अनुवाद और भाषाविज्ञान के अन्तस्सम्बन्ध
विदित है कि सभ्यता के विभिन्न भाषायी और सांस्कृतिक समुदायों को जोड़ने का महत्त्वपूर्ण घटक अनुवाद है; जिसमें एक भाषा में व्यक्त विचार-भाव-सूचना-ज्ञान-अनुभव के मूल अर्थ-भाव-प्रभाव को यथासम्भव सुरक्षित रखते हुए, दूसरी भाषा में प्रस्तुत किया जाता है। पर अनुवाद-क्रिया केवल शब्द के स्थान पर दूसरी भाषा का बदलना नहीं है; अनुवादक का ध्येय, शब्दों का भाषा-परिवर्तन मात्र नहीं होता; वह भाषिक संरचना, अर्थ-सम्बन्ध के सन्दर्भ और सांस्कृतिक संकेत के गूढ़ार्थ को समझते हुए लक्ष्य-भाषा में पुनर्सृजन की प्रक्रिया अपनाता है। इसमें एक भाषा के अर्थ-संसार को पूरी वस्तुनिष्ठता के साथ दूसरी भाषा में स्वाभाविक रूप से पहुँचाया जाता है। इस सूक्ष्मता के लिए भाषाविज्ञान की बड़ी जरूरत होती है। इसी कारण अनुवाद का भाषाविज्ञान से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।
भाषाविज्ञान में भाषा का वैज्ञानिक और व्यवस्थित अध्ययन होता है। इसमें ध्वनि, शब्द, वाक्य, अर्थ, प्रयोग, भाषा-परिवर्तन और भाषा के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों का अध्ययन किया जाता है। इसमें भाषा की रूप-रचना सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त होता है; भाषा विशेष की ध्वनियों, शब्द के बनने के तरीके, वाक्य की बनावट, अर्थान्वेष की पद्धतियों के बारे में जानकारी मिलती है। भाषा के इन सभी पक्षों का पर्याप्त ज्ञान रखने पर ही कोई अनुवादक स्रोत-भाषा के स्वाभाविक अभिप्राय को लक्ष्य-भाषा में सहजता से व्यक्त कर सकता है। क्योंकि, दो भाषाभाषियों के बीच संवाद स्थापित करने का कार्य तभी सम्भव होगा, जब प्रदत्त पाठ का सही-सही अभिप्राय दूसरी भाषा में पहुँचे। अनुवाद करते समय अनुवादक का ध्यान इसी ‘सही-सही अभिप्राय’ के आवगमन पर टिका रहता है। इसलिए भाषावैज्ञानिक ज्ञान, अनुवाद की गुणवत्ता का महत्त्वपूर्ण आधार माना गया है।
अनुवाद और भाषाविज्ञान--दोनों का मूल आधार भाषा ही है। भाषाविज्ञान में भाषा की संरचना और कार्यप्रणाली को समझने का सैद्धान्तिक आधार मिलता है, जबकि अनुवाद में उस ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग होता है। अनुवाद करते समय स्रोत-भाषा के भाषिक तत्त्वों को पहचानकर ही, अनुवादक लक्ष्य-भाषा में शब्दों-पदों के उपयुक्त और समतुल्य शब्द-पद खोजते हैं। इस कार्य में भाषाविज्ञान की विभिन्न शाखाएँ प्रत्यक्ष रूप से सहायक होती हैं।
अनुवाद और भाषाविज्ञान के अन्तस्सम्बन्ध जानने के लिए या अनुवाद-प्रक्रिया में भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तों के उपयोग पर चर्चा करने के लिए, ध्वनि-विज्ञान (फोनेटिक्स), रूप-विज्ञान (माॅर्फोलाॅजी), वाक्य-विन्यास (सिण्टैक्स), अर्थ-विज्ञान (सेमैण्टिक्स), व्यवहार- विज्ञान (प्रैगमैटिक्स), समतुल्यता (इक्विवेलेन्स) और मशीनी अनुवाद जैसे प्रसंगों पर विचार करना अनिवार्य होगा!
ध्वनियों के समुच्चय से ही भाषा का रूप गठित होता है; जिससे वाक्य बनते हैं और वाक्यों के विन्यास स्पष्ट होते हैं; यही विन्यास भावकों को कथन के अभिप्राय तक पहुँचाती है, अर्थात्, अर्थ सुनिश्चित होता है। ध्वनि-विज्ञान, रूप-विज्ञान, अर्थ-विज्ञान की सही समझ हो तो इन प्रसंगों में कोई दुविधा नहीं होती! पर्यायों की सूक्ष्म-प्रयुक्तियों से उत्पन्न दुविधाएँ तो और भी जटिल होती हैं। अर्थ और अभिप्राय की भी अपनी दुनिया और अपना व्यवहार होता है। भौगोलिक परिवेश और सामुदायिक आचरण के प्रभाव में शब्दों-पदों की भाव-भूमि और अर्थ-ध्वनि बदलती रहती हैं। इसकी अर्थ-संगति सामुदायिक जीवन-व्यवहार से निर्देशित होती हैं। इसका कोई शाश्वत प्रसंग नहीं होता! जैसे, पसीना छूटने का सार्वदेशिक-सार्वकालिक अर्थ एक समान नहीं होता! व्यवहार-विज्ञान से निर्देशित अर्थ-सन्धान की प्रक्रिया समझ में आती है, अर्थ की सूक्ष्मताओं को समझने में मदद मिलती है, स्पष्ट होता है कि सन्दर्भ के अनुसार किसी शब्द की अर्थ-ध्वनि कैसे बदल जाती है। अनुवाद के समय वाक्य-संरचना की भूमिका इसलिए महत्त्वपूर्ण होती है कि कई बार मूल पाठ के शब्द के बदले लक्ष्य-भाषा का वैकल्पिक शब्द सीधे-सीधे प्रयोग में लाना असुविधाजनक या अप्रासंगिक लगने लगता है; ऐसे प्रसंग में वाक्य की संरचना बदलनी पड़ती है।
अनुवाद करते समय भाषाविज्ञान की उक्त शाखाएँ इन दुविधाओं से उबरने के मार्ग प्रशस्त करती हैं। प्रयुक्तिपरक अर्थान्वेष से शब्दों के अनेक अर्थ-सन्दर्भ, अर्थ-विज्ञान से स्पष्ट होते हैं। इन सूक्ष्मताओं का ध्यान, हर अच्छा अनुवादक रखता है। अपने विवेक से ही वह तय करता है कि शब्दों का कौन-सा अर्थ-सन्दर्भ किस जगह सही होगा! हिन्दी के शब्द ‘घर’ का अंग्रेजी में कोशीय अनुवाद Home भी होगा, House भी! पर व्यवहार-विज्ञान की सही समझ रखकर ही अनुवाद निर्णय करता है कि कैसी प्रयुक्ति से ‘घर’ का अंग्रेजी अनुवाद Home होगा, और कैसी प्रयुक्ति से House? स्पष्टतः अभिप्राय केवल शब्दों में नहीं, उनके उपयोग की पद्धति में भी छिपे होते हैं। अर्थ-सन्धान के लिए पद्धति, परिस्थिति और सामाजिक सन्दर्भ का संज्ञान अनिवार्य होता है।
मशीन समर्थित अनुवाद में तो भाषावैज्ञानिक आधार और भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं; वे अनुवाद-कार्य का मेरुदण्ड बन जाते हैं। क्योंकि वाक्य का वश्लिेषण करते समय शब्दों-पदों का स्थान-मूल्य नर्धिारित करने में, उसके अर्थ-सन्दर्भ समझने में इसकी भूमिका अपरिहार्य हो जाती है। भाषाविज्ञान, अनुवाद को केवल कला नहीं रहने देता, वह उसे विज्ञान, तकनीक, दर्शन, समाज-शास्त्र...सबकी सैर करा देता है।
ध्वनि-विज्ञान और अनुवाद
ध्वनि-विज्ञान में भाषिक ध्वनियों का अध्ययन होता है। साहित्यिक अनुवाद, काव्यानुवाद, नाट्यानुवाद, मौखिक अनुवाद...में ध्वनियों का विशेष महत्त्व होता है। किसी भाषा की ध्वनि-संरचना, उच्चारण, लय, ध्वनि के आरोह-अवरोह को समझे बिना; नामों, स्थानों और विशिष्ट शब्दों का उचित रूपान्तरण कठिन होता है। कविता के अनुवाद या काव्यानुवाद में छन्द-लय-अलंकारादि या व्यंग्य-वक्रोक्ति या ध्वनि-सौन्दर्यादि को लक्ष्य-भाषा में पुनर्रचित पुनर्गठित करने के लिए ध्वनि-विज्ञान सम्बन्धी समझ उपयोगी होती है।
रूप-विज्ञान, अर्थ-सन्धान और अनुवाद
रूप-विज्ञान से शब्दों की आन्तरिक संरचना और उनके रूप-परिवर्तन की पद्धति समझ आती है। विभिन्न भाषाओं में लिंग-वचन-कारक-काल-पुरुष आदि की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न पद्धति से होती है। अव्ययवाची शब्दों के अलावा हिन्दी में क्रिया और विशेषणों के रूप, लिंग-वचन के अनुसार बदलते रहते हैं, जबकि अंग्रेजी के वाक्यों में शब्दों के रूप-परिवर्तन अपेक्षाकृत कम होते हैं। लक्ष्य-भाषा के व्याकरण की दृष्टि से स्रोत-भषा के शब्दों के समुचित विकल्प के लिए अनुवादकों इन बातों की गहन समझ रखनी पड़ती है, जिसकी सुविधा भाषा-विज्ञान की रूप-विज्ञान शाखा की सही समझ से विकसित होती है।
वाक्य-विन्यास और अनुवाद
भाषा में शब्दों के स्थान-क्रम और वाक्य की संरचना का अध्ययन वाक्य-विन्यास द्वारा होता है। संस्कृत के वाक्य में कर्ता-कर्म-क्रिया के स्थान विपर्यय से कोई अर्थ-विपर्यय नहीं होता, पर हिन्दी या अंग्रेजी में ऐसा नहीं होता। हिन्दी की वाक्य-संरचना ‘कर्ता+कर्म+क्रिया’ में होती है, जबकि अंग्रेजी की वाक्य-संरचना ‘कर्ता+क्रिया+कर्म’ में होती है। हिन्दी और अंग्रेजी की वाक्य-संरचनाओं में पर्याप्त अन्तर है। अनुवाद के समय स्रोत-भाषा के वाक्यों के शब्द-क्रम की यान्त्रिक नकल से लक्ष्य-भाषा का पाठ निष्प्रभ और अबूझ हो जाएगा। श्रेष्ठ अनुवाद के लिए केवल शब्दों का अर्थ जानना पर्याप्त नहीं होता; वाक्य की संरचना और लक्ष्य-भाषा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति का ज्ञान भी आवश्यक है।
अर्थ-विज्ञान, अर्थ-रक्षा और अनुवाद
अनुवाद-कार्य में उपादेय महत्त्वपूर्ण भाषावैज्ञानिक क्षेत्र अर्थ-विज्ञान की समझ से स्पष्ट होता है कि किसी भी शब्द या वाक्य का अर्थ शब्दों के कोशीय अर्थ मात्र से निर्धारित नहीं होता। सन्दर्भ के अनुसार अर्थ बदल जाता है। अंग्रेजी शब्द इनतदपदह का सामान्य अर्थ ‘जलता हुआ’ होता है; पर ‘बर्निंग स्टोव’, ‘बर्निंग टॉपिक’, ‘बर्निंग प्रोब्लेम’ की तीन प्रयुक्तियों में अर्थ होगा ‘जलता हुआ हुआ चूल्हा’, ‘ज्वलन्त विषय’, ‘गम्भीर समस्या’। अनुवादक को इन अर्थ-भेदों की सुसंगत समझ, प्रसंगानुकूल पर्यायवाची संगति, बहुअर्थक सूक्ष्मता का ज्ञान; स्रोत-भाषा के पाठ का सुसंगत अभिप्राय लक्ष्य-भाषा में व्यक्त करने का कौशल वह इस अर्थ-विज्ञान की समझ से ही कर पाता है।
व्यवहार-विज्ञान और अनुवाद
भाषा में शब्दों के वास्तविक अर्थ की सूक्ष्मता का ज्ञान, प्रयुक्ति की युक्ति एवं सन्दर्भ के अध्ययन से ज्ञात होता है। यह समझ विशिष्ट भाषावैज्ञानिक शाखा व्यवहार-विज्ञान के अध्ययन से विकसित होता है। वाचक-भावक के पारस्परिक सम्बन्ध प्रसंग और परिस्थिति से कथन का उद्देश्य, ग्राही द्वारा अर्थ-ग्रहण की क्रिया इन सबके स्थान-काल-पात्र-प्रसंग पर निर्भर करेगा। ‘आप अधिक समझदार हैं’ जैसे मामूली से वाक्य के अर्थ बदलते रहेंगे, यदि वाचक पिता हों या उच्चाधिकारी हों; दोनों सहज स्थिति में हों, या दोनो गुस्से में हों...! अनुवादक यदि कथन के सामाजिक, प्रासंगिक, व्यावहारिक उद्देश्यों को समझे बिना किसी वाक्य का अनुवाद करेंगे, तो उसका प्रभाव बदल जाएगा। इसलिए सन्दर्भ और प्रयोजन की समझ अनुवाद की सफलता के लिए अनिवार्य है।
समाजभाषाविज्ञान और सामाजिक सन्दर्भ
भाषा और समाज के पारस्परिक जुड़ाव की सूचना रखकर भी इसके संश्लिष्ट सम्बन्धों की स्पष्ट समझ अधिकांश लोगों को नहीं होती। प्रायः लोग इसके इकहरे सरोकार से ही परिचित रहते हैं। समाजभाषाविज्ञान में इनके संश्लिष्ट सम्बन्धों के सूक्ष्म अध्ययन की व्यवस्था होती है। लोग अक्सर इस बात पर गौर नहीं करते कि एक ही गाँव के लोगों की भाषा के अनेक स्तर होते हैं; सामाजिक पदक्रम के अलावा, वहाँ जाति-धर्म-आयु-शिक्षा-पेशा सम्बन्धी अनेक भेद के कारण भाषा या बोली की अनेक औपचारिक-अनौपचारिक शैलियाँ चलन में होती हैं। जैसे किसी उपन्यास में ग्रामीण, किसान, मजदूर, अपढ़, शिक्षित, अधिकारी, युवा, प्रौढ़...पात्रों की बोली भिन्न-भिन्न होती है। अनुवादकों को ऐसे भाषा-वैविध्य की समझ समाजभाषाविज्ञान के अध्ययन से ही हो पाता है। ऐसे पाठ का अनुवाद इकहरी शैली में होना उचित नहीं होगा। अनुवादक को समझना होगा कि स्रोत-पाठ में प्रयुक्त भाषा किस सामाजिक समूह और परिस्थिति का प्रतिनिधित्व करती है।
शैली-विज्ञान और अनुवाद
शैली-विज्ञान में भाषा की शैलीगत विशेषताओं का अध्ययन होता है। साहित्यिक अनुवाद में लेखक की शैली, वाक्य-विन्यास, शब्द-चयन, छन्द-अलंकार, बिम्ब-प्रतीक-रूपक और कथन-भंगिमा को समझना आवश्यक होता है। अनूदित पाठ में स्रोत-पाठ सूचना तो पहुँच जाए, पर मूल पाठ की शैली खो जाए, तो साहित्यिक अनुवाद अधूरा ही रह जाएगा। इसलिए शैली-विज्ञान अनुवादक को यह समझने में सहायता करता है कि लेखक ने किस उद्देश्य से किसी विशेष शब्द, वाक्य या अभिव्यक्ति-शैली का प्रयोग किया!
मशीन समर्थित अनुवाद और भाषाविज्ञान
चारेक दशक से, मशीन समर्थित अनुवाद प्रणाली की धूम, दुनिया भर में भर में मची है! भारत के विद्वानों में भी इस दिशा में यथेष्ट चेष्टा की है। मशीन समर्थित अनुवाद, एक कम्प्यूटर आधारित प्रणाली है, जिसमें एक भाषा के पाठ का अनुवाद दूसरी भाषा में कम्प्यूटर द्वारा किया जाता है। मशीन समर्थित अनुवाद (मशीन या कम्प्यूटर असिस्टेड ट्रान्सलेशन होने के कारण इसे ब्।ज् कहा जाता है) में अनेक आधुनिक उपकरण का उपयोग होता है। अनुवाद स्मृति (ट्रान्सलेशन मेमोरी) और पद-प्रबन्धन (टर्मिनोलॉजी मैनेजमेण्ट) की सुविधा उपलब्ध होने के कारण, इन उपकरणों की सहायता से अनुवादकों के कार्य की गति और कार्यफल के परिमाण में बढ़ोतरी हुई है। अभिप्राय यह नहीं कि ये उपकरण इतने समर्थ हो गए हैं कि इससे अनुवादक विस्थापित हो गए हैं। हाँ, इतना अवश्य हुआ है कि शब्दों के विकल्प इसमें उपलब्ध हैं, जिससे बहुधा कुछ सुविधाएँ मिल जाती हैं। दुनिया भर के अनुसन्धित्सु लोगों ने इस दिशा में अनेक ऐप बनाए हैं, भारतीय बौद्धिकों ने भी इस कार्य के लिए राजकीय संसाधन के बड़े हिस्से का उपभोग किया है। इस दिशा में क्रियाशील भारतीय विद्वान दावा तो कर लेते हैं कि उनके उपकरण नब्बे प्रतिशत तक के कार्यफल सही देते हैं, पर उनका दावा ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू’ से अधिक कुछ नहीं है। आज भी, भारत के लगभग अनुवाद उद्यमी विदेशी अनुवाद-उपकरण पर अश्रित हैं और भारत में संरचित एक भी मशीनी अनुवाद-उपकरण का उपयोग, दुनिया के किसी भी देश के अनुवादकर्मी की अनिवार्यता नहीं है।
मशीन आश्रित अनुवाद एवं भाषा प्रौद्योगिकी से सम्बन्धित पहली भारतीय परियोजना सन् 1985-1986 के आसपास आई.आई.टी. बॉम्बे के कम्प्यूटर साइंस विभाग द्वारा शुरू हुई मानी जाती है। प्राप्त सूचनानुसार, भारतीय भाषाओं ‘से और में’, कम्प्यूटर द्वारा अनुवाद करने के प्रस्ताव पर, आई.आई.टी., कानपुर के कम्प्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिक, आर.एम.के. सिन्हा ने, सन् 1984 के आसपास, अन्तरभाषा के रूप में संस्कृत का उपयोग करते हुए काम शुरू किया। सन् 1991 में, उन्होंने छर्-िंअन्तरभाषा (श्यूडो- इण्टरलिंगुआ) की अवधारणा पपर काम किया और समान संरचना की भाषाओं का समूहन कर अंग्रेजी से भारतीय भाषाओं में अनुवाद की पद्धति विकसित की। काश! परवर्ती परियोजनाओं के ध्वजधारियों ने उसी निष्ठा से इस क्षेत्र में अपना योगदान किया होता! इस दिशा में निवेशित राजकीय कोष की कोई आधिकारिक सूचना तो विदित नहीं है; पर पंचवर्षीय योजनाओं की बजटों को जोड़ने से इन चार दशकों में, इस क्षेत्र में तीन साढ़े तीन हजार करोड़ के राजकीय कोष के निवेश का अनुमान किया जाता है।
सन् 1984 में आई.आई.टी. कानपुर और हैदराबाद विश्वविद्यालय के सहयोग से भारतीय भाषाओं के कम्प्यूटेशनल प्रोसेसिंग ‘अक्षर भारती समूह’ की नींव रखी गई। सन् 1988 में सुपरकम्प्यूटिंग और भारतीय भाषा कम्प्यूटिंग के लिए सरकार ने सी-डॅक की स्थापना की, जहाँ ‘मन्त्रा’ (MANTRA) और ‘लीला’ (LILA) जैसे मशीनी अनुवाद सॉफ्टवेयर विकसित हुए। सन् 2000 के बाद इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मन्त्रालय के तहत करोड़ों की लागत से टेक्नोलॉजी डवलपमेण्ट फॉर इण्डियन लैंग्वेजेज (TDIL) कार्यक्रम द्वारा ‘अनुवादक्ष’ और ‘सम्पर्क’ जैसी मशीनी अनुवाद प्रणाली विकसित हुई। मानव संसाधन विकास मन्त्रालय ने उच्च शिक्षा की पुस्तकों के अनुवाद के लिए, सन् 2008 में भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर में राष्ट्रीय अनुवाद मिशन की स्थापना की। सन् 2022 के मध्य में सैकड़ो करोड़ की लागत से शुरू हुई कृत्रिम मेधा अनुवाद परियोजना में ‘भाषिनी’ मिशन (BHASHINI) की शुरुआत हुई। भाषाई रूप से इस समावेशी परियोजना का मुख्य उद्देश्य था--भाषिक वैविध्य के बावजूद, भारत की सभी मातृभाषाओं की गरिमा सुरक्षित रखते हुए, पारस्परिक संवाद स्थापित करना; इण्टरनेट एवं अन्य डिजीटल सेवाओं के लाभ के रास्ते से अंग्रेजी-ज्ञान की अनिवार्यता मिटाकर, मातृभाषा के माध्यम से उन्हें सम्पन्न करना, सरकारी सेवाओं (ई-गवर्नेन्स) का स्थानीकरण करना...! ‘डिजिटल इण्डिया’ की विराट योजना से जुड़ाव होने पर शीघ्र ही इसकी बजट हजारो करोड़ की हो गई! मशीनी अनुवाद की अनेक प्रणालियाँ विकसित हुईं। शोध-कार्य को भी बढ़ावा दिया गया। पर, इन परियोजनाओं के संचालकों के दावे आचारपरक गीत ही साबित हुए हैं! क्योंकि अनुवाद की मानक नीतियों और विशेषज्ञों की कसौटी पर इनके द्वारा अनूदित पाठ हास्यास्पद ही दिखते हैं! फिर भी, राजकीय संसाधन से सम्पुष्ट परियोजना के सुदक्ष स्वामियों की सकल-कामना-सिद्धि भी भारत में कोई छोटी बात नहीं होती!
मशीनी अनुवाद का भाषावैज्ञानिक आधार
मशीनी अनुवाद पूर्णतः भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित होता है। गौरतलब है कि ज्ञान-शाखा के रूप में अनुवाद अध्ययन के के विस्तार के बाद से इसकी अनेक शाखाओं और प्रविधियों पर विचार होने लगा है! इस दिशा में भाषणों के लिप्यन्तरण और लिखित पाठ के ध्वन्यन्तरण (स्पीच-टू-टेक्स्ट और टेक्स्ट-टू-स्पीच) भी अनुवाद-क्रिया में आते हैं। इस कोटि की अनुवाद-क्रिया में ध्वनि का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। भाषाविज्ञान की विशिष्ट शाखा ध्वनि-विज्ञान की समझ का इसमें विशेष महत्त्व होता है। उच्चारण और ध्वनि-रूपान्तरण इस समझ के बिना असम्भव है। ध्यातव्य है कि मशीन को संवेदना और विवेक नहीं होता! उसकी सारी संवेदनाएँ और सारा विवेक उसे सिखाए गए ‘नियम’ में समाहित रहते हैं। उसे ‘स्वनिम’ और ‘रूपिम’ की जितनी श्रेणियाँ बताई गई हैं, उससे बाहर किसी भी ध्वनि अथवा पद को वह या तो निरस्त कर देगा या आसपास की किसी ध्वनि का विकृत रूप मानकर अपने नियमों से बँधा रहेगा! मशीन समर्थित अनुवाद में ध्वनि-विज्ञान के साथ-साथ रूप-विज्ञान, वाक्य-विन्यास, अर्थ-विज्ञानादि का उपयोग भी इसी पद्धति से होता है। रूप-विज्ञान से प्रयुक्त शब्दों का रूप-विश्लेषण, स्थान-मूल्य-निर्धारण और रूपान्तरण सम्भव होता है; वाक्य-विन्यास से वाक्य की संरचना का विश्लेषण और पुनर्गठन सम्भव होता है; अर्थ-विज्ञान से ही शब्दों और वाक्यों के अर्थ का कम्प्यूटेशनल विश्लेषण होता है और प्रयोग-विज्ञान से प्रयुक्ति के सन्दर्भ एवं उद्देश्य की जानकारी मिलती है, जिससे अर्थ-निर्धारण की प्रविधि तय होती है। इसलिए भाषा-विज्ञान की ये शाखाएँ मशीनी अनुवाद के लिए वरेण्य मानी गई हैं!
मशीनी अनुवाद की विधियाँ
मशीनी अनुवाद में मुख्यतः तीन विधियाँ अपनाई जाती हैं--नियम-आधारित अनुवाद, सांख्यिकीय अनुवाद और न्यूरल मशीनी अनुवाद। नियम-आधारित अनुवाद में व्याकरणिक नियमों और शब्दकोशों के आधार पर अनुवाद किया जाता है। यह पूरी तरह भाषावैज्ञानिक नियमों पर आधारित होता है। विदित हो कि सांख्यिकीय अनुवाद गणितीय और सांख्यिकी के नियमों पर होता है। यह प्रणाली व्याकरण के नियमों से संचालित नहीं होता, पहले से निर्मित बड़े द्विभाषिक कॉर्पस के लाखो-करोड़ो अनूदित वाक्यों का विश्लेषण कर अनुमान लगाता है कि किस शब्द या वाक्यांश के बदले कौन-सा शब्द समुचित होगा। सन् 1990 के दशक से लेकर सन् 2016 तक दुनिया के बड़े-बड़े अनुवाद उपकरण (गूगल ट्रान्सलेट तक) इसी तकनीक पर काम करते थे। सांख्यिकीय अनुवाद में अनुवाद मॉडल का काम होता है स्रोत भाषा के शब्द या वाक्यांश का लक्ष्य भाषा के शब्द या वाक्यांश से तुलन और भाषा मॉडल का काम होता है अनूदित का लक्ष्य भाषा व्यवस्थित पुनर्गठन। इसके शब्द-आधारित अनुवाद में एक-एक शब्द का अनुवाद होता है; वाक्यांश-आधारित अनुवाद में छोटे-छोटे शब्द-समूहों या वाक्यांशों का एक साथ अनुवाद होता है। ऐसे अनुवादों में व्याकरण की समझ के बदले संकलित सामग्री और सम्भावना से काम लिया जाता है, इसलिए जटिल और लम्बे वाक्यों में व्याकरण की भयानक भूलें होती रहती थीं। कृत्रिम मेधा के और न्यूरल मशीनी अनुवाद प्रणाली के व्यवहार में आने से अनेक स्थितियों में सुधार हुआ है। न्यूरल नेटवर्क के माध्यम से हुए सन्दर्भ-आधारित अनुवाद प्रणाली में अर्थ-विज्ञान और प्रयोगविज्ञान का उपयोग भी अनुगम्य होता है।
मशीनी अनुवाद प्रणाली की सुविधा के कारण अनुवाद के क्षेत्र में क्रान्ति के बावजूद इसकी अनेक सीमाएँ हैं--इसके उपयोग सक मुहावरों और लोकोक्तियों का सही अनुवाद अक्सर कठिन होता है। चूँकि मशीन को सांस्कृतिक सन्दर्भों की समझ नहीं होती, इसमें साहित्यिक शैली और भावात्मक सूक्ष्मताओं का पूर्ण संरक्षण नहीं हो पाता। बहुअर्थक शब्दों के विकल्प-चयन में अक्सर त्रुटियाँ रह जाती हैं। इसी कारण विशेषज्ञों की दृष्टि में मशीनी अनुवाद को अभी भी सहायक उपकरण ही है, अनुवादक का पूर्ण विकल्प नहीं है। मशीनी अनुवाद कितना भी फलदायी, उसे परिपूर्ण मानना हमेशा जोखिम भरा ही होगा! निर्माता, प्रयोक्ता अपने उत्पाद्य पर मुक्त होना चाहें तो हो लें, पर जोखिम तो रहेगा ही! मनुष्य द्वारा किए गए अनुवाद की बराबरी वह नहीं कर सकता! मशीनी अनुवाद वस्तुतः प्रारम्भिक मसौदा होता है, जिसे मानवीय कौशल से सँवरा जाता है; उसके भाषिक, सांस्कृतिक और शैलीगत स्वरूप को परिष्कृत कर प्रभावी बनाया जाता है।
अनुवाद में भाषावैज्ञानिक ज्ञान की उपादेयता
विदित है कि पाठ में प्रयुक्त बहुअर्थक शब्दों, मुहावरे, व्यंजनाओं, संकेतों, प्रसंगानुकूल अर्थ-संगतियों के कारण अनुवाद के दौरान बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ आती हैं। भाषावैज्ञानिक ज्ञान अनुवादकों को इन चुनौतियों के पार जाने में सहायक होता है। वे वैज्ञानिक ढंग से स्रोत-भाषा की संरचना समझ पाते हैं; प्रयुक्तियों में छिपे शब्दों के व्याकरणिक मूल्यों और अर्थ की सूक्ष्मताओं की पहचान करते हैं। यही ज्ञान उन्हें लक्ष्य-भाषा में की गई अभिव्यक्ति को व्याकरणिक रूप से सही और सहज सम्प्रेषणीय बनाने में सहायक होता है। अनुवाद का उद्देश्य स्रोत-पाठ के समग्र अर्थ एवं अभिप्राय की लक्ष्य-भाषा की प्रकृति के अनुरूप प्रस्तुति होता है, स्रोत-पाठ की संरचना का अनुकरण नहीं।
स्पष्टतः, अनूदित पाठ की उपयुक्तता और उपादेयता जाँचने का समुचित साधन भाषावैज्ञानिक ज्ञान ही है; जिसके बूते अनुवादक या अनुवाद-समीक्षक, अपने या औरों के अनूदित पाठ का मूल्यांकन करने, मूल और अनुवाद की प्रभावी क्षमता की जाँच करने में सक्षम होता है। मूल पाठ में प्रयुक्त शब्दों के सन्दर्भ-शैली-प्रयुक्ति और वाक्य-विन्यास से आए अर्थ-सौन्दर्य की तुलना करते हुए अनूदित पाठ में आई विलक्षणताओं या त्रुटियों की पहचान करने में सफल होता है। तकनीकी और पारिभाषिक शब्दों के बाहुल्यवाले पाठ के अनुवाद में तो भाषावैज्ञानिक ज्ञान का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। विज्ञान, सूचना-प्रौद्योगिकी, विधि, चिकित्सा, प्रशासन और व्यापार सम्बन्धी पाठ के अनुवाद में मानक रूढ़ार्थ की प्रयुक्ति अनिवार्य होती है, इस क्रिया में अत्यधिक सावधानी रखनी होती है; जिसमें भाषावैज्ञानिक समझ आवश्यक होती है।
भाषावैज्ञानिक ज्ञान की सीमाएँ
सच है कि अनुवाद-कार्य के लिए भाषाविज्ञान का ज्ञान अत्यन्त उपादेय है; पर भाषावैज्ञानिक ज्ञान की परिपक्वता भर से कोई अच्छा अनुवादक हो ही जाए, यह जरूरी नहीं। इस ज्ञान के बावजूद, किसी बेहतर अनुवादक के लिए, अनुवाद-क्रिया से सम्बद्ध दोनो भाषाओं (स्रोत-लक्ष्य) के गहन ज्ञान के साथ-साथ दोनो भाषाओं की संस्कृति, इतिहास, साहित्य और सामाजिक सन्दर्भ से भी जुड़ा ज्ञान अनिवार्य होता है। उसके मुहावरों, लोक-प्रतीकों, सांस्कृतिक संकेतों और साहित्यिक बिम्बों का सही अनुवाद करने के लिए अनुवादक में सांस्कृतिक संवेदनशीलता और रचनात्मकता भी आवश्यक होती है।
अनुवाद-कार्य के दौरान भाषावैज्ञानिक ज्ञान अनुवादक को भाषा की ध्वनि, शब्द, रूप, वाक्य, अर्थ, प्रयोग और सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप को समझने का वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। इसी कारण, अनुवाद और भाषाविज्ञान का सम्बन्ध अत्यन्त घनिष्ठ, बहुआयामी और परस्पर पूरक माना गया है। इसमें भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तों को व्यवहारतः लागू करने का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र माना गया है। मशीन आश्रित अनुवाद में तो इसकी उपादेयता ‘प्रणाली-निर्माण’ के समय से बढ़ जाती है; क्योंकि इसकी कम्प्यूटेशनल क्रियाओं में भाषाविज्ञान, अनुवाद तकनीक का आधार-स्तम्भ होता है। फिर भी मानवीय योगदान की भूमिका उसमें अनिवार्य होती है, क्योंकि भाषा केवल सूचना नहीं, यह संस्कृति, भाव और अनुभव की संवाहक भी होती है।
अतः एक कुशल अनुवादक के लिए द्विभाषिक ज्ञान के साथ भाषावैज्ञानिक दृष्टि भी अनिवार्य है। भाषा चूँकि विचार, संस्कृति, सामाजिक सम्बन्ध और मानवीय अनुभव को व्यक्त करने वाली जटिल व्यवस्था है; इसलिए अनुवाद को सटीक, स्वाभाविक, प्रभावपूर्ण और अर्थ-संगत बनाने में भाषावैज्ञानिक ज्ञान की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। उत्कृष्ट अनुवाद के लिए भाषाविज्ञान के अलावा सांस्कृतिक समझ, विषय-बोध, साहित्यिक संवेदना और रचनात्मक क्षमता का समन्वय तो अनिवार्य है ही! इसी समन्वय से स्रोत-लक्ष्य भाषाओं के बीच अनुवाद एक सेतु बन पाता है।
राय बेशक निजी हो, पर कहना मुनासिब होगा कि जिस अनुवाद ने दुनिया के सामुदायिक जीवन को इतना कुछ दिया; कई लुटी-पिटी सभ्यताओं को पुनर्यवस्थित करने का साधन बना; पुनरनुवाद के सहारे विलुप्त पाण्डुलिपियों के पुनर्संग्रहण की व्यवस्था दी; उस अनुवाद के लिए विगत चारेक दशकों में राजकीय संसाधन से जितने मशीनी अनुवाद उपकरण बने वे परियोजना संचालकों के हितसाधक अधिक हुए; तुलनात्मक रूप से उपयोक्ताओं के लिए न्यूनतम फलदायी हुए। आनेवाले में समय में इन संचालकों से अपेक्षाएँ रहेंगी कि वे राजकीय संसाधन का उपयोग साधक की तरह करें, भोक्ता की तरह उसका उपभोग न करें; उपयोक्ता की सुविधा और राष्ट्रीय-मानवीय प्रयोजन का ध्यान रखें।
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