Thursday, March 9, 2023

सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी Learned everything, but didn't learn shrewdness

सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी

Learned everything, but didn't learn shrewdness

फेसबुक-वाट्सैप की शह पाकर इन दि‍नों रचनाकार बनने की फैक्ट्री शुरू हो गई है। कुछ भी लिखकर लोग पोस्‍ट कर देते हैं, ढेरो नासमझ लोग उसे पढ़े बगैर 'लाइक' का ऊर्ध्‍वमुखी अंगूठा लगा डालते हैं। लेखक उसे अपनी सराहना समझकर, महीने, दो महीने के लि‍खे पोस्‍ट को एकत्रकर उपन्‍यास या कहानी-कवि‍ता का संग्रह बना डालते हैं। पैसे हों, तो प्रकाशक मि‍ल ही जाते हैं। ऐसे धनकुबेरों या बाहुबलि‍यों के लि‍ए वाहवाही का गि‍रोह तैयार करना कोई बड़ी बात नहीं होती। फि‍र साहि‍त्‍य के पवि‍त्र आँगन को घि‍नाने से उन्‍हें कौन बरजे? अपनी अज्ञानपूर्ण प्रस्‍तुति‍ को शिल्प का नूतन प्रयोग कहने की जुमलेबाजी वे फिल्मि‍स्तानि‍यों से भली-भाँति‍ सीख चुके हैं। कीर्तन करनेवाले नवसमीक्षकों का गि‍रोह उनकी घटि‍या रचना को महान साबि‍त करने के लि‍ए बैठा ही रहता है। वर्चस्‍वशाली भाषा में अनुवाद करवाकर राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी ऐंठ ही लेते हैं। पर पढ़ने बैठें, तो पाठक उन्‍हें पढ़ नहीं पाते!

 


चि‍न्‍तनीय है कि‍ जि‍स रचना को पाठक पढ़ भी न पाएँ, उसकी सामाजि‍क उपादेयता क्‍या हो? हिन्‍दी के सृजन-क्षेत्र में ऐसी भीड़ तेजी से बढ़ रही है। सामुदायि‍क प्रसंग में यह प्रवृत्ति‍ घातक है। साहित्य के सुकर्ताओं से निवेदन कि‍या जाना चाहि‍ए कि वे ऐसी घातक वृत्ति‍ से साहि‍त्‍य को बचाएँ, अवांछि‍त रचनाओं की तारीफ से खुद को बरजें। दुनिया में करने के लिए ढेर सारे काम हैं, साहित्य-सृजन कि‍ए बि‍ना भी कई लोग महान हुए हैं। खुद को वि‍शि‍ष्‍ट बनाने की ललक बहुत सताए, तो वे अपनी प्रति‍भा को पहचानें, जि‍स क्षेत्र में बेहतर कर सकते हैं, उसमें कुछ करें। साहित्य के पवित्र मन्‍दिर में गन्‍दगी फैलाने, कागज जैसी नितान्‍त राष्ट्रीय सम्‍पत्ति बर्बाद करने से बेहतर है कि‍ वे पाठक ही बने रहें। अब तक जन-मन में जि‍तनी घृणा फैल चुकी है, वे पर्याप्‍त से भी अधि‍क है, फि‍र साहित्य से जनसामान्‍य को घृणा क्‍यों कराया जाए!

शाश्‍वत साहित्य का उद्देश्‍य समाज को मानवीय और मनुष्य को सामाजिक बनाना होता है। अलग-अलग विधाओं की भाषिक संरचना बेशक भि‍न्‍न हो, पर पठनीयता हर रचना की प्राथमि‍क शर्त होती है। अपठनीय रचना कभी सम्‍प्रेषि‍त नहीं होती। सम्‍प्रेषणीयता के बि‍ना रचना का कोई मूल्‍य नहीं होता! व्‍यंजना-नि‍रूपण से कोई रचना महान बनी या नहीं, यह तो बाद की बात होती है। रूपक-वि‍धान से अपनी कहानि‍यों-उपन्यासों को अनूठा बनाने के आग्रही रचनाकारों को प्रथमत: सम्‍प्रेषण की चि‍न्‍ता करनी चाहि‍ए। 

आलोचना को रचना का शेषांश इसीलि‍ए कहा जाता है कि‍ वह‍ पाठकों को रचना के सही मर्म तक पहुँचाने का काम करती है। यह काम नि‍न्‍दा अथवा वि‍रुदावली से सम्‍भव नहीं होता। आलोचना, कृति‍ और पाठक के बीच सेतुबन्‍ध बनाती है। झूठी सराहना या तंगदि‍ल नि‍न्‍दा से लेखकों को भरमानेवाले कोई भी व्‍यक्‍ति‍ आज तक सही आलोचक नहीं माने गए हैं। अनुभूत सत्य को दबाकर कल्पित सत्य चस्पाँ करनेवाले रचयि‍ताओं या समीक्षकों को तनि‍क ठहरकर सोचना चाहि‍ए कि साहित्य ही उनकी मि‍त्रता का आधार है, वे अपनी मि‍त्रता के आधार के साथ प्रपंच क्‍यों कर रहे हैं? सन्‍तों का अनुगमन करते हुए भर्तृहरि ने 'नीतिशतक' में सन्‍मि‍त्र उसे माना, जो लोगों को 'पाप करने से बरजे, हित से जोड़े, गोपनीय प्रसंगों को गुप्त रखे, गुणों को प्रकाशि‍त करे, आपत्‍काल में साथ न छोड़े, अवसर आने पर सहयोग दे (पापान्निवारयति योजयते  हिताय, गुह्यं नि‍गूहति गुणान् प्रकटीकरोति। आपद्गतं च न जहाति ददाति काले, सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥)। पूर्वजों की ऐसी उक्‍ति‍यों के बावजूद मित्रों की झूठी सराहना करनेवालों का उद्देश्‍य समझ से परे है। वस्‍तुनि‍ष्‍ठता को परोक्षकर नि‍योजि‍त रूप से कि‍सी कृति‍ को ध्वस्त करने या श्रेष्ठ साबित करनेवाले समीक्षकों का सामाजि‍क सरोकार नि‍श्‍चय ही सन्‍दि‍ग्‍ध होता है। झूठ बोलकर मि‍त्रों को तुष्‍ट करना, कुमार्ग की ओर धकेलना, राजनीतिक लोगों का आचरण होता है; मि‍त्र का नहीं।

नीत्‍योपदेश की व्‍याख्‍या नि‍श्‍चय ही बदलती रहती है। जैसे मेरे लि‍ए 'न ब्रूयात सत्‍यमप्रि‍यम', अर्थात् 'अप्रि‍य सत्‍य न बोलें' की व्‍याख्‍या करीब चार दशक पूर्व बदल गई। चूँकि‍ 'अप्रि‍य सत्‍य' को समझने की मेरी दृष्‍टि‍ बदल गई। आपातकाल की क्रूरता से मुक्‍ति‍ पाने के लि‍ए सर्वदलीय मोर्चे ने कांग्रेस-मुक्‍त भारत की जैसी तरकीब रची थी और भारतीय नागरि‍क के सि‍र पर जैसी नि‍र्लज शासन-व्‍यवस्‍था आ बैठी थी, अमरत्‍व पाने की उसकी एक ही नीति‍ थी 'जनता जाए भाड़ में, हमारा प्रभुत्‍व कायम रहे।' जयप्रकाश आन्‍दोलन से उद्भूत वैसे खढ़-पतवार आज भी भारतीय नागरि‍कों के मत्‍थे ताण्‍डव कर रहे हैं। उस दौर की राजनीति‍क दुर्वृत्ति‍ क्रमश: जन-मन में ऐसे समा गई, कि‍ लोग अनावश्‍यक रूप से अपने अज्ञान और स्‍वेच्‍छाचार पर अहंकार करने लगे।

मेरी राय में कि‍सी के अपकर्मों को उजागर करना न तब 'अप्रि‍य सत्‍य' था, न अब है। प्रकृति‍-प्रदत्त कि‍सी की अपंगता की खि‍ल्‍ली उड़ाना बेशक 'अप्रि‍य सत्‍य' है, पर होशोहवास में नीति‍वि‍रोधी, जनवि‍रोधी आचरण करनेवालों पर ऊँगली उठाना कतई 'अप्रि‍य सत्‍य' नहीं है। यह 'कुत्‍सि‍त सत्‍य' है। ऐसे सत्‍य को उजागर करना, ऐसे यथार्थ का वि‍रोध करना, सर्वथा सामुदायि‍क हि‍त का कार्य है। पर 'होशि‍यार' लोग ऐसा नहीं करते हैं। 'होशि‍यार' शब्‍द की ध्‍वनि‍ पहले बहुत सकारात्‍मक थी। अब इसका उपयोग लोग धोखे से भी सकारात्‍मक रूप में नहीं करते। अक्‍सर 'चालाकी' और 'धूर्तता' के लि‍ए करते हैं। सन् 1959 में 'अनाड़ी' सि‍नेमा के लि‍ए लि‍खे गीत 'सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी' में शैलेन्‍द्र ने भी इसी अर्थ-ध्‍वनि‍ को महत्त्‍व दि‍या है। इसी 'होशि‍यारी' के कारण वि‍गत चार दशकों से लोगों को 'अप्रि‍य सत्‍य' बोलने में असुवि‍धा होने लगी है। यह असुवि‍धा राजनीति‍ से अधि‍क अब साहि‍त्‍य के क्षेत्र में कूद आए लोगों को होती है। जब से लोगों ने देखा है कि‍ युवा-पीढ़ी के मन-मि‍जाज पर नेता-अभि‍नेता-खि‍लाड़ी झट-से खुद को अंकि‍त कर देते हैं, वे साहि‍त्‍य में आकर अनाप-शनाप हरकतें करने लगे हैं। लि‍खना सीखने से पहले लि‍खने लगते हैं। वे सोचते तक नहीं कि‍ एक अच्‍छे लेखक में भीतर एक पवि‍त्र मनुष्‍य और एक उदार शि‍क्षक का होना जरूरी है। वे कभी नहीं सोचते कि‍ कोई अच्‍छा नेता-अभि‍नेता-खि‍लाड़ी प्रशस्‍ति‍ पा जाने पर भी अपने शि‍क्षक से मुक्‍त नहीं हो पाते। पर हमारे यहाँ तो शि‍क्षक हो गए लोग भी शि‍क्षक बने रहना नहीं चाहते।

एक पुराना प्रसंग याद आता है। सन् 1991 में एक परम मेधावी शोधवेत्ता सूर्यनाथ, जेएनयू में पीएचडी करने के दौरान मेरे निकट आए। आज वे हि‍न्‍दी के ख्याति‍लब्‍ध पत्रकार और कथाकार हैं। उम्र में मुझसे थोड़े छोटे हैं। उनका बड़प्‍पन ही है कि‍ मुझ जैसे उजड्ड, अनगढ़ मनुष्‍य के सम्‍पर्क में खुशी-खुशी आए और तब से मुझे बड़े भाई का दर्जा देते आए हैं। यकीन से कह सकता हूँ कि‍ मेरी आदतों, मेरी पसन्‍दों, मेरी सुविधाओं का ख्याल उन्‍होंने जि‍तनी सूक्ष्मता से रखा, मेरा सहोदर या आत्‍मज भी नहीं रख पाता। उन दि‍नों वे मेरी बेबाकी के प्रशंसक हुआ करते थे; आज भी हैं, पर वैसे नहीं। अब वे मुझे कुछ दुनि‍यादार होने की सलाह देते हैं। मैं बुरा नहीं मानता, पर अपनी आदत बदलने की चेष्‍टा भी नहीं करना चाहता। जेएनयू में उन दि‍नों अध्‍यापकों द्वारा दि‍ए गए वि‍षय पर पर्चा लि‍खने के लि‍ए शोधार्थि‍यों को महत्त्‍वपूर्ण पुस्‍तकों की जरूरत होती थी। प्रति‍स्‍पर्द्धावश चतुर-सुजान शोधार्थी पुस्‍तकालय से वैसी कि‍ताबें फटाफट नि‍र्गत कराकर दबा लेते थे। उन दिनों गूगल-सर्च जैसा कोई संसाधन तो था नहीं! सन्‍दर्भ ग्रन्‍थ जल्‍दी मि‍लते भी नहीं थे। वैसी कि‍ताबों की समयबद्ध जरूरत होती थी। लि‍हाजा कई शोधार्थी मेरे नि‍जी संग्रह पर आश्रि‍त होते थे। उपयुक्‍त पृष्‍ठों की छाया-प्रति‍ करवाकर अगले दि‍न लौटा देने की शर्त पर एक कनिष्ठ छात्रा मुझसे कि‍ताब ले गई। पर उसने समय से किताब नहीं लौटाई, लि‍हाजा दो-तीन दि‍नों तक अन्‍य शोधार्थी नि‍राश लौटते रहे। रात्रि-भोजन के बाद सूर्यनाथ मुझे रोजाना कमल कम्‍प्लेक्स में पान खिलाने ले जाया करते थे। वहाँ से लौटते हुए रास्ते में वह छात्रा मिल गई। नमस्ते करते हुए उसने समय पर किताब न लौटाने की क्षमायाचना की। मैंने उसे अच्छी-खासी डाँट लगाई। मेरी डाँट का मक्सद क्रूरता नहीं, सिर्फ जिम्मेदारी का बोध कराना था। कि‍न्‍तु पर्याप्त सम्मान भाव रखने के बावजूद आगे बढ़ने पर खीज भरी ध्‍वनि‍ में सूर्यनाथ ने कहा -- 'इस तरह कि‍सी लड़की को डाँटा जाता है! आपसे कभी कोई लड़की प्यार नहीं कर सकेगी!'‍ मैंने उनकी राय का खण्‍डन न तब कि‍या, न आज करता हूँ। मुझे यकीन है कि‍ स्‍त्री हो या पुरुष, वंचनापूर्ण संवाद पसन्‍द करनेवाला कोई भी प्राणी, मुझसे प्‍यार नहीं कर सकता। एकार्थक निर्णयात्मकता पसन्‍द करनेवाला मुझ जैसे मनुष्‍य से दुनिया का कोई भी प्राणी प्यार नहीं कर सकता।...न करे, मेरा स्‍वभाव तो नहीं बदलेगा। जमाने के पाखण्‍डों से लड़कर मनुष्‍य प्‍यार करता है, दोस्‍ती करता है, फि‍र उसी प्‍यार और उसी दोस्ती में वंचनापूर्ण संवाद!

गत सप्‍ताह सूर्यनाथ ने बड़ी आत्‍मीयता से पूछा, 'जो व्यक्ति केवल अपनी प्रशंसा ही सुनना चाहता है, उसके सामने आप उसका सच कहकर, उसे अपना शत्रु बनाने में आपकी इतनी दि‍लचस्‍पी क्यों रहती है?...सूर्यनाथ के तात्‍पर्य पर मैंने गौर कि‍या, और समझा कि मनुष्‍य को मात्र‍ 'प्रि‍य सत्‍य' ही बोलना चाहि‍ए, 'अप्रि‍य सत्‍य' नहीं; जबकि‍ 'प्रि‍य सत्‍य' जैसी कोई घटना अब इस देश में होती नहीं। 'प्रि‍य सत्‍य' वस्‍तुत: 'असत्‍य' की परि‍भाषा है। 'अप्रि‍य सत्‍य' नहीं बोलने का ध्‍वन्‍यार्थ है 'असत्‍य' बोलना। मैं समझता हूँ कि‍ 'सच' कितना भी अप्रिय हो, यदि‍ वह प्रकृति‍ प्रदत्त नहीं है, तो उसे बोलने में संकोच नहीं करना चाहि‍ए। 'अप्रि‍य सत्‍य' बोलने से खुद को बरजकर, 'प्रि‍य असत्य' बोलकर लोगों को प्रसन्न करने की 'होशि‍यारी' आत्‍मवंचना है। प्रशंसक बनाने की लालसा में झूठ बोलना, 'अप्रिय सत्य' बोलने से स्वयं को बचाना, नि‍स्‍सन्‍देह वंचकों का काम है, साहि‍त्‍यि‍कों का नहीं। मुझे इस बात का कोई दुख नहीं है कि‍ 'सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी।' सचमुच, मैंने बहुत कुछ सीखा, बस एक 'होशि‍यारी' नहीं सीखी।

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