Saturday, May 30, 2026

हँसुआ के बि‍याह में खुरपा का गीत A Trowel's Song at the Sickle's Wedding



 

हँसुआ के बि‍याह में खुरपा का गीत

A Trowel's Song at the Sickle's Wedding

लगभग आधी सदी से रामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी (सन् 1899-1968) द्वारा सम्पादित-संकलित, विद्यापति के 266 पदों के संग्रह की तूती बज रही है। इसके प्रायः दो कारण हैं--पहला यह कि मोटे-मोटे संकलनों को देखकर, उसमें पाठभेद की जटिलता देखकर, घबराए हुए पाठक-समूह; तुलनात्मक रूप से इतने छोटे संग्रह देखकर प्रसन्न हो जाते हैं; दस फरमे की इस किताब में पूरे विद्यापति का सुख पाने का भ्रम पाल लेते हैं। जिस समाज को चुल्लू भर गंगाजल चारो ओर छींटकर गंगासागर नहा लेने का फलबोध हो जाता हो, तत्त्वबोध की लालसा से परांग्मुख ऐसे समाज मोटे-मोटे ग्रन्थ क्यों ढोएँ?...दूसरा कारण यह कि इस संकलन के नेपथ्य के एकाध सच लोगों तक पहुँच नहीं पाए।

वस्तुतः इस संकलन के अधिकांश पदों की रूपगत प्रामाणिकता इसके आधारग्रन्थ में संकलित पदों के गोरखधन्धे की शिकार है। यह संकलन गुप्त-पदावली के आधार पर तैयार किया गया है। संस्करण में सहायक स्रोतों के प्रति आभार प्रकट करते हुए बेनीपुरी ने स्वयं स्वीकारा कि पदों के संकलन में उन्हें नगेन्द्रनाथ गुप्त द्वारा सम्पादित और जस्टिस शारदाचरण मित्र द्वारा प्रकाशित बंगला विद्यापतिर पदावलीसे अधिक सहायता मिली। यहाँ कुछ भ्रान्ति दिख रही है। वस्तुतः विद्यापति ठाकुरेर पदावलीशीर्षक से गुप्त द्वारा सम्पादित संकलन सन् 1910 में प्रकाशित हुआ और मित्र-मजुमदार सम्पादित संस्करण विद्यापतिर पदावली शीर्षक से सन् 1953 में प्रकाशित हुआ। सम्भवतः धन्यवाद ज्ञापन के समय बेनीपुरी से भूल (स्लिप ऑफ पेन) हुई अथवा छापे की भूल हुई; वे प्रायः विद्यापति ठाकुरेर पदावली ही कहना चाह रहे होंगे, पर देखा होगा विद्यापतिर पदावली भी, इसलिए अनवधानता में विद्यापतिर पदावली लिख गया होगा!

अपने संकलन की भूमिका में बेनीपुर ने किसी प्रामाणिक स्रोत से संकलित पदों के शोधित होने का, यत्किंचित प्रामाणिक पाण्डुलिपि से तुलित होने का कोई संकेत नहीं दिया है। जहाँ-तहाँ बिखरे विद्यापति के पदों को संगठित कर लोगों के समक्ष लाने के अनूठे यत्न के लिए निस्सन्देह विद्यापति प्रेमियों की दृष्टि में नगेन्द्रनाथ गुप्त वरेण्य हैं। किन्तु पदों के साथ मनमानी करने, कवि लोचन द्वारा व्यवस्थित संकलन रागतरंगिणी के पद तक को भी विरूपित करने का काम भी उन्होंने ने ही किया; क्यों किया, वही जानते होंगे!...ऐसे अप्रामाणिक स्रोत से संकलित होने के कारण पदों में अप्रामाणिकता रह जाना कोई बड़ी बात नहीं है। पाठभेद का परीक्षण करते हुए यह तथ्य भी सामने आता है कि अधिकांश पाठभेद  शब्दों  के   हिज्जे   और  कुछ  शब्दों  के  स्थानापन्न भिन्न भिन्न शब्द दिखते  हैं। ऐस पाठभेद पर विचार करते हुए भाषावैज्ञानिक दृष्टि से जो भी भिन्नता होपर  विद्यापति के  पद  के तत्त्वबोध में कोई खास दुविधा नहीं  रहती। पर नगेन्द्रनाथ गुप्त ने तो संकलित अनेक पदों की पंक्तियाँ और विरुद्, भणिता तक बदल दी है। इसलिए इन्हें स्रोत मानना अनिवार्य भी था, परीक्षणीय भी।

संकलन की भूमिका में विद्यापति का परिचय लिखते समय मैथिल कोकिल विद्यापति’, ‘हिस्ट्री ऑफ तिरहुत’, ‘मैथिली-दर्पण से मिली सहायता के लिए बेनीपुरी ने इनके लेखकों के प्रति आभार व्यक्त किया। छोटी-सी संस्तुति लिखने के लिए अयोध्यासिंह उपाध्याय (सन् 1865-1947) के प्रति भी आभार व्यक्त किया है; शिवपूजनसहाय, जनार्दन झा आदि को भी सहयोग के लिए धन्यवाद दिया, पर जिस कुमार गंगानन्द सिंह (सन् 1898-1971) ने प्रकाशक के आग्रह पर छपने से पूर्व पाण्डुलिपि के कुछ विकारों की ओर इशारा किया, उनका उल्लेख तक नहीं किया। सम्भवतः समवयस्की होने अथवा त्रुटि बताने के कारण किंचित क्रोध आने के कारण ऐसी परांग्मुखता आई हो, मन में कोई सम्मान-भाव न उपजा हो! प्रायः इसी क्रोध में प्रकाशक बदलने पर संकलन से कुमार गंगानन्द सिंह की संशोधकीय टिप्पणी भी हटा दी गई।

इस संग्रह की भूमिका में बेनीपुरी ने पदों की चयन-प्रक्रिया अथवा पाठ-शोध की प्रविधि पर भी कोई बात नहीं की। पर इसके समर्पण-वाक्य में हिन्दी आलोचना की अतिविलक्षणता’ (?) के कठोर गाल पर झन्नाटेदार तमाचा दिखता है--‘‘हिन्दी के उन सफल समालोचकों के कुशल करों में, जो अपने फतबे को अकाट्य और अलंघनीय साबित करने के लिए नवरत्नमें दसरत्न घुसेड़ सकते हैं, जो देवको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए बिहारीकी, एवं बिहारीको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए कितने अन्य कवियों की कीर्ति पर सफाई के साथ पर्दा डाल सकते हैं, जो किसी विशेष कवि के श्रद्धालु समर्थकों को नीचा दिखाने के लिए दासको आकाश पर चढ़ा सकते हैं तथा जो केशवकी कविता में तुलसीकी कविता से अधिक काव्य-गुण पाते हैं--अभिनवजयदेव मैथिलकोकिल विद्यापति की पदावली का यह संक्षिप्त संकलन उनके नौसिखे संकलयिता द्वारा सादर, सविनय और सभय  समर्पित।’’ इस संकलन के पूरे होने तक उनकी आयु एकतालीस वर्ष की हो गई थी। तत्त्वान्वेषी शोध के लिए यह वयस कोई छोटा भी नहीं होता। पर इन पंक्तियों में उनका विद्यापति के प्रति गहन अनुराग और आलोचकों के षड्यन्त्राकारी नीति के प्रति उग्र क्रोध मुखरता से व्यक्त हुआ है।

बेनीपुरी-संस्करण में जिस शोधवेत्ता को बिहार राष्ट्रभाष परिषद से प्रकाशित तीन भागों की पदावली के परिशोधित पाठ से साम्य न दिखे, उन्हें स्मरण रखना होगा कि यह चयन नगेन्द्रनाथ गुप्त द्वारा सम्पादित संग्रह से किया गया है। कुछेक लोक-कण्ठ के पद भी समाविष्ट हैं। पर मिथिला के लोक-कण्ठ में जीवित विद्यापति के वे ही पद प्रामाणिक माने जाएँगे, जो किसी न किसी रूप में नेपाल-पाण्डुलिपि या रामभद्रपुर-पाण्डुलिपि या तरौनी तालपत्र से सम्पुष्ट हों! क्योंकि लोक-कण्ठ की व्याप्ति की ओट में मैथिलों ने भी विद्यापति के साथ कम अनाचार नहीं किया है।

गुप्त-संस्करण के सहयोग से तैयार होने के कारण इस चयन में वे असंगतियाँ तो रहेंगी, जो नगेन्द्रनाथ गुप्त की मनमानी से हुई थीं। गुप्त, निस्सन्देह बड़े भारी विद्वान थे, पर अहंकार या आलस्य या दायित्वहीनता बड़े-बड़े शूर-वीर को विपथगामी बना देती है। जिस भाषा की सही समझ न हो, उसमें कार्य करने के लिए किसी दक्ष व्यक्ति का दिग्दर्शन किसी शोध की पहली शर्त है। नगेन्द्रनाथ गुप्त को आरम्भिक दिनों में उस दौर के महामनीषी चन्दा झा के दिग्दर्शन प्राप्त थे, पर उनके असामयिक निधन के बाद उन्होंने अपने को सर्वज्ञ मान लिया, किसी विकल्प की तलाश नहीं की, वे भूल ही गए कि उन्हें मैथिली का ज्ञान नहीं है। फलतः जिस पद में जैसे परिवर्तन की इच्छा हुई, की। बीसवीं शताब्दी में आकर चैदहवीं शताब्दी के मैथिली पाठ की प्रामाणिकता की जाँच किसी जानकार से कराना अनिवार्य था, जो गुप्त ने नहीं की। उसी गुप्त-संस्करण को प्रमाण मान लेने के कारण बेनीपुरी-संस्करण के पद वैसे ही हैं, जैसे गुप्त के यहाँ थे। पर इस बात के लिए उनका यह संक्षिप्त संस्करण अत्यन्त प्रशंसनीय है कि इसने आलस्यानुरागियों की चेतना में भी विद्यापति को बसाए रखा।

यह संकलन सर्वप्रथम सन् 1940 में विद्यापति की पदावली शीर्षक से पुस्तक भण्डार, लहेरियासराय द्वारा प्रकाशित हुआ। छपने से पूर्व प्रकाशक ने कुमार गंगानन्द सिंह से इसका संशोधन करवाया। पुस्तक के मुख-पृष्ठ पर संशोधक के रूप में प्रकाशक ने उनका उल्लेख भी किया, उनसे संशोधकीय टिप्पणी भी लिखवाई। बाद के दिनों में जब सन् 1953 में इसका सम्पादित संस्करण लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ, तो उसमें से कुमार गंगानन्द सिंह की संशोधकीय टिप्पणी और बेनीपुरी का आभार-ज्ञापन हटा दिया गया।

अपनी संशोधकीय टिप्पणी में कुमार गंगानन्द सिंह ने स्पष्ट किया कि नगेन्द्रनाथ गुप्त के संकलन पर आधारित होने के कारण, प्राचीन हस्तलेख से मिलान कर इसका संशोधन अनिवार्य था; पर हस्तलेख उपलब्ध न होने के कारण, संकलन की माँग के आलोक में, कई स्थानों पर सन्देह होने पर भी पदों में हेरफेर करना उचित नहीं।

कई दशक से हिन्दी के समकालीन व्याख्याकारों की समझ बन गई है कि वे विद्यापति के मैथिली पदों को भली-भाँति समझते हैं, कदाचित समझते भी हों; पर यह पूरा सत्य नहीं है। पूरा सत्य यह है कि अधिकांश मैथिलीभाषी भी ऐसा दावा नहीं कर सकते! क्योंकि विद्यापति की मैथिली आज की मैथिली नहीं थी। उन्होंने अपने अनूठे भावों की संगीतबद्ध अभिव्यक्ति के लिए ऐसे अनूठे शब्दों का निर्माण किया था, जिनके अर्थान्वेष के लिए धैर्य-बुद्धि-विवेक तीनो का प्रयोजन है।...व्याख्याकारों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। बहरहाल, बेनीपुरी ने इक्कीस प्रकार के--वन्दना, वयःसन्धि, नखशिख, सद्यःस्नाता, प्रेम-प्रसंग, दूती, नोंकझोंक, सखी-शिक्षा, मिलन, सखी-सम्भाषण, कौतुक, अभिसार, छलना, मान, मान-भंग, विदग्ध-विलास, वसन्त, विरह, भावोल्लास, प्रार्थना और नचारी, विविध--भावों के कुछ-कुछ पद चुनकर यह संकलन तैयार किया है।

ये सब तो प्रशंसनीय है कि समर्पण-पृष्ठ से लेकर चयन-सम्पादन तक में बेनीपुरी ने विद्यापति के प्रति अपने भक्ति-भाव दिखलाए; पर जब अपने द्वारा सम्पादित इस संकलन की भूमिका में पदावली की भाषा पर चर्चा शुरू की, तो कर नहीं पाए। मैथिलीका उल्लेख आते ही वे अपने सारे निर्धारित उद्देश्यों से मुँह मोड़कर भाषाई राजनीति की पंचायती करने लगे।

उनकी चिन्ता हुई कि बंगालियों द्वारा हड़े जानेवाले विद्यापति अन्ततः मैथिल साबित हुए और मैथिलों की एक खास बोली है--उसे मैथिली कहते हैं।...किन्तु यह मैथिली बोली किस भाषा की शाखा है--बंगभाषा की या हिन्दी भाषा की। बाबू नगेन्द्रनाथ गुप्त ने मैथिली को ब्रजबोली (या हिन्दी) की एक शाखा माना है। गुप्तजी प्राचीन विद्या-महार्णव कहे जाते हैं। उनका निर्णय अधिक मूल्य रखता है।...हम कह सकें, तो कह सकते हैं कि मैथिली का शरीर हिन्दी का है, और उसकी पोशाक बंगला की। जिस प्रकार कोई हिन्दुस्तानी अंग्रेजी पोशाक पहनकर अंग्रेज नहीं बन जा सकता, उसी प्रकार मैथिली हिन्दी को छोड़कर बंगभाषा हो नहीं सकती। हाँ बंगभाषा के संसर्ग से इसमें मिठास अवश्य आ गई है।[1]

अब वे होते, या मुझसे भेंट हुई होती, या मेरी बात सुन-समझ सकने की निष्ठा होती, तो उन्हें बताया जाता, कि जिस क्षेत्र का ज्ञान न हो, उस क्षेत्र में पाँव रखने से पहले कुछ ज्ञान हासिल किया जाता है! वर्णमाला भर के ज्ञान से उन्होंने प्रायः अपने को बांग्ला का बड़ा ज्ञानी मान लिया कि उसके भाषा होने और क्रूरतावश मैथिली को उसकी बोली सिद्ध करने पर आमादा हो गए; लोगों को गुमराह करने लगे; पर अपने क्षेत्र की प्राचीन भाषा मैथिली, जिसके सम्बन्ध में वे पहले से क्रूर रवैया अपनाए हुए थे, उसके सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं जुटाई। भारी विद्वान थे, उनकी विद्वता को साष्टांग नमन! पर उनके इस कथन से तो सिद्ध हो गया कि भाषाविज्ञान का रंच मात्र भी ज्ञान, न तो उन्हें था, न उनके प्राचीन विद्या-महार्णव नगेन्द्रनाथ गुप्त को!...होता, तो ऐसी उटपटाँग बातें न करते।

उन्होंने सर्वविदित तथ्यों का भी संज्ञान नहीं लिया कि मैथिली, भारोपीय भाषा परिवार के हिन्द-आर्य समूह की एक प्राचीन भाषा है, दुनिया की उन विरल भाषाओं में से एक, जिसमें व्यवस्थित गद्य-लेखन की परम्परा चैदहवीं शताब्दी से पूर्व प्रचलित हो गई थी। इसकी लिपि की प्राचीनता का संकेत गुप्त-काल तक में मिला है, जिय लिपि में विद्यापति लिखते थे। इस भाषा में सिद्ध-साहित्य लिखा गया है। इस भाषा में कवियों के कवि ज्योतिरीश्वर ठाकुर हुए हैं। इस भाषा में राज-समाज-धर्म-दर्शन-भाषा के ज्ञानसिद्ध कर्मयोगी विद्यापति ने देसिल वयनाका महत्त्व प्रतिपादित किया है। इस भाषा का विकास मागधी अपभ्रंश के रास्ते हुआ है।...

इतने सारे तथ्यों से परांग्मुख व्यक्ति यदि फतवा जारी करे; इतनी प्राचीन भाषा मैथिली को, उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, कैरवी अपभ्रंश से विकसित की गई या बनाई गई भाषा हिन्दी की बोली माने, तो ऐसे विद्वान की भाषिक चेतना पर कोई ठीक से हँसे भी कैसे? विद्यापति की पदावली की भाषा पर बात करते समय, बेनीपुरी को जरूरत क्या थी इस बोली-भाषा की राजनीति में घुसने की?...

स्पष्टतः वे विद्यापति की भाषा-चेतना से सराबोर नहीं हो पाए थे। अपनी क्रूरता को सहलाते हुए उन्हें स्मरण नहीं रहा होगा कि हम विद्यापति की पदावली की भाषा पर विचार करने बैठे हैं! सचमुच, विचलित मन से कोई तपस्या नहीं होती! उन्होंने कलित नहीं किया कि विद्यापति ने जिस देसिल बयनाका उद्घोष किया था, वह हिन्दी नहीं थी, हिन्दी आज भी भारत के किसी क्षेत्र की देसिल बयनानहीं है! वैसे भी महान साहित्य के अवगाहन के समय भाषा-बोली के फन्दे (राजनीतिक बहेलियों द्वारा फैलाए गए) में मूढ़ पक्षी ही फँसते हैं!

हिन्दी साहित्य के इतने बड़े विद्वान इतना तक नहीं सोचा कि मैथिली तब की भाषा है, जब हिन्दी का अस्तित्व ही नहीं था! पृथ्वीराजरासोभी ब्रजभाषा में लिखी गई थी। बिहार राज्य के स्थापना-काल से भाषा की गन्दी राजनीति करनेवाले बहेलियों द्वारा फाँसे जाने के बावजूद बेनीपुरी समझ नहीं आई कि वे गन्दे लोगों के चंगुल में चले गए हैं, उन जैसे निविष्ट साधक को उस गन्दगी से दूर रहना चाहिए था। वे नहीं प्रायः समझ पाए कि मैथिली, हिन्दी की भगिनी भाषा भी नहीं हो सकती! उन जैसे विद्वान के बारे में ऐसी अभद्र बातें आवेश में हुई हैं, पर उस आवेश के लिए कोई ग्लानि भी नहीं है!...जब महर्षि को अभद्रता करने में संकोच नहीं हुआ, तो अनुगामियों को अपना पक्ष रखने में क्यों हो? ...उन्हें स्मरण रखना चाहिए था कि जिस भाषा में विद्यापति के पद राजमहल से झुग्गी तक, जच्चाघर से श्मसान तक, शयनकक्ष की अलसाई अंगराई से हल-कुदाल-खुरपी चलाते मजदूरों के श्रमारक्त कण्ठ तक, चैती से फाग तक, मन्दिर की चैकठ से किसानों की खलिहान तक...सुरीले कण्ठों से गाए जाते रहे हैं; वह वही मैथिली है जिसका विकसित रूप आज की मैथिली है और भारत की पुरातन भाषाओं में से एक है। विकास के दौरान विकृति भी आती है, सो मैथिलों के स्वभाव में भी आई। वैश्विक और कमाऊ बनने के उग्र लालच एवं उत्साह में वे यकीनन खुद भी विकृत हुए, अपने भाषाबोध और संस्कृतिमोह को भी विकृत किया।

बेनीपुरी ने सही स्वीकारा कि पदावली की मैथिली आजकल की मैथिली से कुछ भिन्न है।...रहेगी ही! साढ़े पाँच-छह सौ वर्षों बाद तो दुनिया की किसी भी भाषा का स्वरूप बदल जाता है! पर बेनीपुरी का कहना हुआ कि कुछ मैथिल महाशय विद्यापति के पदों की भाषा को तोड़-फोड़कर आजकल की मैथिली बोली से मिलाने का अनुचित प्रयत्न करते हैं। किन्तु क्या वे समझने की चेष्टा करेंगे, कि ऐसा करके वे विद्यापति की स्वर्गीय आत्मा को कितना कष्ट पहुँचा रहे हैं?’[2]

सही बात है, विद्यापति की स्वर्गीय आत्मा का कष्ट मैथिल जन अनेक कारणों से नहीं समझ पाए; पर क्या बेनीपुरी समझ पाए कि वे अपने इस आचरण से  स्वर्गीय विद्यापति की आत्मा को कितना कष्ट पहुँचा लिए?...

उनके इस दुख में मैं सहयात्री हूँ कि भिन्न-भिन्न क्षेत्र के लोगों ने स्थानीय प्रयुक्तियों से रंगकर पदावाली की भाषा विरूपित कर दी है--बंगालियों ने ठेठ बंगला में ढाल दिया, नेपालियों ने मोरंग का रंग चढ़ा दिया, ब्रजनन्दन सहाय ने भोजपुरी की कलई चढ़ा दी!1 अपटु मैथिल गायकों के अतिचार और अत्याचार ने तो विद्यापति की मिट्टी कूटकर रख दी। अपने उच्चारण-दोष और विकृत भाषिक क्षमता के कारण पदों के साथ इतने मनमानी किए, शब्दों-पदों में इतने विरूपण ले आए आए, कि उनका गायन सुनते हुए विद्यापति के पद सुनने का भान ही नहीं होता! भारत में लेकतन्त्रा है, उन्हें बरजकर कोई उनकी मनमानी में खलल नहीं डालता, विद्यापति ध्वस्त ही हो जाएँ तो क्या, उनकी कमाई और लोकप्रियता तो बढ़ी न!...आधुनिकता ने हमारे समाज को यही सिखाया है! पूर्वज यहाँ धरोहर नहीं होते, प्रेरणा-स्रोत नहीं होते; आत्मस्थान, आत्मविकास और धनार्जन के साधन होते हैं! ऐसे वंशजों के नाम न जाने कितने भारतीय पूर्वजों की आत्मा रो रही होंगी, विद्यापति की भी रो रही होंगी! उपाय?



[1] बेनीपुरी, रामवृक्ष. विद्यापति पदावली. 2023 (1953). लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद. पृ. 31

[2] बेनीपुरी, रामवृक्ष. विद्यापति पदावली. 2023 (1953). लोकभारती प्रका., इलाहाबाद. पृ. 31-32

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