारती हुई/मेरी ही साँसें थीं तुम्हें छूती हुई/मेरी ही हथेलियाँ थीं/जितनी नर्म/उतनी ही कठोर/...जब हमने कसा था एक दूसरे को बाँहों में/तो वह जकड़न नहीं/मुक्ति थी देह और आत्मा की/अचानक झरने की शक्ल में फूट पड़ा था/चट्टानों के बीच सदियों से ठहरा जल/...कुछ पल के लिए/ईश्वर ने त्याग दिया था स्रष्टा का भाव/और मुक्त कर दिया था मनुष्य को/रचने के लिए प्यार!' प्रेम में ऐसा समर्पण वि‍लक्षण है। ऐसे वि‍लक्षण वर्णन का कोई वर्णन नहीं हो सकता, अनुभूति‍ हो सकती है। साहि‍त्‍यि‍क वातावरण में प्रेम के ऐसे समर्पण का स्‍वरूप वि‍द्यापति‍ (तोहें जनमि पुनि तोहें समाओब सागर लहरि समाना) के सि‍वा अन्‍यत्र कम दि‍खा है। यहाँ तो कवि‍ को अपने होने तक का गुमान नहीं है। प्रेम के संस्‍पर्श ने ही उनके होंठों, आँखों, साँसों...को सार्थकता दी, पहचान दी। एक दूसरे के आलिंगन में आते ही अकड़-जकड़ के सारे रोध तरल हो गए, चट्टानों के बीच सदियों से ठहरे जल झरने लगे, देह देह रहा, आत्मा आत्‍मा रही, ईश्वर तक ने सृष्‍टि त्यागकर प्यार रचने के लिए ‍मनुष्य को मुक्त कर दिया, चारो ओर प्‍यार ही प्‍यार बचा रहा...ओफ्फ्...प्‍यार को इस तरह जीवन्‍त करना सम्‍भवत: मदन कश्‍यप से ही सम्‍भव था। इस कवि‍ता को, और इनकी इस जैसी अन्‍य कवि‍ताओं को पढ़कर एक बार फि‍र से नि‍र्धारि‍त होता है कि‍ मनुष्‍य की सृष्‍टि‍ प्‍यार करने के लि‍ए हुई है। काश, इस जमाने के घृणा के सौदागर ये कवि‍ताएँ अनुरागपूर्वक पढ़ते!

अपने हिस्से की जिन्‍दगी जीने, अपने हिस्से का प्यार करने, अपने हि‍स्‍से की जंग लड़ने की कामना रखनेवाले कवि मदन कश्‍यप ज्‍यों ही इस प्रेम-क्षेत्र में उतरे; रोचक है कि‍ पूरी कवि‍ता में देर तक वहीं ठहर गए। सन् 2015 के उन्‍मादी, प्रति‍शोधी और वि‍ध्‍वंसक वातावरण से व्‍यथि‍त होकर, अपनी जि‍स छह हजार वर्ष बूढ़ी सभ्यता के प्रेम-पाश में गए, देर तक वापस नहीं हुए, उसी प्रेम-सरोबर में गोता लगाते रहे। प्रेम की जद में आए लोग-बाग सचमुच उसी के होकर रह जाते हैं, यह प्रेम का नैसर्गि‍क स्‍वभाव है।

इस प्रेम में कवि‍ को दर्द भी फुसफुसाहटों-सा धीमा या 'न' जैसा प्रतीत होता है; यहाँ प्‍यार से इतर सारे भाव अपना अस्‍ति‍त्‍व खो देते हैं; यहाँ तक कि‍ प्रेमी का 'मैं' भी 'मैं' जैसा नहीं लगता -- 'बस एक प्यार था प्यार की तरह/चारों ओर पसरी थी जिसकी गहरी छुअन/जिसके पहलू में आकर हर रंग/बदल लेता था अपना रूप।... तुम्हारे कोमल कपोलों पर मचल रही लालिमा/मैं खुशबू की तरह फैलता चला जा रहा था/पूरे ब्रह्माण्ड में।... सितारों के बेलबूटों वाले आसमान को/चादर की तरह ओढ़ कर/मैं चला जाना चाहता था/तुम्हारी ऊर्ध्व हँसी के उड़नखटोले पर बैठे-बैठे/जोगिनों मालिनों की किस्से कहानियों वाली दुनिया में।'

यहाँ कपोलों पर मचल रही लालि‍मा से प्रेम की नैसर्गि‍कता को प्रश्‍नांकि‍त करने का उद्वेग सुभद्र नहीं होगा। वस्‍तुत: प्रेम का भाव ही ऐसा होता है, जि‍समें घि‍र जाने के बाद सारा कुछ सुन्‍दर ही सुन्‍दर दि‍खता है। 'छाप ति‍लक सब छीनी' की तरह। प्रेमी को अपने प्रेमाधार जैसा सौन्‍दर्य अन्‍यत्र कहीं नहीं दि‍खता। तभी तो कवि‍ अपनी प्रेमि‍का के सौन्‍दर्य पर चकि‍त होते हैं -- 'उफ्! यह इतनी सुन्दरता/कि सुन्दरता में ही छिप जाती है तुम्हारी सुन्दरता/जैसे ईश्वर में छिप जाता है ईश्वर।' सुन्दरता में सुन्दरता और ईश्वर में ईश्वर के छिप जाने के ऐसे अनूठे रूपक ने प्रेमि‍का के सौन्‍दर्य को अनन्‍त वि‍स्‍तार दि‍या है। ऐसे भव्‍य-दि‍व्‍य सौन्‍दर्य में तृप्‍त होने के लि‍ए प्रेम-प्रवाह की लहरें कातर नदी की तरह उमड़कर भी कि‍नारे को नहीं छू पातीं। हृदय में उमड़ी मुस्कान को प्रेमी, प्रेमि‍का के होंठों तक पहुँचाना चाहते हैं, उनके बालों में फँसी बारिश की फुहियों को कविता की रुमाल से पोंछना चाहते हैं, पर क्रमश: सारा कुछ मिट जाता है, यथार्थ भी दरक जाता है, बस सम्मोहन नहीं टूटता, आशंकाओं के बीच भी प्यार बचा रहता है। प्यार की दुनिया में उन्‍हें, ईश्वर की दुनिया से कहीं अधि‍क हलचल दि‍खती है। दुख यहाँ बेशक बड़ा दुख है, सुख बेशक छोटा सुख, उदासी भी आती ही रहती है; पर प्रेम करनेवाले इन्‍हें जीवन के अनुषंग मानते हैं। स्मृतियों की खि‍ड़की से झाँकते समय उन्‍हें अपनी प्रेमि‍का कभी सम्‍मोहि‍त करनेवाली जादूगरनी तो कभी लोककथाओं की सम्‍मोहि‍का दौना मालिन या नैना जोगिन लगती हैं। दौना मालिन के बगीचे में फूल है, फूलों में खुशबू है; पर अन्‍त में दौना मालि‍न कहती हैं -- 'ख़ुशबू में तुम हो', 'तुझमें मैं हूँ', 'मुझमें तुम हो!'

प्रेम के इस अत्‍यन्‍त मोहक सरोबर में गोता लगाते हुए अन्‍ति‍म अंश में कवि‍ पुन: प्रेमाकुल क्रि‍या के लि‍ए उस प्रेम-भाव से वापस अतीत की ओर रुख करते हैं -- 'मैं तुम्हारी आत्मा के अन्‍धेरे में/धूप की थिगली की तरह पसरना चाहता हूँ/तुम्हारी करुण चुप्पी में/अक्षर के अंकुर-सा फूटना चाहता हूँ/सात हजार वर्षों से तुम्हारे सीने पर रखी/सभ्यता की पुंस चट्टानें हटाना चाहता हूँ/तुम्हारी नीन्‍द में पैठ कर/भयानक सपनों को दूर भगाना चाहता हूँ/...तुम्हारे घुटनों की ताकत बन कर खड़ा होना चाहता हूँ/तुम्हें पाना नहीं/तुझमें विलीन हो जाना चाहता हूँ।' चारो ओर फैले हिंस्र वातावरण के बावजूद यह कवि‍ता हमें ध्‍वंस और प्रति‍शोध के भाव से बरजती है और प्रेम एवं अनुराग की ओर अनुरक्‍त करती है।

इस कवि‍ता के छठे अवतरण में घृणा के सौदागरों के लि‍ए महान दार्शनि‍‍क ग्रन्‍थ (अद्वैत वेदान्‍ती मण्‍डन मि‍श्र की 'ब्रह्मसि‍द्धि‍' में 'रज्‍जु सर्प:' का उल्‍लेख है, जि‍सका सार यह है कि‍ प्रकाश की अनुपस्‍थि‍त में रस्‍सी भी साँप लगती है) से एक बड़ा सन्‍देश देते हैं कि‍ 'इतिहास जब अन्‍धेरे में था/तब भी था/और तब भी मैं तुम्हें ही ढूँढ़ रहा था।' वि‍लक्षण धारणा है कि‍ अन्‍धकार होने पर भी कोई प्रेमी प्रेमाधार को ही ढूँढता है, घृणा उसके नि‍कट नहीं जा पाती; फि‍र इक्‍कीसवीं सदी के नागरि‍कों को ऐसा मन्‍त्र कि‍सने दि‍या कि‍ उसके भीतर घृणा और द्रोह के अलावा कुछ रहा ही नहीं। सभ्‍यता के शुरुआती दौर में जब रोशनी की पहली कि‍रण प्रकट हुई, और दुनिया को अपने होने की अनुभूति‍ हुई; तब इस कवि‍ के पूर्वज भी सहस्रो अभि‍लाषाओं के साथ उन सभी राहों पर दौड़ते-भागते रहे थे, जो वस्‍तुत: रास्ते थे ही नहीं; फि‍र आज के नागरि‍क सर्वदा घृणा से ही इतना प्रेम क्‍यों करते हैं?

मदन कश्‍यप के यहाँ जीवन के वि‍वि‍धमुखी संघर्षों और क्रि‍याओं की तरह प्रेम के अनेक रूप हैं। सारे ही रूपों में जीवन-धर्मी वैवि‍ध्‍य तो है, पर हर जगह वि‍वेक और मनुष्‍यता की रक्षा का उत्‍कर्ष बसा हुआ है। जीवन और प्रेम को सुरक्षि‍त और नि‍ष्‍कलुष बनाए रखने की जि‍द है। 'नीम रोशनी में' शीर्षक उनके दूसरे संग्रह की छठी कवि‍ता है 'तुम्हारी यादें।' यह कवि‍ता दूसरे मध्‍यावधि‍ चुनाव के बाद सन् 1982 में लि‍खी गई। भावकों को भली-भाँति‍ स्‍मरण होगा कि‍ यह समय भारतीय समाज में शि‍क्षा, रोजगार की सम्‍भावनाओं और नीति‍-वि‍वेक को नेस्‍तनाबूद करने, तथा दलाली-माफि‍यागि‍री के संस्‍थानीकरण का काल था। जाहि‍र है कि‍ ऐसे क्रूर समय की नृशंसताओं का असर प्रेम पर भी होना था। जीने के संसाधन जुटाने की मजबूरि‍याँ कर्ता की कार्यसूची में प्राथमि‍क बन गई थीं, पर इस कारण प्रेम परोक्ष नहीं हो गया था, स्‍मृति‍यों में बसा रहता था। नि‍रपेक्ष भावकों को गौर करना होगा कि‍ लक्षण-ग्रन्‍थ में और मध्‍यकालीन साहि‍त्‍य में खण्‍डि‍ता नायि‍काओं का जि‍तना वर्णन है, स्‍वाधीन भारत की लोकतान्‍त्रि‍क व्‍यवस्‍था ने खण्‍डि‍त नायकों की जीवन-व्‍यवस्‍था कहीं उससे अधि‍क दुर्वह बना दी। 'तुम्‍हारी यादें' शीर्षक इस कवि‍ता में वैसे ही खण्‍डि‍त नायक के मार्मि‍क चि‍त्र अंकि‍त हुए हैं। इसमें अंकि‍त यादें प्रेमि‍का के आलिंगन-सुख या सहभोग-सुख की यादें ही नहीं हैं। कोलि‍यरी क्षेत्र में कार्यरत, जीवन-यापन के संसाधन जुटाने की और उसके मार्ग में आई यातनाओं की चट्टान तोड़ने में तल्‍लीन कर्मि‍यों की पीड़ओं को प्रेम की स्‍मृति‍यों के साथ रूपायि‍त कि‍या गया है। उन कर्मि‍यों में खुद का कायान्‍तरण करते हुए कवि‍ इस कवि‍ता का वाचक बन बैठे हैं, जि‍नकी स्‍मृति‍ में प्रेम, प्रेमि‍का और गाँव अपने सारे भावों के साथ बसा हुआ है। इसमें वाचक का गँवई मन खुद को तालाब से नि‍कलकर मछुआरे की हाँड़ी में गि‍री मछली की तरह बेबस देख रहा है। स्‍मृति‍यों के अलावा उसे कुछ भी अपना और सुखद नहीं लगता। वह गाँव के हर प्रसंग को लगातार याद करता रहता है। यहाँ प्रेमी के मन में बसे प्रेम और प्रेमाधार की स्‍मृति‍ तो वि‍लक्षण है ही, उससे भी बड़ी वि‍लक्षणता उस प्रेम के अनुमाप के लि‍ए रचे गए रूपक में है, जो कि‍सानी संस्‍कृति‍, कृषि‍-कर्म, कि‍सानी उपादान, ग्राम्‍य वातावरण और फसलों से कवि‍ के प्रेम को नि‍रूपि‍त करता है। उन्‍हें जेठ की पहली बारिश के बाद, उत्तप्‍त-अकुलाई धरती से उठनेवाली सोंधी महक की याद आती है। यद्यपि‍ 'कस्‍तूरी कुण्‍डली बसै' की तरह वह महक उनकी स्मृति‍ में पहले से दर्ज रहती है। वस्‍तुत: कि‍सी अकुण्‍ठ प्रेम के अवधारक की स्मृति में इसका बसा रहना उचि‍त ही है, फि‍र भी उन्‍हें अचरज होता है कि‍ वह महक गाँव से नगर तक की दूरी में नदियों, पहाड़ों और जंगलों को पार करते हुए, न जाने कैसे, खिच्चे दानों में भरते दूध की तरह उनकी आत्मा में भरती चली आती है! 'कोयले की गर्द/और चिमनियों के विषाक्त धुएँ से भरे वायुमण्‍डल में/जाने कैसे जीवित बच आती है वह गन्‍ध...।' वाचक के हाथों में भले ही 'धनरोपनी के कीचड़ की जगह/ग्रीस और मोबिल लगते हैं...।' पर 'आँखें अब भी देखती हैं/लहलहाती फसलों का सपना।' इस प्रेमालाप में बेशक कहीं प्रेमि‍का का उल्‍लेख नहीं है, पर प्‍यार एक ऐसी मानवीय वृत्ति‍ है, जि‍समें प्रेमी केवल प्रेमि‍का के रूप-स्‍वरूप-व्‍यवहार-आलिंगन या प्रेम की अन्‍य क्रि‍याओं को ही नहीं, प्रेमि‍का के सगे-सम्‍बन्‍धि‍यों और उसके रहवासी वातावरण तक से प्‍यार करता है। वाचक केवल जीवन-संघर्ष की मजबूरि‍यों से ही त्रस्‍त नहीं है, वह 'ऊँची चिमनियों और गहरी खदानों की/साँप-सीढ़ियों वाली' औद्योगिक नगरी में जीवन-यापन के संसाधन जुटाने में अपनी भावनाओं को थोक भाव से खर्च करते हुए, उन माफ़ियाओं, दलालों, 'क्रान्‍ति की बातों से बातों की क्रान्‍ति करने वाले' श्रमिक-नेताओं या कि‍ क्रान्‍ति के सौदागरों के भ्रमजालों से भी त्रस्‍त है, फि‍र भी वह अपने प्रेम को नहीं भूल पाता। वह खुद को तालाब से नि‍कालकर मछेरे की हाँड़ि‍यों में पहुँचाए मछली की तरह महसूस करता है और मुक्‍ति‍ के लि‍ए छटपटाता रहता है। यह केवल जीवन-संघर्ष और प्रेम के द्वन्‍द्व की छटपटाहट नहीं है; इसमें दुनि‍यावी फरेब में फँसे जनसाधारण की लालसाओं के अमानवीय दमन से मुक्‍ति-कामना भी है।

गौरतलब है कि मदन कश्‍यप प्रेम के कवि‍ होकर भी भावुकताओं के ज्‍वार में बह चलनेवाले कवि‍ नहीं हैं; उन्‍हें जीवन-संघर्ष के हरेक सोपान पल-पल याद रहते हैं। इसलि‍ए इस कवि‍ता के वाचक के रूप में कहते हैं कि‍ 'कभी भी तो नहीं भूल पाता हूँ तुम्हें/मक्के की हरी बाल के खिच्चे दानों जैसी/तुम्हारी धवल दन्‍तपंक्तियों से/झड़ने वाली उजली-उजली हँसी/अभी भी मेरी नीन्‍द में थिरकती है/आषाढ़ की बारिश में उपजे मोथे की जड़ों-सी मीठी/तुम्हारी यादें/गठिबन्‍ध सरीखी मेरी आत्मा से लिपटी हैं!' वि‍दि‍त है कि‍ रचनाओं में रूपक और उपमान रचने के कौशल में रचनाकार के रचनात्‍मक सरोकार प्रकट होते हैं। मकई की बाली जैसी दन्‍तपंक्‍ति‍ और बारि‍श में उपजे मोथे की जड़ों जैसी मि‍ठास जैसा रूपक कि‍सानी संस्‍कृति‍ से प्‍यार करनेवाला कोई कवि‍ ही रच सकता है, वर्ना तो वह 'सि‍न्‍दूर लोहि‍त मोती अइसन दाँत' या 'मि‍स्री जैसी मि‍ठास' ढूँढता।

इसी तरह इस संकलन की अगली कवि‍ता 'कुछ देर साथ चलो' (सन् 1993) में प्रेम का एक दूसरा रूप नि‍खरता है, जि‍समें तीन बि‍म्‍बों--काली सड़क, दमकती धूपवाली जलती ति‍पहरी और वाटि‍का-वि‍हीन, झीलहीन वातावरण के सहारे कवि‍ ने महानगरीय जीवन की मूल्‍य-रि‍क्‍तता को उजागर कर दि‍या है। राजीव गाँधी की हत्‍या (मई 1991) और भारतीय लोकतन्‍त्र के दसवें लोकसभा चुनाव (जून 1991) के बाद सि‍र पर बैठी सरकार में हर्षद मेहता घोटाला (सन् 1992), मस्‍जि‍द-ध्‍वंस (सन् 1992) के बाद की क्रूर हिंसाएँ, बम्‍बई में शृंखलाबद्ध बम-वि‍स्‍फोट (सन् 1993), राजनीति के अपराधीकरण पर वोहरा की रिपोर्ट, जैन हवाला काण्‍ड, तन्‍दूर हत्याकाण्‍ड, झामुमो घूसकाण्‍ड, इण्‍डियन बैंक स्कैम, शुगर इम्‍पोर्ट घोटाला, लखूभाई घोटाला, सुखराम घोटाला, यूरिया घोटाला जैसे मामले सामने आए, जि‍सने नरसिंहराव सरकार की विश्वसनीयता धूमिल कर दी। इन स्‍थि‍ति‍यों ने इन वर्षों के भारतीय परि‍वेश को ऐसा मूल्‍यहीन बनाया कि‍ स्‍नेह और सम्‍बन्‍धों में रि‍क्‍तता ही रि‍क्‍तता भर गई थी, अनास्‍था परवान चढ़ी थी, वि‍श्‍वासपूर्वक कि‍सी प्रसंग में कुछ कहना कठि‍न हो गया था। ऊपर से पी.वी. नरसिंहराव के नेतृत्ववाला कांग्रेसी शासन...। मनुष्‍य तो हर मामले में अवसन्‍न ही था। ऐसे समय में महानगरीय जीवन में स्‍नेह-शून्‍य सम्‍बन्‍धों की औपचारि‍कताओं एवं वि‍डम्‍बनाओं के सि‍वा कुछ भी बचा नहीं रह गया था, प्रेमि‍का का व्‍यवहार भी कुछ-कुछ परीक्षणीय ही था। इन्‍हीं सन्‍दर्भों को प्रकट करते हुए कवि, प्रेमि‍का से कहते हैं 'कुछ देर साथ चलो/महानगर बनते शहर की काली सड़क पर/इस ढलती मगर जलती तिपहरी में चलना कठिन है/...बस थोड़ा दूर-दूर ही सही/थोड़ी दूर तक चलो/इस शहर में शामें सुनहरी नहीं होतीं/...कोई झील नहीं/जो हमारे स्नेह को दे सके शीतल स्पर्श/बस तपती हुई सड़क का निर्मम सूनापन/यह काफ़ी है कुछ दूर तक साथ चलने के लिए!'

जि‍स महानगरीय आचरण को काली सड़क की कालि‍मा (कलुष), दमकती धूपवाली जलती ति‍पहरी की तीक्ष्‍णता एवं क्रूरता और वाटि‍का-वि‍हीन, झीलहीन शहर का शुष्‍क वातावरण मनुष्‍य को रि‍क्‍त कर देता है; उसी रि‍क्‍तता से उबरने के लि‍ए कवि‍ अपनी प्रेमि‍का को आश्‍वस्‍त करते हुए कुछ दूर तक साथ चलने का आग्रह करते हैं। इस आग्रह में कवि को कहीं प्रेमि‍का पर अनास्‍था नहीं है; बल्‍कि‍ उपस्‍थि‍त वातावरण में कदाचि‍त प्रेमि‍का के मन में उपजी अनास्‍था को दूर करने और अपने व्‍यवहार की आश्‍वस्‍ति‍ देने का आग्रह है। वे आग्रह करते हैं कि दूर-दूर ही सही, पर थोड़ी दूर तक चलो, इस शहर की तपती सड़क के निर्मम सूनापन से खुद को उबारने के लि‍ए यह पर्याप्‍त होगा।

पर सन् 2016 आते-आते जनपदीय वातावरण में वि‍राट परि‍वर्तन आ गया। धर्मान्‍धता, साम्‍प्रदायि‍कता, घृणा, द्रोह, प्रति‍शोध और अनास्‍था की चि‍नगारि‍यों को हवा दे-देकर ज्‍वाला बनाने का कार्य पूरा हो चुका था। सामुदायि‍क जीवन में धर्म और शासन का ऐसा दखल हुआ कि सामाजि‍कता के पुनीत अर्थ सि‍रे से गायब हो गए। 'पनसोखा है इन्‍द्रधनुष' संग्रह में संकलि‍त कवि‍ता 'अकेलापन' (सन् 2016) ऐसी ही वि‍डम्‍बनाओं को उजागर करता है। असंगत और मनुष्य विरोधी आचरणों में तल्लीन ऐसी लोकतान्‍त्रिक व्यवस्था में मदन कश्यप बार-बार अपनी कविता के लि‍ए प्रेम और प्रेम की भाषा तलाशते दि‍खते हैं। प्रेम के प्रतिगामी स्वरूप और पाखण्‍डपूर्ण आचरण की चतुर्दि‍क व्‍याप्‍ति‍ देखकर वे धिक्कार और आत्मालाप पर उतर आए हैं। प्रेम के मनभावन स्वरूप की अनुपस्‍थि‍ति‍ मनुष्‍य को अकेलेपन का शि‍कार बनाता है। अकेलेपन की दुर्वह स्‍थि‍ति से उबरने के लि‍ए ही कभी हमारे पूर्वजों ने सामाजि‍कता और सामूहि‍कता की भावना वि‍कसि‍त की होगी। अक्‍सर देखा जाता है कि‍ समाज के हर परि‍वार के लोग अपनी दैनन्‍दि‍न चर्या की प्रति‍पूर्ति‍ अपने उद्यमों से करते हैं, पर जीवन में कदम-कदम पर ऐसी स्‍थि‍ति‍याँ आती हैं, जि‍नसे नि‍पटने के लि‍ए सामाजि‍क सहयोग अनि‍वार्य होता है। पर व्‍यवहारत: देखा जाने लगा कि‍ राजनीति‍क दखलन्‍दाजी से यह सामाजि‍कता खण्‍डि‍त होने लगी। मनुष्‍य धर्म, सम्‍प्रदाय, जाति‍, वर्ग, पदक्रम, भाषा में वि‍भाजि‍त होने लगा। ऐसा भी नहीं रहने लगा कि‍ समान धर्म या समान जाति‍ के लोगों में पारस्‍परि‍क आस्‍था हो। अपने खण्‍ड में आकर भी लोग अन्‍तत: खण्‍डि‍त ही रहने लगे। ऐसे में कवि‍ के समक्ष कवि‍ता की भाषा का सवाल खड़ा हुआ। गि‍नती के लोगों की अभीप्‍सा-पूर्ति‍ के लि‍ए ऐसा जघन्‍य आचरण, न केवल नागरि‍कों के लि‍ए, बल्‍कि‍ कवि‍ नागरि‍क के लि‍ए भी दुर्वह ही होना था, सो हुआ। छठे-सातवें दशक में ऐसे राजनीति‍क आचरणों पर राजकमल चौधरी को क्रोध आया था, वे भी इसी तरह धिक्कार और आत्मालाप पर उतर आए थे।

पन्‍द्रह अगस्‍त 1966 को प्रकाशि‍त अति‍चर्चि‍त दीर्घ कवि‍ता 'मुक्‍ति‍ प्रसंग' चन्‍द पंक्‍ति‍यों में -- 'मैं कुछ नहीं जानता हूँ/स्‍त्रियों नदियों बीमारियों भूख जन्म अपराधों ईश्वर मृत्यु दास्तोवस्की/हिरोशिमा विधान-सभाओं के विषय में कुछ नहीं/आदमी क्यों पार करता है युद्ध क्यों परिवार नियोजन/क्यों बर्लिन की दीवार/क्यों देशप्रेम क्यों अफीम की गोलियाँ क्यों चैप्लिन की फिल्में/क्यों ताशकन्द-सम्मेलन क्यों रीढ़ की हड्डियों में/गैंग्रीन/...क्यों सुकरात क्यों सेगाँव की बौद्ध भिक्षुणियाँ जल मरती हैं/क्यों गर्गातुआँ की कहानियाँ क्यों काश्मीर के लिए/सेनाएँ क्यों अजन्ता/क्यों एक ही युद्ध मेरी कमर की हड्डियों में और कभी वियतनाम में होता है/...वियतनाम में उड़ी-पुँछ में यू.एन.ओ. में तिब्बत बस्तर काले अफ्रीका में/वह आगे बढ़ता है राइफल का निशाना साधने के लिए/मेरे ही कलेजे पर मस्तिष्क पर/...मूल्य-नियन्त्रण के लिए कभी उड़ीसा में दुर्भिक्ष/काहिरा में कभी शक्ति-सम्मेलन युद्ध अणु-आयुध नियन्त्रण के लिए/कभी दण्ड कभी साम/कभी ईसामसीह और कभी वेश्याओं के नाम/...वैज्ञानिक राजनेता और स्‍त्री के अंगों के व्यापारी/कुल तीन ही प्रभु-जातियाँ रह गई हैं अब स्वयम्भू अस्तु/मैं क्रीतदास हूँ/...मैं इतिहास-पुस्तक की तरह खुला पड़ा हुआ हूँ/लेकिन मेरा देश मेरा पेट मेरा ब्लाडर मेरी अँतड़ियाँ खुलने से पहले/सर्जनों को यह जान लेना होगा/हर जगह नहीं है जल अथवा रक्त अथवा माँस/अथवा मिट्टी/केवल हवा कीड़े जख्म और गन्दे पनाले हैं अधिक स्थानों पर इस देश में/जहाँ सड़कर फट गई हैं नसें वहाँ हवा तक नहीं/...अपने रोग अपनी भूख अपनी नीन्द अपने युद्ध में प्रत्येक आदमी/बालखिल्य-ऋषि है अपने अन्दर/किसी चमगादड़ मन्‍त्री-उपमन्‍त्री अन्नपूर्णा उग्रतारा की एक मूर्ति/अपने घर अपने मन्दिर में स्थापित करता है (रा.क.चौ. रचनावली, पृ. 42-47)।' में भावकगण राजकमल चौधरी के क्रोध, आत्‍मालाप, धि‍क्कार, राष्‍ट्र-प्रेम, नागरि‍क सरोकार, लोक-तन्‍त्र की अवधारणा, वैश्‍वि‍क राजनीति की समझ, इति‍हासबोध, सामुदायि‍क बेवशी पर क्रुद्ध बरबराहट स्‍पष्‍ट देख सकते हैं।

वि‍दि‍त है कि हर कवि‍ अपनी कवि‍ता का कथ्‍य प्रत्‍यक्ष परि‍वेश से ही उठाता है। कोई ज्ञानी कवि‍ कभी अपने ज्ञानलोक से वि‍षय ले भी ले, तो भी अपनी कवि‍ता को समकालीन और अन्‍नत: कालजयी बनाने के लि‍ए उसे अपने वर्तमान में आना ही पड़ता है। घटि‍त दृश्‍य तो कवि‍ को केवल भावुक (मुग्‍ध, क्रुद्ध, वीतराग) बनाता है, इन भावों से कवि दग्‍ध भर होते हैं। भाव मात्र से कवि‍ता पूरी नहीं होती। वाल्‍मीकि‍ भी क्रौंच-वध की घटना से दग्‍ध भर हुए थे। कवि‍ता, घटि‍त दृश्‍य के रूपान्‍तरण से पूरी होती है। घटि‍त दृश्‍य या कथ्‍य का कवि‍ता में रूपान्‍तरण वि‍शि‍ष्‍ट कौशल से होता है। बि‍म्‍ब, प्रतीक, रूपक और कहन की लय-रक्षा इस कौशल का अनि‍वार्य घटक है। जि‍स कवि की राजनीति‍क चेतना जि‍तनी उन्‍नत होगी, अपने समय के इति‍हास, परम्‍परा, समाज, राष्‍ट्र और वैश्‍वि‍क घटनाओं की समझ जि‍तनी सूक्ष्‍म होगी; उनका कौशल उतना ही उन्‍नत होगा। सुधी जन जानते हैं कि‍ राजकमल चौधरी अपने समय के सर्वाधि‍क अधीत रचनाकार थे। पौराणि‍क प्रतीकों ने उनकी कवि‍ताओं को जि‍तना उज्‍ज्‍वल और प्रभावशाली बनाया है, कोई अन्‍य शैली प्राय: इतनी कारगर नहीं होती।

इन सारे अभि‍ज्ञान से सम्‍पन्‍न कवि मदन कश्‍यप की कवि‍ताओं का अवगाहन करनेवाले बड़ी सहजता से गणि‍त कर लेंगे कि‍ राजकमल चौधरी से उनकी अनुरक्‍ति‍ अकारण ही नहीं है। प्रभाव ग्रहण करना या प्रभावि‍त होना सचेत मनुष्‍य की जीवन्‍तता का प्रमाण है। नि‍र्जीव वस्‍तु पर कि‍सी भी भाव का प्रभाव नहीं पड़ता। राजकमल चौधरी की सृजन-दृष्‍टि‍ का कुछ न कुछ प्रभाव परवर्ती काल के अनेक कवि‍यों पर पड़ा है; पर गौर करना अनि‍वार्य है कि‍ वि‍श्‍व इति‍हास और वैश्‍वि‍क घटनाओं की जैसी समझ मदन कश्‍यप की कवि‍ताओं में है, राजकमल चौधरी के अति‍रि‍क्‍त हि‍न्‍दी के काव्‍य-परि‍वेश में अन्‍यत्र कम है।

राजकमल चौधरी, मदन कश्‍यप के मानक रचनाकार हैं, पर इस कारण यह नहीं मानना चाहि‍ए कि‍ मदन कश्‍यप ने कहीं राजकमल चौधरी का अनुगमन कि‍या है या कि‍ दोनो का अकेलापन, क्रोध, धिक्कार और आत्मालाप समान है। दोनो के चि‍न्‍तन में मानवीयता-प्रेम बेशक समान है, पर दोनो की परि‍स्‍थि‍ति‍यों में विराट अन्‍तर है। सारी वि‍संगति‍यों के बावजूद राजकमल चौधरी के समय में मनुष्‍य के लि‍ए कुछ सम्‍भावनाएँ बची हुई थीं, जो मदन कश्‍यप के समय में सि‍रे से नष्‍ट कर दी गईं। इसलि‍ए मदन कश्‍यप का अकेलापन, क्रोध, धिक्कार और आत्मालाप राजकमल चौधरी से भि‍न्‍न है।

'अकेलापन' शीर्षक इस कवि‍ता में कवि‍ का अकेलापन मात्र उनका नि‍जी अकेलापन नहीं है, सामुदायि‍क अकेलापन है; समुदाय में रहकर भी हर नागरि‍क अपने अकेलेपन का दर्द भोग रहा है। इसलि‍ए कवि‍ को बार-बार बेचैनी और विवशता के शरण में जाना पड़ता है, और तब उनका क्रोध मुखर होता है। व्यंग्य की धार प्रहारक हो उठती है। उनका अकेलापन गुलदस्ते में सूख रहे फूलों की उदास गन्‍ध जैसा हो जाता है, एकदम से नि‍ष्‍प्रभ, जो खिड़की से बाहर निकलना तो चाहता है, पर उसकी अशक्‍यता उसे कहीं जाने में सक्षम नहीं बनाती। फलस्‍वरूप वह कवि‍ की रगों में दौड़ती ख़ामोशी बन जाती है और फि‍र वही खामोशी उनके प्रेमाधार को यह कहकर पुकारना चाहती है कि‍ 'सुन सकती हो तो सुनो/और जो नहीं सुन सकती, तब भी इन बेचैनियों के होने पर यकीन करो/कसमसाहट जो बाहर बहुत कम दिख रही है/भीतर बहुत-बहुत तेज़ है।' कवि‍ता के अगले अंश में कवि‍ कहते हैं कि‍ 'यह अब इतना आसान नहीं/कि गणित के सवालों को हल करते हुए/समय के सवालों के हल पा लिए जाएँ/मैं तुम्हें प्यार करता हूँ शायद इसीलिए बेहद/कि तुम्हारा प्यार और बढ़ा देता है मेरा अकेलापन/कर देता है मुझे और बेचैन/और यह सब अब शामिल है मेरी आदत में।' गणित और समय के सवालों के हल नि‍कालने की पद्धति‍ में प्रति‍कूलन भाव डालते हुए इस पद्यांश में कवि‍ ने प्रमेय के एक बड़े परि‍प्रेक्ष्‍य की ओर इशारा कि‍या है, क्‍योंकि‍ गणि‍त के सवाल प्रकटत: आते हैं, जि‍सके हल कि‍सी सुनि‍श्‍चि‍त प्रमेय से नि‍श्‍चय ही नि‍कलते हैं; समय के सवाल न तो दृश्‍य होते हैं, न उसके हल का कोई प्रमेय होता।

गौरतलब है कि‍ प्रेमि‍का के रूप में लक्षि‍त इस प्रेम-कवि‍ता का प्रेमाधार कोई स्‍त्री नहीं, वह मनोरम व्‍यवस्‍था है, जि‍सके सम्‍मोहन में रहकर हर नागरि‍क अपने समय के सवालों का हल, गणि‍त के सवालों की तरह नि‍काल लेता है। यह भेद कवि‍ की उस पंक्‍ति‍ में खुलता है, जब उनका प्यार उनके अकेलेपन को और बढ़ा देता है, उन्‍हें और बेचैन कर देता है; और इन सबको वे अपनी आदत में शामिल कर लेते हैं। समय की धारा को देखते हुए वे आश्‍वस्‍त हो चुके हैं कि‍ इस वातावरण में अब मनोरम व्‍यवस्‍था तो आने से रही, फि‍र क्‍यों न व्‍यवस्‍थाहीनता की ही आदत डाल ली जाए! क्‍योंकि‍ कवि‍ को अन्‍तत: अपने और अपने समाज के जीवन से प्‍यार है। पर चूँकि‍ वे एकदम से नि‍रास भी नहीं हैं, समय-चक्र और जनशक्‍ति‍ पर उन्‍हें आस्‍था बची हुई है, इसलि‍ए वे उस व्‍यवस्‍था को धि‍क्‍कारकर कहते हैं कि 'आओ/जो मुझसे नहीं मिलना चाहती/तब भी आओ/और मिलो मेरे अकेलापन से/मेरी उदासी में घोल दो थोड़ी और उदासी!'

यद्यपि उन्‍हें मालूम है कि‍ सरकार की तरह ही उन्‍होंने अपने अकेलेपन का समय भी खुद नहीं चुना नहीं है, फि‍र भी वे स्‍वीकारते हैं कि‍ यह समय उनका समय है, जि‍से वे पार करना चाहते हैं। उनकी स्‍मृति‍ में उनके पुरखे भी हैं। वे खुद को विद्यापति के दुखों का वारिस मानते हैं, पर उनके पास उन जैसी कोई अमोघ शक्‍ति‍ नहीं रहने दी गई है। जि‍स कारण कोई अनुष्ठान उनके काम नहीं आनेवाले हैं, इसलि‍ए वे व्‍यवस्‍था को भी इतराने से बरजते हैं, क्‍योंकि‍ कि‍सी प्रयोजनकाल में ये उनके काम भी नहीं आएँगे। नैराश्‍य के ऐसे क्षणों में उसे वे अपने अकेलेपन में और उदासी घोलने आने का आमन्‍त्रण देते हैं। उन्‍हें सारे शुभग उपक्रमों की क्षमता पर अचरज होता है कि‍ 'सबसे विश्वसनीय विचारधारा मुझे बचाती क्यों नहीं/सबसे सुन्दर सपना मुझे लुभाता क्यों नहीं।' यहाँ आकर कवि‍ मान लेते हैं कि‍ 'केवल मनुष्यों की अनुपस्थिति नहीं/प्रत्ययों का संकुचन है अकेलापन/जो धीरे-धीरे हमें ले जाता है वहाँ/जहाँ से हम दुख को सराहने लगते हैं।' प्रेम की कवि‍ता होकर भी यह सामुदयि‍क जीवन की बेबसी की कवि‍ता है। प्रेम तो यहाँ प्रति‍कूलन (कण्‍ट्रास्‍ट) द्वारा व्‍यंग्‍य की धार तेज करने के लि‍ए लाया गया है। यह उनके सृजनात्‍मक कौशल की एक वि‍लक्षण पद्धति‍ है।

सन् 2012 से 2015 के बीच अवसर पाकर मदन कश्‍यप ने चैटिंग की शैली में बारह कवि‍ताएँ लि‍खीं, जि‍न्‍हें उन्‍होंने 'चैट कवि‍ता' कहा। साहि‍त्‍यि‍क वि‍धाओं और चि‍न्‍तनों में ऐसी कवि‍ता की कोई परम्‍परा पहले से नहीं है। पर सार्वजनि‍क संचार के चबूतरों (सोशल मीडि‍या प्‍लेटफॉर्म) पर ऐसी पंक्‍ति‍याँ आती रही हैं, जो अपने प्रभाव में भावकों को कवि‍ता का रसबोध कराती हैं। ये कवि‍ताएँ भि‍न्‍न-भि‍न्‍न ति‍थियों‍ में रची गईं हैं और इन बारहो कवि‍ताओं में प्रेम की घनीभूत अभि‍व्‍यक्‍ति है। पन्‍द्रह अगस्‍त 2012 को लि‍खी प्रेमपरक पंक्‍ति‍यों में कवि‍ ने अनुभूति‍ की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ के लि‍ए भाषा की अक्षमता और अननुवाद्यता को जीवन्‍त कर दि‍या है 'हम देखते रहे एक-दूसरे को/सन्नाटों और सपनों के ताने-बाने से कुछ बुनते रहे/जो शायद प्यार था/तुम्हारी चुप्पी इतनी सुन्दर थी/हम भाषा में उसके कमतर अनुवाद से बचना चाहते थे/बैठे थे हम एक-दूसरे के निकट।' प्रेम की ऐसी सघनता में कवि‍ उस देवता को भी नि‍कट हुआ समझने लगते हैं, जो उस मन्‍दि‍र के भीतर थे, जि‍समें वे सायास नहीं गए थे। क्‍योंकि‍ वे आश्‍वस्‍त थे कि‍ उनके पास सपने थे, पर देवता के पास सपने नहीं थे। महीने भर (17.09.2012) बाद ही, जब प्रेमि‍का के नि‍कट बैठकर भी प्रेम की अनुभूति‍ सघन नहीं हुई, तो कवि‍ का उस देवता के लि‍ए नकार भाव उपजा और कवि‍ को संशय हुआ कि‍ 'उस दिन काव्य पाठ अधूरा छोड़कर हम भागे/...हम पास-पास बैठकर भी पास कहाँ थे।' प्रेमि‍का के नि‍कटताबोध में पि‍छली बार उन्‍हें जि‍स देवता का नि‍कट होना प्रतीत हुआ था, उसी देवता के लि‍ए वे कहते हैं 'अगर वह ईश्वर था/मेरा ईश्वर नहीं था/अगर वह नैतिकता थी/मेरी नैतिकता नहीं थी/तो क्या वह हमारी वासना थी/जो कभी ईश्वर तो कभी नैतिकता की तरह दिख रही थी!' ये भाव प्रेमवि‍द्ध प्राणि‍यों के वि‍वि‍ध भावों को ईमानदारी और नि‍ष्‍ठा से व्‍यक्‍त करते हैं, जि‍समें सारे ही भाव ऋजुरैखि‍क नहीं होते, वक्ररैखि‍क भी होते हैं; प्रेमी मन के आत्‍मबोध और आत्‍मालाप को भी व्‍यक्‍त करते हैं। आगे की चैटिंग में ऐसे ही प्रेम की स्‍मृति‍यों में कभी सपना या चेतना का वि‍स्‍तार, कभी धर्म नि‍रपेक्षता, कभी धरती और बादलों के प्‍यास की चि‍न्‍ता करते हुए प्रेम की पारस्‍परि‍कता, कभी प्रेम की अनश्‍वरता के रूप नि‍खारते हैं। अपने प्रेम को वे रेत नहीं, गुलाल समझते हैं, क्‍योंकि‍ मुट्ठी में बन्द करने पर रेत के कण एक-एक कर गायब हो जाते हैं, गुलाल गायब होने पर भी अपना रंग छोड़ जाता है। प्यार के लि‍ए यह अनुपम रूपक है, जो पूरे-का-पूरा झड़ जाने पर भी काल की हथेली पर अपना निशान छोड़ जाता है। प्रेम की एषणा-पूर्ति‍ के सारे प्रयासों के बावजूद, प्रेमाधार परांग्‍मुख हो, तो कवि‍ के पास वि‍लक्षण रूपक है कि‍ 'मैं गीले तौलिये की तरह/लिपट जाना चाहता हूँ/लेकिन तुम तो अपनी/ओदी-ओदी इच्छाओं को सुखाने चली गई हो/ईश्वर के आँगन में!' यह ईश्‍वर, यहाँ एक भ्रम है, माया है, मृगतृष्‍णा है, भटकाव है, जो दो प्रेमि‍यों के मि‍लन-भाव का प्रति‍पक्षी है, जो प्रेमि‍का को सत्‍य का भान नहीं होने देता; या फि‍र समाज या परि‍वार का प्रति‍ष्‍ठाबोध (?) है, जो उसे प्रेम-डगर पर चलने से बरजता है। प्रेम के प्रसार, प्रसार की चतुराई, प्रेमाधार में अहं और चतुराई के वि‍लय की बड़ी सघन अनुभूति‍ नौ मार्च 2013 की उनकी चैटिंग देती है, जि‍समें प्रेमी अपनी प्रेमि‍का को आश्‍वस्‍त करते हैं कि‍ हम दोनो की कामनापूर्ति‍ के लि‍ए सारी बाधाओं को लाँघकर मैं तुमसे मि‍लने इस तरह आऊँगा कि दरवाज़ा तक नहीं चरमराएगा, 'वहशी रखवाले ताकते ही रह जाएँगे/इस तरह पैठूँगा तुम्हारी आत्मा में/कि तन को भी पता नहीं चलेगा ‍/...जैसे अमरूद में घुसती है मिठास/खिच्‍चे कसैलेपन को टरियाती हुई/वैसे ही घुसूँगा अनन्त चोर दरवाज़े से/पानी में मिले ग्लूकोज-सा घुल जाऊँगा/फैल जाऊँगा तुम्हारी पूरी देह में!' प्रेम में दो के एक हो जाने का यह मनोरम चि‍त्र है। पर प्रेम की यह लालसा सन् 2015 आते-आते कुछ ऐसी स्‍थि‍ति‍ में चली गई कि‍ प्रेमी सामुदायि‍क जीवन की चर्याओं में ही प्रेम के लि‍ए प्रति‍गामी बि‍म्‍ब देखने लगे। छब्‍बीस अप्रैल 2015 को आकर उनका प्रेमी मन उस प्रेमाधार की प्रतीक्षा कुछ ऐसे करने लगा, जैसे ख़ाली सड़क राहगीरों के कदमों की प्रतीक्षा करे, जैसे धँसने से पहले तक मिट्टी की खान कि‍सी कुम्हार की बाट जोहे, जैसे परती खेत की खुरदरी देह हलवाहे की आहट अकाने; और इन्‍तजार में उनके प्रेमी-मन को प्रतीत होता है कि‍ 'काश! प्रतीक्षा कोई ख़ुशबू होती/जो फैलती चली जाती तुम तक!' प्रतीक्षा को खूशबू बनाने की यह संकल्‍पना अकल्‍पनीय है। यह प्रेम के उदात्त का प्रमाण है कि‍ प्रेमी खुद न सही, अपनी प्रतीक्षा को ही खुशबू बनाकर अपने प्रेमाधार तक पहुँचाना चाहता है। यह एषणा परम पवि‍त्र है, इसमें कहीं कोई कलुष नहीं दि‍खता, प्रेमी मन स्‍वयं को खुशबू बनाना नहीं चाहता, खुद को उन तक पहुँचाने की इच्‍छा नहीं करता, अपनी प्रतीक्षा को उन तक पहुँचाना चाहता है। इस पवि‍त्रता को नमन।

'स्त्री-पुरुष' (पनसोखा है इन्‍द्रधनुष, पृ. 9) शीर्षक कवि‍ता का लक्ष्‍य-बि‍न्‍दु भी प्रेम ही है, जि‍समें कवि‍ ने स्‍त्री और पुरुष -- दोनों दृष्‍टि‍यों से वि‍चार करने की कोशि‍श की, कि‍न्‍तु अनुभव केवल पुरुष पक्ष का ही उतारा, स्‍त्री पक्ष का उपशीर्षक देकर छोड़ दि‍या। कदाचि‍त इसलि‍ए कि‍ इस पक्ष के अनुभव के वे अधि‍कारी नहीं हैं। अनुभवी जानते होंगे कि जब स्‍त्री-पुरुष साथ होता है, तो पुरुष अपने पुंशत्‍व के पराजि‍त हो जाने की आशंका से सर्वाधि‍क भयभीत रहता है। ऐसे में जब प्रेमि‍का उसे अपने स्‍त्रीत्‍व की क्षमता बताकर, उसके बचे-खुचे पुंशत्‍व को भुलाकर 'प्‍यार' पर केन्‍द्रि‍त होने की सलाहाज्ञा दे, वह भयमुक्‍त हो जाता है। प्‍यार में लीन हर प्रेमी को अपनी प्रेमि‍का, दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री दि‍खती है। और, प्‍यार करने के ऐन मौके पर जब प्रेमी की बाँहों में घि‍री प्यार करती हुई प्रेमि‍का कहे कि‍ स्त्री जैसा कुछ भी नहीं बचा है मेरे भीतर, तुम में भी मर्द जैसा कुछ बचा है, तो उसे त्‍यागकर प्यार करो, तो प्रेमी भयमुक्‍त हो उठता है। कवि‍ कहते हैं कि‍ 'एक-दूसरे को बाँहों में जकड़ते हुए/हमने सबसे पहले जिसे छोड़ा/वह था भय/न तो असफलता हमें डरा रही थी ही सफलता/सारा संकट तो स्त्री-पुरुष होने तक ही था।' वस्‍तुत: पुरुष का पुंशत्‍व और स्‍त्री का स्‍त्रीत्‍व प्‍यार करते समय भी वि‍जय-बोध की लालसा से भरा रहता है। पर जय-पराजय की लालसा से मुक्‍त होकर ही कोई अलिंगनबद्ध जोड़ा नि‍र्द्वन्‍द्व प्‍यार का भोक्‍ता हो सकता है। सही भी है कि प्‍यार में जब दो शरीर, दो आत्‍माएँ, दो धारणाएँ, दो लालसाएँ एक हो जाती हैं, तो कि‍सकी वि‍जय और कि‍सकी पराजय! कि‍स पर कि‍सकी जय, कि‍ससे कि‍सकी पराजय! प्‍यार की जि‍स उत्‍कट लालसा की कामना इस पद्यांश में की गई है, वस्‍तुत: हर प्रेम करनेवालों की ऐसी ही कामना, ऐसी ही समझ होनी चाहि‍ए; पर प्रश्‍नाकुल कवि-मन अगले ही पल सशंकि‍त हो उठता है। 'क्या मतलब हमारे होने का जो हम स्त्री-पुरुष हों!' जैसे सवाल को नामंजूर करने से पहले, 'प्‍यार में दो जीवों का समेकन स्‍वीकार करने पर' उन्‍हें दोनों के लि‍ए एक नकार दि‍खने लगता है, क्‍योंकि‍ समेकन के बाद दोनो में से कोई वह तो नहीं रह गए, जो थे। इसलि‍ए प्‍यार की भावनाओं से नि‍कलकर तर्क की वैचारि‍की में आने पर, उन्‍हें अपना होना ही अधूरा लगने लगा; क्‍योंकि‍ उन्‍हें 'प्यार की जरूरत उतनी ही थी/जितनी क्रान्ति की/...क्रान्ति की तरह प्यार पर भी हमारा बस नहीं है।' तथ्‍यत: पूरा जीवन तो कोई 'भावुकता' में डूबा नहीं रह सकता, यथार्थ की दुनि‍या सर्वत्र और सर्वदा कोमल ही नहीं होती, कठोर भी होती है। 'जिन्‍दगी एक जलता हुआ सिगरेट थी/जिसे मैंने अंगुलियों में फँसा रखा था/लेकिन कश लेना भूल गया था/आग ने फिर भी अंगुलियों को छुआ/तब जाकर उसके होने का एहसास हुआ।' यही आग यथार्थ है; इसी यथार्थ में मनुष्‍य की इच्छाएँ, जल-तल पर तैरते स्पाइरोगाइरा के ढूह की तरह छाई रहती है। यह स्पाइरोगाइरा, पानी के ऊपरी तल पर तीव्र गति‍ से विकसित होनेवाला शैवाल है, जो इतनी तेजी से विकसित होता है कि‍ मि‍नटों में पूरे तालाब में छा जाए। अब कोई आदमी अपनी इच्‍छा के इस स्पाइरोगाइरा से कब तक संघर्ष करे! मानवीय इच्‍छा के लि‍ए इस स्पाइरोगाइरा का रूपक कवि‍ ने बहुत सोच-वि‍चार कर रचा होगा; क्‍योंकि‍ जि‍स तरह क्रान्ति और प्यार पर मनुष्‍य का वश नहीं चलता; बहुत हद तक इच्‍छा के स्पाइरोगाइरा पर भी वश नहीं चलता। जब तक मनुष्‍य जल-तल से उसे हटाने का वि‍चार और तरकीब बनाए, तब तक वह दूर-दूर तक अपना क्षेत्र वि‍कसि‍त कर लेता है; इच्‍छा भी ऐसे ही करती है।

'एक अधूरी प्रेम कवि‍ता', 'स्‍त्री-पुरुष' या उल्‍लि‍खि‍त अन्‍य कवि‍ताओं का केन्‍द्रीय वि‍षय प्रेम है, पर सबमें प्रेम के एक रूप नहीं हैं, इनकी कवि‍ताओं में प्रेम के असंख्‍य आयाम हैं, शरीरी भी, नैसर्गि‍क भी, व्‍यवस्‍थाजन्‍य भी। पर तय है कि‍ उनकी कवि‍ताओं के सारे प्रेम मानवीयता की ओर केन्‍द्राभि‍मुख हैं। उनकी कुछ और प्रेम कवि‍ताओं का उल्‍लेख आगे के अंशों में होगा।

उपलब्‍ध स्रोतों से प्राप्‍त कवि‍ताओं में उनकी सन् 1973 की लि‍खी सर्वाधि‍क पुरानी कवि‍ता 'चिड़िया की चोंच' (दूर तक चुप्‍पी, पृ. 57) मि‍ली है। उन दि‍नों कवि‍ की आयु उन्‍नीस वर्ष की रही होगी, प्राय: बी.ए. अन्‍ति‍म वर्ष में रहे होंगे। सामान्‍य भारतीय युवाओं के लि‍ए यह उन्‍माद और खुशफहमी की उम्र होती है। पर मदन कश्‍यप चूँकि‍ सामान्‍य युवा नहीं थे, माँ के असामयि‍क नि‍धन के बाद उनका रहवास एक बरस तक धनबाद में अपने चचेरे नाना के घर हुआ था। नाना जी कोलि‍यरी के मजदूर संघ के लोकप्रि‍य नेता थे। वंचि‍तों के प्रति‍ अनुराग और उनके हक के लि‍ए खड़े होने की चेतना और संस्‍कार का बीजारोपण सम्‍भवत: उसी सात-आठ बरस की कच्‍ची आयु में हुआ होगा, जो वार्द्धक्‍य के साथ वि‍कसि‍त-परि‍स्‍कृत होता गया। तभी तो अपनी पहली ही कवि‍ता 'चिड़िया की चोंच' में उन्‍होंने प्रवंचि‍त समुदाय के जीवन की त्रासदी के लि‍ए एक नि‍हत्‍थ, नि‍:शस्‍त्र चि‍ड़ि‍या का रूपक उठाया --'दाना दिखाता है/फिर जाल बिछाता है/कौन नहीं कहाँ नहीं कब नहीं सताता है/जिधर भी नजर डालो खतरा ही खतरा है/कहीं मिलती नहीं निर्भयता एक कतरा है/सघन अमराई में/डाल यह बैठी एक चिड़िया रही थी सोच/इन सबसे बचने को नियति ने उसे दिया है क्या/बस यही चोंच!' वि‍चारकगण चाहें तो भगीरथ-श्रम करके उनकी इस प्राथमि‍‍क कवि‍ता के शि‍ल्‍प में नि‍श्‍चय ही कोई मामूली-सी कमजोरी ढूँढ लेंगे; पर देखने की बात यह है कि‍ बीसवीं शताब्‍दी के आठवें दशक की शुरुआत में मदन कश्‍यप की राजनीति‍क-सामाजि‍क चेतना और रचनात्‍मक सरोकार कि‍स तरह सक्रि‍य, सावधान और दृढ़ था कि‍ उन्‍होंने ऐसे रूपक रचे; अर्थध्‍वनि‍यों को ऐसा नादमय बनाया कि‍ भावक चमत्‍कृत हो उठते हैं। इस प्रारम्‍भि‍क प्रयास में छन्‍दों से उनकी मुक्‍ति‍-कामना भी दि‍खती है। प्रतीत होता है कि‍ इससे पूर्व भी वे गीति‍मय रचनाएँ करते रहे होंगे, जि‍से उन्‍होंने कभी प्रकाश में नहीं आने दि‍या। यह कवि‍-कर्म और कवि‍ता की गुणवत्ता के प्रति‍ उनकी अनुशासि‍त सावधानी का ही प्रमाण है कि‍ सन् 1973 में ऐसी श्रेष्‍ठ कवि‍ता लि‍खनेवाले कवि‍ का पहला संग्रह लगभग बीस वर्ष बाद सन् 1992 में 'लेकि‍न उदास है पृथ्‍वी' शीर्षक से प्रकाशि‍त हुआ। और, पहले ही संग्रह के बूते उनकी गि‍नती हि‍न्‍दी के मानक कवि‍यों में होने लगी। इसके साथ यह भी वि‍चारणीय है कि‍ भावुकतावश या छपास रोग के रोगी की तरह उनकी ऐसी कोई भी कवि‍ता प्रकाश में नहीं आई, जि‍स पर वि‍चारकगण कचास का दोषारोपण करें या नवोदि‍त संज्ञा से वि‍भूषि‍त करें। ऐसा धैर्य, असामान्‍य होता है।

इस कवि‍ता की चि‍ड़ि‍या असल में भारत की लोकतान्‍त्रि‍क व्‍यवस्‍था के वर्चस्‍ववादी शि‍कंजे में फड़फड़ाते आम नागरि‍क की जीवन-दशा को रेखांकि‍त करती है; जहाँ आजादी की रजत जयन्‍ती मना चुके भारतीय नागरि‍क, आजाद नागरि‍क तो क्‍या, आजाद चि‍ड़ि‍या भी नहीं हो पाए थे। सन् 1973 में भी व्‍यवस्‍थापति‍यों की नजर में आम नागरि‍क कि‍सी चि‍ड़ि‍या से अलग नहीं था। उन्‍हें फँसाने के लि‍ए हर जगह जाल बिछी थी, लुभावने दाने पड़े थे, उन्‍हें हर सामर्थ्‍यवान व्‍यक्‍ति‍ सताता था, हर ओर कोई न कोई खतरा दि‍खता था, कहीं से कतरा भर निर्भयता की आश नहीं दि‍खती थी। एक चोंच भर थी उसके पास, जि‍ससे उसे दाना चुगना था, बाल-बच्‍चों के भरण-पोषण के लि‍ए दाना लाना था, अगले प्रसव के लि‍ए घोसला बनाना था, और फि‍र जीवन-संघर्ष की सारी लड़ाइयाँ लड़नी थीं। अत्‍यन्‍त लघुकाय यह कवि‍ता अपने प्रभावी अर्थान्‍वेष की दृष्‍टि‍ से एक बड़ी कवि‍ता है, जि‍सकी समालोचना उस दौर के महान आलोचकों को करनी चाहि‍ए थी।

वस्‍तुत: इस कवि‍ता की पृष्‍ठभूमि‍ जानने के लि‍ए उस दौर के भारतीय लोकतन्‍त्र के खूँखारपन पर चि‍न्‍तनशील दृष्‍टि‍ डालनी पड़ेगी। भावक गौर करेंगे कि सन् 1967 में हुए चौथी लोकसभा चुनाव के बाद मार्च 04, 1967 को भारतीय लोकतन्‍त्र में इन्‍दि‍रा गाँधी के नेतृत्‍ववाली सरकार बनी, कि‍न्‍तु आन्‍तरि‍क कलह के कारण सन् 1969 में कांग्रेस पार्टी दो भागों में वि‍भाजि‍त हो गई -- 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' (आर) और 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' (संगठन)। 'कांग्रेस' (आर) का नेतृत्‍व इन्‍दि‍रा गाँधी कर रही थीं, जो नवम्‍बर,1969 आते-आते अल्पमत में आ गई। स्वाधीन भारत की यह पहली अल्पमत सरकार थी, जि‍सके कभी भी गिर जाने की आशंका थी। इसलि‍ए इन्‍दिरा गाँधी ने सिफ़ारिश की और राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने, सत्र पूरा होने के लगभग एक बरस पूर्व ही, 27 दिसम्‍बर 1970 को लोकसभा भंग कर; फरवरी 1971 में मध्यावधि चुनाव का आह्वान कर दि‍या। भारतीय लोकतन्‍त्र का यह पहला मध्यावधि चुनाव था। इस चुनाव में वि‍पक्षि‍यों का नारा था 'इन्‍दिरा हटाओ', जि‍सके टक्‍कर में इन्‍दिरा गाँधी ने नारा दि‍या 'गरीबी मि‍टाओ'। 'गरीबी मि‍टाओ' का नारा प्रभावी हुआ, भारी बहुमत से इन्‍दिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आर) की जोरदार वापसी हुई। पर इन्‍दिरा गाँधी के नेतृत्‍व में आम नागरि‍क की दुर्दशा ही दुर्दशा व्‍याप्‍त रही।

लोग-बाग चाहें तो सन् 1971-75 के मध्‍य-काल में इस कवि‍ता को सन् 1971 की परि‍णति‍ में जन-प्रवंचना और सन् 1975 के आपातकाल की पृष्‍ठभूमि‍ के रूप में रेखांकि‍त कर सकते हैं। उन्‍हें स्‍मरण होगा कि‍ सन् 1971 के चुनाव में पराजि‍त होने के चार बरस बाद सन् 1975 में समाजवादी नेता राजनारायण ने क्‍यों इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में इन्‍दिरा गाँधी पर चुनाव में धाँधली का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की, जि‍स पर फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने जून 12, 1975 को चुनाव रद्द कर दिया, जि‍सकी अवहेलनाकर इन्‍दिरा गाँधी ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय में अपील की, जि‍समें जून 24, 1975 को फैसला देते हुए सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने इन्‍दिरा गाँधी को प्रधानमन्‍त्री पद पर बने रहने की राहत दी। अगले ही दि‍न, जून 25, 1975 को उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को कहकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। स्वतन्‍त्र भारत के इतिहास में यह उस समय तक का सर्वाधि‍क अलोकतान्‍त्रिक काल था। पर इस अलोकतान्‍त्रि‍कता की पृष्‍ठभूमि‍ सन् 1971 से ही बनने लगी थी। मदन कश्‍यप का राजनीति‍क चेतना इतनी उन्‍नत तो थी कि‍ वे इन्‍दि‍रा गाँधी के चुनावी नारे 'गरीबी मि‍टाओ' का अनूदि‍त संस्‍करण 'गरीब मि‍टाओ' समाज में देख लें! लोकतन्‍त्र को 'एक-तन्‍त्र' या 'आखेट-तन्‍त्र' में तब्‍दील होते देखकर उन्‍हें यकीनन भारत देश का आम नागरि‍क कि‍सी बेबस चि‍ड़ि‍या से कम नहीं दि‍खा होगा।

उनकी कवि‍ताओं का सुचि‍न्‍ति‍त अवगाहन करनेवाला हर पाठक आज ऐसा महसूस करता है कि‍ सुवि‍चारि‍त आतंक से भरे आज के गहन अन्‍धकार भरे वातावरण में भारतीय चेतना की जागृति के लिए, उस जागृति की निरन्तरता के लिए, उस निरन्तरता की निरन्तर जुताई, गुड़ाई, निराई के लिए; आतंकि‍त परि‍वेश में मानवीयता बचाए रखने की जिद के लिए...और भी ढेरो शुभग, शुभद वातावरण के लिए... दुनिया के हर देश के हर प्रान्त के हर गाँव के हर मुहल्ले के हर परिवार के हर मनुष्य के लिए...हर हाल में नि‍श्‍चय ही एक मदन कश्‍यप चाहि‍ए; कम से कम एक मदन कश्‍यप तो चाहि‍ए ही चाहि‍ए; जि‍नकी कोई भी कविता, नैराश्‍य से भरे कि‍सी नागरि‍क के सामने गहन अन्धकार में भी आशा की कोई चिनगारी रख दे, साहस का कोई बाहुबली तूफान रख दे...और सामान्‍य नागरि‍क अपने हि‍त में डटकर खड़े होने का साहस कर ले। इस दुनिया को सचमुच एक मदन कश्यप चाहिए, उनका लम्बा ही नहीं बड़ा जीवन चाहिए, उनका सफल ही नहीं सार्थक सृजन चाहिए, उनकी जीवन्त और प्रफुल्ल मुस्कान चाहिए, क्‍योंकि‍ उनकी समग्र सृजनशीलता सामुदायि‍क जीवन में वि‍श्‍वास करनेवाले, पगडण्‍डि‍याँ बनानेवाले, जागती आँखों में सपनों की खेती करनेवाले मामूली लोगों के होठों पर चि‍रन्‍तन मुस्‍कान लाने के लि‍ए तूफानों से मुठभेड़ करने में तनि‍क भी नहीं हि‍चकती। दुनिया भर के देशों के नि‍र्वीर्य व्‍यवस्‍थापति‍ जि‍स तरह इति‍हास की भव्‍यता मि‍टाकर अपने ओछेपन का प्रदर्शन करने में जुटे हुए हैं; मानवेतर आचरण को वैध व्‍यवस्‍था घोषि‍त करने में लगे हुए हैं, ऐसे में दुनि‍या के सभी देशों के सभी नागरि‍क की भाषाओं में मदन कश्‍यप की कवि‍ताएँ उपलब्‍ध होनी चाहि‍ए, ताकि‍ लोग समझ सकें कि‍ हठपूर्वक उनकी चौकीदारी का दायि‍त्‍व झपटकर, उन्‍हें गुड्डा-गुड्डी के खेल में उलझाकर वे कि‍स तरह उन्‍हें बलि‍दानी बकड़ा बना रहे हैं।

प्रारम्‍भि‍क समय से हर दौर के, हर भाषा के श्रेष्‍ठ रचनाकार अपने समय की शासकीय और राजनीति‍क वि‍संगति‍ को उजागर करते आए हैं; पर यह वि‍संगति‍ तो साहि‍त्‍यि‍क आँगन में भी है। स्‍वयं मदन कश्‍यप इसके प्रबल उदाहरण हैं। दशकों में बाँटकर कवि‍-कर्म को दाखि‍ल-खारि‍ज करनेवाली राजनीति‍ में संलि‍प्‍त हि‍न्‍दी के कुछ कवि‍-चि‍न्‍तकों ने मदन कश्‍यप को ठेलकर नौंवें दशक में पहुँचाने की बड़ी चेष्‍टा की। 'नौवें दशक के वि‍शि‍ष्‍ट कवि मदन कश्‍यप' जैसे चतुराईपूर्ण 'कथन' जब-तब टि‍प्‍पणि‍यों में खोंसे गए, जैसे प्रेमि‍का के जूड़े में डण्‍ठलवाले फूल खोंस रहे हों।...मदन कश्‍यप वि‍शि‍ष्‍ट कवि‍ तो हैं, पर नौवें दशक (बीसवीं शताब्‍दी) के क्‍यों? आठवें दशक के क्‍यों नहीं? आखि‍र कि‍स नि‍योजन कार्यालय ने यह अर्हता तय की? आठवें दशक के कवि‍ माने जाने की अर्हता क्‍या है? मान्‍य मत तो यही है कि‍ जि‍स दशक के ज्‍वलन्त प्रश्‍नों के समक्ष जो कवि नि‍ष्‍ठा और तत्‍परता से खड़े हुए, वे उस दशक के वि‍शि‍ष्‍ट कवि‍/कथाकार हुए। बीसवीं शताब्‍दी के आठवें दशक का आपातकाल से भी बड़ा प्रश्‍न क्‍या था? और वि‍चारक देखें कि‍ उस दशक में मदन कश्‍यप ने अपनी कवि‍ता से वि‍षय और शि‍ल्‍प से क्‍या दि‍या है? उपलब्‍ध सामग्री के अनुसार आठवें दशक में उनकी सतरह (सन् 1973 में एक, सन् 1976 में सात, सन् 1977 में दो, सन् 1979 में पाँच, सन् 1980 में दो) श्रेष्‍ठ कवि‍ताएँ लि‍खी गईं। इनमें से चौदह कवि‍ताएँ बहुत छोटी-छोटी हैं, पर अपने प्रहार में बहुत ताकतवर। इन कवि‍तओं में दर्ज मानवीय, राष्‍ट्रीय और सामाजि‍क जीवन की चि‍न्‍ताओं के साथ-साथ, आपातकाल के दौरान अकुलाए जनजीवन पर गम्‍भीरता से वि‍चार हुआ है। पर वि‍चि‍त्र है कि‍ वि‍चारकों ने आपातकाल के समर्थकों में शामि‍ल कवि‍ को तो आठवें दशक में गि‍ना, जि‍न्‍होंने गाहे-ब-गाहे उपलब्‍धि‍ के लि‍ए अन्‍यथा समझौते भी कि‍ए, पर मदन कश्‍यप को ठेलने लगे। उन्‍हें उनमें ऐसा कौन-सा वि‍कार दि‍खा, इसका उल्‍लेख अब तक नहीं हुआ है। उन्‍हें सोचना होगा कि‍ वैसी धारणा के अनुगमन की स्‍थि‍ति‍ में वे उस दशक के ज्‍वलन्‍त प्रश्‍नों से मुखाति‍ब उनकी इन सतरह श्रेष्‍ठ कवि‍ताओं का क्‍या करेंगे? पर, एतद्वि‍षयक वि‍वेकशील नि‍र्णय एकाक्षि‍ आलोचक नहीं, सुबुद्ध भावक देते हैं और कवि‍ता दि‍लाती है।

आठवें दशक की उनकी दस कवि‍ताएँ -- 'ताज', 'गाँव फागुनी', 'तुम आओ', 'हथेलियों में चेहरा' (1976), 'हलवाहे भाई' (1977), 'तुम्हारी हँसी', 'बच्चे', 'भूमिगत आग', 'कूपलेन में अन्‍धेरा' (1979), 'कोई सुर गूँजता है' (1980) उनके पहले संग्रह 'लेकिन उदास है पृथ्वी' (सन् 1992) में और सात कवि‍ताएँ -- 'चिड़िया की चोंच' (1973), 'हँसी की तलाश', 'तुम्हारा इन्‍तज़ार', 'महल फ़िल्म देखकर' (1976), 'मुट्ठियाँ तन रही हैं' (1977), 'चाँद चौथी का' (1979), 'प्रतीक्षारत' (1980) उनके चौथे संग्रह 'दूर तक चुप्‍पी' (सन् 2014) में संकलि‍त हैं।

'ताज' कवि‍ता के बैगनलाल को दी गई धमकी कोई सामान्‍य धमकी नहीं है। वह समय भारतीय लोकतन्‍त्र का शर्मनाक काल था, आपातकाल की शासकीय क्रूरता जारी थी। इसलि‍ए वह धमकी सत्ताधीशों को थी, जो कभी गि‍र जानेवाले अपने ताज पर अकड़े हुए थे और शासकीय मद में उन्‍हें अपने नंगेपन का बोध नहीं हो रहा था। इसलि‍ए कवि‍ ने बैगन को धि‍क्‍कारा कि‍ सि‍र पर खड़े डण्‍ठल को वह बेशक ताज समझे पर अपने नंगे बदन की शर्म न भूले, ऐंठ न दि‍खाए, क्‍योंकि‍ उसे आग में पकाए जाने का समय नि‍कट आ गया है। उन्‍होंने बैगनलाल को सावधान कि‍या कि‍ जनशक्‍ति‍ से डरे, लोकतन्‍त्र में जनता शक्‍ति‍शाली होती है, दुर्दि‍न में अपना ताज भी प्रति‍पक्षी बन जाता है। कदाचि‍त उन दि‍नों कवि‍ की धारणा में लोकतान्‍त्रि‍क वि‍वेक पर रही-सही आस्‍था बची थी। इसलि‍ए उन्‍होंने धमकाया कि‍ 'यह मत भूलो कि आग में पकाकर जब/तुम्हारा भुर्ता बनाया जाएगा तब यही ताज/तुम्हारे छिलके उतारने वाले का सहारा बन जाएगा!' ऐसी कवि‍ता लि‍खने का साहस मदन कश्‍यप ने आपातकाल (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) के दौरान सन् 1976 में कि‍या। शासकीय उद्दण्‍डता एवं दुर्नीति‍ को अस्‍ति‍त्‍व-बोध करानेवाली यह वि‍लक्षण कवि‍ता, जो उस दौर के कांग्रेसी शासकों के लि‍ए तो लि‍खी ही गई, कि‍न्‍तु परवर्ती काल के सत्ताधीशों पर समान भाव से लागू होती है। महत्त्‍वपूर्ण रचना वही होती है, जो अपने समय को पार कर लेने पर भी प्रासंगि‍क बनी रहे।

इसी वर्ष लि‍खी गई कवि‍ता 'गाँव फागुनी' में कवि‍ ने एक ग्राम्‍य बालि‍का और फागुन की फसलों के सहारे मोहक, कि‍न्‍तु मार्मि‍क चि‍त्र उपस्‍थि‍त कि‍या है। वातावरण जीवन्‍त हो गया है। ग्राम्‍य प्रतीकों से रचा गया अनूठा बि‍म्‍ब अचानक से आपातकाल का रूपक खड़ा कर देता है। कवि‍ता में आई उस साँवली लड़की की भंगि‍मा और आचरण‍ में ग्राम्‍य संस्‍कृति एवं कृषि‍-कर्म की उज्‍ज्‍वलता नि‍खर उठती है। शासकीय क्रूरता और राजनीति‍क उग्रता की जघन्‍य छाया ने उस बालि‍का के अल्‍हड़पन को यद्यपि‍ बख्‍शा नहीं है, उस अशुभ छाया से उसका मनोजगत अछूता नहीं है, धारियों पर पड़ी आलू के पौध की झुलसी हुई फुनगी-सी उसकी हँसी झुलसी हुई है, पर इस कारण उसकी दि‍नचर्या आहत नहीं हुई है। उदास ही सही, पर उसकी हँसी बरकरार है। पगडण्‍डी को चूमने आई मटर की लतरों, फुनगि‍यों, छीमि‍यों को अपने पैरों तले कुचले जाने से वह बचाना चाहती है; उन पौधों की रक्षा करना अपना धर्म ही नहीं, संस्‍कार भी समझती है। यहाँ एक तरफ न्‍यूनतम शब्‍दावली में शासकीय क्रूरता परि‍लक्षि‍त है, तो दूसरी तरफ उस साँवली लड़की का ग्राम्‍य संस्‍कार। वह सँभल-सँभलकर पाँव रखती आगे बढ़ रही है, 'वह धूल की धुन्‍ध से धूसर गाँव फागुनी/पगडण्डी को चूमती मटर की लतरें/कि छीमियाँ कुचल जाएँ कहीं/थाह-थाह कर पैर रखती/जा रही है वह साँवली लड़की!' एक ग्राम्‍य बालि‍का के नन्‍हें-से उद्यम द्वारा आपातकाल की शासकीय नृशंसता को दी गई ऐसी ललकार बड़े साहस और बड़े कौशल का कार्य है।

'तुम आओ' शीर्षक उनकी कवि‍ता आपातकाल के दु:स्‍वप्‍न को, टीसते घावों को बार-बार हरा कर देती है। 'हरियाली में डूबी पगडण्डी का कोरा बदन/कहीं-कहीं दीखता है/जैसे मूँग के पौधों में दुबका कोई खरगोश/ कभी-कभी सिर उठा देखता हो।' पगडण्‍डी, पथि‍क, मूँग के पौधों की हरियाली और उस हरियाली में दुबके खरगोश -- ये चारो प्रतीक यहाँ बड़ी सूझ-बूझ से रचे गए प्रतीत होते हैं। पगडण्‍डी स्‍वयं में एक गहन अर्थ-ध्‍वनि‍ को रेखांकि‍त करती है। राजमार्ग बेशक धोखा दे दे, पगडण्‍डी कभी धोखा नहीं देती। स्‍मरणीय है कि‍ पगडण्‍डि‍यों ने ही आपातकाल के दौरान झूठे आरोपों के अपराध में भाग रहे आन्‍दोलनकर्मि‍यों को पुलि‍सि‍या अत्‍याचार से बचाया था। हरि‍याली से ढकी पगडण्‍डी तो यूँ भी पथि‍कों के अन्‍दर-बाहर को कि‍सानी ममता से भर देती है। इन पगडण्‍डि‍यों, और इन पर चलनेवाले पथि‍कों का ग्राम्‍य-सरोकार बड़ा ही ममत्‍वपूर्ण होता है। हरि‍याली से ढकी इस पगडण्‍डी का कोरा बदन कहीं-कहीं ही दि‍खता है। यहाँ बि‍म्‍ब-सृजन का कवि‍-कौशल सराहणीय है कि‍ सातत्‍य के प्रतीक उस पगडण्‍डी को मूँग के पौधों की हरियाली से ढका गया है, जो अत्‍यन्‍त भंगुर हरि‍याली है, सूखने में भी और गलने में भी। पगडण्‍डी के अस्‍ति‍त्‍व को वह अधि‍क देर ढके नहीं रह सकती। प्रचण्‍ड गर्मी में भी उसकी तासीर इतनी गर्म होती है कि‍ उसे खानेवाले मवेशि‍यों के गोबर फब्‍बारे की तरह नि‍कलते हैं। और, उसकी ऊष्‍णता में खरगोश जैसे कोमल प्राणी के छि‍पने का प्रतीक और भी व्‍याख्‍येय है। ऐसे सुन्‍दर, मनभावन, चंचल, नि‍ष्‍कलुष प्राणी के भयातुर होने और इतने ऊष्‍ण पौधों की ओट में छि‍पने की वि‍वशता, आखेटकों की क्रूरता को कई गुणा बढ़ा देती है। इस कवि‍ता की रूप-रचना में कवि‍-बर्ताव तो प्रेम-कवि‍ता जैसा है, पर वस्‍तुत: यह कवि‍ता आपातकाल के शासकीय आचरणों को शर्मसार करती है। पगडण्‍डी के सातत्‍य की सुनि‍श्‍चि‍‍ति‍ बताते हुए इसमें कवि‍ जि‍न्‍हें बुला रहे हैं, असल में वह उनका अपना ही शौर्य, पराक्रम, साहस और चेतना है; वे कहीं गए नहीं हैं, उन्‍हीं में हैं, और उन्‍हें मालूम है कि‍ सब कुछ छि‍न जाने के बाद भी उनके पाँव के नीचे की जमीन उनके साथ है। उ‍नके आने के लि‍ए पगडण्‍डी भी बदस्‍तूर कायम हैं। कदाचि‍त चतुर्दि‍क फैले क्रूर वातावरण में कवि‍ को अपनी यह पूँजी असुरक्षि‍त लग रही होगी, हो न हो, उनमें यह भाव उस दौर के कुछेक बौद्धि‍कों के सत्ताभक्‍त हो जाने के कारण आया हो। कवि‍ अपने उस शौर्य-पराक्रम-साहस-चेतना को समूचे का समूचा सुरक्षि‍त करना चाहते थे, क्‍योंकि उस वि‍कट-काल में कवि‍ के समय ने मिट्टी के सिवा अपना सब कुछ खो दिया, अपना आसमान, अपना सूरज, अपनी हवा...सब कुछ। जबकि‍ कवि‍-पराक्रम ने अभी कुछ भी नहीं खोया था; इसलि‍ए उन्‍होंने उन्‍हें इस माटी के सहारे ही अपना आसमान, अपना सूरज, अपनी हवा हासिल करने के लि‍ए आमन्‍त्रण दि‍या। 'तुम आओ/हवा की विपरीत दिशा में/सूरज का क्रोध अपने माथे पर झेलते हुए/बस जीने और जीतने की अपनी इच्छा की बदौलत चले आओ/...यह ठीक है कि सूरज तुम्हारे पक्ष में नहीं उगा है/हवा तुम्हारे अनुकूल नहीं चल रही है/फिर भी पगडण्डी पर बढ़ते हुए तुम्हें लगेगा/यह धरती लगातार तुम्हारे साथ है।' आपातकाल की दुष्‍कृति‍ को मुँहतोड़ जवाब देनेवाली यह प्रशंसनीय कवि‍ता है।

'हथेलियों में चेहरा' शीर्षक कवि‍ता देखने में पत्‍नी को सम्‍बोधि‍त लगती है, कि‍न्‍तु इसकी अर्थ-ध्‍वनि‍ भावकों को इसके रचनाकाल में खींचकर ले जाती है, जब समय की आँच से दग्‍ध कवि‍ के मनोजगत पर छाया आतंक स्‍पष्‍ट होता है -- 'माँ नहीं रही/अब तुम हो/और हैं सपनों से सराबोर तुम्हारी आँखें/और है मक्खन की भेली-सा तुम्हारा चेहरा/ हथेलियों में होता है तुम्हारा चेहरा/और सीने में दहशत/जानता हूँ/नहीं दे सकेंगी मेरी हथेलियाँ इतनी शीतलता/कि वक़्त की आँच में/मक्खन की भेली-सा तुम्हारा चेहरा/पिघल नहीं जाए!' यह पद्यांश भावकों को इस कवि‍ता की शुरुआत में ले जाती है, जहाँ बचपन की हथेलियों में माँ के दि‍ए मक्खन की भेली है, भेली पर गढ़ी हुई आकृति है, आकृति‍ में पत्‍नी है, मक्खन की भेली जैसा पत्‍नी का चेहरा है; और कर्ता के समक्ष उस मक्‍खन को, या सपनों को, या पत्‍नी को, या सम्‍बन्‍धों को पिघलने से बचा पाने की असमर्थता है, सीने में दहशत है।...यह दहशत वस्‍तुत: आपातकाल की है, मदन कश्‍यप ने अपनी भि‍न्‍न-भि‍न्‍न कवि‍ताओं में उस एक ही दहशत को भि‍न्‍न-भि‍न्‍न प्रतीकों में स्‍पष्‍ट कि‍या है। जैसे कोई महान गायक भि‍न्‍न-भि‍न्‍न आरोह-अवरोह के आलापों से एक ही भाव को प्रकट करते हों; जैसे कथक नृत्‍य के नर्तक भि‍न्‍न-भि‍न्‍न भंगि‍माओं से एक ही भाव को स्‍पष्‍ट करते हों। इसी क्रम में उदास आँखें और चुप चेहरे 'फैलते आसमान और सिकुड़ती धरती के बीच/किसी हँसी की तलाश' (हँसी की तलाश) करते रहते हैं; आपातकाल के आतंक में मनुष्‍य मात्र के चेहरों से हँसी तो गायब हो गई थी, पर आँखों और मन पर तो आपातकाल भी पहरा नहीं दे सकता था। इसी क्रम में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कि‍या कि‍ नीम की शीतल छाया में 'राशनकार्ड लिए गेहूँ-चीनी पाने का इन्‍तजार' करते हुए, दाँत से नाखून काटते हुए, कतार में खड़े रहकर टिकट खिड़की खुलने का इन्‍तज़ार करने से कितना अलग होता है प्रेमि‍का का इन्‍तज़ार (तुम्हारा इन्‍तज़ार)! इन्‍हीं परि‍स्‍थि‍ति‍यों में फि‍ल्‍म देखकर आने के बाद उन्‍हें चाँद दरख्तों के बीच से झाँकता प्रतीत होता है; जैसे रोशनदान से मधुबाला झाँक रही हो। उन्‍हें सारा देश एक 'महल' जैसा लगता है 'जिसमें जिन्‍दगियाँ रूहों की तरह भटक रही हैं' ('महल' फ़िल्म देखकर)!

कि‍न्‍तु साल भर बाद सन् 1977 आते-आते भारत देश का राजनीति‍क परि‍दृश्‍य बदला और जनसामान्‍य को एक बार फि‍र से शासकीय बन्‍दर-बाँट का झटका लगा। आपातकाल से ऊबी-अकुलाई जनता के जीवन में ऐसा कुछ भी नया नहीं हुआ, जो उन्‍होंने अपने सपनों में देखा था। सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारत के द्वि‍तीय प्रधानमन्‍त्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा दि‍ए गए 'जय जवान जय किसान' के नारे मदन कश्‍यप ग्‍यारह वर्ष की आयु से ही सुनते आ रहे थे। इस राष्ट्रीय नारे में किसानी श्रम के लि‍ए जि‍स सम्‍मान का भाव अनुमि‍त कि‍या गया था; सन् 1977 के कांग्रेस वि‍रोधी शासन में भी उन्‍हें कि‍सानी संस्‍कृति‍ के आधार, हलवाहों के लि‍ए वैसा सम्‍मान नहीं दि‍खा। हथियार-युग में भी हलधरों का हथि‍यार हल ही रहा। ऋषि‍ दधीचि‍ की नि‍ष्‍ठा से जमीन्‍दारों के खेत को हरा-भरा करने और अन्‍न उगानेवालों की अवहेलना देखकर कवि‍ ने उनके नि‍रासक्‍त अवदान को उनकी पीड़ा बनाने की चेष्‍टा की -- 'मुट्ठी भर बीज की ये इत्ती फसलें!... पूरा का पूरा इन्हें मालिक के यहाँ पहुँचाकर/तुम बस केवल अपनी थकान के साथ/घर वापस होते हो/बीज तुम्हारे कदम चूमते हैं/बालियाँ तुम्हारी बाँहों में खेलती हैं/और अनाज की टोकरियों को/तुम लाड़ले बच्चे की तरह ढोते हो/फिर भी भूखे रहते हो!' कवि‍ता के बीचवाले अंश में श्रम, श्रमि‍कों की नि‍ष्‍ठा, प्रकृति‍, फसल, किसानी क्रि‍याएँ, जमीन्‍दारी शोषण...सबकी जीवन्‍त तस्‍वीर खींचते हुए कवि‍ अन्‍ति‍म अंश में हलवाहे से प्रश्‍न करते हैं कि‍ 'आखि‍र ‍तुम्हारे मालिक का पेट/कितना बड़ा है हलवाहे भाई/कि अपने पूरे परिवार की हड्डियाँ गलाकर भी/उसे भर नहीं पाते/उसकी आँखों की आग कितनी तेज़ है/कि लगातार उसमें झुलसती हुई तुम्हारी चमड़ी/पत्नी की बाँहों में समाने पर भी हरी नहीं होती (हलवाहे भाई)?

कुल मि‍लाकर बीसवीं शताब्‍दी के ढलते समय में आकर भी, कांग्रेसी कुशासन से मुक्‍ति‍ पाकर भी जनता स्‍वयं को कठपुतली ही समझ रही थी। चारो ओर गहन अन्‍धकार छाया था। ऐसे समय में सामुदायि‍क जड़ता दूर कर जन-जन में चेतना का प्रसार करना अनि‍वार्य था। अन्‍धेरे के पिघलने, धूप के गर्म होते जाने, जन-जन की धमनियों के रक्त के गर्म होते जाने, नसों के तन जाने, मुट्ठियों के बँध जाने, हजारों हज़ार मुट्ठियों के तन जाने का सन्‍देश जन-जन को देना (मुट्ठियाँ तन रही हैं) कवि‍ को अनि‍वार्य लगा, सो उन्‍होंने दि‍या!

सन् 1979 में आकर स्‍थि‍ति‍याँ थोड़ी और गम्‍भीर हुईं। शासकीय लटके-झटके को समझने में कवि‍ भी कुछ सावधान हुए। अपने शासन के तीसरे वर्ष में प्रवेश कर गई वैकल्‍पि‍क सत्ता की चतुराई में उन्‍हें पूर्ववर्ती शासकों की क्रूरता और खूँखारपन दि‍खने लगे। उन्‍हें लगने लगा कि‍ इसके निखरे हुए चेहरे पर जो हँसी है, उस हँसी में हमारी हँसी का कोई बि‍म्‍ब नहीं है। इसलि‍ए उन्‍होंने उस शासक को उसकी कुटि‍लता का बोध कराते हुए साफ कहा कि अब तुम अपना रास्‍ता लो, हमें तुम्‍हारी जरूरत नहीं, तुम्‍हारी हँसी की उत्तेजित धारा तुझे मुझसे अलग करती है 'जैसे मुझे और तुम्हें/किनारों की तरह बाँटती हुई/हँसी की एक उत्तेजित धारा/बह गई हो (तुम्हारी हँसी)!'

बाल-क्रीड़ाओं के प्रतीकन द्वारा उस दौर के सामुदायि‍क जीवन के भोलेपन और नि‍रीहता को रूपायि‍त कर उन्‍होंने स्वयं को जन-जन का दि‍ग्‍दर्शक बनाया और स्‍वयं को नि‍रुपाय देखा, धरती-सा बिछा हुआ। जनता, सि‍यासत की सुरंग में चल रहे खेलों से अनभि‍ज्ञ और नि‍श्‍चि‍न्‍त थी, जैसे सीमित दाँव-पेंचों के साथ खेल के मैदान में खेलते और जीतते और तालियाँ बजाते बच्‍चे अनभि‍ज्ञ रहते हैं, खुशी से झूमते हैं फागुनी हवा में इठलाती गेहूँ की बालियों की तरह। उनकी खुशि‍याँ देखकर माँ-पि‍ता को भी खुश होना पड़ता है 'हँसने लगती हैं पिता की