पुनर्पाठ : अर्थ, प्रक्रिया, प्रमाण
Rereading : Meaning, Process, Testimony
कस्तूरी कुण्डल बसै
प्रशासनिक-नियन्त्रण के साथ योजनाबद्ध ढंग से गठित जिस ग्रामीण-व्यवस्था में व्यापार एवं शासन के अभिलेखीकरण की व्यवस्थित लिपि हो; इतिहासकारों की दृष्टि में उसी की गणना ‘सभ्यता' की श्रेणी में होती थी।
भारत में ऐसे व्यवस्थित नगर, कबीलाई राजतन्त्र, प्रशासनिक नियन्त्रण, मानकीकृत लिपि एवं माप-तौल विधि के उपयोग के संकेत ऋग्वेद काल से ही मिलते हैं। उन दिनों भी राजा की निरंकुशता, नीति-निर्धारण और न्याय-व्यवस्था पर सचेत सभा-समितियों का नियन्त्रण रहता था। उत्तर वैदिक काल, बौद्ध एवं मौर्य काल, महाजनपद काल में राज्यतन्त्र का विधिवत् विस्तार भी हुआ। स्वामी (राजा), अमात्य (मन्त्री), जनपद (भूमि एवं जनता), दुर्ग, कोष, सेना और मित्र जैसे सप्तांग सिद्धान्त भी लागू थे। आधुनिक भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की जड़ें प्राचीन काल से सुदृढ़ इसी स्वरूप के उदाहरण हैं।
इंग्लैण्ड में ये स्थितियाँ पहली से चौथी शताब्दी के बीच आईं; जब कैल्टिक संस्कृति के प्रभाव, रोमनों (सन् 43-410) द्वारा निर्मित व्यवस्थित सड़कें बनीं, शहरी जीवन और कानून-व्यवस्था और एंग्लो-सैक्सन द्वारा लागू अंग्रेजी भाषा की साझी पहचान से शुरू हुई। सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांस से आए नॉर्मनों द्वारा सुदृढ़ सामन्तवाद एवं भव्य किलों की संस्थापना हुई।
इतिहासज्ञों और पुरातत्त्वविदों की राय में भी, दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं का उदय नदी की घाटियों में हुआ—जिसके उदाहरण मेसोपोटामिया की सभ्यता (दजला-फरात सभ्यता) और सिन्धु घाटी सभ्यता का विकास लगभग समानान्तर (ई.पू. 4000-2500 के बीच) ही हुआ। जिन दिनों (ई.पू. 7-6 हजार के आसपास) भारत में कृषि का आगमन हो गया था, इंग्लैण्ड खानाबदोश शिकारी की तरह भोजन की तलाश में यहाँ-वहाँ घूमते थे। उनके यहाँ कृषि की शुरुआत ई.पू. 5000-4500 के बीच हुई। वैदिक संस्कृत में लिखा भारत का प्राचीनतम साहित्य, ऋग्वेद (ई.पू. 1500-1000) धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रन्थ है; जबकि इंग्लैण्ड का प्राचीनतम ग्रन्थ, एक वीर योद्धा 'बियोवुल्फ' की गाथा है, जो एंग्लो-सैक्सन काल (सन् 450-1066) में पुरानी अंग्रेजी में लिखा गया; ऋग्वेद की रचना के दो-ढाई हजार वर्षों बाद। अंग्रेजी साहित्य के जनक ज्योफ्रे चौसर (सन् 1343-1400) ने तो अपने समय की बोलियों को समेटकर साहित्यिक भाषा बनाई ही, एलिजाबेथ के युग (सन् 1558-1603) में आकर विलियम शेक्सपियर (सन् 1564-1616) ने भी इसे समृद्ध किया। यहाँ तक आते-आते भारत में भारवि (ई.पू. छठी शताब्दी), कालिदास (ई.पू. चौथी शताब्दी), शूद्रक (ई.पू. तीसरी-पाँचवीं शताब्दी), भरत मुनि (ई.पू. दूसरी शताब्दी), दण्डी (सन् 650-750), माघ (सन् 675-700), पम्पा (दसवीं शताब्दी), नन्नय भट्टारक (सन् 1020-1060), मम्मट (अनुमानतः सन् 1050), अक्का महादेवी (सन् 1130 के आसपास), जयदेव (12वीं शताब्दी), चन्दवरदाई (सन् 1148 के आसपास), बाबा शेख फरीद (सन् 1173-1266), कम्बन (सन् 1180 के आसपास), शालिभद्र सूरि (सन् 1185 के आसपास), चीरामन (12वीं-13वीं शताब्दी), अमीर खुसरो (सन् 1253 के आसपास), विद्यापति (सन् 1350-1439), कबीर (अनुमानतः सन् 1398), हरिहर विप्र (13वीं-14वीं शताब्दी), जायसी (अनुमानतः सन् 1492)...जैसे महान रचनाकारों ने भारतीय साहित्य के सामाजिक सरोकार और दार्शनिक उत्कर्ष उजागर कर दिए थे।
फिर भी आधुनिक काल में आकर इंग्लैण्ड जैसे पिछड़े देश ने भारत पर दो सौ वर्षों तक (सन् 1757-1947) आधिपत्य रखा और भारतीयों को पिछड़े देश का पिछड़ा नागरिक कहा—यह प्रसंग भारतीय मानस के लिए चिन्ता और चिन्तन का विषय कब बनेगा, कहा जाना असम्भव है। क्योंकि हम अपने ही उन प्राचीन ग्रन्थों के अनुशीलन से प्रेरणा लेने की इच्दा करना छोड़ चुके हैं, जिनमें जीवन-वयवस्था की सारी दुविधाओं को दूर करने की शिक्षा भरी हुई है। अपनी वैचारिक उन्नति के हर मुकाम पर हम पश्चिम की ओर झाँकते रहते हैं। ‘री-रीडिंग’ और ‘टेक्स्ट एनेलेसेस’ जैसे आयातित आचरण के अनुगमन में ‘पुनर्पाठ’ और ‘पाठ-विश्लेषण’ को हमने ‘रामरतन धन’ को अपनाया, पर अपने विशिष्ट पद या आचरण ‘अनुशीलन’ को अपनी चेतना से ओझल कर दिया। जबकि कही गई बातों के ‘गहन अनुशीलन’ का आचरण हमारे यहाँ निरन्तर रहा; स्वाधीनता संग्राम की तैयारी तक में। हमें इस बात का क्लेश भी नहीं होता कि हम अपने धरोहरों और परम्पराओं से हम निरपेक्ष हो गए; उसका नैरन्तर्य बनाए रखने में विफल सिद्ध हुए।
स्वातन्त्र्योत्तर काल के बौद्धिक उद्यमों में न जाने किनके यहाँ किस रास्ते यह विधान आया कि लिखे जानेवाले पुस्तक-परिचय या चलताऊ वक्तव्यों को आलोचना कहा जाने लगा, जिसमें पाठ के सतही मूल्यांकन से काम चलाए जाने लगे। परिणामस्वरूप पश्चिम से उद्घोषित विचार के पोषकों ने ‘पारम्परिक आलोचना’ जैसे पदबन्ध की कल्पना की, उसकी पद्धति सोची, और उसके विरोध में ‘नई समीक्षा’ पद्धति की स्थापना कर दी।
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मृग ढूँढै वन माँहि
यह ‘नई समीक्षा’ पश्चिम से आयातित 'न्यू क्रिटिसिज्म' का हिन्दी अनुवाद है; जिसके उद्घोषण पश्चिम में टी.एस. एलियट (सन् 1888-1965), आई.ए. रिचर्ड्स (सन् 1893-1979) जैसे विचारकों के नेतृत्व में ‘व्यावहारिक समीक्षा’ के तहत सन् 1920-40 के बीच हुई। बीसवीं शताब्दी के मध्य (पाँचवें-छठे दशक) में, भारतीय आलोचक-मण्डल, खासकर हिन्दी आलोचक-मण्डल भी इस 'नई समीक्षा' की आभा में लिपट गए; उन्हें भारतीय साहित्य की अनुशीलन-पद्धति का स्मरण प्रायः नहीं रहा।
‘अनुशीलन’ शब्द का अभिप्राय ही होता है 'गहन और निरन्तर अध्ययन', 'बार-बार अभ्यास' या 'गम्भीर चिन्तन-मनन'। विषय की तह तक जाने की यह अन्यतम प्रक्रिया है। किसी ग्रन्थ, विचार या सिद्धान्त के एक अवगाहन मात्र से अनुशीलन नहीं हो जाता। बार-बार पढ़कर, उसकी सूक्ष्मताओं को समझना और उस पर लगातार विचार करना; अनुशीलन कहलाता है। अर्थात्, पूर्वाग्रहमुक्त, तटस्थ, वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण ही शोध में अनुशीलन कहलाता है। इसलिए किसी रचना का 'पुनर्पाठ' वस्तुतः उसका 'अनुशीलन' ही है। प्राप्त ज्ञान को अपने आचरण में उतारना भी अनुशीलन के अन्तर्गत आता है, जिसे त्यागकर हमने ‘नई समीक्षा’ के पदबन्ध ‘पुनर्पाठ’ और ‘पाठ विश्लेषण’ को अपनया।
इस नवागत ‘नई समीक्षा’ की पूरी पद्धति, कृति के अनुशीलन पर ही टिकी होती है, जहाँ रचना के शब्दों और उसकी बुनावटों का अनुशीलन होता है। पुनर्पाठ या अनुशीलन का मुख्य निदेश यही है कि कृति का मूल्यांकन ‘रचना के भीतर लिखे गए शब्दों’ के आधार पर होना चाहिए, न कि रचनाकार के जीवन या उसके समाज के आधार पर। इस पद्धति के उद्गाताओं (जोर से गानेवाला) के अनुसार नई समीक्षा के चिन्तन का विषय रचनाकार का जीवन-क्रम, समकालीन समाजनीति-राजनीति पर विचार का समावेश नहीं हो सकता; रचना और रचनाकार अलग-अलग वस्तु है। कह दिए जाने या लिख दिए जाने के बाद लेखक परोक्ष हो जाता है; केवल रचना रह जाती है। नई समीक्षा, रचना में प्रयुक्त शब्दों के तथ्यान्वेष पर बल देती है, भाषा-शिल्प, बिम्ब-प्रतीक और शब्दों के चयन का विश्लेषण करती है।...अब चिन्तनीय है कि रचना या रचनाकार की जीवनानुभूति और परिवेश से निरपेक्ष रहकर किसी रचना में प्रयुक्त शब्दों के तथ्यान्वेष पर विचार कैसे सम्भव होगा?
हर समय का साहित्य अपने समकालीन समाज के वस्तुबोध का ही वाहक रहता आया है। गहन जीवनानुभूति के कारण ही कोई साहित्य समकालीनता के साथ-साथ अपनी शश्वतता सुनिश्चित करता है। नई समीक्षा में प्राचीन साहित्य की यह शाश्वतता अनुशीलन से ही सिद्ध होती है; ‘पाठ’ और ‘पुनर्पाठ' द्वारा उसकी नई व्याख्या प्रकट होती है। साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में, समालोचनात्मक लेखन में या शोध-कार्य में उदार और उदात्त रहने पर ही; संकुचित समीक्षात्मक उपकरण के परित्याग से ही साहित्य की वास्तविक समीक्षा सम्भव है।
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कंचन तजि काचहि गहैं
इस सावधानी के उल्लेख का कारण यह है कि इन दिनों भारत में प्रतिभा का विध्वंसक उपयोग तल्लीनता से शुरू हो गया है। बात-बेबात लोग पूर्वजों को खरिज करने में लग जाते हैं। किसी रचनाकार के यहाँ अस्मितामूलक कोई अभद्र चित्रण देखते ही वे तय कर देते हैं कि यह उस रचनाकार विशेष की निजी धारणा है।...वे सोचना भूल जाते हैं कि ‘सामाजिक यथार्थ’ के ‘यथार्थ’ का उल्लेख रचनाकार की अयोग्यता नहीं होती। कलिदास के समय में स्त्री अथवा सेवक पात्रों के शिक्षण की व्यवस्था नहीं थी, अशिक्षा के कारण स्त्रियाँ और सेवक संस्कृत नहीं बोलते थे, इसलिए उनके नाटकों में ये पात्र संस्कृत में पूछे गए प्रश्नों का जवाब भी प्राकृत में ही देते थे। ऐसा न करना समकालीन यथार्थ की मिथ्या प्रस्तुति नहीं होती? उक्त पात्रों के ऐसे भाषिक व्यवहार का दायित्व कालिदास के सिर मढ़ना उचित होगा या उस दौर के समाज के सिर?...अत्युत्साही समालोचक, ऐसी रचना के सहारे उस दौर के सामाजिक व्यवहार की समीक्षा करने के बजाय, रचनाकारों के सिर फोड़ने लगते हैं! उन्हें प्रायः नहीं मालूम कि समकालीन समाज की जीवन-व्यवस्था के यथार्थ के वाहक-रूप में ही किसी समय का साहित्य, उस दौर के इतिहास-लेखन का सूत्र देता है। समाज की सही छवि से रिक्त कोई भी साहित्य इतिहास-लेखन का सूत्र नहीं दे सकता।
हर समय का साहित्य समकालीन सामुदायिक जीवन की सभ्यता-संस्कृति-संघर्ष-चेतनादि …का समीक्षात्मक चित्र होता है, जिसका अधिकरण अतीत होता है, करण (उपकरण) वर्तमान होता है, और क्रियात्मक प्रसार अनन्त भविष्य की ओर उन्मुख होता है। जो साहित्य अतीत से भविष्य तक की यात्रा कर लेता है, वही शाश्वत होता है। रचनाओं में ऐसी योग्यता रचनाकार की गहन जीवन-दृष्टि, सघन मानवीय सरोकार और विलक्षण सृजन-कौशल से सम्भव हो पाता है। इसीलिए दुर्बल सृजनशीलता वाले रचनाकारों की रचना शाश्वत तो नहीं ही हो पाती है, समकालीन भी नहीं होती; वह तात्कालिक भावोच्छ्वास होकर रह जाती है; उसके अनुशीलन या पुनर्पाठ तो क्या, पाठ का भी कोई प्रयोजन नहीं होता। बहरहाल...
साहित्यालोचन में नई दृष्टि के आगमन से अनुशीलन या पुनरावलोकन या पुनर्पाठ का प्रयोजन बढ़ा। इस क्रिया में रचनात्मक कृति के अर्थों के रहस्य, सामाजिक सन्दर्भ और युगीन चेतना की सूक्ष्म व्याख्या की जाती है। चूँकि बदलते समय के सामुदायिक बोध के अनुसार रचना का आस्वादन और विश्लेषण भी बदल जाता है। पुनर्पाठ की क्रिया इस धारणा को और पुष्ट करती है।
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चेत करौं पाबौं परगासा
श्रेष्ठ साहित्य का अध्यापन/अवगाहन/समालोचन करते समय आलोच्य पाठ का 'पाठ’ या ‘अनुशीलन’ या ‘पुनर्पाठ' अनेक कारणों से अनिवार्य होता है --
- कृति विशेष का प्राथमिक परिचय ‘पाठ’ कहलाता है। जिसमें रचना के वस्तु-बोध-शिल्प-चरित्र और लेखक के मूल सन्देश को उजागर किया जाता है।
- जबकि, ‘पुनर्पाठ’, जिसे प्रभवतः ‘अनुशीलन’ कहना श्रेयस्कर होगा, उस रचना के तल में उतरकर उसकी सूक्ष्मताओं को समझने का अवसर देता है। इस क्रिया में भावक उसकी समकालीन उपादेयता के साथ-साथ उसके शाश्वत मूल्य की पहचान भी करता है। नए समय, नए अनुभव और नए विमर्श के आलोक में यह रचना का अनुशीलन करता है।
रचना के ‘अनुशीलन’ या ‘पुनर्पाठ’ के दौरान मुख्यतः तीन क्रियाएँ होती हैं --
- रूढ़ हो गए मानदण्डों और अतीत के प्रयोजनों का गायन त्यागकर, कृति विशेष की तत्कालीनता की समीक्षा और शीघ्र अपनी समकालीनता में उसके प्रयोजन पर आ जाने की प्रेरणा;
- भावकों के ‘काल-वृत्त-जनजीवन’ (समय-समाज-मनुज) में उस कृति के अवगाहन की प्रांसंगिकता की तलाश;
- अस्मितामूलक एवं अन्य नए विमर्शों के आलोक में उस कृति में लघु-मानव के जीवन-यथार्थ की चिन्ता का विश्लेषण।
पारम्परिक पाठ या पाठ-विश्लेषण में भावक कई बार पारम्परिकता के सम्मोहन में वहीं भटकते रह जाते हैं। नई दृष्टि के उपयोग से पाठ की शाश्वतता रेखांकित नहीं कर पाते। संस्तुत सीमित दृष्टि, इतिहास और आलोचना के पंख बाँध देते हैं। ऐसी सीमा भावकों को अक्सर, पाठ की अर्थ-छवियों के विस्तृत आयाम की ओर झाँकने नहीं देती। ‘पुनर्पाठ’ की क्रिया, इस दृष्टि-संकोच को दूरकर, समालोचना-दृष्टि का विस्तार करती है; कृति की समकालीन सार्थकता स्पष्ट करते हुए उसके शाश्वत मूल्य को उजागर करती है।
वाल्मीकि रचित ‘रामायण’ के अयोध्याकाण्ड के सौवें सर्ग से एक उदाहरण लेते हैं --
इस सर्ग को लोग ‘कच्चित सर्ग’ भी कहते हैं; क्योंकि इस सर्ग में भरत से पूछे गए श्रीराम के अधिकांश प्रश्नों के श्लोक 'कच्चित्' (‘क्या’ और ‘आशा की जाती है’ का समन्वित रूप) शब्द से शुरू होते हैं। अर्थात्, कर्ता के मन में क्रिया के ‘होने’ की शंका भी है, सम्भावना भी।
चित्रकूट पर्वत पर भरत आए तो थे श्रीराम को मनाकर, अयोध्या वापस ले जाने के लिए; पर उन्हें देखकर श्रीराम का मन अनेक आशंकाओं से भर उठा। आदर्श राजा का कर्तव्य समझाते हुए उन्होंने भरत को राजधर्म का गहन-गूढ़ उपदेश दिया।
इस सर्ग के प्राथमिक सत्रह श्लोकों में, उन्होंने भरत के समक्ष एक के बाद एक, प्रश्नों की झड़ी लगा दी। पिता और तीनो माताओं के कुशल-क्षेम पूछने के बाद, पुत्र और राजा के रूप में भरत के दायित्व-निर्वहन का प्रश्न पूछने के बाद, उन्होंने अयोध्या के राज, राज-धर्म, राजकाज, मन्त्रि-बल, सैन्य-बल, प्रजा-प्रज्ञा, नीतिविवेकादि से सम्बन्धित लगभग 56 प्रश्न पूछे।
सुबुद्ध जन चाहें, तो इन प्रश्नों में ही ‘रामराज्य’ या ‘सुशासन’ का नीति-विवेक ढूँढ सकते हैं। ‘रामायण’ का यह अध्याय वस्तुतः ‘राजनीति का महापाठ’ है; जिसका पुनर्पाठ दुनिया के हर शासक को करना चाहिए। पूरी दुनिया के ग्रन्थ का अवगाहन तो मैं कर नहीं पाया हूँ; फिर भी आश्वस्त हूँ कि इस सर्ग में राजनीति का जैसा गूढ़-दर्शन है, दुनिया का कोई ग्रन्थ इसके आसपास हो तो हो, आगे तो निस्सन्देह नहीं होगा!
इस दर्शन से प्रेरित-संचालित शासन-व्यवस्था ही दुनिया को मानवीय शासन का सन्देश सकती है। चीनी सभ्यता के छठी शताब्दी के कन्फ्यूशियस और दूसरा ऋषि कहे जानेवाले उनके अनुयायी मैन्सियस, जो बड़े भारी दार्शनिक थे, उनके विचार भी वाल्मीकि के इन विचारों से आगे नहीं हैं।
अपनी सारी शंकाओं को प्रश्न में बदलकर श्रीराम ने भरत से प्रश्न किया --
- तुम पिता की सेवा करते हो या नहीं,
- सत्यप्रतिज्ञ महाराज स्वस्थ हैं या नहीं,
- इक्ष्वाकु-कुल के उपाध्यायों का सत्कार होता है या नहीं,
- सत्कर्म में प्रवृत्त पुरोहितों का तुम सम्मान करते हो या नहीं,
- गुरु-पितु-मातु-देव समान पूज्य अग्रजों-वृद्धों-वैद्यों-ब्राह्मणों का तुम सम्मान करते हो या नहीं,
- धनुर्वेदाचार्य उपाध्याय सुधन्वा, जो अस्त्र-शस्त्र संचालन के महान ज्ञाता हैं, नीति-शास्त्र-विशारद हैं, उनका सम्मान करते हो या नहीं…।
ये सारे प्रश्न, केवल प्रश्न नहीं हैं! ये किसी राजा के उन निष्ठाओं की ओर इशारा करते हैं, जिनके बिना कोई राजा अजेय नहीं हो सकता, प्रजा का प्रिय नहीं हो सकता, वीर्यवान् नहीं माना जा सकता। इन प्रश्नों में यह सन्देश भी छिपा है कि अपने अकेले मत से, या मूढ़मति-विवेकहीन-चाटुकारों की सलाह से निर्णय लेनेवाले राजा की शासन-पद्धति न तो राजहित में होगी, न जनहित में।
कच्चिद्विनयसम्पन्नः कुलपुत्रो बहुश्रुतः ।
अनसूयुरनुद्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहितः ॥
इस सर्ग के इस ग्यारहवें श्लोक में श्रीराम ने भरत से पूछा कि उन्होंने राज्य के मुख्य पुरोहित पद के लिए आदर्श व्यक्ति का चयन किया है या नहीं? और उनका आदर कर रहे हैं या नहीं? इस श्लोक में यहाँ एक आदर्श पुरोहित का विशेषण ‘अनसूयुरनुद्रष्टा’ (दूसरों के गुण में अवगुण ढूँढने के आग्रह से मुक्त ज्ञानी) बताया गया है। इस पद में इतने गूढ़ दर्शन छिपे हैं, जिसकी व्याख्या घण्टों की जा सकती है। इसमें दो शब्द हैं -- 'अनसूयुः' (ईर्ष्या-द्वेष से निर्लिप्त, राज और राजा के वर्द्धिष्णु प्रभाव के अभिलाषी और उद्यमी, निष्पक्ष और उदार व्यक्ति) और 'अनुद्रष्टा' (शास्त्रोक्त विधानों, धर्म-सम्मत आचारों के अनुगमन में पग-पग पर राजा के हित-अहित का दिग्दर्शक)। शिक्षकों और नैष्ठिक उपदेशकों के मनोनयन और सम्मान के प्रति राजा के इतने श्रेष्ठ कर्तव्य का रेखांकन हर काल के राजा के लिए अनुगम्य होना चाहिए।
सोलहवें श्लोक में उन्होंने भरत से कहा कि विजय उसी राजा की होती है, जिसका मन्त्रिमण्डल ज्ञानी हो, राजभय में चाटुकार न हो, राजा को जनहितैषी सलाह दे, उनके ज्ञान और सलाह का नीतिपूर्वक सम्मान हो, उनकी गुप्त मन्त्रणाओं को मन्त्रिगण गुप्त रखे। सतरहवें-अठारहवें श्लोक में श्रीराम ने भरत से प्रश्न किया कि तुम निद्रा के वश में तो नहीं रहते? समय से जाग तो जाते हो?
कच्चिन्निद्रावशं नैषीः कच्चित्काले प्रबुध्यसे।
कच्चिच्चापपररात्रेषु चिन्तयस्यर्थनैपुणम्॥17॥
कच्चिन्मन्त्रयसे नैकः कच्चिन्न बहुभिः सह।
कच्चित्ते मन्त्रितो मन्त्रो राष्ट्रं न परिधावति॥18॥
राज्य सम्बन्धी निर्णय तुम अकेले तो नहीं लेते? या ढेर सारे अयोग्यों के साथ बैठकर तो नहीं लेते? बीती रात को तुम अर्थ-प्राप्ति के उपायों पर विचार करते हो या नहीं? मन्त्रियों के साथ की गई तुम्हारी गुप्त मन्त्रणाएँ क्रियान्वयन से पहले प्रकट तो नहीं हो जातीं?
बुद्धिमान, पराक्रमी और रहस्य छुपाने वाले मन्त्रियों के चयन, राज्य की सुरक्षा के लिए सुदृढ़ जासूसी तन्त्र, हर समय राजकोष के आय से कम खर्च, सैनिकों को समय पर वेतन, किसानों एवं वणिकों की रक्षा का मूल मन्त्र देकर श्रीराम ने भरत को राजधर्म सिखाया।
यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्ति अस्त्राणि राघवः।
तानि पुत्रपशून्घ्नन्ति प्रीत्यर्थमनुशसतः ॥59॥
हे राघव! मिथ्या दोषारोपण से दण्डित लोगों की आँखों से गिरे अश्रु उस न्याय परांग्मुख राजा के पुत्र-पशु समेत सब कुछ का सर्वनाश कर देते हैं।
नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम् ।
अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम् ॥65॥
एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च मन्त्रणम् ।
निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम् ॥66॥
मंगलस्याप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः ।
कच्चित्त्वं वर्जयस्येतान् राजदोषांश्चतुर्दश ॥67॥
इन श्लोकों में श्रीराम ने भरत को राजाओं के इन चौदह दुर्गुणों का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करने की सलाह दी है --
नास्तिकता, असत्य भाषण, क्रोध, कर्तव्यों के प्रति असावधानी, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियों की असंगति, आलस्य, ऐन्द्रिक सुखों मे संलिप्ति, मन्त्रियों की सलाह अवहेलना, मूढ़ों की सलाह का अनुगमन, तय योजनाओं के आरम्भ में विलम्ब, गुप्त मन्त्रणाओं के अगोपण, कल्याणकारी कार्यों से परांगमुखता, अनावश्यक युद्धों में प्रवृत्त होना…
ढाई हजार बरस बाद, आज भी ‘वाल्मीकि रामायण’ के इन प्रसंगों की प्रासंगिकता चर्चा में है, तो इसका श्रेय अनुशीलन या पुनर्पाठ पद्धति को ही जाता है।
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जाके हिय में कछु चेत जगै
सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से नागार्जुन की ‘कालिदास’ शीर्षक कविता उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय कविताओं में से एक है। बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक के अधोकाल में, सन् 1938 में, रचित यह कविता उन्होंने हिमालय-मानसरोवर-तिब्बत यात्रा में अर्जित अपने अनुभवों से प्रेरित होकर लिखी थी। इस भाव की उनकी और भी कालजयी कविताएँ हैं। यह कविता सन् 1959 में प्रकाशित उनके अत्यन्त लोकप्रिय संग्रह 'सतरंगे पंखों वाली' में संकलित हुई। मनोरम रचाव (नागार्जुन की रचनात्मकता का मूल धर्म) के कारण इस कविता का आह्लादक पक्ष इतना बलवन्त हो गया कि भावक समूह इसकी सुरम्यता के सरोबर में ही गोता लगाते रह गए, दार्शनिक पक्ष अनदेखे रह गए। इसका सही अर्थ अनुशीलन से ही सम्भव है।
कविता यूँ है कि --
कालिदास
कालिदास! सच-सच बतलाना
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोए थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना!
शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रन्दन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोए थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोई या तुम रोए थे?
वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा सन्देशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास! सच-सच बतलाना
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोए थे?
रोया यक्ष कि तुम रोए थे!
यह कविता एक महान पूर्वज कवि का दूसरे महानतम पूर्वज कवि के वस्तु-बोध पर प्रश्न भर नहीं है; इस प्रश्न के सहारे नागार्जुन ने अपनी कविता के भावकों को वह अन्तर्दृष्टि दी है, जिसके बूते रस-सिद्ध भावक ‘अज-रति-यक्ष’ की पीड़ा से अभेद स्थापित कर लेता है; पात्र-कवि-भोक्ता-भावक का समेकित भोग इसी तरह पूरा होता है। इसमें जीवन की घनीभूत संवेदना अत्यन्त सूक्ष्मता से उजागर हुई है। अर्द्धांग-वियोग के पीड़ा की कालिदासीय अनुभूति, नागार्जुन के शब्दों में आकर एकमेक हो गई है, इसमें दाम्पत्य के अलगाव का यातनादायी दंश जी उठा है। इस दंश की पीड़ा कोई भोक्ता ही समझ सकता है।
भारतीय सभ्यता के लिए वरदान सिद्ध हुए महान कवि कालिदास की तीन अमर कृतियों — ‘रघुवंशम्’, ‘कुमारसम्भवम्’, और ‘मेघदूतम्’ के एक-एक प्रसंग को संकलित कर, नागार्जुन ने भव्य अतीत की असंगति और कुत्सित वर्तमान की विडम्बना को एकमेक कर दिया है; जिसमें भावक अपनी क्षमता भर आह्लादित भी होता है, उद्वेलित भी। इसमें उन्होंने कवि के 'परकाया प्रवेश' की ओर भी इशारा किया है; जिसमें एक ओर कालिदास का अज-रति-यक्ष में 'परकाया प्रवेश' है, तो दूसरी ओर नागार्जुन का कालिदास में। अर्थात्, यह कविता दूसरों के दुःख में स्वयं को विलीन कर देने की क्षमता का विश्लेषण करती है और समकालीनता को सूक्ष्मता से उजागर करती है।
इस कविता का मूल-दर्शन काव्य-रस-बोध के लिए अंकित ‘साधारणीकरण’ की पद्धति से स्पष्ट हुआ है, जिसकी गाँठें ढीली किए बिना कवि-चेष्टा तक पहुँचना असम्भव है। इसमें ‘सच-सच बतलाना’ कहकर कालिदास से पूछे गए नागार्जुन के प्रश्नों में स्पष्ट राय है कि कोई भी रचनाकार अपने पात्रों की पीड़ा से एकमेक हुए बिना, कालजयी रचना नहीं कर सकता।
अज-रति-यक्ष के गहन विलाप की दृश्य-छवि रचते हुए नागार्जुन ने जिस तरह कालिदास के करुणार्द्र होने का संकेत इस कविता में किया है; उसका आभास नागार्जुन को भी इन ग्रन्थों के पुनर्पाठ से हुआ होगा; इस कविता की रचना से पूर्व, वे स्वयं इन पात्रों की विरह वेदना से उतने ही करुणार्द्र हुए होंगे। क्योंकि कोई रोया हुआ व्यक्ति ही अपने बिम्ब को ऐसा जीवन्त कर सकता है, जिसे पढ़कर भावक, न केवल रो पड़े, बल्कि उस पात्र की पीड़ा और रचनाकार की सृजन-पीड़ा को अपनी पीड़ा बना ले। इसमें नागार्जुन का प्रश्न ‘कालिदास सच-सच बतलाना’ और ‘वह रोया या तुम रोए थे?’ की पुनरावृत्ति सृजन की उस अवस्था को अंकित करने का कौशल देता है, जिसमें सृजेता और पात्र के बीच का भेद मिट जाता है।
रघुवंशम् के आठवें सर्ग में राजा अज के साथ उपवन में विहार कर रही रानी इन्दुमती के वक्षस्थल पर देवर्षि नारद की वीणा से एक दिव्य पारिजात माला टूटकर गिरा और इन्दुमती की मृत्यु हो गई। पत्नी की इस आकस्मिक मृत्यु से व्याकुल राजा अज, इन्दुमती का शव अपनी गोद में लेकर साधारण मनुष्य की तरह विलाप करने लगे। उस हृदय विदारक विलाप में सम्राट के वैभव पर शोक की क्रूरता छा गई।++
पौराणिक राजा ‘अज’ के विलाप की जैसी मर्मस्पर्शी करुणा कालिदास ने जीवन्त की है, जिस तरह उन्हें मृत्यु-शोक में डुबोया है, नागार्जुन का विश्वास उचित है कि ऐसे अमर विलाप की रचना, कोई भी रचनाकार, अपना हृदय द्रवित किए बिना, अपनी आँखों से आँसू बहाए बिना, नहीं कर सकता, कालिदास निश्चय ही रोए होंगे!
कालिदास से उनका प्रश्न भी उचित है कि ‘इन्दुमती के मृत्युशोक से/अज रोया या तुम रोए थे?’…वे स्वयं भी तो इन निष्पत्तियों पर ‘परकाया प्रवेश’ और ‘साधारणीकरण’ द्वारा ही पहुँचे होंगे! पर-पीड़ा की ऐसी मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति, अनुभूत पीड़ा के बिना असम्भव है—रघुवंशम् महाकाव्य में दिवंगत इन्दुमती के लिए शोकाकुल अज का विलाप, उस मानवीय करुणा उदाहरण है, जिस कारण मनुष्य, वस्तुतः मनुष्य हो पाता है।
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कुमारसम्भवम् के चौथे सर्ग में कामदेव ने देवताओं के बहकावे में आकर शिव की समाधि भंग करने की चेष्टा की, परिणामस्वरूप वे शिव के तीसरे नेत्र की ज्वाला में भस्म हो गए। कामदेव के भस्म होने की क्रिया का ‘घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम’ जैसा अनूठा रूपक नागार्जुन के सहज काव्य-कौशल का धर्म ही है। अब अचानक से विधवा हुई ‘रति’ अपने भस्मीभूत पति की दशा पर विलाप करने लगीं; सुध-बुध खोकर, स्वामी के मित्र वसन्त ऋतु को पुकारने लगीं। रति के उस रोदन की मर्मस्पर्शी करुणा में प्रकृति तक शोकाकुल हो उठी। इस हृदय-द्रावक कारुणिक विलाप पर कालिदास से नागार्जुन की आस्था सहज है कि ‘रति का क्रन्दन सुन आँसू से/तुमने ही तो दृग धोए थे?’ यह पंक्ति लगभग आश्वस्ति की है, कि कालिदास का हृदय निश्चय ही करुणार्द्र हुआ होगा, रति के बहाने वे स्वयं रोए होंगे। फिर भी पूछ लिया—‘कालिदास! सच-सच बतलाना/रति रोई या तुम रोए थे?’
***
मेघदूतम् में, अलकापुरी के राजा कुबेर ने अपने दरबार के एक यक्ष को कर्तव्य की चूक के कारण एक वर्ष के देश-निष्क्रमण का दण्ड दिया और वह अपनी नवविवाहिता प्रियतमा से वियुक्त होकर, शापित होकर रामगिरि पर्वत पर आकर जीवन काटने लगा। समय बीता, आषाढ़ के उमड़ते बादलों को देखकर वियोग में इस विरही यक्ष की व्याकुलता इतनी उदग्र हुई, कि विकलता में वह जड़-चेतन का भेद तक भूल गया। वियोग में हृदय की पीड़ा का सन्देश अपनी प्रिया तक अपने पहुँचाने के लिए, गगनचारी मेघ को ही अपना दूत बना बैठा। यक्ष के मनोजगत का उद्वेलन, स्मृतियों के उद्वेग और प्रेयसी की सुरक्षा की चिन्ता का यह वियोग-विलाप इतना मार्मिक है कि भावकों को करुणार्द्र कर देता है। इस कविता में कालिदास से नागार्जुन का तीसरा प्रश्न ‘रोया यक्ष कि तुम रोए थे?’, इसी शपित यक्ष के विलाप से सम्बद्ध है।
इस प्रसंग की शुरुआत ‘वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका’ से हुई है। महाकवि नागार्जुन के भावकों को विदित है कि उनकी प्रगतिशील चेतना जितनी तीक्ष्ण और गत्यात्मक थी, उनका सभ्यताबोध और परम्पराबोध उतना ही अधिक सघन था। मनुष्यता और मनुष्य की जैविक वृत्ति की समझ उतनी ही प्रखर थी।
‘प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा’
या
‘उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास! सच-सच बतलाना’
ऐसी प्रयुक्तियों में उनकी उसी मानवीय वृत्ति और सभ्यताबोध का संकेत है; जहाँ आषाढ़ मास के पहले दिन रामगिरि पर्वत पर उमड़े पुष्करावर्त मेघों (उमड़-घुमड़कर बरसने वाले काले घने बादल) को देखकर एक विरही अपनी प्रिया के स्मरण से व्याकुल हो उठा; फिर बादलों को ही दूत बनाकर प्रिया के पास सन्देश भेजा। और, इसी जगह नागार्जुन ने, उस विरही की वेदना से द्रवित होकर, उसका सन्देश उसकी प्रिया के पास पहुँचा देने की धारणा से, परकाया-प्रवेश के आचरण से, कालिदास को उस पुष्करावर्त मेघों के साथ उड़ने वाला साथी बना दिया; उस यात्रा में उनकी मानसिक थकान परख ली। फिर पूछा है कि—
‘पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?’
स्पष्ट है कि यह ‘सोना’ कालिदास का नीन्द से सोना नहीं है, यह उमड़ते बादलों का किसी गिरि-शिखर पर रुक जाने की क्रिया है, जिसे कवि ने एक विलक्षण कौशल से यक्ष की पीड़ा ढोते हुए बादल और कवि कालिदास की थकान को एकमेक कर दिया है। यक्ष के विरह-ताप को नागार्जुन ने कालिदास के हृदय-ताप की तरह स्थापित करते हुए अपने हृदय का भी ताप बना लिया है।
***
उक्त तीनों ग्रन्थों में अज-विलाप का मूल कारण पत्नी इन्दुमती की मृत्यु से उत्पन्न स्थाई बिछोह है, रति-विलाप में पति कामदेव के भस्म हो जाने से उत्पन्न दुस्सह आकस्मिक शोक है, जबकि यक्ष-विलाप में पत्नी से अस्थाई दूरी के कारण उत्पन्न विरह-वियोग है। दो प्रसंगों का विलाप, शोक के कारण है, एक प्रसंग का विलाप विप्रलम्भ शृंगार के कारण। दो प्रसंगों में करुण रस है, एक प्रसंग में शृंगार रस।...जिन क्रान्तिधर्मी, क्रान्तदर्शी, राष्ट्रभक्त समालोचकों को इन प्रसंगों में क्रान्ति या सामाजिक परिवर्तन या राष्ट्र-प्रेम की गूँज न सुनाई पड़े, उन्हें इन प्रसंगों के दार्शनिक पक्ष पर विचार करना चाहिए! क्योंकि हर क्रान्ति, और हर भक्ति की मूल वृत्ति प्रेम के कारण शुरू होती है! और, प्रेम का अक्षय-बीजागार किसी शाश्वतगर्भा अन्तःकरण का संस्पर्श पाकर ही क्रियाशील होता है; और, ऐसा अन्तःकरण, इन तीनों प्रसंगों में विलाप करते पात्रों के पास है, जहाँ जीवन-मूल्य भी है और मनुष्यता भी। किसी विचार या भावना के प्रति सम्मोहित मनुष्य के हृदय में प्रेम की चिनगारी ही सुलगकर क्रान्ति या भक्ति का स्वरूप पाती है।
उक्त तीनों प्रसंगों में आलम्बन निश्चय ही भिन्न-भिन्न हैं, पर, कर्ता के अन्तःकरण की वृत्ति तीनों प्रसंगों में ‘प्रेम’ ही है! तीनो के विलाप, प्रेम के कारण उपजे विरह के हैं। प्रसंग जो भी हो—विचार, क्रिया, भौगोलिक क्षेत्र, सामुदायिक इकाई...इनसे प्रेम करने के कारण, इनके हितैषी होने के कारण, मनुष्य इनके निकट रहना चाहता है, इसलिए इनके हित में संघर्ष करता है; इनके वियोग में विलाप करता है। विलाप की इन तीनों कृतियों में इसी प्रेम से वियुक्त मनुष्य विलाप करता है। मनुष्यता और प्रेम के वशीभूत इन रचनाओं के विरही पात्र का विलाप एक बड़े सन्दर्भ का प्रतिदर्श खड़ा करता है।
इन प्रसंगों की करुणा, जीवन की गहन संवेदना का परिचय देता है। इस हिय-द्रावक करुणा की अन्तर्वस्तु का पुनर्पाठ करते हुए नागार्जुन के मन में उचित ही प्रश्न उठा कि ‘अज’ या ‘रति’ या ‘यक्ष’ की ऐसी व्याकुलता की पुनर्रचना कोई रोए बिना तो नहीं कर सकता! कलिदास ने भी इसकी रचना रोए बिना तो न की होगी! नागार्जुन का यह विश्वास उनके प्रश्न के पद ‘सच-सच बतलाना’ में है। ‘अज’ या ‘रति’ या ‘यक्ष’ की व्याकुलता तो अपनी ऑँखों इनमें से किसी ने नहीं देखी -- हमने तो नहीं ही देखा, नागार्जुन ने भी नहीं देखा, कालिदास ने भी नहीं देखा होगा। फिर भी कालिदास ने इन तीनों दृश्यों को इतना जीवन्त कर दिया कि हर भावक उस विलाप को पढ़कर रो पड़ता है, नागार्जुन ने तो प्रश्न ही कर दिया! कालिदास और नागार्जुन का यह संवाद बेशक आभासी है, पर प्रश्न जायज है कि इन विलापों में निकले आँसू किसके थे? यकीनन, वे आँसू ‘अज’ या ‘रति’ या ‘यक्ष’ के भी थे, कालिदास के भी, नागार्जुन के भी, और हमारे भी!
इस कविता के उत्तरांश में नागार्जुन ने यक्ष का विशेषण विधुर दिया है। कोशीय अर्थ ढूँढते हुए कोई भावक इस प्रयुक्ति के लिए कवि-चेष्टा पर शंकालु न हों; क्योकि विधुर का अर्थ केवल मृत पत्नी का पति भर नहीं होता! काव्य परम्परा में ‘विधुर’ एक विशेषण है, जिसका अर्थ विकल या व्याकुल या दो प्रेमियों के पार्थक्य से पीड़ित व्यक्ति भी होता है।
तत्समबहुल होने के बावजूद, इस कविता का लालित्य मनोरम है। सभ्यता, समाज, राजनीति और अर्थनीति सम्बन्धी नागार्जुन की उन्नत चेतना से उनके सारे ही पाठक अवगत हैं। सभी जानते हैं कि पौराणिक और समकालिक बिम्बों के सहारे रूपक रचनेवाले वे अद्वितीय कवि थे। इस कविता के पौराणिक प्रसंगों को समकालिक बिम्बों के सहारे स्मरण करना सुकर होगा। इसका रचनाकाल स्वाधीनता संग्राम का चरम काल है, जब भारतीय नागरिकों के जीवन की करुणा किसी ‘अज’, या ‘रति’ या ‘यक्ष’ से कम नहीं थी। यहाँ कवि ने बड़ी चतुराई से एक महान प्रतापी राजा (अर्थात् सामन्त) ‘अज’, जिनके जीवन में दैवीय असावधानी या नियति से करुणा आई; एक सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति स्त्री ‘रति’ (अर्थात् भारतीय स्त्री), जिनके पति लिप्साग्रस्त देवताओं के समूह (शासक समूह) के बहकावे में आकर, दूसरे अत्यधिक शक्तिशाली देवता (शासकीय प्रधान) के प्रचण्ड क्रोध का शिकार हुए, प्राण गँवा बैठे, जिस कारण उनकी पत्नी के जीवन में करुणा आई; एक कर्मचारी ‘यक्ष’, अपने स्वामी कुबेर (शासकीय प्रधान) द्वारा अपनी मामूली-सी चूक का क्रूरतम दण्ड भोगने को विवश हो गया। सोचना सुकर होगा कि ये तीनों प्रसंग औपनिवेशिक क्रूरता से प्रताड़ित भारतीय नागरिक का था, जिसमें सामन्ती सँभाल रहे जमीन्दार ‘राजा अज’ की तरह रो रहे थे, स्त्रियाँ ‘रति’ की तरह, और, जनसाधारण ‘शापित यक्ष’ की तरह। कालिदास की उक्त रचनाओं के अज-विलाप, रति-विलाप और यक्ष-विलाप के प्रसंग में वियोग के कारुणिक और मर्मस्पर्शी चित्रण का पुनर्पाठ करते हुए इन सन्दर्भों को स्मरण करना उचित होगा। जनकवि नागार्जुन की ‘कालिदास’ शीर्षक कविता में विलाप के ये प्रश्न इन सन्दर्भों की ओर इशारा करते हैं; कहना कठिन है कि उनकी इस चतुराई से कितने लोग सहमत हैं!
···
त्रास डरावहि जनम जनम जुग
सन् 1949 में लिखी नागार्जुन की विशिष्ट कविता 'प्रेत का बयान' उनके उग्र राजनीतिक बोध और यथार्थवादी चेतना का संकेत है, जिसमें स्वातन्त्र्योत्तर भारत की शासकीय क्रूरता का उग्र रूप निखरा है। प्रत्यक्ष रूप में यह कविता निश्चय ही सामान्य पाठकों को हास्योन्मुख करती होगी; पर राजनीतिक क्रूरता पर यह घनघोर व्यंग्य है। इस व्यंग्य का स्वरूप इसके अगम तल में जाने पर निखरता है; कि रामराज्य की दुहाई देनेवाले तत्कालीन भारतीय लोकतन्त्र की क्रूरता, भुक्तभोगियों के प्रेत तक को आतंकित किए हुए थी। इस गहन राजनीतिक समीक्षा को अनुशीलन से ही स्पष्ट किया जा सकता है। जिन उपाध्यायों (आजीविका के लिए अध्यापन करनेवाला) का उच्चतर सम्मान रामराज्य में राजा का अनुगम्य कर्तव्य माना गया, भारतीय लोकतन्त्र के आरम्भ होते ही वे उपाध्याय (स्कूल के शिक्षक) भूखों मरने लगे। स्वाधीन भारत के आरम्भिक दौर के लोकतान्त्रिक देवताओं ने जनसामान्य की सहज जीवन-शैली व्यवस्थित करने की घोषणा की थी, पर बरस भर बाद ही ये दावे ध्वस्त होने लगे, जनसामान्य के सपने बिखरने लगे, शासकीय क्रूरता का ताण्डव ऐसा उग्र हुआ कि कवि-क्रोध का स्वरूप मजाक में परिणत हो गया; जिन लोगों को विदूषकों (जोकर) का हास्याभिनय या स्वंग देखकर हँसने का मन करता है, उन्हें यह कविता हास्य सम्बन्धी दिव्य-ज्ञान दे सकती है। मसखरे की तरह ‘प्रेत का बयान’ दर्ज करते हुए इस कविता में नागार्जुन ने हास्य का ऐसा दार्शनिक रूप रचा है कि सही अर्थबोध के बाद भावकों को अपने ही कृत्य पर गलानि होने लगती है; पर तत्कालीन सत्ता को ग्लानि नहीं हुई। इस कविता में व्यतिरेक और अन्योक्ति द्वारा गहन संवेदनशील कवि-हृदय का मार्मिक और मानवीय रूप हृदय विदीर्ण कर देता है—
प्रेत का बयान
ओ रे प्रेत --
कड़ककर बोले नरक के मालिक यमराज
--सच-सच बतला!
कैसे मरा तू?
भूख से, अकाल से?
बुखार कालाजार से?
पेचिस बदहजमी, प्लेग महामारी से?
कैसे मरा तू, सच-सच बतला!"
खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़
काँपा कुछ हाड़ों का मानवीय ढाँचा
नचाकर लंबे चमचों-सा पंचगुरा हाथ
रूखी - पतली किट-किट आवाज़ में
प्रेत ने जवाब दिया--
महाराज!
सच-सच कहूँगा
झूठ नहीं बोलूँगा
नागरिक हैं हम स्वाधीन भारत के
पूर्णिया जिला है, सूबा बिहार के सिवान पर
थाना धमदाहा, बस्ती रुपउली
जाति का कायस्थ
उमर कुछ अधिक पचपन साल की
पेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था
--किन्तु भूख या क्षुधा नाम हो जिसका
ऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको
सावधान महाराज,
नाम नहीं लीजिएगा
हमारे समक्ष फिर कभी भूख का!!
निकल गया भाप आवेग का
तदनन्तर शान्त-स्तम्भित स्वर में प्रेत बोला --
जहाँ तक मेरा अपना सम्बन्ध है
सुनिए महाराज,
तनिक भी पीर नहीं
दुःख नहीं, दुविधा नहीं
सरलतापूर्वक निकले थे प्राण
सह न सकी आँत जब पेचिश का हमला ...
सुनकर दहाड़
स्वाधीन भारतीय प्राइमरी स्कूल के
भुखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षक प्रेत की
रह गए निरुत्तर
महामहिम नर्केश्वर।
प्रेत-यमराज संवाद का यह चित्र जिस किसी को चुटकुले जैसा रोचक, मनोरंजक लगता है; उनके रसबोध पर कोई भी टिप्पणी निरर्थक होगी!...क्योंकि यह स्वातन्त्र्योत्तर भारत के प्राथमिक दो वर्षों के शासकीय ताण्डव का चित्र है; जिसमें यमराज सत्ता के प्रतीक हैं, और दिवंगत शिक्षक का प्रेत जनसामान्य का।... इस संवाद की भाषिक सरलता से व्यंग्य-बोध निखर उठा है। नागार्जुन की कविता का यह विलक्षण वैशिष्ट्य है। बाहर-बाहर अत्यन्त सरल दिखती है; पर भीतर गहनतर दार्शनिक भाव छिपा रहता है। स्वाधीनता के सूर्योंदय से भारतीय जनसामान्य के जीवन के जैसे भाग्योदय का आश्वासन दिया गया था, बौद्धिकों की दृष्टि में दो बरस बाद ही, अर्थात्, सन् 1949 में ही, प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक भूखों मरने लगे थे।
भूख से मरनेवाला यह अध्यापक केवल सर्वहारा वर्ग के प्रतीक नहीं था, बड़े गर्व से इन्हें इस देश में राष्ट्र-निर्माता कहा गया था; बच्चों-किशोरों-नौजवानों को शिक्षित बनाकर राष्ट्र-निर्माण में योगदान देनेवाले नागरिक के निर्माता। पर आजादी के दो ही बरस बाद, समय पर और नियमित वेतन न मिलने के कारण, राष्ट्र-निर्माता भूखों मरने लगे। फिर राष्ट्र का निर्माण किस विधि हो? भारत की जिस लोकतान्त्रिक व्यवस्था को विकास का नमूना बताया जा रहा था, उसमें भूखों मरनेवाले राष्ट्रनिर्माताओं का कोई संज्ञान नहीं था। यह कविता लोकतन्त्र के उसी आचरण पर तीक्ष्णतर व्यंग्य-प्रहार है।
चिन्तन उचित होगा कि जिस तरह रानीतिक आचरण में शासकीय क्रूरता कभी रुक नहीं जाती; सचेत और सरोकारी कवि की संवेदना भी कभी नहीं रुकती। शासकीय निर्लज्जता को उजागर करने में वह कभी संकोच नहीं करती। नागार्जुन का वही उग्र रूप सन् 1987-1988 के आस-पास ‘गुपचुप हजम करोगे’ शीर्षक कविता में व्यक्त हुआ—
‘कच्ची हजम करोगे
पक्की हजम करोगे
चूल्हा हजम करोगे
चक्की हजम करोगे
...
बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे’
ये दोनो ही कविताएँ राजनीतिक व्यंग्य के अन्यतम उदाहरण हैं। ‘गुपचुप हजम करोगे’ में राजनीतिज्ञों की उस निर्लज्जता पर फब्ती कसी गई है, जिसमें हथियार-खरीद की दलाली खाकर भी लोग महात्मा गाँधी की मूर्ति के समक्ष नतमस्तक होते हैं; उस विडम्बना पर व्यंग्य किया गया है, जिसमें विकास के नाम पर मनुष्य के जैविक प्रयोजन के अनिवार्य संसाधन को आहत किया गया—कच्चे अनाज को मण्डी भेजकर, पारम्परिक चूल्हे और चक्की को विस्थापित कर आधुनिकीकरण द्वारा निस्सहाय जनता को घुटने टेकवाने की चतुराई और दुष्टता की गई। पर ऐसे प्रहारक व्यंग्य भी इन्हें लज्जित न कर सका।
‘प्रेत का बयान’ कविता में जिस राष्ट्र-निर्माता की मृत्यु भूख से हुई, वह अपनी तरफ से झूठ न बोलने को प्रतिश्रुत रहा, जीवितावस्था में ही उन्हें शासकीय आतंक ने ऐसी क्रूरता दिखाई कि मर जाने के बादा भी वे आतंकित रहे। स्वयं को स्वाधीन भारत के बिहार सूबे के पूर्णिया जिले के सिवान पर अवस्थित धमदाहा थाना की रुपउली बस्ती का बासिन्दा बताता रहा, कायस्थ जाति का पचपन साल की उम्र का प्राइमरी स्कूल का मास्टर बताता रहा। अपने भौतिक परिचय का सच बताकर भी, वह यकीनन अन्तःकरण की सारी बातें झूठ बताता रहा; क्योंकि उसे अपने खोखले स्वाभिमान की चिन्ता बनी रही या जीवनकाल के कांग्रेसी सत्ताधीश का आतंक उसके सिर सवार रहा। भूख से मरा वह अध्यापक, भूल से भी अपनी मुत्यु का कारण ‘भूख’ नहीं मान रहा था, अपनी दुर्बल आँत पर पेचिश के हमले का ‘सत्योत्तर’ (पोस्ट ट्रुथ) विमर्श रच रहा था, वह दावा कर कर रहा था कि मरते समय उसे तनिक भी पीर नहीं हुई, दुःख-दुविधा नहीं हुई, उनके प्राण सरलतापूर्वक निकले! पर असल में, वह मृत्यु नहीं, हत्या थी, जो शासकों की अक्षमता का प्रमाण थी।
यमराज के प्रश्न में प्रेत ने कहा कि—
...भूख या क्षुधा नाम हो जिसका
ऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमको
सावधान महाराज,
नाम नहीं लीजिएगा
हमारे समक्ष फिर कभी भूख का!!
निकल गया भाप आवेग का
इस ‘आवेगमय भाप’ से ही यह निष्कर्ष निकलता है कि वह झूठ बोल रहा था। यह नाटकीय आवेग या बीते जन्म के दुख के आवेग में वह जो कुछ बोल गया था, उसे ही समतल बनाने के लिए फिर ‘शान्त-स्तम्भित स्वर’ में बोला—सरलतापूर्वक निकले थे प्राण।
कविता में प्रयुक्त पंक्ति ‘नागरिक हैं हम स्वाधीन भारत के’ और ‘पेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था’ सीधे-सीधे नेहरू युग की उत्सवधर्मिता, पाखण्डपूर्ण स्वाधीनता और खोखले राष्ट्रवाद पर तीक्ष्ण व्यंग्य है। यह उस दौर के सुशिक्षित व्यक्ति का मिथ्याभिमान ही है या जीवितावस्था में व्यवस्था के चक्र में पिसे जाने का आतंक, कि मृत्यु के बाद भी उसे सत्य स्वीकार्य नहीं है। ऐसे नग्न यथार्थ के ऐसे वीभत्स वातावरण में 'महामहिम नर्केश्वर' यमराज (अर्थात्, सत्ताधीश), शान्त रह जाने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकते थे, क्योंकि उन्हें अपनी व्यवस्था में निर्मित भूलभुलैया की सम्पूर्ण सफलता दिख रही थी, दिख रहा था कि उनकी व्यवस्था का मारा मनुष्य उनके द्वारा निर्मित आतंक की छाँव में मरने के बाद भी जी रहा है। सत्ताधीश के लिए 'महामहिम नर्केश्वर' की उपाधि भी यहाँ व्याख्येय है! मनुष्य के जीवन को नरक बनानेवाले क्रूर शासक वस्तुतः नरकेश्वर ही तो होंगे!
नागार्जुनी भाषिक प्रौढ़ता के चमत्कार से सजी इस कविता में प्रेत के ढब-ढाँचे, परिचय, ध्वन्यात्मकता (‘खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़’ या ‘किट-किट’ की आवाज़) की प्रशंसा में कुछ अलग से कहने का प्रयोजन इसलिए नहीं है कि यह तो उनके सृजन के प्राण-तत्त्व हैं।
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पाथर पै पानी परै तिहिं नहिं भेदै धार
सन् 1965 में प्रकाशित कुँवर नारायण के प्रबन्ध-काव्य ‘आत्मजयी’ का अधार कठोपनिषद से ली गई नचिकेता की कथा है, जहाँ मृत्यु सम्बन्धी शाश्वत समस्या पर विचार हुआ है। प्राचीनतम माने जाने वाले कठोपनिषद् का सही-सही कालक्रम बताना तो अविश्वसनीय होगा, पर भाषा-शैली-ऐतिहासिकतादि के साक्ष्य से इसे ई.पू. 5वीं शताब्दी का मानना उपयुक्त होगा। इसमें वर माँगने के आग्रह पर नचिकेता ने यमराज से पहला वर माँगा कि उनके पिता क्रोध शान्त हो जाए। ‘आत्मजयी’ के कवि कुँवर नारायण ने इस कथा को इपनी कविता में पिरोकर नया अर्थ दिया है; आधुनिक युग की जटिलतम समस्याओं —अस्तित्व के संकट, बौद्धिक चेतना और आत्म-साक्षात्कार को मुखर किया है।
यज्ञ में जर्जर बूढ़ी गाएँ दान करने के अपने पिता वाजश्रवा का पाखण्ड देखकर युवा नचिकेता आहत हुआ। परस्पर विरोधी जीवन-दर्शनवाली दो पीढ़ियों के द्वन्द्व को रेखांकित करती यह कविता इसलिए महान मानी गई कि इसका मूल सन्देश 'आत्मजय' है, अर्थात् ‘स्वयं पर विजय’। नचिकेता, अर्थात्, बीसवीं शताब्दी की युवा पीढ़ी, बाहरी दुनिया जीतने को उत्सुक नहीं है, इनकी यात्रा अपनी इन्द्रियों, वासनाओं और अहं पर नियन्त्रण पाने की यात्रा है; जबकि वाजश्रवा, अर्थात्, पुरानी पीढ़ी, बाहरी दुनिया जीतकर ही अमर होना चाहती है। यह दीगर बात है कि आज की युवा पीढ़ी का जीवन-दर्शन नचिकेता से नहीं, वाजश्रवा से मेल खाता है; पर कुँवर नारायण का लक्ष्य भावी युवा पीढ़ी में नचिकेता का ही जीवन-दर्शन भरना था। शासकीय क्रोध और वर्चस्व विस्तार की आँधी का प्रतिकार करना था। अपनी प्रश्नाकुलता से नचिकेता ने अपने पिता के उस गौरव-गढ़ को पल भर में ध्वस्त करवा दिया, जिसमें बताया गया कि नचिकेता ही वाजश्रवा के सर्वाधिक प्रिय थे। यदि यह तथ्य होता, तो कितने भी क्रोध आते, वे उन्हें मृत्यु को दान नहीं देते। भौतिक विजय के कामी पुरुष ऐसा ही कर सकते थे।
बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक के बौद्धिक वातावरण में जहाँ मनुष्य अपने वजूद की तलाश में भटक रहा था, मृत्यु-भय का कोई निषेधपूर्ण वातावरण नहीं था; जीवन की समग्रता समझने के लिए मृत्यु के बहाने, माध्यम बन गए थे; अस्तित्व की तलाश प्रमुख हो गई थी। ऐसे वातावरण में नचिकेता का जीवनादर्श आधुनिक युग के संशय और अविश्वास के बावजूद एक 'सात्विक प्रतिरोध' और 'सृजनधर्मी जीवन-मूल्यों' के प्रति आग्रही बनाता है, मनुष्यता में आस्था को पुनर्जीवित करता है।
'आत्मजयी' एक पुराने पाठ का काव्यानुवाद नहीं, बल्कि यह समकालीन समाज के प्रयोजन के अनुकूल सही आत्मसातीकरण (एप्रोप्रिएशन) है, जिसमें अतीत के माध्यम से वर्तमान को जाँचने क एक कालजयी उद्यम है। इस प्रबन्ध में कुँवर नारायण ने स्थापित किया है कि मूलोच्छिन्न होना आधुनिक होना नहीं है; अपने सांस्कृतिक वैभव के मर्म को समझकर ही अपने समय का सही मूल्यांकन किया जा सकता है।
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‘आत्मजयी’ का ही वैचारिक विस्तार, सन् 2008 में प्रकाशित कुँवर नारायण का प्रबन्ध-काव्य ‘वाजश्रवा के बहाने’ है। जिसका केन्द्रीय पात्र युवा नचिकेता के बजाय उनका वृद्ध पिता वाजश्रवा है और इसकी मुख्य चेष्टा, ‘आत्मजयी’ की तरह मृत्यु की ओर से जीवन को देखना नहीं, जीवन की ओर से मृत्यु को देखना है। इसमें वृद्ध पिता की जरावस्था की स्मृतियों, पश्चातापों, आत्म-साक्षात्कारों को मुखरित किया गया है। इसमें नचिकेता के क्रोधित पिता ने अपने इकलौते पुत्र का दान मृत्यु (यम) को दे दिया। यमलोक से वरदान पाकर नचिकेता तो लौट आया, पर वाजश्रवा के अन्तःकरण में मानसिक उथल-पुथल, ग्लानि और उद्वेलन चलता रहा, जिस द्वन्द्व का सात्विक और मार्मिक लेखा-जोखा इस कृति में अंकित हुआ। इसमें अपने पाखण्डी स्वभाव के बावजूद वाजश्रवा को धार्मिक आडम्बरों की व्यर्थता समझनेवाला आत्मचिन्तनशील मनुष्य की तरह अंकित किया गया है। इसमें सन्देश है कि समाज में सभ्यता और मूल्यों का विकास हमेशा युवा पीढ़ी के सात्विक विद्रोह और संघर्ष से ही सम्भव होगा। इस कृति का पुनर्पाठ पौराणिक पात्रों के पुनर्मूल्यांकन के रूप में नहीं, बल्कि आज के जटिल, बहुआयामी और विस्फोटक युग में मनुष्य की विवशता, उसके अकेलेपन और उसकी शाश्वत मानवीय नियति के आलोक में विलक्षण समझ देता है। इसमें जीवन के उत्सव और हाहाकार का साक्षात्कार है। ऋग्वेद, उपनिषद और गीता की दार्शनिक अनुगूँज है। इसमें, ‘असीम अतीत’, ‘अनन्त अन्धकार से भरे भविष्य’ और ‘बीच के अथाह जीवन के वर्तमान’ की संगति की खोज के संकेत हैं। इसे किसी पौरााणिक कथा के काव्यमय रूपान्तरण से अधिक, यह समझने की जरूरत है कि जो कुछ सुनाई पड़ती हैं, वह सत्य नहीं है; अनुगूँज से तथ्य जगाने की चेष्टा जरूरी है; अर्थात् सद्वृत्ति सम्भूत सचेत युवाओं की चेष्टा ही जीवन-मूल्य को बचा पाएगी। जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की इस कोशिश में अनुगुम्फित है कि मृत्यु ही जीवन को अर्थ देती है; निरर्थक में भी अर्थ भरती है। जिजीविषा है इसीलिए सम्भावना भी है।
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सन् 2015 में प्रकाशित प्रकुँवर नारायण का प्रबन्ध-काव्य कुमारजीव चौथी शताब्दी के प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु, चीनी भाषा में बौद्ध ग्रन्थों का अनुवाद करनेवाले सांस्कृतिक सेतु 'कुमारजीव' के जीवन पर आधारित एक कल्पनाशील चिन्तन है। यह कृति कवि कुँवर नारायण की आत्मचेतना की खोज का अन्तिम पड़ाव है। ‘आत्मजयी’ द्वारा सन् 1965 में शुरू की गई इस खोज का तीसरा सोपान है। उनके जीवनकाल में प्रकाशित होने वाली यह उनकी अन्तिम रचना है।
आधा भारतीय आधा चीनी कुमारजीव (सन् 344 में कुचा में जन्म) के योगदान ने जिस तरह चीन और चीनी विद्वानों का संस्कार बदल दिया; उस परिवेश में यह कृति, कुमारजीव की जीवन-कथा के सहारे, सत्ता द्वारा बुद्धिजीवियों और विचारकों को नियन्त्रित करने की विडम्बना पर अंगुली रखती है और जिज्ञासुओं की चेतना जागृत करती है।
इसका पाठ एक बार फिर से सिद्ध करता है कि बुद्धिजीवी की भूमिका सत्ता और राजनीति को नैतिकता सिखाना है, उसकी दासता स्वीकारना नहीं। इसके साथ-साथ इसमें यह भी सिद्ध होता है कि दैहिक मृत्यु के बाद भी महान विचारकों के विचार जीवित रहते हैं।
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बाहर कियो इंजोर पै भीतर रह्यो अन्धार
भीष्म-युधिष्ठिर संवाद के सहारे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने सन् 1946 में प्रकाशित ‘कुरुक्षेत्र’ प्रबन्ध-काव्य में युद्ध-दर्शन के गहन अनुशीलन का अवसर दिया है। आधुनिक हिन्दी साहित्य के इस प्रतिष्ठित, कालजयी और वैचारिक प्रबन्ध की कथाभूमि तो महाभारत की है, पर इसका प्रेरक घटक द्वितीय विश्वयुद्ध है। तत्कालीन वैश्विक परिस्थितियों में हिंसा के औचित्य परखने की चेष्टा से इसकी रचना हुई।
इसमें, शरशय्या पर लेटे भीष्म, युधिष्ठिर का ग्लानि-भाव परखकर सान्त्वना देते हैं और युद्ध की दार्शनिकता समझाते हैं। दिनकर ने इसमें युद्ध और शान्ति के अनेक दार्शनिक प्रश्न उठाए हैं। तय है कि समाज से शोषण, अन्याय और भेद-भाव मिटाए बिना शान्ति की कामना निरर्थक होगी। इसमें युद्ध की दार्शनिक पृष्ठभूमि पर अंगुली रखते हुए भीष्म के निदेश में यह गूढ़ तत्त्व छिपा है कि किसी भी युद्ध का बीजारोपण विनाशकामियों की दुर्वृत्ति से नहीं होता, अन्याय के जनक की नृशंस प्रयास से होता है, जो शान्ति से समझौता नहीं चाहते। इसमें दिनकर ने स्पष्ट किया है कि हथियार डाल देने भर से शान्ति नहीं आ नहीं आ जाती; शान्ति आती है, हर मनुष्य को न्यायसंगत अधिकार मिलने से—‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध/जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।’ पंक्ति में इसी वैचारिकता की ध्वनि है। परवर्ती समाज के लिए यह अत्यन्त विलक्षण तथ्य और सन्देश है। वस्तुतः, 'कुरुक्षेत्र' कोई युद्ध-काव्य ही नहीं, मनुष्यता का घोषणापत्र है; जो कायरतापूर्ण शान्ति की अपेक्षा न्यायपूर्ण युद्ध को कहीं अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करता है, बशर्ते कि युद्ध साम्राज्य विस्तार के बजाय सत्य, जीवन-मूल्य और मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ा जाए।
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इसी तरह कर्ण के चरित्र को उजागर करता, सन् 1952 में प्रकाशित वीर रस प्रधान लोकप्रिय खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’, भारतीय समाज के जातिवाद, भेदभाव, सामाजिक विषमता पर सघन प्रहार है। 'रश्मिरथी' का अर्थ ही है—‘सूर्य की किरणों के रथ पर सवार योद्धा’। महाभारत के सर्वाधिक जटिल, उपेक्षित, दानवीर पात्र कर्ण के जीवन और उसके अन्तर्द्वन्द्व पर केन्द्रित यह कृति शोषितों, वंचितों की ध्वनि बुलन्द करती है। 'कुरुक्षेत्र' में वैचारिक दार्शनिकता की सघन स्थापना के बाद दिनकर ने 'रश्मिरथी' में कर्म, जाति-भेद और वैयक्तिक सामर्थ्य के बुनियादी प्रश्नों को मुखर किया है। जहाँ शौर्य और आचरण से ही मनुष्य के मूल्यांकन का सन्देश दिया गया है।
इस कृति का प्रकाशन भारत में अपनाए गए संवैधानिक प्रावधानों के तहत भारतीय लोकतन्त्र के पहले आम चुनाव (25.10.1951 से 21.02.1952) के बाद हुआ; जिसमें लोकसभा की 489 सीटों पर विजेता पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 364 सीटों विजयश्री मिली थी। पण्डित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले लोकतान्त्रिक प्रधानमन्त्री हुए थे। सन् 1951-52 के चुनाव में भारतीय समाज जातिगत विभाजन का घनघोर परिताप झेल रहा था। बी.आर. अम्बेडकर ने अपनी पार्टी 'शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन' के जरिए, जातिगत भेदभाव के विरुद्ध और हाशिए के समाज को राजनीतिक शक्ति दिलाने के लिए आवाज उठाई थी। हालाँकि, उस चुनाव में वे स्वयं हार गए, उनकी पार्टी को भी इस चुनाव में कोई बड़ी सफलता नहीं मिली। जातिगत राजनीति से वह आम चुनाव पूरी तरह मुक्त तो नहीं था, फिर भी भारतीय समाज में सामाजिक समानता और राजनीतिक चेतना का एक नया मार्ग प्रशस्त हुआ था। हो न हो, वंशवादी बोध की इन्हीं विसंगतियों ने वैयक्तिक सामर्थ्य और संघर्ष की महत्ता अंकित करने के लिए दिनकर को यह प्रेरणा दी हो कि कटीली राहों पर संघर्ष करनेवाले ही आगे बढ़ते हैं। तभी तो उन्होंने लिखा —
सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं।
'रश्मिरथी' सचमुच, व्यवस्था के पाखण्ड, जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध अपना सामर्थ्य दर्ज करनेवाले वंचित समूह की मुखरता दिखती है। दिनकर की ओजस्वी भाषा में कर्ण का यह अलौकिक चरित्र इस कृति को शाश्वत और हर युग के लिए प्रासंगिक, प्रेरणादायी सिद्ध करती है।
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मूढ़मती काँ चेत दियो को बूझत नहीं गँवार
आज की बौद्धिक चर्चा में ‘अनुशीलन’ जैसे शब्द तो आते भी नहीं; किन्तु ‘पुनर्पाठ’ और ‘पाठ-विश्लेषण’ को लोग सामान्यतया एक ही बात मान लेते हैं; क्योंकि इन दोनो ही क्रियाओं की प्रक्रियाएँ गहन पारस्परिकता रखती हैं; रचना की बेहतर समझ बनाने के लिए दोनों आवश्यक हैं; पर इनके उद्देश्य, गहनता और पद्धति में सूक्ष्म अन्तर होते हैं।
पुनर्पाठ का असल अभिप्राय है बार-बार पढ़कर पाठ की भूली हुई बातों को याद करना, सतही समझ को गहनतर कर, आनंद लेना; ‘पाठ में क्या लिखा है’—का स्पष्ट बोध अर्जित करना। जबकि पाठ-विश्लेषण का अभिप्राय है, पाठ के भीतर छिपे अर्थ एवं संरचना को परखना; विकोडीकरण द्वारा, या अकादमिक-आलोचनात्मक प्रक्रिया द्वारा पाठ के सामाजिक-राजनीतिक-मनोवैज्ञानिक-साहित्यिक सन्दर्भों का विश्लेषण करना; कि 'ऐसा क्यों लिखा गया' या 'इसके दूरगामी प्रभाव क्या होंगे’?
वस्तुतः किसी भी पाठ (पुस्तक, कहानी, कविता, लेख, दस्तावेज़) के पहले अवगाहन में, कई विवरणों की तथ्यपरकता या व्यंजना पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती। दूसरे या तीसरे अवगाहन में उसे स्पष्ट कर लेने की क्रिया पुनर्पाठ कहलाती है। जैसे, प्रेमचन्द की कहानी 'कफ़न' पढ़ते हुए पहली बार, कहानी की मूल रूपरेखा स्पष्ट हो जाने पर भी; दोबारा पढ़ने से पात्रों के संवाद या उनके व्यवहारों की छोटी-छोटी बातें बेहतर समझ आने लगती हैं।
किन्तु पाठ-विश्लेषण में पाठ के विभिन्न हिस्सों (शब्द-चयन, भाषा-शैली, बिम्ब-प्रतीक, रूपकादि, ध्वनि, लय, ऐतिहासिक सन्दर्भ) का गहन अध्ययन-मनन किया जाता है। जैसे, 'कफ़न' कहानी का नायक कौन है? घीसू या माधव या बुधिया या समाज या मनुष्यता? मनुष्यता का रूपक बनी बुधिया, इस कहानी में मनुष्यता की तरह ही अमूर्त है, पर पूरी कहानी में जब-तब उसकी छाया उपस्थिति का आभास कराती रहती है। हर रचना में रचनाकार अपने नायक के चरित्र और आचरण द्वारा अपनी धारणाएँ प्रसारित करता है। इस कहानी में भी लेखक ने अपने नायक एवं उनके सहयोगियों द्वारा व्यक्ति, समाज, सामाजिक व्यवस्था, व्यवस्था के विभिन्न तन्त्रों की दुष्कृति पर अपनी धारणाएँ प्रकट की है। घीसू और माधव के माध्यम से तत्कालीन सामन्ती व्यवस्था, गरीबी, अपनी दुर्दशा पर क्रुद्ध दलित की परोक्ष-सी चेतना पर टिप्पणी की है।…ये सारी निष्पत्तयाँ पाठ-विश्लेषण से ही मिल सकती हैं। लेखक की भाषा, भाषिक प्रयुक्ति, व्यंग्य-प्रतीकादि का मूल्यांकन भी इसी तरह पूर्ण होता है।
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कछु जगौं चेत तिनके हिय में?
दीर्घकाल से हमारा समाज ऐतिहासिक-पौराणिक या अन्य शाश्वत ग्रन्थों में दर्ज निदेशों-उपदेशों का अनुसरण करता रहा है; इन ग्रन्थों के अनुशीलन या कि पुनर्पाठ भी होते रहे हैं, पर यान्त्रिक रूप से; ‘पौराणिक पाठ पर तर्क-वर्जना’ की पट्टिका लगाकर उपदेशक लोग उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि की ओर झाँकने से पहले बरजते थे! अब चूँकि वर्जना स्वीकारने की विवशता नहीं रही, इसलिए अनुशीलन-संकोच टूटा और निर्द्वन्द्व पाठ-विश्लेषण से उसमें छिपे गूढ़ सन्देश के साथ-साथ विसंगतियों के सूत्र भी पकड़ में आने लगे।
आधुनिक इतिहासकारों ने महाभारत की रचना का समय ई.पू. 400 से सन् 400 के बीच माना है। खगोलीय गणना के पोषक इसे खिसकाकर ई.पू. 3100 (आज से करीब पाँच हजार वर्ष पहले) के आसपास ले गए, जब महर्षि वेदव्यास ने 'जय काव्य' के रूप में इसे श्रीगणेशजी से लिपिबद्ध करवाया; जो बाद के दिनों में 'महाभारत' कहलाया। अब रचना-समय का जितना भी द्वन्द्व हो, पर अनुसरणीय तथ्य यही है कि पुनर्व्याख्या करते हुए आज के व्याख्याकार, इस महान ग्रन्थ के रचनाकार की मरम्मत करने के बजाय इस कथाक्रम में छिपे गूढ़ रहस्य को जानें। क्योंकि स्वार्थ-परमार्थ-पुरुषार्थ की कथा कहे जानेवाले इस ‘महाभारत’ में असंख्य गूढ़ तथ्य छिपे हैं, जो अनुशीलन और पुनर्व्याख्या से प्रकट होते हैं; आधुनिक समाज के उपयोक्ता इन तथ्यों से प्रेरणा लेकर अपने जीवन-विधान को सँवार सकते हैं।
समझने का प्रयोजन है कि इतिहास-पृष्ठों पर जिस कुरुवंश की शील-सभ्यता की दुहाई दी जाती रही; पितामह भीष्म ने पूरी कथा में हस्तिनापुर के खूँटे से अपनी निष्ठा को बाँधे रखा, उनकी निष्ठा, अपने ही वंश के अपराधियों द्वारा अपने ही वंश के वधू के चीर-हरण के समय कहाँ चली गई? जिस भीष्म की आज्ञा से धृतराष्ट्र राजा बने, वे शकुनी द्वारा उन्मार्गी बनाए गए उसी धृतराष्ट्र के दुर्वृत्त सन्तानों—दुर्योधन और दुश्शासन को द्रौपदी का चीर-हरण करते कैसे देखते रहे? भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य की ऐसी कौन-सी दुर्बलता थी, जिससे प्रेरित होकर वे न तो द्यूत का विरोध कर सके, न द्रौपदी को दाँव पर लगाने की क्रिया का, न ही द्रौपदी के वस्त्र-हरण का? इन तीनो पराक्रमियों के समक्ष यदि उस दौर में खड़े होने लायक कोई पुरुष नहीं था, तो ऐसे कुकृत्यों के समय इनके पुरुषार्थ को क्यों लकवा मार गया? यकीनन उनका यह आचरण अपनी किसी परोक्ष दुर्बलता या विवशता के कारण हुआ होगा। राज-निष्ठा की दुहाई इसमें कतई नहीं थी; जो निष्ठा, राज्य-व्यवस्था की अनीति के विरोध की शक्ति न दे, वह निष्ठा नहीं, कायरता है!
दिगविजयी योद्ध माने जानेवाले भीष्म के हस्तिनापुर से मात्र डेढ़ सौ मील की दूरी पर कंस जैसा उत्पाती राजा, न केवल जनसामान्य के जीवन को नरक बनाए हुए था; बल्कि अपने पिता तक को कैदखाने में डालकर प्रताड़ित कर रहा था, अपने विवाहित मित्र वसुदेव का विवाह जबरन अपनी बहन से करवाकर, नवविवाहित जोड़े को कैद में डाल दिया था, नवजात शिशुओं को मारे जा रहा था, पड़ोसी बस्तियों के लोग उसके उत्पात से त्रस्त था… इन सबके दैन्य पर, इन पराक्रमी योद्धाओं को कभी दया क्यों नहीं आई? ऐसी अभिलाषा इन्हें कभी हुई क्यों नहीं कि बगल का एक साम्राज्य इतने बड़े उपद्रव में जी रहा है, उनकी मदद करें? यकीनन इन्हें मानवीय समुदाय में मनुष्यता फैलाने की जिद नहीं थी, इन्हें जिद थी अपना गुनगान करवाने की। इस पाठ से हमें यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि पराक्रमियों में आत्मश्लाघा की लालसा इतनी बलवती होती है कि उन्हें चाटुकारों को सुरक्षित रखने के सिवा अन्य किसी प्रसंग में अपने पराक्रम का उपयोग करना फलदायी नहीं लगता था।
भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे योद्धा ने ठान लिया होता, तो आगे तीन पल तक भी ऐसी अनीति नहीं हो पाती, सम्भवतः महाभारत युद्ध होने की पृष्ठभूमि ही नहीं बनती। इसलिए इस पाठ का रचनात्मक उद्देश्य जन-मन को सावधान करना है कि वे ऐसे वर्चस्वलोभी सत्ताकामियों के अनुगमन में अपने जीवन-मूल्य और सम्बन्ध-मूल्य को नष्ट करने के बजाय, अपनी जीवन-दृष्टि विकसित करें।
अधिकार-रक्षण की नीति निश्चय ही पराक्रम से सम्बोधित होती है; पर राजनीति में संलिप्त सत्तालोलुप नायक और उनके रक्षक-सहायक-उपदेशक इस निष्ठा को उनके वर्चस्व की खूँटी से बाँध देते हैं। इसी बन्धन के कारण भीष्म-द्रोण-कृप पूरे जीवन नैतिकता का गीत गाते हुए भी अनैतिक पक्ष से युद्ध लड़ा। प्रतिपक्षी को विजयश्री का आशीर्वाद देते हुए भी वे किसे जिताने या हराने के लिए युद्ध कर रहे थे?...ये तीनो चाहते तो पल भर में युद्ध समाप्त हो सकता था। तीनो जानते थे कि सारी फसाद की जड़ शकुनी हैं, हस्तिनापुर के राजन्य के रूप में इन तीनो की राजकीय क्षमता इतनी और निजी शौर्य इतना ऊँचा था कि शकुनी-दुर्योधन-दुश्शासन को पल भर में मसल सकते थे! तीनो दुर्वृत्तों की हत्या न भी करते, सश्रम कारावास तो दे ही सकते थे! ऐसा कर दिया होता, तो एक बौद्धिक वंश का नाश नहीं होता, कुरुक्षेत्र युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेना के साथ चलने वाले सहायक सेवक, रसोइये, शिल्पकार, सन्देशवाहक, हथियारों के कारीगर और विभिन्न राज्यों से आए स्वयंसेवकों की हत्या नहीं हुई होती। इन हत्याओं का दायित्व इन्हीं तीनों पर तो है! इस विश्लेषण से हमें दृष्टि मिलती है कि दुनिया में दुष्कर्मियों की चेष्टा के कारण ही सारे दुष्कर्म नहीं होते, क्षमतावानों की चुप्पी और परंग्मुखता से भी होते हैं। इसलिए यह विश्लेषण हमें प्रेरणा देता है कि किसी दुर्वृत्ति को रोक सकने की क्षमता हो तो क्षमतावानों को आगे बढ़कर रोकना चाहिए।
महाभारत में दुष्कृत्यों के ऐसे-ऐसे नमूने हैं कि रोएँ सिसक उठते हैं। वनकन्या हिडिम्बा भी तो कुरुवंश की ही वधू थी, जिससे महाबली भीम ने विवाह तो किया, पर हस्तिनापुर के राजमहल में उस वधू का प्रवेश नहीं हुआ; कभी उसकी सुधि भी नहीं ली गई। जब महाभारत में उसके पुत्र घाटोत्कच और पौत्र बर्बरीक के प्राणों की बलि दिलाने का अवसर आया, बड़ी सहजता से उन महाबलियों के प्राणों की बलि ले ली गई, उसके पिता-पित्व्य द्वारा उनकी मृत्यु पर वैसे विलाप का कहीं कोई उल्लेख नहीं है, जैसा अभिमन्यु की मृत्यु पर किया गया। क्यों? वह भी तो पाण्डु-पौत्र ही था!...अर्जुन की प्राण-रक्षा के लिए कर्ण को अशक्य बनाने की कितनी चेष्टाएँ हुईं, कितने जघन्य पाप हुए? कर्ण जैसे महावीर के जिस मन्त्रसिद्ध संहारक अस्त्र से अर्जुन की हत्या होनी थी, उसे खर्च कराने के लिए घटोत्कच जैसे महावीर को आगे किया गया; उस अस्त्र का उपयोग उस पर न किया गया होता, तो सब बैठे ही रह जाते, घटोत्कच युद्ध समाप्त कर देता। पर ऐसी स्थिति में यशस्वी घटोत्कच हो जाता! जो कृष्ण को स्वीकार्य नहीं था!... युद्ध की इस नीति और लीला में फिर से कहा जाना चाहिए, कि इन सबके लिए ऋषि व्यास पर शंकालु होने का प्रयोजन नहीं है; विचार का प्रयोजन है कि महर्षि व्यास ने जिस राजकीय विधान को रेखांकित किया है, उसमें परवर्ती काल के सभी समय के बद से बदतर होते जा रहे शासकीय विधान के आदि-सूत्र सन्निहित हैं, जहाँ सब कुछ का महत्त्व, राजा के लिए, उसकी उपादेयता से निर्धारित होता है।
कूटनीतिक सम्बन्ध सुदृढ़ करने के लिए सर्वाधिक सुदृढ़ उपाय उन्हें विवाह ही लगता था। राजकीय व्यवस्था में यह स्त्री सम्बन्धी ओछी वृत्ति का सूचक था। द्रौपदी से विवाह हो जाने के बावजूद अर्जुन ने नाग-कन्या उलूपी से, फिर मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से, और फिर कृष्ण-बलराम की बहन सुभद्रा से विवाह किया। इसका क्या प्रयोजन था? स्त्रियों के सम्मान की रक्षा का गीत गानेवाले कुरुवंश के ध्वजधारियों ने कभी इस प्रसंग की कोई चिन्ता क्यों नहीं की? आज के व्याख्याकरों को इससे भी अनुदेश मिलता है कि राजवंशीय या शासकीय विधान में स्वार्थ-परमार्थ-पुरुषार्थ के कितने भी गीत गाए जाएँ, युद्ध करते समय उनकी धारणा वर्चस्व या राजनीति की ही होती है। अधिकार-रक्षण की ओट में ये सारी मनकथा रचते गए और उसी के तहत राज्य के सीमा-विस्तार के लिए या राजा के वर्चस्व-विस्तार के लिए प्रजा का उपयोग करते गए। इनमें जनपक्षधरता कभी नहीं रही। इसलिए आज पुनर्पाठ या पाठ-विश्लेषण करनेवाले विशेषज्ञों का दायित्व है कि वे अपने अनुगामियों को सही-सही बताएँ कि वे कबीर-तुलसी का व्याकरण ठीक करने के बजाय अपनी समझ दृढ़ करें; नेतृत्व वर्ग की अवान्तर धारणा से प्रेरित होकर अपनी चेतना पर कम्बल न डालें; स्पष्ट रूप से देखें कि उनके द्वारा संस्तुत मार्ग जन-हितैषी है या नहीं!
जिन नीतिज्ञों या महात्माओं ने उन्हें इतने विवाहों की अनुमति दी, उन्हें यह ज्ञान तो निश्चय ही रहा होगा, कि ऋग्वेद के विवाह सूक्त (दसम् मण्डल) में 'सपत्नी' (सौतन) शब्द मिलने से एकाधिक पत्नी प्रथा का तो समर्थन होता है; पर प्रमुखता एकनिष्ठ दाम्पत्य की पवित्रता का ही है—सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव। ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु॥ (ऋग्वेद (10.85.46) अथर्ववेद (14.01.44)। अर्थात्, हे वधू! तुम अपने श्वशुर, सास, ननद और देवरों पर 'सम्राज्ञी' जैसा अधिकार पाओ।
इस मन्त्र के अनुसार गार्हस्थ में एक मात्र सम्राज्ञी का प्रावधान है। बहुपत्नीत्व की सामाजिक मान्यता होती, तो दूसरी पत्नी के आने से यह सर्वोच्चता खण्डित हो जाती। 'सपत्नी-बाधन सूक्त' (ऋग्वेद 10.159) में सौतन (सपत्नी) की प्रयुक्ति से एकाधिक पत्नी के होने का संकेत अवश्य है, पर यह अपवाद स्वरूप। फिर उनलोगों ने किस अभिज्ञान से उन्हें इस दुर्वृत्ति की ओर जाने की अनुमति दी?...जाहिर है कि ‘राजन्यों को सब कुछ क्षम्य है’ की नीति ने इस ओर धकेला।...
राजनीतिक वर्चस्व बढ़ाने के लिए राजवंशियों द्वारा अपनाई गई इस घृणित पद्धति से शिक्षा लेने का प्रयोजन है कि राजकीय भूगोल में उपलब्ध धन-जन-मन-दारा-पशु सब कुछ को को ये राजन्य अपनी वस्तु मानते थे। राजवंशीय विधान में व्यक्ति-प्रसंग-पदार्थ का मूल्य-निर्धारण और उसके उपयोग की पद्धति से होता था। राजा देवता होते थे, राजन्यों द्वारा या उनके वरद्हस्त से हुआ हर आचरण वैध माना जाता था।
महाभारत युद्ध बेशक सम्पत्ति या अधिकार-रक्षण के लिए हुआ; पर तथ्य है कि इस युद्ध के महारथियों के भीतर अपने-अपने विक्षोभ पक रहे थे—द्रोणाचार्य जैसे महान धनुर्वेदज्ञ, बुद्धिजीवी, पराक्रमी की उपेक्षा लम्बे समय तक हुई; फिर उन्हें दिग्विजयी योद्धओं के गुरु होने का सौभाग्य मिला; पर एकलव्य का अँगूठा कटवाने और बालसखा द्रुपद को अपने आगे नतमस्तक कराने की लालसा जैसे उनके अमर्यादित कार्य ने उनके पूरे व्यक्तित्व पर स्खलन चिपका दिया है।
कुरुराजवंश के भय से गान्धार नरेश सुबल की पुत्री गान्धारी का विवाह, नेत्रहीन धृतराष्ट्र से हुआ; पति के सम्मान में गान्धारी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली, पर गान्धार कुमार शकुनी के भीतर यह नासूर बन गया। महाभारत कथा का यह पात्र, रामकथा के मन्थरा की तरह ही था, जो गान्धार त्यागकर हस्तिनापुर अगोर लिया और अपने उग्र असन्तोष का विष-वृक्ष, दुर्योधन-दुश्शासन के हृदय में बाल्यकाल में ही बोया, जो वंशनाश का कारण बना; इस विक्षुब्ध पात्र की टीस ने पूरे महाभारत की कथा में महावीर दुर्योधन-दुश्शासन को कभी अपने मस्तिष्क से सोचने नहीं दिया। यह कथा हमें आज भी निदेश देती है कि जीवन में क्रोध त्याग कर, अपनी योग्यता की पहचान सुनिश्चित कर नैतिक आचरण अपनाना चाहिए।
इस कथा का पाठ-विश्लेषण आज हमें उन अनाचारियों के वंशानुगत जाति से द्रोह रखना नहीं सिखाता; यह सिखाता है कि इतिहास-पुरुषों द्वारा हुई भूलों को हम न दुहराएँ; उसके दुहराव हमारे समाज को फिर से अनाचार की ओर ले जाएगा; प्रतिशोध की आग में जलता मनुष्य कभी भी विवेक-सम्मत आचरण नहीं अपनाता।
स्त्रियों और सवर्णेतर समाज के लोगों के साथ महाभारत कथा में लाख अवान्तर व्यवहार हुए हों; पर उनसे हमें प्रेरणा लेने की जरूरत है कि वैसी दुर्वृत्तियाँ हमारे समय में न हों; स्त्रियाँ कोई वस्तु नहीं कि हम उसे जीत कर लाएँ, जुए के दाँव पर लगाएँ, भरी सभा में निर्वस्त्र करें; प्रतिभा या कौशल जातिगत सम्पत्ति नहीं कि परीक्षण के समय प्रतिभागियों की जाति पूछी जाए, दक्षता स्वयंसिद्ध हो तो अँगूठा कटवा लिया जाए। जाग्रत विवेक स्पष्ट करता है कि उस दौर के व्यवस्थापतियों ने सोचा होता कि ज्ञान-कौशल-प्राप्ति की अनिवार्य योग्यता अभ्यर्थी की प्रतिभा, जिज्ञासा-वृत्ति, लगन और अभ्यास होती है; जाति-वंश नहीं; तो उन्हें उस युक्ति से परिचय होता कि सर्वसाधनसम्पन्न होकर भी, द्रोण जैसे सर्वज्ञ गुरु के शिष्य होने पर भी, दुर्योधन-दुश्शासन क्यों जीवन भर षड्यन्त्र रचते रहे, क्रोध की ज्वाला में जलते रहे; और परिचयविहीन-साधनहीन होकर भी एकलव्य और कर्ण क्यों इतने बड़े धनुर्धर हो गए, कि द्रोण को एकलव्य अँगूठा माँगना पड़ा, इन्द्र को कर्ण से कवच-कुण्डल माँगना पड़ा, कुन्ती को कर्ण से पाण्डवों के लिए अभदान मँगना पड़ा, कर्ण का मन्त्रसिद्ध अस्त्र खर्च करवाने के लिए कृष्ण को घटोत्कच की आहुति की युक्ति रचनी पड़ी? हमारे समय के बौद्धिकों, प्रतिभाशालियों और प्रतिभाहीनों के लिए यह कथा सचमुच इस रूप में नीति-दर्शन का प्रेरणास्पद स्रोत है, इसके विश्लेषण से इन युक्तियों का सन्देश मिलता है कि हमारा समय क्रोध-प्रतिशोध की भावनाओं से बचा रहे, नीति-विवेक का अनुगमन करे, स्त्रियों का तथा मनुष्य की प्रतिभा-योग्यता का सम्मान करे! ऐसा हो, तो निश्चय ही हम व्यवस्थित समाज के नागरिक हो सकेंगे। कुन्ती ने सही समय पर अपनी भूल सुधार ली होती, सूर्यदेव संगति से स्वयं को कर्ण की जननी होने का तथ्य प्रकट कर दिया होता, तो वैसा कुछ भी होता, जो हुआ?...
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कामधेनु तजि छेरि को छाछी पीवन जाइ
इतिहास-पुरुषों की भूलों से सामुदायिक जीवन में जैसे दुष्परिणाम दिखे हैं, उसके आलोक में हमें उनके पात्रों का प्रतिपक्षी या पक्षपाती होने के बजाय उनसे प्रेरणा लेने की जरूरत है कि हम उन परिस्थितियों से बचें। रामकथा को स्मरण कर, हम सोचें कि पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राम ने राजपाट त्याग दिया, वन को चले गए। वन में मिलने आए भरत को राजा के कर्तव्यों का स्मरण कराया। राज्य में ज्ञानियों, अध्यापकों के सम्मान और सबको समुचित न्याय मिलने की बातें पूछीं; मिथ्या आरोपों से किसी के दण्डित न होने की आश्वस्ति माँगी...!
ये स्थितियाँ हमें हिदायत देती हैं कि कि जिस राजा में ऐसा रामत्व न मिले, उसे त्यागने का संकल्प लें। उसके लिए अपने प्राण न गँवाएँ!...रचना के पुनर्पाठ से हमें जीवन की सार्थकता के अर्थपूर्ण सन्देश निकालने की जरूरत है, तैयार फरमों से अनुशासित किसी विमर्शों के फेर में कोई अवान्तर अर्थ लेना सुकर नहीं होगा, कभी नहीं हुआ है। पुनर्पाठ और पाठ-विश्लेषण की क्रिया हमें सदैव से ऐसी सद्परिणति देती आई है, देती रहेगी।
उदाहरण असंख्या हैं। प्रेमचन्द की कहानी ‘कफन’ हो, या विद्यापति की ‘पुरुष परीक्षा’ या चन्दा झा द्वारा अनूदित ‘पुरुष परीक्षा’, या भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा अनूदित ‘मर्चेण्ट ऑफ वैनिश’...सबके पुनर्पाठ से हम किसी न किसी प्रेरक प्रसंग तक जा सकते हैं। पुराने पाठ में युगीन प्रासंगिकता की खोज कर सकते हैं। हाशिए के समाज की ध्वनि सुन सकते हैं।
उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श में औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित मानसिक दासता के प्रभावों और भारतीय अस्मिता की पहचान की जा सकती है। उत्तर-आधुनिकता, स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के सैद्धान्तिक उपकरणों के उपयोग से साहित्यिक पाठ का पुनर्पाठ सम्भव है। पारम्परिक महा-आख्यान के दावों का प्रतिपक्ष रचा जाना, इन विमर्शों से सम्भव है। पाठ के भीतर दबी अस्मिताओं, शक्ति-संरचनाओं, यथार्थ के बहुस्तरीय रूपों को उद्घाटित किया जा सकता है।
‘लेखक की मृत्यु’ और ‘पाठक की सम्प्रभुता’ पर बल देनेवाला उत्तर-आधुनिकतावाद, साहित्य में किसी 'अन्तिम सत्य' की खोज नहीं करता। वह विखण्डनवाद के सहारे, उत्तर-आधुनिक पुनर्पाठ की बात करता है, यह रचना में किसी केन्द्रीय सन्देश के होने की वकालत नहीं करता, किसी स्थापित महा-आख्यान की दुहाई नहीं देता, पाठ की भाषाई परतों को खोलता है और सिद्ध करता है कि पाठ के भीतर अनेक विरोधाभास होते हैं। साहित्य में पहले, केन्द्र और परिधि के संघर्ष पर विचार नहीं होता था, कहे गए आख्यान मान लिए जाते थे। पर अब केन्द्र बनाम परिधि का दृष्टिकोण, शास्त्रीय सिद्धान्तों को चुनौती देता है। अब पुरानी रचनाओं के प्रतीकों का नए सिरे से मूल्यांकन सम्भव है। जैसे मुख्यधारा के सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमान (छन्द-रस-अलंकार-नायकत्व) को चुनौती देते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकी की कविता स्वानुभूति की प्रामाणिकता से सहानुभूति के भाव को विस्थापित करती है—
ठाकुर का कुआँ
चूल्हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की
तालाब ठाकुर का ।
भूख रोटी की
रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का
खेत ठाकुर का ।
बैल ठाकुर का
हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी
फ़सल ठाकुर की ।
कुआँ ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के
गली-मुहल्ले ठाकुर के
फिर अपना क्या?
गाँव?
शहर?
देश? — (नवम्बर, 1981)
इस कविता, या इस जैसी कविता के भाव को समेटने के लिए जाति, वर्ग और आर्थिकता को केन्द्र में लाना होगा। श्रमशील समाज को आश्वस्त होना होगा कि हल की मूठ पर पड़ी हथेली भर ही अपनी नहीं है, उस हथेली के आशीर्वाद या पराक्रम से उपजाई गई उस पूरी फसल में उनका हिस्सा है; जिसके बूते ठाकुर (सामन्तों) का जीवन मनोनुकूल सुविधा से चलता है। उनकी हथेली में चूँकि शाप देने या चाँटा मारने की क्षमता नहीं है, इसलिए वे सामन्त इनसे भयभीत नहीं होते, वर्ना तो नजरों से सदैव ओझल रहनेवाले ईश्वर की काल्पनिक छाया से भयभीत ही रहते हैं।
सामन्तों को भी सचेत होना होगा कि अस्तित्वहीनता के संकट से जूझ रहे इन वंचितों को अब और अधिक वंचित वे नहीं रख सकते। भारतीय स्वाधीनता के तीन दशक बाद सक्रिय दलित चेतना को रेखंकित यह कविता कोई वंचितों का विलाप नहीं है, वंचित समुदाय में चेतना-जगृति भरने का अक्षय स्रोत और आलोक-पुंज है। जिस तरह वे, हवा के अलावा जीवन जीने के सारे प्राकृतिक या प्रकृति-सम्भूत उपादानों और श्रमशीलों द्वारा उपजाए संसाधनों पर से उनका स्वामित्व-हरण करते आए हैं, वह अब नहीं चलेगा।
शोषक समुदाय चाहें तो इस कविता के सहारे संसाधनों के असन्तुलित वितरण की व्यवस्था के भीतर भरे अन्धकार भी देख सकते हैं, जहाँ उन्हें ‘हल की मूठ पर पड़ी हथेली’ की क्षमता का अनुमान होगा। क्योंकि ‘हथेली’ का बोध हो जाना ही उनकी जागृति का द्योतक है। क्योंकि ‘हथेली’ केवल हथेली नहीं होती, क्रियाशीलता का उपकरण भी होती है, आशीर्वाद की मुद्रा में अभयदान की कामना भी होती है, चाँटे की मुद्रा में सबक भी सिखाती है, मुट्ठी बँध जाने पर प्रतिपक्षी को चुनौती भरा पराक्रम दिखाने की पद्धति भी होती है।
काव्य-नायक, अब तक देखता रहा कि उनके घर पकी रोटी के बाजरे ठाकुर के खेत आते रहे, उसे पकानेवाले चूल्हे की मिट्टी ठाकुर के तालाब से आते रहे, खेत में बाजरा उपजाने के उपकरण (हल-बैल) ठाकुर के थे, भूसों से दानों को अलग करने का स्थान (अधिष्ठान, खलिहान) ठाकुर का था, इसलिए फसल भी ठाकुर के, कुआँ-पानी...जैसे प्राकृतिक साधन ठाकुर के, गली-मुहल्ले तक ठाकुर के, जिसमें उनके चलने-फिरने का अधिकार संयमित था, सरकारी दस्तावेजों में उन्हें जिस गाँव-शहर-देश का माना जाता रहा, उसकी पहचान भी ठाकुर के नाम...फिर उस हथेली की क्षमता तो आँकी जाएगी, जिनके श्रमफल से ठाकुर की ठाट-बाट है! इस कविता मे इसी क्षमता का सूक्ष्म संकेत है कि वह हथेली अन्न उगाने के अलावा और क्या-क्या कर सकती है? चिन्ता इस बात की भी की जाएगी कि मानवीय सम्मान और जिजीविषा के संसाधनों के सन्तुलित वितरण की व्यवस्था जब तक नहीं होगी; स्वाधीनता, लाकतन्त्र, देश, गाँव... जैसे शब्द एक बड़े जनसमूह के लिए निरर्थक होंगे।
शोषित, वंचित समुदाय पर सामन्ती समाज की आर्थिकता के ऐसे आरोपण पर यह कविता फटकार लगाती है, इस व्यवस्था पर सांघातिक प्रहार करती है। अत्यन्त सरल संरचना की इस कविता में छोटी-छोटी मारक पंक्तियों से व्यंग्य की चुभन तीक्ष्ण हो उठी है। 'ठाकुर' शब्द बार-बार आवृत्ति यहाँ किसी व्यक्ति का अर्थ-द्योतन नहीं करती; यह उस सामन्ती व्यवस्था, सत्ता, पूँजीपति और सभी संसाधनों पर नागराज की तरह फन काढ़कर बैठे शोषकों का प्रतीक है।
यह कविता राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय के खोखले दावों के समक्ष बड़ा प्रश्न खड़ा करती है कि सामान्तों के जीवन का हर भौतिक साधन जुटानेवाला नागरिक स्वयं साधनहीन-विहीन क्यों है, हथेली के सिवा उसका कुछ भी अपना क्यों नहीं है? ऐसा नागरिक इस गाँव, शहर, देश को अपना कैसे कहे, जिसका वहाँ अपना कोई अस्तित्व नहीं है?
वैश्विक पूँजीवाद, कॉर्पोरेट एकाधिकार और नागरिक अधिकारों की नई व्याख्या के समय में आकर भी यह कविता आज पुनर्पाठ द्वारा अपना स्वभाव बदल बैठी है; जहाँ 'ठाकुर' की जगह बहुराष्ट्रीय उद्योग और बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने ले ली है, जिनका एकाधिकार जीवन-यापन के हर संसाधन—पानी, जमीन, इण्टरनेट, डेटा...सब कुछ पर है। हथेली की ताकत लेकर चला हुआ नागरिक आज फिर से लघु-मानव ही है, सुबह से शाम तक काम करता है, पर मुनाफे की फसल कम्पनियों के खातों में जाता है।
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हीरा जनम अमोल कौड़ी बदलै जाय
पारम्परिक रूप से क्रूर और यथार्थवादी मानी जानेवाली कहानी 'कफ़न' में गरीबी और पुंशवादी क्रूरता का चरम रूप प्रस्तुत हुआ है। पर उत्तर-आधुनिकता, दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के उपकरणों से जाँचने पर इसके नए तथ्य उद्घाटित होते हैं --
पारम्परिक आलोचना की दृष्टि से 'कफ़न' के नायक—घीसू और माधव...परम आलसी, क्रूर, स्वार्थी और संवेदनाशून्य पात्र है। न घीसू को बहू (बुधिया) की पीड़ा का बोध है, न माधव को बीवी की पीड़ा का। उसकी मृत्यु के बाद उसके कफ़न के पैसों से दोनों शराब पीकर, पूड़ी-जलेबी खा आया।
उत्तर-आधुनिक दृष्टि इस पाठ के महा-आख्यानवादी व्यवस्था का उपहास करती है। उसकी दृष्टि में आलसी होना घीसू-माधव का स्वाभाविक दोष नहीं है, वह सामन्ती व्यवस्था के प्रति एक सचेत विद्रोह है, दिन-रात की मेहनत के बावजूद जब उसे भूखे ही सोना पड़े, तो काम करने से क्या लाभ? वे दोनो, उपलब्ध व्यवस्था में 'मेहनत और ईमानदारी' वाले महा-आख्यान को खारिज कर आलसी हो गए।
यहाँ अस्तित्ववाद और विसंगति का क्रूर चेहरा उजागर हुआ है। उत्तर-आधुनिक दृष्टि से घीसू-माधव अस्तित्ववादी पात्र हैं। बहू-बहुरिया की मृत्यु के बाद भी उनका शराबखाने में जाकर जश्न मनाना, जीवन की निरर्थकता और क्रूरता के चरम क्षण में 'अर्थ' खोजने की विसंगति भरी कोशिश है। यहाँ पारम्परिक नैतिकता का विखण्डन होता है।
दलित विमर्श के आलोकचकों की दृष्टि में 'कफ़न' में एक गैर-दलित लेखक प्रेमचन्द द्वारा दलित-छवि गढ़ने की रूढ़िवादी पद्धति है। दलित दृष्टि के पुनर्पाठ में प्रश्न उठाना सहज है कि कोई दलित परिवार, कितना भी गरीब क्यों न हो, प्रसव-पीड़ा में तड़पकर मरती हुई अपनी बहू की छोड़कर आराम से आलू नहीं भून सकता है! दलित पुनर्पाठ आरोपित करता है कि घीसू और माधव के अमानवीय आचरण के सहारे इस कहानी में दलित समुदाय की अस्मिता को ठेस पहुँचाई गई है। यह पाठ रस या करुणा पैदा करने के बजाय सामाजिक न्याय और प्रामाणिक प्रतिनिधित्व की माँग करता है।
स्त्री-विमर्श की दृष्टि में चिन्ता इस बात की है कि जिस बुधिया को पृष्ठभूमि का पात्र भर समझा गया, जिसकी मृत्यु से कहानी को गति मिली, पूरी कहानी में कराह के सिवा उसकी पास कोई 'आवाज' नहीं है। वह कोठरी के भीतर प्रसव पीड़ा से कराह रही है और बाहर दो पुरुष बैठकर उसके मरने का इन्तजार कर रहे हैं, ताकि उन्हें भरपेट भोजन मिल सके। स्त्रीवादी पुनर्पाठ दिखाता है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की देह और श्रम का उपयोग केवल पुरुषों की क्षुधा शान्त करने के लिए किया जाता है।...बुधिया इसमें दोहरे शोषण की शिकार है। वह केवल गरीब ही नहीं, एक 'दलित स्त्री' भी है। घर के भीतर वह घीसू और माधव के लिए श्रम करती है और बाहर समाज की सामन्ती व्यवस्था की शिकार होती है। जीवित रहते उसे पेट भर रोटी नहीं मिलती, और मरने के बाद भी उसकी देह 'कफ़न' और पुरुषों की तृप्ति का जरिया बन जाती है।
इस तरह पुनर्पाठ से शिक्षार्थियों को उद्बुद्ध करने के असंख्य उदाहरण हैं। वाद-विवाद और संवाद (1989) में नामवर सिंह ने सही कहा कि ‘आलोचना कोई औज़ारों का बक्सा नहीं, अक़्ल हो तो एक पेचकस ही काफ़ी है।’ इस कथन का अभिप्राय है कि किसी पाठ की समालोचना अथवा पुनर्पाठ के लिए बहुत सारे उपकरणों का मेला लगाने की जरूरत नहीं है; सही और विवेकसम्मत अर्थान्वेष की पद्धति अपनाकर किसी मामूली समझ के उपयोग से भी जरूरत भर अर्थ-सन्धान कर लिया जा सकता है। जैसे सन् 1972 में प्रकाशित कुबेरनाथ राय (ज. 1933) का तीन गुच्छों में विभक्त कुल बाइस निबन्धों के संग्रह का शीर्षक लेखक ने 'गन्धमादन' दिया। इस 'गन्धमादन' शब्द का अभिप्राय अन्योक्ति (सीधे न कहकर, प्रतीकों के सहारे बात कहने पद्धति, प्रस्तुत के माध्यम से अप्रस्तुत का बोध कराना) के सहारे स्पष्ट होगा। इसका अभिप्राय हुआ ‘अपनी सुगन्ध से मदमस्त कर देनेवाली कृति’। अर्थात्, इसके अवगाहन से भावक को वैसी मुग्धता मिले, जैसी गन्धमादन पर्वतमाला के भ्रमण से मिल सकती है। अर्थात्, जिस कृति में संकलित निबन्धों के अवगाहन से भावकों को संजीवनी बूटी जैसी औषधियों के संजीवक तत्त्व का बोध हो; अर्थात्, गन्धमादन पर्वत, मनुष्य की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जो आज के भौतिकवादी युग में अपनी जड़ों से कट चुके लोगों को, आत्मिक शान्ति दे सकती है। मनुष्य अपने मूल की पहचान कर ले, तो इस 'सांस्कृतिक सुगन्ध' के प्रभाव से आनन्दित हो सकता है। इस कृति में कुबेरनाथ राय ने अपने इसी सांस्कृतिक मूल्य का विश्लेषण किया है। पौराणिक कथाओं के इस दिव्य पर्वत, जहाँ संजीवनी जैसी औषधियाँ पाई जाती हैं, उसके रूपक से कुबेरनाथ राय ने अन्योक्ति द्वारा यह जताने की चेष्टा की है कि इन निबन्धों का अवगाहन कोई मामूली बात नहीं, लोग इसे सही अर्थों में पढ़कर समझ लें, तो निश्चय ही वे अपने मूल की तलाश के लिए उत्सुक होंगे। ‘राघव करुण रसः’ जैसे शाश्वत मूल्य का निबन्ध भी इसी संग्रह में है।
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