Monday, June 8, 2026

विद्यापति सम्बन्धी शोध की दशा-दुर्दशा The plight or comfort of research on Vidyapati

 

विद्यापति स्थान के गह्वर में पूजित मूर्तयाँ

विद्यापति सम्बन्धी शोध की दशा-दुर्दशा

The plight or comfort of research on Vidyapati

नीति-विवेक-शास्त्र-शासनादि के प्रेरणास्पद रचनाकार विद्यापति, संगीतशास्त्र के आचार्य थे या नहीं, इस विषय पर विचार करना प्रायः अन्धेरे में तीर चलाने जैसा है! क्योंकि उन्हें किस शास्त्र में आचार्यत्व था, किसमें नहीं, इसका एक मात्र साक्ष्य उनकी रचना ही है। यकीनन परवर्तीकाल के कुछेक नैष्ठिक प्रवक्ताओं का वक्तव्य भी महत्त्वपूर्ण है। इस प्रसंग में एक श्लोक (रागतरंगिणी) का उल्लेख करते हुए, कई विद्वानों ने आधे-अधूरे, उल्टे-सीधे अर्थ किए हैं। ‘विद्यापतिक प्रसंग किछु विचारणीय प्रश्न’ शीर्षक अपने आलेख में प्राचीन साहित्य के गहन अध्येता गोविन्द झा ने इसका समीचीन अर्थान्वेष किया है[1]--

सुमतिसुतोदयजन्मा जयतः शिवसिंहदेवेन।

पण्डितवरकविशेखर विद्यापतये तु संन्यस्तः॥

एतैः संगीतविद्भिः स्वरनिकरसरित्कान्तमन्तर्विगाह्य

प्रोन्मीलत्सुस्वरौघप्रविततगतिकाः कल्पिताः केऽपि रागाः॥

तद्यानार्थन्तु विद्यापतिकविकृतिना कल्पितास्तु धुवा याः

तासामेकाग्रगाताऽभवदिह जयतः संसदि श्रीनृपस्य॥

सुमति के पुत्र उदय से जन्मे जयत (सुमति के पौत्र) को राजा शिवसिंह ने पण्डितप्रवर कविशेखर विद्यापति के साथ नियोजित कर दिया। इन संगीतज्ञों (सुमति, उदय और जयत) ने स्वर-सागर में डुबकी लगाकर अनेक रागों की कल्पना की। इन रागों के अभ्यास के लिए इनलोगों को उपयुक्त गीतों का प्रयोजन था। एतदर्थ कृती कवि विद्यापति द्वारा रचे गीतों का गायन ये संगीतज्ञ राजसभा में करते थे। इन संगीतज्ञों में जयत, शिवसिंह की राजसभा में प्रमुख गायक सिद्ध हुए।

इसलिए भावकों, गायकों, अनुशीलकों के लिए ध्यातव्य है कि विद्यापति के पदों के गायन-मनन-अनुशीलन के लिए सहज सांगीतिक चित्त प्रयोजनीय है। सांगीतिक स्वभाव पाए बिना इनके पदों पर हाथ या रसना फेरना उचित नहीं। सांगीतिक मर्मज्ञता का अपरिहार्य प्रयोजन, ऐसे पदों की रचना के लिए तो है ही; गायन, आस्वादन, अनुशीलन के लिए भी है। क्योंकि इसके सांगीतिक संस्कार के स्थापत्य में विद्यापति की स्वयंसिद्धि के साथ-साथ उक्त संगीशास्त्रियों की भी भूमिका है। इनकी लय-सिद्धि अत्यन्त सुगढ़ है। गायकों, भावकों, अनुशीलकों को पदों में कहीं कुछ छन्द-भंग जैसा भान हो तो, ध्वनि के आगम, वर्णों के अनुशासनादि से काम लें! इससे उनकी दुविधा दूर हो जाएगी। अपनी सांगीतिक दुर्बलता के कारण, विद्यापति के पदों में शब्दों-पदों का हेर-फेर करने का पाप न करें।

उक्त श्लोक का अर्थान्वेष करते हुए शशिनाथ झा ने प्रसिद्ध संगीतज्ञ सुमति के अगले वंशजों का भी उल्लेख किया है--जयत के पुत्र महागायक कृष्ण, उनके पुत्र हरिहर मल्लिक, उनके तीन पुत्रों--खड्ग राम, घनश्याम, बल्लीराम में केवल घनश्याम ही संगीतज्ञ हुए। घनश्याम के तीन पुत्र--लच्छिराम, राघवराम, टीकाराम...कविवर लोचन के समकालीन थे। ‘रागतरंगिणी’ का निर्माण इसी संगीत-परम्परा के अनुसार हुआ[2]

विद्यापति का एक पद है--

बाजत द्रिगि द्रिगि धोद्रिम द्रिमिञा

नटति कलावति माति स्याम संग करे करु ताल प्रबन्धक धनिञा॥

डम डम डम्फ द्रिमिकि द्रिमि मादल रुनु झुनु मञ्जिर बोल।

किङ्किनि रन रनि बलया कन कनि निधुबने रास तुमुल उतरोल॥

बीन रवाब मुरज सरमण्डल स रि ग म प ध नि स बहुविधि भाव।

घेटिता घेटिता घेनि मृदङ्ग धुनि चञ्चल सरमण्डल एक राव॥

स्रम भरे गलित लुलित कबरी युत मालति माल बिथारल मोति।

समय वसन्त रास रस वर्णने विद्यापति मति छोभित होति॥

--विद्यापति पदावली, पद-129; वैष्णव पद सं. 77; प.क. पद सं. 1502

ढोल-मृदंग के बोल ‘द्रिगि-द्रिगि’, ‘धो-द्रिमि-द्रिमिञा’ निनादित हैं। कलावती नर्तकियाँ श्रीकृष्ण के साथ नाचने में तल्लीन हैं। रास रचानेवाली ताल-प्रबन्धक सुन्दरी हाथों से ताल दे रही हैं। डफली से ‘डम-डम’, मादल से ‘द्रिमिकि द्रिमि’ और घुँघरू से ‘रुनु-झुनु’ की ध्वनियाँ आ रही हैं। करधनी से ‘रन-रन’, कंगन से ‘कन-कन’ की ध्वनि निकल रही है। आमोद-प्रमोद (निधुवन) के कारण रास में खूब शोरगुल हो रहा है। बीन, सारंगी, पखावज सहित स्वरमण्डल से विभिन्न प्रकार के वाद्यों से षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद स्वर निकल रहे हैं। मृदंग से ‘घेटिता-घेटिता-घेनि’ की ध्वनि हो रही है। सातो चंचल स्वर मिलकर एक ही सुर गुंजार कर रहे हैं। श्रम-भार के कारण खुली हुई हिलती-डुलती चोटी में गुँथी मालती की माला में गुँथे मोती बिखर गए हैं। वसन्त ऋतु के इस सरस रास-वर्णन में विद्यापति की बुद्धि भी चकित हो रही है।

रास-वर्णन जैसी प्रतीति के कारण, इसके विद्यापति के पद होने पर गोविन्द झा को सन्देह है। क्योंकि यह पद प्राचीन किसी स्रोत में नहीं है, इसका स्रोत बंगीय पदावली है।

प्राचीन स्रोतों से प्राप्त विद्यापति के छहेक सौ पदों में गोविन्द झा को ‘श्याम’ शब्द और ‘रास’ का वर्णन कहीं नहीं दिखा[3]। बंगाल से प्राप्त पद के बीच शशिनाथ झा ने इसे पदावली के तीसरे खण्ड में समाविष्ट किया, पर नगेन्द्रनाथ गुप्त और विमानबिहारी मजुमदार ने अपने संकलन में स्थान नहीं दिया। गुप्त और मजुमदार ने संज्ञान नहीं लिया, यह कोई उतनी बड़ी बात नहीं है, पर गोविन्द झा का सन्देह महत्त्वपूर्ण है, इस पर गहन शोध अपेक्षित है।

विद्यापति के पिता के आराध्य कपिलेश्वर महादेव स्थान में घूमते देवशंकर नपीन

उल्लेख प्रासंगिक हो कि विद्यापति की झाल बजानेवाले अधिकांश लोग अध्यवसायी नहीं हैं, वे सुनी-सुनाई बातों के सहारे कूद-फाँद करते हैं। उन्हें वस्तुनिष्ठता से कोई लेना-देना नहीं है। स्वातन्त्रयोत्तर -कालीन भारत में यकीनन कुमार गंगानन्द सिंह, सुभद्र झा, शशिनाथ झा, गोविन्द झा जैसे गम्भीर अध्येता हुए, पर सांगठनिक चतुराई के कारण अपढ़ों की एक बड़ी टोली, अवसर देखकर संस्कृति-रक्षक हो गई; जिन्हें इतनी भी जानकारी नहीं कि राष्ट्र-राज-जन के हित और धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए विद्यापति ने पूरे जीवन घोर तनाव झेला। उन्हें मालूम होना चाहिए कि विद्यापति के पद-संचय के लिए चार ही प्राचीन स्रोत प्रामाणिक हैं--नेपाल पदावली (262 पद), रामभद्रपुर पदावली (95 पद), तरौनी पदावली (260 पद), रागतरंगिणी (51 पद)। इनसे परीक्षित होने पर ही कोई संकलन या पद प्रामाणिक माना जाएगा।

सन् 1941 में प्रकाशित शिवनन्दन ठाकुर की ‘विद्यापति विशुद्ध पदावली’ रामभद्रपुर पदावली का ही सम्पादित रूप है, जिसमें 86 पद हैं। सुभद्र झा द्वारा सम्पादित ‘विद्यापति गीत संग्रह’ या ‘द सौंग्स ऑफ विद्यापति’, नेपाल पदावली का ही सम्पादित रूप है, जिसमें 262 विद्यापति के, 15 अन्य कवियों के और 11 अपूर्ण पद संकलित हैं। ग्रियर्सन द्वारा लोक-कण्ठ से संकलित 82 पदों के संग्रह को भी केवल इसलिए प्रामाणिक माना गया कि उसके अनेक पद इन प्राचीन स्रोतों में उपलब्ध हैं। इन स्रोतों से प्राप्त पदों का योगफल 750 के आसपास है। संकलनों में अनेक पदों के दोहराव, तिहराव के कारण यह संख्या कम हो जाएगी। तीनो प्राचीन पाण्डुलिपियों में भणितायुक्त पद 353 (क्रमशः 64+63+226) ही हैं। भणिताविहीन पदों की संख्या 81 (क्रमशः 15+32+34) है, कुछ लोगों ने इनमें से सभी को, कुछ लोगों ने कुछ को अपने-अपने विवेक से विद्यापति की रचना मानकर अपने संकलन में समाविष्ट किया। नेपाल पदावली में 182 पदों में अपूर्ण भणिता (भनइ विद्यापतीत्यादि या विद्यापतीत्यादि) है।

वस्तुनिष्ठता के आधार पर, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से शशिनाथ झा के सम्पादन में तीन खण्डों में प्रकाशित ‘विद्यापति पदावली’ अब तक सर्वाधिक प्रामाणिक संकलन है। 

विद्यापति स्थान विस्फी में उनकी प्रतिमा के पास अजित आजाद के साथ देवशंकर नवीन
 इसमें सम्पादक मण्डल ने प्रभूत श्रम से सारे स्रोतों का अनुशीलन करते हुए, व्यवस्थित तर्क के साथ एक-एक पद समाविष्ट किया है। उन्होंने पदों का समावेशन स्रोत के आधार पर किया है, एक स्रोत से प्राप्त पद एक जगह। इस कारण पदों का विषयगत या भावगत अनुशीलन करने के लिए अनुशीलनकर्ता को श्रम करना होगा। तीनो खण्डों को मिलाकर कुल 989 (288+387+314) पद संकलित हैं। इनमें अनेक पदों की आवृत्ति दूसरे, तीसरे खण्डों में हुई। शशिनाथ झा के सम्पादकीय शोध से परीक्षित पदों की संख्या 831 (262+95 +51+230+184+9) है--पहले खण्ड में नेपाल पदावली के कुल 288 पदों में से 262 भणितायुक्त, 11 भणिताविहीन, 15 अन्य के; दूसरे खण्ड के 387 पदों में रामभद्रपुर पदावली के 95 पद विद्यापति के, 3 अन्य के; रागतरंगिणी के 51; तरौनी पदावली के 230 पद विद्यापति के, 8 अन्य के; तीसरे खण्ड के 314 पदों में बंगाल से उपलब्ध 184 पद प्रामाणिक, 113 अप्रामाणिक; विद्यापति नामांकित 9 बांग्ला पद, 8 अन्य के।

संख्यात्मक रूप से महेन्द्रनाथ दूबे द्वारा सभी स्रोतों से संकलित ‘गीतविद्यापति’ में 891 पद हैं। दूबे का नैष्ठिक शोध श्रम भी सराहणीय है, पर प्रामाणिकता से सन्दर्भित प्रसंगों पर इन्होंने कोई गम्भीर चिन्तन नहीं किया है। यद्यपि इस संकलन में पदों का विषयगत समायोजन, श्रमलाघवप्रेमी भावकों के लिए सुखदायी है। नगेन्द्रनाथ गुप्त संस्करण ‘विद्यापति ठाकुरेर पदावली’ में 935, मित्र-मजुमदार के संस्करण ‘विद्यापतिर पदावली’ में 933, गोविन्द झा द्वारा संकलित ‘विद्यापति गीतावली’ में 710 पद हैं।

विद्यापति की पाण्डुलिपि के बीच मिलने के कारण, भणिताविहीन पदों को विद्यापति की रचना माननेवाले संकलक वस्तुतः प्रतिलिपिकारों की अकर्मण्यता और दायित्वहीनता के शिकार हुए हैं। प्रतिलिपि बनाते समय उन्होंने भणिताविहीन पदों की लिखावट अन्य पृष्ठों से मिलाकर सुनिश्चित कर लेने की मामूली-सी सावधानी बरती होती कि ऐसी हस्तलिपि और किनकी है? वहाँ समुचित टिप्पणी देने की बौद्धिकता दिखाई होती, तो आज के शोधवेत्ताओं के समक्ष कोई दुविधा न आती! अपनी श्रमलाघव-वृत्ति के कारण उन्होंने परवर्ती शोधवेत्ताओं के लिए जितनी बड़ी विपत्ति खड़ी कर दी, उसका अनुमान उन्हें सपने में भी न हुआ होगा! अब तो अकर्मण्यों के भूसे कूटने के अलावा कोई विकल्प नहीं है!

उल्लेख हो चुका है कि पद-परीक्षण के लिए नगेन्द्रनाथ गुप्त ने अपने मन के अलावा किसी भी शक्ति को दिग्दर्शक नहीं माना। पर, विमान बिहारी मजुमदार ने पदों की प्रामाणिकता के परीक्षण-विवेचन का आधार गीतों में कवि और आश्रयदाता--दोनो का उल्लेख आवश्यक माना। यह कसौटी महनीय अवश्य रही होगी, पर पर्याप्त नहीं! क्योंकि, विद्यापति के अनेक ऐसे पद भी हैं, जिनकी भणिता में केवल कवि के ही नाम हैं, किसी आश्रयदाता के नाम नहीं हैं। दूसरी बात यह कि अप्रामाणिक गीतों में बहुप्रचलित विरुद्-भणिता ‘भनइ विद्यापति’ और ‘राजा सिबसिंह रूपनराएन’ जोड़ना कोई असाध्य कार्य नहीं है। उपद्रवियों को ऐसा करने में कोई संकोच या अतिरिक्त श्रमबोध नहीं हुआ होगा। इससे अधिक प्रभावी कसौटी भाव और भाषा की हो सकती थी। गोविन्द झा ने सही कहा कि भणिता में उलट-फेर आसान है, भाव एवं भाषा में असम्भव। प्रामाणिकता के विवेचन के लिए क्रमशः स्रोत की प्राचीनता, भाषा, भाव और भणिता पर विचार होना चाहिए। नेपाल तालपत्र के प्रतिलिपिकार तो ‘भनइ विद्यापतीत्यादि’ या ‘इति विद्यापतेः’ लिखकर पूरे के पूरे भणिता ही खा गए। ऐसा अपराध नेपाल तालपत्र के 178 पदों में किया गया है[4]

ध्यातव्य हो कि गोविन्द झा ने प्रामाणिकता की पहली कसौटी स्रोत की प्राचीनता को माना! अर्थात्, जो पद नेपाल पदावली, रामभद्रपुर पदावली, तरौनी पदावली और रागतरंगिणी में नहीं है, उसकी प्रामाणिकता परीक्षणीय है। यह शर्त नितान्त अनुकरणीय है। इससे भी बात न बने, तो पद की भाषा, भाव, भणिता की ओर रुख करें!

गणपति ठाकुर के अराध्य कपिलेश्वर स्थान में देवशंकर नवीन

 उल्लेख हो चुका है कि विद्यापति, केवल शिवसिंह-सखा, ओइनवार राजपण्डित और कवि-चिन्तक ही नहीं, मानव सभ्यता के लिए वरदान थे, कालिदास की तरह! जिनके सृजनात्मक अवदानों के निर्देशन में आज का समाज भी व्यवस्थित जीवन-क्रिया का दिग्दर्शन पा रहा है। राष्ट्र-राज-समाज-मानवीयता के हित में जितने विलक्षण सूत्र विद्यापति के यहाँ हैं, वे जनसामान्य के साथ-साथ आज के लेखक, चिन्तक, शिक्षक, उपदेशक, शासक, शासित...सबके लिए प्रेरणास्पद हैं। आधुनिक समाज के जीवन और व्यवस्था की जटिलतओं का विलक्षण समाहर उनकी रचनाओं में कोई भी सुबुद्ध ढूँढ सकता है। कूटनीतिक सम्बन्ध से लेकर युद्ध-नीति और युद्धोत्तर आर्थिक नीति तक। ऐसे विद्यापति को मैथिली-हिन्दी के लोग आज भी किंवदन्ती के नायक रूप में पहचानते हैं! दुखद है कि उनका मूल्यांकन उनकी रचनाओं की कसौटी से न कर, प्रवादों के चर्चित कथा-प्रसंगों से करते हैं। मैथिलों ने जिस तरह उन्हें अपनी पहचान का संकेतक बना लिया, सौभाग्य की बात होती, यदि उनकी वस्तुनिष्ठता समझकर बनाया होता! पर, वे तो दन्तकथा की वाहियात कथाओं से बाहर ही नहीं आना चाहते!

सच है कि बंगीय उपद्रवों से खिन्न, राजकृष्ण मुखोपाध्याय, जॉन बीम्स, जॉर्ज ग्रियर्सन, चन्दा झा, हरप्रसाद शास्त्री, शारदाचरण मित्र, नगेन्द्रनाथ गुप्त, शिवनन्दन ठाकुर, खगेन्द्रनाथ मित्र, विमानबिहारी मजुमदार से शुरू होकर शशिनाथ झा, गोविन्द झा तक के सकारात्मक प्रयासों में विद्यापति सम्बन्धी शोध-कार्य में गति आई। जिसे आगे बढ़ाने का दायित्व हर परवर्ती नागरिक का था, पर ये तो इनके ही पैरों में चट्टान बाँध बैठे! विद्यापति जैसे अपूर्व धरोहर के पोषण के बजाय दोहन करने लगे! कभी बाहर ही नहीं निकले! क्योंकि पोषण श्रमसाध्य कार्य है; दोहन के लिए तो चतुराई और उग्रता भर यथेष्ट है!

शोध और तथ्यान्वेषण से इनका ऐसा द्रोह है कि कोई शोधवेत्ता कुछ नई निष्पत्ति दे तो, ये आक्रामक हो उठते हैं। विचार से इन्हें परहेज है, ये अपनी सुविधानुसार अफवाह को सच मान लेते हैं और निर्णय देते हैं कि उन्होंने जिसका वरण किया है, उसे सब सच माने, उस पर तर्क न करे। तर्क करनेवाले अपमानित होंगे, उनका छवि-ध्वंस होगा, वध भी सम्भव है।...पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी तक का इतिहास साक्षी है कि मैथिल जनपद, दुनिया भर के लोगों को तर्क करना सिखाता था, न्याय-दर्शन पढ़ाता था, अब वहाँ तर्क नहीं होता। दुखद है कि न्याय वैशेषिक के उद्गाताओं के ऐसे वंशज हुए, जिनके जीवन में तर्क का प्रतिपक्ष तर्क नहीं, कुल्हाड़ी या फरसा या छवि-ध्वंस है। उनकी बात न माननेवालों का वे वध कर देंगे!

वस्तुतः देश के अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में फासीवाद तो इधर के दशक में आया, मिथिला क्षेत्र के अवचेतन में बहुत पहले आ गया था। अज्ञतावश वे स्वयं किसी मूढ़-मुग्ध के पिछलगुवे बन जाएँ, अब आप उनके पिछलगुवे न बनें, तो वे परशुराम का फरसा उठाकर आपको निस्पन्द कर देंगे! परशुराम को तो फिर भी फरसा चला देने के बाद पश्चाताप हुआ, वे प्रायश्चित करने चले गए। मैथिलों को तो कोई पश्चाताप भी नहीं होता, कोई पूर्वपक्ष हो तब तो पश्चाताप हो!...

इस फासीवादी वर्चस्व के आतंक में अब भाषा-संस्कृति सम्बन्धी तार्किक-बौद्धिक बात करनेवाले दुबकने लगे हैं। खिलाड़ियों की तस्करी ने इस खेल को सामुदायिक आस्था का प्रतीक बना दिया है। सामूहिक जीवन में इसकी जड़ें गहरे पैठ गई हैं। बात-बेबात सामुदायिक उन्माद फैलाना इनके बाएँ-दाएँ हाथ का खेल है। वे जानते हैं कि समुदाय को उन्हीं की तरह शास्त्र से कोई लेना-देना नहीं होता, वे ‘घोषित शास्त्रकारों’ (?) की बात समझते हैं। उन्हें विद्यापति की भाषा का ज्ञान हो भी क्यों? उनके लिए तो उद्घोषकों के अनुदेश ही वेदवाक्य हैं! वे इन्हें अपनी भक्ति और शक्ति का स्रोत मानते हैं! इनका अनुगमन मनसा-वाचा-कर्मना करते हैं। विद्यापति की भाषा, भाव और अर्थान्वेष से उन्हें क्या मतलब?...

विद्यापति स्थान विस्फी के तल-गह्वर में प्राचीन मूर्ति देखते देवशंकर नवीन 

 जनास्था की इसी ताकत के बूते वे उन्मत्त रहते हैं। गहन शोध के साथ कोई स-तर्क वक्तव्य दे दे, और वह वक्तव्य इनकी मान्यता के समर्थन में न हो, तो ये उनके सिर आतंक की घटा घहरा दें। जैसे मण्डन-शंकर शास्त्रार्थ की कथा को झूठ कहनेवालों पर, शृंगेरी मठ के अनुदान से चूल्हा-चक्की चलानेवालों ने कर रखा है। उन्होंने मण्डन मिश्र के किसी भी ग्रन्थ का कभी अवगाहन नहीं किया, सिर्फ दन्तकथाएँ सुनीं। पर वे आक्रामक होंगे! ...जैसे भामती की दन्तकथा के परिपोषकों ने ‘भामती टीका’ ग्रन्थ छूआ तक नहीं, पर उन सबको नामालूम स्रोतों से दिव्यज्ञान हो गया कि ‘भामती’ वाचस्पति मिश्र की पत्नी का नाम था और वाचस्पति मिश्र ने उनकी जीवन भर घनघोर उपेक्षा की। अचानक से स्त्रीवादी हो गए इन पामरों को स्त्री-विमर्श का कुशाग्र भर ज्ञान नहीं होता, पर कोई वस्तुनिष्ठ शोध सम्मत बात करते हुए कह दे, कि ‘भामती टीका’ से वाचस्पति मिश्र की पत्नी का कोई सरोकार नहीं है। उनकी पत्नी का नाम ‘भामती’ नहीं था। यह दन्तकथा झूठी है, अकल्पनीय है, युक्तिहीन है, तो उन अध्येताओं की खैर नहीं; ये उन्हें फटाफट स्त्रीविरोधी घोषित कर निस्पन्द करने के इन्तजाम में लग जाते हैं।

वस्तुतः संविधान की आठवीं अनुसूची में मैथिली के समावेशन के बाद से उद्यमियों को दिव्यज्ञान हुआ कि मैथिली अब कामधेनु हो गई। गायकों-भावकों-आयोजकों के त्रिक ने साँठ-गाँठ के बूते दाता अभिकरणों की दृष्टि में ‘जय जय भैरवि’ को अपना सांस्कृतिक प्रतीक घोषित कर दिया, व्यक्ति और संस्था--इसे नारा बना बैठी। धन्धा कायम रखने के लिए यह अनिवार्य था। सामुदायिक मूढ़ता (मुग्धता) को इस तरह अपने पक्ष में भुनानेवाले ऐसे चतुरों से कोई अध्येता कैसे मुठभेड़ करे? अध्येता का अस्त्र उसका तर्क है, जिससे खड्गहस्त प्रहारक को परिचय ही नहीं होता! इन भक्तों से पूछने तक का साहस नहीं होता कि जनश्रुतियों के अलावा आप विद्यापति के बारे में क्या जानते हैं?

उल्लेख हो चुका है कि गुप्त-संस्करण (सन् 1910), जो उसी वर्ष ‘विद्यापति ठाकुर की पद्यावली’ शीर्षक से 478 पृष्ठों में दरभंगा-नरेश रामेश्वरसिंह के खर्च से इण्डियन प्रेस प्रयाग से देवनागारी लिपि में भी मुद्रित हुई; के प्रथम अंश में 841 पद, बाद के हरगौरी पदावली में 44, गंगा गीत में 3, नानाविषयक पदावली में 13, परकीया नायिका में 15, प्रहेलिका में 20 पद हैं। scribd.com/doc/305354084 वेबसाइट पर इसकी पीडीएफ प्रति उपलब्ध है; उसके 935 पदों में से विमान विहारी मजुमदार ने मात्र 732 को ही प्रामाणिक माना और 201 नए पद जोड़कर 933 पदों का संकलन ‘विद्यापतिर पदावली’ बनाया। शशिनाथ झा के सम्पादन में पुनरावृत्ति सहित 831 पद हैं, जबकि गोविन्द झा द्वारा संकलित ‘विद्यापति गीतावली’ में 710 पद।...

अब जिज्ञासा तो उचित है कि किस सम्पादक का संकलन प्रामाणिक है?...यकीनन शशिनाथ झा का! इससे आगे किसी शोध में बेहतर विकल्प सामने आए, तो विचार किया जाएगा, विचार किया जाना चाहिए! प्राचीन साहित्य एवं पाण्डुलिपि विशेषज्ञ गोविन्द झा ने इस पर विचार किया और सन् 2006 में मोहन भारद्वाज, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और ‘समय-साल’ पत्रिका के सम्पादक शरदिन्दु चौधरी से एक अनौपचारिक वार्ता में तर्कपूर्वक कहा कि मिथिला में राष्ट्रगीत की तरह लोकप्रिय गीत ‘जय-जय भैरवि’ विद्यापति की नहीं, किसी और की रचना प्रतीत होती है; इसकी जाँच वैज्ञानिक विधि से होनी चाहिए। ‘समय-साल’ (अक्टू.-नव., 2006, पृ. 35) पत्रिका में इस टिप्पणी के छपते ही हंगामा मच गया। ‘भक्त’(?) मैथिल उनके साथ शत्रु-देश से आए आतंकवादी जैसा व्यवहार करने लगे! जबकि उन्होंने इशारा भी किया कि इस कार्य की वैज्ञानिक विधि का विधिवत ज्ञान विशेषज्ञों के पास होता है। वे शब्दों की सूची तैयारकर उसकी युक्तियों में विसंगति का अनुशीलन करते हैं।...इस पंक्ति में व्यक्त गोविन्द झा की चिन्ता से किसी ने साहचर्य बनाया होता, तो आज विद्यापति के पाठ-सम्मत शोध की स्थिति कुछ और होती। पर कृपाण-हस्त छवि-ध्वंसकों ने उन पर प्रहार शुरू कर दिया! उद्यमी संस्थाओं और विद्वानों ने निन्दा-प्रस्ताव पारित कर उन्हें अपमानित करने में कोई संकोच नहीं किया।

व्यथित गोविन्द झा ने सन् 2010 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘अनुचिन्तन’ में द्रवित हृदय से उनके इस आचरण पर दुख प्रकट किया[5] कि निन्दा-प्रस्ताव पारित करने या उन्हें अपमानित करने में अग्रसर होने से पूर्व किसी ने उनसे कोई स्पष्टीकरण नहीं माँगा।

...यह कोई मामूली घटना नहीं हुई, प्रकटतः चेतावनी दी गई कि आगे के दिनों में किसी ने भी पढ़ने-लिखने जैसी कोई बात की; जो ‘वे’ मानते हैं, उसी को वेदवाक्य नहीं माना, तो उनकी दशा भी ऐसी ही होगी!...

कपिलेश्वर स्थान मन्दिर का प्रवेश द्वार

...हो जाए, पर मैं मानता हूँ कि मुझसे बड़ा विद्यापति-भक्त अभी संसार में कोई नहीं हैं; जो थे, वे दिवंगत हो गए! मैं यह भी मानता हूँ, और सत्य ही मानता हूँ, कि बाप की झाल बजाने से पहले बाप को जानना जरूरी होता है। विद्यापति को यदि कोई बाप मानते हैं, तो वे बताएँ कि वे अपने बाप को कितना जानते हैं?...विद्यापति सम्बन्धी गोविन्द झा की ढेर सारी स्थापनाओं से मुझे असहमति है, उनकी मान्यताओं का खण्डन भी किया है; पर मैं आश्वस्त हूँ कि गोविन्द झा विद्यापति को जानते थे। उनकी जिस बात के लिए असहमति हो, तर्क किया जा सकता है। ‘जय जय भैरवि’ गीत यदि उन्हें उस विद्यापति का नहीं लगता, जिनकी हम पूजा करते हैं; तो उनके मत के खण्डन के लिए कोई वस्तुनिष्ठ तर्क दे! है किन्हीं के पास तर्क?...उनकी इस राय से मैं शतसः सहमत हूँ, और इसके लिए हमारे पास तर्क है, कुछेक शोध सन्दर्भ गोविन्द झा ने भी जुटाए हैं।

मैथिलों द्वारा गौरवान्वित यह गीत, नेपाल पदावली, रामभद्रपुर पदावली, रागतरंगिणी, तरौनी पदावली...किसी भी प्राचीन हस्तलेख में नहीं है। जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन, शिवनन्दन ठाकुर, सुभद्र झा, शशिनाथ झा, भोल झा, अणिमा सिंह द्वारा संकलित किसी भी संकलन में नहीं है। गोविन्द झा जैसे प्राचीन साहित्य के विशेषज्ञ ने इसका मूल स्रोत ढूँढते हुए सन् 1880 तक के लिखित स्रोतों का इतिहास खँगाल डाला; पर उन्हें मिले सात-आठ सौ गीतों में यह गीत नहीं मिला।[6] भारतीय स्वाधीनता के दसेक वर्ष बाद तक यह गीत लोक-कण्ठ में भी अंकुरित नहीं हुआ था। गोविन्द झा के इस दावे का समर्थन हर सुजान करेगा कि अतीत के ढेर में दबे इस गीत का उत्खनन और चलन, बीते सात दशकों में ही हुआ है, जब मैथिली के उत्थान और विद्यापति की स्मृति के बहाने शहर-शहर में समारोह मनाए जाने लगे।[7] विद्यापति-स्मृति-पर्व की उत्थापक संस्था के कोई अतिप्रतिभाशाली  सदस्य निश्चय ही बेनीपुरी-भक्त रहे होंगे, जिनके हाथ उनका संकलन लग गया होगा, और उन्होंने इस गीत का चयन प्रार्थना के लिए कर लिया होगा! शेष ने मान लिया होगा! क्योंकि ललितेश्वर सिंह सम्पादित ‘मैथिल भक्तप्रकाश’ तो किसी ने शायद ही देखी हो!

मैथिलीभाषियों को प्रायः स्मरण नहीं है कि भाषा के आखेटक बीसवीं शताब्दी के आरम्भ-काल से ही मैथिली को निगल लेने के तिकड़म गढ़ रहे हैं। वे विद्यापति के रचना-संसार को इतना अतार्किक बना देना चाह रहे हैं कि दावा कर सकें कि मैथिली के सिरमौर विद्यापति की भाषा और भाव में कोई तार्किकता नहीं है। उद्यमी-जन चाहें तो बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से ‘अंगिका भाषा और साहित्य’ (माहेश्वरी सिंह महेश, सन् 1959) तथा ‘बज्जिका भाषा और साहित्य’ (सियाराम तिवारी, सन् 1964) छपवाने की पृष्ठभूमि का अवलोकन कर लें।...वे समझना नहीं चाहते कि अत्युत्साही लोग नामालूम स्रोतों से अनाप-शनाप पद्य जुटाकर विद्यापति के सरोबर को दूषित करना चाह रहे हैं। वाहियात पदों की कोलाहल जैसी ख्याति मचाकर, उन्होंने इसे सामुदायिक जीवन की भक्ति और संवेदनाओं से जोड़ दिया है। दुखद है कि विद्यापति के सम्बन्ध में कोई तार्किक बात उन्हें समझ नहीं आती! जिन पदों की प्रामाणिकता प्राचीन स्रोतों से परीक्षित नहीं होती, जिनमें विद्यापति-रचित न होने के यथेष्ट तर्क होते हैं, उसे वे उन्हीं का क्यों मानते हैं? एक गलती तो करते ही आ रहे हैं, अब दूसरी गलती दूसरों से करवाने पर क्यों तुले हुए हैं? समझना कठिन है कि ये विद्यापति के भक्त हैं या तस्कर? तनिक-से सन्देह पर मार-पीट करने को आमादा हो जाते हैं! इसे वे अपनी इज्जत क्यों बना बैठे हैं? अब तो डर के मारे कोई शोधवेत्ता कहने का साहस भी नहीं करता। इनका भक्ति-भाव सत्य से ऊपर होता है।

बेनीपुरी द्वारा संकलित ‘विद्यापति पदावली’ (1940) गुप्त सम्पादित ‘विद्यापति ठाकुरेर पदावली’ (1910) का ही संक्षिप्त संस्करण है। यह पद देवनागारी में प्रकाशित बेनीपुरी संस्करण का तीसरा पद है, बांगला में प्रकाशित गुप्त-संस्करण के ‘हरगौरी पदावली’ खण्ड (पृ. 500) का दूसरा और मित्र-मजुमदार संस्करण ‘विद्यापतिर पदावली’ के चतुर्थ भाग का पहला पद (पृ. 477)। गुप्त ने इसे मिथिला से प्राप्त बताया है, मजुमदार ने ‘मिथिलाय लोकमुखे संगृहीत’ कहा है। यह गीत लोक-कण्ठ में बसा होता तो आगे के साढ़े चार दशकों तक वहाँ से विलुप्त नहीं होता!...उल्लेख हो चुका है कि नगेन्द्रनाथ गुप्त, विद्यापति की रचनाओं की टोह में चन्दा  झा के साथ गाँव-गाँव भ्रमण करते थे; सम्भव है कि हस्तलेखों के बीच उन्हें यह पृष्ठ भी मिला हो, और ‘विद्यापति’ के नामोल्लेख के कारण इसे उन्होंने बिना कुछ सोचे-विचारे अपने संकलन में समाविष्ट कर लिया हो।[8] बाद के दिनों में यह सन् 1953 में मित्र-मजुमदार के बांग्ला संस्करण (पद संख्या 766, पृ.477) में भी समाविष्ट हुआ।

पर गोविन्द झा को इस गीत का प्रथम दर्शन सन् 1918 में मिथिला में प्रकाशित ललितेश्वर सिंह के संकलन ‘मैथिल भक्तप्रकाश’ में हुआ।[9] ललितेश्वर ने भी यह गीत प्रायः गुप्त-संस्करण से ही लिया होगा। परांग्मुख शोध-दृष्टि और उद्देश्यविहीन संकलन-वृत्ति पर चर्चा कर यहाँ भावकों के समय का अपव्यय नहीं किया जाना चाहिए।

किसी भी प्रामाणिक या मैथिल स्रोत में इस गीत का न होना तो सन्देहास्पद है ही, गोविन्द झा का तर्क भी विचारणीय है कि शव पर खड़ी, रक्तपान करती भगवती भैरवि वामाचार तन्त्र की देवी मानी गई हैं। महाकवि विद्यापति ‘शैव-शाक्त-वैष्णव’ थे या नहीं, यह तो विवाद-संवाद का विषय है, पर तान्त्रिक नहीं थे, यह तय है। और, ‘जय जय भैरवि’ गीत कोई तान्त्रिक कवि ही लिख सकते हैं।[10]

गंगानाथ झा रिसर्च इन्स्टिच्यूट, प्रयाग के जर्नल में दीनेशचन्द्र भट्टाचार्य के लेख में विद्यापति ठाकुर रचित ‘आगमद्वैतनिर्णय’ शीर्षक एक हस्तलेख का उल्लेख हुआ है, जिसमें उन्होंने ग्रन्थ के रचयिता को तान्त्रिक सिद्ध किया है। पर ये विद्यापति ठाकुर, महाकवि विद्यापति नहीं हैं। दीनेशचन्द्र भट्टाचार्य की स्थापना को खण्डित करते हुए रमानाथ झा ने उसी जर्नल (खण्ड 6, भाग 3, मई, 1949, पृ. 241) में सिद्ध किया कि इस ग्रन्थ के रचयिता विद्यापति ठाकुर, घुसौत मूल के म.म. गोविन्द ठाकुर के पुत्र, काव्यप्रदीप’ जैसे अनेक ग्रन्थों के प्रणेता, राजा शिवसिंह के सम्बन्धी और महाकवि विद्यापति के समकालीन थे। महाकवि विद्यापति इस ग्रन्थ के रचयिता नहीं थे।[11]

रमानाथ झा के इस आलेख से गोविन्द झा की सुनिश्चिति जायज है कि ‘जय जय भैरवि’ गीत प्रायः उसी विद्यापति ठाकुर का होगा, जो स्वयं तान्त्रिक थे, उनके पिता भी प्रसिद्ध तान्त्रिक थे।[12]

इस गीत के पाठ विश्लेषण की ओर बढ़ने से पूर्व तनिक मैथिल मानस में झाँकना उचित होगा! आत्म-निरीक्षण करते हुए, दुनिया भर के जिज्ञासु लोग टोहते हैं कि वे क्या नहीं जानते? इसके ठीक विपरीत मैथिल-जन टोहते हैं कि वे क्या जानते हैं! इसी क्रम में वे आश्वस्त हो जाते हैं कि उनकी जानकारी से बाहर न कोई ज्ञान है, न ज्ञानी!...किसी शुभ मुहूर्त में किसी ज्ञानसम्भूत व्यक्ति के दिग्दर्शन में मैथिल-जन मिथिला-राज की माँग कर बैठे।...जिन मैथिलों की घरेलू भाषा मैथिली नहीं है, जो प्रति वर्ष मैथिली की एक भी पुस्तक नहीं पढ़ते, उन्हें मिथिला-राज चाहिए!...ऐसे में हुआ यह, कि राजसत्ता मान्यता दे, न दे; मिथिला-राज्य बने, न बने; मैथिलों की एक खास टोली ने नामालूम दार्शनिकों के निर्देशन में मान लिया कि ‘जय जय भैरवि’ गीत उनका राष्ट्रगीत है। पहले यह गीत मंचों पर प्रार्थना की तरह गाया जाता था, अब राष्ट्रगीत की तरह गाया जाता है।

इधर के वर्षों में इसीलिए वे पटु-अपटु-मूढ़-बेसुरे गवैयों द्वारा इस गीत के गायन के समय, सभा में बैठे सभी भावकों को खड़े होने को विवश कर देते हैं? वे इस बात से बेफिक्र हैं कि भारत में किसी भी राज्य का राष्ट्रगीत नहीं होता! किसी दिन मिथिला राज्य बन भी जाए, तब भी यह गीत राष्ट्रगीत नहीं होगा!...वैसे प्रश्न परेशान करनेवाला है कि तन्त्र-साधना की देवी भैरवि की उपासना के लिए तान्त्रिकों की भाषा में लिखे गए इस गीत में ऐसा क्या है कि वे इसे राष्ट्रगीत बनाना चाहते हैं? यह तो क्रूर भाषा-भाव में तन्त्र-साधकों का देवी-आवाहन है! आखिर वे मैथिलों का कैसा समाज चाहते हैं? अब तक उन्हें किसी ने क्यों नहीं बताया कि किसी भी पन्थ विशेष का धार्मिक गीत कहीं का राष्ट्रगीत नहीं हो सकता!...वे क्या चाहते हैं कि मिथिला राज्य में तन्त्रपूजक ब्राह्मण एवं कायस्थ के अलावा अन्य कोई न रहे? अन्य सभी जाति, धर्म, पन्थ के अनुगामी मिथिला से बाहर चले जाएँ? किसी के पास है कोई तर्क? तर्क से पहले इस गीत के अर्थान्वेष पर विचार कर लेते हैं--

जय जय भैरवि असुर भयाउनि पसुपति भामिनि माया।

सहज सुमति बर दिअ हे गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया॥

बासर रैनि सबासन सोभित चरन चन्द्रमनि चूड़ा।

कतओक दैत्य मारि मुँह मेलल कतेक उगिलि करु कूड़ा॥

सामर बरन नयन अनुरंजित जलद जोग फुल कोका।

कट कट विकट ओठ पुट पाँड़रि लिधुर फेन उठ फोका॥

घन घन घनन घुघुर कत बाजए हन हन कर तुअ काता।

विद्यापति कवि तुअ पद सेवक पुत्र बिसरु जनि माता॥

बेनीपुरी, पद 3; मि.म. पद 766; न.गु. (हरगौरी पदा.) पद 2

हे भैरवि! आपकी जय हो! आप असुरों के लिए भयकारी हैं। आप पशुपति शिव की कल्पना हैं, माया हैं, स्त्री सौन्दर्य के प्रतीक (भामिनि) हैं। आप हमें सहज सुमति का वरदान दें! आपके गत्यात्मक पैरों (पाया) में अनुगमन की छाया है। आप रात-दिन शवासन धारण करनेवाली हैं! आपके पैरों में चन्द्रकान्ता मणि आभूषित है। आपने न जाने कितने दैत्यों को मारकर मुँह में डाल लिया, कितनों को मुँह से उगलकर कुल्ला कर दिया! आपके श्यामल वर्ण मुखमण्डल में अनुरंजित आँखें प्रतीत होती हैं जैसे बादल में कमल खिल उठे हों! विकटता से दाँत किटकिटाते हुए, आपके होठों पर सफेद (पाँड़रि) झाग उठ रहे हैं, उस पर रक्तिम बुलबुले उठ रहे हैं। असंख्य घुँघरुओं के घन-घन-घनन की ध्वनि की तरह आपके तेज तीक्ष्ण खड्ग (काता) चलने की हन-हन की ध्वनि गुँजायमान है। आपके चरणों के सेवक विद्यापति कवि विनती करते हैं कि हे माते! अपने पुत्र को विस्मृत न करें!

गुप्त-संस्करण, मित्र-मजुमदार संस्करण में होने के बावजूद यह गीत सन् 1961 में प्रकाशित शशिनाथ झा द्वारा सम्पादित सर्वाधिक प्रामाणिक विद्यापति पदावली में समाविष्ट नहीं हुआ--स्पष्ट है कि उन्होंने इस पद को विद्यापति रचित नहीं माना। अप्रामाणिक रचना भी नहीं! इस प्रसंग की चर्चा बाद में, पहले इसके अर्थ-सन्दर्भ पर बात हो जाए! 

विद्यापति धाम में शिव-पूजन स्थल पर देवशंकर नवीन
 इस गीत की पहली पंक्ति में भैरवि का अर्थ काली ही होगा, दुर्गा नहीं; क्योंकि तीसरी पंक्ति में रात-दिन शवासन धारण करने, पाँचवीं पंक्ति में साँवर वर्ण और मेघ में खिले कमल का उल्लेख है; जो देवी दुर्गा के लिए अप्रासंगिक है। देवी काली के भी वासर-रैनि शवासन का कोई उल्लेख किसी हिन्दू धर्मग्रन्थ में नहीं है। सत्य है कि शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा और देवी काली मैथिलों की कुलदेवी होती हैं, अपने भक्तों-उपासकों के जीवन-सौविध्य के लिए असुर-शक्तियों पर आक्रामक होने, उनका संहार करने की उनकी कथाएँ हर मैथिल बचपन से सुनते हैं। पर किसी मैथिल ने अपनी देवी के इतने वीभत्स रूप का वर्णन सुना-पढ़ा है?...

प्रश्न तो केवल अस्था और शास्त्रविदित कथाओं का ही है, जिसमें सारी ही शास्त्रीय कथाओं में हमारी इस आराध्या द्वारा सारी ही असुर शक्तियों का संहार अत्यन्त सहजता से हुआ सुना-पढ़ा गया है, पर ऐसा करते समय उन्हें किसी ने ‘पैरों में घुँघरूदार चन्द्रमणि पहनते’, ‘दैत्यों को मारकर उसका खून पीते’, ‘उसे निगलते’, ‘उसे कुल्ला करते’, ‘होठों पर सफेद झाग लाते’, ‘शोणित के बुलबुले बनाते’, ‘क्रोधावेश में हन-हन काता चलाते’ तो किसी ने नहीं सुना! यदि शास्त्र-कथा ही साक्ष्य है तो पूछा जाना चाहिए कि किसी मैथिल ने किसी शास्त्र में आराध्या काली या दुर्गा को असुर-शक्ति-संहार के समय का ऐसा वर्णन पढ़ा-सुना है? ऐसे शास्त्रविरोधी प्रसंगों का अनुगमन जिस विद्यापति ने जीवन में कभी नहीं किया, वे अपनी रचना में कैसे करते? विद्यापति जैसे निष्णात शास्त्रज्ञ और भाषाशास्त्री, अपनी ही अधिष्ठात्री देवी का ऐसा नृशंस और वीभत्स वर्णन सपने में भी नहीं कर सकते थे। जीवन भर माधुर्य के उपासक रहनेवाले धर्मानुरागी अपने ही धर्मशास्त्र और अपनी ही अधिष्ठात्री का इतना अपमान नहीं कर सकते थे!...सामान्य मैथिलों की दृष्टि कभी इस गीत के पाठ-विश्लेषण की ओर नहीं गया, इसलिए वे सदैव भक्ति-भाव में ही तल्लीन रहे। हमारे लिए समझना सुकर होगा कि ऐसे दस-बीस पद विद्यापति की सूची से हट भी जाएँ, तो उनके कीर्तिस्तम्भ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा! फिर भी जितना बचा रहेगा, दुनिया भर के साहित्य के लिए भारी ही होगा। समुद्र से दस-बीस लोटा पानी निकाल लेने से समुद्र की महिमा नहीं घटती! ...हाँ, इतना कष्ट तो लोगों को होगा कि जिस गीत को सातेक दशक से होठों पर बसाए हुए थे, जिससे उनका भाषाई धन्धा चलता था, उससे मुँह फेरने में कुछ दिनों तक तकलीफ होगी!

म.म. हरप्रसाद शास्त्री ने खूब कहा कि विद्यापति के जिन गीतों ने पूरे जगत को मुग्ध किया, उनकी ख्याति, प्रतिपत्ति हुई--उनमें से एक भी न लिखा होता; बस स्मृति, पुराण, तीर्थ और वार्षिक त्यौहार-सम्बन्धी पुस्तकें ही लिखकर विराम ले लेते, तो भी उनकी प्रतिभा समुज्ज्वल और सर्वतोमुखी मानी जाती।[13]

इस पद में प्रयुक्त शब्दाली, असंगत रूपक, असम्बद्धतादि की ऐसी प्रयुक्तियों का कोई ध्यान से अनुशीलन करे, तो स्पष्ट होगा कि यह पद विद्यापति रचित नहीं है। उनकी रचना ‘दुर्गाभक्तितरंगिणी’ में दुर्गा-उपासना की जैसी पद्धति संस्तुत है, यह गीत उसके प्रतिकूल भाव से सन्नद्ध है; इससे भी किसी के मन में शंका नहीं होती?

इस पद में कुल 72 शब्द हैं। इनमें छह शब्द तो भणिता के निकल गए। दो शब्द ‘जय जय’ तो संस्कृत से लेकर प्राकृत, अवहट्ट, भाखा तक में समान रूप से प्रचलित हैं। शेष 66 में से 34 शब्द और उनसे बने रूपक विद्यापति के नहीं हो सकते। ‘दिअ हे’, ‘कट कट विकट ओठ’, बिसरु’ शब्दों का उपयोग विद्यापति नहीं करते थे। काली भगवती के लिए ‘बासर रैनि सबासन’, ‘चरन चन्द्रमनि चूड़ा’, ‘दैत्य मारि मुँह मेलल’, ‘कतेक उगिलि करु कूड़ा’, ‘कट कट विकट ओठ’, ‘पुट पाँड़रि’, ‘लिधुर फेन उठ फोका’, ‘घन घन घनन घुघुर’, ‘हन हन कर तुअ काता’ जैसे शास्त्रविरुद्ध रूपक की युक्ति वे कदापि नहीं लगा सकते थे। काली भगवती की कोई ऐसी छवि किसी ने किसी फोटो में भी देखी है क्या, जिसमें वे शव के आसन पर हों, उनके पैरों में चूड़ामणि गहने हों, वे दैत्यों को मारकर खा जाती हों, उसके लहू से कुल्ला करती हों, वे दाँत किटकिटाती हों, उनके होठों पर क्रोधवेश के सफेद झाग हों, उनके मुँह से लहू के बुलबुले निकलते हों, उनका खड्ग हन-हन करता हो?...या शक्तिस्वरूपा काली भगवती की ऐसी छवि किसी पूजक की स्मृति में आराधना के समय आती है?...यदि ऐसा नहीं देखा है, ऐसी छवि उनके मन में नहीं आती है, तो विद्यापति के नाम से वे ऐसे भजन की कामना क्यों करते हैं?

 

[1] झा, गोविन्द. अनुचिन्तन (निबन्ध संग्रह). 2010. नवारम्भ प्रकाशन, पटना. पृ. 66

[2]   वही. पृ. 67-68

[3]   वही. पृ. 69

[4]  वही. पृ. 72

[5] वही. पृ. 79-80

[6]   वही. पृ. 79

[7] वही

[8]   वही. पृ. 80

[9] वही

[10]   वही. पृ. 79

[11] वही

[12] वही. पृ. 79

[13] भारद्वाज, मोहन(सम्पा.). आचार्य रमानाथ झा रचनावली खण्ड 1. में उद्धृत. पृ. 275

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