एशियाई अनुवाद परम्परा
Asian Translation Tradition
दुनिया की सबसे समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से महत्त्वपूर्ण ‘एशियाई अनुवाद परम्परा’ के नवीनतम सोपानों में से एक है। पश्चिमी देशों की अनुवाद परम्परा की 'शाब्दिक' सटीकता पर बल देने के बजाय, एशियाई परम्परा का लक्ष्य, आरम्भिक समय से रूपान्तरण द्वारा भाव-विचार-ज्ञान का प्रसार रहा। यहाँ अनुवाद को भाषा परिवर्तन के बजाय, पुनर्सृज माना गया। इसमें पाठ का भाषा-परिवर्तन करते हुए स्थानीय संस्कृति के समावेश का भी ध्यान रखा गया। भारत में इसे 'भाष्य', 'अनुसृजन' या 'छायानुवाद' भी कहा। स्पष्टतः उपनिषदीय भाष्यों की प्राचीन भारतीय पद्धति की धमक एशियाई अनुवाद परम्परा में गूँजित रही; भौगोलिक विस्तार के कारण कुछ स्वभावगत विस्तार अवश्य हुए।
पर रोचक है कि अनुवाद की अति प्राचीन, अति समृद्ध ऐतिहासिकता के बावजूद, यहाँ किसी विदेशी साहित्य का अनुवाद, प्राचीन समय में, किसी भारतीय भाषा में नहीं हुआ। रूपान्तरण, भाष्य, टीका, अनुसृजन, आत्मसातीकरण … द्वारा अपने कालजयी ग्रन्थों को जनोपयोगी और समकालीन बनाने में सदैव हमारे अनुवाद-चिन्तक व्यस्त रहे; विदेशी साहित्य की ओर उनका ध्यान नहीं गया, अट्टालिकाओं के निवासी झोपड़ियों की ओर कहाँ देखते हैं।
भारतीय भाषाओं का क्षेत्र व्यापक है, इसमें प्राकृत, अपभ्रंश एवं अन्य अनेक क्षेत्रीय भाषाएँ भी हैं। इस दिशा में भारतीय चिन्तकों की पहली चिन्ता, प्राचीन काल के वैदिक ग्रन्थों सहित संस्कृत के अन्य विशिष्ट ग्रन्थों के भाष्य एवं अनुवाद की हुई। इसी कारण वेद से वेदान्त और फिर उनके भाष्योपभाष्य के बाद -- रामायण और महाभारत को आम बोलचाल की भाषाओं में ढालना ही यहाँ का प्रमुख अनुवादकीय कर्तव्य माना गया। ग्यारहवीं शताब्दी में कवि नागचन्द्र (पम्पा रामायण) ने कन्नड़ भाषा में जैन परम्परा के अनुसार रामायण का रूपान्तरण किया। बारहवीं शताब्दी में महाकवि कम्बर द्वारा तमिल में रचित 'रामावतारम्', जनमानस में 'कम्ब रामायण' या 'कम्ब रामायणम्' के नाम से लोकप्रिय हुई। यह भारत की किसी भी प्रान्तीय भाषा का पहला महत्त्वपूर्ण रूपान्तरण माना गया। इसमें कुल छह काण्ड हैं – बालकाण्डम्, अयोध्या काण्डम्, अरण्यकाण्डम्, किष्किन्धा काण्डम्, सुन्दरकाण्डम् और युद्ध काण्डम्। श्रीराम के राज्याभिषेक पर यह महाकाव्य समाप्त होता है।
ग्यारहवीं शताब्दी में ही नन्नय भट्ट ने तेलुगु भाषा में महाभारत का अनुवाद शुरू किया।
भारतीय भाषा में किसी विदेशी ग्रन्थ का पहला अनुवाद सन् 1667 में जेसुइट मिशनरी इग्नाज़ियो अरकामोने ने किया। यह अनुवाद ईसाई धर्मग्रन्थ बाइबिल के एक अंश का कोंकणी अनुवाद था। इसके बाद, सन् 1715 में बार्थोलोमियस ज़ीगेनबाल्ग ने पूरे न्यू टेस्टामेण्ट का तमिल अनुवाद किया।
भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद विदेशी भाषाओं में तो होते ही रहे; सासानी सम्राट 'अनुशीरवान' के राजवैद्य बोरजुया ने छठी शताब्दी में सन् 550–570 के आसपास ‘पंचतन्त्र’ का पहलवी में अनुवाद किया। ‘पंचतन्त्र’ का किसी विदेशी भाषा में यह पहला ज्ञात अनुवाद था; यह दुनिया में सर्वाधिक अनूदित होने वाले भारतीय ग्रन्थों में से एक है। दीर्घ अन्तराल के बाद नवम्बर 1785 में चार्ल्स विल्किंस ने भगवद्गीता का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया।
पर एशियाई अनुवाद परम्परा की शुरुआत मुख्य रूप से बौद्ध, हिन्दू, सनातनी, ताओ और बाद में इस्लामिक ग्रन्थों के प्रसार के लिए हुई। चीन और तिब्बत के राजाओं के संरक्षण में इस परम्परा के सहज विकास के लिए सामूहिक अनुवाद की व्यवस्था की गई; जिसमें बड़े-बड़े ‘अनुवाद ब्यूरो’ या ‘अनुवाद अकादेमी’ गठित हुई, जहाँ दर्जनों विद्वान मिलकर अनुवाद करते थे।
एशियाई अनुवाद परम्परा पर मुख्यतः तीन सांस्कृतिक दृष्टियों से विचार सम्भव है --
1. भारतीय अनुवाद परम्परा
2. चीनी बौद्ध अनुवाद परम्परा
3. इस्लामिक और मध्य-पूर्व परम्परा
भारतीय अनुवाद परम्परा
इतिहास समेत पूरी दुनिया, भारत की बहुभाषिकता और बहुसांस्कृतिकता से परिचित है। वैदिक संस्कृत से लौकिक संस्कृत तक आने के बाद वैदिक ग्रन्थों के भाष्य की सामुदायिक अनिवार्यता बढ़ गई; अपभ्रंश के उदय के बाद; और फिर आधुनिक भारतीय भाषाओं (हिन्दी, तमिल, बांग्ला, कन्नड़ आदि) के विकास के बाद; भारत में अपने ही महान ग्रन्थों के भाष्य, टीकादि की अनिवार्यता बढ़ गई। भारतीय अनुवाद परम्परा इन्हीं सन्दर्भों से विकसित हुई। वेदोपनिषद के भाष्य तो हुए ही, आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामायण और महाभारत जैसे विशिष्ट ग्रन्थों के आत्मसातीकरण हुए। इनमें से कई ग्रन्थ ऐसे हैं, जो अनुवाद होकर भी मूल की तरह मान्य हैं -- ‘कम्ब रामायण' या 'रामचरितमानस' ऐसे ही भारतीय अनुवाद परम्परा में आत्मसातीकरण के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
चीनी और बौद्ध अनुवाद परम्परा
चीन के अनुवाद के इतिहास का गहन सम्बन्ध, भारत से गए बौद्ध ग्रन्थों के चीनी भाषा में हुए अनुवाद से जुड़ा है। ज्ञान-प्रसार के क्षेत्र में इस प्रयास को दुनिया भर के लोग सर्वाधिक व्यवस्थित अनुवाद आन्दोलन के रूप में जानते हैं। चौथी-पाँचवीं शताब्दी के कुमारजीव (सन् 344–413) और सातवीं शताब्दी के ह्वेनसांग (सन् 602-664) जैसे सन्तों का स्मरण इस दिशा में श्रद्धा से किया जाता है। ये दोनो, एशियाई अनुवाद परम्परा के ऐसे कीर्ति-स्तम्भ हैं, जिन्होंने संस्कृत के बौद्ध ग्रन्थों को चीनी भाषा में अनूदित कर न केवल चीन में बौद्ध धर्म की नींव मजबूत की, बल्कि चीनी भाषा, दर्शन और संस्कृति को हमेशा के लिए बदल दिया। इन दोनों विद्वानों का दृष्टिकोण और काम करने का तरीका एक-दूसरे से भिन्न था, जिसे अनुवाद विज्ञान में आज भी एक बेहतरीन केस स्टडी माना जाता है।
कुमारजीव की अनुवाद शैली इतनी सहज थी कि उन्होंने चीनी भाषा और दर्शन का स्वरूप हमेशा के लिए बदल दिया।
कुमारजीव कुचेन-भारतीय विद्वान थे। उनके पिता भारतीय थे, माँ कूचा साम्राज्य की राजकुमारी थीं। पिता कुमारायण भारत के कश्मीर क्षेत्र के थे, कश्मीरी ब्राह्मण और बहुत बड़े विद्वान थे। उन्होंने सांसारिक मोह त्याग कर बौद्ध भिक्षु का जीवन अपना लिया और बौद्ध-धर्म के प्रचार के लिए पामीर के कठिन रास्तों से मध्य एशिया के कूचा राज्य पहुँचे। कूचा के राजा ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें राजगुरु बनाया। बाद में, कुमारायण का विवाह कूचा के राजा की छोटी बहन राजकुमारी जीवा से हुआ। कूचा में जन्मे कुमारजीव, माँ की ओर से 'कुचेन' और पिता की ओर से भारतीय थे। इसलिए उन्हें कुचेन-भारतीय माना गया। यह कूचा प्राचीन काल में मध्य एशिया में रेशम मार्ग (सिल्क रूट) पर स्थित एक अत्यन्त समृद्ध बौद्ध साम्राज्य था; जो इस समय चीन के शिनजियाँग प्रान्त में है। इस्वी सन् की आरम्भिक शताब्दियों में ही यहाँ भारतीय बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। यह क्षेत्र भारतीय बौद्ध संस्कृति का बहुत बड़ा केंद्र बन गया था। अपनी भारत यात्रा के दौरान सन् 630 में ह्वेनसांग ने भी कूचा का दौरा किया था और वहाँ सैकड़ो बौद्ध मठ और हजारो भिक्षु देखे थे।
प्राचीन व्यापारिक मार्गों की मद में ‘रेशम मार्ग’ एक ऐतिहासिक यात्रा-पथ था; जो एशिया-यूरोप-अफ्रीका को जोड़ता था; ज्ञान-धर्म-विज्ञान-साहित्यादि के वैश्विक आदान-प्रदान में प्रमुख माध्यम के रूप में संस्थापित एशियाई अनुवाद परम्परा के महत्त्व को रेखांकित करने में इसकी अहम् भूमिका है। इस मार्ग से न केवल रेशम और मसाले जैसी भौतिक वस्तुओं का व्यापार हुआ, बल्कि संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित कर इसने दुनिया की अनुवाद परम्परा को नई दिशा दी। यह कोई सड़क नहीं थी, ज़मीनी और समुद्री रास्तों का विशाल जाल था, जो चीन के चांगआन से शुरू होकर मध्य एशिया, भारत, ईरान, इराक और यूरोप के रोम तक फैला हुआ था। इस मार्ग का नाम 'रेशम मार्ग' इसलिए पड़ा, कि चीन से रेशम का सर्वाधिक निर्यात इसी रास्ते से यूरोप तक होता था। इस रास्ते में व्यापारी-यात्री-भिक्षु-दूत सभी यात्रा करते थे, जिससे अलग-अलग सभ्यताओं का आपस में मेल हुआ।
अनुवाद परम्परा के विकास में रेशम मार्ग ने दुनिया के विभिन्न भाषाई क्षेत्रों के बीच सेतु का काम किया। इसके बिना प्राचीन ग्रन्थों का एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक पहुँचना और उनका अनुवाद होना सम्भव नहीं था। भारतीय बौद्ध भिक्षु और विद्वान रेशम मार्ग से ही मध्य एशिया और चीन पहुँचे। उन्होंने संस्कृत और पाली भाषा के बौद्ध धर्म-ग्रन्थों को चीनी और खोतानी भाषाओं में अनुवाद किया। कुमारजीव और ह्वेनसांग जैसे प्रसिद्ध अनुवादक इसी मार्ग से जुड़े थे। शून्य और दशमलव पद्धति जैसे भारत के गणित और चिकित्सा विज्ञान के ग्रन्थ रेशम मार्ग और फारस के रास्ते ही अरब जगत तक पहुँचे। बाद में अरबी विद्वानों ने यूनानी और भारतीय ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद किया, जिन्हें बाद में लैटिन अनुवाद के सहारे यूरोप भेजा गया। इसी सम्पर्क मार्ग और व्यापारिक मेल-मिलाप के कारण ‘पंचतन्त्र’ ग्रन्थ पहलवी और अरबी होते हुए यूरोप तक पहुँचा।
इसी रेशम मार्ग के मुहाने पर दो अलग-अलग राष्ट्रीयताओं और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि प्रभावी विद्वान कुमारजीव रहते थे। दो महान सभ्यताओं के संयुक्त प्रभाव से उनकी विद्वता और जीव-शैली निर्मित हुई थी। कहें कि कुमारजीव का रक्त भारतीय था और जन्मभूमि कुचेन। इसी अनोखे संगम ने उन्हें इतिहास का सबसे महान अनुवादक और दार्शनिक बनाया। उनका पालन-पोषण और उच्च शिक्षा दोनों ही संस्कृतियों के बीच हुई, जिसने उन्हें अद्वितीय विद्वान बनाया।
शिक्षा और ज्ञान की मद में कुमारजीव, वस्तुतः इन दोनों संस्कृतियों के समागम थे। उनका जन्म और आरम्भिक शिक्षा इसी सिल्क रूट पर स्थित कूचा साम्राज्य में हुई, जो बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा केन्द्र था। जब वे नौ वर्ष के हुए, बौद्ध धर्म और संस्कृत दर्शन की उच्च शिक्षा के लिए उनकी माँ, उन्हें लेकर कश्मीर आ गईं। तब तक वे स्वयं भिक्षुणी बन चुकी थीं। यहाँ उन्होंने वैदिक साहित्य, संस्कृत भाषा और बौद्ध दर्शन; विशेषकर महायान का गहन अध्ययन किया।
भारत-चीन सांस्कृतिक मैत्री के पुरोधा कुमारजीव के कुचेन-भारतीय होने का ऐतिहासिक अर्थ यह भी है कि वे भारतीय दर्शन को मध्य एशिया के रास्ते चीन तक पहुँचाने वाले सबसे मजबूत सेतु बने। बाद के जीवन में जब वे चीन गए, तो उनके पास पिता की विरासत संस्कृत और मध्य एशियाई/कुचेन भाषाओं का असाधारण ज्ञान था। इसी अद्भुत क्षमता के बल पर उन्होंने सैकड़ों मूल्यवान संस्कृत बौद्ध ग्रन्थों का चीनी भाषा में सटीक अनुवाद किया, जिसने पूरे पूर्वी एशिया (चीन, जापान, कोरिया) में बौद्ध धर्म की नींव मजबूत कीं।
अनुवाद-क्रिया में कुमारजीव 'भाव' और 'सहजता' के प्रणेता थे। उन्हें चीनी सम्राट के आमन्त्रण पर चांगआन लाया गया। वे राज्य-समर्थित चीनी अनुवाद ब्यूरो के पहले निदेशक बने। अनुवाद की शैली में उनकी धारणा थी कि अनुवाद को चीनी पाठकों के लिए सहज और काव्यात्मक होना चाहिए। उन्होंने संस्कृत के जटिल व्याकरण को छोड़कर चीनी भाषा के मुहावरों और प्रवाह को प्राथमिकता दी। उन्होंने चौहत्तर के आसपास की संख्या में ग्रन्थों का अनुवाद किया। 'लोटस सूत्र' का उनका अनुवाद इतना लोकप्रिय हुआ कि इसने चीन में बौद्ध धर्म को एक जनान्दोलन बना दिया। उनकी शैली के कारण ही आम चीनी नागरिक बौद्ध दर्शन को आसानी से समझ पाए।
एशियाई अनुवाद परम्परा के दूसरे स्मरणीय सन्त हैं ह्वेनसांग। हर्षवर्द्धन (सन् 590-647) के शासनकाल (सन् 606-647) में वे अपनी भारत-यात्रा (सन् 629-645) पूरी कर, पर्याप्त संख्या में बौद्ध-ग्रन्थों की पाण्डुलिपियाँ लेकर, भारत (नालन्दा) से चीन लौटे; और सम्राट के संरक्षण में एक विशाल अनुवाद केन्द्र स्थापित किया; भारत से साथ लाए सभी ग्रन्थों का चीनी भाषा में अनुवाद किया।
ह्वेनसांग अपनी अनुवाद पद्धति में 'सटीकता' और 'विद्वत्ता' के प्रतीक थे। वे स्वयं एक चीनी भिक्षु थे। कुमारजीव के अनुवादों में कुछ बचे-खुचे विरोधाभासों के निराकरण के उद्देश्य से उन्होंने भारत की यात्रा की; लगभग 16-17 वर्ष भारत में बिताने और संस्कृत सीखने के बाद वे चीन लौटे। अपनी अनुवाद-शैली में वे सटीकता के आग्रही थे। उनका मानना था कि मूल संस्कृत पाठ की पवित्रता और उसके दार्शनिक अर्थों से समझौता नहीं होना चाहिए। उन्होंने एक नई वैज्ञानिक पद्धति विकसित की, जिसे 'वस्तुनिष्ठ अनुवाद' कहा जाता है।
ह्वेनसांग ने अनुवाद के पाँच कठोर नियम बनाए, जिसके तहत ‘धर्म, प्रज्ञा, भगवान’ जैसे कुछेक संस्कृत शब्दों का चीनी में अनुवाद करने के बजाय, वैसे का वैसा रखने का आग्रह दिखाया, ताकि उनका असली अर्थ नष्ट न हो।'महाप्रज्ञापारमिता सूत्र' और 'योगाचार भूमि शास्त्र' जैसे अत्यन्त जटिल दार्शनिक ग्रन्थों समेत सैकड़ो कृतियों के अनुवाद के लिए वे आज भी श्रद्धेय हैं।
इन दोनों महापुरुषों का सामूहिक योगदान ही था कि भारत का बौद्ध-ज्ञान सुदूर पूर्व (चीन, जापान, कोरिया) तक सुरक्षित पहुँच सका और आज भी जीवित है।
चीनी अनुवाद परम्परा की आरम्भिक पद्धति
हान-वंशीय शासनकाल (ई.पू. 206 से सन् 200 तक) में ही बौद्ध-ग्रन्थ भारत और मध्य एशिया से चीन पहुँचने लगे थे। उन दिनों चीनी भाषा में इनके अनुवाद की दो बड़ी चुनौतियाँ थीं – पहली चुनौती थी, व्याकरण-प्रधान, विभक्ति-युक्त भाषा संस्कृत के पाठ का, विभक्तिविहीन चित्रात्मक भाषा चीनी में अनुवाद और दूसरी, ‘निर्वाण और कर्म’ जैसे भारत के आध्यात्मिक विचार को चीन के कन्फ्यूशियसवाद और ताओवाद जैसे सोच में उन्हें ढालना। इन चुनौतियों के निराकरण के लिए आरम्भिक चीनी अनुवादकों ने 'अवधारणा मिलान' की पद्धति अपनाईं, पर इससे मूल बौद्ध-धर्म का असली दार्शनिक अर्थ बदल रहा था। फिर वहाँ अनुवादशाला (इचांग) निर्मित कर सामूहिक अनुवाद की प्रथा बनाई गई; जिसमें मुख्य अनुवादक के रूप में कोई भारतीय या मध्य-एशियाई भिक्षु संस्कृत ग्रन्थ को पढ़ता था और उसका मौखिक अनुवाद करता था। फिर कोई दुभाषिया, मुख्य अनुवादक की बात समझकर उसे चीनी बोलचाल की भाषा में बदलता था। इसके बाद कोई चीनी विद्वान उस मौखिक अनुवाद को शास्त्रीय चीनी भाषा में लिखता था और कोई सुबुद्ध समीक्षक, चीनी में लिखे गए मूल संस्कृत पाठ के दार्शनिक अर्थ के अनुकूल होने की जाँच करता था।
इस कारण वहाँ अनुवादकों के दो खेमों का द्वन्द्व शुरू हो गया -- शाब्दिक अनुवाद (झियी) के पक्षधर और मुक्त अनुवाद (पियी) के पक्षधर। ‘शाब्दिक अनुवाद’ मूल-पाठ के प्रति तो नैष्ठिक होता था, पर चीनी भाषा में अनूदित उबाऊ पाठ, आम पाठकों के लिए जटिल हो जाता था। बाद के अनुवादकों ने शब्दों के बजाय ‘भाव’ और ‘अर्थ' को प्राथमिकता दी। वे संस्कृत के कठिन वाक्यों को चीनी मुहावरों में ढालने लगे।
आरम्भिक दिनों के चीनी अनुवाद की इन अनगढ़ पद्धतियों को कुमारजीव ने अपनी कलात्मकता से सुधारा और ह्वेनसांग ने अपनी वैज्ञानिक दृढ़ता से। चीनी अनुवाद परम्परा को इसी रास्ते दुनिया में श्रेष्ठता मिली।
आरम्भिक चीनी अनुवाद के सोपान
संस्कृत से चीनी भाषा में बौद्ध-ग्रन्थों के आरम्भिक अनुवाद की व्यवस्थित परम्परा बनी; जिसमें सामूहिक अनुवाद की पद्धति विकसित हुई। कुमारजीव और ह्वेनसांग के काल में (चौथी-सातवीं शताब्दी) इस प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया गया। इस दौरान चीन में स्थापित अनुवादशालाओं (इचांग) में इसके मुख्य नौ सोपान माने गए, विद्वानों की एक समिति द्वारा अनुवाद का कार्य होने लगा; जिसमें नौओ विशेषज्ञों की भूमिकाएँ तय होती थीं -- प्रधान अनुवादक, स्रोत-पाठ परीक्षक, अर्थ-परीक्षक, पाठ रचयिता, अर्थ-सत्यापक, वाक्य-शोधक, सम्पादक, अन्तिम पुनरीक्षक या तुल्यक, मुख्य सम्पादक।
1. प्रधान अनुवादक : पूरी अनुवाद प्रक्रिया के केन्द्र में प्रधान अनुवादक ही होते थे। ये प्रायः कोई प्रतिष्ठित भारतीय या मध्य-एशियाई भिक्षु होते थे। इनका कार्य मूल संस्कृत/प्राकृत/पालि पाण्डुलिपि का सस्वर पाठ और चीनी विद्वानों को उसका दार्शनिक अर्थ समझाना होता था।
2. स्रोत-पाठ परीक्षक : इस दायियत्व में संस्कृत/प्राकृत/पालि भाषा के एक और विशेषज्ञ होते थे, जिनका कार्य प्रधान अनुवादक के पाठ-वाचन को मूल पाण्डुलिपि की दूसरी प्रतियों से मिलान कर सुनिश्चित करना होता था कि इस वाचन में मूल पाठ की तुलना में कहीं त्रुटि या अशुद्धि तो नहीं है।
3. अर्थ-परीक्षक : इस भूमिका में वैसे व्यक्ति होते थे जो संस्कृत/प्राकृत/पालि और चीनी -- अर्थात्, स्रोत-लक्ष्य दोनों भाषाओं के प्रकाण्ड पण्डित हों। इनका कार्य प्रधान अनुवादक द्वारा समझाए गए अर्थ को सुनकर उसे चीनी बोलचाल की भाषा में मौखिक रूप से अनुवाद करना होता था।
4. पाठ रचयिता : इस भूमिका में चीनी भाषा के कुशल लेखक होते थे, चीनी भाषा में निर्धारित मौखिक अनुवाद को ये लिखित रूप में दर्ज करते थे।
5. अर्थ-सत्यापक : इस भूमिका में बौद्ध दर्शन के गहन विद्वान होते थे, जिनका दायित्व उक्त क्रिया से प्राप्त चीनी पाठ की तुलना मूल पाठ से करते हुए परीक्षण करते थे कि अनुवाद के दौरान बौद्ध सिद्धान्त के अर्थ में कोई बदलाव तो नहीं आ गया!
6. वाक्य-शोधक : इस भूमिका में चीनी व्याकरण के विशेषज्ञ होते थे, जिनका दायित्व मूल-पाठ और चीनी-पाठ की संरचना-परीक्षण से बिल्कुल अलग होता था। वे उक्त विशेषज्ञों के लिखित मसौदों की वाक्य-संरचना चीनी भाषा के व्याकरणिक स्वाभव और मुहावरों के अनुसार व्यवस्थित करते हुए सुगम बनाते थे।
7. सम्पादक : इस भूमिका में प्रायः श्रेष्ठ कोटि के चीनी साहित्यकार होते थे, जो विषयानुकूल पाठ की शिल्प-शैली का परीक्षण करते थे । इस सोपान में अनुवाद को व्याकरणिक रूप से शुद्ध बनाने के साथ-साथ सम्प्रेषणीय और प्रवाहपूर्ण बनाया जाता था, ताकि चीनी विद्वानों और सम्राट को इसे पढ़ने में आनन्द आए।
8. अन्तिम पुनरीक्षक या तुल्यक : इस भूमिका में प्रधान अनुवादक और राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों की एक संयुक्त समिति होती थी, जो पूरे ग्रन्थ की गुणवत्ता का आरम्भ से अन्त तक दोबारा मूल्यांकन करते थे। अनूदित पाठ की निरर्थक प्रयुक्तियों या विरोधाभासों का निराकरण, मूल-पाठ के विशेषज्ञों के सहयोग से करते थे।
9. मुख्य सम्पादक : इस तरह सामूहिक पद्धति से हुए अनुवाद-कार्य में मुख्य सम्पादक की निर्णायक भूमिका होती थी। इस भूमिका में प्रायः स्वयं सम्राट या उनके द्वारा नियुक्त कोई प्रतिनिधि होते थे, जिनका कार्य अनुवाद की शुद्धता की अन्तिम स्वीकृति देना होता था। इसके बाद ही उस ग्रन्थ की प्रतियाँ आधिकारिक रूप से बौद्ध मठों और पुस्तकालयों में भेजी जाती थीं।
इस तरह की चरणबद्ध सांस्थानिक प्रक्रिया, प्राचीन एशियाई अनुवाद परम्परा की वैज्ञानिकता और पारदर्शिता रेखांकित करती है। इस सामूहिक उत्तरदायित्व के कारण ही हज़ारों मील दूर से आए विचार, चीनी संस्कृति में रच-बस गए, बौद्ध-धर्म चीन का मुख्य धर्म बन गया।
संस्कृत और चीनी भाषा की विपरीत प्रकृति के बावजूद, अनुवाद चिन्तकों की निष्ठा ने, इसे इतनी ऊँचाई दी कि चीन में विकसित हुई इस अनुवाद परम्परा के प्रभाव में सुदूर पूर्व के देश जापान और कोरिया का पूरा सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास बदल गया।
‘अनूदित चीनी बौद्ध साहित्य' जापान और कोरिया के लिए ज्ञान का मुख्य स्रोत बन गया। जापान और कोरिया ने भारत की मूल संस्कृत के बजाय चीनी अनुवादों के माध्यम से बौद्ध धर्म और भारतीय दर्शन को अपनाया।
बौद्ध-धर्म को समझने के लिए कोरियाई विद्वानों ने चीनी भाषा को अपनी साहित्यिक भाषा बना लिया। चीनी बौद्ध ग्रन्थों को पढ़ने और उनका अनुवाद करने के लिए जापानियों ने चीनी वर्णों को अपनाया, जिन्हें आज जापान में 'कांजी' कहा जाता है।
जापान का प्रसिद्ध बौद्ध सम्प्रदाय 'ज़ेन', जो संस्कृत के 'ध्यान' और चीनी के 'चान' से बना है, कुमारजीव द्वारा किए गए चीनी अनुवादों पर आधारित है।
जापानियों ने चीनी ग्रन्थों को पढ़ने की एक विशेष अनुवाद पद्धति विकसित की जिसे 'कम्बन' कहा जाता है।
इस तरह महामनीषियों के अनुवादकीय अवदान ने संस्कृत-चीनी के बीच की व्याकरणिक दूरी मिटाने के लिए जैसी अनुवाद पद्धतियाँ चीन में विकसित कीं, उससे न केवल चीनी भाषा समृद्ध हुई, बल्कि कोरिया और जापान को एक साझी लिपि, दर्शन और संस्कृति के सूत्र में बाँध दिया।
इस्लामिक और मध्य-पूर्व परम्परा
मध्य-पूर्व एशिया (एशिया का पश्चिमी भाग) ने पूर्व (भारत/चीन) और पश्चिम (यूनान/ग्रीक) के बीच सांस्कृतिक पुल का काम किया। यहीं टिगरिस (दजला) नदी तट पर बसे शहर बगदाद (इराक की राजधानी) में दुनिया का सबसे बड़ा अनुवाद केन्द्र बना; जिसे ‘बैत अल-हिकमा’ ('बौद्धिकता का आवास’ या ‘ज्ञान का श्रीनिवास’ या 'हाउस ऑफ विज़डम') कहा गया। अब्बासी खलीफा अबू जाफ़र अल-मन्सूर (सन् 754-775) ने इसकी नींव रखी, जिसका प्रभूत विकास उनके वंशज खलीफे हारून अल-रशीद (786-809 ईस्वी) के समय में हुआ। शाही पुस्तकालय के रूप में शुरू हुए इस ज्ञानागार में दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ सहेजकर रखी जाती थीं। इराक में आठवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर 13वीं शताब्दी के मध्य तक के समय को इस्लामी स्वर्ण युग कहे जाने में, इस संस्था की बड़ी भूमिका थी; जिसने ज्ञान-प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाई।
हारून अल-रशीद के पुत्र खलीफा अल-मामून (सन् 813–833) के शासनकाल में इस संस्था का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। उन्होंने इसे सार्वजनिक अकादमी और विज्ञान केन्द्र में बदल दिया, जहाँ दुनिया भर से विद्वान खिंचे चले आते थे। उस दौर में यह सार्वजनिक अकादमी, अत्यन्त प्रसिद्ध पुस्तकालय और बौद्धिक केन्द्र के साथ-साथ दुनिया भर में ज्ञान-विज्ञान-दर्शन-गणित का सबसे बड़ा केन्द्र मानी जाती थी। यहाँ संस्कृत के गणित, खगोलशास्त्र और आयुर्वेद के चरक संहिता, सुश्रुत संहिता जैसे ग्रन्थों तथा अरस्तू, प्लेटो जैसे दार्शनिकों के ग्रीक ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ।
ग्रीक, फ़ारसी, संस्कृत, सीरियाई भाषाओं के महान वैज्ञानिक और दार्शनिक ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद करवाकर इस संस्था ने अनुवाद को आन्दोलन का रूप दे दिया।
उस दौर के खलीफा, विद्वानों को प्रोत्साहित करने के लिए इनाम में, अनूदित पुस्तकों के वजन के बराबर सोना दिया करते थे।
इस संस्थान में धर्म और राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी विद्वान एक साथ काम करते थे। सन् 1258 में चंगेज खान के पोते हलाकू खान के नेतृत्व में मंगोल सेना ने बगदाद पर हमला कर पूरे शहर को तहस-नहस कर दिया और बैत अल-हिकमा की लाखों बहुमूल्य और दुर्लभ पुस्तकों-पाण्डुलिपियों को दजला नदी में फेंक दिया। समकालीन इतिहासकारों के अनुसार, पुस्तकों की स्याही से दजला नदी का पानी पूरी तरह काला हो गया था, जिसने इस्लामी स्वर्ण-युग के इस महान ज्ञान केन्द्र को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।
अब्बासी खलीफा के इस ज्ञानात्मक प्रयास से पूर्व सासानी साम्राज्य के प्रतापी सम्राट खुसरो प्रथम, जिन्हें 'अनुशीरवान' (अमर आत्मा वाला) कहा जाता था; वे भी दुर्द्धर्ष योद्धा होने के साथ-साथ कला-विज्ञान-साहित्य के बड़े संरक्षक माने जाते थे। उनके शासनकाल (सन् 531-579) को भी प्राचीन फारस (ईरान) का 'स्वर्ण युग' माना जाता था। सन् 529 में रोमन सम्राट जस्टिनियन ने एथेन्स की प्रसिद्ध ग्रीक अकादमी को बन्द कर दिया, तो खुसरो प्रथम ने उन निर्वासित यूनानी दार्शनिकों को अपने साम्राज्य में शरण दी और ग्रीक एवं सीरियाई ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद करवाया।
चिकित्सा ग्रन्थों की खोज के लिए उन्होंने अपने राजवैद्य बोरजुया को विशेष रूप से भारत भेजा था, जो भारत से संस्कृत के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पंचतन्त्र’ लेकर लौटे। छठी शताब्दी (लगभग 550–570 ईस्वी) में उन्होंने राजा की देखरेख में उसका पहलवी अनुवाद किया। इसी पहलवी अनुवाद के आधार पर आगे चलकर सन् 750 के आसपास अब्दुल्लाह इब्न अल-मुक़फ़ा ने इसका अरबी अनुवाद 'कलीला वा दिम्ना' शीर्षक से किया, जिससे यह ग्रन्थ पूरे यूरोप और मध्य-पूर्व में प्रसारित हुआ। यद्यपि बोरजुया द्वारा पहलवी में अनूदित प्रति अब लुप्त है। पर, ‘पंचतन्त्र’ की वैश्विक यात्रा का सर्वसुलभ सेतु अरबी अनुवाद बना; क्योंकि अब्बासी राजवंश के समय में व्यापार, शिक्षा और साहित्य की वैश्विक भाषा अरबी बन गई थी। परिणामस्वरूप, इस अरबी संस्करण की लोकप्रियता राजाओं से लेकर आम जनता तक फैल गई। आगे चलकर इस ग्रन्थ ने अरबी और यूरोपीय साहित्यों को भी प्रभावित किया। यूरोपीय भाषाओं में इसके प्रसार शुरू हो गए। ग्रीक, स्पेनिश आदि भाषाओं में इसके अनुवाद हुए; अंग्रेजी में तो बहुत बाद में हुआ।
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