Sunday, August 2, 2026

विद्यापति का सम्प्रदाय-निर्धारण जरूरी है क्या? Is Any Need the Sect Determination of the Great Vidyapati?

 

विद्यापति का सम्प्रदाय-निर्धारण जरूरी है क्या?

दुनिया भर के लोग साहित्य को, चिरकाल से जीवन का प्रतिबिम्ब कहते आए हैं; पर यह साहित्य का रूपगत वैशिष्ट्य है। वस्तुनिष्ठता की दृष्टि से साहित्य, जीवन की व्याख्या है। निज जीवन की व्याख्या नहीं, सामुदायिक जीवन की व्याख्या! अब प्रश्न है कि कोई मनुष्य सामुदायिक जीवनानुभूति की व्याख्या कैसे करे? अनुभूति तो उसे केवल अपने जीवन की है! समुदाय भर के राग-विराग, दुख-दुविधा का विवरण वह कैसे दे सकता है?...दे सकता है! जीवन-दृष्टि विवेकशील हो और दार्शनिकता विलक्षण हो, तो वह सामुदायिक जीवन का संज्ञान ले सकता है। अपने ही उल्लास से आत्मरति करता हुआ या अपनी ही पीड़ा में रोता हुआ मनुष्य निश्चय ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि उसका सोच आत्म से बाहर नहीं होता! पर संवेदनशील सृजेता अपनी जीवन-दृष्टि के विवेकशील उपयोग से ऐसा कर पाता है।

अपने समय के जनसामान्य की जीवन-क्रिया और शासकों की प्रशासनिक नीति को कोई सृजेता, ठीक वैसे ही नहीं देखता, जैसे जनता और शासक देखता है। श्रमशील मनुष्य के जीवन को, संग्राम बना देनेवाले शासकों की नीति और नीयत की समझ जनता को नहीं हो पाती, सृजेता को होती है; वह विवशता में भी खुशी के दो पल बना लेने का नागरिक-कौशल देखकर मुग्ध भी होता है, एक सीमा तक चिन्तित भी। परिवेश और सामुदायिक जीवन-क्रिया को गहन-दृष्टि से देखते हुए इसी मुग्धता और चिन्ता के कारण उसका चैतन्य जनसामान्य और मनुष्यता का पक्षधर बनता है। सृजेता के मानवीय अनुराग को यही संवेदना और चैतन्य, जीवन्त करता है, उद्बुद्ध करता है। रचनात्मक कौशल से नहाकर उनकी यही जीवनानुभूति, सामुदायिक अनुभूति की छवि पाती है। इसके लिए भोक्ता के अनुभव में उदारता, सृजेता के जीवन-दर्शन का वैराट्य अनिवार्य होता है।

भारतीय परिवेश में सौभाग्यवश विद्यापति, ऐसे ही सृजेता हैं। स्मरणीय है कि कालिदास और विद्यापति, हमारी सभ्यता और संस्कृति के लिए कोई मनुष्य भर नहीं, वरदान हैं, मनुष्य के रूप में अवतार हैं; जिनका हरेक वाक्य, हरेक कथन आज भी हमारी सभ्यता को दिग्दर्शन दे रहा है, पथ आलोकन कर रहा है।

आज के समालोचक विद्यापति को बेशक गुटकों में बाँट लें, रसवादी, सम्प्रदायवादी, विधावादी, विषयवादी समीक्षा प्रस्तुत कर लें, पर विद्यापति वस्तुतः एक ही रस, एक ही सम्प्रदाय, एक ही विधा, एक ही विषय के रचनाकार थे--वह रस-सम्प्रदाय-विधा-विषय था मनुष्य का जीवन। राजा का जीवन, प्रजा का जीवन! उनकी सृजनात्मकता दोनो ही मानव प्रजाति के लिए सदैव दिग्दर्शक की तरह क्रियाशील रही।

वे आत्मकेन्द्रित नहीं थे, इसलिए कभी चारण-वृत्ति नहीं अपनाई, राजाओं को तृप्त करने में कभी लिप्त नहीं हुए, विभिन्न भावों के पद एवं ‘पुरुष परीक्षा’ जैसे नीतिशास्त्र तथा अन्य स्मार्त-ग्रन्थों द्वारा उन्हें नीति सिखाते रहे, जनसामान्य के जीवन पर पड़नेवाले युद्धोत्तर परिताप से उन्हें परिचित कराते रहे। रूस-युक्रेन और इजराइल-इरान के युद्ध का दुष्प्रभाव युद्ध से बाहर रहे राष्ट्रों पर भी जिस तरह पड़ा है, उसकी व्याख्या आज के नीति पुरोधा जिस तरह कर रहे हैं, ‘कीर्तिलता’ के पृष्ठों में साढ़े छह सौ वर्ष पूर्व विद्यापति ने अंकित कर दिया था! कदाचित पड़ोसी शासकों (शर्कीवंशीय, गौड़वंशीय) की राजसभा में भी विद्यापति जैसे चिन्तक रहे होते, तो अपनी सीमाविस्तार के लिए वे इतने आक्रामक न होते। प्रायः विद्यापति के दिग्दर्शन का ही परिणाम हो कि कीर्तिसिंह या शिवसिंह ने केवल अपने और अपनी प्रजा के स्वाभिमान-रक्षा के लिए युद्ध किया, कभी आक्रमण नहीं किया।

शासकीय विधान का हिस्सा होने के बावजूद जनहित-चिन्ता विद्यापति की दिनचर्या थी। इतिहास साक्षी है कि पड़ोसी सुलतानों के खब्ती आचरण से, उनके शृंखलाबद्ध आक्रमणों से, उस दौर की शन्तिप्रिय मिथिला की जीवन-क्रियाएँ पल-पल आशंकित रहती थीं। कब उनके जान-माल, इज्जत-आबरू पर कौन-सा संकट आ जाए, कुछ सुनिश्चित नहीं था; पूरा जीवन ही अनिश्चय की गोद में था। शिवसिंह जैसे प्रतापी वीर का संरक्षण अवश्य प्राप्त था, पर आश्वस्ति तो किसी बात की नहीं थी। प्रताप-वर्द्धन की सनक में सुलतानों की क्रूरता से तो जन-जन परिचित थे! इस परिताप में विद्यापति की दृष्टि मैथिल मानस को हताश-निराश देख रही थी। वे जनसामान्य के बोध-स्तर से भी परिचित थे! इसलिए उन्होंने जीवन के प्रति जन-जन में अनुराग-संचार के लिए शृंगार-रस के विविधवर्णी पद रचे और शासकीय एवं बौद्धिक लोगों के लिए नीति-धर्म-विवेक-शास्त्र के ग्रन्थ रचे।

सृजेता के रूप में उनका मन जितना विवेकशील, विवेक जितना चैतन्य, चेतना जितनी जाग्रत, जागृति जितनी बहुआयामी, बहुआयामिता जितनी मानवीय और एकनिष्ठ थी, ऐसी समग्रता सामान्यतया किसी एक शरीर-प्राण के साथ नहीं मिलती। ऐसे रचनाकारों का ‘मैं’ और ‘मेरा’, ‘सर्व’ और ‘समष्टि’ में विलीन हो जाता है। ऐसे रचनाकार जीवन भर औरों का जीवन जीते हुए, अपनी देह में रहकर औरों के देह-मन की पीड़ा भोगते रहते हैं। इसीलिए विद्यापति की रचनाएँ जीवन की समग्र व्याख्या हो पाई, जिनमें धर्म-कर्म-कर्तव्याकर्तव्य की सारी समझ समाई हुई है।

उनके जीवन और सृजन को सही-सही समझने पर हर किसी को लगेगा कि वे अब तक अपूर्ण थे, अब पूर्ण हुए हैं। ऐसी समझ बन जाने पर वे स्वतः समझ जाएँगे कि विद्यापति कोई भक्त-शृंगारिक-दरबारी या वैष्णव-शाक्त-शैव-स्मार्त नहीं थे, अपूर्ण मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए, उन्हें मनुष्यता का भाव समझाने के लिए, जीवन-दर्शन और कर्तव्याकर्तव्य समझाने के लिए नियति द्वारा भारतीय सभ्यता के नाम वरदान थे! ‘अभिनव जयदेव’ की उपाधि तो उन्हें राधाकृष्ण विषयक गीत लिखने के कारण जल्दबाजी में दे दी गई उपाधि थी; जो उन्हें रचनात्मक जीवन के आरम्भिक समय में ही दी गई थी। आगे के दिनों में तो उनका रचनात्मक व्यक्तित्व इतना बड़ा हो गया कि वे उस उपाधि में समा नहीं रहे थे। फिर भी लोग उनके भक्त-शृंगारिक-दरबारी होने या वैष्णव-शाक्त-शैव-स्मार्त होने पर बेवजह विचार करते हैं, रचनाओं की वस्तुनिष्ठता छोड़कर उसकी रूपगत व्याख्या में तल्लीन हो जाते हैं, इसलिए यहाँ उस प्रसंग में कुछ बातें करनी पड़ेंगी!

जिस साहित्य-सृजन को यहाँ जीवन की व्याख्या मानने की संस्तुति की जा रही है, वस्तुतः उसकी समझ बनाने के लिए भावकों से भी एकनिष्ठता और ईमानदारी अपेक्षित है। उसके बिना उन्हें सृजेता के हरेक उद्यम में कुछ अवान्तर ही दिखेगा! स्वयं द्वारा धारण कर लिए गए दायित्वों से दबा रहना हर सृजेता की नियति होती है। समाज की स्वतन्त्र इकाई के रूप में वह केवल कहने के लिए स्वतन्त्र होता है, उनका दायित्वबोध उन्हें वस्तुतः स्वतन्त्र नहीं रहने देता। उसके जीवन-बोध का हरेक भाव, हरेक विचार देश-काल एवं सामाजिक-प्रशासनिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से प्रभावित और निर्धारित होता रहता है। इस प्रभाव को झेलकर भी, चरम सत्य की पक्षधरता अपनाए हुए भी, सृजेता अपने आसपास संचालित सामुदायिक वातावरण को किस मधुरिमा का संकेत देता है, किस ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, इसका अनुशीलन ही किसी भद्र समीक्षक की वृत्ति होनी चाहिए। और, ऐसी समीक्षा के लिए प्रदत्त परिथितियों में नागरिक जीवन-क्रिया से बड़ा उपकरण कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि गतिशीलता केवल जीवन में होती है; शास्त्रीय मानक या विमर्शवादी सूत्र या दलगत सिद्धान्त तो स्थिर होते हैं; स्थिर सूत्रों से गतिशील वस्तु-प्रसंगों का मूल्यांकन कैसे होगा?

हर व्यक्ति के जीवनकाल में विवशताएँ और सुविधाएँ अलग-अलग होती हैं; अपने जीवन के इन दोनो उपादानों में संगति बिठाने की पद्धति भी सबकी अलग होती है। किस सुविधा में फैलकर कौन मनुष्य कौन-सा वांछित-अवांछित मार्ग अपनाएगा और किस विवशता में टूटकर कौन मनुष्य कौन-से आपराधिक कृत्य की ओर चल पड़ेगा; इस विकल्प का चयन मनुष्य अपनी जीवन-दृष्टि से ही करता है।

महाकवि विद्यापति मिथिला नरेश के राजपण्डित थे, बालपन से ही पिता के साथ दरबार जाना और सभासदों का विचार-विमर्श सुनना उनकी दिनचर्या में अनायास ही समाविष्ट हो गया। महाराज गणेश्वर के पुत्र वीरसिंह, कीर्तिसिंह और महाराज देवसिंह के पुत्र शिवसिंह उनके समवयस्की थे; इनके शासनकाल में वे सम्मानित सभासद भी रहे; समवयस्की तो वे त्रिपुरसिंहसुत राएअर्जुन के भी थे; पर उनके सम्बन्ध में विद्यापति की धारणा कैसी थी, इस पर सूक्ष्म विचार ‘रसवाणी’ या ‘कीर्तिगाथा’ टीका के साथ हुआ है। पिता के नियोक्ता की सन्तानों के साथ बालपन बिताते हुए भी कभी किसी मनोग्रन्थि का शिकार न होना या किसी राजकुमार द्वारा ही इन्हें लघुतर न समझा जाना--उनकी कितनी श्रेष्ठ छवि निर्मित करती है, इस पर किसी ने कभी विचार नहीं किया।...गौर करना होगा विद्यापति मिथिला राज में महाराजपण्डित थे, दरबारी नहीं थे, चारण नहीं थे, उनकी किसी रचना में चारण-वृत्ति नहीं दिखती! रचनाओं में राजा या रानी की प्रशस्ति करना चारण-वृत्ति नहीं है, शिष्टोक्ति है, सभ्यता है! जो लोग इसे दरबारीपन कहते हैं, उन्हें फिर से स्मरण कराऊँ कि विद्यापति, मिथिला के वैदुष्य का विनय-भाव त्यागकर आज के मूढ़-मुग्ध आत्मविश्वास का अनुगमन नहीं करते थे!

वीरगाथा से शुरू कर, नैबन्धिक स्मार्त-ग्रन्थ तक की रचनात्मक यात्रा में उन्होंने जिस तरह का दृष्टान्त प्रस्तुत किया, परवर्ती काल में वह परिपाटी बन गई, जिसका अनुगमन शताब्दियों तक अनेक रचनाकारों द्वारा होता रहा। उन्होंने शृंगारिक एवं भक्तिपरक पदों के साथ-साथ अनेक धर्मशास्त्रीय एवं स्मार्त कोटि की नैबन्धिक रचनाएँ कीं; पर विडम्बना है कि उनके सम्प्रदाय-निरूपण के लिए, उन्हें भक्त-शृंगारिक-वैष्णव-शैव-शाक्त सिद्ध करने के लिए लोग केवल उनके पदों को आधार बनाते हैं। जबकि उनके सृजनात्मक मर्म के सही वस्तु-बोध के लिए केवल उनके कुछेक पदों के अवगाहन पर्याप्त नहीं हैं; चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्दी की मिथिला की परिस्थिति का ज्ञानार्जन आवश्यक है, उस दौर के मैथिल समाज और मैथिल सम्प्रदाय से परिचय अनिवार्य है।

तत्त्वान्वेषी दृष्टि से विद्यापति की रचनाओं के अनुशीलन का उद्वेग आज भी मैथिलों में नहीं हुआ है, कारण प्रायः यह हो कि उस दौर के बौद्धिकों में ‘देसिल बयना’ के प्रति उपेक्षा-भाव था, आज के बौद्धिकों में परांग्मुखता। आज के बौद्धिक, भाषा या मातृभाषा को बाजार-मूल्य से नापने की चेष्टा करते हैं। वे इतना भी कलित नहीं कर पाए हैं कि दुनिया की किसी भी भाषा को इतना समृद्ध धरोहर नहीं है। उन्हें अपने पाए हुए के लिए कोई गर्व नहीं है। उस दौर में तो सहज ही दर्शन और धर्मशास्त्र के समक्ष साहित्य का अनुशीलन, उसमें भी भाषा (देसिल बयना) के साहित्य का अनुशीलन निरर्थक कार्य माना जाता था। इस सम्बन्ध में कोई सोचते तक नहीं थे। इसके साथ-साथ विद्यापति की ख्याति समकालीन बौद्धिकों, अनुभवसिद्ध पण्डितों के लिए एक चुनौती बन गई थी। इस प्रसंग में रमानाथ झा का कथन सही है कि उन्हें सौंपा गया विस्फी दान-पत्र (सन् 1402 में), ‘अभिनय जयदेव’ की उपाधि, परवर्ती रचनाकारों द्वारा उनकी रचना-प्रणाली के अनुगमन से विदित है कि वे जीते जी इतने ख्यात, इतने सम्मानित हो गए थे, जितने कोई मृत्यूपरान्त भी नहीं हो पाते।[1]

भाषा-साहित्य की मामूली समझवाले अध्येता भी जानते हैं कि संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित होते हुए भी विद्यापति ‘देसिल बयना’ के प्रबल अनुरागी थे। भाषा-विधान के इतने बड़े साधक की रचनाओं में राष्ट्र-हित का विवेक, राज-धर्म की नीति, सामुदायिक जीवन की सौविध्य-रक्षा और लोकानुरंजन द्वारा जीवनराग के सूत्र का संगम था! राधाकृष्ण प्रेम विषयक जिस गीत परम्परा से जयदेव को ख्याति मिली, गीत विधा को इतनी लोकप्रियता मिली; विद्यापति ने उसे जनसामान्य के जीवन से जोड़ दिया। अपनी विलक्षण सूझ-बूझ से राधा-कृष्ण विषयक उसी भाव के राग-ताल-लयाश्रित गीत जब इनके यहाँ देसिल बयना में आए, तो वे जन-मन पर छा गए। यहाँ भगवत् रूप त्यागकर राधा-कृष्ण, ग्रामीण परिवेश के सामान्य युवती-युवक के रूप में प्रकट हुए। गीतों का रचाव इतना कौशलपूर्ण हुआ कि वहाँ एक ओर बंगीय वैष्णव सन्तों को भगवत् रूप राधा-कृष्ण का दर्शन हुआ, तो दूसरी ओर मिथिला के सामान्य भावकों को अपनी छवि-चर्या दिखने लगी। स्पष्टतः उन गीतों की लोकप्रियता परवान चढ़ बैठी! भगिनीभाषाभाषी क्षेत्रों--बंगाल, आसाम, उड़ीसा में ये गीत सम्मोहक हो उठे। चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव ने इस प्रशस्ति को और बढ़ाया, उनके शिष्यों ने इस प्रसार को बल दिया। दर्शन-विद्या सीखने के लिए मिथिला आए बंगवासी युवा भी गीत सीखकर वापस जाते और वहाँ उसका प्रसार करते। इस तरह विद्यापति के गीतों का प्रसार मिथिला से बाहर होता रहा।

विदित है कि प्रेम के ‘मधुर भाव’ का प्रचुर सम्मोहन भक्तिमार्ग में भी है। शास्त्रज्ञों की दृष्टि से ‘भक्ति’ और ‘शृंगार’--दोनो रसों का स्थायी-भाव ‘पूर्ण समर्पण’ ही है। इष्ट अथवा आराध्य में स्वयं को विलीन कर देना ही प्रेम और भक्ति को सार्थक करता है। ‘सूफी भक्ति’ से तो हरेक भावक विज्ञ हैं। राधा-कृष्ण विषयक विद्यापति के प्रेमगीतों के ये ‘मधुर भाव’ इसी कारण भक्ति-मार्ग में भी सम्मोहक सिद्ध हुए। बंगवासी वैष्णव भक्तों ने इसी कारण इन गीतों को भक्तिगीत के रूप में स्वीकार किया। विद्यापति के अनुकरण में उनलोगों ने भी राधाकृष्ण प्रणयलीला के मधुर भावों का वर्णन करते हुए रचनाएँ कीं! अर्थात् चैतन्य के वैष्णव-धर्म के प्रचारार्थ विद्यापति के गीत बंगाल के घर-घर में गाए जाने लगे। हमारे विद्यापति, वैष्णवों के आचार्य माने जाने लगे।

बंगीय विवेचकों के बीच इन्हें वैष्णव मानने की धारणा दृढ़ होने लगी। इनके शृंगारिक पदों में भी भक्ति दिखने लगी, प्रेम के आराध्य कृष्ण दिखने लगे। बाबू ब्रजनन्दन सहाय ने इन्हें ‘वैष्णव-कवि-चूड़ामणि’ कहा। रूपक-सन्धान की चेष्टा किए बिना, पदों के गूढ़ार्थ में गए बिना, वे उन्हें सदैव भगवत् रूप राधा-कृष्ण ही मानते रहे!...इन पदों में चित्रित राधा या कृष्ण के ठेठ ग्राम्य आचरण, भोरी-छोरी या रसिया-छोरा जैसा सहज व्यवहार लक्ष्य कर लेते, तो आसानी से रूपक-सन्धान हो जाता। इन विवेचकों ने कभी गौर नहीं किया कि विद्यापति का यही भाषिक व्यवहार, उन्हें भारतीय साहित्य के राधा-कृष्ण गीत लिखनेवाले अन्य शृंगारिक कवियों से अलग करता है। इन शृंगारिक पदों के सहारे जो अध्येता ऐसे विद्यापति को ‘वैष्णव-गह्नर’ में स्थापित कर उनका सम्प्रदाय-निरूपण करते हैं, वे निश्चय ही साहित्य के तत्त्वबोध के प्रतिगामी हैं, अगली पीढ़ी को विद्यापति की समझ बनाने में बाधा उत्पन्न करते हैं!

अब रचना और रचनाकार के जनसरोकार का अनुशीलन करने की क्षमता न हो, फिर भी मन में समालोचक कहलाने की लिप्सा ताबड़तोड़ अंगराइयाँ ले रही हो, तो ऐसी ही उटपटांग बातें हो ही सकती हैं। विवेचकों को प्रायः स्मरण हो कि बहुदेवोपासक समाज का कोई गृहस्थ कवि किसी एक पन्थ या सम्प्रदाय में स्वयं को केन्द्रित नहीं कर सकता। मिथिला समाज के सांस्कृतिक आचरण की समझ जिस किसी को नहीं होगी, वे ऐसी ही असंगत बातें करेंगे!

मिथिलांचल में विद्यापति के जिन दो कोटियों के पद प्रशस्त हैं और घर-आँगन, तीज-त्योहार, मन्दिर-चैपाल में गाए जाते रहे हैं; वे हैं ‘तिरहुत’ और ‘भजन’। उनके सारे शृंगारिक पद, आचार-व्यवहार-ऋतु-उमंगादि के पद ‘तिरहुत’ कहलाते हैं, कालान्तर में जिनके अनेक प्रसंगानुकूल नामकरण हुए--कोहबर, डहकन, सोहर, समदाउन, उदासी, पावस, लगनी, बटगमनी, फाग, चैती, मान, बरहमासा, निर्गुण...इत्यादि। दूसरी कोटि के पद शिव-पार्वती या विभिन्न देवी-देवताओं की अर्चना में गाए जानेवाले गीत, भजन या भक्ति-गीत हैं। शिव की अर्चना में गाए जानेवाले पदों को मिथिला में ‘नचारी’ कहा गया। ‘तिरहुत’ में अर्चना या अर्चना में ‘तिरहुत’ का उलटफेर यहाँ कभी नहीं हुआ; ‘तिरहुत’ कभी ‘अर्चना’ की तरह या ‘अर्चना’ ‘तिरहुत’ की तरह कभी नहीं गाए गए। राधा-कृष्ण प्रेम विषयक गीत सदैव रसिकों के बीच शृंगारिक गीत की तरह ही गाए गए। इन गीतों को गाते हुए कभी किसी मैथिल के हृदय में भक्ति-भाव नहीं उपजा। या फिर भजन-नचारी गाते समय किसी के मन में कभी कामवेग नहीं उपजा।

विद्यापति की रचना-पद्धति के परवर्ती अनुगामी कवियों में भी कोई वैष्णव कवि या वैष्णव-धारा के कवि नहीं माने गए। उनके भक्तिपरक पदों के अनुगमन में भी ढेरो रचनाएँ हुईं। अनेक कवियों ने शिव-अर्चना, भगवती-वन्दना के गीत रचे। नदी-पूजन, प्रकृति-पूजन के अनेक पद रचे गए। पर उनमें से कोई सम्प्रदायगत पद्धति से वैष्णव पद नहीं माने गए। मिथिला में विष्णु के अवतार राम और कृष्ण की भक्ति की प्रथा अवश्य है, पर उस भक्ति को ईश-भक्ति के रूप में ही देखा जाता रहा, कभी सम्प्रदायगत स्वरूप की पहचान नहीं हुई। रामभक्तों या कृष्णभक्तों को कभी वैष्णव नहीं माना गया। रमानाथ ने तो दृढ़तापूर्वक कहा कि मैथिली में विष्णु-भक्ति विषयक गीतों का अत्यन्त अभाव है। यहाँ रामनवमी या कि कृष्णाष्टमी के अवसर पर कभी विद्यापति के गीत नहीं गाए जाते। जो गाए जाते हैं, वे हिन्दी या ब्रजभाषा के होते हैं।[2]

मिथिला में विष्णु-पूजन की प्रथा थी, पर वैष्णव-पन्थ की सम्प्रदायगत दृढ़ता कभी नहीं थी। यहाँ सदैव स्मार्त पद्धति की ‘पंचदेवोपासना’ का चलन रहा। ‘स्मार्त’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘स्मृति’ से हुई है। इसके अनुगामी वेदों, उपनिषदों और स्मृति ग्रन्थों जैसे धर्मशास्त्रों एवं पुराणों में बताए गए आनुष्ठानिक पद्धतियों का दृढ़ता से पालन करते हैं। शिव, विष्णु, शक्ति (देवी), गणेश, सूर्य--पंचदेवोपासना के सभी प्रमुख देवताओं की पूजा का समान महत्त्व इनकी भक्ति में होती है। यह हिन्दू धर्म की ऐसी समावेशी परम्परा है, जिसमें सभी देवताओं को एक ही परम-सत्ता (ब्रह्म) के विभिन्न रूपों में देखा जाता है। इस भक्ति में किसी एक देवता की दृढ़ भक्ति में सीमित रहने का बन्धन नहीं है। सभी देवताओं की पूजा में विश्वास रखा जाता है। स्मार्त भक्त अपनी पसन्द के किसी भी देवता को अपना ‘इष्ट’ मान सकते हैं, पर अन्य देव-देवियों का भी समान सम्मान करते हैं। यहाँ के नागरिक-मत में भक्ति सम्बन्धी कोई सीमाबन्दी नहीं हुई। अधिकांश लोग यहाँ शाक्त होते हैं, शैव भी होते हैं, पर वैष्णव तो गिने-गुथे ही मिलते हैं। वे भी उस दृढ़ता से अलग।

राधा-कृष्ण प्रेम विषयक पदों के सृजेता होने के कारण विद्यापति को वैष्णव कहनेवालों की जड़बुद्धि में प्रायः मैथिल परिवेश की उक्त परम्परा न समाई हो, या अनुमान न हो कि विद्यापति, कवि-चिन्तक ही नहीं, सामाजिक-राजनीतिक-शासकीय विधानों के प्रभावकारी सहभागी भी थे, दायित्वबोध-सम्पन्न गृहस्थ भी थे। किसी एक पन्थ में उनका केन्द्रित रहना सम्भव नहीं था। उन्हें सम्प्रदाय के खूँटे से बाँधने का काम कोई जड़बुद्धि ही करेगा।

मैथिली-हिन्दी के विवेचकों की चेतना में उन्हें वैष्णव-सम्प्रदाय तक सीमित करने की संकुचित वृत्ति वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरकाल के बंगीय प्रवादों से आगे बढ़ी, जिसे जॉन बीम्स ने सींच दिया। ‘द इण्डियन एण्टिक्वेरी पत्रिका’ में ‘अर्ली वैष्णव पोएट्स ऑफ बंगाल : बिद्यापति’ शीर्षक लेख लिखकर विद्यापति को बंगाली वैष्णव सन्त सिद्ध कर दिया। बाद में उन्होंने अपनी धारणा अवश्य बदली, पर तब तक रिले रेश के धावक पिछले विचार लेकर आगे दौड़ गए थे। बाद के दिनों में कुछ अन्य अंग्रेज एवं बंगवासी विद्वानों ने भी ऐसी उक्तियाँ बलपूर्वक दीं। मैथिली-हिन्दी के विवेचकगण उसी उक्ति का पोषण करते रहे।...उल्लेख प्रासंगिक होगा कि चन्दा झा के अलावा किसी मैथिल को खबर तक न थी कि उनके विद्यापति उनसे छीन लिए गए थे। भला हो राजकृष्ण मुखोपाध्याय, ग्रियर्सन, हरप्रसाद शास्त्री जैसे समादृत विद्वानों का, जिन्होंने चन्दा झा द्वारा जुटाई गई सामग्रियों के सहयोग से, विद्यापति को मिथिलावासी सिद्ध किया। ये छीने हुए विद्यापति वापस मैथिल तो माने गए, पर मैथिलों की दृष्टि में वे वैष्णव ही रह गए। जिन्हें स्वयं मालूम नहीं था कि मिथिला के किस भूखण्ड में वैष्णव मतावलम्बी बसते हैं, वे विद्याापति पर ‘वैष्णव’ होने की मुहर लगा बैठे!

ग्रियर्सन की उक्ति से सम्मोहित आधुनिक भारतीय साहित्य के अध्येता मान बैठे कि विद्यापति के लगभग सभी पद वैष्णव भजन हैं। इनका मूल्यांकन यूरोपीय मानदण्डों के आधार पर नहीं किया जा सकता, न ही इन्हें जल्दबाजी में यह कहकर निन्दा की जानी चाहिए कि इनमें ईश्वर के प्रति आत्मा की तड़प व्यक्त करने के लिए केलिगृह की भाषा प्रयुक्त हुई है।...भारतीय आस्था के रहस्यों से अनभिज्ञ होने के बहाने का प्रयोजन किसी को नहीं है। ‘प्रेम से प्राप्य ईश्वर’ की नीति यूरोप में भी मान्य है, भारत में भी; जबकि प्रेम का स्वरूप दोनो जगह भिन्न है। शीतल जलवायु के यूरोपीय देशों के लोग ईश्वर के अवर्णनीय प्रेम की तुलना सन्तानों के प्रति पिता के प्रेम से करते हैं, पर ऊष्ण जलवायु के देशों में, सत्य-सन्धान के उपासक, आराध्य के प्रति अपने प्रेम की तुलना, भगवान कृष्ण के प्रति भगवती राधा के प्रेम से करते हैं। पश्चिमी मानसिकता के लोगों के लिए इसे समझना कठिन है, पर इसकी उपेक्षा अनुचित है। यहाँ विद्यापति के पदों का गायन भक्तजन उसी तरह वासनाविहीन भावों से करते हैं, जैसे ईसाई पादरी सोलोमन के गीत गाते हैं।...ईश के प्रति आत्मा की पहली लालसा, ईश-प्रेम में आत्मा का पूर्ण समर्पण, फिर आत्मा का विरक्त होना...इस रूपक में राधा आत्मा है, दूती मध्यस्थ और कृष्ण परम सत्ता।[3]

इस तरह विद्यापति के पदों के अर्थान्वेष में गिल्ली-डण्डा खेला गया। बलपूर्वक भक्ति-भाव के उद्रेक ढूँढे गए। दूसरे भाषाभाषी क्षेत्र में मैथिल महाकवि के गीतों का गायन गौरव का विषय हो सकता था, पर उन्हें वह कहा जा रहा था, जो वे नहीं थे!

इधर कुछ अनुशीलकों में विद्यापति को शैव और कुछ को शाक्त सिद्ध करने की भी बड़ी बेताबी हुई! पारम्परिक सूत्रों के अनुसार विद्यापति के वंश में शिव-भक्ति की प्रथा थी भी। उनके पिता गणपति ठाकुर महान शिवभक्त थे। जिस ओइनवार राजवंश के आश्रय में रहकर उन्होंने विपुल रचनाएँ कीं, वे भी शिव के उपासक थे। इसलिए उन्हें शिव का उपासक मानने में कोई समस्या नहीं है। पर, इस कारण उन्हें ‘शैव सम्प्रदाय’ के गह्नवर बैठाने का प्रयोजन नहीं है। क्योंकि प्रार्थनाएँ तो उन्होंने राम, कृष्ण, दुर्गा, काली, गंगा...अनेक देवी-देवताओं की लिखीं। गीतों के उदाहरण से वैष्णव-शैव-शाक्त-शृंगारिक तय कर भी लें; तो कीर्तिलता, रसवाणी (कीर्तिगाथा), कीर्तिपताका, भूपरिक्रमण, पुरुष परीक्षा, लिखनावली, गोरक्ष विजय, गंगावाक्यावली, विभागसार, दानवाक्यावली, वर्षकृत्य, गयापत्तलक, व्याडीभक्तितरंगिणी जैसे धर्मशास्त्रीय, नीतिशास्त्रीय, कर्मकाण्ड-विषयक ग्रन्थों के रचनाकार को किस सम्प्रदाय में रखेंगे? शिवसिंह-लखिमा के विरुद् के कारण उन्हें दरबारी कहें, तो पिअरोजसाह, नसरत साह, ग्यासदीन, बैजल के विरुद् वाली रचना को क्या मानेंगे? शृंगारिक रचनाओं में संयोग-वियोग के अनेक भावों की रचनाओं के लिए कितनी कोटियाँ बनाएँगे? करना चाहें, तो अभी भी देर नहीं हुई है, विद्यापति के सम्प्रदाय-निर्धारण का मार्ग त्यागकर उन्हें पहचानने की चेष्टा करें! करेंगे तो पाएँगे कि अब तक वे रत्नसागर-तट पर घोंघा चुग रहे थे! लोग देखें कि अपने एक पद में विद्यापति ने किस तरह हरि-हर का भेद मिटा दिया है, काली-सरस्वती-सुरसरि-सूर्य को भी एकमेक कर दिया है, रौद्र-ज्ञान-अभिसिंचन-ताप का एकृा कर दिया है--

विदिता देवी विदिता हो अविरल केस सोहन्ती।

एका एक सहस को धारिनि जनि रंगा पुर नटी॥

कज्जल रूप तुअ काली कहिअ उज्जल रूप तुअ वानी।

रविमण्डल परचण्डा कहिअए गङ्गा कहिए पानी॥

ब्रह्मा घर ब्रह्मानी कहिए हरघर कहिअए गोरी।

नारायन घर कमला कहिए के जान उत्पति तोरी॥

स्मार्तज्ञान के बिना, पुराणादि में वर्णित प्रसंगों की जानकारी के बिना, इस पद का सम्पूर्ण अर्थ-ग्रहण या इसकी व्यवस्थित व्याख्या और पूरा भाव-ग्रहण असम्भव है। अपनी सुविख्याता देवी के अनेक तेजस्वी रूपों -- शत्रुओं के संहारक, काली-सरस्वती-सूर्य- सुरसरि, ब्रह्मा-शिव-श्रीमन्त के घर ब्रह्माणी-गौरी-लक्ष्मी की स्तुति करते हुए कवि ने विवेचकों के ज्ञान-चक्षु में स्वयं अंगुली डाली है कि भगवती के सभी रूपों की सारी शक्तियाँ के साथ हैं।...एक पद में तो उन्होंने ‘हरि’ और ‘हर’ में अभेद भी दिखाया है--

भल हर भल हरि भल तुअ कला। खन पित बसन खनहिं बघछाला॥

खन पञ्चानन खन भुजचारि। खन सङ्कर खन देव मुरारि॥

खन गोकुल भए चराइअ गाए। खन भिखि माँगिए डमरु बजाए॥

खन गोबिन्द भए लेअ महादान। खनहि भसम भरु काँख बोकान॥

एक सरीर लेत दुइ बास। खन बैकुण्ठ खनहि कैलास॥

भनइ विद्यापति बिपरित बानि। ओ नाराएन ओ सुलपानि॥

परम प्रतापी ईश्वर की महिमा अपरमपार है, अनेक रूप-धारण की कला अद्भुत है, हर (शिव) रूप में जितने सम्मोहक लगते हैं, हरि (विष्णु) रूप में उतने ही मनोहर; पीताम्बर विष्णु वही हैं, बाघम्बरधारी शिव वही हैं; पंचानन शिव, चतुर्भुज विष्णु, देवाधिदेव शंकर, मनमोहन कृष्ण मुरारी, गोकुल में गाय चराते कन्हैया, डमरू बजाकर भिक्षाटन करते शिव, राजा बलि से महादान लेते वामन (विष्णु, गोबिन्द), काँख तले भस्म भरी झोली (बोकान) दबाए महादेव; एक शरीर से बैकुण्ठ और कैलास दोनों जगहों पर उपस्थित ईश के चमत्कारी विधान पर चकित कवि विद्यापति कहते हैं कि वही विष्णु (नाराएन) हैं, वही शिव (सुलपानि=शूलपाणि=त्रिशूलधारी) भी हैं। दो में से कोई अलग नहीं हैं! फिर भी विवेचकों को विद्यापति का सम्प्रदाय क्यों चाहिए, समझना कठिन है।

बेरि बेरि अरे सिब हमे तोहि कइलहुँ, किरिषि करिअ मन लाए।

रहिअ निसंक भीख मँगइते सब गुन गौरब दुर जाए॥

निरधन जन बोलि सब उपहासए नहि आदर अनुकम्पा।

तोहें सिब आक धतुर फूल पाओल हरि पाओल फुल चम्पा॥

खटंग काटि हर हर जे बनाविअ तिरसुल तोड़ि करु फार।

बसहा धुरन्धर हर लए जोतिअ पाटिअ सुरसरि धार॥

शिव-पत्नी पार्वती, अपने पति से अपनी चर्या सुधारने और भिक्षाटन छोड़कर कृषि-कर्म को प्रवृत्त होने की सलाह देती हैं। वे कहती हैं कि भिक्षाटन से गुण-गौरव नष्ट होता है, उपहास होता है; आपको आक-धथूरे, पर विष्णु को चम्पा फूल चढ़ाया जाता है। आप अपनी चर्या बदलिए, सोंटा (खटंग) काटकर हल बनाइए, त्रिशूल तोड़कर फाल बनाइए, जोते जाने योग्य धुरन्धर बसहा बैल के सहारे हल जोतिए, गंगधार से खेत की सिंचाई कीजिए। अर्थात्, पारिवारिक सुविधा योग्य कार्य कीजिए!

इस पद में भक्ति के बजाय व्यावहारिकता दिखाई गई है। विद्यापति के सम्प्रदाय-निर्धारकों से डर लगता कि इसके सहारे, किसी दिन विद्यापति नास्तिक न घोषित हो जाएँ! इस शिव-पार्वती संवाद के रूपक में कवि ने गार्हस्थ-जीवन की व्यावहारिकता रेखांकित की है, पति-पत्नी की चिन्तन-व्यवस्था का प्रतिरूप रचा है। प्रायः दो भिन्न चिन्तन-तरंगों का प्रतीक! जगत कल्याण के प्रतिकूल आचरण करनेवालों के संहार के लिए हाथ में त्रिशूल तो पूरे जगत को स्नेहसिक्त करने के लिए सिर पर सुरसरि। हो न हो ‘युद्ध और नारी’ शीर्षक महादेवी वर्मा का विशिष्ट आलेख विद्यापति के इसी पद से प्रभावित हो, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि गार्हस्थ जीवन में पवित्र गृहों की नींव स्त्री की बुद्धि पर रखी गई है, पुरुष की शक्ति पर नहीं।...स्त्री और गृह पुरुष के जीवन की आवश्यकताओं में से एक है, जबकि पुरुष और गृह स्त्री का जीवन है।...स्त्री के स्वभाव और गृह के आकर्षण ने पुरुष को युद्ध से विरत किया, लेकिन युद्ध-कर्म-संघर्ष उसकी मूल वृति है, उसके गर्व का कारण है।...इस पद में रेखांकित दाम्पत्य-जीवन के संवाद में भावकों के लिए एक सन्देश है कि दाम्पत्य जीवन का संघर्षात्मक संवाद कभी युद्ध नहीं होता, वह पारिवरिक जीवन की सुव्यवस्था के लिए किया गया संवाद मात्र होता है, जिसकी परिणति द्विपक्षीय वार्ता की सहमति में होती है, और परिवार के हित में होती है।

शैवसर्वस्वसार’ में उन्होंने जिस दृढ़ता से ‘हरि’ और ‘हर’ का अभेद स्पष्ट किया, वह उनकी आस्तिकता और भक्ति की स्पष्ट छवि निरूपित करता है। विद्यापति के सम्प्रदाय-निर्धारकों के दृष्टि-पथ पर ये तीनो पद आए हों, उन्होंने इन तीनो पदों का अभिप्रेत समझा हो, फिर भी सम्प्रदाय-निर्धारण का तमाशा कर रहे हों, तो उन्हें सृष्टि के सृजेता भी (यदि कोई हैं, तो) नहीं समझा सकते!

एक महान कवि होने के साथ-साथ विद्यापति, महान निबन्धकार, महान दार्शनिक, महान राजरक्षक, लोकप्रिय लोकनायक, दायित्वबोधसम्पन्न पारिवारिक, एकनिष्ठ गृहस्थ, परम विश्वासी मित्र भी थे। इन सारे गुणों के साथ ही उन्हें महापुरुष कहना समीचीन है। इन सभी दायित्वों के निर्वाह में उनकी दृष्टि, संवेदना और विवेक अवलोकनीय है। जन-भाषा में रचित उनके जन-साहित्य और संस्कृत में रचित उनकी नैबन्धिक कृतियों में उनका दायित्वबोध अनुसन्धेय है। मित्र-गृहस्थ-राज्याधिकारी और लोक-राज-राष्ट्र के हितैषी के रूप में उनकी विवेकी दृष्टि का विवेचन सम्भव है। रागताल-लयाश्रित अपनी कोमलकान्त पदावली में उन्होंने मानव-हृदय के नैसर्गिक भाव और भावावेश को, जिस सूक्ष्मता और चमत्कार से, प्रसाद-लालित्य-माधुर्य के साथ रखा है, अन्य किसी से शायद ही सम्भव हो! सौन्दर्य-वर्णन में तो भौतिक सौन्दर्य की सीमा पारकर उनकी दृष्टि, मन के सात्विक सौन्दर्य को स्पर्श कर बैठी है। स्त्री-मन के आवेग-उद्वेग का उनका वर्णन देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वे स्त्री मनोविज्ञान के उद्भट विश्लेषक हों!

विद्यापति वस्तुतः कर्मयोगी थे, पुरुषार्थपूर्ण कार्य करते रहने में ही मानव-जीवन की सार्थकता मानते थे! राजनीति और लोकनीति की उनकी समझ इतनी सुव्यवस्थित थी कि ‘पुरुष परीक्षा’ के तीसरे परिच्छेद की दूसरी प्रविष्टि ‘अथ शस्त्रविद्यकथा’ में स्पष्ट कहा--

स्वभावात् शस्त्रविद्यायाः शास्त्रविद्या कनीयसी।

शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते॥

यः समस्तेषु शस्त्रेषु कृताभयासश्च तत्त्ववित्।

शास्त्रविद्य समाख्यातः सोऽस्त्रव्यापारपारगैः॥

शस्त्रविद्या स्वभावतः शास्त्रविद्या से कमतर है, क्योंकि शस्त्र से राष्ट्र सुरक्षित होता है, राष्ट्र के सुरक्षित रहने पर ही शास्त्रविद्या पल-बढ़ सकेगी। अगले दो चरणों में उन्होंने शस्त्रविद्य और शास्त्रविद्य के सम्बन्ध में लिखा है कि जिस तरह सभी प्रकार के शस्त्रों के प्रयोग के अभ्यासी, उसके रहस्यों के जानकार, पारंगत ही शस्त्रविद्य कहलाते हैं; उसी प्रकार शास्त्रविद्या में पूरी तरह ख्यात व्यक्ति ही शास्त्रविद्य कहलाएँगे।...

कुछ अतिप्रतिभाशालियों को कहे बिना चैन नहीं मिलेगा कि ऐसी उक्ति पूर्वकाल में भी चलन में थी! ऐसे वक्त्व्यवीरों से विवाद तो सम्भव है नहीं, मात्र इतना निवेदन है कि सूक्ति-वचन कितनी भी बार, कितनी भी तरह से, कितने ही लोग कह दें, एक बार फिर से कहे जाने पर कहनेवाले की धारणा और काल-परिवेश का परीक्षण अनुगम्य होना चाहिए। विद्यापति की इस सूक्ति के सहयोग से सुविज्ञ जन स्वातन्त्र्योत्तरकालीन भारत की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं, कूटनीतिक सम्बन्धों या अन्य राष्ट्रों के सामरिक संसाधनों पर विचार कर सकते हैं। ऐसे बहुआयामी कवि, निबन्धकार, दार्शनिक, धर्मशास्त्री, स्मार्त, रानीतिज्ञ, लोकसेवक, राज्याधिकारी, राजरक्षक, समाज-चिन्तक, गृहस्थ, मित्र...पर विचार करने से पूर्व स्वयं अपनी बौद्धिक क्षमता और जीवन-दृष्टि पर भी विचार कर सकते हैं।

बीसवीं शताब्दी में आकर जब वैश्विक बौद्धिकों ने अनुभव किया कि भाषा ही राष्ट्रीयता का प्रमुख आधार है, तब हमें स्पष्ट दिखता है कि इसका अनुमान विद्यापति को छह सौ वर्ष पूर्व ही लग गया था, जिस कारण उन्होंने देववाणी छोड़कर मिथिला की जनभाषा में गीत रचे, ताकि समस्त मिथिलावासी, समस्त मैथिलीभाषी एक सूत्रमे आबद्ध होकर स्वयं को एक मान सकें। समस्त उत्तर भारत में जनभाषा को यह प्रतिष्ठा सर्वप्रथम विद्यापति ने ही दिलाई। इसीलिए रमानाथ झा ने विद्यापति को सही ही मैथिलत्व का ‘पिता’ कहा।[4]

उपहार-स्वरूप विस्फी गाँव ग्रहण करने के कारण, सोलहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में आकर वाचस्पति मिश्र के पौत्र केशव मिश्र (सन् 1582, ल.सं. 473 के आपास) ने ‘अतिलुब्ध नगरयाचक’ कहकर विद्यापति का उपहास किया। वे इनसे घनघोर द्वेष रखते थे। पर यह विद्वता का नहीं, उद्दण्डता का द्योतक है।



[1] भारद्वाज, मोहन. आचार्य रमानाथ झा रचनवली, खण्ड-1. 2010. वाणी प्रकाशन. पृ. 120

 [2] भारद्वाज, मोहन. आचार्य रमानाथ झा रचनवली, खण्ड-1. 2010. वाणी प्रकाशन. पृ. 123

[3] ग्रियर्सन, जॉर्ज अब्राहम. एन इण्ट्रोडक्शन टु द मैथिली लैंग्वेज ऑफ नॉर्थ बिहार कण्टेनिंग ए ग्रामर, क्रस्टोमेथी एण्ड वोकेबुलरी, खण्ड-2. 1882. एशियाटिक सोसाइटी. पृ. 36, 38-39

[4] भारद्वाज, मोहन. आचार्य रमानाथ झा रचनवली, खण्ड-1. 2010. वाणी प्रकाशन. पृ. 120

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