‘रामत्व’ उदारता सिखाता है, संकीर्णता नहीं
'Ramatva' Confer Splendor, Not Narrowness
‘राम से बड़ा राम का नाम’ -- बचपन से सुनता आ रहा हूँ । पूर्वज कवि मैथिलीशरण गुप्त की राय बनी कि ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही पूर्ण काव्य है’। व्याकरणिक व्युत्पत्ति और धार्मिक ग्रन्थों की सलाह से ‘रमते कणे कणे इति रामः’, अर्थात्, चराचर के कण-कण में, प्राणियों के हृदय में निवास करनेवाले राम हैं।...ध्यानावस्था में योगी-जन जिस सच्चिदानन्द ब्रह्म में लीन होते हैं (रमन्ते योगिनोऽस्मिन् सा राममित्युच्यते’), पद्म-पुराण उसे राम मानता है।…फिर वे कौन लोग हैं, जो ‘राम’ अथवा ‘रामत्व’ की रक्षा के नाम पर दंगा-फसाद, मार-काट किए फिरते हैं? बौड़म हरिण की तरह, नाभिकुण्ड में बसे कस्तूरी को इधर-उधर ढूँढते फिरते हैं?...
अपनी चर्या से ‘रामत्व’ उतार लेने से बड़ी राम-भक्ति और कुछ नहीं हो सकती; ऐसे रामभक्त कुछ होंगे तो निश्चय ही, पर दुर्योगवश दिखते नहीं!
इस ‘रामत्व’ की प्रतिष्ठा रेखांकित करने के लिए भारतीय साहित्य के अनेक पुरोधाओं ने महान-महान ग्रन्थों की रचना की है। भाई लोग अब तक समझ नहीं पाए कि यह ‘रामत्व’ एक शब्द भर नहीं है, एक विचार-व्यवस्था है। भारतीय जीवन-चर्या में यह विचार, ऊर्जा की तरह अनश्वर है। संवाद के जरिए इसे, एक विचार से दूसरे विचार में परिवर्तित तो किया जा सकता है, नष्ट नहीं किया जा सकता।
स्थानीय जीवन-परिवेश के प्रयोजन के अनुसार, इस ‘रामत्व’ की प्रतिष्ठा, पूरे भारत की विभिन्न भाषाओं के साहित्य में उपलब्ध है, जिसका सम्मान उन्हें भी करना चाहिए, जो किसी धर्म या धार्मिक आचरण में आस्था नहीं रखते! क्योंकि ‘रामत्व’ की अर्थ-संगति किसी धर्म-विशेष तक सीमित नहीं है, इसका सम्बन्ध सम्पूर्ण मानवता की भलाई और सुख की कामना से है। यह वस्तुतः भारतीयता का मूल मन्त्र है; सभी उपनिषदों के सार ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः’ का पूरा अभिप्राय इस ‘रामत्व’ में ही समाया हुआ है। ‘रामत्व’ पूरे ब्रह्माण्ड के सभी जीवों की मंगलकामना का सन्देश देता है।
इसी 'रामत्व' की प्रतिष्ठा के साथ, भारतीय संस्कृति की यात्रा या जय-यात्रा, सभ्यता के आदिकाल से गतिमान है। महर्षि वाल्मीकि से लेकर तुलसीदास होते हुए, कुबेरनाथ राय के समय तक की अनेक विभूतियों ने अपने चिन्तन से इस विषय में हमें हृष्ट किया है। ‘राम’ और ‘रामत्व’ सम्बन्धी अध्यवसायविहीन रचनाएँ तो अभी हो रही हैं; पर माना जाना चाहिए कि ऐसे सृजेताओं की संख्या नगण्य है जिन्हें ‘रामत्व’ का सही-सही बोध हो!
एतत्सम्बन्धी रचनाएँ हमारे अनेक पूर्वजों ने की है; पर चूँकि इन्हीं तीनो के चिन्तन से हमारी मनीषा सर्वाधिक उद्वेलित हुई है; अनेक रचनाकारों के चिन्तन का आधार वाल्मीकि एवं तुलसीदास ही रहे हैं और इनके द्वारा रेखांकित ‘रामत्व’ को दार्शनिक दृष्टि से देखने का सबसे बड़ा दृष्टिकोण कुबेरनाथ राय के यहाँ ही मिलता है, इसलिए यकीनन इन्हीं तीनो के सृजन और चिन्तन से हम एक बार फिर से ‘रामत्व’ की प्रतिष्ठा, भारतीयता के साथ समझ सकते हैं।
हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य संस्कृति-पुरुष और निबन्धकार कुबेरनाथ राय का रचना-संसार भारतीय अस्मिता, लोक-जीवन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। 'रामत्व' की प्रतिष्ठा करने में उनके 'राम' भारतीय मनीषा की नैतिक चेतना के प्रतीक बन आए हैं। उनकी महत्त्वपूर्ण कृति 'रामायण महातीर्थम्' भारतीय सामुदायिक जीवन का सांस्कृतिक विश्लेषण है। उनके रामत्व की अवधारणा पूरे भारत को भौगोलिक और मानसिक रूप से एक सूत्र में पिरोता है। उनके राम का चरित-विधान भारतीय समाज का नैतिक दिग्दर्शक है। उनके ‘रामत्व’ में भारत की सभी समस्याओं का समाधान बसा हुआ है। क्योंकि उनके राम के चरित-विधान में लोकमंगल की वरीयता है। ‘गन्धमादन’, ‘निषाद बाँसुरी’, ‘त्रेता का बृहत्साम’ जैसे उनके अनेक निबन्धों में आर्येतर और वनवासी समाज से राम की अन्तरंगता का सूक्ष्मतर उल्लेख है, जो भारतीय लोक-संस्कृति की वास्तविक विजय-यात्रा है; ऐसा संकेत वाल्मीकि रचित ‘रामायण’ में भी मिलता है।
उनके राम का चित-चरित इतना आनन्दमय है कि कहीं दूर-दूर तक भी अवसाद की छाया नहीं दिखती। राम के जीवन-चरित एवं वन-गमन की क्रिया में भी उन्होंने अपनी पृष्ठभूमि के अनूरूप वे यान्त्रिक युग की क्रूरता के विरुद्ध प्राकृतिक सुषमा और कृषि-संस्कृति के रक्षक रूप देखे हैं।
उनकी चिन्तन-पद्धति का एक बड़ा फलक भारत की सांस्कृतिक चेतना और रामकथा के अन्तर्सम्बन्धों को समर्पित है। 'रामायण महातीर्थम्' और 'त्रेता का बृहत्साम' -- शीर्षक दोनों विशिष्ट कृतियों में उन्होंने ‘रामत्व’ की विलक्षण व्याख्या की है, जो नए समय भावकों के लिए उपादेय है। उनके राम, 'चिन्मय और आनन्दमयी चेतना' के उत्प्रेरक हैं, सभी संकीर्णताओं से परे सार्वभौमिक सत्य के प्रतीक हैं। जीवन के घोर संघर्ष में भी, जीवन-संगिनी के वियोग में भी, राजमुकुट के परित्याग में भी...किसी भी समय अवसाद उनके निकट नहीं आता। उनका ‘रामत्व’ ऐसी कसौटी है, जिस पर राजन्यों की नैतिकता और राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता की परिशुद्धि आज भी सम्भव है।
उन्होंने राम के वन-गमन को उत्तर-दक्षिण, आर्य-आर्येतर, शबर-वनवासी का ऐसा संवाद देखा है; जिससे भौगोलिकता एवं जातीयता का सांस्कृतिक सेतु प्रतिष्ठित हुआ है। शोषित-वंचित समुदाय को संगठित कर, आतातायी शक्तियों को चुनौती दिलाने के नेतृत्व का श्रेय इसी रामत्व को है। राम के वन-गमन विवरण में ऋतु, भूगोल, प्रकृति, वन-पर्वत-नदी, पशु-पक्षी...आदि से राम के तादात्म्य का रेखांकन...वस्तुतः भारतीय लोक-जीवन, कृषि-संस्कृति और प्रकृति के सह-अस्तित्व को उजागर करता है। 'सांस्कृतिक-क्षरण’ की ओर अग्रमुख समुदाय के जीवन-परिवेश में ‘रामत्व’ निरूपण की दृष्टि से कुबेरनाथ राय का लेखन, एक सार्थक हस्तक्षेप है।
रामकथा में ऋषि वाल्मीकि के अवतरण से, हमारे यहाँ ढेरो पढ़े-लिखे लोग मान बैठे कि आदिकाव्य ‘रामायण’ के रचयिता वही वाल्मीकि हैं। वस्तुतः ‘रामायण’ की रचना से कई सौ वर्ष पूर्व से हमारे समाज की सामुदायिक चर्या मौखिक रामकथा से दिग्दर्शित थी, ‘रामायण’ की रचना कर, ऋषि वाल्मीकि ने इस जीवन-चर्या-परिष्करण को स्थायित्व दिया। ‘रामायण’ अब हमारी जीवन-चर्या में एक महाकाव्य भर नहीं है, यह भारतीय सभ्यता और राष्ट्रीयता के मूल मन्त्र को साकार करने का एक संवैधानिक ग्रन्थ है, जो तुलसीदास के समय में आकर सामुदायिक जीवन के अनुसार एक बार फिर से अनुकूलित हुई, और कुबेरनाथ राय के समय में आकर भारतीयता और ‘रामत्व’ से परांग्मुख नागरिक के लिए व्याख्यायित हुई।
हिन्दी पाठक इस बात के लिए धन्य हुए कि अपनी इयत्ता से विमुख नागरिकों को नीन्द से जगाने के लिए उन्होंने इसके दार्शनिक पक्षों की व्याख्या की। ‘रामायण’ और ‘रामचरितमानस’ में भारतीय संस्कृति के जिन आदर्शों, मूल्यों और नैतिक विधानों को स्वरूप दिया गया है; ‘रामत्व’ की जैसी अवधारणा रेखांकित हुई है; कुबेरनाथ राय ने उसकी दार्शनिकता को सूक्ष्मता से स्पष्ट किया। जिन्हें ‘रामत्व’ नहीं समझना है, उत्पातियों के अनुगमन के अलावा कुछ नहीं करना है, उन्हें कुबेरनाथ राय तो क्या, स्वयं वाल्मीकि या कि स्वयं राम भी नहीं समझा सकते! जीवन-दर्शन के बिना जी लेनेवालों की यह जैविक चर्या होती है।
'रामत्व' वास्तविक परिभाषा, ‘रामायण’ के आरम्भ में ही महर्षि वाल्मीकि से देवर्षि नारद की जिज्ञासा में स्पष्ट हो गई है। नारद की जिज्ञासा का शमन करते हुए वाल्मीकि ने ‘श्रीराम’ को सकल सृष्टि के सभी गुणों का समुच्चय (गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवाचक, दृढ़प्रतिज्ञ)और धर्म-मर्यादा का रक्षक कहा, जिनके जीवन के हर मोड़ पर कर्तव्य और नैतिक मर्यादा सर्वोपरि रहा, जिन गुणों के कारण सामान्य मनुष्य भी 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हो जाते हैं। श्रीराम जैसे नायक की चरितगाथा के सहारे इस महान ग्रन्थ ‘रामायण’ की कथा, भारतीय संस्कृति के अभ्युदय एवं मानवीय कल्याण का प्रतिरूप रचती है। भारतीय सभ्यता के मूल मर्म को रेखांकित करती है।
अयोध्याकाण्ड (सर्ग 18, श्लोक 28-30) में, राजाज्ञा और पितृ-आज्ञा के बारे में श्रीराम ने कैकेयी को निश्शंक कहा --
अहं हि वचनाद्रज्ञः पतेयमपि पावके॥28॥
भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं मज्जेयमपि चार्णवे।
नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च॥29॥
तद्ब्रूहि वचनं देवि राज्ञा यदभिकाङ्क्षितम्।
करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभापते॥30॥
महाराज की आज्ञा से मैं आग में कूद सकता हूँ, गुरु समान परम हितकारी महाराज पिता की आज्ञा से तीक्ष्ण विष खा सकता हूँ, अगाध समुद्र में डूब सकता हूँ। हे देवि! आप मेरी प्रतिज्ञा को अटल मानें, राम कभी अपने वचन से नहीं पलटता, जो कहता है वही करता है।
उन्नीसवें सर्ग के बीसवें श्लोक में उन्होंने और स्पष्ट कर दिया कि उनके जीवन में राज्यकामना भी ऋषि के समान धर्म और कर्तव्य-पालन के लिए ही है, राज्योपभोग के लिए नहीं --
नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे।
विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं केवलं धर्ममास्थितम्॥20॥
विषम परिस्थितियों में भी नीति और मर्यादा से नहीं डिगना ‘रामत्व’ की अर्थवत्ता सिद्ध करता है। राज्याभिषेक से ठीक पहले, वनवास की आज्ञा सुनकर वे रत्ती भर विचलित नहीं हुए; उनका गाम्भीर्य, उनकी सात्विकता जस के तस रही।
दिग्भ्रान्ति का शिकार हुआ इस समय का नागरिक परिवेश वस्तुतः ‘रामायण’ से ही सही दिग्दर्शन पा सकता है, जहाँ 'रामत्व' (मर्यादा, धर्म और आदर्श) की प्रतिष्ठा में भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के सूत्र दिखते हैं; नए समय के भावक एक इसी ग्रन्थ से, या 'रामत्व' निरूपण के इन जैसे कुछेक और ग्रन्थों (तुलसी साहित्य या कुबेरनाथ राय के साहित्य) से सरोकार बना लें, तो उनके सारे मार्ग व्यवस्थित और प्रशस्त हो जाएँगे।
यह ‘रामत्व’ की महिमा ही है कि मित्र तो मित्र, शत्रु-पक्ष के समझदार प्राणी भी राम के पराक्रम के गीत गाने लगे थे। अरण्यकाण्ड, सर्ग 37, श्लोक 13-14 में महर्षि वाल्मीकि ने इसी ‘रामत्व’ की प्रतिष्ठा की है। यहाँ शत्रु-पक्ष के नायक राक्षसराज रावण के भाई मारीच, सनातन संस्कृति के रक्षक-परिपोषक श्रीराम के भव्य पराक्रम का बखन करते हुए अपने हठी भाई को उपदेश दे रहे हैं।
सीता-हरण के प्रपंच में मारीच से कपट करने की याचना पर उन्होंने रावण को ‘रामत्व’ की उज्ज्वलता रेखांकित की। ‘रामत्व’ के सही पराक्रम के ज्ञाता की तरह मारीच ने चेताया, कि --
रामो विग्रहवान्धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां इव वासवः॥
कथं त्वं तस्य वैदेहीं रक्षितां स्वेन तेजसा।
इच्छसि प्रसभं हर्तुं प्रभामिव विवस्तः॥
श्रीराम, धर्म के मूर्तिमान स्वरूप हैं। परम साधु और सत्य पराक्रम से युक्त हैं। जैसे इन्द्र समस्त देवताओं के अधिपति हैं, श्रीराम इस सम्पूर्ण जगत के अधिपति हैं। वैसे राम की सीता (जो स्वयं अपने तेज से रक्षित हैं) का, सूर्य की प्रभा का, तुम बरजोरी हरण करना चाहते हो, तुम आग में कूदना चाहते हो, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए!
पारिवारिक आदर्शों की संस्थापना और असुरत्व पर देवत्व की विजय (दुष्कृति पर सद्कृति की विजय) की जैसी उज्ज्वल समझ ‘रामायण’ और ‘रामचरितमानस’ से बनती है, दुनिया की कोई गाथा ऐसी समझ देने में सक्षम नहीं। ‘रामत्व’ के सहारे ही यहाँ भारत का समाज-बोध, परिवार-बोध, बन्धुत्व-बोध, मर्यादा-बोध निखर उठता है।
भारत के पारिवारिक-सामाजिक आदर्शों की नींव, इन दोनो ग्रन्थों में ‘रामत्व’ कई रूपों में -- पितृभक्ति, मातृभक्ति, विमाता के प्रति भी सगे पुत्र जैसा सम्मान, भ्रातृप्रेम...के साथ सुदृढ़ हुई हैं। इन ग्रन्थों में अंकित ‘रामत्व’ के प्रताप से स्पष्ट होता है कि ‘लुंचन’, ‘आच्छेदन’ (छीनने) के बजाय त्याग का महत्त्व वरीय है।
एक आदर्श राजा के साथ-साथ ‘रामायण’ और ‘रामचरितमानस’ के राम ने, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई और आदर्श पति के रूप में सम्बन्धों की शुचिता को स्थापित किया। भारत के मर्यादा-बोध का स्वरूप, भरत के त्याग और लक्ष्मण के समर्पण में भी स्पष्ट होता है, पर उसमें भी उस ‘रामत्व’ का अवदान ही महत्त्वपूर्ण दिखता है। ‘रामत्व’ के मर्यादा की उज्ज्वलता युद्धकाण्ड के एक सौ उन्नीसवें सर्ग के 12-15 श्लोक में भी स्पष्ट दिखता है, जब रावण की मृत्यु के बाद श्रीराम द्वारा आरोपित विकार पर व्यथित जानकी ने उन्हें नरशार्दूल और ओछा मनुष्य कहा, पर राम इससे रत्ती विचलित नहीं हुए --
त्वया तु नरशार्दूल क्रोधमेवानुवर्तता।
लघुनेव मनुष्येण स्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम्।।14।।
अपदेशेन जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात्।
मम वृत्तं च वृत्तज्ञ बहु तेन पुरस्कृतम्।।15।।
हे नरशार्दूल! ओछे मनुष्यों की तरह क्रोधवश तुमने भी मुझे स्त्री शरीर मात्र समझा। हे मेरा समस्त वृत्तान्त जाननेवाले वृत्तज्ञ! तुमने तनिक विचार नहीं किया कि मैं जनक की बेटी हूँ। न तो पृथ्वी से मेरी उत्पत्ति की ओर ध्यान दिया, न ही मेरे लोकोत्तर चरित्र का विचार किया।
इस अवसर पर श्रीराम ने अपने अनुरक्त अनुज लक्ष्मण तक की क्रोधित दृष्टि भी झेली, पर प्रतिकार नहीं किया। जब ब्रह्मा समेत सारे देवों ने आकर उन्हें समझाया, अग्निपरीक्षित जानकी को लेकर स्वयं अग्निदेव बाहर आए, तब श्रीराम ने युद्धकाण्ड के एक सौ इक्कीसवें सर्ग के 16-17 श्लोक में अपना ध्येय स्पष्ट किया कि सीता की चारित्रिक विशुद्धता का विश्वास तीनो लोकों को कराने के उद्देश्य से उन्होंने इस सत्य का आश्रय लिया और अग्नि-प्रवेश के समय उन्हें नहीं रोका; क्योंकि वे जानते थे कि अपने पातिव्रत्य के तेज रक्षित विशालाक्षि सीता का कोई भी अनिष्ट रावण नहीं कर सकता था, जैसे समुद्र कभी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता --
प्रत्ययार्थं तु लोकानां त्रयाणां सत्यसंश्रयः।
उपेक्षे चापि वैदेहीं प्रविशन्तीं हुताशनम्॥
इमामपि विशालाक्षों रक्षितां स्त्रेन तेजसा।
रावणो नातिवर्तेत वेलामिव महोदधिः॥
सुधीजन भलीभाँति अवगत हैं उत्तर से दक्षिण की ओर वनगमन करते श्रीराम की यात्रा कोई भौगोलिक यात्रा भर नहीं थी, वह संस्कृति के प्रसार और विचारों के विस्तार की यात्रा थी, जिस दौरान उन्होंने अनेक लोक-कल्याणकारी शक्तियों को एकजुट कर आतातायी शक्तियों को मूलोच्छिन्न कराया।
इन ग्रन्थों में प्रतिष्ठित भारतीय संस्कृति की सर्वसमावेशी भावना भी उत्कृष्ट है, जिसका संकेत श्रीराम की उस धारणा में है, जिस कारण उन्होंने कभी जाति-वंश या सामाजिक पदक्रम के कारण कोई भेदभाव नहीं किया। रावण जैसे प्रतापी वीर से लड़ने के लिए किसी राजसी सैन्य की अपेक्षा नहीं की; रीछ, वानर एवं जनजातियों को संगठित कर युद्ध किया।
युद्धकाण्ड के अठारहवें सर्ग के 33-35 श्लोक में शरणागत को स्वीकार कर मानवीय मूल्य की रक्षा की। शत्रु के भाई विभीषण को भी शरण देकर उसे राजा के रूप में स्वीकार कर 'रामत्व' की महत्ता स्थापित की। मित्र सुग्रीव ने अनेक तरह से विभीषण के आगमन पर शंका उठाई, पर राम ने स्पष्ट कहा --
धर्मिष्ठ च यशस्यं च स्वर्ग्ये स्यात्तु फलोदये।
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम।
आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया॥
विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयं … …॥35॥
समर्पण-भाव से शरणागत को अभय देना मेरा अटल संकल्प है; मेरी राय में उत्तम फलदायी कृत्य है। यह आचरण धर्म के अनुकूल, यशवर्द्धन के अनुकूल, स्वर्ग प्राप्त्यर्थ अनुगम्य है। मैं शरणागत को संसार के समस्त प्राणियों से पूर्ण सुरक्षा देना मेरा कर्तव्य है। इसलिए हे वानरश्रेष्ठ सुग्रीव! तुम शरणागत विभीषण को आदर सहित यहाँ ले आओ, मेरे द्वारा इसे अभयदान दिया जा चुका है। शरण में आया व्यक्ति विभीषण हो या मुझसे शत्रुता रखने वाला स्वयं रावण, मैं हर परिस्थिति में उसे अपनी शरण में स्वीकार करूँगा।
यह प्रसंग श्रीराम के चरित्र की उस ऊँचाई को दिखाता है जहाँ 'शत्रुता' का भाव पूरी तरह समाप्त हो गया है। संसार का कोई भी राजा अपने सबसे बड़े शत्रु को शरण देने की बात सोच भी नहीं सकता, लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने घोषणा की कि यदि उनके प्राणप्रिय भाई लक्ष्मण पर शक्तिवाण चलवाने वाला और सीता का हरण करने वाला रावण भी हाथ जोड़कर शरण में आ जाए, तो वे अपने सारे दुख भूलकर उसे शरण दे!
इसीलिए वाल्मीकि रचित ‘रामायण’ का 'रामराज्य' आज भी सुशासन का वैश्विक पैमाना है। 'रामत्व' और 'भारतीय संस्कृति' वस्तुतः एक-दूसरे के पूरक हैं। लोग सीखना चाहे, तो सीख सकते हैं कि सामर्थ्यवान अपनी शक्ति का उपयोग दमन के लिए नहीं, रक्षण के लिए करते हैं। इस महाकाव्य के ‘रामत्व’ से जिन नैतिक मूल्यों की स्थापना हुई, भारतीय समाज की आत्मा का मूल मन्त्र आज भी वही मूल्य है, जिसे दुर्भाग्यवश हमारा समाज देख नहीं पा रहा है।
महलों के सुख का परित्याग कर वन-पर्वत-कन्दराओं के परिवेश में उत्कीर्ण ‘रामत्व’, मानवीय मर्यादा का बोध कराता है, जहाँ जातिगत रूढ़ियों और सामाजिक बन्धनों को त्यागकर राम ने निषादराज गुह को गले लगाया, मित्रता निभाई।
अयोध्याकाण्ड (सर्ग 50, श्लोक 33) में इस आत्मीयता का संकेत है --
तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसमः सखा।
निषादजात्यो बलवान् स्थपतिश्चेति विश्रुतः॥
वहाँ (शृंगवेरपुर में) 'स्थपति' नाम से ख्यात निषाद जाति के बलवान राजा गुह राम के प्राणप्रिय (आत्मसमः) मित्र थे। वाल्मीकि द्वारा ‘आत्मसमः सखा’ पद की प्रयुक्ति से स्वतः सिद्ध है कि दोनों की पुरानी अन्तरंगता थी, कोई नई नहीं। इसी सख्य भाव के कारण अयोध्याकाण्ड (सर्ग 50, श्लोक 41) में राजा गुह दौड़े आए और श्रीराम से कहा --
स्वागतं ते महाबाहो तवेयमखिला मही।
वयं प्रेष्या भवान् भर्ता साधु राज्यं प्रशाधि नः॥
हे महाबाहु (परम पराक्रमी)! आपका स्वागत है। यह सम्पूर्ण पृथ्वी और राज्य आपका है। हम सब आपके सेवक और आप हमारे स्वामी हैं। कृपा कर आप इस राज्य को स्वीकार कीजिए और इस पर न्यायपूर्वक शासन कीजिए।...अगले श्लोक में श्रीराम ने उन्हें गले लगाया --
तमुप्रीतः परिष्वज्य भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्याम्।
रामस्तु प्रीयमाणो वै गुहम वाक्यमथाब्रवीत्॥
दिष्ट्या त्वाम् गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवैः।
निषादराज गुह का परम त्याग देखकर प्रसन्नचित्त श्रीराम ने अपनी सदाचारी भुजाओं से उन्हें प्रेमपूर्वक गले लगाया (परिष्वज्य) और कहा -- हे मित्र गुह! मेरा सौभाग्य है कि मैं तुम्हें और तुम्हारे बन्धु-बान्धवों को स्वस्थ, कुशल औरामत्व की उज्ज्वलता। उन्होंने निषादराज के सत्कार को ही पर्याप्त माना। यह प्रसंग दोनो की आत्मीयता का निदर्शन है, जहाँ पदक्रम की कोई बाधा नहीं है, केवल मैत्री है, केवल रामत्व है। अगले श्लोकों में राम ने और भी मर्मस्पर्शी वचन कहे --
प्रतिगृह्णामि ते सर्वं प्रीत्यैव कुशालेन च।
नहि मे वर्तते कालो विहाराय प्रतिग्रहे॥
कुशचीराजिनधरं तापसं विद्धि मां जने।
वनं प्रवेष्टुं मुनिभिः केवलं फलभोजनम्॥
हे मित्र! मैं तुम्हारे अगाध प्रेम और कल्याणकारी भावना के कारण तुम्हारे इस सम्पूर्ण साम्राज्य और आतिथ्य को मानसिक रूप से स्वीकार करता हूँ। किन्तु पितृ-आज्ञा के अनुपालन में इस समय किसी भी सांसारिक सुख या भौतिक उपहार का उपभोग मेरे लिए स्वीकार्य नहीं! तुम मुझे वल्कलधारी (कुश के वस्त्र) वनवासी ही समझो, जो मुनियों की भाँति केवल कन्द-मूल-फल खाकर वन में रहने का संकल्प लेकर आया है।...
श्रीराम की यह वाग्विदग्धता (चतुराई नहीं) विलक्षण है; जहाँ एक ओर उन्हें अपनी प्रतिज्ञा का पालन भी करना था, और मित्र के उपहार को स्वीकार करके भी उसका उपभोग नहीं करना था।
‘रामत्व’ पर प्रवचन करने और जीवन में ‘रामत्व’ ले आने में बहुत भेद है। राम ने तो अपने जीवन में दिखा दिया। उनका दृढ़प्रतिज्ञ होना, वचन के अनुपालन में निस्पृह रहना, उनके ‘रामत्व’ की परिभाषा है, जिसके उदाहरण पूरे ‘रामायण’ में भरे पड़े हैं।
‘रामायण’ और ‘रामचरितमानस’ भारतीय संस्कृति के दो ऐसे महास्तम्भ हैं, जिनके निकट रहकर पत्थर भी 'रामत्व' समझ विकसित कर ले। समय, समाज और परिस्थितियों के बदले स्वरूप के कारण दोनों के 'रामत्व' के दृष्टिकोण और प्रस्तुतीकरण में कुछ महत्त्वपूर्ण अन्तर तो दिखते हैं। समय और समाज के परिवर्तित प्रयोजन से कुबेरनाथ राय का दृष्टिकोण भी बदला है। तीनो के समय और समाज के नायक एक जैसे हो भी नहीं सकते थे। महत्त्वपूर्ण है कि हमें कैसा ‘रामत्व’ चाहिए?
वाल्मीकि के राम जहाँ 'मर्यादा पुरुषोत्तम मनुष्य' हैं, वहीं तुलसीदास के राम 'साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर' हैं; और कुबेरनाथ राय के समय समाज जब उपभोक्ता-संस्कृति के चंगुल में फड़फड़ाता पक्षी हो गया, मानवीय मर्यादा का शत्रु रावण नहीं, कंस जैसा क्रूर और धनानन्द जैसा लम्पट हो गया; तब ई.पू. ग्यारहवीं शताब्दी या मुगलकालीन सोलहवीं शताब्दी के चिन्तकीय उपकरण से की ‘रामत्व’ की व्याख्या असम्भव थी।
इसीलिए वाल्मीकि के 'राम', आदर्श मनुष्य हैं, मानवीय भावनाओं एवं मर्यादाओं के रक्षक हैं; पूरी कथा में कर्म को प्रधान मानकर उन्होंने 'धर्म' और 'मर्यादा' की रक्षा की; विपत्तिकाल में मनुष्यों की तरह विलाप किया। उन्हें अपने देवत्व का ज्ञान देवताओं द्वारा स्मरण कराने के बाद हुआ। इनका रामत्व विपरीत परिस्थितियों में भी हमें जीवन-क्रिया का सूत्र सिखाता है।
पर तुलसी के 'राम' लीलाधर ब्रह्म हैं। उनके ईश्वरत्व की स्पष्टता बालकाण्ड से ही हो गई। उनके ‘रामत्व’ का आधार 'भक्ति' और 'कृपा' है; उनके राम शरणागत वत्सल हैं, पतितपावन हैं। इनका ‘रामत्व’ भक्ति-भाव से भव-तरण की विधि सिखाता है।
र सुखी देख रहा हूँ।
श्रीराम को सब कुछ समर्पित करना, निषादराज गुह की अनन्य भक्ति और सच्ची मित्रता का प्रतीक है, जबकि राम द्वारा, राज्य-दान को परोक्ष कर, मित्र गुह और उनके समाज की खुशी की कामना करना उनके
कुबेरनाथ राय का समय और समाज, चूँकि भक्ति और समर्पण से छल करनेवाला समाज हो गया था; ईर्ष्या-द्वेष-लोभ-स्वार्थ-अनीति-हिंसा-द्रोह-दंगा-पाखण्ड से भर गया था; इसलिए उन्हें उसी ‘रामत्व’ की व्याख्या ऐसे समुदाय के लिए दार्शनिक दृष्टि से करनी थी; इसलिए इनके यहाँ ‘रामत्व’ व्याख्या स्पष्टतः वाल्मीकि और तुलसी के उपकरण से सम्भव नहीं थी।
रूप चाहे जो भी हो, पर तीनो के यहाँ 'रामत्व' का अन्तिम लक्ष्य सत्य, न्याय, करुणा और लोक-कल्याण की स्थापना ही है।
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