Saturday, January 10, 2026

वैचारिक संवर्द्धन का नन्‍दनकानन : जेएनयू Divine Garden to Prosper the Ideology : JNU

 

वैचारिक संवर्द्धन का नन्‍दनकानन : जेएनयू

 

ज्ञान-विकास ही नहीं, जेएनयू जीवन-दृष्टि और वैचारिक विकास का प्राकृतिक उपवन है; जहाँ वातावरण के कण-कण में शैक्षणिकता व्‍याप्‍त है। इस गुरुकुल से मेरा सम्पर्क एक शोधार्थी के रूप में सन् 1991 में हुआ, जब डाइरेक्‍ट पी-एच.डी. में मेरा दाखिला हुआ था। अर्थात् किसी भी प्रवेश परीक्षा में शामिल हुए बिना, एम.फिल्. किए बिना सीधे पी-एच.डी. में दाखिला। उन दिनों भारतीय भाषा केन्‍द्र में प्रति वर्ष दो शोधार्थियों के ऐसे दाखिले का प्रावधान था, पर जेएनयू की स्‍थापना के उस बाइसवें वर्ष तक केवल एक ही शोधार्थी का नामांकन हुआ था, मैं उस धारा का दूसरा शोधार्थी था।

विदित है कि इसके अध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी, अध्‍येता...सबके निवास की व्यवस्था, परिसर के आवास या छात्रावास में ही होती थी। उन आवासीय रहन-सहन में भी वैचारिक खुलापन दिखता था। आवासीय परिसर में किसी के मन में घेराबन्‍दी या सीमा-विस्‍तार की इच्‍छा नहीं सताती थी। सहजता, प्राकृतिकता और खुलापन ही उन दिनों यहाँ के अध्‍यापकों-अधिकारियों के आचरण में बसा हुआ था। घेरा डालने की प्रथा नहीं थी, न आवास में, न विचार में। विचार की किलाबन्‍दी की शुरुआत के बाद ही शायद आवासीय किलाबन्‍दी की धारणा पनपी होगी। वैचारिक आवाजाही की प्रथा तो ऐसी थी कि हर पर्यवेक्षक अपने शोधार्थियों को अन्‍य विद्वानों, यहाँ तक कि अन्‍य ज्ञान-शाखा के विद्वानों से चर्चा करने के लिए प्रेरित किया करते थे।

उन दिनों यहाँ न तो विचार पर कोई पहरा था, न ज्ञानार्जन की किसी पद्धति पर और न ही वस्तु पर। परिसर में सुरक्षा गार्ड न के बराबर था। यहाँ पढ़ाई की व्यवस्था भी, न मालूम कारणों से शिष्योपशिष्य परम्परा की बन गई थी। कक्षा में अध्यापक जब कभी कोई अवधि-पत्र (टर्म पेपर) या संगोष्‍ठी पत्र (सेमिनार पेपर) लिखने देते थे; कोई भी अध्‍येता लिखकर सीधे अध्‍यापक को नहीं सौंपते थे। हर कनिष्‍ठतम अध्‍येता को यहाँ अपने से वरिष्‍ठ पाँच बैच के अध्‍येता रहते थे, जिनके सम्‍पर्क में वे सदैव अपने ज्ञानलोक को पुष्‍ट करते रहते थे। वरिष्‍ठों कें निर्देशन में शोध-पत्रों पर काम करते हुए हर अध्येता भरपूर चेष्‍टा से स्‍तरीय पत्र लिखकर कई-कई बार अपने शोध-पत्र को इतना स्‍तरीय बना लेते थे कि मूल्‍यांकन के समय कई बार अध्‍यापक भी सम्‍मोहित हो जाते थे।

अध्‍यवसाय का यह श्रेष्‍ठतम मार्ग शायद ही भारत के किसी विश्‍वविद्यालय में अपनाया जाता होगा। इस पूरी क्रिया में न केवल शोध-पत्र लिखनेवाले उस छात्र-छात्रा के ज्ञान-फलक का विकास होता था, बल्कि उन्हें दिग्दर्शन देनेवाले वरिष्‍ठ अध्‍येताओं के विकास के रास्ते भी खुलते थे। वह इस लिहाज से भी अपने को अद्यतन रखने की चेष्टा करते थे कि किसी कनिष्ठ अध्‍येता के पूछे गए प्रश्नों का हल बताने में उन्हें हतप्रभ न होना पड़े। व्यवस्था इतनी उदार हुआ करती थी कि अध्यापक हों या वरिष्ठ अध्‍येता, पूछे गए किसी प्रश्न का तत्‍काल हल न बताने की स्थिति में सहजता से स्‍वीकार करते थे कि अभी मैं इस प्रश्न के जवाब देने की स्थिति में नहीं हूँ, इस पर तैयार होकर अगले दिन या उसके अगले दिन या किसी निर्धारित समय में इस विषय पर हम बात करेंगे। 

अध्‍येताओं के पारस्‍परिक संवाद, सदैव किसी न किसी पाठ्यक्रम सम्‍बन्‍धी विषय, या कक्षा में उठी कोई नई उद्भावना या राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय विषयों पर ही होता था। बहसें कहीं भी हों, कमरे में, मंच पर, ढाबे पर...सब मानवीयता, सामाजिकता, जनसरोकार या राजकीय व्यवस्था पर ही हुआ करती थी। जेएनयू में साहित्यिक समालोचना में समाजशास्त्रीय अध्ययन की शुरुआत इसी पद्धति से विकसित हुई। मैनेजर पांडेय की प्रसिद्ध पुस्तक ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ में इस धारा के विकास की बात देखी जा सकती है, जो उन्होंने नामवर सिंह को इस विशेषण से समर्पित की कि उन्होंने ही हिन्दी समालोचना में समाजशास्त्रीय अध्ययन की नींव रखी। आगे के दिनों में समाजशास्त्रीय समालोचना की यह परम्परा पूरे देश की सभी भाषाओं में विकसित हुई । 

डाइरेक्ट पी-एच.डी. में नामांकन पाने की वजह से मुझे जेएनयू के किसी भी अध्यापक की किसी कक्षा में बैठने का अवसर नहीं मिला, पर उन दिनों रोजाना ही किसी न किसी छात्रावास, या ढाबा, या छात्रावास के डाइनिंग हॉल या किसी स्कूल के संगोष्‍ठी-कक्ष में कोई न कोई संवाद होता ही रहता था; और उनमें इन ख्यातिलब्ध महान विद्वानों -- नामवर सिंह, रोमिला थापर, बिपन चन्द्र, योगेन्द्र सिंह, केदारनाथ सिंह, हरवंश मुखिया, मैनेजर पाण्डेय, प्रमोद तलगेरी, अनिल भट्टी, आनन्द कुमार के भाषण होते ही रहते थे। दुनिया भर से आए विशिष्‍ट विद्वानों के भाषण सुनने का अवसर भी अध्‍येताओं को मिलता रहता था। बिना किसी अतिरिक्‍त प्रयास के यहाँ के अध्‍येता अन्‍तरानुशासनिक अध्‍येता हो जाते थे। दुनिया भर के विषयों के संकेत पाकर उनके ज्ञान-चक्षु ऐसे खुलते थे कि उन्‍हें अपनी ज्ञानपिपासा तृप्‍त करने में अपना सारा समय झोंक देना ही मुनासिब लगता था।

अपना और अपने साधनविहीन परिवार की खर्ची जुटाने की जिम्मेदारी ने मुझे कुछ इस तरह से तोड़ रखा था कि मेरे जीवन का प्राथिमक उद्देश्‍य आर्थिक विपन्नता से जूझना था। नामवर जी के सम्‍मोहन और युवावस्‍था के जोश में डालटनगंज के कॉलेज की एडहॉक अध्‍यापकी छोड़कर आ तो गया था, पर भरण-पोषण की जुगाड़ में अध्यवसाय से ज्ञान-संवर्द्धन के लिए कम ही समय निकाल पाता था। मेरा अधिकांश समय अखबारी लेखन की तैयारी अथवा ट्यूशन पढ़ाने की आवाजाही में जाता था। समय मेरे पास बहुत कम हुआ करता था। पर एक बहुत बड़ी सम्पदा इस परिसर में मुझे उपलब्ध थी -- रात्रि-भोजन के बाद प्रो. नामवर सिंह और प्रो. मैनेजर पाण्डेय रोजाना जेएनयू की सड़कों पर टहलने निकलते थे। मैंने इनके समय और रास्‍ते को गौर कर लिया था। समय से खाना खाकर इनके रास्‍ते में कहीं खड़ा हो जाता था, इनके आते ही साथ हो लेता था। वे चलते रहते थे, मैं कोई अपनी जिज्ञासा रख देता था, टहलने के दौरान मैं उनका भाषण सुनता रहता था। इस तरह इनकी कक्षा में बैठे बिना मैंने इनकी शिक्षण-शैली का गहन अनुभव प्राप्‍त किया।

उन दिनों हमारे विश्‍वविद्यालय की अपनी बस भी हुआ करती थी, जो दिन में तीन बार पूरी दिल्ली के सभी सम्पन्न पुस्तकालयों के सामने जेएनयू के अध्‍येताओं को नि:शुल्‍क पहुँचा आती थी, फिर शाम को वापस ले आती थी। जेएनयू के सारे अध्येताओं को अनुकूल पुस्तकालयों में उपलब्ध पुस्तकों का लाभ लेने की सदस्यता आधिकारिक रूप से मिल जाया करती थी। 

दलगत और राजनीतिक मतभेद के बावजूद अकादमिक बहस में कभी किसी का वैयक्तिक मतभेद सामने नहीं आता था। यहाँ के अकादमिक वातावरण को इतना स्वस्थ, इतना पवित्र रखने में सभी का सहभाग होता था। यही कारण था कि देश के अत्यन्त पिछड़े क्षेत्र से आकर मुझ जैसे लोग भी, उन दिनों यहाँ अपनी वैचारिकता सुदृढ़ कर सके; ग्रामीण और सामाजिक उपेक्षाओं को पैरों तले रौंदकर, लगभग टूट रहे मनोबल को तन्‍दुरुस्‍ती से दृढ़कर अपनी मान्यता के साथ जीने का अवसर बना सके। वर्ना, हमें तो बताया जा रहा था कि हम जैसे अर्थ-विपन्‍न लोग सोचने के लायक हैं, हमें वह करना होगा जो हमें बताया जाएगा। जेएनयू ने हमें अपनी धारणा, अपने विचार को प्रकट करने की सुविधा दी, अपनी हिल रही वैचारिकता और आत्मबल को दृढ़ करने का अवसर दिया। तिनके के मूल्य के व्यक्ति ने जब इतने बड़े-बड़े विद्वानों के बगल में खड़े होने, साथ बैठने और बहस करने का अवसर पाया, तो जीवन-दृष्टि में निखर आया। जेएनयू एक ही साथ जीवन-दृष्टि सुदृढ़ करने, और सुदृढ़ को और अधिक विकसित करने का अवसर देता है। 

अध्‍येताओं-अध्यापकों की समावेशी सामूहिकता यहाँ की अनूठी व्यवस्था की पहचान है। पूर्वज पीढ़ी के नीति-निर्माताओं द्वारा संरचित यहाँ की अध्यवसायी व्‍यवस्‍था ने ऐसी प्रविधि निर्मित कर दी है कि स्‍वावलम्‍बन और जीवन-दर्शन के सारे ओर-छोर इसमें शामिल हो गए हैं। मैं इस पद्धति के प्रति कृतज्ञ हूँ, आज मेरे जीवन में जो कुछ भी है, कम से कम निर्भीकता, अपनी बात रख पाने का साहस, अपनी मान्‍यताओं के जीने का आत्मबल,...सब कुछ जेएनयू के बूते ही है।

मैं आशा करता हूँ कि आनेवाली पीढ़ियों के अध्येताओं को जेएनयू यह प्रेरणा दे, कि वह किसी की जेब या जूते में बसनेवाला मनुष्‍य न बने। नई पीढ़ी सार्थक जीवन जीने की वृत्ति अपना ले तो इस राष्‍ट्र के उन्‍नत भाल को समुन्‍नत करने से कोई नहीं रोक सकता। शुभास्ते सन्‍तु पन्‍थान: ...।

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