बी.आर. दीपक की अनुवाद-चेतना
Translation sense of B.R. Deepak
सन् 2009 में प्रो. बी.आर. दीपक ने ‘चीनी कविता’ (ई.पू. 11वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी तक) का चयन और अनुवाद प्रस्तुत कर एक विशिष्ट कार्य किया, इसके अगले खण्ड में आगे के समय को रेखांकित करनेवाली चुनी हुई कविताओं का संग्रह अनूदित होकर आ जाता, तो हिन्दी-चीनी कविताओं के तुलनात्मक अध्ययन को बड़ा बल मिलता। सम्भवतः वे ऐसा कर पाएँ!
सन् 1987 में प्रकाशित होते ही, चाङ वेई के जिस पहले उपन्यास ने उपन्यासकार को चीनी भाषा के पीड़ित समुदाय की जीवन-दशा के चिन्तनशील लेखक सिद्ध कर दिया; जिसके बीस से अधिक संस्करण अब तक छपे; बी.आर. दीपक ने ‘पुराना जहाज’ शीर्षक से इसका हिन्दी अनुवाद किया, जो सन् 2021 में प्रकाशन संस्थान से छपा। यह उपन्यास सन् 1949 में चीनी गणराज्य की स्थापना के बाद के चालीस वर्षों का इतिहास है, जो भूत-वर्तमान-भविष्य को एक साथ जोड़ता है। इसमें सामाजिक आत्यचार, क्रूरता और भ्रष्टाचार पर चोट करते हुए; मनुष्य की सहनशक्ति, जिजीविषा, सपने और सपनों को यथार्थ में बदलने की इच्छाशक्ति के साथ-साथ मनुष्यता बचाने की वकालत की गई है। चीन के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और साहित्य में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह उपन्यास अनिवार्य सामग्री है। यह अनुवाद प्रो. दीपक की अनुवाद चेतना को रेखांकित करता है।
सन् 2017 में प्रो. दीपक द्वारा हिन्दी में अनूदित कृति ‘मेनशियस’ शीर्षक से प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित हुई। यह कृति 'द मेनशियस' का हिन्दी अनुवाद है, जो ई.पू. चौथी-तीसरी (ई.पू.372-289) शताब्दी के चीन के महान दार्शनिक, विचारक, शिक्षक और कन्फ्यूशियस के सर्वश्रेष्ठ अनुयायी ‘मेनशियस’ के विचारों, उपदेशों और राजाओं के साथ उनके संवादों का संकलन है। इस कृति की गणना कन्फ्यूशियस की वैचारिकता का विकास करनेवाली चार श्रेण्य साहित्य (क्लासिक्स) में होती है। चीनी इतिहास में मेनशियस की गणना कन्फ्यूशियस परम्परा के 'दूसरे ऋषि' की तरह होती है। मेनशियस का सर्वप्रसिद्ध सिद्धान्त था कि मनुष्य, जन्मजात अच्छे और दयालु होते हैं। वातावरण के प्रभावों से ही कोई अवान्तर मार्ग अपनाता है। सही शिक्षा और वातावरण मिले, तो हर व्यक्ति सदाचारी होगा। उनकी राय थी कि शासकीय व्यवस्था में जनता ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है, उसके बाद ही देश आता है, और अन्त में राजा।...इसीलिए उन्होंने शासकों को कल्याणकारी शासन चलाने की सलाह दी। उनकी स्पष्ट राय थी कि राजा क्रूर हो, जनता का ध्यान न रखे, तो जनता को विद्रोह का पूर्ण अधिकार है। चीनी ज्ञान-परम्परा की इस शृंखला का हिन्दी अनुवाद कर, प्रो. दीपक ने यहाँ अपनी क्रियाशील अनुवाद चेतना का परिचय दिया है।
भारत-चीन सांस्कृतिक सम्बन्ध और प्राचीन चीनी विद्वानों की भारत-यात्रा के वृत्तान्तों का अतुल्य विवरण भारतीय इतिहास-लेखन में सहजता से मिल जाता है। फिर भी, हिमालय के उस पार का यह देश हमारे लिए एक पहेली की तरह है। इसकी उपलब्धियों से सम्मोहित होकर भी भारतीय अध्येताओं को इसकी पृष्ठभूमि ठीक-ठीक समझ नहीं आती। ऐसे में, प्रो. दीपक द्वारा मूल चीनी से हिन्दी में अनूदित चीनी भाषा-संस्कृति के प्रख्यात विद्वान, छन लाए की पुस्तक ‘चीनी सभ्यता के बुनियादी मूल्य’, चीन की आधुनिक सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सन् 2018 में हिन्दी में प्रकाशित यह कृति विदेशी अध्येताओं के समक्ष चीनी में दिए गए व्याख्यानों पर आधारित है। यह कृति महान चिन्तक कन्फ्यूशियस की परम्परा के विकास और समकालीन चीन के बौद्धिक विमर्शों को जानने-समझने की सूक्ष्म दृष्टि देती है। मूल चीनी में इसका प्रकाशन सन् 2015 में हुआ।
‘चीन और भारत : सभ्यताओं का संवाद’, सतरह खण्डों में प्रकाशित, य्वी लूङय्वी और ल्यु चाओह्वा की पुस्तक चीन-विदेश साहित्यिक आदान-प्रदान के इतिहास शृंखला का एक खण्ड है। प्रो. दीपक ने इस खण्ड का हिन्दी अनुवाद कर और प्रकाशन संस्थान ने सन् 2024 में इसे प्रकाशित कर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। भारत-चीन सम्बन्धों की पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए, इसमें चीन में बौद्ध-मत के प्रसार से लेकर आज तक के दौर के एशियाई साहित्यिक संवाद का गहन अध्ययन है। साठ से अधिक पृष्ठों की भूमिका सहित, लेखक द्वय ने सोलह अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक में भारत-चीन सम्बन्ध का लम्बा काल-क्रम दिया है।
इसके पहले तीन अध्यायों में बौद्ध-मत की छत्र-छाया में होने वाले साहित्यिक आदान-प्रदान पर चर्चा की गई है। इनमें सूत्र अनुवाद, चीनी साहित्य पर बौद्ध साहित्य का प्रभाव, चीनी अनुवाद-अध्ययन की शुरुआत...आदि के बारे में उल्लेख है। अगले तीन अध्यायों में भारतीय गाथाओं, मिथकों और नाट्य-वृत्तियों का चीन में प्रवेश; रामायण और महाभारत का प्रसार तथा इन महाकाव्यों के दृष्टान्तों के चीनी साहित्य में समावेश पर चर्चा है। आगे के पाँच अध्यायों में चीन के अग्रणी भारतविदों और भारतीय प्राचीन ग्रन्थों एवं आधुनिक साहित्यिक रचनाओं पर उनके द्वारा किए गए शोधों का उल्लेख है; जिसकी शुररुआत चीन में टैगोर के अनुवाद से हुई। बारहवें और तेरहवें अध्यायों में, भारत में चीनी अध्ययन के प्रसंगों की सम्यक् जानकारी है। चौदहवें अध्याय में भारत में ताओ-मत की लोकप्रियता, पन्द्रहवें में चीन पर राजा राव के लेखन और अन्तिम अध्याय में चीनविदों और भारतविदों की वर्तमान पीढ़ी द्वारा किए गए भारत-चीन अध्ययन का ब्योरा है।
चारेक दर्जन से अधिक लिखित-अनूदित चीनी-अंग्रेजी-हिन्दी की पुस्तकों में से गत 25 वर्षों में हिन्दी में अनूदित उनके प्रमुख ग्रन्थ हैं --
1. 'चीनी साहित्य का इतिहास' (2001)
2. 'भारत-चीन सम्बन्ध : बीसवीं सदी के पहले 50 वर्ष' (2001),
3. 'भारत और चीन 1904-2004 : एक सदी की शान्ति और संघर्ष' (2005),
4. ‘चीनी कविता’ : ई.पू. 11वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी तक (2009),
5. 'चीन : कृषि, किसान और गाँव' (2010),
6. 'चीनी कविता : ई.पू. 11वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तक' (2011),
7. 'भारत-चीन सम्बन्ध : सभ्यता परिप्रेक्ष्य' (2012),
8. 'कन्फ्यूशियस सूक्ति-संग्रह' (2016),
9. 'हिन्दी-चीनी-अंग्रेजी वार्तालाप' (2016),
10. ‘कन्फ्यूशियस सूक्ति संग्रह’ (2016)
11. 'दीवार के उस पार : समय रेत पर हमारे पदचिह्न' (2017)
12. ‘मेनशियस’ (2017)
13. ‘कन्फ्यूशियसवाद के चार ग्रन्थ’ (2018)
14. ‘चीनी सभ्यता के बुनियादी मूल्य’ (2018)
15. ‘पुराना जहाज’ (2021)
16. चीन और भारत : सभ्यताओं का संवाद (2024)
17. ‘तुनह्वाङ बौद्ध कला : इतिहास, रेशम मार्ग, चीन और पश्चिमी क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संवाद’ (2025)
18. ‘बौद्ध धर्म : भारत-चीन सांस्कृतिक संवाद’ (2025)
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