मैथिली में अनुवाद की क्रिया
सामुदायिक ज्ञानाकुलता शान्त करने के लिए अनुवाद-कार्य सदैव से प्रभावी रहा है। ज्ञान-क्षेत्र में फैले भाषिक वर्चस्व मिटाकर लोकतन्त्रिक वातावरण कायम करने में इसकी विशिष्ट भूमिका है। बहुभाषिक समाज में भाषिक वर्चस्व भी एक खास तरह की सामन्तशाही फैलाता है। भारत में ज्ञान-सम्पदा पर कुछ खास समूह का वर्चस्व प्राचीन काल से बना रहा। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ऋचा संकलित होने की प्रथा-पद्धति, उपनिषद-ब्राह्मण-आरण्यक रचे जाने के प्रयोजन, निघण्टु-निरुक्त के इन्तजाम से जो कोई परिचित हैं; और वैदिक संस्कृत से लेकर लौकिक संस्कृत की ओर बढ़नेवाले अग्रणी विद्वानों की भूमिका से जो लोग अवगत हैं; वे सहजता से मानेंगे कि अनुवाद ने ज्ञानाकुल समाज की भाषिक अक्षमता को निष्प्रभ कर दिया। भाष्य, टीका, वार्तिक, व्याख्या, अन्वय...द्वारा जनसामान्य के लिए प्राचीन ज्ञान-सम्पदा सुलभ कराने का कार्य जिन मनीषियों ने किया; उनकी दूरदर्शिता का स्मरण आदरपूर्वक किया जाना चाहिए।
बौद्ध साहित्य के प्रचार-प्रसार के समय में भाषिक सामन्तशाही के दुर्ग भली-भाँति टूटे और ज्ञान सम्मत बात विभिन्न जनपदों की लोकभाषा में होने लगी। मैथिली में खास यह प्रथा विद्यापति के समय में शुरू हुई, जब उन्होंने ‘देसिल बयना सब जन मिट्ठा’ की घोषणा करते हुए रचना की। पर यह तो मूल रचनाशीलता की बात हुई। अनुवाद की बात इससे सम्बद्ध रहते हुए भी अलग है। भारतीय साहित्य की अन्य दिशाओं में भी, अर्थात् भक्ति-आन्दोलन के समस्त कवि -- वसवन्ना, कबीर, रैदास, नामदेव, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, अक्का महादेवी, चण्डीदास आदि के रचना-सन्धान में इस भाषिक सामन्तशाही को निरस्त कर मानवीय सम्बन्ध के नए आयाम विकसित हुए हैं; जहाँ ज्ञान, भक्ति और भाषा को आम लोगों का अधिकार क्षेत्र समझा गया। ध्यातव्य है कि कृतिवास, कम्बन जैसे महान कविगण उसी दौर में हुए। रामायण, महाभारत के अनेक अनुवाद अनेक भाषाओं में उसी दौर में हुआ; जिनमें से अधिकांश अपनी-अपनी भाषा के मौलिक ग्रन्थ माने जाते हैं। बहुत बाद में और कर मैथिली में भी चन्दा झा द्वारा ‘मिथिला भाषामय रामायण’ और फिर लालदास द्वारा ‘रमेश्वरचरित रामायण’ की रचना हुई। कहना कठिन है कि इन ग्रन्थों को अनुवाद माना जाए या मूल। तथ्यत: यह स्थानीय जन-मन की संस्कृति और भाषा-विधान में आत्मसातीकरण (एप्रोप्रिएशन) है। स्वीकार्य हो कि मैथिली के आधुनिक कथा-साहित्य के उद्भव और विकास में भी अनुवाद का प्रचुर योगदान है।
बात फिर वहीं आ पहुँची कि बहुभाषिकता के कारण समाज में जो अपरिचय की स्थिति उत्पन्न हुई और सांस्कृतिक संचरण-सम्मिलन-संवर्द्धन के मार्ग में जो अवरोध आए; उसे सामाप्त करने में अनुवाद-कौशल वरदान साबित हुआ। विदित है कि अनुवाद में एक प्रतीक-व्यवस्था में व्यक्त सन्दर्भ को दूसरी प्रतीक-व्यवस्था में लाया जाता है। प्रतीक-व्यवस्था का यह कायान्तरण मात्र शब्दार्थ के माध्यम से सम्भव नहीं होता। अनुवाद करते समय विषय-वस्तु के साथ-साथ मूल भाषा की संस्कृति और वातावरण का भी कायान्तरण होता है। हम भली-भाँति जानते हैं कि हर पाठ, एक सुसम्बद्ध भाषा में अनुगुम्फित रहता है, किन्तु इसी कारण वह भाषा मात्र नहीं होता। भाषा, स्वयं जनपदीय संस्कृति का एक प्रमुख अंग है; पाठ के सम्प्रेषण में जिस भाषा संरचना का उपयोग होता है, उसमें जनपदीय जीवन का अतीत बसा रहता है; भाषा में प्रयुक्त बिम्ब-प्रतीक-मुहावरों का जन्म सामुदायिक जीवन की क्रियओं में ही हुआ रहता है। इसलिए ध्यातव्य है कि हर भाषा में लिखे गए पाठ में वहाँ की संस्कृति प्रवाहित रहती है। अनुवाद करते समय इन बातों का ध्यान रखना अनिवार्य होता है।
कुछ दशकों से भारत में अनुवाद-कार्य और अनुवाद-चिन्तन पर गम्भीरता से विचार-विमर्श होने लगा है। इसी विचार-वीथि में कुछेक ‘अति सचेष्ट’ अंग्रेजीदाँ और कुछेक अलस-भाव के भारतीय बुद्धिजीवी जोर-शोर से कहने लगे कि भारत में अनुवाद-कार्य भले ही प्राचीन समय से होता रहा हो, पर अनुवाद-चिन्तन की कोई व्यवस्थित परम्परा नहीं रही। विस्मयकर है कि औरों की पारम्परिक भव्यता के मूल ढूँढने में संलिप्त भारतीय विद्वानों को असीरिया के राजा सरगोन की बहुभाषी विजय-घोषणा में, ई.पू. चार-पाँच सौ के आसपास हिब्रू भाषा के प्रवचनों का आर्मेइक भाषा में अनुवाद करवाकर समझने के यहूदी उद्यमों में, ई.पू. तीन हजार के प्राचीन मिस्र के द्विभाषी शिला-लेख में, ई.पू. 2100 के आसपास के राजा हम्मूरावी के बहुभाषी आदेशोद्घोषणा में उनकी अनुवाद-परम्परा की प्राचीनता अवश्य दिखी; अपने यहाँ वैदिक ऋषियों द्वारा शिष्यों को ऋचा के अन्वय समझाने में, ऋचाएँ कण्ठाग्र कराने के लिए कराए गए अनुवचन, अनुकथन में अनुवाद-चिन्तन की प्राचीनता नहीं दिखी।
इधर के दशकों में अनुवाद-कौशल के स्वरूप अवश्य सुस्थिर हुए, पर दुनिया भर की छोटी-छोटी घटनाओं से इसके उद्भव-विकास के पुराने स्रोत का अनुसन्धान कोई अनुचित भी नहीं। वर्तमान समय में अपनी कार्य-दक्षता को पुष्ट करने के लिए, क्षमता-संवर्द्धन के लिए अपनी प्राचीन परम्परा को स्मरण करना सर्वथा उचित और कृतज्ञता-बोध के लिए अनिवार्य आचरण है। इस आचरण को सकारात्मक माना जाना चाहिए। पर इस कृतज्ञता-ज्ञापन में एकांगी हो जाना अनुचित है। भारतीय पद्धति से अपनी सोच-समझ विकसित करनेवाले विद्वानों के लिए गौरतलब है कि भारतवर्ष की अनुवाद-चिन्तन-परम्परा सर्वाधिक प्राचीन है।
नौवीं-सोलहवीं शताब्दी के बीच इंगलैण्ड में अनुवाद की व्यवस्थित परम्परा कायम हो गई थी; इधर मुगल शासन-व्यवस्था में बाबर, हुमायूँ के समय में भारत में भी यह कार्य व्यवस्थित ढंग से हुआ। अकबर (सन् 1542-1605) और दाराशुकोह (सन् 1615-1659) के समय में अनुवाद के क्षेत्र में हुए विलक्षण कार्य आज भी स्मरणीय हैं । किन्तु उससे कई शताब्दी पूर्व बौद्ध-साहित्य और बुद्ध-वचन का प्रचार-प्रसार चीन से श्रीलंका तक तेजी से हुआ, सम्राट अशोक (सन् 304-232) के समय में इसका प्रचार-प्रसार विराट स्तर पर हुआ। फिर तो दुनिया भर के देशों में बुद्ध-वचन प्रसारित हुए। बाद के दिनों में फिर अश्वघोष (सन् 80-150) का काल भी मुख्य रूप से ध्यातव्य है, जिनकी जनोन्मुखी कृतियों के अनुवाद हुए।
भारतीय अनुवाद-चिन्तन की परम्परा को ध्यान में रखते हुए, उसकी सुव्यवस्था की ओर स्वाभिमान से देखते हुए, इसकी प्राचीनता पर भी विचार होना चाहिए। उल्लेख प्रासंगिक होगा कि अरस्तू का अनुवाद करते हुए जरा-सी छूट लेने के अपराध में, फ्रांस के महान अनुवाद-चिन्तक एतीन दोले (सोलहवीं शताब्दी) को फाँसी दे दी गई। ऐसी बर्वरता के आलोक में वहाँ की अकादेमिक नीति पर चिन्ता व्यक्त होनी चाहिए। ऐसी प्रथा भारत में रही होती तो सम्भवत: कम्बन, तुलसीदास, कृतिवास, चन्दा झा, लाल दास...समेत भक्ति-आन्दोलन के सभी सन्त कवियों को फाँसी दे दी गई होती। पर सुकर है कि भारतीय अनुवाद परम्परा पर्याप्त उदार, दीर्घ और सतर्क है।
अनुकथन, अनुवचन, अन्वय, टीका, सारानुवाद, भावानुवाद...सब कुछ अनुवाद की विविधता और प्राचीनता के प्रारम्भिक रूप हैं; जो भारतीय अनुवाद परम्परा के क्रमिक विकास और भारतीय अनुवाद-चिन्तन की व्यावहारिक समझ को रेखांकित करते हैं। अनुवाद-क्रिया का जैसा स्वरूप आज हमारे समक्ष है, उसमें हमारे पूर्वजों और समकालीन विद्वानों के दीर्घकालीन अनुभव, चिन्तन, प्रेक्षण और विचार शृंखला मूर्त हैं। इस क्रम में विधान्तरण की गणना भी अनुवाद-कार्य में ही होगी। मूर्ति, चित्र अथवा रंगकर्म में पाठ का रूपान्तरण भी अनुवाद माना जाएगा। इसी तरह उपन्यास और कहानियों के नाट्य रूपान्तरण, अथवा पद्यानुवाद अनुवाद माने जाएँगे। नाट्यालेख का मंचन अथवा नृत्य में प्रस्तुत भंगिमा अथवा संवाद-वाचन द्वारा भाव-प्रस्तुति भी अनुवाद मानी जाएगी!
भारतीय ज्ञान-शृंखला पर संस्कृत का भाषिक वर्चस्व प्राचीन काल में था; जो ब्रिटिश-शासन और स्वातन्त्र्योत्तर काल में अंग्रेजी के वर्चस्व में परिणत हो गया। भाषिक वर्चस्व के इस दुर्ग को तोड़ने का प्रयास फिरंगी हुकूमत में ही शुरू हो गया था। मराठी, बांग्ला और हिन्दी में इस दिशा में पर्याप्त प्रयास हुए; जो बाद के समय में अन्य भाषाओं में भी बढ़े, पर वे प्रयास यथेष्ट सफल नहीं हुए। पचास-साठ वर्ष पूर्व तक ज्ञानोन्मुख पाठों के आधुनिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद की स्थिति सन्तोषजनक नहीं थी। यहाँ ज्ञानोन्मुख पाठ का तात्पर्य ‘नॉलेज ओरिएण्टेड टेक्स्ट’ से है। अर्थात् शैक्षिक, अकादेमिक उत्थान के लिए जिस पाठ का अध्ययन-मनन किया जाए। इन पाठ को ज्ञानोन्मुख कहने का अभिप्राय यह कदापि नहीं कि अन्य पाठ ज्ञान-विमुख हैं। ज्ञान और जानकारी तो कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक, समाजशास्त्र, अखबार, पत्रिका...सब कुछ पढ़ते होता रहता है। इस कोटि में वैसे पाठ आते हैं, जो पाठ्यक्रम में हो अथवा जिसके अध्ययन-अनुशीलन की योग्यता जाँचकर अकादेमिक उत्थान होता हो अथवा लोग हुनरमन्त होता हो, कौशल का विकास होता हो।
शैक्षिक जगत में सर्वाधिक विस्तार विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हुआ है। साइबर युग के प्रवेश के कारण एलेक्ट्रॉनिक रूप से ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में इतना विस्तार आया है कि सामान्य दिनचर्या तक के अधिकांश प्रकरण में तकनीकी शिक्षा का प्रवधान हो गया है। अभियन्त्रण, चिकित्सा, विद्युत, रसायन आदि के क्षेत्र में तो बहुत समय से यह व्यवस्था थी; विगत तीन-चार दशकों से डिग्री, डिप्लोमा के अनेक फलक स्पष्ट हुए हैं। संचार माध्यमों में भी अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। वैज्ञानिक क्षेत्र में निरन्तर अध्ययन, अनुशीलन, अनुसन्धान, चिन्तन और आविष्कारपरक लेखन हो रहे हैं। ये सारे लेखन अंग्रेजी अथवा अन्य विदेशी भाषाओं -- रूसी, फ्रेंच, जर्मन, चीनी इत्यादि में हो रहे हैं । यहाँ तक कि भारतीय लेखक भी इन विषयों पर अंग्रेजी में पुस्तक लिखना पसन्द करते हैं। इतिहास, समाजशास्त्र, संस्कृति, चिन्तन, वैचारिक शोध से सम्बद्ध पुस्तकें भी अंग्रेजी में ही लिखी जाती हैं। ऐसी स्थिति में स्वीकार करना मुनासिब होगा कि स्थिति ब्रिटिश-काल से थोड़ी बेहतर अवश्य है, पर बहुत सुखद आज भी नहीं है।
इन परिस्थितियों में एक बार फिर से भाषिक सामन्तशाही के विरुद्ध नए आन्दोलनात्मक स्थिति का प्रयोजन भारत में होने लगा। अनुवाद कार्य की प्रगति और कुछेक समझदार लोगों के भाषिक अनुराग के कारण इस दिशा में सुगबुगाहट हुई, जागरूकता आई। पर मातृभाषाओं में अनुवाद के क्षेत्र में दो मूल समस्याएँ फिर भी पहाड़ बन खड़ी रही -- बेहतर एवं नैष्ठिक अनुवादकों अभाव और तकनीकी शब्दावली का अभाव।
स्मरणीय है कि हमारे पूर्वजों ने उद्देश्य-पूर्ति के लिए बड़ी निष्ठा से अनुवाद-कार्य की शुरुआत की। ऐसा करते हुए उनके समक्ष राष्ट्र, क्षेत्र, भाषा और विषय के प्रति अनुराग था। निष्ठा और लगन से यह कार्य किया। गत चारेक दशकों से भारत में यह उद्यम धनार्जन का माध्यम बन गया है। ऐसा मैथिली में भी हुआ। अधिकांश अनुवादक उस मर्म से परांग्मुख हो गए, जिसके तत्त्वावधान में यह कार्य शुरू किया गया था। इनमें कार्य के प्रति अनुराग, न के बराबर रहा; इनके लिए यह कार्य या तो ड्यूटी (कर्तव्य नहीं) बनी या वाणिज्यिक उद्यम। इस कर्म में इनकी ममतामय संगति न तो लक्ष्य-भाषा के सन्दर्भ से रही, न स्रोत-भाषा के सन्दर्भ से। उन्हें लगा कि वे दोनो भाषा जानते हैं, इसलिए अनुवाद कर सकते हैं। भाषाओं की सांस्कृतिक समझ उनके लिए किसी भी तरह विचारणीय नहीं रही। दोनो भाषाओं के लक्षित पाठकों की आवश्यकता, मूल लेखक के अभिप्रेत की रक्षा के लिए वे कदापि चिन्तित नहीं रहे। मैथिली के अनुवादक तो सेतु भाषा से मैथिली में अनुवाद करने लगे। अनुवाद में सेतु भाषा का उपयोग कोई अपराध भी नहीं है, पर जिन कृतियों का अनुवाद हिन्दी में उपलब्ध हो, उसका अनुवाद मैथिली में करने की जरूरत क्यों हो?
भारतीय भाषाओं में पारस्परिक अनुवाद की दिशा में एक समस्या मानदेय की भी है। इस कार्य के लिए मानदेय इतना अभद्र है कि कोई नैष्ठिक अनुवादक इस दिशा में आगे नहीं आते। इसलिए यान्त्रिक अनुवाद प्रस्तुत कर भुगतान ले लेना अपना परम-चरम कर्तव्य समझते हैं। कहा नहीं जा सकता कि भारतीय अनुवाद की इस विराट विडम्बना की कमर कौन तोड़ेगा?
इसके बाद का प्रमुख अवरोध तकनीकी और पारिभाषिक शब्दावली में एकरूपता के अभाव का है। मैथिली समेत अधिकांश मातृभाषाओं में पारिभाषिक शब्दावली नहीं बन पाई है। फलस्वरूप सामान्य शब्दकोश से कोशीय अर्थ निरूपित कर अनुवादक आगे बढ़ जाते हैं। इस कारण पूरे पाठ में पारिभाषिक शब्दों की एकरूपता नहीं बन पाती है; पाठ का मर्म समझने के लिए फिर से अंग्रेजी पाठ का सहयोग लेना पड़ता है। हिन्दी में जो पारिभाषिक शब्दावली तैयार हुई है, एक तो उसका उपयोग बहुत कम होता है, संयोगवश कहीं हो भी जाए तो उसमें प्रयुक्त शब्दों के पर्याय को इतना जटिल बनाया गया कि वह लोकोपयोगी नहीं है। स्वयं को सम्भ्रान्त (इलीट) साबित करने और अंगेजी से द्रोह करने की उत्तेजना में विषय-विशेषज्ञों ने शब्द-संचयन के समय ऐसा जौहर दिखाया कि लोक-भाषा की कौन कहे, वे लौकिक संस्कृत तक को छोड़कर वैदिक संस्कृत की ओर प्रयाण कए गए। अनुवाद-प्रेमियों को डर है कि कभी कोई पारिभाषिक शब्दावली मैथिली में सामने आई, तो उसका हाल इससे भी बदतर होगा। कारण, मातृभाषा का विकास शास्त्र से नहीं, लोक से होता है; सूत्र से नहीं, प्रयोग से होता है; सिद्धान्त से नहीं, व्यवहार एवं प्रयुक्ति से होता है। बिहार के उन्नीस-बीस जिलों के अलावा भारत एवं नेपाल के विभिन्न भूभागों में बसे जिन पाँच करोड़ से अधिक मैथिलों की मातृभाषा मैथिली है; उनका भाषिक बोध वैदिक संस्कृत के विधान से नहीं लोकाचार के प्रयोजन से विकसित हुआ है।
अनुवादक, प्रकाशक अथवा शिक्षा जगत के नियन्ताओं की यह उक्ति निरर्थक है कि ‘भारतीय भाषाओं में तकनीकी और अकादेमिक पुस्तकें लोग पसन्द नहीं करते’। वे आश्वस्त रहें कि बेहतर अनुवाद उपलब्ध हो तो लोग अवश्य पढ़ेंगे।
मैथिली से अन्य भारतीय या अभारतीय भाषाओं में अनुवाद-कार्य तो स्वातन्त्र्योत्तर काल में बढ़ा, पूर्व-काल के स्रोत सूखे-से ही हैं; किन्तु अन्य महत्त्वपूर्ण भाषाओं की विशिष्ट कृतियों का मैथिली में अनुवाद करीब दो शताब्दियों से हो रहा है; जिसके क्रम-भंग का मूल कारण मैथिली में प्रकाशन-संस्था का अभाव भी था। साहित्य अकादेमी में मैथिली पुस्तकों के प्रकाशन की शुरुआत और मैथिली अकादेमी पटना की स्थापाना से यह उद्यम पुनर्जीवित हुआ। इससे पूर्व कुछेक आग्रही भाषानुरागी कुछ कर लिया करते थे। पर इस पूरे परिदृश्य में जिन पाठों के अनुवाद प्रकाशित हुए, वे सब के सब वैदिक-पौराणिक साहित्यिक सामग्री हैं। संस्कृत या कि अन्य किसी भारतीय भाषा से ज्ञानोन्मुख पाठ का अनुवाद मैथिली में नहीं हुआ। उद्योगपूर्वक और उदारतापूर्वक विचार करने पर ज्ञानोन्मुख पाठ में किसी तरह ‘संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र’ (अनुवादक : ताराकान्त झा, मूल लेखक : गोपीचन्द नारंग), ‘भारतक भाषा सर्वेक्षण’ (अनुवादक : कुलानन्द मिश्र, मूल लेखक : जार्ज ग्रियर्सन), ‘बिहारक ग्राम्य जीवन’ (अनुवादक : भीमनाथ झा, मोहन भारद्वाज, मूल लेखक : जार्ज ग्रियर्सन), ‘अन्तरिक्ष में विस्फोट’ (अनुवादक : सुरेश्वर झा, मूल लेखक : जयन्त नार्लीकर) की ही गिनती की जा सकती है। इनमें भी पारिभाषिकता का बहुत अवसर नहीं है; इसलिए इनके अनुवाद में उतनी ही समस्या उत्पन्न हुई होगी, जितनी सांस्कृतिक द्वन्द्व के कारण किसी भी पाठ के अनुवाद में होती है।
कई वर्ष पूर्व ‘राष्ट्रीय अनुवाद मिशन’ ने ज्ञानाश्रित विषयों से सम्बद्ध अनेक दर्जन पुस्तकों का मातृभाषाओं में अनुवाद करवाकर प्रकाशित कराने का निर्णय लिया, इनमें रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, चिकित्साशास्त्र, कम्प्यूटर तकनीक, अभियन्त्रण, प्रौद्योगिकी, सूचना-संचार, साइबर-संकेत, कृषि विज्ञान आदि विषय से सम्बद्ध अनेक पुस्तकें होंगीं। इस निर्णय ने अन्य मातृभाषानुरागियों समेत मैथिलीभाषियों को भी प्रसन्नता दी; पर उसका हुआ क्या, यह जानना अभी शेष है। आशंका व्यक्त की जा सकती है कि इनके अनुवाद-कार्य का दायित्व किसी टपोरी ठेकेदार को सौंप दिया गया होगा, खानापूर्ति हो गई होगी। विगत दो तीन महिनों में जो मैथिली में अनूदित कुछेक पाठ (छपनेवाला भी और ऑनलाइन अपलोड होनेवाला भी) पुनरीक्षण के लिए सामने आया, देखकर हैरत में पड़ गया। मैं सोचने लगा कि लगा मुझे जिस मैथिली का लेखक-समालोचक-अनुवादक लोग मानते हैं, मैथिली वह है, या मैथिली यह है!
वस्तुत: मैथिली में अभी तक यह विवेक विकसित नहीं हुआ है कि जिस कार्य की योग्यता न हो, उसमें हाथ न लगाएँ। सन् 1985 में उच्च माध्यमिक शिक्षा के भौतिक विज्ञान की एक पुस्तक का मैथिली अनुवाद करने का प्रस्ताव मुझे एक ठेकेदार महोदय ने दिया। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, पर इस ईमानदारी के लिए वे प्रणम्य हैं कि उन्होंने कहा कि काम तो मेरी बेटी के नाम से आवण्टित हुआ है, पर वह भौतिक विज्ञान नहीं जानती। इसलिए आप इसका अनुवाद कर दें...। प्रार्थना की जानी चाहिए कि आगे के कार्य जिन ठेकेदारों को मिले, उनमें कम से कम इतनी ईमानदारी बची हो।
तकनीकी और वैज्ञानिक विषयों का मैथिली में अनुवाद करते समय विकराल समस्या उत्पन्न होना सुनिश्चित है। कारण, मैथिली लिखने के लिए मैथिलीभाषी होना ही पर्याप्त नहीं है। मैथिली में संवाद करनेवाले सारे लोग मैथिली लिख नहीं सकते। स्पष्ट है कि जिन्हें तकनीकी विषयों का बोध है, वे मैथिली नहीं लिख नहीं पाएँगे, और जो मैथिली लिख पाएँगे, उनमें से अधिकांश को तकनीकी विषयों का बोध परिपूर्ण नहीं होगा। इस दिशा में साझा-अनुवाद किए जाने का मार्ग फलदायी हो सकता है। पारिभाषिक और तकनीकी शब्दावली की प्रयुक्ति में मैथिली के अनुवादकों को पाठ और लक्षित भावकों की बौद्धिकता के प्रति विवेकशील और संवेदनशील होना चाहिए। मैथिली भाषा की पाचनशक्ति और समावेशी नीति पर्याप्त उदार है, सदैव से विदेशज शब्दों को पचाकर अपनाती रही है। माहटर बाबू, लालटेम, कम्पूटर, तातिल, बहाया, बेखसमा...जैसे असंख्य शब्द मैथिली में पच गए हैं। इसी तरह अन्य शब्दों को भी पचाया जा सकता है। मूल शब्द को घिसकर नया शब्द गढ़ा जा सकता है। रेलवे स्टेशन के लिए धूम्र शकट विश्रामालय, रेलगाड़ी के लिए लौहपथगामिनी जैसे शब्द गढ़कर अपना और अपनी मातृभाषा का उपहास नहीं करना चाहिए। चिकित्सा-शास्त्र के पाठ का अनुवाद करते समय टेट्रासाइक्लिन का अनुवाद चतुष्चक्रीय करने लगेंगे, तो विद्रूप परिस्थिति उत्पन्न होगी। आज-कल अनुवाद-कार्य में इन बातों की पर्याप्त छूट है कि जिस शब्द का पर्याय आपकी भाषा में नहीं है, उसे उसी रूप में अपनी लिपि में लिख कर पचा लें। अनुवाद ऐसा करें कि उसका अभिप्राय स्पष्ट हो जाए। इस कोटि के अनुवाद में अनुवादकों को हरदम लक्षित पाठक-वर्ग की चिन्ता रखनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जब प्रान्तीय भाषाओं को जगह दी जा रही थी, तब एक धारणा यह भी थी कि जिन प्रतीक-व्यवस्थाओं के लिए हिन्दी में शब्द-पर्याय नहीं मिले, वहाँ प्रान्तीय भाषाओं से शब्द ले लिए जाएँ। पूर्व में भी कहा गया कि शब्द-सम्पदा, प्रतीक-व्यवस्था और लोकोक्ति-मुहावरा तो जनपदीय उपज है! जो यन्त्र मिथिला में बना ही नहीं, उसका नामकरण-संस्कार मैथिली भाषा में कैसे हो! मिथिला और मैथिली तो प्रारम्भिक समय से ही तीन वाक्यों के वार्तालाप में दूसरों को अपना कुटुम्ब मानती आई है, फिर अपने क्रियापदों के साथ तीन बार लिख कर किसी परदेशी शब्द को अपना शब्द क्यों नहीं मानेगी?
गत दो दशकों से, या कहें कि संविधान में मैथिली की भाषिक स्वीकृति के बाद से कुछेक ऐसे उत्साही लोगों को ‘पावर’ (यहाँ ‘क्षमता’ शब्द का उपयोग जान-बूझकर नहीं कर रहा हूँ) मिल गया है, जो भाषिक सामन्तशाही से अभिभूत हैं। अपने क्षमताविहीन रिश्तेदारों को अर्थलाभ कराने के लिए आँखें मूँदकर अनुवाद-कार्य आवण्टित करने लगे हैं। स्रोत-लक्ष्य दोनों ही भाषाओं की सूक्ष्मता को जाने बिना ढेरो अनुवाद हुए, मैथिली के सामन्तों ने उसका मूल्यांकन किया; राष्ट्रीय संसाधनों का दुरुपयोग किया; भाषिक गरिमा को क्षरित किया ...। विचारणीय है कि राष्ट्रीय सरोकार और भाषिक सरोकार सुनिश्चित किए बिना किसी अनुवादक को इस क्षेत्र में पाँव नहीं रखना चाहिए। मैथिली से या मैथिली में अनुवाद करनेवाले अनुवादकों की संख्या तो इन दिनो बहुत है, पर उनमें से कितनो की राष्ट्रीय और भाषिक नीति स्पष्ट है, कहना कठिन है।
सांस्कृतिक युक्तियों-प्रयुक्तियों, मुहावरों, लोकोक्तियों जनपदीय सरोकारों, क्षेत्रीय अस्मिताओं के विशेष सन्दर्भ के कारण उक्त सारी समस्याएँ उपस्थित होती हैं; जिसका निराकरण पाठ और लक्षित भावक के अनुमानित ज्ञानलोक के आलोक में सारे ही अनुवादक करते हैं; मैं भी करता रहा हूँ। सांस्कृतिक सन्दर्भ निश्चय ही अनुवादक के समक्ष जटिलता उत्पन्न करते हैं, पर इस कारण अननुवाद्यता (अनट्रांसलेटेबिलिटी) के समक्ष घुटने टेक देना मुनासिब नहीं है। अनुवादक वैसे महासेतु के निर्माता होते हैं जो ज्ञानकुल और ज्ञानसम्पन्न समुदायों के बीच संवाद स्थापित करता है। उसके जीवन की सफलता इसी में है, सामाजिक संसाधनों से अपने विकास के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करने का कर्तव्य वह इसी रास्ते निभाता है। अननुवाद्यता का गीत गाने से अनुवाद का उद्देश्य नष्ट हो जाएगा, इसलिए इस पदबन्ध की अपरिहार्यता के बावजूद इससे मुठभेड़ अनिवार्य है। अननुवाद्यता के कारण कठिनाई बेशक आए, असम्भाव्यता नहीं आती; यदि आती है, तो मानना चाहिए कि अनुवादक दुर्बल है, उनमें वैदुष्य का अभाव है।
अनुवाद का उद्देश्य ही होता है एक भाषा में उपजे ज्ञान-संसाधन को अपनी भाषा में लाकर, अपनी भाषा के उपयोक्ताओं को ज्ञान-सुख देना। अनुवाद साहित्यिक-सांस्कृतिक पाठ का हो या दार्शनिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, संसदीय, वैधानिक पाठ का... वह सन्देश और ज्ञान का संचार अधिकतम भावकों, उपयोक्ताओं तक करने का कार्य करता है। अनुवाद-कार्य के दीर्घकालीन अनुभवों से कौशल पुख्ता करते हुए यही सीख पाया कि अनुवाद-कार्य का हर बौद्धिक उद्यम अनन्तिम ही होता है, पूर्ण और अन्तिम कभी नहीं होता। कुछ वर्ष पूर्व किए गए अपने ही अनुवाद को कोई अनुवादक आज फिर देखें तो उन्हें उसमें सुधार की गुंजाइश दिखेगी। महान और कालजयी पाठों के अनुवाद में तो यह समस्या और भी बढ़ जाती है। वैज्ञानिक प्रगति और सभ्यता-विकास के क्रम में बदलते समय के साथ-साथ सामुदायिक जीवन का आचार-विचार, रीति-रिवाज, रहन-सहन, शील-सभ्यता, राग-विराग परिवर्तित होता रहता है। जीवन-पद्धति बदलती रहती है। इस परिवर्तन-शृंखला में मनुष्य के लिए उपादेय संगत भाषा और साहित्य के उपयोग की पद्धति भी बदलती रहती है। अठारहवीं शताब्दी में मिथिलांचल की शासकीय क्रूरता देखकर महाकवि मनबोध द्वारा ‘कृष्ण-जन्म’ (व्यास रचित कृष्ण-कथा का आत्मसातीकरण) महाकाव्य की रचना; मैथिल-जन को स्वाधीनता संग्राम का सन्देश देने के लिए कवीश्वर चन्दा झा द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में विद्यापति रचित ‘पुरुष परीक्षा’ का मैथिली अनुवाद और ‘मिथिला भाषामय रामायण’ (वाल्मीकि रचित रामायण का आत्मसातीकरण) की रचना; बीसवीं शताब्दी में तन्त्रनाथ झा द्वारा ‘कीचक वध’ महाकाव्य, काशीकान्त मिश्र मधुप द्वारा ‘राधा विरह’ महाकाव्य, कांचीनाथ झा किरण द्वारा ‘पराशर’ खण्डकाव्य की रचना ... कालजयी कृतियों का आत्मसातीकरण या अनुवाद या पुनर्रचना मात्र नहीं है; बल्कि पूर्वजों का सहयोग लेकर समसामयिक सन्दर्भों को रेखांकित करने का सार्थक उद्यम है। यहीं आकर अनुवादकों की अनुवाद-नीति और सामाजिक दायित्व मुखर हो उठता है। कहना मुनासिब होगा कि समाज और समाज में व्याप्त राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, शासकीय वातावरण को रेखांकित करने की पद्धति बन जाता है।
भाषा की युक्तियों में जनपदीय जीवन-व्यवहार, आचार-विचार, सम्बन्ध-सरोकार, रीति-नीति के तौर-तरीके अनुस्यूत होते हैं। ये स्थानीय प्रयुक्तियाँ औरों से भिन्न होती हैं। इसलिए एक भाषा की सांस्कृतिक युक्तियों का समानार्थी विकल्प दूसरी भाषा में ढूँढना कठिन होता है, पर इन सन्दर्भों को द्योतित करनेवाले प्रसंगों को सही-सही निरूपित करने की युक्तियाँ निकालनी पड़ती हैं। सामान घनत्व के पर्याय प्रस्तुत करने में कठिनाई जो भी हो, पर दोनों भाषाओं के सांस्कृतिक सन्दर्भों की सूक्ष्मता जानकर अनुवाद करना कोई असम्भव कार्य नहीं है। अनुवाद में असम्भव कुछ नहीं होता, क्योंकि अनुवाद ही संवाद का माध्यम है, संवाद ही प्रेम-सौहार्द की सरणि है। अर्थात्, अनुवाद ही भारत जैसे बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने का कारगर प्रविधि है।...
No comments:
Post a Comment