Sunday, August 23, 2026

चेतनोन्नति का नन्दन-कानन जेएनयू और नामवर सिंह Intellectual Awakening Garden (JNU) and Namvar Singh

चेतनोन्नति का नन्दन-कानन जेएनयू 

और 

नामवर सिंह

निरन्तर खौफनाक परिस्थितियों से जूझते हुए, मैंने जैसे-जैसे विसंगत अनुभव जुटाए, उनमें भाग्य और ईश्वर जैसी अमूर्त शक्तियों का जिक्र बार-बार आया, जिन पर कभी भरोसा न हुआ। पर सोचता हूँ कि 22 मई 1991, बुधवार की सुबह का वह मुहूर्त मेरे जीवन में अचानक से कैसे आया?...

लेनिनग्राद से भारत वापस आ रहे अपने अग्रज मित्र डॉ. नरेन्द्र प्रसाद सिंह की अगुवाई में मैं डालटनगंज से दिल्ली आया था। मई 21, 1991 की गहन रात्रि की विचित्र घड़ी में मैं जे.एन.यू. कैम्पस पहुँचा था। यहाँ पहुँचने से पूर्व मुझे इस बात का इल्म न था कि उस दिन प्रातःकाल आततायियों ने तमिलनाडु के श्रीपैराम्बदूर के चुनाव-प्रचार में बम-विस्फोट कर भारत के प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी की हत्या कर दी थी।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से जे.एन.यू. तक की सड़कों पर खौफनाक सन्नाटा पसरा हुआ था।...जे.एन.यू. में हिन्दी में पी-एच.डी. कर रहे रमेश कुमार (नरेन्द्रजी के रिश्तेदार, बाद में मेरे घनिष्ठ मित्र, अब श्रीवार्ष्णेय कॉलेज, अलीगढ़ से सेवानिवृत्त हिन्दी विभागाध्यक्ष) के कमरे में रुका। सुबह-सुबह (22 मई, 1991) रमेशजी से निवेदन किया -- कि नामवरजी यहीं रहते हैं, उनसे मिल पाना सम्भव है क्या?...

तब तक मैं अपनी पहली पी-एच.डी. के शोध-निर्देशक डॉ. शिवशंकर झा ‘कान्त’ की प्रेरणा से नामवरजी द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘आलोचना’ के कुछ अंकों और उनकी विशिष्ट कृतियों--आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (1954), छायावाद (1955), इतिहास और आलोचना (1957), कहानी : नई कहानी (1964), साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कृति कविता के नए प्रतिमान (1968), दूसरी परम्परा की खोज (1982), वाद विवाद संवाद (1989) से परिचित हो चुका था। उनके मोहक गद्य पर मैं सम्मोहित रहता था। उनके जैसा गद्य लिखने की विफल कोशिश भी करता रहता था। उनके लेखन से परिचित होने से पूर्व मैं राजकमल चौधरी के गद्य-लेखन से इतना प्रभावित था कि पल-प्रति-पल उन्हीं की शैली नकल करने में लगा रहता था। अब नामवर जी को पढ़ने के बाद, नकल करने के एक और स्रोत मिल गए। तार्किक ढंग से अपनी बात रखने की इन दोनों की पद्धति और इनके गद्य-लेखन की शैली ने, इन दोनों की भाषिक संरचना ने मेरी चेतना में कुछ इस तरह जगह बनाई कि मैं सदा-सदा के लिए इन दोनों का गुलाम हो गया, शायद अभी भी इन दोनों से मुक्त नहीं हुआ हूँ, शायद मुक्त होने की कभी चेष्टा भी नहीं की, शायद अभी भी नहीं कर रहा हूँ।...उस वक्त जे.एन.यू. कैम्पस की हवाओं में मुझे उनके विचार और गद्य-शैली की अनुगूँज-सी सुनाई पड़ रही थी।...

जे.एन.यू. के कावेरी छात्रावास में जलपान करने के बाद रमेशजी मुझे टहलाते-टहलाते 109, उत्तराखण्ड (नामवरजी का तत्कालीन आवास) के दरवाजे तक पहुँचा गए। एक छोटे-से नामपट्ट पर लिखा था--नामवर सिंह। इतने बड़े नामवर का इतना छोटा नामपट्ट! देखकर चकित नहीं हुआ। गाँव में किर्तनियाँ समुदाय को गाते हुए सुना था -- राम से बड़ा राम का नाम। मुझे उस कीर्तन का कोई अर्थ न तब लगा था, न अब लगा है। अब तक न तो राम जैसी किसी शक्ति को देखा, न ही उनकी कोई महिमा जानी। किन्तु, नामवर नामधारी महिमामय व्यक्ति से तो अभी-अभी मेरी भेंट होनेवाली थी, जिनके लघुकाय नामपट्ट की लघुता में उनका ख्याति-वैभव समाया हुआ महसूस कर रहा था।

मैंने रमेशजी से कहा--आप अब चलिए, मैं मिलने के बाद आपके हॉस्टल आ जाऊँगा। रमेशजी ने कहा--घण्टी बजाइए! परिचय करा देता हूँ!

मैंने उनका प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा--जी नहीं! कल को नामवरजी से मेरे रिश्ते कैसे हों, इसका श्रेय मैं किसी और को नहीं देना चाहता!...रमेशजी वापस चले गए। मैंने घण्टी बजाई। भव्य व्यक्तित्व, लम्बी कद-काठी के नामवर जी प्रकट हुए--जी! बताइए!

- डॉक्टर साहब! मैं हूँ देवशंकर नवीन। मैथिली और हिन्दी में भी लिखता हूँ। आपसे मिलने की अभिलाषा लिए बिहार से आया हूँ।...

नामवरजी ने दरवाजे से मेरे प्रवेश का रास्ता देते हुए, अपनी फैली तलहत्थी को अन्दर की ओर लहराया (गोया बीच की हवाओं को मेरे लिए रास्ता देने का आदेश दे रहे हों) और कहा--‘आइए!’...

अह्! उस मद्धम-सी ध्वनि के ‘आइए’ में क्या आकर्षण था! गजब!

नामवरजी ने दरवाजे की सिटकनी लगाई और हमलोग भीतर आकर बैठ गए। उन्होंने कहा -- आप ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, नागार्जुन, सुभद्र झा की भव्य परम्परा से आए हैं। बताइए! कैसे आना हुआ?...

मैंने कहा -- डॉक्टर साहब, मिलने के अलावा कोई भी अभिकलित उद्देश्य नहीं है। पर आपके सामने हूँ, तो एक साहस कर लेता हूँ!

- जी, बताइए!

- मैंने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा से ‘राजकमल चौधरी : जीवन एवं साहित्य’ विषय पर मैथिली में पी-एच.डी. की है। बीते दिनों राजकमल चौधरी पर हिन्दी में कई लेख लिखे। एक प्रकाशक उसे छापना चाहता है। आप उस पर चार वाक्य लिख देते तो मेरे लिए आशीर्वाद हो जाता, किताब के लिए संस्तुति हो जाती। उनके गम्भीर आलोचकीय दर्प के बीच से रत्ती भर की एक मुस्कान उभरी, जो खिलने से पहले एक वाक्य बन गई--क्यों बच्चों की तरह उँगली पकड़कर चलना चाहते हैं?...

वे अपनी वाग्विदग्धता में शायद मेरे दुस्साहस पर मुस्कराना चाहते थे, और मुझे मना भी कर रहे थे। तब मुझे मालूम न था कि मैं दन्तकथा के उस गोरैये जैसा दुस्साहस कर रहा हूँ, जो डैनों में धूल लिपटाकर राम द्वारा बनाए जा रहे रामेश्वरम् सेतु के अगले सोपान में धो आता था और खुद को उस पुनीत कार्य का सक्षम हिस्सेदार मानता था। अब समझ में आता है कि मैंने कितना बड़ा दुस्साहस किया था। तब मुझे यह भी नहीं मालूम था कि नामवरजी, राजकमल चौधरी को पसन्द नहीं करते।



 
इसका यह मतलब भी नहीं कि वे राजकमल चौधरी के लेखन को नकारते थे। वे सदैव अपने विरोधियों के कथन में भी कुछ सार्थक देखकर स्वीकारते रहे थे। उनकी स्पष्ट राय थी कि अपनी मान्यता पर डटे रहने के बावजूद प्रतिपक्ष से सहमति की सम्भावना बने रहने देना चाहिए। लोगों को नामवर सिंह द्वारा राजकमल चौधरी की प्रशंसा में लिखा कोई लेख बेशक न दिखा हो
, पर तथ्य है कि उन्होंने कहीं राजकमल चौधरी की भर्त्स्ना में भी कोई लेख नहीं लिखा।

प्रसंगानुकूल उल्लेख सुसंगत होगा कि सन् 1967 के आसपास का समय भारतीय लोकतन्त्र के लिए दुर्वह था। लम्बे समय के कांग्रेसी शासन में देश की आन्तरिक दशा बेढब थी। सन् 1964-1966 तक में देश ने चार प्रधानमन्त्रियों को देखा था। लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने से देश में अफरातफरी मची हुई थी। क्षेत्रीय ताकतें मुखर हो रहीं थीं। हरित क्रान्ति की शुरुआत के बावजूद अनाज की तंगी जारी थी। सन् 1962 और 1965 के सीमा-संघर्ष एवं अन्य कारणों से देश की अर्थ-व्यवस्था चरमराई हुई थी। सन् 1967 में इन्दिरा गाँधी की सरपरस्ती में हुए पहले आम चुनाव के परिणाम में कांग्रेस पार्टी की स्थिति से ऐसा स्पष्ट भी हुआ था। सरकार बनाने में कांग्रेस पार्टी लगातार चौथी बार सफल तो हुई, पर राज्यों पर उसकी पकड़ ढीली दिखी। पण्डित जवाहरलाल नेहरू की अनुपस्थिति में हुआ वह पहला चुनाव था। भारतीय राजनीति के लिहाज से वह चुनाव महत्त्वपूर्ण था। वह देश की पहली महिला प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी के युग की शुरुआत थी। राज्य विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा था। कई राज्यों की सत्ता उससे छिन गई थी और कुछ राज्यों में कांग्रेस विरोधी दलों के गठजोड़ से संविद सरकारों की नींव रखी गई थी। चीन और पाकिस्तान के साथ हुए संघर्षों में अमेरिका और रूस के रवैये से अन्तरराष्ट्रीय राजनीति-विश्लेषक तरह-तरह के कयास लगाने लगे थे।

उसी दौरान हिन्दी की विशिष्ट पत्रिका आलोचना के सम्पादन का दायित्व नामवरजी ने सँभाला था। उनके सम्पादन में आलोचना (अप्रैल-जून 1967) नए तेवर के साथ प्रकाशित होनी शुरू हुई। इस अंक से हिन्दी पत्रिका आलोचना के नए युग का आरम्भ माना गया। इसे नवांक-1 की संज्ञा दी गई। इसी अंक में नामवरजी ने उस दौर के सर्वाधिक ज्वलन्त विषय ‘चुनाव के बाद का भारत’ विषय पर पूरे देश के चौदह (सम्भवतः) विशिष्ट चिन्तकों की परिचर्चा आयोजित कर उनकी टिप्पणियाँ प्रकाशित कीं। उन चौदह चिन्तकों के तारकपुंज में, जिनमें उनके गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी भी थे, राजकमल चौधरी भी थे, जो आयु में नामवरजी से तीन वर्ष छोटे थे। जिज्ञासा सहज होगी कि नामवरजी राजकमल चौधरी से नफरत करते तो ऐसा क्यों करते? अपने सम्पादन में अपने गुरु के समकक्ष महत्त्व कैसे देते। बहरहाल...

मैंने कहा--डॉक्टर साहब, अपने पाँव की शक्ति थाहने से पहले तक तो बच्चे बड़ों की उँगली पकड़े ही रहते हैं।

तनिक-सी एक मुस्कान के साथ एक ध्वनि फूटी -- बड़े वाक्पटु दिखते हैं!

मैंने छूटते ही कहा -- सर, बिहार से लोग जब दिल्ली की ओर रवाना होते हैं, तो बड़े-बुजुर्ग और दिल्ली आ जाने पर टूरिस्ट गाइड कहते ही रहते हैं -- दिल्ली में कुछ देखो चाहे न देखो, कुतुबमीनार जरूर देख लेना! मैं भारतीय समाज, विश्व-साहित्य, मानव-सभ्यता, और जनसंस्कृति के कुतुबमीनार के सामने बैठकर क्या वाक्पटुता दिखाऊँगा?

इस बार नामवरजी की मुस्कान हल्की-सी हँसी तक पहुँची। उस वक्त तो मुझे लग रहा था कि मैंने ऐसा वाक्य कहकर बहुत बड़ा तीर मारा है! नामवरजी की हँसी ने और भी मुगालते में डाल दिया। पर अब सोचता हूँ कि बड़े विद्वान कई बार दूसरों की मूर्खताओं का भी आनन्द लेते हैं। अपने लिए तो आज भी दुखी रहता हूँ कि नामवरजी, केदारजी जैसे गम्भीर विद्वानों की सोहबत में मैं ऐसा क्यों नहीं सीख पाया? वैसी मूर्खता करते हुए लोगों को देखकर उनकी तरह नजरअन्दाज क्यों नहीं कर पाता हूँ?...गुरुवर! सुन रहे हों तो ऐसा कर पाने का आशीष दें! इस कला के बिना बहुत तकलीफ होती है!

आगे कुछ बातें मैथिली साहित्य की रचनाओं को लेकर हुई। जी.एल.ए. कॉलेज, डालटनगंज (राँची विश्वविद्यालय) में तदर्थ व्याख्याता पद पर मेरी स्थिति को लेकर चर्चा हुई।...

इसी बीच मैंने एक और अभिलाषा जताई, कहा -- सर, मैथिली में मैं पी-एच.डी. तो कर चुका, राँची विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. भी हूँ, वहीं से इस बार हिन्दी में एम.ए. की परीक्षा दी है। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा में डी.लिट्. के लिए अनुबन्धित हो गया हूँ, पर आप अपने साथ कुछ दिनों काम करने का अवसर दें तो पिछला सब कुछ छोड़कर यहाँ आ जाऊँगा।

- नौकरी का क्या करेंगे?

- नौकरी तो एडहॉक है सर! आपके साथ काम करने के सुख से बड़ा सुख कोई नौकरी तो दे नहीं सकती!

- भावुकता की बात मत कीजिए। तर्कपूर्ण रहा कीजिए!

बहुत जिद करने पर उन्होंने कहा -- देखिए, यहाँ डी.लिट्. नहीं होता। प्रवेश परीक्षा पास करने पर एम.फिल्. में दाखिला होता है। हमारे सेण्टर में डायरेक्ट पी-एच.डी. में दाखिला के लिए आवेदन माँगा गया है। जाकर देख लीजिए, मन करे तो आवेदन कर दीजिए। इण्टरव्यू से चयन होगा।

मैं प्रसन्न-चित्त बाहर आया। नामालूम कारणों से स्वयं को ताकतवर महसूस करने लगा। अभाव समेत अनेक परेशानियों ने जिस तरह मेरे जीवन को विफलता और हताशा का सम्मेलन-कक्ष बना दिया था, उसमें अचानक से आशा की किरण दिखने लगी। कुछ दिनों पहले कहीं एक प्रसंग पढ़ा था -- शहंशाह अकबर ने अपने दूसरे बेटे को किसी सूबे की देखभाल के लिए भेजा था। बेटे ने पिता को पत्र लिखा कि यहाँ एक बड़े प्रतापी फकीर हैं, फकीरों पर आपकी बड़ी आस्था है; मेरा मन करता है कि उनसे मिलूँ, आप इजाजत दें तो मिल आऊँ!


 

अकबर ने जवाब दिया -- जरूर मिलो, मगर मिलने पर भय लगे, तो दुबारा न मिलना। क्योंकि ज्ञान उजाला फैलाता है, भयमुक्त करता है, भयभीत नहीं। अपने फन में जो माहिर होते हैं, उन पर खुदा का विशेष करम होता है। उनसे मिलना, खुदा से मिलने के बराबर होता है।...कहते हैं कि अपने दरबार में नवरत्न की बहाली अकबर ने इसी मंशे से की थी।

नामवरजी से मिलकर बाहर निकलने के बाद देर तक मुग्ध होता रहा -- इतने महान व्यक्ति से मिल आया, इतनी देर उनके साथ बैठा रहा, कभी कोई भय अथवा संकोच नहीं हुआ। पूरे समय किसी अनजान सम्मोहन से भरा रहा।...जानता था कि मूर्खों को कोई भय-संकोच नहीं होता। क्योंकि भय और संकोच का सीधा रिश्ता उचितानुचित के चिन्तन-विवेक से होता है, यह कार्य स्वस्थ मस्तिष्क की अपेक्षा रखता है, दुर्योग से मूर्खों के पास यह उपकरण होता नहीं। मैं सुबुद्ध बेशक न रहा होऊँ, पर मूर्ख तो कतई नहीं था। अपने जीवन के उस क्षण की मूल्यवत्ता का पूरा अभिज्ञान मुझे था। बाहर निकलते हुए नामवरजी दरवाजे तक छोड़ने आए। बाहर आकर वापस उनकी तरफ मुड़कर हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए मुझे अपने उस सौभाग्य पर सचमुच इतराने का मन करने लगा।

कावेरी छात्रावास के 220 नम्बर कमरे में रमेश रहते थे, वापस आकर उन्हें अविकल कहानी बताई, उन्होंने डायरेक्ट पी-एच.डी. में दाखिला के लिए आवेदन करने की पूरी व्यवस्था कर दी। आवेदन जमाकर वापस मैं डालटनगंज आ गया। इण्टरव्यू के लिए बुलावा आया। सम्भवतः जुलाई 1991 में कभी। अब एक बार फिर जे.एन.यू. में था। इण्टरव्यू से एक दिन पूर्व मैं फिर बैताल की तरह नामवरजी के सिर आ धमका -- सर, आपके कहे अनुसार मैंने आवेदन किया। बुलावा भी आया। अब मैं आपके सामने हूँ।

उन्होंने कहा -- देखिए, डायरेक्ट पी-एच.डी. में दाखिला के लिए उन आवेदकों को भी बुलाया जाता है जिनके पास एम.फिल्. की डिग्री बेशक न हो, पर उनका लिखा छपा इतना हो कि उसे एम.फिल्. डिग्री के समतुल्य माना जाए। इस बार संयोग से भीड़ ज्यादा है। कई अभ्यर्थी बुलाए गए हैं। प्रतिस्पर्द्धा अधिक है। इण्टरव्यू में पूरे विभाग के सभी अध्यापक रहेंगे। सभी आपसे सवाल करेंगे, आपको अपनी श्रेष्ठता साबित करनी होगी।

...अगले दिन इण्टरव्यू था। प्रस्तावित शोध के लिए किसी एक नूतन विषय पर प्रारूप लेकर इण्टरव्यू में उपस्थित होना था। नैतिक समर्थन में रमेशजी मेरे साथ थे। भारतीय भाषा केन्द्र के कमरा संख्या-24 (नामवरजी का चैम्बर) में इण्टरव्यू होना था। मेरे अलावा अन्य ग्यारह अभ्यर्थी वहाँ पहले से उपस्थित थे। एक अभ्यर्थी के हाथ में मैंने कवि केदारनाथ सिंह की कविता पर लिखा लघु शोध-प्रबन्ध देखा। वे बनारस से आए हुए थे, खुद को काशीनाथजी के निकटर्ती बता रहे थे। मेरी नाउम्मीदी में तनिक और इजाफा हुआ। क्योंकि भीतर इण्टरव्यू में स्वयं केदारनाथ सिंह बैठे हुए थे, अध्यक्षता कर रहे नामवरजी, काशीनाथजी के बड़े भाई थे, पिछली शाम नामवरजी की भाषा भी तनिक बदले हुए सुर की लगी थी -- ‘आपको अपनी श्रेष्ठता साबित करनी होगी।’

...करीब-करीब सोच लिया कि जब नहीं ही होना है, तो सिर क्या धुनना!

इण्टरव्यू देकर वापस आए एक अभ्यर्थी से पूछ बैठा -- क्या पूछा गया आपसे? उन्होंने बिन्दास अन्दाज में कहा -- कुछ खास नहीं, संस्कृत का कोई श्लोक सुनाने को कहा गया। मैंने सुना दिया। फिर सिनॉप्सिस माँगा। उन्होंने एकाध और सवाल बताए।


 

मैंने उनसे पूछा -- आपने श्लोक कौन-सा सुनाया? उन्होंने कहा -- त्वमेव माता च पिता त्वमेव...। मुझे अचानक से अपनी खोती हुई शक्ति वापस आती दिखने लगी। लगा कि इनकी तुलना में मेरी समझ बेहतर है। पी-एच.डी. में दाखिला का इण्टरव्यू देते हुए नामवर सिंह के सवाल पर कोई अभ्यर्थी यह श्लोक सुनाए, तो क्या कहा जाए?...

मुझे लगा कि यह श्लोक सुनकर नामवरजी ने निश्चय ही सिर पीटा होगा! अपने बारे में तो जानकारी नहीं थी, उनका चयन न होने का परिणाम मैं उसी वक्त रमेशजी के कान में कह डाला। एकाध अभ्यर्थी के बाद मेरी बारी आई। संयोग ऐसा कि श्लोक सुनाने को मुझे भी कहा गया।...मुझे हठात् राजशेखराचार्य का एक श्लोक याद आया। कविराज राजशेखर (सन् 880-920) ने काव्यशास्त्र सम्बन्धी अपने मानक ग्रन्थ ‘काव्यमीमांसा’ के नवें अध्याय में पाठ-प्रतिष्ठा, काव्यार्थ और अर्थव्याप्ति जैसे विषयों पर विचार किया है; जिसमें उन्होंने शब्दानुशासन के प्रवचनकर्ता और शाकटायन व्याकरण के रचयिता पाल्यकीर्ति (सन् 814-867) के श्लोक का उद्धरण दिया है। ऐसे विशिष्ट विद्वानों के तारकपुंज से बेहतर मुझे और कहाँ क्या मिलता! मैंने पूरा श्लोक सुना दिया –

येषाम् वल्लभया समम् क्षणमिव क्षिप्रम् क्षपाक्षीयते,

तेषाम् शीतकरो शशि विरहिणाम् उल्कैव सन्तापकृत्।

अस्माकं न तु वल्लभा न विरहस्तेनोभयाभावतः

चन्द्रौराजति दर्पणाकृति नोष्णो न वा शीतलः।...

हालाँकि इसका एक पाठ –

‘येषां वल्लभया समं क्षणमिव स्फारा क्षपा क्षीयते,

तेषां शीततरः शशि विरहिणामुल्कैव सन्तापकृत्।

अस्माकं न तु वल्लभा न विरहस्तेनोभयभ्रंशिनाम्

इन्दुराजति दर्पणाकृतिरयं नोष्णो न वा शीतलः’

... भी है। सारे लोग चुप थे, शायद सब के सब नामवरजी के अगले सवाल की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने कुछ प्रसन्नचित्त होकर अगला सवाल किया -- इसका अर्थ कर सकते हैं? मैंने अन्वय करते हुए अर्थ बताया।

फिर उन्होंने प्रस्तावित शोध का प्रारूप माँगा। मैंने उनके समक्ष प्रारूप रख दिया -- ‘राजकमल चौधरी की कहानियों का सामाजिक सरोकार’। उस वक्त तक भी मुझे जानकारी नहीं थी कि नामवरजी राजकमल चौधरी को पसन्द नहीं करते। हालाँकि अच्छा ही था कि मुझे जानकारी नहीं थी; होती, तो निश्चय ही मैं किसी और विषय पर सिनॉप्सिस ले जाता, और हो न हो मेरा चयन नहीं होता।

सिनॉप्सिस देखकर उन्होंने पूछा -- आपको ऐसा लगता है कि राजकमल चौधरी ने इतना कुछ लिखा, जिन पर पी-एच.डी. हो जाए?

मुझे तनिक अचरज हुआ। इस बात की तो कल्पना असम्भव थी कि राजकमल चौधरी के लिखे-छपे साहित्य से नामवरजी अनभिज्ञ रहे हों! मैंने उनके इस प्रश्न को इस रूप में लिया कि वे सम्भवतः मुझे उग्र करना चाह रहे हैं; या फिर मेरे धैर्य, शालीनता और अध्ययन की सीमा जानना चाहते हैं। मैंने कहा -- सर, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने मात्र तीन कहानियाँ लिखीं, उनमें भी विचार सदैव एक ही कहानी पर होता है। उन पर लगातार शोध हो रहे हैं। राजकमल चौधरी की लगभग साढ़े आठ सौ कविताएँ, दस उपन्यास, पाँच दर्जन से अधिक वैचारिक लेख, आधे दर्जन के करीब एकांकी, कई स्तम्भ-लेखन, चार सौ पृष्ठों के करीब वैचारिक पत्र-डायरी को छोड दिया जाए, तो भी उनकी लिखी दोनों भाषाओं की केवल कहानियाँ ही डेढ़ सौ के करीब हैं। और, जितना मैं देख पाया हूँ, अब तक एक भी कहानी द्वितीयक श्रेणी की नहीं है। फिर भी उन पर पी-एच.डी. न हो, तो फिर हो किन पर?...

सब के सब स्तब्ध रह गए। स्वयं नामवरजी कुछ चौंके हुए से दिखे। उन्हें सम्भवतः विश्वास नहीं हो पाया। उन्होंने फिर पूछा -- आपने ये सब रचनाएँ देखी हैं?

मैंने कहा -- सारी नहीं देखी हैं, अनुसन्धान में लगा हूँ सर, सूची मेरे पास है।...

नामवरजी ने स्वयं सूची देखी, फिर औरों की तरफ बढ़ाया। फिर मेरी प्रकाशित रचनाओं की कतरनें देखी जाने लगीं। और, होते-होते उस साक्षात्कार में बातचीत के चरित्र घुस आए। कुछ बातचीत के बाद मैं बाहर आ गया।...


 अगली सुबह फिर उनके घर पहुँच गया। उन्होंने दरवाजे पर ही कहा -- बधाई हो
, आपका चयन हो गया है। पहले नम्बर पर आपका ही नाम है। कुछ पैसे-वैसे हैं साथ में? न हों, तो इन्तजाम कर लीजिए। कल तक नोटिफिकेशन हो जाएगा। नामांकन कराकर ही वापस जाइए। मैं खुशी-खुशी वापस हुआ।

रमेशजी के कमरे में जश्न मनाया गया। अगले दिन सचमुच नोटिफिकेशन हो गया। नामांकन के समय भी कई लिपिकीय बाधाएँ उपस्थित हुईं, जिन्हें फोन पर निर्देश दे-देकर फिर नामवरजी ने ही दूर किया। उनके लिए जातिवादी, सम्बन्धवादी, परिवारवादी, मान्यतावादी विशेषण का झुनझुना बजानेवालों को तनिक रुककर विचार करना चाहिए कि मैं तो उस दिन बाढ़ में बहकर आए तिनके की तरह था! अपने लिए तो हर कोई महत्त्वपूर्ण होता है, पर नामवरजी के सामने मेरी औकात तो तिनके की ही थी, सिनॉप्सिस भी उनकी पसन्द के प्रतिकूल विषय पर था, फिर भी उन्होंने मेरा चयन किया, यह उनकी तटस्थता नहीं थी? वे मान्यतावादी होते तो ऐसा करते? बहरहाल...

जे.एन.यू. के हॉस्टल में रहकर पढ़-लिख पाने की व्यवस्था में लिप्त हो गया। दिन कटता गया। एक दिन रामदुलारेजी (भारतीय भाषा केन्द्र में कार्यरत नामवरजी के प्रिय कर्मचारी) ने आकर सूचना दी कि डॉक्टर साहेब ने बुलाया है। मैं तो वैसे भी आचार्यवर से मिल आने के बहाने ढूँढता रहता था। पहुँच गया घर। नमस्ते किया। मेरा अभिवादन स्वीकार करते हुए उन्होंने पूछा -- ये बताइए, आपने कहा था कि पारिवारिक भरण-पोषण का दायित्व आप पर ही है, आप तो नौकरी छोड़कर यहाँ आ गए हैं, ऐसे में कैसे काम चल रहा है?

मैंने कहा -- सर, और तो कोई शऊर है नहीं! थोड़ा-बहुत पढ़ना-पढ़ाना भर आता है। आर.के.पुरम में विज्ञान का एक ट्यूशन पढ़ाता हूँ और अखबार-पत्रिकाओं के दफ्तरों में जा-जाकर कुछ लिखने का काम ले आता हूँ। किसी तरह काम चल रहा है। नामवरजी दो पल के लिए चुप रहे। सन्नाटा-सा छाया रहा। फिर उन्होंने एक लम्बी साँस खींची और कहा--चलिए, कुछ तो राहत मिली!

मैंने महसूस किया कि आचार्यवर मेरी आर्थिक बदहाली पर घोर चिन्तित हैं। इनके वश में कुछ होता, तो आज ही मुझे कोई रोजगार दिला देते।...एक तरफ मैं दुखी हो रहा था कि इन्हें मेरी जिम्मेदारियों के बोझ ने परेशान कर रखा है। दूसरी ओर उत्साह से प्रफुल्ल था कि ऐसी महान शख्सीयत जिसके लिए इतने रहमदिल हों, उनके जीवन में दुःख अधिक देर टिक नहीं सकता।

गुरुवर ने आगे कहा -- पर इस समय किसी और बात के लिए आपको बुलवाया है!

- जी!

- विभाग में आपके शोध-निर्देशक तय होने हैं। किसी को चुनकर बात कर लीजिए!

- सर, शोध-निर्देशक चुनने की औकात तो मेरी है नहीं, प्रयोजन भी नहीं है, क्योंकि मैंने तो आवेदन ही किया था आपके निर्देशन में काम करने के लिए।

- पर ऐसा सम्भव नहीं होगा। मैं थोड़े ही दिनों बाद, कैम्पस से बाहर चला जाऊँगा। फिर आपको गाइड बदलना पड़ेगा। आप मुश्किल में पड़ जाएँगे। इसलिए अभी ही ऐसा गाइड तय कर लीजिए, जिनके साथ आगे तक आप बने रहें।

उन्होंने कुछ नाम भी बताए और कहा कि ये लोग मेहनती हैं। आपको अच्छे से काम कराएँगे।

मैंने कहा -- सर, मुझे नहीं चाहिए मेहनती गाइड। शोध तो मुझे करना है न! मेहनती गाइड का मुझे क्या करना? आप जब तक यहाँ हैं, आपके साथ रहूँगा, जाते समय आप जिनके साथ कहेंगे, चला जाऊँगा!

इस बार वे तनिक जोर देकर बोले -- बच्चों की तरह जिद मत कीजिए! आप परेशानी में न पड़ें, इसलिए यह सलाह दे रहा हूँ। तय आपको करना है, मन करे तो केदारजी से बात करके देखिए! तैयार हो जाएँ तो बेहतर!

अबकी मैंने सोचा -- महान लोग, पता नहीं किस महदुद्देश्य से कोई सलाह दे दें। मैंने उनकी बात मान ली। केदारजी से बात कर उन्हें राजी कर लिया। थोड़ी कठिनाई वहाँ भी आई, पर बात बन गई, केदारजी ने अन्ततः मान लिया।

जे.एन.यू. में पंजीकृत हुए साल लगने को आए थे। इस बीच दिल्ली से प्रकाशित सभी दैनिक पत्रों के साप्ताहिक परिशिष्टों में मैं छपने लगा था। राष्ट्रीय सहारा में उपसम्पादक (ट्रेनी) पद की रिक्ति आई थी। मैंने आवेदन किया और जून 17, 1992 को उनके घर जाकर सूचना दी। दो पल चुप रहकर नामवरजी ने लेटर-पैड निकाला और चिट्ठी लिखने लगे—

प्रिय श्री विभांशु दिव्याल जी, आपसे यह पत्र लेकर डॉ. देवशंकर झा मिलेंगे। ये आपके अखबार में उप-सम्पादक (ट्रेनी) के उम्मीदवारों में हैं। आपके सिवा वहाँ और कोई ऐसा नहीं है जिससे मैं इस तरह के काम के लिए सिफारिश कर सकूँ। देवशंकर जी हमारे केन्द्र में पी-एच.डी. के शोध छात्र हैं। यहाँ आने से पहले ये बिहार के एक कालेज में अध्यापन करते थे और पत्र-पत्रिकओं में लिखते रहे हैं। मुझे यकीन है कि यदि इन्हें आपके यहाँ काम करने और सीखने का अवसर मिला तो ये आपलोगों की अपेक्षाओं के बहुत कुछ अनुरूप प्रमाणित होंगे। कृपया जहाँ तक हो सके इनकी सहायता करें। सस्नेह आपका...

-- नामवर सिंह


 

ऐसी चिट्ठी, जिसमें पत्रवाहक के मान-सम्मान और कर्मठता को ऊँचे शिखर से प्रस्तुत किया जाए, नामवरजी ही लिख सकते थे। इस पत्र में वे कहीं मेरे लिए गिड़गिड़ाते नहीं दिख रहे हैं। हर जगह मेरा ही सिर ऊँचा करते दिख रहे हैं।...सचमुच महान व्यक्ति की संगति मनुष्य को बहुत गौरव दिलाती है।

राष्ट्रीय सहारा के ‘हस्तक्षेप’ स्तम्भ में लिखने का काम तो मुझे विभांशु दिव्याल ने ही दिया था। उन दिनों मुझ जैसे स्ट्रगलर्स को इस तरह के फ्रिलान्स काम मिल जाया करते थे। उनसे परिचय जैसा कुछ तो था मेरा, किन्तु नामवरजी का यह पत्र तो नौकरी के लिए था!...पत्र के साथ विभांशु जी से जाकर मिला। उन्होंने इण्टरव्यू में मदद करने का आश्वासन भी दिया। पर दुर्योग ऐसा कि इण्टरव्यू के समय मैं दिल्ली में नहीं था, लिहाजा यह अवसर मेरे हाथ से जाता रहा।

उल्लेख सुसंगत हो कि नामवर सिंह जैसे अध्यापकों के ही अवदान से जेएनयू, ज्ञान-विकास के केन्द्र से ऊपर उठकर, जीवन-दृष्टि और वैचारिक विकास का प्राकृतिक उपवन बन गया था; जहाँ वातावरण के कण-कण में शैक्षणिकता व्‍याप्‍त थी। ऊपर चर्चा हो चुकी है कि इस गुरुकुल से मेरा सम्पर्क एक शोधार्थी के रूप में सन् 1991 में हुआ, जब डाइरेक्‍ट पी-एच.डी. में मेरा दाखिला हुआ था। अर्थात् किसी भी प्रवेश परीक्षा में शामिल हुए बिना, एम.फिल्. किए बिना सीधे पी-एच.डी. में दाखिला। उन दिनों भारतीय भाषा केन्‍द्र में प्रति वर्ष दो ऐसे शोधार्थियों के दाखिले का प्रावधान था, जिन्होंने एम.फिल्. न भी किया हो, पर उनका प्रकाशित लेखन ऐसा हो, जिसे एम.फिल्. की बराबरी का माना जाए। जेएनयू की स्‍थापना के उस बाइसवें वर्ष तक भारतीय भाषा केन्‍द्र में केवल एक ही शोधार्थी का नामांकन हुआ था, मैं उस धारा का दूसरा शोधार्थी था।

यहाँ के अध्यापकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, अध्‍येताओं...सबके निवास की व्यवस्था, परिसर के आवास या छात्रावास में ही होती थी। उन आवासीय रहन-सहन में भी वैचारिक खुलापन दिखता था। आवासीय परिसर में किसी के मन में घेराबन्‍दी या सीमा-विस्‍तार की इच्‍छा नहीं सताती थी। सहजता, प्राकृतिकता और खुलापन ही उन दिनों यहाँ के अध्‍यापकों-अधिकारियों के आचरण में बसा हुआ था। घेरा डालने की प्रथा नहीं थी, न आवास में, न विचार में। विचार की किलाबन्‍दी की शुरुआत के बाद ही शायद आवासीय किलाबन्‍दी की धारणा यहाँ पनपी होगी। वैचारिक आवाजाही की प्रथा तो ऐसी थी कि हर पर्यवेक्षक अपने शोधार्थियों को अन्‍य विद्वानों, यहाँ तक कि अन्‍य ज्ञान-शाखा के विद्वानों से चर्चा करने के लिए प्रेरित किया करते थे।

उन दिनों यहाँ न तो विचार पर कोई पहरा था, न ज्ञानार्जन की किसी पद्धति पर और न ही वस्तु पर। परिसर में सुरक्षा गार्ड न के बराबर था। यहाँ पढ़ाई की व्यवस्था भी, न मालूम कारणों से शिष्योपशिष्य परम्परा की बन गई थी। कक्षा में अध्यापक जब कभी कोई अवधि-पत्र (टर्म पेपर) या संगोष्‍ठी पत्र (सेमिनार पेपर) लिखने देते थे; कोई भी अध्‍येता लिखकर सीधे अध्‍यापक को नहीं सौंपते थे। हर कनिष्‍ठतम अध्‍येता को यहाँ अपने से वरिष्‍ठ पाँच बैच के अध्‍येता रहते थे, जिनके सम्‍पर्क में वे सदैव अपने ज्ञानलोक को पुष्‍ट करते रहते थे। वरिष्‍ठों के निर्देशन में शोध-पत्रों पर काम करते हुए हर अध्येता भरपूर चेष्‍टा से स्‍तरीय पत्र लिखकर कई-कई बार अपने शोध-पत्र को इतना स्‍तरीय बना लेते थे कि मूल्‍यांकन के समय कई बार अध्‍यापक भी सम्‍मोहित हो जाते थे।

अध्‍यवसाय का यह श्रेष्‍ठतम मार्ग शायद ही भारत के किसी विश्‍वविद्यालय में अपनाया जाता होगा। इस पूरी क्रिया में न केवल शोध-पत्र लिखनेवाले उस छात्र-छात्रा के ज्ञान-फलक का विकास होता था, बल्कि उन्हें दिग्दर्शन देनेवाले वरिष्‍ठ अध्‍येताओं के विकास के रास्ते भी खुलते थे। वह इस लिहाज से भी अपने को अद्यतन रखने की चेष्टा करते थे कि किसी कनिष्ठ अध्‍येता के पूछे गए प्रश्नों का हल बताने में उन्हें हतप्रभ न होना पड़े। व्यवस्था इतनी उदार हुआ करती थी कि अध्यापक हों या वरिष्ठ अध्‍येता, पूछे गए किसी प्रश्न का तत्‍काल हल न बताने की स्थिति में सहजता से स्‍वीकार करते थे कि अभी मैं इस प्रश्न के जवाब देने की स्थिति में नहीं हूँ, इस पर तैयार होकर अगले दिन या उसके अगले दिन या किसी निर्धारित समय में इस विषय पर हम बात करेंगे। 

अध्‍येताओं के पारस्‍परिक संवाद, सदैव किसी न किसी पाठ्यक्रम सम्‍बन्‍धी विषय, या कक्षा में उठी कोई नई उद्भावना या राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय विषयों पर ही होता था। बहसें कहीं भी हों, कमरे में, मंच पर, ढाबे पर...सब मानवीयता, सामाजिकता, जनसरोकार या राजकीय व्यवस्था पर ही हुआ करती थी। 

डाइरेक्ट पी-एच.डी. में नामांकन पाने की वजह से मुझे जेएनयू के किसी भी अध्यापक की किसी कक्षा में बैठने का अवसर नहीं मिला, पर उन दिनों रोजाना ही किसी न किसी छात्रावास, या ढाबा, या छात्रावास के डाइनिंग हॉल या किसी स्कूल के संगोष्‍ठी-कक्ष में कोई न कोई संवाद होता ही रहता था; और उनमें इन ख्यातिलब्ध महान विद्वानों -- नामवर सिंह, रोमिला थापर, बिपन चन्द्र, योगेन्द्र सिंह, केदारनाथ सिंह, हरवंश मुखिया, मैनेजर पाण्डेय, प्रमोद तलगेरी, अनिल भट्टी, आनन्द कुमार के भाषण होते ही रहते थे। दुनिया भर से आए विशिष्‍ट विद्वानों के भाषण सुनने का अवसर भी अध्‍येताओं को मिलता रहता था। बिना किसी अतिरिक्‍त प्रयास के यहाँ के अध्‍येता अन्‍तरानुशासनिक अध्‍येता हो जाते थे। दुनिया भर के विषयों के संकेत पाकर उनके ज्ञान-चक्षु ऐसे खुलते थे कि उन्‍हें अपनी ज्ञानपिपासा तृप्‍त करने में अपना सारा समय झोंक देना ही मुनासिब लगता था।

अपना और अपने साधनविहीन परिवार की खर्ची जुटाने की जिम्मेदारी ने मुझे कुछ इस तरह से तोड़ रखा था कि मेरे जीवन का प्राथिमक उद्देश्‍य आर्थिक विपन्नता से जूझना था। नामवर जी के सम्‍मोहन और युवावस्‍था के जोश में डालटनगंज के कॉलेज की एडहॉक अध्‍यापकी छोड़कर आ तो गया था, पर भरण-पोषण की जुगाड़ में अध्यवसाय से ज्ञान-संवर्द्धन के लिए कम ही समय निकाल पाता था। मेरा अधिकांश समय अखबारी लेखन की तैयारी अथवा ट्यूशन पढ़ाने की आवाजाही में जाता था। समय मेरे पास बहुत कम हुआ करता था। पर एक बहुत बड़ी सम्पदा इस परिसर में मुझे उपलब्ध थी -- रात्रि-भोजन के बाद प्रो. नामवर सिंह और प्रो. मैनेजर पाण्डेय रोजाना जेएनयू की सड़कों पर टहलने निकलते थे। मैंने इनके समय और रास्‍ते को गौर कर लिया था। समय से खाना खाकर इनके रास्‍ते में कहीं खड़ा हो जाता था, इनके आते ही साथ हो लेता था। वे चलते रहते थे, मैं कोई अपनी जिज्ञासा रख देता था, टहलने के दौरान मैं उनका भाषण सुनता रहता था। इस तरह इनकी कक्षा में बैठे बिना मैंने इनकी शिक्षण-शैली का गहन अनुभव प्राप्‍त किया।

उन दिनों हमारे विश्‍वविद्यालय की अपनी बस भी हुआ करती थी, जो दिन में तीन बार पूरी दिल्ली के सभी सम्पन्न पुस्तकालयों के सामने जेएनयू के अध्‍येताओं को नि:शुल्‍क पहुँचा आती थी, फिर शाम को वापस ले आती थी। जेएनयू के सारे अध्येताओं को अनुकूल पुस्तकालयों में उपलब्ध पुस्तकों का लाभ लेने की सदस्यता आधिकारिक रूप से मिल जाया करती थी। 

दलगत और राजनीतिक मतभेद के बावजूद अकादमिक बहस में कभी किसी का वैयक्तिक मतभेद सामने नहीं आता था। यहाँ के अकादमिक वातावरण को इतना स्वस्थ, इतना पवित्र रखने में सभी का सहभाग होता था। यही कारण था कि देश के अत्यन्त पिछड़े क्षेत्र से आकर मुझ जैसे लोग भी, उन दिनों यहाँ अपनी वैचारिकता सुदृढ़ कर सके; ग्रामीण और सामाजिक उपेक्षाओं को पैरों तले रौंदकर, लगभग टूट रहे मनोबल को तन्‍दुरुस्‍ती से दृढ़कर अपनी मान्यता के साथ जीने का अवसर बना सके। वर्ना, हमें तो बताया जा रहा था कि हम जैसे अर्थ-विपन्‍न लोग सोचने के लायक भी नहीं हैं, हमें वह करना होगा जो हमें बताया जाएगा।

जेएनयू ने हमें अपनी धारणा, अपने विचार को प्रकट करने की सुविधा दी, अपनी हिल रही वैचारिकता और आत्मबल को दृढ़ करने का अवसर दिया। तिनके के मूल्य के व्यक्ति ने जब इतने बड़े-बड़े विद्वानों के बगल में खड़े होने, साथ बैठने और बहस करने का अवसर पाया, तो जीवन-दृष्टि में निखार आया। जेएनयू, वस्तुतः एक ही साथ जीवन-दृष्टि सुदृढ़ करने, और सुदृढ़ को और अधिक विकसित करने का अवसर देता है। 

अध्‍येताओं-अध्यापकों की समावेशी सामूहिकता यहाँ की अनूठी व्यवस्था की पहचान है। पूर्वज पीढ़ी के नीति-निर्माताओं द्वारा संरचित यहाँ की अध्यवसायी व्‍यवस्‍था ने ऐसी प्रविधि निर्मित कर दी थी कि स्‍वावलम्‍बन और जीवन-दर्शन के सारे ओर-छोर इसमें शामिल हो गए थे। मैं इस पद्धति के प्रति कृतज्ञ हूँ, आज मेरे जीवन में जो कुछ भी है, कम से कम निर्भीकता, अपनी बात रख पाने का साहस, अपनी मान्‍यताओं के जीने का आत्मबल,...सब कुछ जेएनयू के बूते ही है।

मैं आशा करता हूँ कि आनेवाली पीढ़ियों के अध्येताओं को जेएनयू यह प्रेरणा दे, कि वह किसी की जेब या जूते में बसनेवाला मनुष्‍य न बने। नई पीढ़ी सार्थक जीवन जीने की वृत्ति अपना ले तो इस राष्‍ट्र के उन्‍नत भाल को समुन्‍नत करने से कोई नहीं रोक सकता। शुभास्ते सन्‍तु पन्‍थान: ...।

कुछ दिनों बाद नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया के सम्पादकीय विभाग में एक रिक्ति आई। मैंने आवेदन कर दिया और फिर डालटनगंज चला गया। इसी बीच कावेरी छात्रावास के पते पर नेशनल बुक ट्रस्ट से लिखित परीक्षा में शामिल होने की सूचना आई। रमेशजी ने किसी तरह फोन-फान से मुझे सूचना पहुँचाई। उन दिनों आज जैसा त्वरित-सूचना-सम्पन्न जीवन नहीं था। मैं दिल्ली के लिए रवाना होने को ही था कि 6 दिसम्बर, 1992 मेरे भावी जीवन के सामने आ खड़ा हुआ। अयोध्या का आसमान चीरते हुए ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष और ‘एक धक्का और दो, बाबरी तोड़ दो’ के नारे ने मेरे जीवन की गति का ब्रैकेट बन्द कर दिया। प्रतिक्रिया में अगली सुबह पाकिस्तान से मन्दिर तोड़े जाने की घटनाएँ प्रसारित होने लगीं। वैश्विक राजनीति की सरगर्मी बढ़ गई। पूरा भारत सन्नाटे में डूबा था। आमजन किसी अगली अनहोनी की प्रतीक्षा में थे। जगह-जगह कर्फ्यू लग गए। रेल-यात्रा या तो स्थगित थी या असुरक्षित। राजनीतिक परिवेश की भिन्नता के कारण बिहार की स्थिति यद्यपि उत्तर प्रदेश से भिन्न थी, किन्तु यात्रा तो असम्भव थी। साधनविहीन शहर डालटनगंज की सीमा में मैं व्याकुल हुआ-सा कैद था।...

स्थिति शान्त हुई तो दिल्ली पहुँचा, परीक्षा की तिथि निकल चुकी थी, किन्तु अगले ही दिन नेशनल बुक ट्रस्ट से चिट्ठी आई। प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण परीक्षा के स्थगित होने और नई तिथि को परीक्षा होने की सूचना आई थी। मैं प्रसन्न हुआ। परीक्षा दी। दो सप्ताह के भीतर ही इण्टरव्यू के लिए बुलावा आया। न जाने क्यों, मुझे नामवरजी से तत्काल मिलने की प्रेरणा नहीं हुई। मेरे हॉस्टल के सामने ही मेरे शोध-निर्देशक कविश्रेष्ठ केदारनाथ सिंह रहते थे। उन्हीं की सिफारिश से सन् 1992 के विश्व पुस्तक मेले में मैंने सौ रुपए प्रति दिन के हिसाब से मेला-गाइड का काम किया था, और एक हजार रुपए कमाए थे। उन दिनों एक हजार रुपए बहुत होते थे, लगभग साढ़े तीन महीनों का मेस बिल!...मेरे मन में बसा था कि गुरुजी की सिफारिश को नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक टाल तो सकेंगे नहीं!

किन्तु गुरुजी (केदारनाथ सिंहजी) ने छूटते ही मना कर दिया। स्पष्ट कहा कि मैं तुम्हारे लिए पैरवी नहीं कर सकता, आज ही इस पद के लिए मैं किसी और की पैरवी कर चुका हूँ। पर चिन्ता मत करो। चयन तुम्हारा ही होगा! इसे मेरा आशीर्वाद समझो। उस महान शख्सीयत की स्पष्टवादिता को दण्डवत, किन्तु उनकी पहेली समझ नहीं आई – मैं किसी और की पैरवी कर चुका हूँ। पर चयन तुम्हारा ही होगा!’...आशंकित मन से इण्टरव्यू दे आया। दो सप्ताह के भीतर ही नियुक्ति-पत्र मिला। केदारजी के भविष्यवाणी की पहेली मुझे अभी समझ नहीं आई थी। पर उन्हें जाकर सूचना दी। उन्होंने तब भी पहेली नहीं सुलझाई। पहेली सुलझी नामवरजी से मिलने के बाद।

वे अब जे.एन.यू. कैम्पस छोड़कर अपने निजी आवास 32, शिवालिक अपार्टमेण्ट, कालकाजी, नई दिल्ली में रहने लगे थे। मैं मिठाई लेकर गुरुवर से मिलने गया। उन्हें सूचना दी। प्रफुल्ल मुस्कान के साथ उन्होंने कहा -- मुझे आपके इण्टरव्यू के दिन ही सूचना मिल गई थी। अरविन्द (नेशनल बुक ट्रस्ट के तत्कालीन निदेशक) का फोन आया था। वे बता रहे थे कि किसी लिखित परीक्षा में जे.एन.यू. का इस नाम का लड़का अव्वल आया है, इसकी बहाली नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए कैसी रहेगी? ... कोई लिखित परीक्षा हुई थी क्या?

मैंने हामी भरी। उन्होंने डब्बे से एक मिठाई उठाकर मेरे मुँह में डालते हुए कहा -- मैंने आपकी तारीफ की है। उस तारीफ की लाज रखिएगा। अब तनिक राहत मिली। धैर्य रखिए, आगे कुछ बेहतर ही होगा...!

तनिक ठहरकर फिर बोले -- इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि यह नौकरी आपको पैरवी से मिली है। अपने हिसाब से अरविन्द ने आपका चयन कर रखा था, मुझसे उन्होंने केवल आपके आचरण के बारे में पूछा।...

यहाँ आकर बात साफ हुई कि केदारजी को या तो नामवरजी ने सूचना दी होगी, या जब उन्होंने किसी की पैरवी के लिए अरविन्दजी को फोन किया होगा, उन्हें संकेत मिल गया होगा। पर नौकरी ज्वाइन करने से पहले ही गुरुवर की ‘तारीफ की लाज’ वाली पंक्ति ने मुझे कड़े अनुशासन में बाँध दिया। आगे के चार वर्षों के श्री अरविन्द कुमार के कार्यकाल में मैं नौकरी के शिष्टाचार से कहीं अधिक, गुरुवर की आज्ञा से बँधा रहा।

जरूरत के कारण नेशनल बुक ट्रस्ट की नौकरी किए जा रहा था। यद्यपि अपने किसी दायित्व में अन्यमनस्क नहीं रहा, किसी जिम्मेदारी से मुँह नहीं चुराया, किन्तु वहाँ का बेढब परिवेश रास नहीं आता था। सदैव शिक्षण पेशे में भागने को बेताब रहता था। सन् 1996 में बिहार में व्याख्याता पद के लिए इण्टरव्यू देने गया। नामवरजी उसमें विशेषज्ञ थे। मैं आशावान भी था, क्योंकि उनकी अनुशंसा को पारकर कोई चयन समिति निर्णय ले ले, यह तो असम्भव था। उनके व्यक्तित्व की ऐसी आभा थी कि वे जहाँ होते थे, वे ही होते थे। उनके समक्ष उनकी अनुशंसा को नकारने की हिम्मत उनके विरोधियों की भी नहीं होती थी।

किन्तु इण्टरव्यू में उन्होंने मुझे अत्यन्त हतोत्साह किया। पूरी समिति को उन्होंने खुद स्पष्ट किया कि वे मुझे अच्छी तरह जानते हैं। बाद में दिल्ली आने पर मिलने गया तो उन्होंने बड़ी फजीहत की। कहा कि ‘प्रतीक्षा-सूची में आपका नाम ऐसी जगह है कि दस लोग ज्वाइन न भी करें, तो भी आपकी बारी न आए।’...अब तक उनसे मेरे रिश्ते ऐसे हो चुके थे कि उनकी ऐसी पंक्ति भी चौंकाती नहीं थी, तर्क की ओर धकेलती थी।

मैंने पूछा -- कारण सर?

उन्होंने कहा -- हो जाता, तो जिस तरह बिना कुछ सोचे-विचारे इण्टरव्यू देने चले गए, ज्वाइन भी कर लेते! बिहार के विश्वविद्यालयों में जाकर शहीद होने को तैयार हैं, तो नेशनल बुक ट्रस्ट क्या बुरा है? कुछ पता है वहाँ के बारे में? किसी कार्यरत अध्यापक से पता किया है? आधी-पौनी घिसी-घिसाई तनख्वाह पाकर लोग वहाँ अध्यापकी किए जा रहे हैं, आप क्या करेंगे? यहाँ तनख्वाह तो हर महीने मिलती है? भाषा, साहित्य और संस्कृति के हित में अपने मन का सोचा चार काम कर तो लेते हैं? काम करने की गुंजाईश तलाशते चारेक लोग आपके सहयोग से एन.बी.टी. में कुछ अवसर तो पा जाते हैं? बिहार की अध्यापकी में घिसी-पिटी लकीर के अलावा नया क्या करेंगे?...

मैं दुःखी-सा वापस आ गया। सम्भवतः वे खुद से जुड़े हर व्यक्ति में अपने उस काव्य-नायक की तलाश करते थे, जिसके लिए उन्होंने लिखा था—

कोसेगा तुम को अतीत, कोसेगा भावी

वर्तमान के मेधा! बड़े भाग से तुम को

मानव-जय का अन्तिम युद्ध मिला है चमको

ओ सहस्र जन-पद-निर्मित चिर-पथ के दावी! ...

पर मुझ जैसे व्यक्ति में इतनी प्रमा कहाँ कि इतना ऊँचा सोच पाऊँ!

बड़ा सोचना, बड़ा करना, कम बोलना, सार्थक बोलना...उनके जीवन का विधान था। उस विधान का अनुप्रयोग अपने हरेक उद्यम में किया करते थे। उनके इस नवोन्मेषी दृष्टि का संकेत कोई ढूँढना चाहें, तो पाठ्यक्रम-निर्माण की उनकी चिन्तन पद्धति और  अध्यापन-विज्ञान (पेडागोजी) विकसित करने की विलक्षण शैली में ढूँढ सकते हैं। शिक्षा के बुनियादी आयामों पर विचार करने की उनकी जिद के कई किस्से मैं, प्रो. मैनेजर पाण्डेय से सुन चुका हूँ। जे.एन.यू. में अपनी बहाली की कथा में भी नामवरजी की जिद की कथा पाण्डेयजी मुक्त कण्ठ से सुनाते थे। दुनिया भर के हिन्दी-शिक्षण में, भारतीय भाषा केन्द्र, जे.एन.यू. के पाठ्यक्रम की जैसी प्रतिष्ठा है, वह नामवरजी के नवोन्मेषी अध्यापन-विज्ञान की ही परिणति है। यहाँ उन्होंने न केवल ऐसा विलक्षण पाठ्यक्रम बनाया, बल्कि उसके अध्यापन के लिए देश भर से चुन-चुनकर वैसे अध्यापकों की नियुक्ति भी करवाई। भारतीय भाषा केन्द्र, जे.एन.यू. में केदारनाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय जैसे विशिष्ट अध्यापकों की नियुक्ति उसी का परिणाम है। इसके अलावा वे जिस किसी शैक्षिक संस्थान की पाठ्यक्रम निर्माण समिति में रहे, वहाँ भी उन्होंने अपनी वही दृष्टि लागू करवाई। हिन्दी के अध्यवसायी आज अपनी कमीज का कॉलर खींचकर यूँ ही नहीं कहते कि हम उस हिन्दी भाषा में पढ़ने-लिखने या काम करनेवाले हैं, जिसमें नामवर सिंह ने साहित्य-साधना की।

वैसे तो उनका पूरा जीवन ही संघर्षशील नायक का जीवन था, पर हिन्दी अध्यापन का पाठ्यक्रम बनाने में उन्होंने जो संघर्ष किया, उसकी कथा भी प्रो. मैनेजर पाण्डेय से कई बार सुन रखी है; भारतीय भाषा केन्द्र में उनके द्वारा लागू कराया गया पाठ्यक्रम उसी का नमूना था।

साहित्यालोचन में समाजशास्त्रीय चिन्तन और वैश्विक चेतना की सम्पुष्टि से समालोचना लिखने की पद्धति लागू कराकर उसे प्रतिष्ठा दिलानेवाली दृष्टि उन्हीं की है। जेएनयू में साहित्यिक समालोचना में समाजशास्त्रीय अध्ययन की शुरुआत उनकी इसी पद्धति से विकसित हुई। मैनेजर पांडेय की प्रसिद्ध पुस्तक ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ में इस धारा के विकास की बात देखी जा सकती है, जो उन्होंने नामवर सिंह को इस विशेषण से समर्पित की कि ‘उन्होंने ही हिन्दी समालोचना में समाजशास्त्रीय अध्ययन की नींव रखी’। आगे के दिनों में समाजशास्त्रीय समालोचना की यह परम्परा पूरे देश की सभी भाषाओं में विकसित हुई।

लोगों को अत्युक्ति लगे, तो लगता रहे; पर सच यही है कि भारतीय साहित्य-चिन्तन में उनके विराट छवि-वैभव के लिए कोई सटीक विशेषण कोशों में आज भी आसानी से नहीं मिलता! वे वस्तुतः गुरुत्व की गरिमा के गुरु थे। वैचारिक संवर्द्धन के नन्‍दन-कानन, जेएनयू आने से पहले भी उन्होंने, हिन्दी अध्ययन-अध्यापन की जिस नवोन्मेषी शैली का बीजरोपण अनेक अकादेमिक संस्थानों में किया, वहाँ वह आज भी क्षितिजगामी तर्जनी की तरह ऊर्ध्व है; जेएनयू में तो है ही। वे भारतीय भाषाओं एवं पराम्पराओं के आधुनिक चिन्तक थे। उनकी चिन्तन-शृंखला में न तो लापरवाह आधुनिकता के मृगमरीचिका की ललक है, न ही रूढ़ि-पोषण के लिए कोई जगह। तर्क-विवेक से सम्पुष्ट वैचारिकता ने ही उनके सोच को सामाजिक और  मानवीय बनाए रखा। वे सांस्कृतिक समन्वय के कृती विद्वान थे, नीति-मूल्य और जीवन-मूल्य की वस्तुनिष्ठता के रक्षक थे, मनुष्यता उनकी चिन्तन-दृष्टि की परम-चरम पहचान थी...।

युवा पीढ़ी के भावी जीवन की उन्नति और किसी भी अनिष्ट से उनके बचाव की चिन्ता उनके हृदय के कण-कण में व्याप्त रहती थी। अपनी अवमानना सहकर भी वे युवाओं की उद्दण्डता-उग्रता-कृतघ्नता को परोक्ष कर देते थे।...शोधार्थी के रूप में जेएनयू में दाखिल होते ही मुझे मालूम हुआ कि कुछ बरस पूर्व, प्रायः सन् 1979 में, वामपन्थी शिक्षार्थियों की एक टोली (जिसमें एक वे शिक्षार्थी भी थे, जो वर्षों से स्वयं को नामवरजी का सर्वाधिक प्रिय और अनुरक्त बताने का ढोल पीटते आ रहे हैं, अभी भी पीटे जा रहे हैं) अपने किसी सहपाठी की अवांछित और अवैधानिक लालसा पूरी न होने के कारण, उनके कक्ष में जाकर अभद्र भाषा का उपयोग करते हुए उनकी फजीहत कर आए।

जेएनयू प्रशासन में यह बात आग की तरह फैल गई। घटना की जानकारी प्रो. मूनिस रज़ा के कानों तक पहुँची। रज़ा साहब सन् 1969 में जेएनयू की स्थापना के समय, प्रथम कुलपति प्रो. गोपालस्वामी पार्थसारथी के साथ इस विश्वविद्यालय के सह-संस्थापक थे, जेएनयू के संस्थापक रेक्टर थे। इस विश्वविद्यालय की रूपरेखा, शैक्षणिक संरचना, नए परिसर की संरचना, छात्रावासों के नामकरण एवं अन्य व्यवस्थाओं के स्थापत्य का श्रेय उन्हीं की उदार, पारदर्शी और लोकतान्त्रिक चेतना को दिया जाता है। उन्होंने कई वर्षों तक रेक्टर पद पर रहकर विश्वविद्यालय का प्रशासन सँभाला, जेएनयू के 'सेण्टर फॉर द स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेण्ट' के संस्थापक और पहले अध्यक्ष वे ही थे। बाद में सन् 1985–1990 तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति भी हुए। वे नामवर जी का सम्मान पूज्य-भाव से करते थे। इस घटना की सूचना से वे अत्यन्त कुपित हो उठे।...

नामवर जी के लाख कहने पर भी कि ‘उन्हें छात्रों के विरुद्ध कोई अकादेमिक दण्ड-प्रक्रिया मंजूर नहीं है’, रज़ा साहब ने जाँच कमिटी बैठा दी, और नामवर जी को बैठाकर सभी छात्रों का परेड करा दिया; पर नामवर जी ने किसी को पहचानने तक से इनकार कर दिया। साफ कहा कि मैं किसी को पहचान नहीं पा रहा हूँ।

सारे छात्र, किसी भी प्रकार के दण्ड से मुक्त हो गए।...वस्तुतः नामवर जी जानते थे कि छात्रों की पहचान कर देने से, रज़ा साहब उन्हें कहीं ऐसे दण्ड न दे दें, जिससे उसका भावी जीवन बर्वाद हो जाए।…‘ऐसो को उदार जग माही!’ गुरुवर! आपकी उदारता को साष्टांग प्रणति!...

अब, इतने बड़े नामवर सिंह का छवि-वैभव, सम्पूर्णता में, किसी एक विशेषण में कैसे समाए? ले-देकर भारतीय साहित्य एवं संस्कृति के शिखर पुरुष या सदी के महानायक कहकर सन्तोष करते हैं। उनके आलोचनात्मक दृष्टिकोण से हिन्दी समालोचना का गौरव शिखरोन्मुख और शिखरस्थ हुआ।

सामाजिक सरोकार, इतिहासबोध एवं रचनात्मक वस्तुनिष्ठता के आन्तरिक सौन्दर्य का अनूठा समन्वय उनकी आलोचना पद्धति में है। उनकी आलोचना-दृष्टि में रचना को मान्य या निरस्त करने का भाव कहीं नहीं रहता, दलगत वैचारिकता के आवेश या आवेग का आरोपण नहीं रहता; रचना की तह में उतरकर उसका आन्तरिक अर्थ-सौन्दर्य ढूँढने की चेष्टा रहती है, इसी चेष्टा में उन्होंने कृत्यालोचन के लिए समाजशास्त्रीय दृष्टि का उपयोग किया, साहित्य और समाज की बहुस्तरीय पारस्परिकता की शिनाख़्त की।

विदित हो कि रचना या आलोचना जिस भाषा में लिखी जाती है, उसका उद्गम-स्थल समाज होता है और साहित्य-सृजन के हरेक कथ्य का उद्गम-स्थल भी समाज ही होता है; समाज का सामुदायिक जीवन जितना संघर्षशील, क्रियाशील और घटनाबहुल होगा; भाषा और साहित्य के सृजन-स्रोत के रूप में वह उतना ही उर्वर होगा, वह भाषा और वहाँ का साहित्य उतना ही ताकतवर होगा। स्पष्टतः सामुदायिक जीवन की उन क्रियाओं, संघर्षों, घटनाओं, घटना की परिणतियों और जनजीवन पर पड़े उसके प्रभावों का संज्ञान लिए बिना, सही साहित्यालोचन असम्भव होगा। अपनी सूक्ष्म अध्यवसायी-वृत्ति के कारण इस बात की समझ नामवर सिंह ने अपने छात्र-जीवन में ही विकसित कर ली थी; जिसकी अनुगूँज उनके दोनों प्रबन्ध -- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए. करते समय सन् 1951 में हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग शीर्षक से लिखे गए लघु शोध-प्रबन्ध तथा पी-एच.डी. उपाधि के लिए सन् 1956 में ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ शीर्षक से लिखे गए शोध-प्रबन्ध में दिखाई देती है; जो बाद के दिनों में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। इसी रास्ते विकसित हुई उनकी आलोचना-पद्धति मनुष्यता की पक्षधर हुई, कभी उनकी आलोचना में राजनीतिक जड़ता नहीं आई।

नागरिक दायित्व और मनुष्यता की पक्षधरता उनकी उत्थानकालीन रचनात्मकता की एक कविता में देखी जा सकती है –

बुरा जमाना, बुरा जमाना, बुरा जमाना

लेकिन मुझे जमाने से कुछ भी तो शिकवा

नहीं, नहीं है दुख कि क्यों हुआ मेरा आना

ऐसे युग में जिसमें ऐसी ही बही हवा

गन्ध हो गई मानव की मानव को दुस्सह।

शिकवा मुझ को है जरूर लेकिन वह तुम से

तुम से जो मनुष्य होकर भी गुम-सुम से

पड़े कोसते हो बस अपने युग को रह-रह

कोसेगा तुम को अतीत, कोसेगा भावी

वर्तमान के मेधा ! बड़े भाग से तुम को

मानव-जय का अन्तिम युद्ध मिला है चमको

ओ सहस्र जन-पद-निर्मित चिर-पथ के दावी !

तोड़ अद्रि का वक्ष क्षुद्र तृण ने ललकारा

बद्ध गर्भ के अर्भक ने है तुम्हें पुकारा।

इस कविता की रचना प्रायः स्वाधीनता-संग्राम के दौरान हुई होगी; अर्थात्, ‘द्वितीय विश्व-युद्ध’, ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ और भारतीय स्वाधीनता की घोषणा के दौरान। स्पष्टतः उनकी यह रचना, कविता होकर भी सामुदायिक जीवन-वृत्तियों की आलोचना है, जिसमें मनुष्य को कर्तव्योन्मुख होने की ललकार व्यक्त हुई है।

स्वातन्त्र्योत्तर काल में स्थापित भारतीय लोकतन्त्र की मनुष्यता विरोधी शासकीय नीति देखकर वे प्रायः स्पष्ट कर चुके थे कि शोध, साहित्यालोचन एवं अध्यापन की प्रखर दृष्टि ही हमारे समाज की लोकतान्त्रिक चेतना दुरुस्त कर सकेगी! इसीलिए इन क्षेत्रों में नई दृष्टि का उन्मोचन किया। साहित्यालोचन की भाषा को लोकोन्मुख किया। भारतीय मनीषा में दुरूह होती जा रही आलोचनात्मक संरचना को सहज और सम्प्रेषणीय बनाया। ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ (1951) और ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ (1956) जैसे उनके शोध ग्रन्थ तब लिखे गए, जब ऐसे विषयों की ओर लोग झाँकते तक नहीं थे। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से तैयार उनके आलोचनात्मक उपस्कर से न केवल हिन्दी, बल्कि तमाम भारतीय भाषाओं के आलोचकों को नवोन्मेषी प्रेरणा मिली। हमारा आलोचना साहित्य कितनी भी प्रगति कर ले, पर मानना पड़ेगा कि हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं का समालोचना-साहित्य, विगत साढ़े सात दशकों से उन्हीं की बनाई आलोचना-दृष्टि की आभा से आलोकित और अद्यतन होता रहा है, आनेवाली पीढ़ियाँ प्रायः उसी उत्प्रेरण से अपना आलोचनात्मक विवेक समुन्नत करेंगी।

उल्लेख सुसंगत होगा कि उनकी अन्त्येष्टि से वापस आने के बाद, भारतीय भाषा केन्द्र, जेएनयू के शिक्षार्थियों को उत्प्रेरित कर जब उनकी शोक-सभा आयोजित की थी, तो कन्नड़ के प्रो. पुरुषोत्तम बिलिमले ने सूचना दी कि दस मिनट पहले मैंने अपने फेसबुक पर यह दुखद सूचना डाली, और कन्नड़ के चार सौ विद्वानों ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।...

आज नामवरजी अपने पार्थिव शरीर से बेशक हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके आलोचनात्मक सूत्र हमारे साथ हैं। वे ‘हिन्दी आलोचना की वाचिक परम्परा के आचार्य’ कहे जाते रहे हैं। विगत तीन दशकों से कुछ लोग ऐसा व्यंग्य में भी कहते पाए गए हैं। इन दशकों में उनकी स्थापनाओं की भ्रामक व्याख्या कर-करके भी लोग खुद को स्थापित करने की असफल चेष्टा करते रहे हैं।

शुरू-शुरू में स्वयं को उनका चरण-रज घोषित कर, अपना महत्त्व साबित करने में तल्लीन लोग, उनसे वांछित फल नहीं पाने पर उन्हें रजकण कहते हुए भी पाए गए हैं। इतनी लम्बी साहित्य-सेवा और अध्यापकीय जीवन पार करने में उनके कई ऐसे शिष्य भी दिखे हैं, जो भस्मासुर की उपाधि के काबिल हैं। अरदास और गुहार लगाने के बावजूद अपनी अज्ञता के कारण खाली हाथ वापस होते हुए लोग बेमतलब उनके निन्दक होते गए हैं। इस प्रसंग में एक दिन मैंने काशीनाथ सिंहजी से कहा -- गुरु के रूप में आप बड़े भाग्यशाली हैं। आप जैसे भाग्यशाली मेरे गुरुजी (नामवरजी) नहीं हो पाए। उन्होंने तत्काल प्रतिकार किया -- ऐसा आप नहीं कह सकते। भैया, भैया हैं, उनकी बराबरी मैं कहाँ से करूँगा?...

मैंने कहा -- आपके दो ऐसे शिष्यों से मेरी मित्रता है (होंगे तो और भी), जो तथ्यतः आपका नाखून बचाने के लिए अपनी जान दे सकते हैं। पर नामवरजी के अधिकांश शिष्य अपना नाखून बचाने के लिए उनकी इज्जत नीलाम कर सकते हैं। स्वार्थ सध जाने के बाद अक्सर उनके शिष्य उनकी छाती पर मूँग दलते दिखे हैं।...काशीजी ने मेरा समर्थन तो नहीं किया, पर विरोध भी नहीं किया। विवेकसम्मत अर्थ लगाने को लोग स्वतन्त्र हैं।

नामवरजी की किशोरावस्था स्वाधीनता संग्राम के सिपाहियों के करतब देखते-सुनते बीती। जवान होते ही उन्होंने देश की आजादी देखी, विभाजन देखा। आजाद भारत की शासकीय व्यवस्था में मौजूद जनविरोधी वातावरण से क्षुब्ध होते हुए भी वे समाज में शिक्षा एवं साहित्य की मर्यादा के प्रति चिन्तित रहते थे। साहित्य-चिन्तन और अध्यापन के क्षेत्र में अपनी दीर्घ-सेवा देकर अब वे जैसी सामाज-व्यवस्था तक आ गए थे, उसमें उनका वीतराग हो जाना ही श्रेयस्कर ही था।

विगत पाँच दशकों की भारतीय राजनीति ने कुछ ऐसी सभ्यता विकसित कर दी, जहाँ निष्ठा की कोई जगह बची नहीं रह गई। सारा कुछ मुनाफे की गणना से परिभाषित होने लगा। शिक्षा और साहित्य भी।

छठी और सातवीं लोकसभा चुनाव (सन् 1977 और 1980) की परिणतियों और विचित्रताओं ने भारतीय नागरिकों को तरह-बेतरह भरमाया था। तब से लेकर अब तक वैसे शिक्षित नौजवानों की संख्या लगातार बढ़ी, जिनकी सारी नैतिकता उनकी क्षुद्र लिप्सा से परिभाषित और अभिकलित होने लगी। जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर जिस सम्पूर्ण क्रान्ति का बिगूल फूँका गया, उसके परिणामस्वरूप कांग्रेस पार्टी की गद्दी तो छिनी, पर नवगठित शासकीय व्यवस्था देखकर, भारतीय नौजवानों की क्रान्ति करने की हिम्मत टूट गई। वे सदैव पिछले दरवाजे की तलाश में रहने लगे। राजनीतिक विसंगतियों से फैले इस वातावरण ने पीढ़ियों की भाषिक समझ छीनकर, उन्हें चतुराई सिखाई।

दुर्योगवश नामवरजी के कथित शिष्यों ने उसका भरपूर प्रयोग उन्हीं पर किया। गरज यह नहीं कि नामवरजी को मनुष्य की पहचान नहीं थी, वे चतुर लोगों की कृतघ्न-वृत्ति से अवगत नहीं थे, वे सब जानते थे। पर उनकी तो पद्धति ही मिर्ज़ा ग़ालिब की पंक्ति में निबद्ध थी कि -- दे के ख़त मुँह देखता है नामाबर/कुछ तो पैगाम-ए-जबानी और है (आशिक को महबूबा का ख़त देकर भी डाकिया वहीं खड़ा आशिक का मुँह देखता रहा, आशिक के चेहरे का हाव-भाव पढ़ता रहा। प्रायः महबूबा ने कुछ मुँहजुबानी भी कोई सन्देश दिया हो, जिसे कहने से वह झिझक रहा हो!)। नामवर सिंह ऐसे कृतघ्नों से वही सन्देश सुनने का इन्तजार करते रहे, जो उनके शिष्यों ने उन्हें बेच-बेचकर प्राप्त किया।

उनकी स्मृति सभा में श्री अशोक वाजपेयी ने सही कहा कि नामवरजी ने अपनी वाचिक वाग्मिता से आलोचना के क्षेत्र में वही किया जो कभी भक्त कवियों ने भक्तिधारा के विकास के लिए किया। उनकी आलोचना-दृष्टि ने साठोत्तरी पीढ़ियों को साहस दिया कि वे बड़े-बड़े नामवरों से सवाल करें, नया और मौलिक सोचें। अध्यापन को शिक्षादान के बैरक से निकालकर तर्क और बहस की गरिमा उन्होंने ही दिलाई। उन्होंने सदैव वैचारिक मतभिन्नता को वैयक्तिक सम्बन्ध से अलग रखा।

उनके सान्निध्य के लगभग तीन दशकों को एक संस्मरणात्मक आलेख में समेटना असम्भव है। मेरे जैसे असंख्य लोग उनके सम्पर्क में आए, अपनी-अपनी तरह के अनुभव सबने जुटाए। कई लोग महान (?) और महत्तम (?) भी हुए। पर मई 22, 1991 को हुई उनसे पहली भेंट ने मेरे जीवन को एक दिशा दी। इस पूरे दौर में कई बार उनसे दुखी भी हुआ और प्रफुल्ल भी। उनके पिछले जन्म-दिवस (जुलाई 28, 2018) पर मैं और रामबक्षजी सपरिवार उनसे मिलने गए थे। उनका पैर छूकर मैं सामने खड़ा उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगा। उन्होंने अपनी दाईं तरफ तलहत्थी थपथपाकर मुझे बैठ जाने का इशारा किया। प्रो. रामबक्ष वहीं थे। हम सभी योजना बनाकर उनका जन्मदिन मनाने गए थे। रामबक्षजी को उन्होंने अपनी बाईं ओर बिठाया। मेरी पत्नी प्रतिमाजी उनके लिए चीनी मिलाए बिना, मखाने की खीर बनाकर ले गई थीं। मेरे परिवार में डॉ. योगेश और श्री धर्मराज कुमार भी शामिल थे। प्रतिमाजी, खीर का डब्बा श्रीमती कल्पना (नामवर जी की सन्तानवत् परिचारिका) को रेफ्रिजरेटर में रखने के लिए दे आईं। नामवरजी ने यह देख लिया। उन्होंने इशारे से उन्हें नजदीक बुलाया और पूछा -- क्या लाई हो इसमें? प्रतिमाजी सकपका गईं। गुरु जी ने मेरी ओर नज़र फेरी -- तुम बोलो! 

 


उस दिन उन्होंने पहली बार मुझे ‘तुम’ सम्बोधन दिया था। नामवरजी के मुँह से ऐसे पुकार के लिए तरस गया था मैं! मैंने कहा--इसमें मखाने की खीर है!

- अच्छा! तालमखाना! बाबा नागार्जुन!

- जी!

- खिलाओ। डब्बा खोलकर, प्रतिमाजी उन्हें खीर खिलाने लगीं। खीर खाना रोककर उन्होंने मुझसे पूछा -- तुम्हें याद है, मुक्तिबोध ने अपनी कविता में कहा है--अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया?...

मैंने कहा -- जी, आप तो अपने कई भाषणों में इसका जिक्र करते रहे हैं।...

उन्होंने आगे जोड़ा -- मैंने अब तक यही किया, जीवन यही जिया! तुमलोगों का यही स्नेह मेरे जीवन की कमाई है...

इसी बीच सामने से योगेश को फोटो खींचते देखकर उन्होंने रोका। फोटो खिंचवाते समय वे बड़े सजग रहते थे।...

योगेश थम गए।

गुरुवर दीवान पर बैठे-बैठे दो इंच पीछे खिसके, फिर दायाँ हाथ मेरे कन्धे पर और बायाँ हाथ रामबक्ष जी के कन्धे पर रखा, फिर योगेश को स्वस्ति दी--हाँ, अब खींचो!

फोटो खींचा गया। बानबे वर्ष की आयु पूरी कर रहे गुरुवर को उस दिन बच्चों की तरह प्रसन्न देखकर बड़ा आनन्द आ रहा था। अचानक से आठ बरस पहले की उनकी एक जिज्ञासा याद आई।

दिसम्बर 25, 2011 को मेरे पिता का देहान्त हुआ था। इसकी खबर उन्हें मिली, सान्त्वना देने के लिए उन्होंने फोन किया और पूछा--कितनी उमर थी?

मैंने कहा -- पचासी वर्ष!

बोले -- अच्छा, तब तो मेरी ही उमर के थे!

मैंने कहा -- जी! आपसे छह महीने बड़े थे।

मेरे जीवन के इतने वांछनीय दिग्दर्शक के न रहने की पहली सूचना जब फरवरी 19, 2019 की मध्य रात्रि में फोन पर मिली, तो मैं हिल गया। क्योंकि नवम्बर 2018 से ही उन्हें देखने जाने की मेरी योजना बेशुमार कारणों से टल रही थी, और मध्य जनवरी 2019 में जब वे चोट खाकर अस्पताल में भर्ती हुए तब भी उन्हें देख नहीं पाया। उनकी पुत्री डॉ. समीक्षा ने बताया कि उनकी यादाश्त जाँचने के लिए डॉक्टर ने उनसे नाम पूछा तो बड़े टोप-टहंकार से बोले -- नामवर सिंह!



अपने मुँह से अपने जीवनकाल में उन्होंने इसी शब्द का अन्तिम उच्चारण किया था!

वस्तुतः उस मुँह से इसी नाम का अन्तिम उच्चारण होना भी चाहिए था, क्योंकि विगत एक सदी में इससे बड़ा नाम हुआ भी कहाँ? अपने विचार-सिन्धु की भव्यता के साथ शिष्यों के मन-मस्तिष्क में अनुगूँजित गुरु-स्मृति को कोटिशः नमन!!!

 

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