Tuesday, August 11, 2026

कोशविज्ञान : तकनीकी शब्दावली और अनुवाद प्रक्रियाएँ Lexicography, Technical Terminology and Translation Processes




 

 

कोशविज्ञान

तकनीकी शब्दावली और अनुवाद प्रक्रियाएँ

Lexicography, Technical Terminology and Translation Processes


हर कार्य की सिद्धि के लिए किसी न किसी उपकरण का सहयोग लिया जाता है। अनुवाद-कर्म जैसे महान कार्य के लिए भी अनेक उपकरण सहाय्य होते हैं। कोश-ग्रन्थ उन उपकरणों में प्रमुख है। विदित है कि सभी अनुवादक अपने अभिज्ञान से ही अनुवाद करते हैं, पर अपने अनूदित पाठ को श्रेष्ठ, प्रामाणिक और सम्प्रेषणीय बनाने में उन्हें कोश-ग्रन्थों से बड़ी सहायता मिलती है। भाषिक ज्ञान के क्षेत्र में अनुवादक कितने भी निपुण हों, वे कोश-ग्रन्थों की महत्ता को सर्वोपरि स्थान देते हैं। इसलिए यहाँ कोश-विज्ञान की परम्परा, विकास और परिणति पर संक्षेप में चर्चा की जा रही है।

भारत में कोश-रचना की परम्परा (Lexicographical Traditions in India)

कोश’ शब्द का उपयोग अनेक क्षेत्रों में होता है। हर क्षेत्र में इसके भाव एवं अर्थ अपने-अपने होते हैं। इस शब्द का मूल अर्थ ‘शब्दसंग्रह’ (Lexicon) है। अक्षरानुक्रम के कारण हर भाषा के शब्दों की व्याख्या-पद्धति भिन्न-भिन्न होती है। इसकी पहचान शब्दों की व्याख्या देनवाले ग्रन्थ के रूप में होती है।

संगृहीत ज्ञान एवं सूचनादि का भण्डार कोश कहलाता है। इसमें धर्म, दर्शन, शास्त्र, विज्ञानादि के तकनीकी शब्दों की अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध होती है। इसके अनेक प्रकार होते हैं--शब्द-कोश, भाषा-कोश, साहित्य-कोश, मुहावरा-कोश, लोकोक्ति-कोश आदि। इसकी प्रविष्टियाँ वर्णानुक्रम से संयोजित होती हैं। इसमें हर प्रविष्टियों के अर्थ की यथायोग्य व्याख्या दी जाती है। शब्दकोश एक भाषिक भी होते हैं, भिन्नभाषिक भी।

भारतीय कोश परम्परा का प्राचीनतम ग्रन्थ ‘निघण्टु’ है। संस्कृत कोश-परम्परा में ‘वैदिक निघण्टु’ अतिशय महत्त्वपूर्ण है। इस ग्रन्थ में प्राचीन एवं अपने समय के अप्रचलित शब्दों का विवेचन है। इसका आरम्भ वैदिक भाषा के ऐसे शब्दों के संग्रह के लिए हुआ, जिनका चलन लोक में नहीं रहा। जिसे समझने में लोगों को कठिनाई होने लगी। यास्क विरचित ‘निरुक्त’ इसी ‘निघण्टु’ का भाष्य है। इसे ‘निघण्टु पंचाध्यायी’ भी कहा जाता है।

इसके प्रथम तीन अध्यायों को नैघण्टुक काण्ड कहा गया है। ‘निरुक्त’ के दूसरे और तीसरे अध्याय में शब्दों की व्याख्या है। इनमें 1341 शब्द हैं पर व्याख्या केवल 230 शब्दों की ही है। ‘निघण्टु’ में संज्ञा एवं अव्यय पदों का संकलन है। इसमें पृथ्वी के इक्कीस पर्याय हैं, अग्नि के ग्यारह। तीनों अध्यायों में समानार्थी शब्दों के समूह दिए गए हैं। ढेर सारे अनेकार्थक शब्द भी हैं।

निघण्टु’ में संकलित पर्यायवाची शब्दों के अनेक अर्थ होते हैं, जो ‘निरुक्त’ में सोदाहरण बताए गए हैं। चौथे अध्याय में 278 स्वतन्त्र पदों का संकलन है। ये शब्द किसी के पर्याय नहीं हैं। इनमें अनेकार्थक एवं अज्ञात व्युत्पत्ति वाले शब्दों का संग्रह है। अन्तिम अध्याय में 151 वैदिक देवताओं के नाम हैं।

निघण्टु’ के रचयिता के बारे में विद्वानों के बीच मतभेद है। एक मत के अनुसार ‘निघण्टु’ और ‘निरुक्त’, दोनो के रचयिता यास्क ही हैं; जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार यह ग्रन्थ अज्ञात वेदज्ञ ऋषि की रचना है। कुछेक विद्वान तो इसे अनेक व्यक्तियों की रचना मानते हैं। प्राप्त ‘निघण्टु’ के अलावा उस दौर में और भी अनेक ‘निघण्टु’ओं की रचना का अनुमान हुआ है, पर वे सब अनुपलब्ध हैं।

बाद के दिनों में ‘वैदिक निघण्टु’ओं की परम्परा लुप्त हो गई। पर अथर्ववेद के उपवेद ‘आयुर्वेद’ में इसकी परम्परा जीवन्त रही। ई.पू. चौथी शताब्दी में रचित ‘धन्वन्तरि निघण्टु’ शीर्षक के एक ‘निघण्टु’ ग्रन्थ का अनुमान हुआ है। नौ अध्यायों के विभक्त इस ग्रन्थ में पारिभाषिक शब्दों के अर्थ एवं गुण-दोष का उल्लेख हुआ है।

निघण्टु’ ग्रन्थों के बाद संस्कृत कोशों की दीर्घ परम्परा चली--धातुपाठ, उणादिसूत्र, लिंगानुशासन...जैसे अनेक कोशों की चर्चा विदित है। चौथी शब्ताब्दी में अमरसिंह विरचित ‘अमरकोश’ संस्कृत कोश-परम्परा का अत्यन्त लोकप्रिय ग्रन्थ है। इसकी मान्यता दुनिया के पहले समान्तर कोश (थिसॉरस) के रूप में है। कुछेक इतिहासकारों की राय में ‘अमरकोश’ एवं इसके रचयिता अमरसिंह ई.पू. पहली शताब्दी के हैं।

संस्कृत-कोश दो प्रकार के हैं--समानार्थी शब्द-संग्रह, अनेकार्थी शब्द-संग्रह। दोनों ही कोशों के रूप किंचित अव्यवस्थित ही थे। सबकी पद्धति भिन्न-भिन्न थी--कोई अक्षरानुक्रम में, कोई शब्दों में अक्षरों की संख्या के क्रम में, कोई पयार्यबाहुल्य के वरीयता क्रम में। मध्यकाल में भी कोशों की रचना बड़ी संख्या में हुई।

प्रारम्भिक काल के कुछेक महत्त्वपूर्ण कोश इसस प्रकार हैं--

यास्क                  ‘निघण्टु’ (वैदिक शब्दकोश), निरुक्त’ (‘निघण्टु’ पर  शब्दार्थ कोश)

अमरसिंह           ‘अमरकोश’ (‘नामलिंगानुशासन’ या ‘त्रिकाण्ड’)

राजमुकुट          ‘बृहत अमरकोश’ (‘अमरकोश’ टीका)

सर्वानन्द             ‘अमरटीकासर्वस्व’

भानुदीक्षित        ‘बृहत् हारावली’

पाणिनी                ‘धातुपाठ’, ‘गणपाठ’

धन्वन्तरि             ‘धन्वन्तरिनिघण्टु’

शाश्वत                   ‘अनेकार्थसमुच्चय’ (‘शाश्वतकोश’ नाम से भी ख्यात)

भट्ट हलायुध       ‘अभिधानरत्नमाला’ (10वीं शताब्दी)

हेमचन्द्र                (सन् 1088-1172)देशीनाममाला’ (प्राकृत-अपभ्रंश-कोश), अभिधानचिन्तामणिमाला’ (प्रसिद्ध पर्यायवाची कोश), निघण्टुशेष’, ‘लिंगानुशासन’, ‘अनेकार्थसंग्रह’

क्षेमेन्द्र                   (सन् 1025-1066) रचित व्यवहारोपयोगी शब्दों का कोश ‘लोकप्रकाश’ एक विशिष्ट कोश

महेश्वर                   ‘विश्वप्रकाश’ या ‘विश्वकोश’ (सन् 1111)

अजयपाल            ‘नानार्थसंग्रह’ (12-13 वीं शताब्दी के आसपास)

धनंजय                  नाममाला (अनुमानतः सन् 1123-1140)

पुरुषोत्तमदेव       ‘हारावली’ (सन् 1159 से पूर्व), भाषावृत्ति’, ‘उणादिवृत्ति’, ‘त्रिकाण्डशेष’ (अमरसिंह के त्रिकाण्ड से भिन्न), अमरकोश परिशिष्ट’, ‘एकाक्षरकोश’, ‘द्विरूपकोश’, ‘वर्णदेशना’

श्रीहर्ष                         ‘द्विरूपकोश’ (पुरुषोत्तमदेव के ग्रन्थ से भिन्न)

केशवस्वामी         ‘नानार्थार्णव’ (12-13 वीं शताब्दी)

मेदिनि                    ‘नानार्थशब्दकोश’ या ‘मेदिनिकोष’ (चौदहवीं शताब्दी के आसपास)

कल्याणमल्ल        ‘शब्दरत्नप्रदीप’ (सन् 1295 के आसपास)

महीप                         ‘शब्दरत्नाकर’ (सन् 1374 के आसपास)

सहजकीर्ति              ‘नामकोश’ (सन् 1627),पंचचत्व प्रकाश’ (सन्                        1644)

राधाकान्तदेव       ‘शब्दकल्पद्रुम’ (सन् 1886-94)

हेमचन्द्र रचित ‘निघण्टुशेष’ छह काण्डों में विभक्त है। यह ‘अभिधानचिन्तामणिमाला’ पर्यायवाचीकोश का पूरक ग्रन्थ है। यह पौधों एवं जड़ी-बूटियों से सम्बन्धित यह एक पूर्ण शब्दकोश है। इस में लगभग 400 छन्द हैं। ‘अभिधानचिन्तामणि’ की ख्याति ‘अभिधानचिन्तामणि-नाममाला’ के रूप में भी है। इसके पहले काण्ड में केवल जैन देवों एवं जैनमत के धार्मिक शब्दों का संग्रह है। अन्य पाँच काण्डों में देव-मत्य-भूमि आदि से सम्बद्ध शब्द हैं। ‘यशोविजय’ शीर्षक से उन्होंने ‘अभिधानचिन्तामणि’ की टीका स्वयं लिखी है।

छह काण्डों में विभक्त ‘अनेकार्थसंग्रह’ में कुल 1829 श्लोक हैं। इसकी काण्ड-योजना एकाक्षर, द्वयक्षर, त्रयक्षर...के क्रम में है। परिशिष्ट काण्ड में अव्ययों का संग्रह है। प्रत्येक काण्ड में शब्द-क्रम योजनाएँ दो प्रकार की हैं--प्रथमाक्षरानुसारी और अन्तिमाक्षरानुसारी। माना जाता है कि बारहवीं शताब्दी में सर्वोत्कृष्ट कोश हेमचन्द्र के ही हैं। ‘अभिधानचिन्तामणि’ कोश तो सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वांगसुन्दर है ही। भारतीय चिन्तन, साहित्य-साधना और कोश निर्माण के क्षेत्र में आचार्य हेमचन्द्र का नाम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। साहित्य, दर्शन, योग, व्याकरण, काव्यशास्त्र...सभी क्षेत्रों में उन्होंने नए मार्ग आलोकित किए। संस्कृत एवं प्राकृत पर उनका समान अधिकार है। लोग उन्हें ‘कलिकालसर्वज्ञ’ के नाम से पुकारते थे।

पुरुषोत्तमदेव बहुत बड़े वैयाकरण थे। उन्हें ‘देव’ नाम से भी पुकारा जाता था। वे बौद्ध धर्मावलम्बी थे और बंगालवासी थे। बौद्धों और वैदिकों की अनबन की कथा तो पुरानी है। पुरुषोत्तमदेव ने उस वातावरण के प्रभाव के कारण ‘अष्टाध्यायी’ के सूत्रों में से वैदिक सूत्रों को छोड़कर शेष सूत्रों पर भाष्य लिखा। इस भाष्य का नाम ‘भाषावृत्ति’ है। यह ग्रन्थ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। देव के समय में उपलब्ध उन अधिकांश प्रामाणिक ग्रन्थों का इसमें उल्लेख है, जो अब लुप्त हो गए। उत्तरवर्ती वैयाकरणों ने ‘भाषावृत्ति’ की महत्ता मुक्त कण्ठ से स्वीकारी। बंगाल निवासी सृष्टिधर ने इस ‘भाषावृत्ति’ की टीका ‘भाषावृत्यर्थवृत्ति’ शीर्षक से लिखी। इसमें 23 वैयाकरणों का उल्लेख है।

मान्यता है कि पुरुषोत्तमदेव ने ‘भाषावृत्ति’ की रचना तत्कालीन राजा लक्ष्मण सेन की प्रेरणा से की। इससे राजा लक्ष्मण सेन का बौद्ध होना और पुरुषोत्तमदेव का उनका आश्रित होना अनुमेय है। पुरुषोत्तमदेव के मन में जैनधर्म का भी पर्याप्त सम्मान था। लक्ष्मण संवत् की शुरुआत 22 जनवरी 1110 को हुई। स्पष्टतः पुरुषोत्तमदेव का समय 12वीं शताब्दी के आसपास का है। परवर्ती काल के अनेक बड़े-बड़े कोशकारों, टीकाकारों और वैयाकरणों द्वारा श्रद्धा से उनका नामोल्लेख हुआ। उनकी रचनाओं की प्रामाणिकता सहज स्वीकार्य है।

अपने समय के सुविख्यात वैयाकरण शरणदेव द्वारा, सन् 1307 में रचित ग्रन्थ ‘दुर्घटवृत्ति’ में पुरुषोत्तमदेव के ग्रन्थों का बार-बार उल्लेख हुआ है। ‘अमरटीकासर्वस्व’ (सन् 1293) के प्रणेता सर्वानन्द के यहाँ भी देव के ग्रन्थों की प्रामाणिकता का स्मरण हुआ है। यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।

अमरसिंह के त्रिकाण्ड से भिन्न पुरुषोत्तमदेव के ‘त्रिकाण्डशेष’ में बौद्ध संस्कृत वांग्मय के महत्त्वपूर्ण शब्दों का समावेश है। पर ‘त्रिकाण्डशेष’ की अपेक्षा ‘हारावली’ कोश, अधिक महत्त्वपूर्ण है।

शब्दकल्पद्रुम’ आधुनिक युग का महाकोश है। सात खण्डों में रचित इस एकभाषीय संस्कृत कोश का प्रकाशन सन् 1828-1858 के बीच हुआ। इसके रचयिता राजा सर राधाकान्त देब बहादुर (सन् 1784-1867) हैं। राधाकान्त देब संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। वे बांग्ला, हिन्दी, अरबी, फारसी, अंग्रेजी जैसी अनेक भाषाओं के जानकार थे, कोलकाता धर्म सभा के नेता भी थे। संस्कृत की परवर्ती कोश-परम्परा सहित समस्त भारतीय भाषाओं की कोश-परम्परा पर इस ‘शब्दकल्पद्रुम’ का व्यापक प्रभाव पड़ा। यह शब्दार्थकोश, पर्यायकोश, ज्ञानकोश, विश्वकोश जैसे अनेक प्रकार के कोशों का सम्मिश्रित महाकोश है। इसमें बहुविध उद्धरण, उदाहरण, प्रमाण, व्याख्या, विधा-विधान एवं पद्धतियों का परिचय है। इसमें प्रत्येक शब्द की व्युत्पत्ति, पाणिनीय व्याकरण के अनुसार है। इसमें शब्दप्रयोग के उदाहरण, शब्दार्थसूचक कोश, इतर प्रमाणों के समर्थन द्वारा अर्थनिर्देश आदि दिए गए हैं। इसमें शब्दों की विस्तृत व्याख्या करने के लिए दर्शन, पुराण, वैद्यक, धर्मशास्त्र आदि के लम्बे लम्बे उद्धरण भी हैं। तन्त्र-मन्त्र, शास्त्रादि अनेक स्रोतों के विस्तृत अंश इसमे उद्धृत हैं। ज्योतिष एवं अन्य भारतीय विद्याओं के पारिभाषिक शब्दों के भी प्रमाण भी हैं। इसमें कोश-रचना-परम्परा पर विस्तृत वक्तव्य है। इसमें उन कोशों की भी सूची है, जो उस दौरान उपलब्ध थे और जिनसे शब्द-संग्रह किए गए। इसकी भूमिका में ऐसे विभिन्न कोशों/कोशकारों के नामोल्लेख हैं, जो भौतिक रूप से अनुपलब्ध हैं, पर विभिन्न कोशों में उनके उल्लेख प्राप्त हैं।

संस्कृत के अलावा प्राकृत/पालि कोश ने भी भारतीय कोश-परम्परा को यथेष्ट समृद्धि दी है। धर्मपाल रचित ‘पाइयलच्छी नाममाला’ (सन् 972) सर्वाधिक प्राचीन प्राकृत कोश है। हेमचन्द्र के ‘देशीनाममाला’ में इसका उपयोग हुआ है। बारहवीं शताब्दी में लंका निवासी मोग्गल्लान थेरो ने ‘अभिधानप्पदीपिका’ शीर्षक पालि शब्दकोश की रचना की। इसका संस्कृत उच्चारण ‘अभिधानप्रदीपिका’ होगा। इस कोश की रचना ‘अमरकोश’ की रीति से हुई है। इसमें पालि के पर्यायवाची शब्दों का संकलन है। इसमें ‘अमरकोश’ के अनेक श्लोकों का पालि रूपान्तरण भी है। इसमें ‘स्वर्गकाण्ड’, ‘भूकाण्ड’ और ‘श्रामणय काण्ड’ संज्ञा से तीन विभाग हैं। ऐसी मान्यता है कि श्रीलंका के पोलोन्नरु राज्य के सिंहल राजा प्रथम पराक्रमबाहु (सन् 1123-1186) के शासनकाल (सन् 1153-1186) में इसकी रचना हुई।

बर्मा के राजा कित्तिसीहासूर के मन्त्री ने चौदहवीं शताब्दी में ‘अभिधानप्पदीपिका’ पर एक भाष्य की रचना की। अठारहवीं शताब्दी में इस ग्रन्थ का बर्मी भाषा में अनुवाद हुआ।

कोश रचना की प्रक्रिया अकबर (सन् 1542-1605) के शासनकाल में भी अनवरत चली। कृष्णदास (सन् 1495 से 1575 या 1581) रचित फारसी-संस्कृत कोश ‘पारसी प्रकाश’ शीर्षक से प्रकाश में आया। शाहजहाँ (सन् 1592-1666) के समय में भी वेदांगराय द्वारा रचित ज्योतिष विषयक कोश ‘पारसीप्रकाश’ बना।

अनुसन्धान से ज्ञात होता है कि हिन्दी साहित्य के मध्यकाल से ही हिन्दी में कोश-रचना की परम्परा चल पड़ी। अनेक छोटे-बड़े कोश बने, जिनमें से अब अनेक ग्रन्थ लुप्त हैं। पर स्पष्ट दिखता है कि उपलब्ध कोशों के विषय एवं पद्धति पर संस्कृत-कोशों का प्रभूत प्रभाव पड़ा। अधिकांश कोशकारों का आधार-ग्रन्थ ‘अमरकोश’ रहा। कुछ कोशकारों ने मेदिनि आदि से भी सहायता ली। नन्ददास (सन् 1533 से 1586) रचित दो कोश--‘नाममाला’ और ‘अनेकार्थमंजरी’ का स्वरूप इनके शीर्षक से ही स्पष्ट है। सन् 1615 में गरीबदास रचित ‘अनंगप्रबोध’ बना। सन् 1713 में रत्नजीत रचित ‘भाषाशब्दसिन्धु’ और ‘भाषाधातुमाला’ उल्लेखनीय कोश है। सतरहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मिर्जा खाँ द्वारा ब्रजभाषा में रचित ‘तुहफतुल-हिन्द’ (हिन्दुस्तान का तोहफा) एक महत्त्वपूर्ण कोश माना गया है। हिन्दी व्याकरण के इतिहास में, सन् 1675 से कुछ पूर्व ही मिर्जा खाँ द्वारा रचित 16 पृष्ठों के ब्रज-भाषा व्याकरण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह संक्षिप्त व्याकरण उनकी मूल रचना ‘तुहफतुल-हिन्द’ का अंश है। ‘तुहफतुल-हिन्द’ में तत्कालीन हिन्दी साहित्य के विविध विषयों--व्याकरण, छन्द, तुक, अलंकार, शृंगार रस, संगीत, कामशास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र और शब्दकोष का विवेचन है। हिन्दी-फारसी शब्दकोश में तीन हजार से अधिक शब्द हैं। इसमें हिन्दी शब्दों की वर्तनी पर मिर्जा खाँ ने अतिरिक्त सावधानी बरती। प्रत्येक शब्द की वर्तनी का विशिष्ट लिप्यन्तरण किया। यहाँ तक कि पूर्ण अनुनासिक ध्वनि (पाँ) और अपूर्ण अनुनासिक ध्वनि (पं) के लिए भी फारसी/अरबी लिपि में विशेष सावधानी

मिर्जा खाँ का विषय-विवेचन अत्यन्त वैज्ञानिक है। भाषाशास्त्रीय दृष्टि से देशी भाषाओं के विश्लेषकों के लिए यह कोश अत्यन्त उपादेय है। तेरहवीं शताब्दी में ‘खालिकबारी’ (सृजेता के बारे में) परम्परा के अनेक ग्रन्थों की रचना हुई। पर अमीर खुसरो (सन् 1253-1325) रचित ‘खालिकबारी’ सर्वाधिक प्रसिद्ध हुई। यह ग्रन्थ अरबी-फारसी-हिन्दी का पद्यमय पर्यायवाची शब्दकोश है। भारत से बाहर ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश आदि देशों में भी यह ग्रन्थ उपादेय साबित हुआ। इस कोश-रचना द्वारा उस दौर की ऐतिहासिक प्रयोजन की पूर्ति हुई।

विदित है कि फारसी उस दौर में राजभाषा थी। आम जनता को इस भाषा के विधिवत ज्ञान के मद्देनजर और भारत में आगत शरणार्थियों की जरूरत का देखते हुए खुसरो ने अरबी-फारसी-हिन्दी के इस छन्दबद्ध पर्यायवाची शब्दकोश की रचना की। लगे हाथ मदरसों में इस कोश की पढ़ाई होने लगी। कुछ विद्वानों के अनुसार ‘खालिकबारी’ किसी ‘खुसरो शाह’ की रचना है, जिनका समय अमीर खुसरो के बहुत बाद का है। राजनीति सम्बन्धी फारसी-संस्कृत की एक शब्दावली शिवाजी ने भी बनाई, जिसमें लगभग 1500 शब्द हैं।

यूरोप के कोश

प्राचीन रोम में लैटिन भाषा का चलन ई.पू. तीसरी शताब्दी से आरम्भ हुआ। पर इसे वहाँ की प्रमुख भाषा बनने में दो सौ वर्ष लग गए। इससे पूर्व वहाँ प्राचीन ग्रीक का चलन था। सन् 180 के आसपास तक वहाँ के बहुत सारे शिक्षित लोग प्राचीन ग्रीक में ही लिखते-पढ़ते थे। इसलिए लैटिन को प्राचीन ग्रीक की निरन्तरता में ही देखना चाहिए। क्रमानुसार लैटिन भाषा रोमन धर्म और साम्राज्य की भाषा बन गई। अर्थात् धार्मिक-राजनीतिक बल से वहाँ की प्रमुख भाषा बन गई। सारी विद्याओं का माध्यम बन गई। इसलिए पाश्चात्य कोशरचना की परम्परा लातिन शब्दसूचियों (ग्लॉसेस/ glosses) से ही विकसित हुई।

लातिन ग्रन्थों के हाशिए में पाठक दुर्बोध शब्द टीपते रहते थे। अपने ज्ञान से अथवा लोगों की सहायता से इन शब्दों के अर्थ भी लिख देते थे। यह ‘ग्लॉस’ कहलाता था। इस पाठकीय चेतना से भाषाओं के प्राचीन शब्दरूप बड़ी मात्र में सुरक्षित हुए, जो शब्दकोश Glosserium) कहलाए। बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी आते-आते यूरोप की विभिन्न भाषाओं में अनेक प्रकार के शब्दों की सूचियाँ संकलित होने लगीं। अंग, वस्त्र, आभूषण, सम्बन्ध, खान-पान, आहार-व्यवहार...आदि से सम्बन्धित शब्द संकलित हुए। इन सूचियों को शब्दावली (Vocabularium) कहा गया। और, इसी शब्दावली से शब्दकोश (Dictionaries) का विकास हुआ। बाद के दिनों में यूरोपीय भाषाओं के अपने-अपने शब्दसंग्रह हुए। क्रमशः अक्षरानुक्रम से व्यवस्थित कोशों का रूप सामने आया। इसे ही हम आज ‘डिक्शनरी’ नाम से जानते हैं।

आधुनिक हिन्दी कोश

भारत में अंग्रेज शासन के दौरान नवागन्तुक अंग्रेजों को इस देश की भाषाएँ सीखने की जरूरत हुई। उन्होंने अपनी भाषा के कोशों के अनुकरण से भारतीय भाषाओं के कोश बनवाए, और इस देश में वर्णानुक्रम से कोश-निर्माण कला का सूत्रपात हुआ। भारतीय भाषाओं में कदाचित् सबसे पहले हिन्दी (अंग्रेजों के शब्द हिन्दुस्तानी) में ही कोश तैयार हुआ, जो सन् 1773 में दो खण्डों में लन्दन से प्रकाशित हुआ--अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी और हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी कोश। यह कोश भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी जॉन फग्र्यूसन ने अधिकारियों के उपयोग के लिए बोलचाल की भाषा का वर्णन करते हुए तैयार किया। इसमें भाषा के विभिन्न रूपों को एक साथ मिलाया गया। पर उसमें मगही शब्दों की प्रधानता थी। ग्रन्थ की प्रस्तावना में उनके द्वारा दी गई सूचना के अनुसार, अपने अकादेमिक जीवन की शुरुआत उन्होंने मिदनापुर में जॉन ग्राहम के अधीन काम करते हुए किया था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कलकत्ता के सुप्रीम काउन्सिल जॉन ग्राहम (सन् 1741-1775) सन् 1759 में कलकत्ता आए। वे वहाँ के काउन्सिल के सचिव थे। सन् 1765 तक मिदनापुर में रहे। जनवरी, 1772 में पटना के चीफ रहे। अगस्त, 1773 में वे खालसा के अधीक्षक हुए। सन् 1773 में ही वे सीमा शुल्क बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे। वे जॉन वॉरेन हेस्टिंग्स के करीबी सहयोगी थे। लगभग 34 वर्ष की आयु में मार्सिले से लिस्बन की यात्र के दौरान मालोर्का के सामने समुद्र में उनकी मृत्यु हो गई। जॉन फग्र्यूसन के जीवन के बारे में इससे अधिक कुछ नहीं मिलता। किसी पत्रिका से एक क्षीण संकेत मिलता है कि 4 सितम्बर 1773 को वे ‘इंडियामैन वैनसिटार्ट’ नामक जहाज से भारत-इंग्लैण्ड यात्रा कर रहे थे, उसी दौरान कैप्टन रोशे नाम के उनके एक सहयात्री ने उन्हें तलवार से मार डाला।

सन् 1790 में हेनरी हेरिस के प्रयास एक और कोश मद्रास से प्रकाशित हुआ। फिर जॉन बोथ्विक गिलक्राइस्ट (सन् 1759-1841) ने इस दिशा में विशिष्ट काम किया। उन्होंने एक वर्ष का अवकाश लेकर पटना, फैजाबाद, लखनऊ, दिल्ली, गाजीपुर सहित विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया। देशी लोगों के साथ मिलकर सामग्री जुटाई। हिन्दुस्तानी भाषा का व्यवस्थित अध्ययन किया और यह कोश बनाया। सन् 1786 में उन्होंने ‘ए डिक्शनरी: इंग्लिश एण्ड हिन्दुस्तानी’ प्रकाशित कराया, जिसकी पूर्वपीठिका में हिन्दुस्तानी भाषा का व्याकरण भी है। इसका खण्डवार प्रकाशन बारी-बारी से हुआ। सन् 1790 में यह काम पूरा हुआ। देवनागरी में मुद्रित यह पहला प्रकाशन था। अपने स्वाध्याय के लिए कैप्टन जोसेफ टेलर द्वारा बनाया गया ‘हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी’ कोश, बाद के दिनों में बड़ा उपादेय साबित हुआ। फोर्ट विलियम कॉलेज के अध्यापकों ने इसका संशोधन किया। विलियम हण्टर ने कलकत्ता से सन् 1808 में इसका सम्पादन और प्रकाशन कराया।

कोश परम्परा में विलियम हण्टर का एक और योगदान है--‘ए कलेक्शन ऑफ प्रोवर्ब्स: परशियन एण्ड हिन्दुस्तानी’। फ्रांसिस ग्लैडविन (मृत्यु सन् 1813) द्वारा तैयार फारसी-हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी कोश सन् 1805 में प्रकाशित हुआ। कोश निर्माण परम्परा में जॉन शेक्सपियर का योगदान भी विशिष्ट है। उन्होंने सन् 1808 में विलियम हण्टर के कोश का संशोधन तो किया ही; सन् 1819 में इसका चौथा संस्करण भी प्रकाशित हुआ। ये कोश रोमन अक्षरों में मुद्रित हुए थे। जिसमें ‘हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी’ के बाद ‘अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी कोश’ भी जोड़ दिया गया।

प्राच्यविद् और प्रसिद्ध कोशकार थॉमस रोबक (सन् 1781-1819) ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एक स्कॉटिश सेना अधिकारी थे। खराब स्वास्थ्य के कारण, सन् 1806-1809 तक की छुट्टी लेकर वे एडिनबर्ग आ गए। छुट्टी के दौरान उन्होंने अन्य कामों के साथ अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी शब्दकोश और दो खण्डों के ब्रिटिश-इण्डियन मॉनिटर बनाने में जॉन बोथ्र्विक गिलक्राइस्ट सहायता की। वापसी की समुद्र यात्रा में उन्होंने संक्षिप्त व्याकरण के साथ-साथ नौसेना से सम्बन्धित अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी नेवल तकनीकी कोश तैयार किया -- ‘एन इंगलिश एण्ड हिन्दुस्तानी नेवल डिक्शनरी ऑफ टेक्निकल टम्र्स एण्ड सी फ्रेजेज’ (तकनीकी शब्दावली एवं समुद्री मुहावरों का अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी नौसेना शब्दकोश)। यह छोटी-सी रचना सन् 1811 में कलकत्ता से प्रकाशित हुई। यह ऐतिहासिक महत्त्व की रचना मानी जा सकती है। हिन्दी में आधुनिक पारिभाषिक कोश परम्परा का इसे आरम्भिक बिन्दु माना जा सकता है। इसका दूसरा संस्करण सन् 1813 में और चौथा संस्करण 1848 में आया; मार्च 1811 में वे फोर्ट विलियम कॉलेज, मद्रास के सहायक सचिव और परीक्षक बने। वे एशियाटिक सोसाइटी के सदस्य भी थे। उनकी मृत्यु (08.12.1819/कलकत्ता में) बुखार से हुई।

फोर्ट विलियम कॉलेज में थॉमस रोबक ने एक ‘हिन्दुस्तानी-फारसी शब्दकोश’ (कलकत्ता, 1818) का भी सम्पादन किया। मृत्यु से ठीक पहले उन्होंने ‘ए कलेक्शन ऑफ पॉलिसीज एण्ड प्रोवर्बियल फ्रेजेज इन फारसी एण्ड हिन्दुस्तानी लैंग्वेजेज’ पूरा किया, जो सन् 1824 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। हिन्दुस्तानी शब्दकोश के लिए तैयार किए गए उनके नोट्स, कॉलेज की लाइब्रेरी में जमा कर दिए गए थे। मूलतः थॉमस रोबक द्वारा तैयार इस कोश की शब्दावली लशकर से सम्बन्धित थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी सेवा के सैन्य अधिकारी मेजर विलियम हेनरी कार्मिकेल-स्मिथ (सन् 1780-1861) द्वारा संशोधित-परिष्कृत और फिर जॉर्ज स्मॉल द्वारा सावधानीपूर्वक संवर्द्धित, पुनर्सम्पादित इसका पाँचवाँ संस्करण डब्ल्यू.एच. एलन एण्ड कम्पनी, लन्दन से सन् 1882 में प्रकाशित हुआ। इस संस्करण शीर्षक दिया गया--‘लस्करी डिक्शनरी’ या ‘एंग्लो-इण्डियन वोकेबुलरी ऑफ नॉटिकल टम्र्स एण्ड फ्रेजेज इन इंग्लिश टू हिन्दुस्तानी’ (चीफली इन द करप्ट जार्गन इन यूज अमोंग लशकर ऑर इण्डियन सेलर)। इस अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी कोश में समुद्री शब्दों-मुहावरों का, मुख्य रूप से लशकर या भारतीय नाविकों के बीच उपयोग में आने वाले अबूझ शब्दों-पदों का संग्रह हैं।

अंग्रेजी प्राच्यविद् होरेस हेमैन विल्सन (सन् 1786-1860) ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के पहले बोडेन प्रोफेसर थे। प्राचीन भारतीय भाषा एवं साहित्य में उनकी गहन रुचि थी। ऋग्वेद का अंग्रेजी अनुवाद करनेवाले वे पहले व्यक्ति थे। सन् 1813 में उन्होंने कालिदास के ‘मेघदूत’ का अंग्रेजी में छन्दबद्ध अनुवाद ‘क्लाउड-मैसेंजर’ शीर्षक से किया और संस्कृत पाठ के साथ उसे प्रकाशित कराया। सन् 1819 में उन्होंने स्थानीय विद्वानों द्वारा संकलित सामग्रियों से पहला संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोश तैयार किया, और उसे अपनी शोध-परिलब्धि से पूरित किया। उनका यह शोध इतना विशिष्ट था कि सन् 1855-1875 के बीच रुडोल्फ रोथ (सन् 1821-1895) और ओट्टो वॉन बोह्टलिंगक (सन् 1815-1904) के संयुक्त प्रयास से तैयार संस्कृत शब्दकोश के प्रकाश में आने तक उसी की आभा छाई रही। रुडोल्फ और ओट्टो ने अपने कोश की प्रस्तावना में विल्सन के प्रति भरपूर कृतज्ञता व्यक्त की। 

 


रूसी-जर्मन इण्डोलॉजिस्ट और संस्कृत विद्वान ओट्टो वॉन बोह्टलिंगक स्वयं भी विशिष्ट कोशकार थे। उन्होंने अपने दो लेखक मित्रों रुडोल्फ रोथ और अल्ब्रेक्ट वेबर (सन् 1825-1901) की सहायता से सेण्ट पीटर्सबर्ग में 23 वर्षों में 7 खण्डों का महान कोश ‘संस्कृत-जर्मन शब्दकोश’ तैयार किया। होरेस हेमैन विल्सन की रुचि आयुर्वेद, पारम्परिक भारतीय चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा पद्धतियों में भी पर्याप्त थी। मेडिकल एण्ड फिजिकल सोसाइटी ऑफ कलकत्ता से प्रकाशित उनके संकलनों में हैजा एवं कुष्ठ निवारण की वे स्थानीय प्रथाएँ भी संकलित हैं, जो भारतीय सामुदायिक जीवन में उन्होंने अपनी आँखों देखी थी।

इसी बीच सन् 1827 में प्रकाशित पादरी मैथ्यू थामसन एडम का ‘ए ग्रामर ऑफ हिन्दी लैंग्वेज’ (हिन्दी भाषा का व्याकरण) एक विशिष्ट काम है। इस कृति को कामता प्रसाद गुरु ने हिन्दी की सर्वमान्य पुस्तकों में प्रथम कहा। सन् 1829 में कलकत्ता से प्रकाशित थामसन एडम द्वारा संगृहीत हिन्दी कोश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हिन्दी भाषा और नागरी लिपि में यह पहला कोश है। श्याम सुन्दर दास ने इसे देवनागरी वर्णक्रमानुसार से संयोजित आधुनिक पद्धति का पहला एकभाषी हिन्दी कोश कहा।

इसके बाद तो फिर हिन्दी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिन्दी में अनेक कोश प्रस्तुत हुए। ऐसे कोशकारों में एस. डब्ल्यू. फैलन का नाम वरेण्य है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने ‘हिन्दुस्तानी कहावत कोश’ (‘ए डिक्शनरी ऑफ हिन्दुस्तानी प्रोवर्ब्स, सेइंग्स, एम्ब्लेम्स, एफोरिज्म्स’) तैयार किया, जिसके संस्करण अभी भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा उन्होंने हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी कोश और हिन्दुस्तानी-अंग्रेजी तथा अंग्रेजी-हिन्दुस्तानी विधि-कोश की रचना भी की। उनसे पहले इस प्रकार की कोई कृति हिन्दी भाषा के सम्बन्ध में नहीं थी। फैलन ने इस ‘हिन्दुस्तानी कहावत कोश’ में मारवाड़ी, पंजाबी, मराठी, भोजपुरी और तिरहुती कहावतों, प्रचलित वाक्य-खण्डों, सूत्रों, नीति-वाक्यों का संग्रह किया।

विदित है कि कहावतों और मुहावरों में इतिहास के बहुत सारे तथ्य जीवन पाते रहते हैं, जो लोक-कण्ठ में बसकर सुरक्षित होते हैं। जिस इलाके में कहावत प्रचलित हैं, वहाँ के इतिहास, रीति-नीति पर इस कहावतों, मुहावरों के द्वारा नई रोशनी पड़ती है। फैलन द्वारा संकलित होकर इस कोश में उस इलाके की की ढेर सारी नष्टप्राय भाषिक युक्तियाँ और सामाजिक रीति-नीति की छवियाँ सुरक्षित रह गईं। फैलन के बाद इस ग्रन्थ का सम्पादन और परिशोधन कप्तान रिचर्ड कार्नेक टेम्पल ने किया। सर रिचर्ड कार्नेक टेम्पल (सन् 1850-1931) भारतीय मूल के ब्रिटिश प्रशासक; अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह के मुख्य आयुक्त और एक मानवशास्त्रीय लेखक थे। वे रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल, फिलोलॉजिकल सोसाइटी, फोकलोर सोसाइटी और रॉयल एन्थ्रोपोलॉजिकल इन्स्टीट्यूट के सदस्य भी थे। सन् 1886 में उन्हें अमेरिकन फिलॉसॉफिकल सोसाइटी का सदस्य भी चुना गया था। उनकी राय में स्थानीय लोककथाओं का ज्ञान, हर शासक और शासित के लिए उपयोगी है।

सन् 1914 आते-आते तो उन्होंने स्पष्ट लिखा कि लोक-साहित्य में समाविष्ट प्रथाएँ और मान्यताएँ, क्षेत्र के मूल निवासियों के दैनिक जीवन का निर्माण करती हैं। उनकी भावनाओं को नियन्त्रित करती हैं। उनकी क्रियाओं को रेखांकित करती हैं। इन सबकी गहन जानकारी के बिना हम विदेशी उन्हें भली-भाँति नहीं समझ सकते! उन्होंने चेतावनी की तरह कहा कि निकटवर्ती सरोकार और सही समझ से सहानुभूति पैदा होती है। और, सहानुभूति से ही अच्छी सरकार बनती है। उनकी अनेक रचनाओं में एक ‘हिन्दुस्तानी कहावत कोश’ के सम्पादन का उल्लेख है, वह यही ‘हिन्दुस्तानी कहावत कोश’ है। इस ग्रन्थ के सम्पादन में टेम्पल ने बंगाल सरकार के प्रथम उर्दू सहायक अनुवादक, दिल्ली निवासी लाला फकीरचन्द की सहायता ली। यह कृति मेडिकल हाल प्रेस बनारस से छपी। सन् 1886 में यह फिर ई.जे. लजरस एण्ड कं. बनारस तथा ट्यूबर एण्ड कं. लन्दन से प्रकाशित हुई। उस समय इसका मूल्य दस रुपए था। लम्बे समय तक यह ग्रन्थ कुछेक ही पुस्तकालयों में दुर्लभ ग्रन्थ के रूप में था। मार्च 1968 में नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया ने लोकसाहित्य के विशिष्ट विद्वान कृष्णानन्द गुप्त के सम्पादन में इसका संशोधित एवं परिमार्जित संस्करण प्रकाशित किया। बाद के दिनों में इसके पुनर्मुद्रण भी हुए। किन्तु हिन्दी भाषा के ये सभी कोश-निर्माता भारतीयेतर वंश के ही थे।

इस मामले में मुंशी राधेलाल पहले भारतीय हैं, जिन्होंने सन् 1873 में हिन्दी भाषा में एक कोश बनाया। ‘गुलशने फैज’ शीर्षक से सैयद जामिल अली जलाल द्वारा निर्मित कोश सन् 1880 में प्रकाशित हुआ। यह कोश था तो फारसी लिपि में, पर उसके अधिकांश शब्द हिन्दी के थे। बाबा बैजूदास का ‘विवेक कोश’ सन् 1892 में बाँकीपुर (पटना) से प्रकाशित हुआ। इसके बाद फिर हिन्दी के अनेक छोटे छोटे कोश प्रकाशित हुए।

हिन्दी शब्दसागर

हिन्दी शब्दसागर’ नागरीप्रचारिणी सभा के संचालकों के अभ्यन्तर ध्वनि पुकार की परिणति है। नागरीप्रचारिणी सभा के संचालकों को हिन्दी में किसी बृहत् कोश का अभाव, उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम समय, अर्थात् सन् 1893 से ही खटक रहा था। इसलिए सभा की धारणा बनी कि नए-पुराने गद्य-पद्य में व्यवहृत हिन्दी के सारे शब्दों के समावेशन से एक वृहत् कोश का प्रकाशन हो। इस प्रयोजन-सिद्धि की ओर सन् 1904 में सभा अग्रसर हुई। इस प्रसंग में विचार करने के लिए हिन्दी भाषा के बड़े-बड़े विद्वानों की समिति गठित हुई। सन् 1907 आते-आते इस कोश-रचना के स्वरूप स्पष्ट होने लगे। समिति की धारणा बनी कि नागरीप्रचारिणी सभा हिन्दी भाषा के दो बड़े कोश बनवाए--‘हिन्दी से हिन्दी कोश’ और ‘हिन्दी से अंग्रेजी कोश’

ऐसे श्रेष्ठ कोश के निर्माण के लिए बड़ी पूँजी का प्रयोजन था, क्योंकि पूर्ववर्ती अनेक कोशों की तरह यह कोश भी व्यक्ति-निर्मित न होकर भाषा-साहित्य के अनेक मर्मज्ञों द्वारा तैयार होना था। कोश की गुणवत्ता का ध्यान रखते हुए सभा का नीतिगत निर्णय था कि-- शब्दसंग्रह के काम में लगे विद्वानों को वेतन दिए जाएँ। लगभग डेढ़ दर्जन विद्वान शब्द-संग्रह के कार्य में लगे थे। सन् 1908 के आरम्भ से ही एक निश्चित प्रणाली पर शब्दसंग्रह का काम होने लगा। पर पूँजी की आवश्यकता बनी रही।

इस पूँजी की व्यवस्था के लिए सभा ने दरभंगा नरेश, महाराजा सर लक्ष्मीश्वर सिंह समेत अनेक राजाओं-महाराजाओं से आर्थिक सहायता के लिए निवेदन किया और यथायोग्य आर्थिक सहायता प्राप्त भी की। इस कोश के सम्पादक का नाम आरम्भ में सभा की ओर से सुनिश्चित था। पर अनेक विशिष्ट विद्वान सहसम्पादक के रूप में इस शब्द-संग्रह के काम में निष्ठा से लगे थे। अगले वर्ष सभा ने श्यामसुन्दर दास को कोश का प्रधान सम्पादक मनोनीत किया। सन् 1910 के आरम्भ में शब्द-संग्रह का कार्य पूरा हुआ। प्रधान सम्पादक श्यामसुन्दर दास, सहसम्पादक बालकृष्ण भट्ट, लाला भगवानदीन, अमीर सिंह एवं जगन्मोहन वर्मा हुए। इस पुनीत कार्य में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं आचार्य रामचन्द्र वर्मा का भी प्रभूत योगदान था। लगभग दस लाख पर्चियों पर शब्द लिखे गए थे। किन्तु पुनरावृत्ति वाली पर्ची हटा देने से लगभग एक लाख प्रविष्टि हुई। मई 1912 में छपाई का कार्य आरम्भ हुआ। चार खण्डों का कोश में बना। सन् 1922-1929 के बीच इसका प्रथम प्रकाशन हुआ, पर बीच प्रकाशन में सन् 1924 में एक दुर्घटना हो गई। कोश कार्यालय से शब्दसंग्रह की 22 बण्डल पर्चियाँ चोरी हो गईं। फिर भी, जैसे तैसे जनवरी, 1929 में यह कार्य सम्पन्न हुआ। इसमें ग्रन्थों में प्रयुक्त भाषा, व्यवहारपरक भाषा एवं बोलियों के लगभग शब्द संगृहीत हुए। व्याख्यात्मक पद्धति से इसमें अर्थ-निर्धारण किया गया। हिन्दी शब्दसागर के प्रकाशन के पश्चात् उसका एक संक्षिप्त संस्करण भी प्रकाशित किया गया। इस तरह हिन्दी भाषा का बृहत् शब्द-संग्रह ‘हिन्दी शब्दसागर’ घनघोर आपदाएँ झेलते हुए, काशी नागरीप्रचारिणी सभा से प्रकाशित हुआ। यह हिन्दी भाषा का पहला मानक कोश है। इसे प्रथम व्यावहारिक और प्रामाणिक हिन्दी कोश कहा जाता है। बाद के दिनों में सन् 1965-1976 के बीच 11 खण्डों में इसका परिवर्द्धित संस्करण प्रकाशित हुआ। इसके बाद समय समय पर अनेक कोश प्रकाशित हुए।

शब्दकोश और कोश-रचना (Dictionaries and Lexicography)

कोश-कला का विकास केवल सामान्य कोशों के रूप में ही नहीं, ज्ञानकोश के रूप में भी हुआ। इसके सर्वाधिक वृहत् रूप को आज हम ‘विश्वकोश’ नाम से जानते हैं। अंग्रेजी में लोग इसे ‘इन्साइक्लोपीडिया’ कहते हैं। हिन्दुस्तान में इसकी प्रथम प्रयुक्ति बांग्ला भाषा में हुई। हिन्दी में इसका अभिग्रहण बांग्ला से ही हुआ है। ‘बांग्ला विश्वकोश’ भारतीय भाषाओं का पहला आधुनिक विश्वकोश है। नगेन्द्रनाथ बसु (सन् 1866-1938) द्वारा सम्पादित यह कृति समकालीन बांग्ला भाषा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और पूर्ण विश्वकोश है। नगेन्द्रनाथ बसु ने इसका संकलन सन् 1888 से ही आरम्भ कर दिया था, पर सुधी भाषा-प्रेमियों को उनके उद्यम की परिणति सन् 1911 में प्रकाशन के बाद दिखी।

इस विश्वकोश के अलावा नगेन्द्रनाथ बसु ने सन् 1884 में ‘शब्देन्दु महाकोश’ शीर्षक बांग्ला-अंग्रेजी शब्दकोश भी प्रकाशित कराया। ‘हिन्दी विश्वकोश’ शीर्षक से सन् 1916-32 के दौरान 25 भागों में प्रकाशित कृति ‘बांग्ला विश्वकोश’ का हिन्दी रूपान्तरण है। यह पहला ‘हिन्दी विश्वकोश’ पूरी तरह ‘बांग्ला विश्वकोश’ पर आधारित होकर भी नई धारणा से संकलित हुआ। आगे चलकर स्वातन्त्र्योत्तर काल के भारतीय विद्वानों की सावधान चेतना हर पल अपनी आधुनिक भाषाओं एवं साहित्यों को सर्वविध सम्पन्न करने की ओर अग्रसर थी। आधुनिक भारतीय भाषाओं में विश्वकोश निर्माण का सूत्रपात विद्वत्समाज की इसी चेतना से हुआ।

इसी क्रम में नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी ने सन् 1954 में हिन्दी में मौलिक तथा प्रामाणिक विश्वकोश के प्रकाशन का प्रस्ताव भारत सरकार के सम्मुख रखा। इस कार्य के क्रियान्वयन के लिए गठित विशेषज्ञ समिति की पहली बैठक 11 फरवरी 1956 को हुई और ‘हिन्दी विश्वकोश’ के निर्माण का कार्य जनवरी 1957 में आरम्भ हुआ। सन् 1970 तक 12 खण्डों में इस विश्वकोश का प्रकाशन कार्य पूरा हुआ। सन् 1970 में ही विश्वकोश के प्रथम तीन खण्ड अनुपलब्ध हो गए। परिणामस्वरूप इसके नए परिवर्धित संस्करण प्रकाशित हुए। नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा हिन्दी में निर्मित इस बारह खण्डों के ‘हिन्दी विश्वकोश’ में अनेकानेक विषयों का समावेश है।

राजभाषा विभाग (गृह मन्त्रालय) तथा मानवसंसाधन विकास मन्त्रालय ने राजभाषा हिन्दी स्वर्ण-जयन्ती वर्ष के उपलक्ष्य में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा को दायित्व सौंपा कि सुधी प्रयोक्ताओं के लिए वह ‘हिन्दी विश्वकोश’ इण्टरनेट पर सुलभ कराए। तदनुसार मानव संसाधन विकास मन्त्रालय तथा सूचना प्रौद्योगिकी मन्त्रालय के वित्तपोषण से केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा और इलेक्ट्रॉनिक अनुसन्धान एवं विकास केन्द्र, नोएडा के संयुक्त तत्त्वावधान में इण्टरनेट पर ‘हिन्दी विश्वकोश’ प्रस्तुत करने का कार्य अप्रैल 2000 में प्रारम्भ हुआ। आज सुधी उपयोक्ताओं के लिए यह इण्टरनेट पर निःशुल्क उपलब्ध है। इसके सम्पादक मण्डल में थे--गोविन्द बल्लभ पन्त (अध्यक्ष, नागरीप्रचारिणी सभा), धीरेन्द्र वर्मा (प्रधान सम्पादक), भगवतशरण उपाध्याय एवं गोरखप्रसाद (सम्पादक) और राजबली पाण्डेय (मन्त्री)।

कोशविद्या (Lexicography)

शब्दकोश निर्माण से सम्बन्धित सकल कार्यों के मिले-जुले उद्यम को कोशकर्म या कोशविद्या कहते हैं। कोश-निर्माण के कार्य में निपुण लोग कोशकार (lexicographer) कहलाते हैं।

विषय की दृष्टि से शब्दकोशों का कोटि-विभाजन वस्तुतः जटिल कार्य होता है। भिन्न-भिन्न कोशकार अपनी-अपनी समझ से विषयों का वर्गीकरण करते तो थे, पर वे सर्वसम्मति में स्वीकार्य और उपादेय नहीं हो पाते थे।

इसके अलावा शब्दों-पदों का कोई निश्चित क्रम भी नहीं होता था। प्रायः हो भी नहीं सकता था। परिणामस्वरूप उपयोक्ताओं के समक्ष पूरे कोश को कण्ठस्थ करने के अलावा कोई उपाय नहीं दिखता था। पाश्चात्य देशों की कोश-परम्परा के अक्षरक्रम से बड़ी राहत आई। कोश कण्ठस्थ करने की विवशता समाप्त हो गई। प्रयोजन के अनुसार हर प्रयोक्ता अपेक्षित शब्दों-पदों का अर्थ-सन्धान करने में सक्षम हो गए।

अब तो लगभग देशों की भाषाओं के कोशों में अक्षरानुक्रम का प्रयोग हो रहा है। कोश-रचना की यह पद्धति, उपयोक्ताओं की सुविधा की दृष्टि से सर्वाधिक उपादेय है। हर प्रकार के कोश में प्रायः वर्णानुक्रम ही प्रयुक्त होता है।

कोश अनेक के प्रकार होते हैं, पर अर्थ के विचार से कोश दो प्रकार के होते हैं-- समभाषी कोश, अर्थात्, जिसमें शब्दों-पदों के अर्थ या विवेचन उसी भाषा में हो; विषमभाषी कोश, अर्थात्, जिसमें शब्दों-पदों के अर्थ या विवेचन दूसरी भाषा या भाषाओं में हो।

विषय के विचार से कोश अनेक प्रकार के होते हैं--गणित, विज्ञान, भूगोल, दर्शन, चिकित्सा, दर्शन इत्यादि विषयों से सम्बन्धित कोश। ऐसे कोशों को सामान्यतया शब्दावली कहा जाता है--गणितीय शब्दावली, वैज्ञानिक शब्दावली, भौगोलिक शब्दावली, दार्शनिक शब्दावली, विधिक शब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, संसदीय शब्दावली...आदि।

कोशकारों की बौद्धिक विलक्षणता के कारण अब कोशों की अनेक पद्धतियाँ प्रस्तुत हुई हैं--विशिष्ट रचनात्मक प्रवृत्तियों या रचनाकारों के ग्रन्थों में प्रयुक्त पात्र, प्रसंग, बिम्ब, प्रतीक, सूक्ति, प्रयुक्ति...आदि से सम्बन्धित शब्दो-पदों के कोश; जैसे ‘छायावाद कोश’, ‘प्रगतिवाद कोश’, ‘निराला कोश’, ‘जयशंकर प्रसाद कोश’...। विभिन्न बोलियों या विभाषाओं में प्रयुक्त शब्दों के कोश; जैसे ‘ब्रजभाषा कोश’, ‘बज्जिका कोश’...आदि।

कोश-रचना एक कला है। इस कला में सिद्धि के बिना कोश-कर्म में प्रवृत्त होना उचित नहीं। और, इस सिद्धि का एक मात्र रास्ता उन्नत भाषाओं के कोशों का सूक्ष्म अध्ययन है। उच्च शिक्षा और चर्चित-प्रशंसित विद्वता मात्र के बूते प्रामाणिक कोशों की रचना या सम्पादन सम्भव नहीं है। ऐसे गुमान से विफलता सुनिश्चित होगी। इसके लिए कोश-कला का गहन-ज्ञान अनिवार्य है। और, यह ज्ञान कोशों के उपादेय अध्ययन से ही सम्भव है।

संकल्पना और प्रासंगिकता (Concept and Relevance)

किसी भी कोश के निर्माण का निमित्त, किसी न किसी क्षेत्र के प्रयोजन की पूर्ति के लिए होता है। इसलिए कोश-निर्माण-प्रक्रिया में उन उद्देश्यों का ध्यान रखना अनिवार्य होता है। इसकी वस्तुनिष्ठता और गुणवत्ता का सन्तुलन बनाए रखने के लिए निर्माण-प्रक्रिया की सूक्ष्मता पर हर दृष्टि से कोशकार की सावधानी अनिवार्यतः अपेक्षित होती है।

प्रविष्टि विशेष पर विवरण-व्याख्या, औचित्य से अधिक और अन्य पर अपेक्षाकृत कम हो, तो कोश का सन्तुलन भंग होता है। शब्दों-पदों-पदबन्धों के विवेचन-क्रम सदैव युक्तिसंगत होना चाहिए। एक श्रेणी के सारे शब्दों का विवेचन एक जैसा होना चाहिए। प्रामाणिक ग्रन्थों अथवा ग्रन्थकारों के उदाहरण आवश्यक हों, तो उद्धृत अंश प्रयोजन से अधिक न हों। उतना ही हो, जितने में प्रयोक्ताओं या भावकों की जिज्ञासा का शमन हो जाए।

कोशों में अर्थ-सृष्टि और विवेचन की प्रधानता होती है। इसलिए उनमें अव्याप्ति या अतिव्याप्ति दोष नहीं होने चाहिए। मर्यादित और संक्षिप्त विवरण नपे-तुले शब्दों में होने चाहिए। इसमें अधिकतम और प्रामाणिक जानकारी न्यूनतम शब्दों में प्रस्तुत होनी चाहिए। भिन्न-भिन्न विषयों के पारिभाषिक शब्द हर अच्छे कोशों में रहते हैं। इसलिए सभी कोशकारों या कोश-सम्पादकों को उन विषयों का सामान्य ज्ञान अनिवार्यतः रहना चाहिए। आवश्यकतानुसार विषय विशेष के प्रामाणिक ग्रन्थों अथवा विशेषज्ञों का सहयोग लेना चाहिए।

कोशकार की व्यापक-दृष्टि और हितकारी वृत्ति कोश-निर्माण के लिए अनिवार्य होती है। नीर-क्षीर-विवेक सम्पन्न सूक्ष्म और पैनी दृष्टि के बूते ही वे पुरानी त्रुटियों का परिमार्जन करते हैं। पक्षपात अथवा राग-द्वेष से उनको दूरी बनाए रखनी चाहिए। भाषा-साहित्य की सेवा मात्र ही उनका लक्ष्य होना चाहिए। हर भाषा में शब्दों के कुछेक रूप तो मानक होते हैं, पर ढेर सारे शब्दों के रूप भौगोलिक प्रयुक्ति के अनुरूप क्षेत्रीय होते हैं। जिन क्षेत्रीय शब्दों के मानक रूप उपलब्ध प्राप्त हों; उनका सम्पूर्ण विवेचन मानक शब्दों के रूप में ही होना चाहिए। पर, उनके क्षेत्रीय रूप की प्रविष्टि के आगे मानक रूप का संकेत कर देना चाहिए। इससे पुनरावृत्ति से बचाव का लाभ का तो होता ही है, साथ ही अन्य भाषा-भाषियों को सहजता से उन शब्दों के मानक रूप का अभिज्ञान भी हो जाता है।

तकनीकी सुविधा और आधुनिकता के उग्र उड़ान में इधर आकर ज्ञान-दान, जानकारी-वितरण और सूचना-विपणन के क्षेत्र में विचित्र प्रसार हुए हैं। निश्चय ही उनमें कई प्रसार विशिष्ट भी हुए हैं। कोश-विद्या इसका अपवाद नहीं है। भाषा-साहित्य की समृद्धि की भावना से अथवा ज्ञानाकुल समाज की जिज्ञासा तृप्त करने की महनीय चेतना से अथवा अपने वाणिज्यिक विस्तार की महत्त्वाकांक्षी योजना से नए युग के कोश-विद्या के नए प्रबन्धकगण, कोश-निर्माण की प्रक्रिया को बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ देने लगे हैं। कोश-कला या कोश-विद्या अब बाजार के प्रभाव से बाहर नहीं है। बाजार को या कि प्रकाशकों को पता चल गया है कि उपयोक्ताओं की जेब में धन है। उसे बताना भर है कि--औरों के यहाँ से प्रकाशित कोश की कौन कहे, अब तो हमारे ही गत वर्ष के कोश पुराने हो गए हैं। इस नए संस्करण को देखिए, इसमें हमने ज्ञानार्जन के नए-नए आदर्श संस्तुत किए हैं।

इन्हीं आदर्शों में से एक नया आदर्श ‘वेब्स्टर्स न्यू वल्र्ड डिक्शनरी’ ने रखा है। शब्दकोशों के लिए यह आदर्श उपादेय और अनुकरणीय है। आधुनिक समय के सुविधा-प्रेमी प्रयोक्ताओं को इससे अतिरिक्त सुविधा मिल जाती है। ‘वेब्स्टर्स न्यू वल्र्ड डिक्शनरी’ प्रसिद्ध अमेरिकी कम्पनी ‘मरियम-वेबस्टर, इनकॉर्पोरेटेड’ द्वारा प्रकाशित एक बहुप्रशंसित शब्दकोश है। ‘मरियम-वेबस्टर, इनकॉर्पोरेटेड’ उत्तरपूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका में सन्दर्भ ग्रन्थ, विशेष रूप से शब्दकोश प्रकाशित करनेवाला सबसे पुराना शब्दकोश प्रकाशक है।

इस पुस्तक-कम्पनी की स्थापना, डैन मरियम के दो पुत्र जॉर्ज (सन् 1803-1880) और चाल्र्स ने अपने नाम के आद्यक्षर से ‘जी एण्ड सी मरियम कम्पनी’ नाम से सन् 1831 में की थी। इसकी शुरुआत स्प्रिंगफील्ड (उत्तरपूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यू इंग्लैण्ड क्षेत्र के राज्य मैसाचुसेट्स का एक शहर) में हुई। उनके वंश में पिछली पीढ़ी से ही पुस्तक व्यवसाय चला आ रहा था। उनके चाचा एबेनेजर मरियम (सन् 1777-1858) मैसाचुसेट्स के प्रतिष्ठित प्रकाशक थे। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मैसाचुसेट्स में जन्मे एबेनेजर मरियम ने, तेरह वर्ष की आयु में, वॉर्सेस्टर के प्रसिद्ध प्रकाशक इसाइया थॉमस (Isaiah Thomas) के साथ छह वर्षों तक प्रशिक्षु का काम किया। एबेनेजर मरियम ने सन् 1798 में अपने भाई डैन के साथ ब्रुकफील्ड (अब वेस्ट ब्रुकफील्ड) के वेस्ट पेरिश में ‘ई. मरियम एण्ड कम्पनी’ नाम से एक ‘प्रिण्टिंग एण्ड बुक बाइण्डिंग’ व्यवसाय शुरू किया। सन् 1823 में डैन मरियम की मृत्यु हो गई। इसके बाद एबेनेजर ने डैन के बेटे जॉर्ज के साथ व्यवसाय जारी रखा, पन्द्रह वर्ष की आयु में जॉर्ज मरियम (सन् 1803-1880) आरम्भ में कुछ समय तक अपने चाचा एबेनेजर के वेस्ट ब्रुकफील्ड प्रिण्टिंग कार्यालय में प्रशिक्षु रहे-- वयस्क होने के बाद वे प्रकाशन संस्थान के हिस्सेदार हो गए। एबेनेजर ने अपने प्रकाशन ‘ई. मरियम एण्ड कम्पनी’ का नाम बदलकर ‘ई. एण्ड जी. मरियम’ रख लिया।

मुद्रण, प्रकाशन और पुस्तक विक्रय का यह व्यापार भली-भाँति वॉर्सेस्टर काउण्टी (मैसाचुसेट्स में बड़ी आबादीवाला प्रदेश) में चलता रहा। पर सन् 1831 में जॉर्ज मरियम अपने चाचा के व्यवसाय से अलग हो गए। वे अपने भाई चाल्र्स के साथ मैसाचुसेट्स के एक अन्य शहर स्प्रिंगफील्ड चले गए; वहीं दोनों भाइयों ने साथ मिलकर ‘जी एण्ड सी मरियम कम्पनी’ स्थापित की। उनके प्रकाशन की आरम्भिक पुस्तकें कानूनी पुस्तकें, बाइबिल के संस्करण और स्कूल की पुस्तकें थीं। पर अन्ततः इस कम्पनी का परिवर्तित नाम ‘मरियम-वेबस्टर, इंक.’ हो गया।

यह परिवर्तन वस्तुतः सन् 1843 में नोआ वेब्स्टर की मृत्यु के परिणमस्वरूप हुआ। नोआ वेबस्टर (सन् 1758-1843) अत्यन्त प्रतिष्ठित अमेरिकी कोशकार, पाठ्यपुस्तक प्रणेता, अंग्रेजी भाषा के वर्तनी सुधारक, राजनीतिक लेखक, सम्पादक थे। उन्हें ‘अमेरिकी विद्वता और शिक्षा का जनक’ माना जाता है। उन्हीं की पुस्तकों की ‘ब्लू-बैक्ड स्पेलर’ शृंखला से अमेरिकी बच्चों की पाँच पीढ़ियों को वर्तनी-ज्ञान और पढ़ने का कौशल हासिल हुआ। वेबस्टर का नाम संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘शब्दकोश’ के पर्याय जैसा बन गया। विशेष रूप से सन् 1828 में पहली बार प्रकाशित अंग्रेजी भाषा के अमेरिकी शब्दकोश ‘मॉडर्न मरियम-वेबस्टर डिक्शनरी’ के रूप में नोआ वेबस्टर के पहले शब्दकोश ‘ए कम्पेण्डिअस डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंग्वेज’ का प्रकाशन सन् 1806 में हुआ। सन् 1807 में उन्होंने अपने ग्रन्थ को ‘एन अमेरिकन डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंग्वेज’ के रूप में विस्तारित कर व्यापक शब्दकोश की भव्यता देने का काम शुरू किया।

शब्दों की व्युत्पत्ति का पता लगाने के लिए उन्होंने 26 भाषाएँ सीखीं। अमेरिकी भाषणों को मानकीकृत करने की चेष्टा की। क्योंकि उन दिनों देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग शब्दावली, वर्तनी, उच्चारण का उपयोग होता था। वर्तनी सुधारक के रूप में उनका मानना था कि अंग्रेजी वर्तनी के नियम अनावश्यक रूप से जटिल हैं। इसलिए उनके शब्दकोश में अमेरिकी अंग्रेजी वर्तनी की शुरुआत हुई। जिसमें Colour के लिए Color, Wagon के लिए Wagon, Centre के लिए Center अपनाया गया। उन्होंने Skunk (बदमाश) और Squash (दबाना) सहित कई अमेरिकी शब्द भी जोड़े, जो ब्रिटिश शब्दकोशों में नहीं थे। सन् 1843 में नोआ वेब्स्टर की मृत्यु के बाद मरियम भाइयों ने वेब्स्टर की बौद्धिक सम्पदा ‘एन अमेरिकन डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंग्वेज’ के अधिकार खरीद लिए। सन् 1964 में आकर ‘इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, इंक.’ ने एक सहायक कम्पनी के रूप में ‘मरियम-वेबस्टर, इंक.’ का अधिग्रहण किया। इस कम्पनी ने सन् 1982 में अपना वर्तमान नाम ‘मरियम-वेबस्टर, इनकॉर्पोरेटेड’ अपनाया।

सन् 1996 में, मरियम-वेबस्टर ने अपनी पहली वेबसाइट शुरू की, जो ऑनलाइन शब्दकोश और थिसॉरस तक निःशुल्क उपलब्ध कराती थी। इसी ‘मरियम-वेबस्टर, इनकॉर्पोरेटेड’ के कोश ‘वेब्स्टर्स न्यू वल्र्ड डिक्शनरी’ ने अब कोशकारों के समक्ष नया आदर्श प्रस्तुत किया है--प्रयोक्ता इसमें एक शब्द का अर्थ ढूँढने पहुँचें तो वहाँ उन्हें लक्षित शब्द के अर्थ एवं व्याख्या के साथ अनेक निकटवर्ती एवं विभिन्न प्रयुक्ति सामर्थ्यवाले शब्दों की व्याख्या दिख जाती है। उदाहरण के लिए एक शब्द ढूँढा जाए--Beat (पीटना); ‘वेब्स्टर्स न्यू वल्र्ड डिक्शनरी’ में सूक्ष्म भेद के साथ इसके आसपास के अनेक समानार्थी शब्द उपस्थित किए गए हैं--Beat (पीटना) शब्द की व्याख्या तो है ही, साथ में Whip (कोड़ा मारना), Lash (चाबुक मारना), Knock (ठोकना), Hit (मारना), Punch (मुक्का मारना), Slap (थप्पड़ मारना), Thump (थपथपाना), Attack (आक्रमण करना), Smash (मसल देना), Assault (हमला करना), Spank (थपकी देना), Pummel (कूट देना); या फिर Fear (डर) ढूँढने पर Dread (आतंक), Fright (डरावना), Alarm (चेतावनी), Dismay (सन्त्रास), Terror (दहशत), Panic (घबड़ाहट)...आदि के सूक्ष्म अन्तर भी बतलाए गए हैं।

शब्दकोश में समाविष्ट इस नए वैशिष्ट्य में कोशकारों के गुरुतर दायित्व रेखांकित हैं। क्योंकि कोशकारों का काम शब्दों के अर्थ भर बताकर निश्चिन्त हो जाना नहीं हैं। प्रयोक्ताओं को उन शब्दों की सही प्रयुक्ति बताना भी कोशकार का ही दायित्व होता है। पारस्परिक रूप से निकटतम अर्थ देनेवाले हजारो शब्द हमारी भाषाओं में हैं, पर उन सभी में सूक्ष्म अन्तर भी होते हैं। जिज्ञासु प्रयोक्ताओं को ऐसे शब्दों पर नए ढंग से विचार और अभ्यास करना होगा। ‘गूगल ट्रान्सलेट’ में भी सूक्ष्म अन्तर के साथ निकटतम अर्थ देनेवाले शब्दों के विकल्पों की यह सुविधा है। वहाँ भी एक शब्द दुःख (Grief) ढूँढा जाए, तो सूक्ष्म अन्तर के साथ गूगल अनेक विकल्प सन्ताप (Sorrow), पीडा (Pain), विपत्ति (Misery), संकट (Trouble), विपदा (Calamity), कष्ट (Pang) सामने प्रस्तुत हो जाते हैं।

अंग्रेजी कोशों में उपसर्गों के योग से बने शब्दों की प्रविष्टि के लिए प्रचलित नई पद्धति, भारतीय भाषाओं के कोशों के लिए भी विचारणीय है। उपसर्गों के योग से भारतीय भाषाओं में बने यौगिक शब्दों की बड़ी संख्या है, ऐसे शब्दों की अर्थ-ध्वनियाँ दो रूपों में प्रकट होती हैं--कई शब्दों में पूर्वपद-उत्तरपद के मिल जाने से कोई विकार उत्पन्न नहीं होते--निराहार, निष्प्रयोजन, निरपराध, निष्कलंक, सुशील, शालीनता, उद्दण्डता, महाकवि। ऐसे शब्द उपसर्ग-प्रत्यय के योग को समेटकर अपनी अर्थ-ध्वनि में मूल के निकट ही रहते हैं। ऐसे सभी यौगिक शब्दों की अलग-अलग प्रविष्टि देने से कोश में अतिशय विस्तार आ जाता है। इसलिए पुराने संस्कृत कोशों में, कुछ हिन्दी के कोशों में भी ऐसे शब्दों को उपसर्गों--‘प्र, उप, सह, अति’ आदि के साथ योग कराकर एक ही शीर्षक के अन्तर्गत रखते हैं। व्याकरण की दृष्टि से यह युक्तिसंगत पद्धति है।

वेब्स्टर के नए कोशों में ऐसे शब्दों को स्वतन्त्रा शब्द नहीं माना गया। इससे कोश में तो कुछ जगह की बचत हो जाती है, पर अपटु प्रयोक्ताओं को शब्द ढूँढने में असुविधा होती। जिन यौगिक शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं या विशेष अर्थ प्रकट करते हुए योगरूढ़ि की कोटि में चले जाते उनकी अर्थसहित प्रविष्टि उचित स्थान पर अनिवार्य है। अर्थ-छवियों के वैविध्य के कारण भारतीय भाषाओं में अनेक शब्द ऐसे भी होते हैं जिसमें अवयवी पदों के अर्थ नष्ट ही हो जाते हैं--महाकपोत (एक जहरीला साँप), महाकर्ण (शिव, एक नाग), महाकान्ता (धरती)...।

कई शब्दों के अर्थ और पर्यायों में अर्थ की विकराल दूरी बन जाती है--हरि (हरा, विष्णु, इन्द्र, ब्रह्मा, शिव, यम, सूर्य, चन्द्रमा, मनुष्य, अश्व, गीदड़, बन्दर, साँप, मेढक); शिव (महादेव, कल्याण, कौआ, मोक्ष, सेंधा नमक); अरि (शत्रु, स्वामी, हवा); गो (गाय, सरस्वती, धरती, दिशा, जीभ, बैल); सारंग (रंजित, सुन्दर, मृग, भ्रमर, कोयल, मयूर, मधुमक्खी, बादल, कामदेव, बाल, शंख, पृथ्वी, कमल, हल, मेढक, सर्प, चन्द्रमा)। ‘दिक्’ शब्द का उपयोग संज्ञा के रूप में होता है, उपसर्ग के रूप में भी--दिक् (दिशा, आदेश, संकेत), दिग्पाल, दिगम्बर; ‘आदि’ का उपयोग संज्ञा के रूप में भी, उपसर्ग रूप में भी; प्रत्यय के रूप में भी-- आदि-आद्यन्त-इत्यादि। ‘आम’ का अर्थ संज्ञा रूप में फल, विशेषण रूप में साधारण। ऐसे शब्दों का उचित संज्ञान भारतीय भाषाओं के कोशों में आवश्यक होता है।

तकनीकी शब्दावली और अनुवाद (Technical Terminology and Translation)

वर्णों का सार्थक समूह शब्द कहलाता है। शब्दों में ही सामुदायिक या पारस्परिक सम्प्रेषण होता है और समस्त मानवीय भावनाएँ प्रकट होती हैं। ये शब्द और इनके अर्थ सामुदायिक परिस्थितियों-प्रयुक्तियों में ही रक्षित, संवर्द्धित और प्रयोजनवश रूढ़ भी होते रहते हैं। रूढ़ इसलिए होते हैं, क्योंकि विषय विशेष के ज्ञान एवं सिद्धान्त के सम्प्रेषण के लिए विशिष्ट शब्दावली का प्रयोजन होता है। विशिष्ट क्षेत्र के विशेष सन्दर्भ में विशेष अर्थ देने के लिए इनका उपयोग होता है। ऐसी प्रयुक्ति और ऐसी अर्थ-योजना वहीं तक सीमित होती है। उनकी अर्थ-रचना वहीं सार्थक और समीचीन होती है। आम उपयोग में भी उसका वैसा ही अर्थ-द्योतन हो, यह आवश्यक नहीं। नए विचारों एवं नई वस्तुओं को रेखांकित करने के लिए ऐसे शब्द नए अर्थ-सन्दर्भ में अपनाए जाते हैं। ऐसे ही शब्द तकनीकी शब्द कहलाते हैं।

तकनीकी शब्दों का गहन सम्बन्ध सम्प्रेषण की सूत्रबद्धता से है। वांछित मन्तव्य प्रकट करने के लिए इसमें न्यूनतम शब्दों के उपयोग किए जाते हैं। अर्थ-भ्रान्ति या अनेकार्थता इसमें वर्जित होती है। अर्थ-गाम्भीर्य और एकार्थता ही इसका ध्येय होता है । ज्ञान-विज्ञान के असीम फलक की स्पष्ट अभिव्यक्ति में यह अत्यन्त प्रभावी होता है। क्षेत्र विशेष में प्रयुक्त होते-होते इसकी परिभाषा रूढ़ हो जाती है। इसलिए ये पारिभाषिक शब्द भी कहलाते हैं। अर्थात्, जिन शब्दों को परिभाषित किया जा सके।

परिभाषा’ शब्द स्वयं भी परिभाषेय है। यह भाषा में किसी विषय, वस्तु, विचार का स्वरूप स्थिर करती है। ऐसे ही शब्दों का भण्डार तकनीकी शब्दावली या पारिभाषिक शब्दावली या परिभाषा कोश या ग्लॉसरी (Glossary) कहलाता है। ग्रीक भाषा के शब्द Glossa का अर्थ आरम्भ में ‘वाणी’ था। प्रयुक्ति में यह क्रमशः ‘भाषा’ या ‘बोली’ का अर्थ देने लगा। बाद में अर्थ-परिवर्तन-प्रक्रिया से गुजरकर यह पारिभाषिक शब्दों के लिए प्रयुक्त होने लगा और ग्लॉसा, ग्लॉसरी (Glossary) बनकर ‘परिभाषा कोश’ का समानार्थी हो गया।

निर्माण-प्रक्रिया एवं उपादेयता के आधार पर इन शब्दों को समझना आसान है। विषयानुगत भिन्नता से ही इनके कोटि-निर्धारण होते हैं। ज्ञान-विज्ञान, प्रशासन, बैंक, वाणिज्य, पर्यटन, जनसंसार, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कानून...आदि इनकी कई कोटियाँ हैं। सारे ही पारिभाषिक कोश, क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों द्वारा तैयार करवाए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावलियाँ हिन्दी शब्दों के संकलन नहीं, ये अंग्रेजी शब्दों के समानार्थी कोश के रूप में निर्मित की गई हैं। अपने ज्ञान-बोध को समृद्ध करने के लिए हर समाज अन्य भाषिक-सांस्कृतिक समुदाय से तकनीकी ज्ञान ग्रहण करता है। इस क्रम में उस समुदाय को सम्बद्ध समुदाय की भाषा की शब्दावली ग्रहण करनी पड़ती है। इसके लिए उन्हें अपनी भाषा में, उनकी शब्दावली के पर्याय रचने पड़ते हैं। इस पर्याय-सुनिश्चिति में प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से अनुवाद प्रक्रिया सन्निहित रहती है।

शब्दावली-निर्माण-प्रक्रिया में अनेक मत, सिद्धान्त, प्रयुक्ति, उपादेयता को आधार बनाया जाता है--सृजन, ग्रहण, संचयन, अनुकूलन की प्रक्रिया इसमें अत्यधिक उपादेय होती है। कभी प्रचलित शब्दों का अनुकूलन करना पड़ता है, तो कभी नए शब्द की रचना करनी पड़ती है। अनुकूलन का अभिप्राय, उच्चारण सम्बन्धी जटिलता दूरकर, प्रचलित शब्दों को उपादेय बना लेना है--अकादेमी, त्रासदी, इन्जिन...जैसे शब्द हमारी भाषाओं में इसी अनुकूलन-प्रक्रिया से आए हैं।

प्रदत्त शब्द की धारणा स्पष्ट करने में, उपलब्ध तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज शब्द समर्थ हों, तो नए शब्द नहीं गढ़े जाते, वे शब्द ही अपना लिए जाते हैं। शासकीय पदों के लिए भारत के प्राचीन राजवंशों की कार्यप्रणाली के अनेक शब्द जस के तस अपना लिए गए हैं। आसानी से समानार्थी शब्द न मिलने पर अनेक विदेशज शब्दों के अनुकूलित लिप्यन्तरण या जस के तस लिप्यन्तरण भी किए गए हैं--कम्प्यूटर, माउस, की-बोर्ड, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, प्रोटीन, लालटेन, रेल, बस, मोटर...ऐसे ही शब्द हैं। पारिभाषिक शब्द के रूप में, भारतीय भाषाओं, विभाषाओं, बोलियों से भी ढेरो शब्द संकलित किए गए हैं। तकनीकी विषयों का अनुवाद करते समय ऐसे पारिभाषिक कोश की बड़ी जरूरत होती है।

शब्दकोशों के प्रकार (Types of Dictionaries)

किसी न किसी प्रयोजन से ही कोश-निर्माण होता है, प्रयोजनपरकता से ही शब्द-संग्रह की पद्धति तय होती है। इसी प्रयोजनपरकता के आधार पर इसकी प्रक्रिया और सिद्धान्त सुनिश्चित होता है। शब्दों के भाषा-काल, क्रम और संख्या भी निर्धारित होती है। शब्दकोश एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसमें शब्दों की वर्तनी, व्युत्पत्ति, उच्चारण, अर्थ, परिभाषा, प्रयुक्ति, व्याकरण निर्देश...आदि का समावेश होता है। उसके कोटि-निर्धारण इन्हीं आधारों पर होते हैं। यह समभाषिक, द्विभाषिक, बहुभाषिक कई कोटि के होते हैं। कई शब्दकोशों में शब्दों के उच्चारण सिखाने की भी व्यवस्था होती है। कुछ शब्दकोशों में चित्रों के सहारे भी शब्दों के परिचय दिए जाते हैं। भिन्न-भिन्न कार्य-क्षेत्र में उपादेय कोश भिन्न-भिन्न होते हैं-- विज्ञान शब्दकोश, चिकित्सा शब्दकोश, विधिक शब्दकोश, गणित के शब्दकोश...आदि।

आधुनिक कोश की मुख्यतः दो विधाएँ हैं--शब्दकोश और ज्ञानकोश। विशेषज्ञों की सहायता से विभिन्न शास्त्रों एवं विज्ञानों के विशिष्ट शब्दों के संकलन कोशविद्या के ही विकसित रूप हैं। दुनिया भर की सभी सम्पन्न भाषाओं में दर्शन, भाषाविज्ञान, अर्थविज्ञान, मनोविज्ञान, समाजविज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, व्याकरण, साहित्य...आदि समस्त आधुनिक वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय विद्याओं के विशिष्ट एवं पारिभाषिक शब्दों के कोश बनाए जा रहे हैं। शब्दों के पर्याय, व्याख्या, परिभाषा के साथ निर्मित सभी ज्ञान-शाखाओं के ऐसे परिभाषिक शब्दकोशों से कोश के अनेक रूप विकसित हुए हैं।

ये कोश एकभाषी, द्विभाषी या बहुभाषी भी हैं। विशिष्ट रचनाओं, रचनाकारों एवं रचनात्मक प्रवृत्तियों की विशिष्ट शब्दावलियों का संकलन भी पारिभाषिक कोश की तरह किया जा रहा है। विषय की दृष्टि से विद्वानों ने तीन कोटि के कोशों का उल्लेख किया है--व्यक्ति-कोश, पुस्तक-कोश, भाषा-कोश।

किसी एक रचनाकार द्वारा भाषा-साहित्य में प्रयुक्त शब्दों का संग्रह व्यक्ति-कोश कहलाता है; जैसे प्रेमचन्द कोश, निराला कोश, महादेवी कोश आदि। किसी विशिष्ट पुस्तक में प्रयुक्त शब्दों का संग्रह पुस्तक-कोश कहलाता है; जैसे बाइबिल-कोश, महाभारत-कोश, गीता-कोश, कुरान-कोश आदि। किसी एक भाषा या बोली के शब्दों के संग्रह को भाषा-कोश कहते हैं; जैसे मैथिली कोश, राजस्थानी कोश आदि।

स्वभाव के अनुसार भाषा-कोश की तीन कोटियाँ हो सकती हैं--वर्णनात्मक भाषा-कोश, तुलनात्मक भाषा-कोश, ऐतिहासिक भाषा-कोश। किसी भाषा के काल विशेष में प्रयुक्त शब्दों के संग्रह में प्रविष्टियों के अर्थ-क्रम प्रचलित अर्थों के आधार पर दर्ज हों, अधिक प्रचलित अर्थ पहले, कम प्रचलित अर्थ बाद में हों, तो ऐसे कोश को वर्णनात्मक भाषा-कोश कहते हैं। तुलनात्मक भाषा कोश में शब्दों का क्रम दो भाषाओं के शब्दों की तुलना के आधार पर दिया जाता है। ऐतिहासिक भाषा कोश में शब्दों के अर्थ, अर्थों के कालक्रम से दिए जाते हैं; अर्थात् पहले से प्रचलित अर्थ पहले, बाद में प्रचलित अर्थ बाद में।

इसी कारण, भाषा की विकास-प्रक्रिया समझने के लिए ऐतिहासिक भाषा कोश, अत्यन्त उपादेय होता है। ऐसे कोशों के निर्माण के लिए सम्बद्ध भाषा का साहित्य उपलब्ध होना, ग्रन्थों का पाठालोचन होना, रचनाओं का काल सुनिश्चित होना अनिवार्य है।

कुछ अन्य प्रकार के कोशों में प्रमुख हैं--पारिभाषिक कोश, पर्याय कोश, मुहावरा कोश, लोकोक्ति कोश या कहावत कोश, बहुभाषा-कोश, बोली-कोश, तकनीकी शब्द-कोश, वर्तनी-कोश, उच्चारण-कोश, रचना-कोश...आदि। व्याकरण एवं महाभाष्य तक की भी शब्दानुक्रमणिका प्रकाशित हो रही है। इस कारण कोश-परम्परा की विशिष्ट विधा ‘ज्ञानकोश’ का भी प्रभूत विकास हुआ है।

ज्ञानकोश-रचना के अनेक प्रकार और पद्धतियाँ--चरितकोश, कथाकोश, इतिहासकोश, कालकोश, आख्यानकोश...चलन में आई हैं। कम्प्यूटर में उपलब्ध कोशों के विभिन्न प्रकार भी सामने आए हैं--सामान्य शब्दकोश, विषय-केन्द्रित पारिभाषिक शब्दकोश, एलेक्ट्रानिक शब्दकोश, ज्ञानकोषीय शब्दकोश, बाल शब्दकोश, तुकान्त शब्दकोश, व्युत्क्रम या विलोमार्थक शब्दकोश, सचित्र शब्दकोश आदि की वर्द्धिष्णु क्रिया, सुखद है। यह कोश-विद्या की प्रगति का परिचायक है। इस कारण अनुवाद के क्षेत्र की जागृति के भव्य परिणाम दृष्टिगोचर हैं।

शब्दकोशों के उपयोग की विधियाँ (Methods of Using Dictionaries)

शब्द-कोशों के उपयोग की विधियाँ उसकी निर्माण-प्रक्रिया की सूक्ष्मताओं में छिपी होती है। कोश-निर्माण का प्रथम सोपान है ‘शब्द-संकलन’। जीवन्त भाषा के कोश-निर्माण के लिए जनसमुदाय से सुने शब्दों का संग्रह करना पड़ता है।

किसी जीवन्त भाषा का पूर्ण कोश बनाना असम्भव है, क्योंकि लोक-जीवन सदैव गतिशील होता है; उसके आहार-व्यवहार में विभिन्न स्रोतों से नए शब्दों का आगमन होता रहता है; पर किसी विशिष्ट साहित्य या प्राचीन भाषा का कोश बनाने के लिए ग्रन्थों से ही शब्द-संग्रह किए जाते हैं।

शब्दों की वर्तनी में एकरूपता, शब्द-कोश की अनिवार्यता होती है। उपसर्ग-प्रत्यय के योग से बने यौगिक पदों का कोश में स्थान-निर्धारण एक जटिल कार्य होता है। इसकी स्थानीयता तय करने में घोर समस्या होती है--पूर्वपद के योग से बनानेवाले सभी मूल शब्दों को एक जगह दिए जाएँ, अथवा हरेक मूल शब्द के साथ उपसर्ग-प्रत्यय के योग को समझाया जाए। इस जटिलता को साधने में कोशकारों को घोर मानसिक व्यायाम करना पड़ता है। अन्ततः वे किसी न किसी परम्परा के अनुसरण से काम निकालते हैं।

उपयोक्ताओं की सुविधा में ही कोश की उपादेयता और सार्थकता निहित होती है। उपयोक्ताओं की सुविधा वस्तुतः शब्द ढूँढने की सुविधा है। यह सुविधा शब्द-क्रम की प्रविधि से रेखांकित होती है। इसलिए कोशकारों की सारी चिन्ता कोशों के शब्द-क्रम तय करने पर केन्द्रित होती है।

विशिष्ट और सर्वाधिक वैज्ञानिक पद्धति के शब्द-क्रमवाले कोशों में शब्द ढूँढना सर्वाधिक सहज होता है। दुनिया भर के कोशों में शब्द-क्रम की पद्धति भिन्न-भिन्न होती है--अक्षरों की संख्या के अनुसार, वर्णों की ध्वनि के अनुसार, विचारों (धर्म, अंग, वस्त्र, कला, विज्ञान...) के अनुसार, शब्दों की व्युत्पत्ति के अनुसार, अर्थ प्रचलन के वर्चस्व के अनुसार, अर्थ-प्रचलन के काल-क्रम के अनुसार...।

कई आधार से शब्द-क्रम योजना की जाती रही है। पर, उपयोक्ताओं की सुविधा की दृष्टि से, वर्णानुक्रम की प्रविष्टि वाले कोश सर्वाधिक उपादेय और वैज्ञानिक साबित हुए हैं।

ज्ञान-शाखाओं के विकास-विस्तार और आधुनिक युग में अद्यतन रहने के लिए अनुवाद की अनिवार्यता के आलोक में आज कोशों की महत्ता अत्यधिक बढ़ गई है। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र के उत्तरोत्तर विकास के कारण कोश-विज्ञान की उपादेयता बढ़ती ही जाएगी।

एक श्रेष्ठ अनुवादक के अनुवादकीय उद्यमों में कोश की महत्ता सदैव उच्चस्थ रहेगी। हर उपयोक्ता को कोश, शब्दों के विविध अर्थ-सन्दर्भों की विलक्षण जानकारी देता है। व्याकरणिक अनुशासनों एवं सन्दर्भों के संकेत देता है। यह नवोन्मेषी अभिव्यक्ति की सूचना उपलब्ध कराने का मुख्य स्रोत है।

शब्दकोश, अनुवाद-कर्म का अनिवार्य उपकरण है। अत्यन्त उपादेय साधन है। पर ध्यातव्य है कि अनुवाद करते समय या ज्ञानार्जन के समय कोश के उपयोक्ताओं को विवेकशील और आत्मनिर्णयी रहना ही होगा। कोश में उपलब्ध अनेक पर्याय और विकल्प देखकर भी उन्हें अपने बौद्धिक विवेक, विषय-वस्तु के ज्ञान एवं अनुभव से निर्णय लेना होगा कि उनके लिए अनुसन्धेय शब्द या पद के लिण् कौन-से विकल्प उपादेय होंगे।

कोश उपयोग की विधि जानने के लिए ‘बृहत हिन्दी कोश’ से बात शुरू करते हैं --‘बृहत हिन्दी कोश’ का पहला संस्करण सन् 1952 (विक्रम संवत् 2009) में ज्ञानमण्डल लिमिटेड वाराणसी द्वारा प्रकाशित हुआ। इसके सम्पादक थे--कालिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय, मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव। इस कोश का निर्माण-कार्य कई वर्ष पहले आरम्भ हुआ था।

चर्चा हो चुकी है कि सन् 1929 आते-आते नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा श्यामसुन्दर दास के सम्पादन में चार खण्डों का कोश ‘हिन्दी शब्दसागर’ प्रकाशित हो चुका था; जो विराट होने के कारण सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध या सहज उपादेय नहीं हो रहा था। उसकी प्रतियाँ कुछेक वर्षों में ही अनुपलब्ध हो गई थीं। अगले संस्करण की सम्भावना स्पष्ट नहीं थी। उसके निर्माण-काल से लेकर आगे तक के समय में हिन्दी में ढेरो नए शब्दों का समावेश हो गया था। छायावादी कवियों सहित अन्य साहित्यिकों के रचना संसार में तत्सम शब्दों की अत्यधिक प्रयुक्ति से हिन्दी समृद्ध हो रही थी। इन परिस्थितियों में किसी ऐसे हिन्दी कोश की आवश्यकता प्रतीत हुई; जो आकार-प्रकार में ‘शब्दसागर’ जैसा विराट भी न हो और एक जिल्द में परिपूर्ण तथा सर्वोपयोगी हो।

बृहत् हिन्दी कोश’ उसी परिकल्पना की परिणति है। इस कोश में लगभग 1.26 लाख शब्दों का समावेश हुआ। इसमें उपसर्गों-प्रत्ययों के योग से बने यौगिक शब्दों का संयोजन उलझन भरा था। योग एवं सन्धि से उत्पन्न विकारों का संकेत भर कर देने से कोश में स्थान की बचत तो हो जाती; पर उपयोक्ताओं को घोर असुविधा होती! इसलिए सम्पादक मण्डल ने संस्कृत के सारे प्रत्ययान्त शब्द अलग रखे और अन्य भाषाओं के शब्द, जिनमें प्रत्यय के योग से मूलार्थ में परिवर्तन न हो, मूल के साथ ही रखे।

हिन्दी में उन दिनों अंग्रेजी की तरह विभिन्न टाइप फेस से शब्दों में अन्तर करने की सुविधा नहीं थी। समस्त पदों के संयोजन में भी कुछ इसी तरह की युक्तियाँ अपनाई गईं। इस कोश में स्वर-रहित आनुनसिक पंचमाक्षर के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किया गया है और अनुस्वार एवं विसर्गयुक्त वर्णों को आरम्भ में रखा गया है। इस कोश के परिशिष्ट में अर्थ सहित कुछ छूटे हुए शब्द हैं, व्याख्या सहित कुछ लाक्षणिक शब्द हैं, और राजनीति, अर्थशास्त्र आदि में प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों के हिन्दी पर्याय हैं।

इन पारिभाषिक शब्दों की संख्या लगभग 3200 हैं। इस कोश के निर्माण का कार्य कालिका प्रसाद ने आरम्भ किया था। रुग्णावस्था से पूर्व तक वे इस कोश के लिए काम करते रहे; पर अन्तिम समय में उनका देहावसान हो गया। फलस्वरूप इसके पहले संस्करण की भूमिका उनके सहयोगी राजवल्लभ सहाय एवं मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव ने लिखी। सन् 1956 (रामनवमी, संवत 2013) में प्रकाशित कोश के दूसरे संस्करण की भूमिका में मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव ने सूचित किया कि कोश के मूल भाग में हजारो छूटे हुए शब्दों को समाविष्ट कर पूरा कोश फिर से संकलित किया गया है। परिशिष्ट के पारिभाषिक शब्दों की संख्या 3200 से बढ़कर 5650 हो गई और इस संस्करण में शब्दों की कुल संख्या अब 1.36 लाख हो गई।

 सन्धि से विकार उत्पन्न करनेवाले समस्त पदों को इस संस्करण में मूल शब्द से अलग रखा गया; ताकि सन्धि-नियम अथवा संस्कृत से अपरिचित उपयोक्ताओं को शब्द-रूप पहचानने में असुविधा न हो। सन् 1973 (मार्गशीर्ष, संवत 2030) में प्रकाशित कोश के चौथे संस्करण की भूमिका में मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव ने चिन्ता व्यक्त की कि इस कोश के अत्यन्त लोकप्रिय हो जाने पर भी ढेरो उपयोक्ता इसकी रचना-प्रणाली से अवगत नहीं हो पाए हैं। उन्होंने उपयोक्ताओं को सलाह दी कि किसी शब्द विशेष के न मिलने पर वे शब्दों के स्वरूप पर गौर करें; यौगिक शब्दों की स्थिति में उसके पूर्वपद के योग के साथ देखें--कमजोर, खानदान, दरकार, दुविधा, दुशाला, नटसाल, पाबन्द, लाचार, सकरपाला...जैसे शब्दों को कम, खान, दर, दु, नट, पा, ला, सकर आदि शब्दों के साथ समस्त रूप में देखें!

इस चौथे संस्करण में दो नई बात और हुई--लगभग दो हजार नए शब्दों के समावेश से कुल शब्द संख्या 1.40 लाख हो गई। पर पृष्ठों की संख्या लगभग 340 कम हो गई; क्योंकि तीसरे संस्करण में प्रति पृष्ठ में 100 पंक्तियाँ थीं; जबकि नए संस्करण में 120 पंक्तियाँ रखी गईं। मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव (‘बृहत हिन्दी कोश’ सम्पादक मण्डल के सदस्य) ने पाँचवें संस्करण को अद्यतन करने के लिए तीन सौ नए शब्दों का संग्रह किया, पर जुलाई 1984 में संस्करण के प्रकाशित होने से पूर्व उनका निधन हो गया।

पूर्व संस्करण की तुलना में इस पाँचवें संस्करण में कोश की शब्द-संख्या 1,40,300 थी, जो जनवरी 1989 में प्रकाशित छठे संस्करण 1.45 लाख हो गई। लगभग पाँच हजार नए शब्द परिशिष्ट में जोड़े गए। इसके बाद की आवृत्तियों में सम्भवतः कोई समृद्धि नहीं हुई।

बाद के समय में हिन्दी-भाषी समुदाय के भाषिक व्यवहार में यथेष्ट प्रगति हुई, पर कोश-कर्म स्थगित-सा हो गया; या चर्वित-चर्वण होने लगा। सन् 1992 में प्रकाशित सातवीं आवृत्ति छठे संस्करण का ही पुनर्मुद्रण है। सन् 2016 में प्रकाशित पुनर्मुद्रण भी वही है।

अन्य कोशों की तरह इस कोश के उपयोग की विधि भी, इसकी निर्माण-प्रक्रिया में निहित है। कोश के उपयोग से पूर्व उपयोक्ता को उसके महत्त्वपूर्ण संस्करणों में दिए गए सम्पादकीय संकेतों को अवश्य समझना चाहिए। सम्पादक द्वारा दी गई संकेत-सूची पर गम्भीरता से गौर करना चाहिए। वहाँ कोशकार द्वारा कुछ शब्दों, पदों, पदबन्धों के संक्षिप्त संकेत दिए जाते हैं। ये संकेत उपयोक्ताओं की सुविधा और कोश में स्थान की बचत के लिए दिए जाते हैं; क्योंकि ये शब्द बार-बार उपयोग में आते हैं--

अ.          अव्यय,                       उप.         उपसर्ग,               प्र.               प्रत्यय,

पु.            पुलिंग                          स्त्री.         स्त्रीलिंग             वि.             विशेषण,

बहु.        बहुवचन                   वे.             वेदान्त         वि.स्त्री.     विशेषण स्त्रीलिंग

स.क्रि.    सकर्मक क्रिया  

कालिका प्रसाद द्वारा सम्पादित ‘बृहत हिन्दी कोश’ का शब्द-क्रम निस्सन्देह वर्णानुक्रम से है; पर इसके उपयोग के समय इतनी-सी जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। सम्पादकीय टिप्पणी के अलावा कोश के व्यावहारिक पक्ष के अवलोकन से भी जानकारी लेनी चाहिए। हर वर्ण के अनुनासिक उच्चारण, विसर्गयुक्त वर्ण, ‘ऋ’कारवाले वर्ण, स्वर-रहित वर्ण, ‘र’संयुक्त वर्ण...कहाँ मिलेंगेक्ष, त्र, ज्ञ कहाँ मिलेंगे?...इन सबका व्यावहारिक ज्ञान अनिवार्य है।

शब्दकोश निर्माण प्रक्रिया (Process of Making Dictionaries)

शब्दकोश’ का अंग्रेजी पर्याय Dictionary है, जो लैटिन शब्द Dictio से बने Diction से बना है, Dictio का अर्थ होता है ‘बोलने की क्रिया’ और Diction का अर्थ होता है ‘उच्चारण, शब्द-चयन, पद-रचना’ इसी Diction से Dictionarus बना है, जिसका अर्थ होता है ‘शब्दों का संग्रह’। ‘डिक्शनरियस’ शीर्षक से सन् 1200 के आसपास, इंग्लैण्ड के चर्चित व्याकरणविद् जॉन ऑफ गारलैण्ड की लघु रचना आई। इस ‘डिक्शनरियस’ को जॉन ऑफ गारलैण्ड का आविष्कार माना जाता है। जॉन ऑफ गारलैण्ड के जन्म-मृत्यु का विवरण अज्ञात है, पर अनुमानतः उनका समय सन् 1190-1270 माना जाता है। उनकी शिक्षा-दीक्षा ऑक्सफोर्ड में, और फिर पेरिस के मध्ययुगीन विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ उन्होंने सन् 1220 तक अध्यापन कार्य किया। ‘डि ट्र्यूम्फिस एक्लेसिए’ (De triumphis Ecclesie/चर्च की विजय पर) शीर्षक उनकी दीर्घ कविता में उनके जीवन की अनेक छवियाँ हैं।

जॉन ने, पेरिस की सड़कों पर, व्यापारों में व्यापारियों द्वारा प्रयुक्त दैनन्दिन जीवन-व्यवहार की, सूची पेरिस विश्वविद्यालय में अध्ययनरत अपने छात्रों के उपयोग के लिए बनाई थी। यह सूची लैटिन भाषा में थी, जिसके साथ पुरानी फ्रेंच भाषा के समवर्ती शब्द भी थे; जो अंग्रेजी एवं अन्य अनेक आधुनिक भाषाओं के समानार्थी शब्दों के स्रोत थे।

डिक्शनरियस’ (शब्द-संग्रह) का अगला सोपान ‘डिक्शनरी’ (शब्दकोश) हुआ। Dictionary एक सन्दर्भ ग्रन्थ है, जिसमें भाषाओं के शब्द वर्णानुक्रम से सूचीबद्ध रहते हैं। इसमें शब्दों के अर्थ, प्रकार्य आदि तो परिभाषित होते ही हैं, इसके अलावा शब्दों के उच्चारण, व्याकरणिक रूप, व्युत्पत्ति, वाक्यों में प्रयुक्तियों के वैशिष्ट्य, वर्तनी, पर्याय, विलोम आदि की जानकारी रहती है। प्रयोजनवश इसमें शब्द विशेष के उपयोग को स्पष्ट करनेवाले उद्धरण भी रहते हैं। पर विश्वकोश (इनसाइक्लोपीडिया) में इस शब्द का उल्लेख पूरक के साथ हुआ है, जैसे ‘बायोग्राफिकल डिक्शनरी’।

भारत के प्राचीन विद्वानों की दृष्टि में ‘शब्दकोश’ का महत्त्व राजकोष जैसा रहा है। प्रविधि जैसी भी रही हो, पर कोश रचना की परम्परा भारत में अत्यन्त पुरानी है। प्राचीन से लेकर नई भाषा तक के, अनेक भाषाओं के अनेक छोटे-बड़े कोश प्रकाशित हैं। हिन्दी भाषा का गहन सरोकार भारत की सभी क्षेत्रीय भाषाओं से है। जनपदीय भाषाओं के लाखो शब्दों से आज हिन्दी का कोश भव्य, गरिमामय और वैविध्यपूर्ण बना है। वैविध्य-सम्पन्न शब्दकोश निश्चय ही प्राणवान होता है; उससे भाषा का विकास सुनिश्चित होता है। शब्दों से बोल बनते हैं, बोल से बोली होती है, बोली से भाषा बनती है। बोली से भाषा बनने के क्रम में ही वह व्याकरण द्वारा संस्कारित होती है। शब्दों की ध्वनि से ही दैनन्दिन वार्तालाप, वैचारिक आदान-प्रदान होते हैं। इसी वार्तालाप में शब्दों की सांस्कृतिक पहचान होती है। इन शब्दों का संकलन-संचयन और इनके अर्थों, प्रयुक्तियों, पर्यायों का अन्वेषण अत्यन्त श्रमसाध्य कार्य होता है।

जनपदीय भाषाओं में लोकोक्तियाँ, मुहावरे, कहावतें, पहेलियाँ, बुझौअल आदि भरी पड़ी हैं। बोल-चाल के दौरान उच्चारण, बलाघात, प्रभाव आदि की दृष्टि से इन भाषाओं में ऐसा रस-बोध उमड़ता है कि मन प्रफुल्ल हो उठता है। ऐसे शब्दों के कोश-निर्माण की प्रक्रिया कई चरणों में सम्पन्न होती है।

सर्वप्रथम तो भाषा के सभी प्रचलित-अप्रचलित शब्दों का संग्रह किया जाता है। कोश-निर्माण में शब्द-संग्रह का कार्य लोकजीवन के निकटस्थ होता है। इस संग्रह-कार्य में रचनाकारों, विद्वानों के सहयोग की अनिवार्यता होती है। जनसम्पर्क और साहित्य-अध्ययन द्वारा शब्द-संकलन किए जाते हैं। संचयित शब्दों को व्यवस्थित ढंग से संकलित कर आमजन के समक्ष लाने का कार्य विद्वानों ने सदैव से किया है।

संकलित कर लेने के बाद कोशकार एवं उनके सहकर्मी, शब्दों की वर्तनी सुधारते हैं; मानक रूप के अनुसार उसका परिष्कार करते हैं; उसके लेखन में एकरूपता लाते हैं। क्षेत्रीय प्रयुक्ति में एक ही शब्द विभिन्न उच्चारण के द्योतक होते हैं। कोशकार-मण्डल उस क्षेत्रीय वैविध्य की उपेक्षा नहीं करते; बल्कि उसके मानक रूप के साथ उसके क्षेत्रीय रूप को भी रेखांकित करते हैं।

एक ही प्रसंग की अभिव्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न शब्द मिलते हैं; यह वैविध्य उस क्षेत्र और क्षेत्रीय प्रयुक्ति के सौरभ और निजता का सूचक होता है। भाषा समृद्धि एवं सम्पन्नता का परिचायक होता है। ध्वनि और रूप की दृष्टि से अनेक शब्द समान प्रतीत होते हैं, पर उनके अर्थ भिन्न होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कोशकार-मण्डल को सूक्ष्मता से शब्द-निर्णय करना होता है।

शब्दों को सूचीबद्ध करना

कोश-निर्माण प्रक्रिया का अगला सोपान, शब्दों को सूचीबद्ध करने के क्रम-निर्धारण का है। उपयोग-पद्धति की दृष्टि से यह सोपान भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वर्णानुक्रम से शब्दों का संग्रहण सर्वाधिक वैज्ञानिक और उपादेय होता है। पहले की बात तो और थी, पर शब्द-संयोजन की प्रक्रिया अब दुनिया की सभी भाषाओं के कोशों में वर्णानुक्रम से ही होती है। आजकल कम्प्यूटर के आधुनिक तकनीक से यह काम तनिक सहज हो गया है। कम्प्यूटर साफ्टवेयर के सहारे शब्दों को अकारादि क्रम से सूचीबद्ध करने में सुविधा हो गई है। वर्णानुक्रम से संयोजित करते हुए, कोशों में शब्दों के व्याकरणिक रूप (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रिया-विशेषण, अव्यय, काल...इत्यादि की सूचनाएँ भी अनिवार्यतः देनी होती है। शब्दों के अर्थ-सन्धान एवं व्याख्या, शब्दकोश का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग होता है।

उल्लेखनीय है कि अर्थ किसी भी शब्द में स्वतः नहीं आ जाते! प्रयोक्ताओं द्वारा उनमें अर्थ दिए जाते हैं। शब्द तो होते ही हैं लोकव्यवहार के निमित्त, इसलिए शब्द एवं अर्थ का संयोग लोक में निर्मित होता है। शब्दों के अर्थान्वेष के लिए प्रसंग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। प्रसंग आधारित अर्थ-सन्धान केवल अनेकार्थी शब्दों के ही नहीं, एकार्थी शब्दों के भी होते हैं--काम पर गया, काम से गया, काम से गया, काम भावना... जैसी प्रयुक्तियों में काम का अर्थ भिन्न-भिन्न है। इसलिए, इस अंश में शब्द के मौलिक एवं व्यावहारिक अर्थ दिए जाते हैं।

उच्चारण के कारण जब, जिस शब्द के, जैसे अर्थ की प्रतीति होती है, वही उसका अर्थ है। सामुदायिक जीवन-व्यवहार में प्रचलित होते ही, शब्दों में अर्थ-परिवर्तन की सम्भावनाएँ शुरू हो जाती हैं। यह परिवर्तन कभी तो शब्दों के अर्थ को रूढ़ बना देता है, कभी परिवर्तित होकर व्युत्पत्तिमूलक अर्थ इतना भिन्न हो जाता है कि--दोनो अर्थों में कोई संगति नहीं बैठती। अर्थविस्तार, अर्थ-संकोच, अर्थादेश जैसी क्रियाओं से संचालित होकर ये कई रूपों में प्रकट होते हैं।

समय पाकर सीमित अर्थ में प्रयुक्त शब्द जब व्यापक अर्थों में प्रयुक्त होने लगता है, तो इसे अर्थ-विस्तार कहा जाता है। ‘कुश’ उखाड़कर लानेवाले शिष्यों को ऋषिगण कभी ‘कुशल’ कहा करते थे। अब कुशल योद्धा, कुशल कारीगर, कुशल व्यापारी, कुशल-समाचार ...सब होते हैं। स्याह (काला) से स्याही बना, पर अब लाल, नीली, हरी...सभी रंग की स्याही होती है। रोशन (प्रकाशित, प्रख्यात, प्रकट) से रोशनाई बना; अब सभी रंगों की स्याही के लिए रोशनाई की प्रयुक्ति होती है। कागज के पृष्ठों को गूँथ-बाँधकर ग्रन्थ (गूँथना, बाँधना) तैयार होते थे, अब सारी ही पुस्तकें ग्रन्थ कहलाती हैं।

पहले खोई हुई गाय के अन्वेषण को ‘गवेषणा’ कहा जाता था, अब सभी शोधोन्मुख आलेख को गवेषणा कहा जाता है। ‘जगत’ (खूब चलने वाला) शब्द, अब संसार का वाचक हो गया है। प्रारम्भ में विस्तृत अर्थ के वाचक शब्द बाद के दिनों में सीमित अर्थ के वाचक हो जाएँ, तो इसे अर्थ-संकोच कहते हैं। ‘मृग’ शब्द पहले सभी पशुओं का सूचक था, अब केवल हिरण के लिए होता है। ‘खग’ का अर्थ आकाश में उड़नेवाला होता था, अब केवल पक्षी होता है। ‘रसाल’ का अर्थ रसयुक्त वस्तु होता था अब केवल आम है।

अर्थादेश में अर्थ का विस्तार या संकोच नहीं होता, वह सिरे से बदल जाता है। ‘आकाशवाणी’ का अर्थ देववाणी होता था, अब ऑल इण्डिया रेडियो है। अर्थादेश में अर्थोत्कर्ष भी होता है, अर्थापकर्ष भी। अर्थोत्कर्ष में संकुचित अर्थ छोड़कर शब्द, भव्य अर्थ ग्रहण कर लेता है, जैसे संस्कृत में ‘साहस’ शब्द, ‘लूट’, ‘हत्या’ के लिए प्रयुक्त होता था, अब इसका उपयोग निडरता के लिए होता है।

अर्थापकर्ष में पहले से अच्छे अर्थ के वाचक शब्द बाद में हीनताबोधक हो जाते हैं, जैसे भद्र से बना शब्द ‘भद्दा’ का अर्थ भला होना चाहिए, जो अब बुरे अर्थ के लिए प्रयुक्त होता है। ‘शुचि’ से बना शब्द ‘शौच’ में अब पवित्रता के बजाय ‘मल त्याग’ के लिए प्रयुक्त होता है; मूल अर्थ ‘श्रेष्ठ’ का वाचक शब्द ‘पुंगव’, अब संकुचित होकर ‘पोंगा’, ‘मूर्ख’, ‘साँढ’ के लिए प्रयुक्त होता है; ‘वज्रवतुक’ (पक्का ब्रह्मचारी) अब ‘बजरबट्टू’ बनकर मूर्ख के लिए प्रयुक्त होता है।

 जैन साधुओं के आदर में प्रयुक्त ‘नग्न-लुंचित’ अब नंगा-लुच्चा का वाचक है। पुराने समय में जैन मुनियों के लिए यह विशेषण बड़े सम्मान से से परम आदरणीय के रूप में दिया जाता था। मूल जैन दर्शन में इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यन्त पवित्र है। वस्त्रविहीन जैन मुनियों, अर्थात् दिगम्बर सम्प्रदाय के मुनियों का ‘दिक् (दिशा) ही अम्बर (वस्त्र) होता है’। अपरिग्रहवादी जैन मुनिगण वस्त्र धारण करना भी एक प्रकार का संचय या परिग्रह (संसार से जुड़ाव) मानते आए हैं। जैन दर्शन के अनुसार, मनुष्य को नवजात शिशु की तरह निष्पाप, निर्दोष और लोक-लाज के विकारों से दूर नग्न अवस्था में रहना चाहिए, सांसारिक वासनाओं, अहंकार और लोक-दिखावे की भावनाओं से सर्वथा मुक्त रहना चाहिए। इसी तरह लुंचित शब्द का अभिप्राय ‘केशलोचन’ से है, जिसमें जैन साधु-साध्वी अपने हाथों से अपने सिर और दाढ़ी के बालों को एक-एक कर उखाड़ते हैं। बालों को उस्तरे या कैंची से हटाने में अहिंसा-पालन नहीं होगा, बालों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों की हिंसा होने का भय रहता है। अपने शरीर में पीड़ा सहकर भी वे दूसरों को पीड़ा नहीं देते हैं। जैन सन्त यह सिद्ध करते हैं कि वे शारीरिक कष्टों से ऊपर उठ चुके हैं और उन्हें अपने शरीर से कोई आसक्ति नहीं है। पर अब यह पद नंगा-लुच्चा के रूप में आकर अभद्र लोगों का संकेत बन गया है।

शब्दकोश में सभी विषयों एवं शास्त्रों के शब्द होते हैं, इसलिए भिन्न-भिन्न विषयों के विशेषज्ञों से शब्दों के अर्थ-सन्धान के लिए विचार-विमर्श अपेक्षित है। शब्दों के सम्बन्ध में स्पष्ट और प्रामाणिक जानकारी देने के लिए रचनाकारों के उद्धरणों के साथ-साथ कहावतों, मुहावरों, लोकोक्तियों का सहारा लिया जाता है। शब्द संकलन के समय नए-नए क्षेत्रों-विषयों के ढेरो शब्द मिलते हैं। विभिन्न प्रसंगों के शब्दों का संकलन, उन शब्दों के अर्थान्वेष की पद्धति एवं परम्परा में कोशकारों को विविध ज्ञानात्मक अनुभूतियों से साक्षात्कार होता है।

जीवन-यापन की वृत्तियों एवं विधियों से सम्बद्ध व्यवस्थाओं--गृहस्थी, किसानी, काश्तकारी के सहयोगी अवयव; वाणिज्यादि के तत्त्वों के असंख्य शब्दों की व्याख्या के लिए विशेषज्ञों की सलाह अनिवार्य होती है। उक्त सारी क्रियाओं के बाद कोश के मुद्रण सम्बन्धी कार्य शुरू होते हैं। इस कार्य के लिए सबसे पहले पाण्डुलिपि का सम्पादन ‘प्रेस प्रति’ के रूप में होता है।

यह सम्पादन ‘भाषा-सम्पादन’ से भिन्न होता है। इसके कर्ता को भाषा की दक्षता के अलावा मुद्रण सम्बन्धी विभिन्न क्रियाओं और संकेतों का ज्ञान होना अनिवार्य होता है। इसमें पूरी पाण्डुलिपि में कोश के पृष्ठों के आकार-प्रकार, कॉलम, अक्षरों के आकार (10 प्वाण्ट, बोल्ड, इटैलिक, सामान्य) एवं प्रकार (शिवा, चाणक्य...), पंक्तियों और अक्षरों के बीच की जगह, पंक्तियों का समावेशन (बाएँ संरेखित, दाएँ संरेखित, दोनो ओर संरेखित) ...आदि संकेत दिए जाते हैं। ताकि शब्द-संयोजक (कम्पोजीटर) तदनुरूप कम्प्यूटर में टंकित करें।

पृष्ठों का आकार तय करते समय प्रतिलिपि सम्पादक को उपयोक्ताओं की सुविधा, मुद्रणालय की नीति, कॉलम की चौड़ाई, कोश के पृष्ठों की अनुमानित संख्या...सबका ध्यान रखते हुए करना पड़ता है। पृष्ठों की संख्या का अनुमान प्रविष्टियों की संख्या के आधार पर किया जाता है।

ध्यातव्य है कि भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर-सुविधा आने से पूर्व तक, अक्षरों के आकार-प्रकार (टाइप फेस) की इतनी सुविधा नहीं थी, उन दिनों कोशकारों के समक्ष अर्थ-भेद दर्शाने में ढेर असुविधाएँ रहती थीं।

सम्पादित और मुद्रण-प्रक्रिया से अनुकूलित होने के बाद पाण्डुलिपि टंकित होती है। इसे प्रूफ कहते हैं, जिसका संशोधन अत्यन्त सावधानी से होता है। क्योंकि लिखते-पढ़ते समय शब्दों की वर्तनी एवं हिज्जे (स्पेलिंग) की भ्रान्ति दूर करने के लिए लोग कोश को ही प्रमाण मानते हैं। कोश में कोई भ्रान्ति हो, तो घोर विसंगति आ जाएगी। इसलिए कोश का प्रूफ-पठन पूरी तरह ठोक-ठठाकर कई-कई बार किया जाता है। इस संशोधित प्रूफ के अनुसार त्रुटि निवारण करते हुए शब्द-संयोजक (कम्पोजीटर) को भी बहुत सावधानी से काम करना होता है। कहीं ऐसा न हो कि इतने भारी-भरकम काम में एक भूल का निवारण करते हुए कोई दूसरा भूल समा जाए। इस ग्रन्थ की छपाई के समय मुद्रक/प्रकाशक को इसमें प्रयुक्त कागज की कोटि का विशेष ध्यान रखना पड़ता है; ताकि कागज के वजन और मोटाई के कारण ग्रन्थ का वजन और मोटाई, उपयोक्ताओं के सँभाल में रहे।

चूँकि ऐसे ग्रन्थ की उपादेयता दीर्घकालिक, बल्कि पीढ़ियों तक बनी रहती है, इसलिए इसके कागज और जिल्दसाजी के टिकाऊपन की बड़ी जरूरत होती है। कोश के पृष्ठों के छप जाने के बाद इसके जिल्दसाज को भी अत्यधिक सावधानी बरतनी होती है। इस ग्रन्थ की नत्थी करते हुए जिल्दसाज को पाठकों की उपयोग पद्धति, उपयोग की बारम्बारता, ग्रन्थ के टिकाऊपन...सबका ध्यान रखना पड़ता है...इसमें किस प्रकार की नत्थी और जिल्दसाजी हो कि इतने मोटे ग्रन्थ को पलटने में नत्थी भी न टूटे और उपयोक्ताओं को सुविधा भी हो।

ऑन-लाइन शब्दकोश (On-line Dictionaries)

चलन में आने के बाद, कम्प्यूटर के अनुप्रयोगों की क्रियाएँ भिन्न-भिन्न दिशाओं में बढ़ी है। अनुवाद-कर्म और कोश-रचना भी इसका अपवाद नहीं है। इन दोनो उद्यमों में पग-पग पर ‘कम्प्यूटर’ का उपयोग सुविधाजनक होता है। ‘मुद्रित कोश’ की निर्माण-प्रक्रिया के विभिन्न सन्दर्भों में कम्प्यूटर की अहम भूमिका तो होती है।

कोश-निर्माण’ के लिए ‘कम्प्यूटर’, मात्र सहायक संयन्त्र ही नहीं है, यह एक भिन्न प्रकार के कोश का आधार भी है, जिसे ‘कम्प्यूटर कोश’ कहते हैं। कोश सम्बन्धी पूर्व-चर्चा, अब तक केवल मुद्रित कोशों पर हुई है, ‘कम्प्यूटर कोश’ इससे भिन्न है।

इसमें शब्दकोशीय पद्धति से उपादेय शब्दों का संग्रहण कम्प्यूटर में ही होता है; जहाँ शब्दों के अर्थ, व्युत्पत्ति, व्याख्या आदि दिए जाते हैं। इसे ‘कम्प्यूटर शब्दावली’ भी कहा जाता है। कोश की तरह इसका उपयोग विभिन्न रूपों में होता है। इसका निर्माण कम्प्यूटर द्वारा कम्प्यूटर में ही होता है। अर्थात्, कम्प्यूटर में उपलब्ध कोश को ‘कम्प्यूटर कोश’ कहते हैं। इसके दो प्रकार के होते हैं--‘ऑनलाइन कोश’ और ‘ऑफलाइन कोश’।

कम्प्यूटर में उपलब्ध कोश ‘ऑफलाइन कोश’ कहलाता है, जबकि नेट पर उपलब्ध कोश ‘ऑनलाइन कोश’। ‘ऑनलाइन शब्दकोश’ की चर्चा लोग ‘कम्प्यूटर कोश’ के समानार्थी रूप में करते हैं। पर, कई वैशिष्ट्य में समान होने के बाबजूद दोनों एक नहीं हैं। इण्टरनेट सम्पर्क के बिना, नेट पर उपलब्ध कोश अर्थात्, ‘ऑनलाइन कोश’ का उपयोग असम्भव है। ऑनलाइन शब्दकोश शुल्क-सहित भी उपलब्ध होते हैं, निःशुल्क भी।

इण्टरनेट की सुविधा और प्रयोक्ता को इण्टरनेट-संचालन का ज्ञान होने पर ही इन कोशों का उपयोग सम्भव है। ‘ऑनलाइन शब्दकोश’ का आकार-प्रकार निर्बन्ध होता है और इसमें सदैव अद्यतनीकरण की सुविधा रहती है। इसमें वांछित शब्द की खोज आसानी से की जा सकती है, उसकी व्याख्या तक शीघ्र पहुँचा जा सकता है। मुद्रित कोश निस्सन्देह उपयोगी है, ज्ञान-विज्ञान की सम्पुष्टि के लिए अत्यन्त उपादेय संसाधन है; पर उपयोक्ताओं की सुविधा की दृष्टि से आज कम्प्यूटर कोश कहीं अधिक उपादेय हो गया है।

एक बार यह छप जाए, तो पुनर्मुद्रण से पहले उसका अद्यतनीकरण असम्भव होता है; और बड़े बजट की परियोजना होने के कारण इसका बार-बार पुनर्मुद्रण सम्भव नहीं होता। कम्प्यूटर कोश के कुछ विलक्षण वैशिष्ट्य मुद्रित कोश में नहीं होते। जबकि, कोश का निरन्तर अद्यतन होना अनिवार्य है। निरन्तर परिवर्तनशील भाषा के विस्तृत फलक में ज्ञान-विज्ञान के नए-नए शब्दों, पदों, प्रयुक्तियों का प्रवेश होता रहता है। नए-नए अर्थ-सन्दर्भ भी प्रकट होते रहते हैं, जिनका कोश में समावेश उपादेय होता है।

कम्प्यूटर कोश को इन नई प्रविष्टियों से निरन्तर अद्यतन किया जा सकता है। कोशकार चाहें, तो कम्प्यूटर कोश में परिष्कार, संशोधन रोजाना भी कर सकते हैं। इसमें धन, समय और ऊर्जा की खपत न्यूनतम होती है। कम्प्यूटर कोश में नए शब्दों का समावेशन, प्रविष्टियों का संशोधन-परिवर्धन-सम्पादन, अनुपयुक्त या विवादास्पद प्रविष्टियों का अपच्छेदन, आसान है; जो मुद्रित कोश में लगभग असम्भव है।

कम्प्यूटर कोश में शब्द ढूँढना, श्रम और समय दोनो ही दृष्टियों से आसान होता है। बृहदाकार मुद्रित कोश में यह कार्य उतना आसान नहीं होता! ‘मुद्रित शब्दकोश’ की तरह ‘कम्प्यूटर शब्दकोश’ में पृष्ठों और भाषाओं (समभाषिक, द्विभाषिक, बहुभाषिक) की कोई बँधी-बँधाई सीमा नहीं होती!

उपयोग की दृष्टि से ‘कम्प्यूटर शब्दकोश’ इन वैशिष्ट्यों के कारण निश्चय ही अधिक सुविधाजनक होता है; पर, इस कारण ‘मुद्रित शब्दकोश’ अनुपादेय नहीं है; इसकी उपादेयता सदैव वरेण्य है, वरेण्य रहेगी।

शब्द, शब्दावली, तकनीकी शब्दावली (Word, Terminology, Technical Terminology)

एकाधिक वर्णों के सार्थक समूह को शब्द कहा जाता है। यह भाषा की लघुतम इकाई है। वाक्यों में प्रयुक्त होने पर इसके अर्थ प्रयुक्ति के अनुसार निर्धारित होते हैं। स्रोत की दृष्टि से शब्द चार कोटि के होते हैं--तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज। किन्तु रचना, बनावट या व्युत्पत्ति की दृष्टि से ये तीन कोटि के होते हैं--रूढ़, यौगिक, योगरूढ़।

रूढ़ शब्दों में उपसर्ग, प्रत्यय के योग से नए-नए शब्द बनते हैं, अर्थात् अन्य शब्द-खण्डों में भी रूढ़ शब्दों की विशेष उपस्थिति होती है। शब्दों की अर्थ-सृष्टि में शब्द-शक्ति की बड़ी भूमिका होती है। शब्द-शक्ति मुख्यतः तीन तरह के होती है-- अभिधा, लक्षणा, व्यंजना। वाचक या लेखक अपनी भाषा में सटीक शब्दों का प्रयोग शब्द-शक्ति के आधार पर ही करते हैं और भावक, प्रयुक्त शब्दों का अर्थ ग्रहण शब्द-शक्ति के आधार पर ही करते हैं।

भाषा में अर्थ के बिना शब्दों का कोई महत्त्व नहीं है। शब्द की समग्र सत्ता अर्थ से जुड़ी हुई है। शास्त्र-निर्देशित आचार में विद्वत्समाज, शब्द को शरीर और अर्थ को आत्मा कहते आए हैं। ये वस्तुतः एक दूसरे के पूरक हैं, ठीक शरीर और आत्मा की तरह।

दैनन्दिन चर्या में उपादेय भिन्न-भिन्न तरह के शब्दों के संग्रह को शब्दावली (वोकेबुलरी) कहते हैं। शब्दों के ऐसे संग्रह, भाषा विशेष के होते हैं। विद्वत्जन ‘शब्दावली’ के लिए ‘शब्दकोश’ (लेक्सिकन) शब्द का भी प्रयोग करते हैं। तथ्यतः तो यह शब्द-भण्डार है, अर्थात् एक मनुष्य के अभिज्ञान में जितने शब्द हैं, वह उसकी शब्दावली है, वह जब भी संवाद करेगा, उन्हीं शब्दों के सहारे करेगा; पर विद्वानों ने इसे विशेषणमूलक उपसर्ग बनाकर ‘शब्द-संग्रह’ या ‘शब्दकोश’ (ग्लॉसरी) कहा; जिसे पारिभाषिक शब्दावली (ग्लॉसरी) नाम से जाना जाता है।

ज्ञान-क्षेत्र की शाखा विशेष में प्रयुक्त शब्दों की सूची, उस शाखा विशेष की पारिभाषिक शब्दावली या पारिभाषिक शब्दकोश कहलाती है। इस सूची में संकलित, संगृहीत शब्द परिभाषेय होते हैं, और उस शाखा-विशेष में प्रयुक्त होकर विशेष अर्थ-सन्दर्भ को द्योतित करते हैं। इसी अर्थ में ऐसे शब्द, क्षेत्र विशेष में प्रयुक्त होकर विशेष अर्थ के लिए रूढ़ हो जाते हैं, और ‘तकनीकी शब्द’ की संज्ञा पाते हैं।

संकल्पना, आयाम, विकास-प्रक्रिया, विभिन्न क्षेत्र (Concept, Dimension, Process of Development, Different Domains)

भाषा, सार्थक शब्दों का समूह है। भावकों की अर्थ-प्रमा को उद्बुद्ध कर सही अर्थ तक पहुँचाना उसका लक्ष्य होता है। यह सही अर्थ-बोध उसी को होगा, जो उस भाषा की  सूक्ष्मताओं एवं शब्द-शक्तियों से परिचित हो। क्योंकि अर्थ-बोध का मार्ग कई बार उलझाता भी है। ज्ञान-क्षेत्र की भिन्नता के कारण, शब्द विशेष का लक्ष्यार्थ या व्यंग्यार्थ, शब्दों के संकेतित अर्थ से भिन्न अर्थ का बोध कराते हैं। ऐसे शब्द अलग-अलग सन्दर्भों में लक्ष्यार्थ या व्यंग्यार्थ के वाचक होते हैं। शब्दों में ऐसी अर्थ-भिन्नता शब्द-शक्ति के कारण होती है। शब्द-शक्ति भाषा की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण इकाई है।

भाषा में प्रयुक्ति आधारित अर्थ-बहुलता का यही वैशिष्ट्य भाषा-विशेष की क्षमता सिद्ध करती है। जिन शब्दों के अर्थ-बोध में कोई तकनीकी पक्ष नहीं होता, सामान्य शब्द कहलाता है। अर्थ-बोध की सूत्रात्मकता के कारण कोई शब्द परिभाषेय होते हैं, इसलिए वे पारिभाषिक शब्द कहलाते हैं। प्रयुक्ति के अभिप्रेत या प्रयोजनमूलक अवधारणाओं के कारण भाषा में शब्द की अभिव्यंजकता मुखर होती है।

रसायन, भौतिकी, धर्म, दर्शन, समाजनीति, राजनीति, कला, संस्कृति, व्यपार, पर्यटन, संसद, कानून आदि विषयों की प्रयुक्ति में जाकर शब्द, रूढ़ अर्थ का द्योतन करते हैं, और ‘पारिभाषिक शब्द’ हो जाते हैं और अपने-अपने क्षेत्र में विशिष्ट अर्थ के वाचक होते हैं। क्षेत्र विशेष में, रूढ़ अर्थ के प्रतिपादक शब्द पारिपाषिक शब्द कहलाते हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के नए-नए उद्यमों का विकास जहाँ कहीं होगा, जाहिर है कि उसके विवरण वहीं की भाषा में लिखे जाएँगे। उन देशों की भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दावली का निर्माण सहजता से होगा। वहाँ की भाषाओं में पारिभाषिक शब्दावली स्वमेव बनती जाएगी। अन्य देशों में इस वैज्ञानिक साहित्य के प्रसार के लिए अनुवाद की अनिवार्यता होती है।

पारिभाषिक शब्दों का प्रयोजन, ऐसे ही वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद के लिए होता है। विज्ञान-प्रौद्योगिकी के अलावा, भारत की न्यायिक प्रणाली भी अंग्रेजी, फारसी भाषा के दबाव में दम तोड़ती रही है। इसलिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी, विधिक साहित्य के भारतीय भाषाओं में अनुवाद का प्रयोजन जब-तब होता रहता है और हमें पारिभाषिक शब्दावली की उपादेयता दिखती रहती है।

पारिभाषिक शब्दावली की निर्माण-प्रक्रिया अनुवाद के बिना असम्भव है। अब तकनीकी शब्दों से द्योतित मूल संकल्पना व्यक्त करने योग्य शब्दों का अभिग्रहण या सृजन लक्ष्य भाषा में करना कठिनतर तो होगा ही! ऐसे में अनुवाद करते समय संविधान-स्वीकृत सभी भाषाओं के शब्दों के योग से राष्ट्रीय शब्द-समूह विकसित करना आवश्यक होता है।

कई बार बहुप्रयुक्त और सहजता से बोधगम्य शब्दों को जस का तस स्वीकार भी कर लिया जाता है। कम्प्यूटर, ट्रेन, मोबाइल, वाउचर...जैसे शब्द इसी के परिणाम हैं।

तकनीकी शब्दावली का अनुवाद (Translation of Technical Terminology)

तकनीकी पाठ, वस्तुतः विभिन्न कार्य-व्यापारों के पाठों का समूह है; जैसे--प्रशासनिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक, संसदीय, विधिक, समाजशास्त्रीय, चिकित्सकीय, अभियान्त्रिक, पर्यटन, व्यापारिक, बैंकिंग, संचार...आदि। वैसे तकनीकी पाठ में भी तकनीकी या पारिभाषिक अंश दस-पन्द्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होते, अधिकतम अंश सामान्य भाषा के ही होते हैं, पर, अपनी अर्थ-जटिलता और पारिभाषिकता के कारण इतने ही अंश अनुवाद करते समय बहुत अधिक और जटिल प्रतीत होते हैं।

अनुवाद अध्ययन जैसी ज्ञान-शाखा के विकास के कारण तकनीकी अनुवाद सम्बन्धी अध्ययन पर बल दिया जाने लगा। तकनीकी शब्दों या पाठों के अनुवाद में स्रोत-भाषा के प्रति अनुवादकों की बड़ी निष्ठा रहती आई है। बाद के दिनों में ऐसे पाठ के अनुवाद में भी लक्षित ग्राही-समुदाय की ग्राह्यता की चिन्ता की जाने लगी। ज्ञान-शाखाओं के विकास, कूटनीतिक सरोकार, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक सम्बन्ध, भूमण्डलीकरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की नई-नई उपलब्धि...आदि की अपेक्षाओं के आलोक में इस दिशा में इतना विस्तार हुआ कि अब साहित्यिक पाठ से अधिक अनुवाद, तकनीकी पाठ के ही होने लगे हैं।

तकनीकी विषयों से सम्बन्धित दस्तावेजों का अनुवाद, तकनीकी अनुवाद कहलाता है। इसमें सम्प्रेषण की मद में भाषा महत्त्वपूर्ण होता है, तो तथ्य-बोध के रूप में विषय को रेखांकित करता है। पर इस अनुवाद में दोनों का सन्तुलन अनिवार्य होता है। स्वत्वाधिकार अधिनियम, विश्वविद्यालय अध्यादेश, दूरदर्शन कम्पनी की पुस्तिका, कार-कम्पनी का ऑनर बुक...ऐसा ही पाठ होता है। तकनीकी विषयों के शोधपत्र, पुस्तकादि का अनुवाद पढ़ते हुए पाठकों की रुचि--भाषा के लालित्य से अधिक प्रदत्त तथ्य या संकल्पना के प्रति रहती है। इसलिए तकनीकी अनुवाद के अनुवादकों का ध्यान सदैव इस ओर रहता है कि भाषा के लालित्य के फेर में कहीं तथ्य न दबे।

पारिभाषिक शब्दों की अनिवार्य प्रयुक्ति, ऐसे अनुवादों की मुख्य विशेषता होती है। तकनीकी अनुवाद में अनुवाद-स्मृति (ट्रान्सलेशन मेमोरी) की अनिवार्यता रहती है। सीमित शब्दों की प्रयुक्ति के कारण इसमें शब्दों, पदों के दुहराव खूब होते हैं। इसलिए इसमें शब्दों/पदों की एकरूपता अनिवार्य होती है। तकनीकी पाठ के अनुवादकों को वस्तुतः बहुआयामी तत्त्व-बोध रखना होता है। अनुवाद के सैद्धान्तिक पक्ष और स्रोत-लक्ष्य भाषा की सूक्ष्म समझ तो उन्हें रहनी ही चाहिए। इसके साथ-साथ उन्हें भावकों की ज्ञानाकुलता, उसके मनोभाव, अनूदित पाठ की व्यावहारिक संरचना और पाठ के तकनीक की भी सूक्ष्म समझ रखनी होती है। इसके बिना प्रभावी अनुवाद असम्भव है।

उल्लेखनीय है कि ढेरो तकनीकी पाठ अन्तरानुशासनिक चरित्र के होते हैं, इसलिए ऐसे पाठों के अनुवादक बड़ी तैयारी से इस क्षेत्र में आते हैं। शब्दकोश, विश्वकोश, सन्दर्भित तकनीकी शब्दावली, कम्प्यूटर कोश, ऑनलाइन डिक्शनरी...जैसे अनेक अनुवाद उपकरण, तकनीकी अनुवाद में अत्यन्त उपादेय और सुविधादायी होते हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहित कई क्षेत्रों में तीव्र गति से विकास हो रहे हैं। इसलिए सम्बद्ध पाठ में प्रविष्ट नई तकनीकों और नई शब्दावली के प्रति, अनुवादकों को सदैव अद्यतन होना पड़ता है। कोई भी अनुवादक सारे विषयों का ज्ञाता नहीं हो सकते, पर उद्यम से, सम्मेलनों/परिसंवादों में भागीदारी से, शोध एवं अध्यवसाय से, अनेक विषयों का कार्य-साधक ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। अनूद्य पाठ के विषय विशेषज्ञों से सलाह लेना या सन्दर्भ ग्रन्थों की सहायता से जटिल प्रसंगों का सहज हल निकालना हर सिद्ध अनुवादक अपना धर्म समझता है।

तकनीकी पाठ चूँकि मूल लेखक द्वारा मूल भाषा में तैयार एक दस्तावेज होता है; इसलिए उसके अनुवादक भी उसे वैसा ही दस्तावेज बनाना चाहते हैं; जो भावकों को स्पष्ट समझ दे सके, लक्षित भाषा की संस्कृति के अनुकूल भाषा तो नियन्त्रित हो, पर विचार मूल की तरह ही स्पष्ट हो।

कम्प्यूटर आश्रित अनुवाद उपकरण (Computer Assisted Translation Tools)

अनुवाद-कार्य में सहायक सभी सन्दर्भ-ग्रन्थों की गणना अनुवाद-उपकरणों में होती है। महत्त्वपूर्ण अनुवाद उपकरणों में विभिन्न प्रकार के कोशों की गणना होती हैं--शब्दकोश, तकनीकी शब्दावली, कम्प्यूटर शब्दकोश, ऑनलाइन शब्दकोश, पारिभाषिक शब्दों का डाटाबैंक, मुहावरा-लोकोक्तिकोश, ज्ञानकोश, विश्वकोश, परिभाषा कोश...आदि।

इन उपकरणों द्वारा अनुवादक न केवल अपरिचित शब्दों के पर्याय जानते हैं, बल्कि अपरिचित विषयों के बारे में भी ज्ञान-सम्पन्न होते हैं। कम्प्यूटर शब्दकोश, ऑनलाइन शब्दकोश, पारिभाषिक शब्दों के डाटाबैंक का यत्किंचित उपयोग हर अनुवादक अपने अनुवाद-कार्य में करता है, पर मशीन-समर्थित अनुवाद करते समय इस उपकरण का भरपूर उपयोग करता है। मशीन-समर्थित अनुवाद का अभिप्राय उस अनुवाद से है जिसमें मनुष्य संचालक भर होते हैं, मूल कार्य कम्प्यूटर करता है, कम्प्यूटर द्वारा किए गए अनुवाद को मनुष्य सँवारता है।

मशीन-समर्थित अनुवाद या कि मशीनी अनुवाद में अनुवाद की तीनो क्रियाएँ--विश्लेषण, अन्तरण, पुनर्गठन--कम्प्यूटर द्वारा ही सम्पन्न होती हैं। आरम्भिक समय में यह प्रणाली हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के मामले में करीब-करीब विफल थी। पर बीते डेढ़ेक दशक में इसमें यथेष्ट विकास हुआ है।

अभिधामूलक सन्दर्भ के पाठों के अनुवाद में अब यह उपादेय साबित होने लगी है। वैसे, पूरी तरह इस पर अभी भी निर्भर होना उचित नहीं है। मानवीय विवेक का समर्थन इसे अभी भी चाहिए; सम्भवतः सदैव ही चाहिए होगा; क्योंकि भारतीय भाषाओं का चरित्र मशीनी नहीं है। इसकी प्रयुक्तियों में सम्बन्ध-बोध, काल-बोध एवं संवेदनाओं के अनेक सन्दर्भ अन्तर्निहित होते हैं।

इलेक्ट्रान एण्ड टेलीकॉम इन्जिनियर्स संस्थान (भारत) के जर्नल, खण्ड 30, संख्या 6, 1984 से प्राप्त सूचना के अनुसार, आर.एम.के. सिन्हा (आई.आई.टी., कानपुर के कम्प्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिक) ने, बीसवीं शताब्दी के नौवें दशक की शुरुआत में, अन्तरभाषा के रूप में संस्कृत भाषा का उपयोग कर, भारतीय भाषाओं ‘से और में’, मशीन द्वारा अनुवाद करने के प्रस्ताव पर काम शुरू किया। सन् 1989 में बैंकॉक में प्रस्तुत CPLA-1 (कॉमन पब्लिक एट्रिब्यूशन लाइसेन्स, वर्जन-1) शीर्षक अपने पर्चे में उन्होंने इस विचार को और विस्तारित दिया। सन् 1991 में, उन्होंने छद्म-अन्तरभाषा (श्यूडो-इण्टरलिंगुआ) की अवधारणा विकसित कर, समान संरचनात्मकता वाली भाषाओं का समूहन किया। अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में अनुवाद के लिए, आंग्लभारती (ANGLABHARTI) नाम की मशीन-समर्थित अनुवाद पद्धति, इसी अवधारणा के उपयोग से विकसित की।

आंग्लभारती’

आंग्लभारती, एक प्रतिरूप (पैटर्न) निर्देशित, नियम आधारित प्रणाली है, जो अंग्रेजी (स्रोत-भाषा) की व्याकरणिक संरचनाओं से सन्दर्भमुक्त है। यह एक ‘छद्म-लक्ष्य’ (छद्म-इण्टरलिंगुआ) उत्पन्न करता है, जो इण्डो-आर्यन परिवार, द्रविड़ परिवार एवं अन्य भारतीय भाषा समूह (लक्षित भाषाओं) (हिन्दी, बांग्ला, असमिया, पंजाबी, मराठी, ओड़िया, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि), पर लागू होता है।

इसी क्रम में कॉर्पस विश्लेषण से प्राप्त नियमों द्वारा तार्किक घटकों की पहचान की जाती है, जिसकी सहायता से ‘छद्म-लक्ष्य’ की ओर अग्रसर होने के नियम निर्मित होते हैं। इस ‘छर् िंलक्ष्य’ का उपयोग, पाठ के पृष्ठ-खण्डों को रेखांकित करने के लिए किया जाता है। इसका लक्ष्य दस्तावेज में आन्तरिक लिंक बनाना होता है, ‘छद्म-लक्ष्य’ का द्योतन चयनित कोड में कोलन (;) या (/) अदि जोड़कर होता है।

यह URL (Uniform Resource Locator) के खण्ड से मेल खाने वाली आईडी के लक्ष्य-तत्त्व को द्योतित करता है। HTML (हाइपरटेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज) तत्त्वों को आकार देने के लिए, स्टाइल शीट की भाषा के रूप चिद्दित ‘सीएसएस’ (कैस्केडिंग स्टाइल शीट) का उपयोग किया जाता है, जो ब्राउजर में वेब-पेज प्रदर्शित करता है। HTML कोड का उपयोग वेब पेज और उसकी सामग्री को संरचित करने के लिए किया जाता है

विदित है कि प्रत्येक भाषा समूह में सघन संरचनात्मक एकरूपता होती है। पद्धति विकसित करने में इस समरूपता का भरपूर उपयोग होता है। भाषा विशेष का पाठ-सर्जक इस ‘छद्म-लक्ष्य’ कोड को लक्ष्य-भाषा-पाठ में अन्तरण कर देता है।

कारक विभक्तियों का उपयोग करते हुए, संस्कृत व्याकरण की पाणिनीय संरचना से भारतीय भाषा पाठ-सृजन में संरचनात्मक समरूपता पहचानी जाती है। इसमें उदाहरण के साथ संज्ञा एवं क्रिया रूपों की पहचान कर उनके अर्थ-विज्ञान का हल प्रस्तुत किया गया है। अनुवाद सम्बन्धी अधिकांश सन्दिग्धताओं के समाधान का प्रयास इसमें तत्त्व-मीमांसा (अण्टोलॉजी), वाक्य-रचना प्रणाली (सिण्टैक्टिक), अर्थ-विज्ञान (सिमेण्टिक) के टैग तथा कुछ व्यावहारिक नियमों के उपयोग से किया गया है। बची-खुची अनसुलझी सन्दिग्धताएँ मानवीय सम्पादन-कौशल के भरोसे छोड़ दिया गया है।

आंग्लभारती’ के सर्जकों के दावे के अनुसार मशीन-समर्थित अनुवाद में नब्बे प्रतिशत कार्य मशीन द्वारा पूरा करने का प्रयास किया गया है (वैसे इस दावे में अहमन्यता के सिवा कुछ है नहीं) और दस प्रतिशत मनुष्यों के सम्पादन-कौशल पर छोड़ा गया है। यह ऐसा तन्त्र है, जिसके द्वारा अंग्रेजी से अधिकांश भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जा सकता है। यह प्रणाली क्रमशः इस रूप में भी विकसित की जा सकती है, जिसके द्वारा जटिल परिस्थितियों का भी समाधान निकाला जा सके।

मनुष्य द्वारा अभियन्त्रित इस मानव-मशीन के पारस्परिक उद्यम में, इसके उपयोग एवं संवर्द्धन को सुविधाजनक बनाते रहने का प्रयास होता रहता है। इस अनुवाद प्रणाली को टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉड्यूल और ओसीआर (ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्नीशन) इनपुट के साथ भी जोड़ा गया है।

सन् 1995 में, इस मशीनी अनुवाद प्रणाली को कुछ और विकसित किया गया। इसमें अनूदित वाक्य की अर्थ-ध्वनि का मूल वाक्य की निकटतम अर्थ-ध्वनि के मेल का ध्यान रखा गया। उदाहरणों द्वारा जाँचकर इस अनुवाद प्रणाली के सृजन और विकास को समृद्ध किया गया। हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद के लिए विकसित इस प्रणाली को ‘अनुभारती’ नाम दिया गया। आगे चलकर ‘आंग्लभारती’ और ‘अनुभारती’ की प्रारम्भिक अवधारणा में प्रभूत परिवर्तन हुए और सन् 2004 में, प्रारम्भिक प्रणाली की कई कमियों को दूर कर; इन्हें ‘आंग्लभारती-2’ और ‘अनुभारती-2’ कहा गया।

आंग्लभारती-2’ मुख्यतः नियम-आधारित प्रणाली है। जबकि ‘अनुभारती-2’ EBMT (Example Based Machine Translation) के उपयोग द्वारा अनुवाद के प्रतिमान प्रस्तुत करने का साधन। राजभाषा विभाग, गृह मन्त्रालय, भारत सरकार ने सी-डैक, पुणे के एप्लाइड आर्टिफिशियल इण्टेलीजेन्स ग्रुप द्वारा ‘मन्त्र-राजभाषा’ नामक मशीन असिस्टेड ट्रान्सलेशन टूल्स (MATT) विकसित कराया। यह एक मशीन साधित अनुवाद पद्धति है, जो राजभाषा के विभिन्न प्रशासनिक क्षेत्रों के दस्तावेजों का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद करता है। इसमें हिन्दी और अंग्रेजी के लिए व्याकरणिक शब्द-वृक्ष (Lexical Tree Adjoining Grammar) का उपयोग होता है।

पाणिनीय व्याकरण ‘अष्टाध्यायी’ के नियमों से नियोजित, अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद का सॉफ्टवेयर ‘अनुसारका’ चिन्मय इण्टरनेशनल फाउण्डेशन (सीआईएफ) द्वारा, अन्तर्राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद (IIIT-H) तथा हैदराबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत अध्ययन विभाग में विकसित की गई। ‘अनुसारका’ को भारत के समुन्नत पारम्परिक शास्त्रों एवं समकालीन प्रौद्योगिकियों का सम्मिश्रण कहा जाता है। इसका उद्देश्य ज्ञान-साहित्य के विपुल भण्डार को अनुवाद द्वारा भारतीय भाषाओं में सहजता से उपलब्ध कराना है। इसके बहुपरतीय तकनीकों से प्राप्त अनूदित पाठ में, स्रोत-भाषा में निहित जानकारी देने पर बल रहता है। इसके अलावा भी राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मशीन समर्थित अनुवाद एवं अनुवाद स्मृति (ट्रान्सलेशन मेमोरी) के अनेक सॉफ्टवेयर विकसित हुए हैं, जो निरन्तर अपनी-अपनी प्रणालियों को अधिक से अधिक उपादेय बनाने की ओर अग्रसर हैं; पर तथ्यतः भारतीय भाषाओं में अनुवाद-क्रिया में सफलता मिलना अभी बाकी है।

मशीन समर्थित अनुवाद उपकरण के लगभग आविष्कारकों को भली-भाँति समझ हो गई है कि इस उपकरण के उपयोग द्वारा राजकोष से धनदोहन करना अत्यन्त आसान है; क्योंकि राजकोष के संचालकों को फुसलाना (Seduce) सबसे आसान है। उनके पास परीक्षण करने का अवकाश नहीं है। वे दो उदाहरण भर से मुग्ध हो जाते हैं! लोक-प्रचलित व्यवहार में वे देख चुके हैं कि धूर्त आदमी भोले-भाले लोगों के समक्ष अपनी बकरी को चमत्कारी साबित करने के लिए बकरी की कान ऐंठते हुए पूछते हैं--बोल बेटा! जून से पहले कौन-सा महीना आता है? बकरी बोलती है--में ऽ ऽ ऽ! वह दूसरा उदाहरण देता है--बोल बेटा! अप्रैल के बाद कौन-सा महीना आता है? बकरी बोलती है--में ऽ ऽ ऽ! वह तीसरा उदाहरण देता है--बोल बेटा! अभी मेरे पास कौन खड़ा है? बकरी बोलती है--में ऽ ऽ ऽ! वे संचालक इतने से ही मुग्ध हो उठते हैं, रामरतन-धन मानकर ऐसे फरेबियों को वित्तीय समर्थन देते हैं, और राजकोष से आवण्टित वित्त का उपयोग फरेबियों के परिपोषण में होता है। संचाालक  या इस आविष्कारक की चिन्ता इस बात के लिए होती कि यह राजकोष अन्ततः जनधनकोष है, इसका उपयोग सही-सही ज्ञान के प्रसार में होना चाहिए; तो ऐसा नहीं होता! भारतीय संसाधन से इतने अनुवाद-उपकरण तैयार हुए; पर आज भी भारतीय अनुवादक अमेरिकी अनुवाद-उपकरण, गूगल ट्रन्सलेट या अब आकर कृत्रिम-मेधा का उपयोग करते हैं! भारतीय संसाधनों से बने अब तक के अनुवाद-उपकरण शैक्षणिक फरेब के सिवा अन्य कुछ नहीं हो पाया है। क्योंकि भारतीय संसाधनों के संचालकों को या कि तत्सम्पोषित आविष्कारकों को इस जाँच की फुरसत नहीं होती कि वे देखें कि उनका उपकरण, ‘यह आम खाता है’ का अनुवाद ‘दिस इज जेनरल एकाउण्ट’ करता है; ‘ही इट्स मैंगो’ नहीं करता।

मशीनी अनुवाद: सम्भावनाएँ और क्षेत्र (Machine Translation : Scope and Areas)

मशीनी अनुवाद के मानदण्ड, क्षेत्र एवं सम्भावनाएँ अनन्त हैं, जो भारतीय आविष्कारकों के सामर्थ्य की वस्तु कदाचित नहीं हैं; क्योंकि आर.एम.के. सिन्हा के बाद, सरकारी परियोजना उगाहनेवाले कोई फरेबी, इस दिशा में निष्ठा से लगे हों, ऐसा अब तक तक दिखा नहीं। हर किसी में अपनी बकरी को चमत्कारी सिद्ध करने की आतुरता दिखती है! और, विदेशी मूल के विशेषज्ञ भारतीय भाषाओं के वैशिष्ट्य को समझ सकें, ऐसी सम्भावना निकट भविष्य में दिखती नहीं। मशीनी अनुवाद के सहारे भारतीय भाषाओं में शब्दों की वैकल्पिक ध्वनि जुटाई जा सकती है; भाषिक गठन का विकल्प जुटाना इसके वश का नहीं है; क्योंकि भारतीय भाषाओं की दो तिहाई से अधिक प्रयुक्तियाँ लोक-व्यवहार से संचालित हैं--अर्थात्, यहाँ सम्बन्धों जितने आयाम हैं, क्रियापद के स्वरूप उतनी ही संख्या में हैं! चूँकि अमेरिकी या यूरोपीय समाज में सम्बन्धों का भारत जैसा संजाल नहीं है, ऐसा कोई सामाजिक विधान नहीं है, वहाँ की भाषाओं में क्रियापद का भी ऐसा वैविध्य स्वभावतः नहीं है। सम्बन्धों के ये व्याकरण को इन देशों के अनुसन्धानवेत्ताओं को चकित तो कर सकते हैं, बोधपूर्ण आश्वस्ति शायद एक जन्म में असम्भव हो! इसलिए भारतीय भाषाओं से अमेरिकी या यूरोपीय भाषाओं में हुए मशीन साधित अनुवाद, भावकों/अनुवादकों को साठेक प्रतिशत तक फलदायी हो जा सकता है; पर अन्य भाषाओं से भारतीय भाषाओं में हुए अनुवाद में अठन्नी से अधिक सफलता नहीं मिल सकती! आधुनिक भारतीय भाषाओं की बात कौन करे, यह उपकरण तो संस्कृत में उपलब्ध ‘रज्जु सर्पः’, ‘तत्त्वमसि’, ‘नेति नेति’, ‘अथातोब्रह्म-जिज्ञासा’ जैसे दार्शनिक सूत्रों का अनुवाद करने में भी अक्षम हो जाएगा। पारिवारिक सदाचार से लेकर सासमाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक, व्यापारिक प्रसंगों के संवाद भी स्थानीयता से इतने गहरे जुड़े हैं कि इसकी प्रयुक्ति में स्थानीयता ही एक मात्र सहारा हो सकती है। फिर भी, इसके क्षेत्र एवं सम्भावनाओं से दृष्टि नहीं फेरी जा सकती। मशीनी अनुवाद की ढेरो समस्याएँ हैं, अपनी सीमाएँ हैं, पर सम्भावनाएँ भी अनन्त हैं।

भाष्य, टीका, अन्वय/विश्लेषण (Commentary, Criticism/Analysis)

भाष्य और टीका, लगभग समानार्थी पद हैं। इसका कोशीय अर्थ होता है--बोलना, कहने योग्य, भाषा में लिखा कोई ग्रन्थ, सूत्र या मूल ग्रन्थ की व्याख्या, अपने ज्ञान से किसी कथन का अर्थ लगाना, संस्कृत साहित्य परम्परा के अनुसार किसी दूसरे ग्रन्थ के अर्थ एवं व्याख्या वाले ग्रन्थ को भाष्य कहते हैं।

सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र, पदैः सूत्रानुसारिभिः।

स्वपदानि च वर्ण्यन्ते, भाष्यं भाष्यविदो विदुः॥

जहाँ वर्णन सूत्रों में हुआ हो, उस सूत्र का अनुसरण करते हुए व्याख्याकार, अपने शब्दों/पदों में उस सूत्र का अर्थ या वर्णन प्रस्तुत करे, उस श्रेष्ठ व्याख्या को भाष्यविदों ने ‘भाष्य’ कहा है। पुराने समय में लोग भाष्य की रचना, मोक्ष-प्राप्ति के लिए अविद्या के विनाशक साधन के रूप में करते थे। सायणाचार्य प्रणीत वेदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों के भाष्य, शंकराचार्य प्रणीत प्रस्थानत्रयी ग्रन्थ (उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र,गीता) के भाष्य, पतंजलि प्रणीत पाणिनीय अष्टाध्यायी के व्याकरणमहाभाष्य, भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रसिद्ध भाष्य हैं।

भाष्य कई प्रकार के होते हैं--प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक...। मूल ग्रन्थ का भाष्य प्राथमिक भाष्य कहलाता है, भाष्य का भाष्य द्वितीयक...आदि। भाष्य लिखना अत्यन्त विद्वत्तापूर्ण कार्य होता है। स्कन्दस्वामी, सायण, स्वामी दयानन्द सरस्वती, वेंकटमाधव, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जैसे विशिष्ट विद्वानों ने वेदों के भाष्य किए हैं।

टीका का भी अर्थ यही होता है, पर भाष्य में जहाँ भाष्यकार, ग्रन्थ में कथित सन्दर्भों की व्याख्या करते हैं, टीकाकार उससे आगे उस अर्थ एवं व्याख्या पर अपनी टिप्पणी भी देते हैं। छोटी टीकाओं को ‘वाक्य’ या ‘वृत्ति’ कहते हैं; भाष्यों का अर्थ स्पष्ट करने के लिए लिखी गई रचनाएँ ‘वार्तिक’ कहलाती हैं।

अन्वय/विश्लेषण

अन्वय का कोशीय अर्थ है--अनुगमन, सम्बन्ध, मेल, आशय, वाक्य में पदों का परस्पर उचित सम्बन्ध, नियमानुसार यथास्थान रखना, हेतु और साध्य का साहचर्य बनाना। लेखन में इसे शब्दों का तर्कपूर्ण क्रम लगाना कहेंगे। ‘विश्लेषण’ शब्द का प्रयोग आज ज्ञान के सभी क्षेत्रों में किया जाता है। भाषिक विश्लेषण, सांस्कृतिक विश्लेषण, आर्थिक विश्लेषण, सामाजिक विश्लेषण, राजनीतिक विश्लेषण...। किसी व्यवस्था-क्रम के सूक्ष्म परीक्षण में उसके अवयवी तत्त्वों की जाँच-क्रिया ‘विश्लेषण’ कहलाता है।

आशु अनुवाद

आशु का अर्थ होता है शीघ्र। इसलिए आशु अनुवाद का अर्थ हुआ शीघ्र अनुवाद। आशु अनुवाद की प्रक्रिया भावानुवाद/सारानुवाद से भिन्न होता है। इसमें वक्ता के कथन की भाषा (स्रोत भाषा) से श्रोताओं की भाषा (लक्ष्य भाषा) में अनुवाद होता है। इसमें वाक्य पूरा होने के तत्काल बाद वक्ता के कथन का लक्ष्य भाषा में अनुवाद होता है। इसके अनुवादक वक्ता के समग्र कथन का अविकल अनुवाद पूरी निष्ठा और तटस्थता से करते हैं।

वक्तव्य के साथ-साथ अनूदित होते जाने के कारण, इसे सहकालिक अनुवाद (Simultaneous Oral Translation) भी कहा जाता है। वैसे आशु अनुवाद का मूल अभिप्राय निर्वचन (इण्टरप्रिटेशन) है। निर्वचन में एक ही वक्तव्य दो भाषाओं में एक साथ चलता है; पर दोनों की प्रस्तुति के बीच पारस्परिक विराम होता है। मूल वक्ता का वाक्य पूर्ण होते ही उसके अनुवाद की प्रस्तुति शुरू हो जाती है। यह एक प्राचीन मानवीय गतिविधि है, लेखन के आविष्कार से एक सदी पूर्व ही इसकी शुरुआत हो गई थी।

निर्वचन (इण्टरप्रिटेशन) के इतिहास एवं परम्परा सम्बन्धी शोध की स्थिति अधिक पुरानी नहीं है। आरम्भिक समय में पेशेवर सम्मेलन मात्र में ही विद्वानों की रुचि निर्वचन सम्बन्धी कार्य के लिए होती थी। इतिहास काल में इस प्रथा पर शैक्षणिक कार्य बहुत कम होते थे। इसकी गतिविधियों का हजार वर्षों के ऐतिहासिक अभिलेख भी अत्यन्त सीमित हैं। दुभाषियों और उनके कामों को इतिहास के प्राचीन पृष्ठों में स्थान नहीं मिला। इसका पहला कारण तो वाचिक प्रस्तुति पर लिखित पाठ का प्रभुत्व है। क्योंकि इतिहासज्ञों के अभिलेख में वाचिक प्रस्तुति का उल्लेख नहीं हुआ। दूसरा कारण इसे सदैव किसी मामूली पूरक गतिविधि के रूप में देखना था, जिस पर कोई विशेष ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी गई और लिपिकारों, अभिलेखकों और इतिहासकारों की दृष्टि में बहुधा दुभाषियों का सामाजिक पदक्रम भी बहुत मामूली-सा रहा और फिर पत्रों, अभिलेखों, जीवनियों, डायरियों-संस्मरणों एवं अन्य दस्तावेजों और साहित्यिक कार्यों से निर्वचन परम्परा के बारे में हमारा ज्ञान-वर्द्धन भी सीमित ही हुआ। इसलिए इस विषय पर अनुसन्धान अनिवार्य है। पर, ध्यातव्य है कि निर्वचन में किसी कथन के सहकालिक अनुवाद कभी-कभी लिखित भी हो जाता है, जबकि आशु अनुवाद केवल मौखिक ही होता है।

चलचित्रों की डबिंग में इसका उपयोग बहुतायत से होता है। आशु अनुवाद में किसी भी अनुवाद उपकरण की सहायता का अवसर नहीं होता। वक्ता का कथन सुनकर उसका मौखिक अनुवाद तत्काल करना होता है। किसी भी विशेषज्ञों से विचार-विमर्श का अवसर नहीं होता। पल भर भी सोचने का अवसर नहीं मिलता। इस कार्य को अगले किसी क्षण के लिए टाला नहीं जा सकता। दो भिन्न भाषिक व्यक्ति/व्यक्तियों के बीच संवाद स्थापित करना इसका एक मात्र उद्देश्य होता है। किसी तमिल-भाषी से किसी मैथिली-भाषी का संवाद अनुवाद द्वारा ही सम्भव है।

आशु अनुवाद का स्वरूप नितान्त मौखिकहोता है। विभिन्न भाषा-भाषी लोगों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, वैज्ञानिक एवं तकनीकी आविष्कार की जानकारी, तीर्थाटन, पर्यटन, व्यवसाय, संसदीय एवं राजनयिक कार्य-कलापों में आशु अनुवाद अत्यन्त उपादेय होता है।

अननुवाद्यता (Un-translatability)

अननुवाद्यता किसी भाषा के पाठ का वह लक्षण है, जिस कारण लक्ष्य-भाषा के शब्द/प्रसंग/कथन में स्रोत-भाषा के पाठ के समतुल्य अर्थ-ध्वनि देने योग्य पर्याय उपलब्ध नहीं होते। जिस कारण स्रोत-पाठ में ध्वनित अर्थ-सन्दर्भ को लक्ष्य-भाषा में पहुँचाना असम्भव हो जाता है। पाठ में अनुवाद्यता नहीं होना; उसकी अननुवाद्यता है। अर्थात्, लक्ष्य-भाषा में उस पाठ के शब्द/प्रसंग/कथन के समतुल्य पर्याय नहीं हैं। ऐसा बहुधा भाषाई विलक्षणताओं एवं सांस्कृतिक प्रयुक्तियों के अनूठेपन के कारण होता है।

कुछ अनवधान लोग तो अननुवाद्यता को रचना की श्रेष्ठता भी मान लेते हैं। सांस्कृतिक प्रयुक्तियों में अवधारणाएँ और शब्द पारस्परिक रूप से इतने जुड़े होते हैं कि उनका अनुवाद असम्भव होता है। भाषाई सापेक्षता की परिकल्पना से परिचित लोग जानते हैं कि--अपनी स्थानीयता, निजता, व्याकरणिक संरचना, प्रयुक्तिमूलक वैशिष्ट्य के कारण हर भाषा का स्वभाव भिन्न होता है। भाषा, केवल विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है, वह विचारों के स्वरूप का नियन्त्रक भी है। इसी कारण हर भाषा की संरचना उसके बोलनेवालों की विश्व-दृष्टि को प्रभावित करती है।

एडवर्ड सपिर एवं बेन्जामिन ली व्होर्फ ने इस भाषाई सापेक्षता सिद्धान्त का प्रतिपादन सन् 1929 में किया था। इसीलिए इसे सापिर-व्होर्फ परिकल्पना भी कहा जाता है। एडवर्ड सपिर (सन् 1884-1939) अमेरिका में भाषा के संरचनात्मक अध्ययन के उन्नायक और प्रसिद्ध मानवविज्ञानी-भाषाविद थे। उनके शिष्य बेन्जामिन ली व्होर्फ (सन् 1897-1941) प्रसिद्ध भाषाविद् एवं अग्नि-शमन अभियन्ता थे।

इस सिद्धान्त के अनुसार हर व्यक्ति, अपनी ही भाषा के माध्यम से विश्व को देखता-समझता है। व्यक्ति का ज्ञान-बोध भाषा के स्वरूप से रेखांकित होता है। भाषा की ज्ञानात्मक संरचना उसकी विचार-प्रक्रिया को प्रभावित करती है। जिस भाषा में, वस्तु-विशेष को अभिव्यक्त करने के जितने शब्द होंगे, उस भाषा में वह वस्तु, उतनी तरह से सम्बोधित होगा। विशिष्ट अनुवाद-चिन्तक एवं भाषा-विज्ञानी जे.सी. कैटफोर्ड ने अननुवाद्यता की बात सन् 1965 में उठाई थी। उन्होंने दो तरह की अननुवाद्यता का उल्लेख किया -- भाषाई अननुवाद्यता और सांस्कृतिक अननुवाद्यता।

स्रोत-भाषा और लक्ष्य-भाषा की भाषिक भिन्नताओं के कारण भाषाई अननुवाद्यता की स्थिति आती है, जबकि लक्ष्य-भाषा में संगत वैशिष्ट्य की अनुपस्थिति के कारण सांस्कृतिक अननुवाद्यता आती है।

स्रोत-भाषा के जिन शब्दों/पदों/अवधारणाओं का अनुवाद करते समय अनुवादकों को लक्ष्य-भाषा में समुचित पर्याय का लोप दिखे, युगीन नायडा ने उसे अननुवाद्यता कहा। कोई समुदाय, जिस विशिष्ट भाषा का उपयोग, अपनी अभिव्यक्ति के साधन के रूप में करता है, उसमें उसके जीवन-यापन की निजता और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य निहित होते हैं; पीटर न्यूमार्क की राय में अननुवाद्यता इसी कारण उपस्थित होती है।

अननुवाद्यता की समस्या से अनुवादक बहुधा जूझते रहते हैं, फिर भी यह सदैव से विवादित प्रसंग रहा है। अनुवाद की उपादेयता, अनिवार्यता, सम्भाव्यता और व्यावहारिकता पर हर किसी को आस्था है; पर इस बात की समझ हर किसी को है कि भाषाओं के अनेक प्रसंगों का अनुवाद कठिन है। अब लाख अननुवाद्यता आए, पर भाषाई भिन्नता को तो कोई नहीं बदल सकता; पर, सांस्कृतिक भिन्नता को पाटने के लिए, अनुवादकीय कौशल से, कोई न कोई पूरक व्यवस्था अपनाई जा सकती है; और अननुवाद्यता को अनुवाद्यता में बदला जा सकता है, बदला जा रहा है।

अननुवाद्यता की चर्चा करते हुए यहाँ अनुवाद, अनुवाद्यता, विश्व-साहित्य एवं उक्तियों पर विचार प्रासंगिक होगा--उक्तिकारों की अनुवाद-सम्बन्धी उक्तियाँ प्रमाणित करने लगी हैं कि ये उक्तियाँ आँखें बन्दकर, टटोल-टटोलकर दी गई हैं। अनूदित पाठ में वे मूल पाठ को पूरी तरह सम्प्रेषित करने में क्षमता ढूँढते हैं। भाषाओं की सूक्ष्मताओं के जानकार इस तथ्य से अवगत हैं कि वे जो कुछ मौलिक बोलते या लिखते हैं, उसमें भी उनके सोच-विचार की समग्रता नहीं आ पाती। बाल भर ही सही, अपूर्णता रह ही जाती है। फिर एक प्रतीक व्यवस्था की पूर्णता दूसरी प्रतीक व्यवस्था में कैसे रह पाएगी?...हर भाषा के व्याकरण, व्यवहार और संस्कृति का समीकरण तो भिन्न-भिन्न होता है!

जगत-विदित है कि पूरी तरह वही के वही अर्थ देनेवाले पर्याय समभाषा के शब्दों के भी नहीं मिलते, संस्कृति-बोध और प्रयुक्तिजन्य भिन्नता होती ही है; नीर, पानी, जल पर्याय होकर भी निकटतम अर्थ ही ध्वनित करते हैं, एक ही अर्थ ध्वनित नहीं करते। इस प्रसंग में विचारकों को तय करना होगा कि वैश्विक दृष्टि से अनुवाद-कर्म उपादेय है या नहीं।

उपादेय है, तो अननुवाद्यता के भय से काँपना बन्द कर, असम्भाव्यता को नकारकर, किसी कौशल का उद्योग करना होगा, कोई व्यवस्था बनानी होगी। वाल्टर बेंजामिन (सन् 1892-1940) उन अग्रणी विद्वानों में से हैं, जो अनूदित पाठ में, मूल की समग्र अर्थ-ध्वनि सम्प्रेषित करने की क्षमता की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे पवित्रतावादी दृष्टिकोण में अननुवद्यता पग-पग पर प्रकट होगी। फिर तो अनुवाद-कर्म ही असम्भव होगा। इस दृष्टिकोण के अनुसार अनुवाद के बाद अर्थ और सूचक में अभेद होना चाहिए। अर्थात्, अनूदित पर्याय की अर्थ-ध्वनि और मूल पाठ के प्रतीक-सूचक में भेद नहीं रहना चाहिए। अननुवाद्यता इसी भेद के कारण आती है। यह सिद्धान्त, अनुवाद की अन्तर्विरोधी प्रकृति की ओर संकेत करता है। क्योंकि अनुवाद एक ही साथ, आवश्यक भी और असम्भव भी कैसे होगा?

अनुवाद की इस आवश्यकता और असम्भाव्यता के द्वन्द्व को जाक देरीदा (सन् 1930-2004) ने बैबेल की मीनार के सहारे रेखांकित किया है। बैबेल की मीनार की घटना लगभग साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी है। यह महाप्रलय के लगभग सौ वर्ष बाद, इब्राहिम के जन्म से पहले, अर्थात् प्राचीन मिस्र, ग्रीस एवं अन्य प्रारम्भिक सभ्यताओं से पहले की बात है। तब पूरी पृथ्वी पर एक ही भाषा थी, सारे लोग पूर्व की ओर पलायन करते हुए शिनार के मैदान तक आकर बस गए। नाम कमाने के उद्देश्य से सबने एक गगनचुम्बी मीनार बनाने की ठानी। मीनार बनते देखकर यहूदी धर्म के परमेश्वर ‘यहोवा’ (इब्रानी भाषा में) प्रकट हुए; वे समझ गए कि एकभाषी होने के कारण वे एक-दूसरे को समझ रहे हैं, और इसीलिए ऐसा कर पा रहे हैं। उन्होंने सभी की भाषा भिन्न-भिन्न कर दी। और उन्हें दुनिया भर में तितर-बितर कर दिया। दुनिया भर के राजनीतिक परिवेश में इस मिथक की असंख्य व्याख्या हो सकती है; पर हमें तो अनुवाद और अननुवाद्यता की चर्चा पर कायम रहना है। जिस तरह बैबेल के मीनार की कथा में यथार्थ और मिथक का द्वन्द्व है, उसी तरह का द्वन्द्व देरीदा ने अनुवाद की आवश्यकता और असम्भाव्यता में दिखाया है। यहाँ ईश्वर ने दुनिया भर के लोगों को समभाषी भी बनाया, विषमभाषी भी।

उत्तर-उपनिवेशकालीन बौद्धिक चिन्तनों में एक ओर भाषिक-सांस्कृतिक विस्तार, मेल-मिलाप, उदार-संचार की दुहाई दिखती है; तो दूसरी ओर अंग्रेजी भाषा के वैश्विक वर्चस्व की लिप्सा। कुछ विद्वान इस नेपथ्य के सच को भी देख रहे हैं।

अंग्रेजी में अनुवाद हो जाने से रचना और रचनाकार के वैश्विक हो जाने की घोषणा या ललक भी कम नहीं है। रचनाकारों को वैश्विक हो जाने की इस प्रचण्ड लिप्सा में कृतियों के अनुवाद से प्रसन्नता जितनी भी हो जाए, पर तथ्यतः यह दुनिया भर की अन्य संस्कृतियों के अंग्रेजीकरण का आयोजन है। विश्व साहित्य में आज विश्व का सभी साहित्य समाविष्ट है। इसी दौड़ में कहीं सबसे अधिक बिकने वाले साहित्य का अन्ध-कूप भी है, जिसमें डूब मरने को ढेरो लोग तत्पर हैं। सामन्तों की छपरी में लेटकर मान बढ़ाने के चक्कर में अपने बिछावन से गायब होने को बेताब हैं। विश्व साहित्य की भीड़ में दर्ज होकर अपनी मौलिकता से बेफिक्र हैं।

शैक्षणिक संस्थाओं में विश्व-साहित्य के आलोक में किसी कृति के अध्ययन के प्रयोजन पर अक्सर विचार होता है। क्यों होता है? इसलिए नहीं कि विश्व-साहित्य की देहरी में घुसते ही कोई कृति महिमा-मण्डित हो जाती है। बल्कि विचार होना चाहिए कि इस देहरी में प्रविष्टि पाने के लिए अनूदित होकर किसी कृति के मूल की तुलना में कितना लोप कितना आगम हुआ? तत्त्वतः अनुवाद की आधारशिला पर ही विश्व-साहित्य की अवधारणा केन्द्रित है। अनुवाद के बिना विश्व-साहित्य की संकल्पना ही अधूरी होगी। किसी भी भाषा की कृति का अनुवाद जब किसी विदेशी भाषा में होता है; वह कृति, अपनी क्षेत्रीयता, भाषिकता, सांस्कृतिकता, साहित्यिकता, युग-सन्दर्भ आदि का कुछ न कुछ अनिवार्यतः खोता है और स्रोत-भाषा के उक्त सन्दर्भों के संकेत ग्रहण करता है।

विश्व-साहित्य के सन्दर्भ में किसी कृति के अवगाहन का मूल लक्ष्य इन्हीं लोप-आगम के सन्दर्भों का अभिज्ञान प्राप्त करना होता है। ध्यातव्य है कि अननुवाद्यता की स्थिति में यह लोप-आगम जटिल भी हो जाता है। विश्वसाहित्य के अवधारणा की पुनर्पुनः मीमांसा के सारे सूत्र वस्तुतः इसी रास्ते अननुवद्यता की पृष्ठभूमि में छिपे होते हैं।

अमेरिकी विदुषी एमली सुसन एप्टर (ज. 1954), अमेरिकी विद्वान डेविड डैमरोश (ज. 1953) जैसे लोग भी कुछ इसी तरह के विचार रखते हैं।

पुनरीक्षण, मूल्यांकन, समीक्षा

एक भाषिक परिवेश के पाठ को दूसरे भाषिक परिवेश में ले जाने कारण; लोकक्षेत्र में लाने से पूर्व अनुवाद-अभिकरण के स्वामी, उस अनूदित पाठ के गुणवत्ता की जाँच सामान्यतया किसी समझदार विशेषज्ञ से कराते हंै। इसे अनुवाद मूल्यांकन या अनुवाद पुनरीक्षण या अनुवाद समीक्षा कहते हैं। इसमें देखा जाता है कि अनूदित पाठ में, मूल पाठ की ध्वनि, उसके अर्थ-सन्दर्भादि का समावेश सही-सही हुआ है या नहीं? अर्थ की सूक्ष्मता, भाषिक-सांस्कृतिक उपयुक्तता, भाव एवं ध्वनियों की ईमानदार अभिव्यक्ति हुई है या नहीं? मूल पाठ के सन्देश को आहत किए बिना; अनूदित पाठ में तथ्य, तिथि, आँकड़े, नाम, तकनीकी प्रयुक्ति की युक्तियुक्त प्रयुक्ति और अर्थगत पूर्णता का अनुपालन हुआ है या नहीं? भाषाई प्रवाह, स्वाभाविक सम्प्रेषण, विषयानुरूप वाक्य संरचना, व्याकरणिक प्रतिमानों के अनुपालन, मुहावरे एवं लोकोक्तियों का उपयोग, शब्द-चयन एवं शैली आदि का समावेशन समुचित रूप से हुआ है या नहीं? अनूदित पाठ की पठनीयता सम्मोहक है या नहीं? मूल पाठ एवं लक्षित भावकों के अनुरूप अनूदित पाठ के ध्वनि-स्वर (औपचारिक, अनौपचारिक, तकनीकी, व्यावसायिक) एवं सन्दर्भ प्रामाणिक हैं या नहीं? वर्तनी एवं टंकण की शुद्धता, विराम चिद्दों की जाँच; लिंग-वचन-कारक-वाच्य के स्वरूप, क्रिया, विशेषण, संज्ञादि व्याकरणिक प्रतिमानों की शुद्धता इसमें है या नहीं?  

पर सारे पाठों की पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पुनरीक्षक एक समान दृष्टिकोण नहीं अपनाते। चूँकि हर पाठ के अनुवाद की धारणा अलग होती है, पुनरीक्षक अनूदित पाठ के उपादेय क्षेत्र के अनुरूप ही पुनरीक्षण की दुष्टि अपनाते हैं। इसमें पुनरीक्षक का दृष्टिकोण थोपा नहीं जाता! अनुवाद के व्यवहारपरक क्षेत्र को ध्यान में रखकर यह प्रक्रिया पूरी होती है। जैसे कानूनी दस्तावेजों (अनुबन्ध, अदालती आदेश) में रचनात्मकता की कोई जगह नहीं होती, ऐसे पाठ में शब्दों के समुचित और मान्य विकल्प और एकार्थता ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। पर, साहित्यिक पाठ में भाव, रस, शैली का अनुवाद; भावनात्मक (करुण, हास्य, वीर...) प्रभाव; लेखन शैली, पात्रोचित संवाद भी महत्त्वपूर्ण होता है। सांस्कृतिक अनुकूलन, स्थानीय मुहावरे, बिम्ब-प्रतीकादि के सौष्ठव महत्त्वपूर्ण होते है। पर मैनुअल, मेडिकल रिपोर्ट, कोडिंग या इंजीनियरिंग दस्तावेजों जैसे तकनीकी पाठ में स्पष्टता और मानक शब्दावली प्राथमिक होती है। उद्योग विशेष के पाठ में उस क्षेत्र की मानक शब्दावली का अनुपालन पूरी तरह होना अनिवार्य होता है। स्पष्टता और असन्दिग्धता इसकी आवश्यक शर्त होती है। इस पाठ के अवगाहन में उपयोक्ताओं को कोई भ्रान्ति न आए! मापन और इकाइयों का अनुपालन सही-सही हो! इसलिए पुनरीक्षक की तटस्थता अनिवार्य होती है।

इस कारण भाषाई ज्ञान के साथ-साथ, विश्लेषणात्मक और तकनीकी कौशल एक कुशल अनुवाद पुनरीक्षक के लिए आवश्यक होता है। इस क्रम में शैक्षणिक पृष्ठभूमि सहायक अवश्य होता है, पर किसी भाषा में स्नातकोत्तर उपाधिधारी व्यक्ति एक कुशल पुनरीक्षक भी हों, यह आवश्यक नहीं। आवश्यक होता है उनका अनुभव! अनुवाद पुनरीक्षक की शैक्षणिक उपाधि से अधिक महत्त्वपूर्ण उनका ज्ञानसिद्ध होना होता है। मूल एवं लक्ष्य भाषा की गहन जानकारी के साथ-साथ उनका अनुवाद कौशल लाभकारी होता है। विषय-विशेष में विशेषज्ञता, तकनीकी क्षेत्र (प्रशासनिक, व्यापारिक, कानूनी, चिकित्सकीय ...विषयों से सम्बद्ध तकनीकी शब्दावली) का ज्ञान पुनरीक्षण के समय अनिवार्य होता है। दोनों भाषाओं पर पूर्ण अधिकार और गहन अनुभव से ही कोई पुनरीक्षक त्रुटिनिवारण में सक्षम होता है। व्याकरण के ज्ञान के बिना अनुवाद की वर्तनी-सुधार असम्भव है। दोनों भाषाओं के सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों से परिचित हुए बिना अनुवाद की स्वाभाविकता और तथ्यात्मकता की शुद्धता की जाँच असम्भव है। तकनीकी और व्यावसायिक योग्यता के बिना आधुनिक अनुवाद उद्योग में प्रयुक्त आधुनिक सन्दर्भों की समझ असम्भव होगी।

Search This Blog