Sunday, August 24, 2025

मैथिली में अनुवाद की क्रिया (Translation Process in Maithili)

 

मैथिली में अनुवाद की क्रिया

 

सामुदायिक ज्ञानाकुलता शान्त करने के लिए अनुवाद-कार्य सदैव से प्रभावी रहा है। ज्ञान-क्षेत्र में फैले भाषिक वर्चस्व मिटाकर लोकतन्त्रिक वातावरण कायम करने में इसकी विशिष्‍ट भूमिका है। बहुभाषिक समाज में भाषिक वर्चस्व भी एक खास तरह की सामन्तशाही फैलाता है। भारत में ज्ञान-सम्पदा पर कुछ खास समूह का वर्चस्‍व प्राचीन काल से बना रहा। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ऋचा संकलित होने की प्रथा-पद्धति, उपनिषद-ब्राह्मण-आरण्यक रचे जाने के प्रयोजन, निघण्टु-निरुक्‍त के इन्‍तजाम से जो कोई परिचित हैं; और वैदिक संस्कृत से लेकर लौकिक संस्कृत की ओर बढ़नेवाले अग्रणी विद्वानों की भूमिका से जो लोग अवगत हैं; वे सहजता से मानेंगे कि अनुवाद ने ज्ञानाकुल समाज की भाषिक अक्षमता को निष्‍प्रभ कर दिया। भाष्‍य, टीका, वार्तिक, व्‍याख्‍या, अन्‍वय...द्वारा जनसामान्य के लिए प्राचीन ज्ञान-सम्पदा सुलभ कराने का कार्य जिन मनीषियों ने किया; उनकी दूरदर्शिता का स्‍मरण आदरपूर्वक किया जाना चाहिए।

बौद्ध साहित्य के प्रचार-प्रसार के समय में भाषिक सामन्तशाही के दुर्ग भली-भाँति टूटे और ज्ञान सम्मत बात विभिन्न जनपदों की लोकभाषा में होने लगी। मैथिली में खास यह प्रथा विद्यापति के समय में शुरू हुई, जब उन्‍होंने देसिल बयना सब जन मिट्ठा की घोषणा करते हुए रचना की। पर यह तो मूल रचनाशीलता की बात हुई। अनुवाद की बात इससे सम्बद्ध रहते हुए भी अलग है। भारतीय साहित्य की अन्य दिशाओं में भी, अर्थात् भक्‍ति-आन्दोलन के समस्त कवि -- वसवन्ना, कबीर, रैदास, नामदेव, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, अक्का महादेवी, चण्डीदास आदि के रचना-सन्धान में इस भाषिक सामन्तशाही को निरस्त कर मानवीय सम्बन्ध के नए आयाम विकसित हुए हैं; जहाँ ज्ञान, भक्‍ति और भाषा को आम लोगों का अधिकार क्षेत्र समझा गया। ध्यातव्य है कि कृतिवास, कम्बन जैसे महान कविगण उसी दौर में हुए। रामायण, महाभारत के अनेक अनुवाद अनेक भाषाओं में उसी दौर में हुआ; जिनमें से अधिकांश अपनी-अपनी भाषा के मौलिक ग्रन्थ माने जाते हैं। बहुत बाद में और कर मैथिली में भी चन्दा झा द्वारा ‘मिथिला भाषामय रामायण’ और फिर लालदास द्वारा ‘रमेश्वरचरित रामायण’ की रचना हुई। कहना कठिन है कि इन ग्रन्थों को अनुवाद माना जाए या मूल। तथ्यत: यह स्थानीय जन-मन की संस्कृति और भाषा-विधान में आत्मसातीकरण (एप्रोप्रिएशन) है। स्वीकार्य हो कि मैथिली के आधुनिक कथा-साहित्य के उद्भव और विकास में भी अनुवाद का प्रचुर योगदान है।

बात फिर वहीं आ पहुँची कि बहुभाषिकता के कारण समाज में जो अपरिचय की स्थिति उत्पन्न हुई और सांस्कृतिक संचरण-सम्मिलन-संवर्द्धन के मार्ग में जो अवरोध आए; उसे सामाप्त करने में अनुवाद-कौशल वरदान साबित हुआ। विदित है कि अनुवाद में एक प्रतीक-व्यवस्था में व्यक्‍त सन्दर्भ को दूसरी प्रतीक-व्यवस्था में लाया जाता है। प्रतीक-व्यवस्था का यह कायान्तरण मात्र शब्दार्थ के माध्यम से सम्भव नहीं होता। अनुवाद करते समय विषय-वस्तु के साथ-साथ मूल भाषा की संस्कृति और वातावरण का भी कायान्तरण होता है। हम भली-भाँति जानते हैं कि हर पाठ, एक सुसम्बद्ध भाषा में अनुगुम्फित रहता है, किन्‍तु इसी कारण वह भाषा मात्र नहीं होता। भाषा, स्वयं जनपदीय संस्कृति का एक प्रमुख अंग है; पाठ के सम्प्रेषण में जिस भाषा संरचना का उपयोग होता है, उसमें जनपदीय जीवन का अतीत बसा रहता है; भाषा में प्रयुक्‍त बिम्ब-प्रतीक-मुहावरों का जन्म सामुदायिक जीवन की क्रियओं में ही हुआ रहता है। इसलिए ध्यातव्य है कि हर भाषा में लिखे गए पाठ में वहाँ की संस्कृति प्रवाहित रहती है। अनुवाद करते समय इन बातों का ध्यान रखना अनिवार्य होता है।

कुछ दशकों से भारत में अनुवाद-कार्य और अनुवाद-चिन्तन पर गम्भीरता से विचार-विमर्श होने लगा है। इसी विचार-वीथि में कुछेक ‘अति सचेष्‍ट’ अंग्रेजीदाँ और कुछेक अलस-भाव के भारतीय बुद्धिजीवी जोर-शोर से कहने लगे कि भारत में अनुवाद-कार्य भले ही प्राचीन समय से होता रहा हो, पर अनुवाद-चिन्तन की कोई व्‍यवस्‍थित परम्परा नहीं रही। विस्‍मयकर है कि औरों की पारम्परिक भव्‍यता के मूल ढूँढने में संलिप्‍त भारतीय विद्वानों को असीरिया के राजा सरगोन की बहुभाषी विजय-घोषणा में, ई.पू. चार-पाँच सौ के आसपास हिब्रू भाषा के प्रवचनों का आर्मेइक भाषा में अनुवाद करवाकर समझने के यहूदी उद्यमों में, ई.पू. तीन हजार के प्राचीन मिस्र के द्विभाषी शिला-लेख में, ई.पू. 2100 के आसपास के राजा हम्मूरावी के बहुभाषी आदेशोद्घोषणा में उनकी अनुवाद-परम्‍परा की प्राचीनता अवश्‍य दिखी; अपने यहाँ वैदिक ऋषियों द्वारा शिष्यों को ऋचा के अन्वय समझाने में, ऋचाएँ कण्ठाग्र कराने के लिए कराए गए अनुवचन, अनुकथन में अनुवाद-चिन्तन की प्राचीनता नहीं दिखी।

इधर के दशकों में अनुवाद-कौशल के स्वरूप अवश्‍य सुस्थिर हुए, पर दुनिया भर की छोटी-छोटी घटनाओं से इसके उद्भव-विकास के पुराने स्रोत का अनुसन्‍धान कोई अनुचित भी नहीं। वर्तमान समय में अपनी कार्य-दक्षता को पुष्ट करने के लिए, क्षमता-संवर्द्धन के लिए अपनी प्राचीन परम्परा को स्मरण करना सर्वथा उचित और कृतज्ञता-बोध के लिए अनिवार्य आचरण है। इस आचरण को सकारात्मक माना जाना चाहिए। पर इस कृतज्ञता-ज्ञापन में एकांगी हो जाना अनुचित है। भारतीय पद्धति से अपनी सोच-समझ विकसित करनेवाले विद्वानों के लिए गौरतलब है कि भारतवर्ष की अनुवाद-चिन्तन-परम्परा सर्वाधिक प्राचीन है।

नौवीं-सोलहवीं शताब्दी के बीच इंगलैण्ड में अनुवाद की व्यवस्थित परम्परा कायम हो गई थी; इधर मुगल शासन-व्यवस्था में बाबर, हुमायूँ के समय में भारत में भी यह कार्य व्‍यवस्‍थित ढंग से हुआ। अकबर (सन् 1542-1605) और दाराशुकोह (सन् 1615-1659) के समय में अनुवाद के क्षेत्र में हुए विलक्षण कार्य आज भी स्मरणीय हैं । किन्‍तु उससे कई शताब्‍दी पूर्व बौद्ध-साहित्य और बुद्ध-वचन का प्रचार-प्रसार चीन से श्रीलंका तक तेजी से हुआ, सम्राट अशोक (सन् 304-232) के समय में इसका प्रचार-प्रसार विराट स्तर पर हुआ। फिर तो दुनिया भर के देशों में बुद्ध-वचन प्रसारित हुए। बाद के दिनों में फिर अश्वघोष (सन् 80-150) का काल भी मुख्य रूप से ध्यातव्य है, जिनकी जनोन्मुखी कृतियों के अनुवाद हुए।

भारतीय अनुवाद-चिन्तन की परम्परा को ध्यान में रखते हुए, उसकी सुव्यवस्था की ओर स्वाभिमान से देखते हुए, इसकी प्राचीनता पर भी विचार होना चाहिए। उल्लेख प्रासंगिक होगा कि अरस्तू का अनुवाद करते हुए जरा-सी छूट लेने के अपराध में, फ्रांस के महान अनुवाद-चिन्तक एतीन दोले (सोलहवीं शताब्दी) को फाँसी दे दी गई। ऐसी बर्वरता के आलोक में वहाँ की अकादेमिक नीति पर चिन्ता व्यक्‍त होनी चाहिए। ऐसी प्रथा भारत में रही होती तो सम्‍भवत: कम्बन, तुलसीदास, कृतिवास, चन्दा झा, लाल दास...समेत भक्‍ति-आन्दोलन के सभी सन्त कवियों को फाँसी दे दी गई होती। पर सुकर है कि भारतीय अनुवाद परम्परा पर्याप्त उदार, दीर्घ और सतर्क है।

अनुकथन, अनुवचन, अन्वय, टीका, सारानुवाद, भावानुवाद...सब कुछ अनुवाद की विविधता और प्राचीनता के प्रारम्भिक रूप हैं; जो भारतीय अनुवाद परम्परा के क्रमिक विकास और भारतीय अनुवाद-चिन्तन की व्यावहारिक समझ को रेखांकित करते हैं। अनुवाद-क्रिया का जैसा स्वरूप आज हमारे समक्ष है, उसमें हमारे पूर्वजों और समकालीन विद्वानों के दीर्घकालीन अनुभव, चिन्तन, प्रेक्षण और विचार शृंखला मूर्त हैं। इस क्रम में विधान्‍तरण की गणना भी अनुवाद-कार्य में ही होगी। मूर्ति, चित्र अथवा रंगकर्म में पाठ का रूपान्तरण भी अनुवाद माना जाएगा। इसी तरह उपन्यास और कहानियों के नाट्य रूपान्तरण, अथवा पद्यानुवाद अनुवाद माने जाएँगे। नाट्यालेख का मंचन अथवा नृत्य में प्रस्तुत भंगिमा अथवा संवाद-वाचन द्वारा भाव-प्रस्तुति भी अनुवाद मानी जाएगी!

भारतीय ज्ञान-शृंखला पर संस्कृत का भाषिक वर्चस्व प्राचीन काल में था; जो ब्रिटिश-शासन और स्‍वातन्‍त्र्योत्तर काल में अंग्रेजी के वर्चस्व में परिणत हो गया। भाषिक वर्चस्व के इस दुर्ग को तोड़ने का प्रयास फिरंगी हुकूमत में ही शुरू हो गया था। मराठी, बांग्ला और हिन्दी में इस दिशा में पर्याप्त प्रयास हुए; जो बाद के समय में अन्‍य भाषाओं में भी बढ़े, पर वे प्रयास यथेष्‍ट सफल नहीं हुए। पचास-साठ वर्ष पूर्व तक ज्ञानोन्मुख पाठों के आधुनिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद की स्थिति सन्‍तोषजनक नहीं थी। यहाँ ज्ञानोन्मुख पाठ का तात्पर्य ‘नॉलेज ओरिएण्टेड टेक्स्ट’ से है। अर्थात् शैक्षिक, अकादेमिक उत्थान के लिए जिस पाठ का अध्ययन-मनन किया जाए। इन पाठ को ज्ञानोन्मुख कहने का अभिप्राय यह कदापि नहीं कि अन्‍य पाठ ज्ञान-विमुख हैं। ज्ञान और जानकारी तो कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक, समाजशास्त्र, अखबार, पत्रिका...सब कुछ पढ़ते होता रहता है। इस कोटि में वैसे पाठ आते हैं, जो पाठ्यक्रम में हो अथवा जिसके अध्ययन-अनुशीलन की योग्यता जाँचकर अकादेमिक उत्थान होता हो अथवा लोग हुनरमन्त होता हो, कौशल का विकास होता हो।

शैक्षिक जगत में सर्वाधिक विस्तार विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हुआ है। साइबर युग के प्रवेश के कारण एलेक्ट्रॉनिक रूप से ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में इतना विस्तार आया है कि सामान्य दिनचर्या तक के अधिकांश प्रकरण में तकनीकी शिक्षा का प्रवधान हो गया है। अभियन्त्रण, चिकित्सा, विद्युत, रसायन आदि के क्षेत्र में तो बहुत समय से यह व्यवस्था थी; विगत तीन-चार दशकों से डिग्री, डिप्लोमा के अनेक फलक स्‍पष्‍ट हुए हैं। संचार माध्यमों में भी अत्‍यधिक परिवर्तन हुआ है। वैज्ञानिक क्षेत्र में निरन्तर अध्ययन, अनुशीलन, अनुसन्धान, चिन्तन और आविष्कारपरक लेखन हो रहे हैं। ये सारे लेखन अंग्रेजी अथवा अन्‍य विदेशी भाषाओं -- रूसी, फ्रेंच, जर्मन, चीनी इत्यादि में हो रहे हैं । यहाँ तक कि भारतीय लेखक भी इन विषयों पर अंग्रेजी में पुस्तक लिखना पसन्द करते हैं। इतिहास, समाजशास्त्र, संस्कृति, चिन्तन, वैचारिक शोध से सम्बद्ध पुस्‍तकें भी अंग्रेजी में ही लिखी जाती हैं। ऐसी स्थिति में स्‍वीकार करना मुनासिब होगा कि स्थिति ब्रिटिश-काल से थोड़ी बेहतर अवश्य है, पर बहुत सुखद आज भी नहीं है।

इन परिस्थितियों में एक बार फिर से भाषिक सामन्तशाही के विरुद्ध नए आन्दोलनात्मक स्थिति का प्रयोजन भारत में होने लगा। अनुवाद कार्य की प्रगति और कुछेक समझदार लोगों के भाषिक अनुराग के कारण इस दिशा में सुगबुगाहट हुई, जागरूकता आई। पर मातृभाषाओं में अनुवाद के क्षेत्र में दो मूल समस्याएँ फिर भी पहाड़ बन खड़ी रही -- बेहतर एवं नैष्ठिक अनुवादकों अभाव और तकनीकी शब्दावली का अभाव।

स्‍मरणीय है कि हमारे पूर्वजों ने उद्देश्‍य-पूर्ति के लिए बड़ी निष्ठा से अनुवाद-कार्य की शुरुआत की। ऐसा करते हुए उनके समक्ष राष्ट्र, क्षेत्र, भाषा और विषय के प्रति अनुराग था। निष्ठा और लगन से यह कार्य किया। गत चारेक दशकों से भारत में यह उद्यम धनार्जन का माध्‍यम बन गया है। ऐसा मैथिली में भी हुआ। अधिकांश अनुवादक उस मर्म से परांग्‍मुख हो गए, जिसके तत्त्‍वावधान में यह कार्य शुरू किया गया था। इनमें कार्य के प्रति अनुराग, न के बराबर रहा; इनके लिए यह कार्य या तो ड्यूटी (कर्तव्‍य नहीं) बनी या वाणिज्यिक उद्यम। इस कर्म में इनकी ममतामय संगति न तो लक्ष्य-भाषा के सन्दर्भ से रही, न स्रोत-भाषा के सन्दर्भ से। उन्‍हें लगा कि वे दोनो भाषा जानते हैं, इसलिए अनुवाद कर सकते हैं। भाषाओं की सांस्कृतिक समझ उनके लिए किसी भी तरह विचारणीय नहीं रही। दोनो भाषाओं के लक्षित पाठकों की आवश्यकता, मूल लेखक के अभिप्रेत की रक्षा के लिए वे कदापि चिन्तित नहीं रहे। मैथिली के अनुवादक तो सेतु भाषा से मैथिली में अनुवाद करने लगे। अनुवाद में सेतु भाषा का उपयोग कोई अपराध भी नहीं है, पर जिन कृतियों का अनुवाद हिन्‍दी में उपलब्‍ध हो, उसका अनुवाद मैथिली में करने की जरूरत क्‍यों हो?

भारतीय भाषाओं में पारस्‍परिक अनुवाद की दिशा में एक समस्या मानदेय की भी है। इस कार्य के लिए मानदेय इतना अभद्र है कि कोई नैष्‍ठिक अनुवादक इस दिशा में आगे नहीं आते। इसलिए यान्त्रिक अनुवाद प्रस्‍तुत कर भुगतान ले लेना अपना परम-चरम कर्तव्य समझते हैं। कहा नहीं जा सकता कि भारतीय अनुवाद की इस विराट विडम्बना की कमर कौन तोड़ेगा?

इसके बाद का प्रमुख अवरोध तकनीकी और पारिभाषिक शब्दावली में एकरूपता के अभाव का है। मैथिली समेत अधिकांश मातृभाषाओं में पारिभाषिक शब्दावली नहीं बन पाई है। फलस्वरूप सामान्य शब्दकोश से कोशीय अर्थ निरूपित कर अनुवादक आगे बढ़ जाते हैं। इस कारण पूरे पाठ में पारिभाषिक शब्दों की एकरूपता नहीं बन पाती है; पाठ का मर्म समझने के लिए फिर से अंग्रेजी पाठ का सहयोग लेना पड़ता है। हिन्दी में जो पारिभाषिक शब्दावली तैयार हुई है, एक तो उसका उपयोग बहुत कम होता है, संयोगवश कहीं हो भी जाए तो उसमें प्रयुक्‍त शब्दों के पर्याय को इतना जटिल बनाया गया कि वह लोकोपयोगी नहीं है। स्‍वयं को सम्भ्रान्त (इलीट) साबित करने और अंगेजी से द्रोह करने की उत्तेजना में विषय-विशेषज्ञों ने शब्द-संचयन के समय ऐसा जौहर दिखाया कि लोक-भाषा की कौन कहे, वे लौकिक संस्कृत तक को छोड़कर वैदिक संस्कृत की ओर प्रयाण कए गए। अनुवाद-प्रेमियों को डर है कि कभी कोई पारिभाषिक शब्‍दावली मैथिली में सामने आई, तो उसका हाल इससे भी बदतर होगा। कारण, मातृभाषा का विकास शास्‍त्र से नहीं, लोक से होता है; सूत्र से नहीं, प्रयोग से होता है; सिद्धान्‍त से नहीं, व्‍यवहार एवं प्रयुक्‍ति से होता है। बिहार के उन्नीस-बीस जिलों के अलावा भारत एवं नेपाल के विभिन्‍न भूभागों में बसे जिन पाँच करोड़ से अधिक मैथिलों की मातृभाषा मैथिली है; उनका भाषिक बोध वैदिक संस्‍कृत के विधान से नहीं लोकाचार के प्रयोजन से विकसित हुआ है।

अनुवादक, प्रकाशक अथवा शिक्षा जगत के नियन्ताओं की यह उक्‍ति निरर्थक है कि ‘भारतीय भाषाओं में तकनीकी और अकादेमिक पुस्‍तकें लोग पसन्द नहीं करते’। वे आश्‍वस्‍त रहें कि बेहतर अनुवाद उपलब्ध हो तो लोग अवश्य पढ़ेंगे।

मैथिली से अन्‍य भारतीय या अभारतीय भाषाओं में अनुवाद-कार्य तो स्वातन्त्र्योत्तर काल में बढ़ा, पूर्व-काल के स्रोत सूखे-से ही हैं; किन्‍तु अन्‍य महत्त्वपूर्ण भाषाओं की विशिष्‍ट कृतियों का मैथिली में अनुवाद करीब दो शताब्दियों से हो रहा है; जिसके क्रम-भंग का मूल कारण मैथिली में प्रकाशन-संस्था का अभाव भी था। साहित्य अकादेमी में मैथिली पुस्‍तकों के प्रकाशन की शुरुआत और मैथिली अकादेमी पटना की स्थापाना से यह उद्यम पुनर्जीवित हुआ। इससे पूर्व कुछेक आग्रही भाषानुरागी कुछ कर लिया करते थे। पर इस पूरे परिदृश्य में जिन पाठों के अनुवाद प्रकाशित हुए, वे सब के सब वैदिक-पौराणिक साहित्यिक सामग्री हैं। संस्कृत या कि अन्‍य किसी भारतीय भाषा से ज्ञानोन्मुख पाठ का अनुवाद मैथिली में नहीं हुआ। उद्योगपूर्वक और उदारतापूर्वक विचार करने पर ज्ञानोन्मुख पाठ में किसी तरह ‘संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र’ (अनुवादक : ताराकान्त झा, मूल लेखक : गोपीचन्द नारंग), ‘भारतक भाषा सर्वेक्षण’ (अनुवादक : कुलानन्द मिश्र, मूल लेखक : जार्ज ग्रियर्सन), ‘बिहारक ग्राम्य जीवन’ (अनुवादक : भीमनाथ झा, मोहन भारद्वाज, मूल लेखक : जार्ज ग्रियर्सन), ‘अन्तरिक्ष में विस्फोट’ (अनुवादक : सुरेश्वर झा, मूल लेखक : जयन्त नार्लीकर) की ही गिनती की जा सकती है। इनमें भी पारिभाषिकता का बहुत अवसर नहीं है; इसलिए इनके अनुवाद में उतनी ही समस्या उत्पन्न हुई होगी, जितनी सांस्कृतिक द्वन्द्व के कारण किसी भी पाठ के अनुवाद में होती है।

कई वर्ष पूर्व ‘राष्ट्रीय अनुवाद मिशन’ ने ज्ञानाश्रित विषयों से सम्‍बद्ध अनेक दर्जन पुस्‍तकों का मातृभाषाओं में अनुवाद करवाकर प्रकाशित कराने का निर्णय लिया, इनमें रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, चिकित्साशास्त्र, कम्प्यूटर तकनीक, अभियन्त्रण, प्रौद्योगिकी, सूचना-संचार, साइबर-संकेत, कृषि विज्ञान आदि विषय से सम्बद्ध अनेक पुस्‍तकें होंगीं। इस निर्णय ने अन्‍य मातृभाषानुरागियों समेत मैथिलीभाषियों को भी प्रसन्‍नता दी; पर उसका हुआ क्‍या, यह जानना अभी शेष है। आशंका व्यक्‍त की जा सकती है कि इनके अनुवाद-कार्य का दायित्व किसी टपोरी ठेकेदार को सौंप दिया गया होगा, खानापूर्ति हो गई होगी। विगत दो तीन महिनों में जो मैथिली में अनूदित कुछेक पाठ (छपनेवाला भी और ऑनलाइन अपलोड होनेवाला भी) पुनरीक्षण के लिए सामने आया, देखकर हैरत में पड़ गया। मैं सोचने लगा कि लगा मुझे जिस मैथिली का लेखक-समालोचक-अनुवादक लोग मानते हैं, मैथिली वह है, या मैथिली यह है!

वस्‍तुत: मैथिली में अभी तक यह विवेक विकसित नहीं हुआ है कि जिस कार्य की योग्यता न हो, उसमें हाथ न लगाएँ। सन् 1985 में उच्‍च माध्‍यमिक शिक्षा के भौतिक विज्ञान की एक पुस्‍तक का मैथिली अनुवाद करने का प्रस्ताव मुझे एक ठेकेदार महोदय ने दिया। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, पर इस ईमानदारी के लिए वे प्रणम्य हैं कि उन्‍होंने कहा कि काम तो मेरी बेटी के नाम से आवण्टित हुआ है, पर वह भौतिक विज्ञान नहीं जानती। इसलिए आप इसका अनुवाद कर दें...। प्रार्थना की जानी चाहिए कि आगे के कार्य जिन ठेकेदारों को मिले, उनमें कम से कम इतनी ईमानदारी बची हो।

तकनीकी और वैज्ञानिक विषयों का मैथिली में अनुवाद करते समय विकराल समस्या उत्पन्न होना सुनिश्चित है। कारण, मैथिली लिखने के लिए मैथिलीभाषी होना ही पर्याप्त नहीं है। मैथिली में संवाद करनेवाले सारे लोग मैथिली लिख नहीं सकते। स्पष्ट है कि जिन्‍हें तकनीकी विषयों का बोध है, वे मैथिली नहीं लिख नहीं पाएँगे, और जो मैथिली लिख पाएँगे, उनमें से अधिकांश को तकनीकी विषयों का बोध परिपूर्ण नहीं होगा। इस दिशा में साझा-अनुवाद किए जाने का मार्ग फलदायी हो सकता है। पारिभाषिक और तकनीकी शब्दावली की प्रयुक्‍ति में मैथिली के अनुवादकों को पाठ और लक्षित भावकों की बौद्धिकता के प्रति विवेकशील और संवेदनशील होना चाहिए। मैथिली भाषा की पाचनशक्‍ति और समावेशी नीति पर्याप्‍त उदार है, सदैव से विदेशज शब्दों को पचाकर अपनाती रही है। माहटर बाबू, लालटेम, कम्पूटर, तातिल, बहाया, बेखसमा...जैसे असंख्य शब्द मैथिली में पच गए हैं। इसी तरह अन्‍य शब्दों को भी पचाया जा सकता है। मूल शब्‍द को घिसकर नया शब्‍द गढ़ा जा सकता है। रेलवे स्टेशन के लिए धूम्र शकट विश्रामालय, रेलगाड़ी के लिए लौहपथगामिनी जैसे शब्द गढ़कर अपना और अपनी मातृभाषा का उपहास नहीं करना चाहिए। चिकित्सा-शास्त्र के पाठ का अनुवाद करते समय टेट्रासाइक्लिन का अनुवाद चतुष्चक्रीय करने लगेंगे, तो विद्रूप परिस्थिति उत्पन्न होगी। आज-कल अनुवाद-कार्य में इन बातों की पर्याप्त छूट है कि जिस शब्द का पर्याय आपकी भाषा में नहीं है, उसे उसी रूप में अपनी लिपि में लिख कर पचा लें। अनुवाद ऐसा करें कि उसका अभिप्राय स्पष्ट हो जाए। इस कोटि के अनुवाद में अनुवादकों को हरदम लक्षित पाठक-वर्ग की चिन्ता रखनी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जब प्रान्तीय भाषाओं को जगह दी जा रही थी, तब एक धारणा यह भी थी कि जिन प्रतीक-व्यवस्थाओं के लिए हिन्दी में शब्द-पर्याय नहीं मिले, वहाँ प्रान्तीय भाषाओं से शब्द ले लिए जाएँ। पूर्व में भी कहा गया कि शब्द-सम्पदा, प्रतीक-व्यवस्था और लोकोक्‍ति-मुहावरा तो जनपदीय उपज है! जो यन्त्र मिथिला में बना ही नहीं, उसका नामकरण-संस्कार मैथिली भाषा में कैसे हो! मिथिला और मैथिली तो प्रारम्‍भिक समय से ही तीन वाक्यों के वार्तालाप में दूसरों को अपना कुटुम्ब मानती आई है, फिर अपने क्रियापदों के साथ तीन बार लिख कर किसी परदेशी शब्द को अपना शब्द क्‍यों नहीं मानेगी?

गत दो दशकों से, या कहें कि संविधान में मैथिली की भाषिक स्‍वीकृति के बाद से कुछेक ऐसे उत्साही लोगों को ‘पावर’ (यहाँ ‘क्षमता’ शब्द का उपयोग जान-बूझकर नहीं कर रहा हूँ) मिल गया है, जो भाषिक सामन्तशाही से अभिभूत हैं। अपने क्षमताविहीन रिश्‍तेदारों को अर्थलाभ कराने के लिए आँखें मूँदकर अनुवाद-कार्य आवण्टित करने लगे हैं। स्रोत-लक्ष्‍य दोनों ही भाषाओं की सूक्ष्‍मता को जाने बिना ढेरो अनुवाद हुए, मैथिली के सामन्तों ने उसका मूल्यांकन किया; राष्‍ट्रीय संसाधनों का दुरुपयोग किया; भाषिक गरिमा को क्षरित किया ...। विचारणीय है कि राष्ट्रीय सरोकार और भाषिक सरोकार सुनिश्‍चित किए बिना किसी अनुवादक को इस क्षेत्र में पाँव नहीं रखना चाहिए। मैथिली से या मैथिली में अनुवाद करनेवाले अनुवादकों की संख्‍या तो इन दिनो बहुत है, पर उनमें से कितनो की राष्ट्रीय और भाषिक नीति स्‍पष्‍ट है, कहना कठिन है।

सांस्कृतिक युक्‍तियों-प्रयुक्‍तियों, मुहावरों, लोकोक्‍तियों जनपदीय सरोकारों, क्षेत्रीय अस्‍मिताओं के विशेष सन्‍दर्भ के कारण उक्‍त सारी समस्याएँ उपस्‍थित होती हैं; जिसका निराकरण पाठ और लक्षित भावक के अनुमानित ज्ञानलोक के आलोक में सारे ही अनुवादक करते हैं; मैं भी करता रहा हूँ। सांस्‍कृतिक सन्‍दर्भ निश्‍चय ही अनुवादक के समक्ष जटिलता उत्पन्न करते हैं, पर इस कारण अननुवाद्यता (अनट्रांसलेटेबिलिटी) के समक्ष घुटने टेक देना मुनासिब नहीं है। अनुवादक वैसे महासेतु के निर्माता होते हैं जो ज्ञानकुल और ज्ञानसम्‍पन्‍न समुदायों के बीच संवाद स्‍थापित करता है। उसके जीवन की सफलता इसी में है, सामाजिक संसाधनों से अपने विकास के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करने का कर्तव्‍य वह इसी रास्‍ते निभाता है। अननुवाद्यता का गीत गाने से अनुवाद का उद्देश्‍य नष्‍ट हो जाएगा, इसलिए इस पदबन्‍ध की अपरिहार्यता के बावजूद इससे मुठभेड़ अनिवार्य है। अननुवाद्यता के कारण कठिनाई बेशक आए, असम्‍भाव्‍यता नहीं आती; यदि आती है, तो मानना चाहिए कि अनुवादक दुर्बल है, उनमें वैदुष्‍य का अभाव है।

अनुवाद का उद्देश्य ही होता है एक भाषा में उपजे ज्ञान-संसाधन को अपनी भाषा में लाकर, अपनी भाषा के उपयोक्‍ताओं को ज्ञान-सुख देना। अनुवाद साहित्यिक-सांस्‍कृतिक पाठ का हो या दार्शनिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, संसदीय, वैधानिक पाठ का... वह सन्‍देश और ज्ञान का संचार अधिकतम भावकों, उपयोक्‍ताओं तक करने का कार्य करता है। अनुवाद-कार्य के दीर्घकालीन अनुभवों से कौशल पुख्‍ता करते हुए यही सीख पाया कि अनुवाद-कार्य का हर बौद्धिक उद्यम अनन्‍तिम ही होता है, पूर्ण और अन्‍तिम कभी नहीं होता। कुछ वर्ष पूर्व किए गए अपने ही अनुवाद को कोई अनुवादक आज फिर देखें तो उन्‍हें उसमें सुधार की गुंजाइश दिखेगी। महान और कालजयी पाठों के अनुवाद में तो यह समस्या और भी बढ़ जाती है। वैज्ञानिक प्रगति और सभ्‍यता-विकास के क्रम में बदलते समय के साथ-साथ सामुदायिक जीवन का आचार-विचार, रीति-रिवाज, रहन-सहन, शील-सभ्‍यता, राग-विराग परिवर्तित होता रहता है। जीवन-पद्धति बदलती रहती है। इस परिवर्तन-शृंखला में मनुष्‍य के लिए उपादेय संगत भाषा और साहित्य के उपयोग की पद्धति भी बदलती रहती है। अठारहवीं शताब्‍दी में मिथिलांचल की शासकीय क्रूरता देखकर महाकवि मनबोध द्वारा ‘कृष्‍ण-जन्‍म’ (व्‍यास रचित कृष्‍ण-कथा का आत्‍मसातीकरण) महाकाव्‍य की रचना; मैथिल-जन को स्‍वाधीनता संग्राम का सन्‍देश देने के लिए कवीश्‍वर चन्‍दा झा द्वारा उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के अन्‍तिम चरण में विद्यापति रचित ‘पुरुष परीक्षा’ का मैथिली अनुवाद और ‘मिथिला भाषामय रामायण’ (वाल्‍मीकि रचित रामायण का आत्‍मसातीकरण) की रचना; बीसवीं शताब्‍दी में तन्‍त्रनाथ झा द्वारा ‘कीचक वध’ महाकाव्‍य, काशीकान्‍त मिश्र मधुप द्वारा ‘राधा विरह’  महाकाव्‍य, कांचीनाथ झा किरण द्वारा ‘पराशर’ खण्‍डकाव्‍य की रचना ... कालजयी कृतियों का आत्मसातीकरण या अनुवाद या पुनर्रचना मात्र नहीं है; बल्‍कि पूर्वजों का सहयोग लेकर समसामयिक सन्‍दर्भों को रेखांकित करने का सार्थक उद्यम है। यहीं आकर अनुवादकों की अनुवाद-नीति और सामाजिक दायित्‍व मुखर हो उठता है। कहना मुनासिब होगा कि समाज और समाज में व्याप्त राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, शासकीय वातावरण को रेखांकित करने की पद्धति बन जाता है।

भाषा की युक्तियों में जनपदीय जीवन-व्यवहार, आचार-विचार, सम्बन्ध-सरोकार, रीति-नीति के तौर-तरीके अनुस्यूत होते हैं। ये स्थानीय प्रयुक्तियाँ औरों से भिन्न होती हैं। इसलिए एक भाषा की सांस्कृतिक युक्तियों का समानार्थी विकल्प दूसरी भाषा में ढूँढना कठिन होता है, पर इन सन्‍दर्भों को द्योतित करनेवाले प्रसंगों को सही-सही निरूपित करने की युक्तियाँ निकालनी पड़ती हैं। सामान घनत्व के पर्याय प्रस्तुत करने में कठिनाई जो भी हो, पर दोनों भाषाओं के सांस्कृतिक सन्दर्भों की सूक्ष्मता जानकर अनुवाद करना कोई असम्‍भव कार्य नहीं है। अनुवाद में असम्भव कुछ नहीं होता, क्योंकि अनुवाद ही संवाद का माध्‍यम है, संवाद ही प्रेम-सौहार्द की सरणि है। अर्थात्, अनुवाद ही भारत जैसे बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने का कारगर प्रविधि है।...

 

Thursday, February 27, 2025

सांस्कृतिक राजनीति और अनुवाद (भक्ति आन्दोलन के विशेष सन्दार्भ में) Cultural Politics and Translation (with special reference to the Bhakti Movement)

 

सांस्कृतिक राजनीति और अनुवाद

(भक्ति आन्दोलन के विशेष सन्‍दर्भ में)

Cultural Politics and Translation 

(with special reference to the Bhakti Movement)

 

अनुवाद ज्ञान-प्रसार का माध्यम है। इसे समाज को सभ्य और कर्तव्यनिष्ठ बनाने का साधन बनना था। सांस्कृातिक समन्वय का संयोजक बनना था। जीवन-व्यवहार से भाषिक-द्रोह मिटाना था। वर्गीय भेद-भाव दूर करने का नेतृत्व करना था। समाज को राजनीतिक आखेटकों के ओछेपन से सावधान करते हुए संवाद स्थापित करना था। ...पर ऐसा हो न सका!...अनुवाद पूरी तरह धन्धा बन गया।

इस तरह अनुवाद के धन्धा बन जाने के दोषी अनुवादक नहीं हैं। अनुवाद-कर्म का संस्थानीकरण है। बीते दशकों में परवान चढ़ी बहुराष्ट्रीय वणिक-वृत्ति की आभा से भारतीय जन-चित्तवृत्ति में ऐसा सम्मोहन पैदा हुआ कि यहाँ जीव-संचालन की अनेक क्रियाएँ वाणिज्यिक हो गईं। शिक्षा, संस्कार, उपचार, पूजा, प्रचार...सब कुछ की ठीकेदारी होने लगी। अनुवाद इससे बचा नहीं सका। इस पुनीत कर्म को उद्योग बना देनेवाली संस्थाओं ने इसकी शुचिता को कलंकित कर दिया! मोल-भाव कर न्यूनतम अनुवाद-शुल्क पर अधिकतम अनुवाद करवाने की इनकी लालची वृत्ति ने भ्रष्ट अनुवाद को प्रश्रय दिया और अनुवाद का बाजारीकरण हो गया!...बाजार कोई निष्द्धि क्षेत्र नहीं है, निषिद्ध है उसकी नीतियाँ! अधिक मुनाफे के लालच में वह उपभोक्ता विरोधी हो गया है; अपनी वस्तुनिष्ठता से वह ग्राहकों को आकर्षित नहीं करता, लोक -लुभावन जुमलों से, विज्ञापनों से, किफायती मूल्य से...फुसलाता है, ठगता है। अनुवाद में यह ठगी ज्ञान-द्रोह के साथ-साथ जनद्रोह भी है। ऐसे दुष्कर्मियों के लिए आधिकारिक तौर पर जघन्य अपराधी जैसे दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। गुणवत्ता और वस्तुनिष्ठता से समझौता करना जिस बाजार का स्वभाव हो चुका है, उस बाजार के प्रबन्धक तो यकीनन किसी सस्ते अनुवादक की ही तलाश करेंगे!...इन दिनों बाजार के संचालन में बेशक अनुवाद का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। अनुवाद के एकनिष्ठ सहयोग के बिना बाजार का प्रसार असम्भव है। पर यह बाजार की नीतियों के प्रसार में अनुवाद की भूमिका की बात है। अनुवाद की यह भूमिका तभी बेहतर होगी, जब अनुवाद बेहतर होगा। किन्तु होड़ लगाने में बाजार अपनी नैतिकता खो चुका है, बाजार की नीतियाँ अमरूद बेचने और अनुवाद बेचने में फर्क नहीं करतीं! क्योंकि उसके संचालकों को इन दोनों की वस्तुनिष्ठता सही समझ नहीं है; उन्हें अत्यधिक उपार्जन की समझ है। अनुवादकों को उपार्जन के फेरे में अपने अनुवाद-कर्म से समझौता नहीं करनी चाहिए! पर यह सैद्धान्तिक बात है। व्यावहारिक तौर पर होता है प्रतिकूल। क्योंकि अनुवाद के पवित्र आँगन में असंख्य धन्धेबाज उतर आए हैं! इस कारण अनुवाद अभिकरणों (एजेंसियों) की भरमार हो गई है। इन अति क्रियाशील अभिकरणों की पीठ पोछनेवाली सत्ता और सत्ता के चाटुकार बौद्धिक वर्ग की दुर्वृत्तियों के कारण इस आँगन की शुचिता नष्ट हुई है। वस्तुतः ये अनुवाद-द्रोही हैं, अनुवाद की महत्ता से बेखबर हैं...। इन्हीं सबके बीच कहीं वे स्वघोषित अनुवाद-चिन्तक भी हैं, जो ऊल-जुलूल वक्तव्यों से अनुवादकों पर अपना बौद्धिक आतंक पसारते रहते हैं। बात-बात पर एक सिद्धान्त गढ़ कर फेक देते हैं!

आज के संवेदनशील मौसम में अति प्रतिभाशाली लोग कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं। बात-बात में आहत हो जाते हैं! चोर को चोर कहना बेहतर है या पुलिस? धूर्त को धूर्त कहना बेहतर है या नैष्ठिक? गुण्डों को गुण्डा कहना बेहतर है या सभ्य? इसकी सुनिश्चिति वाचक नहीं कर सकते, वे ही बताएँगे कि उन्हें कब क्या कहा जाए? उनके अनुसार उनको सम्बोधन देने का आचरण वाचक में न हो, तो सावधान! वे कभी भी किसी भी जोखिम में पड़ सकते हैं। कई बार तो उन्हें मनुष्य कहना भी निरापद नहीं है। क्या पता वे खुद को मनुष्य कहलवाना पसन्द न करते हों, या मनुष्य कहे जाने पर उनके आका नाराज हो जाते हों, या उनकी उपलब्धिायों के सूत्र कमजोर पड़ जाएँ!

वाचक ने उन्हें उनके अनुसार सम्बोधन नहीं दिया, तो वे आहत हो जाएँगे। फिर बदला लेने के लिए वे वाचक के विचार की तह में नहीं जाएँगे। वाचक की जाति, धर्म, वंश, सम्प्रदाय, नैतिकता...पर शोध करेंगे, और फिर उनका जीवन दुर्वह कर देंगे। इस जगह धूमिल की कविता भाषा की रातकी पंक्ति हरदम याद रखनी चाहिए -- भाषा ठीक करने से पहले आदमी को ठीक कर

धूमिल को इस बात की बेहतरीन समझ थी कि आदमी का ठीक होना बेहद जरूरी है, क्योंकि ठीक आदमी ही ठीक भाषा का उपयोग की सकता है। यकीनन ठीक आदमी ही ठीक अनुवाद कर सकता है; जबकि अनुवाद की दुनिया से ठीक आदमी को विस्थापित कर गलत आदमी ने अपना घर सा लिया है!

धूमिल ने कह तो दिया कि --कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।

पर यहाँ कविता का अर्थ सिर्फ कविता ही नहीं है, कविता के साथ-साथ सभी साहित्यिकक विधाएँ भी हैं; क्योंकि साहित्य स्वयं में अपने जनपदीय जीवन का अनुवाद है। इसलिए यहाँ कविता का अर्थ अनुवाद भी लिया जाना चाहिए। अनुवाद वस्तुतः मनुष्य को जीवन की तमीज सिखाता रहा है। इसलिए, अनुवाद मनुष्य को मनुष्य होने और मनुष्य बने रहने की प्रेरणा देता है। पर अनुवाद को तो हमने धन्धा बना दिया।

जिस अनुवाद के जरिए इतिहास-काल में तरह-तरह के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक आन्दोरलन हुए; उसे हमने धन्धा बना दिया, और इस अनैतिकता के लिए तर्क गढ़ने लगे कि सही सच यही है।

नए मौसम में हममें सत्य से जूझने की क्षमता नहीं रह गई है, सत्य को ताख पर रखकर हमने नया सत्य गढ़ा, और उसे सत्य कहलवाने की जुगत में लग गए। इसे ही लोग इन दिनों सत्योत्तर (पोस्ट-ट्रुथ) कहते हैं। अंग्रेजीदाँ को लगता है कि उन्होंने कोई नया काम कर लिया है। वे मानने को तैयार नहीं कि भारत में ये सदैव से था, उदाहरण असंख्य हैं।

यही वैचारिक दुराग्रह है, वर्चस्ववादी धारणा है। यह कौन-सा दुराग्रह है जो मनुष्य आत्म से बाहर नहीं आने देता? औरों की कामना, आहार-वयवहार, वेश-भूषा, मान-मर्यादा, रीति-नीति, रहन-सहन को अपने आधिपत्य के बोझ तले मार देना चाहता है? मैं जब प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता था, मेरे साथ एक महादलित परिवार का बालक खट्टर राम पढ़ता था। विदित है कि एक पूरे गाँव की भाषा कभी भी समान नहीं होती। जातीय परिवेश की ध्वनियाँ उसकी भाषा में अनुगुम्फित रहती है। विद्यालय में सवर्ण समुदाय के बच्चों ने उसकी ध्वनियों पर ऐसा ठहाका लगाया कि वह दुबारा स्कूल नहीं आया; आज वह मेरे गाँव में किसी के खेत में हलवाही करता है।...यह कौन-सी सभ्यता है, जिसमें कोई वर्ण विशेष केवल अपने ही उच्चारण को भव्य मानता रहे?

सर्वेभवन्तु सुखिनः या वसुधैव कुटुम्बकम् का मन्त्र-जाप पर्याप्त है क्या? समाज के जीवन-व्यवहार में भारत में ऐसे भाव कहीं दिखते हैं? स्वातन्त्र्योत्तरकालीन भारत में तो कदापि नहीं दिखता!

राष्ट्रीय भावनाओं से अभिभूत सिपाहियों में बेशक समता के भाव परिलक्षित होते हैं। प्रथम स्वावधीनता संग्राम से लेकर स्वाधीनता तक के राष्ट्रवादियों में ऐसे भाव देखकर आश्वस्त हो जाना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि बाद के भारतीय समाज के व्यववहार में समता के सारे भाव सिरे से गायब हो गए। तब से अब तक वर्चस्ववादी नीति ही मूल नीति की तरह प्रभुत्व में है। इसमें भाषिक-द्रोह की बड़ी भूमिका है। भारतीय अनुवाद इस प्रभाव से मुक्त कैसे रह पाता?

उन्नीसवीं सदी के ढलते चरण में भारत में इस भाषाई द्रोह के प्रवर्तक अंग्रेज थे। अनुवाद-कर्म के उद्देश्य को तो वे पहले से प्रदूषित कर चुके थे; अब भारतीयों के बीच द्रोह फैलाने के लिए उन्होंने भाषा को हथियार बनाया और हिन्दी-उर्दू विवाद को हवा दी।

पर अब तो अंग्रेज नहीं हैं! फिर भी हम ऐसा क्यों करते हैं? हम क्यों नहीं मानना चाहते कि सर्वे भवन्तु सुखिनःया वसुधैव कुटुम्बकम्का भाव भारतीय आचरण का मूल मन्त्र है? जाति-वंश के सहारे हम मनुष्य और मनुष्य में विभेद क्यों पैदा कर रहे हैं? सत्ता के आखेटकों की क्षुद्रता का शिकार हम क्यों हो रहे हैं? ... इसलिए, कि हमारे बीच संवादहीनता आ गई है; अपनी भाषाई समृद्धि त्यागकर, आखेटकों द्वारा परोसे गए चन्द नारे हमारे जीवन के व्यवहार हो गए हैं। लिहाजा हमारी संवादधर्मिता अवरुद्ध हो गई है।

अनुवाद इस अवरोध का उन्मू्लक है। अनुवाद कोई कर्मनहीं, ‘धर्महै; क्रिया नहीं, विचार है; आचरण नहीं, चेतना है। क्योंकि ज्ञान-प्रसार और पारस्परिक समझ विकसित करने के क्रम में अनुवाद ऐसी ऊष्मा देता है, जिससे अपरिचय और संवादहीनता की दीवारें ढहती हैं। ऊँच-नीच का भेद-भाव मिटता है। मनुष्य के मस्तिष्क में जमी वर्चस्व की काई खण्डित होती है। अहंकार का परित्याग कर मनुष्य सामान्य होने की चेष्टा करता है। मानवीय भाव से वंचित समूह की ओर हाथ बढ़ाता है। भारत का भक्ति-आन्दोलन इस बात की पुष्टि करता है।

भारत के भक्ति आन्दोतलन के सन्दर्भ में हमें तनिक सूक्ष्मता और उदारता से सोचना होगा। यह कोई भक्ति-भाव से खुद को ईश-चरणों में समर्पित कर देना नहीं था या पूजा-पाठ, यज्ञ-विधानादि का पाठ नहीं सिखा रहा था! यह मनुष्य को मनुष्य होने की तमीज बता रहा था। बता रहा था कि रहन-सहन, आहार-व्यवहार, पर्व-त्योहार, वेश-भूषा तो भौगोलिक परिस्थिति और आर्थिक सुविधा से संचालित होता है; ब्रह्म जब सारे ही जीवों में हैं, तो भक्ति के लिए भेद-भाव क्यों? स्नेहपूर्ण व्यववहार और मानवीय आचरण के लिए जाति-वंश का भेद क्यों? संवाद जारी रख, धारणा पवित्र रख, स्नेह आप से आप हो जाएगा। वस्तु्तः इस आन्दोलन में भारतीय भूगोल की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था का सन्दर्भ था। यह एक सांस्कृतिक आन्दोलन था, जिसमें सभी मनुष्य को ईश्वर की सन्तान, अर्थात् एक ही जाति के जीव माने जाने का आग्रह था। भारत के भिन्न-भिन्न भूखण्ड की परिस्थितियों और सांस्कृतिक राजनीतिके सुसंगत वातावरण में छठी से तेरहवीं शताब्दी के बीच यह आन्दोलन एक सांस्कृतिक आन्दोलन बन गया।

इतिहास गवाह है कि भारत में भक्ति आन्दोलन के सन्तों का उद्देश्य कभी समाज पर अपने ज्ञान का वर्चस्व थोपना नहीं रहा। उन्होंने सदैव अतीत की बौद्धिक सम्पदा के निचोड़ से समकालीन समाज को मानवीयता का सन्देश दिया। स्थिति-बोध कराया। भारत का भक्ति आन्दोलन इसी सन्देश का नमूना है। पूरे का पूरा भक्ति साहित्य, पारम्परिक सम्पदा का अनूदित संस्करण है। प्राचीन ज्ञान परम्परा के चैतन्य का आत्मकसातीकरण है। समकालीनों के चेतना-विस्तार का उपकरण है। भारत में सन्त-कवियों ने अपनी रचनाओं द्वारा न केवल धर्म के प्रवर्तन में अपनी भूमिका निभाई, बल्कि भिन्न-भिन्न भूखण्ड की लोक-वृत्तियों का उपयोग करते हुए, समकालीन जनजीवन को ज्ञान के अमूल्य दर्शन-सूत्र से परिचित कराया।

महात्मा बुद्ध हों, बौद्ध धर्म के परवर्ती अनुयायी हों, अद्वैत वेदान्ती मण्डन मिश्र हों, शंकराचार्य हों, आलवार सन्त हों, लिंगायत सम्प्रदाय हों, सूफी परम्परा हों, विद्यापति-चैतन्य-शंकरदेव की परम्परा हो...सबके यहाँ लोकमंगल की छवि को भक्ति का विकास सम्पुष्ट करता है और मनुष्य द्वारा सृजित भेदभाव या मनुष्य पर मनुष्य के वर्चस्व की आलोचना करता है, ज्ञान-दर्शन के सर्वोच्च स्वरूप को रेखांकित करता है। इस लोकमंगल की कामना को आज सही परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयोजन है।

ये सारे परिप्रेक्ष्य इन प्रवर्तक सन्तों की निजी कल्पना या किसी तन्द्रा में गठित कपोल-कल्पना नहीं हैं, प्राचीन ज्ञान एवं दर्शन ग्रन्थों के आत्मासातीकरण हैं। इन सभी रचनाओं के स्रोत हमारी प्राचीन बौद्धिक सम्पदा हैं, जिनके अनुवाद की शैली आत्मसातीकरण की है। उन्होंने अपने समय के लोकजीवन की स्थिति और ग्राह्यता के आलोक में अपनी ओर से कुछ नया कहने की जगह पुरानी बातों को समकालीन शैली और उपादेयता के अनुसार कहा। समाज में उन्हें जैसा जटिल भेदभाव दिख रह था, उसके प्रति सामुदायिक चेतना विकसित करने, वर्चस्ववादी नीति के सम्पोषकों को चुनौती देने और वंचित समुदाय के लोगों को चैतन्य बनाने के लिए जैसी रचना करनी चाहिए थी, इनलोगों ने किया। यकीनन यह काल भारतीय साहित्य के लिए, अनुवाद-चेतना के सदुपयोग के लिए, भाषिक समृद्धि के लिए उन्नयन-काल था।

तमिलनाडु के बारह आलवार-सन्तों ने तमिल भक्ति-आन्दोलन का प्रवर्तन किया। वे सब विष्णु के उपासक थे। बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे, पर अनुभव सम्पन्न थे। इन सन्तों ने पूरे तमिल प्रदेश में पदयात्रा कर भक्ति का प्रचार किया और घोषणा की कि ईश-भक्ति का समान अधिकार सबको है (आलवार का अर्थ होता है ईश-भक्ति में लीन’)। वे सब जाति-वंश के भेद-भाव से परे थे। उनकी राय में, ईश-भक्ति नहीं करनेवालों के अलावा कोई नीच नहीं होता था। भिन्न-भिन्न जातियों के होने पर भी वे सन्त रूप में समादृत थे। इनका समय छठी-नौवीं शताब्दी माना जाता है। इस भक्ति-सिद्धान्तों के तर्कशील व्याख्याकार रामानुजाचार्य माने गए। रामानन्द उन्हीं की परम्परा में हुए। जिन्होंने भक्ति-क्षेत्र से ऊँच-नीच, जाति-वंश का भेद मिटा दिया। उस दौर का सूत्र था--

जाति-पाति पूछे नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि के होई॥

हिन्दी का भक्ति काल सन् 1318-1643 माना जाता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस काल को लोक-जागरण कहा। यह काल वस्तुतः लोक-जागृति का काल था। इस साधना-क्षेत्र में क्रमशः नाथ सम्प्रदाय और सूफीवाद का चलन हुआ। सूफी मत की धारणा विशिष्टाद्वैतवाद जैसी है। भक्ति के अद्वैत में यदि जीव और ब्रह्म का अद्वैत है। तो अनुवाद में भी मूल और अनूदित का अद्वैत देखने का प्रयोजन है (कृपया शब्द का अर्थान्वेष परिप्रेक्ष्यगत किया जाए)। भक्ति में साधक खुद को साध्य में विसर्जित करता है, अनुवाद में भी मूल का विसर्जन अनूदित में होता है। भक्तों ने भक्ति की दोनों शाखाओं--ज्ञानाश्रयी (तर्क) और प्रेमाश्रयी (सख्य) में दो भिन्न पद्धतियाँ अपनाईं। अनुवाद के लिए भी सन्तों ने प्राचीन ग्रन्थों के ज्ञान-प्रसार के लिए दो राह अपनाए--जहाँ सख्य भाव दिखा, वहाँ अर्थान्वेष द्वारा; और जहाँ दर्शन जैसे गूढ़ तत्त्व दिखे, वहाँ आत्मसातीकरण द्वारा जनसामान्य के लिए रचना की। इस उद्यम के स्पष्टत उदाहरण--ज्ञानेश्वरी टीका और सूरसागर समेत अनेक ग्रन्थों में दिख सकते हैं।

विदित है कि तेरहवीं शताब्दी आते-आते भारत में धर्म का क्षेत्र विचित्र हो गया था। अन्धविश्वास परवान चढ़ रहा था। रूढ़ियों, आडम्बरों का वर्चस्व हो गया था। मायावाद के घटाटोप से समाज शिथिल हो रहा था। इसी दुष्काल में भक्ति के देशव्यापी सांस्कृतिक आन्दोलन ने प्रबलता से सामाजिक और वैयक्तिक मूल्यों की प्रतिष्ठा की। जिसमें अनुवाद की बड़ी भूमिका है। विसंगतियाँ भी आईं, पर उनमें उन मनीषियों की कोई भूमिका नहीं थी। परवर्ती काल के उनके समर्थकों ने प्रचार में अपने मनोविकारों का इतना विष-वमन किया कि वही चर्चा प्रमुख होने लगी...! जड़मति से बहस कौन करे? शाश्वत सत्य है कि जो विचार विरोधियों के विरोध से नहीं मरते, समर्थकों के कीर्तन से मर जाते हैं। बुद्ध, शंकराचार्य, विद्यापति, कबीर, रैदास, मार्क्‍स... इसके उदाहरण हैं।

निर्गुण भक्ति की ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कबीर और प्रेमाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि जायसी; सगुण भक्ति की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि तुलसी और कृष्ण भक्ति के प्रतिनिधि सूरदास की रचनाओं पर इसी परिप्रेक्ष्य में गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है। भक्ति की इन भिन्न-भिन्न प्रणालियों की विशेषताएँ बेशक भिन्न-भिन्न हों, पर प्रेम की सामान्य भूमिका सबने स्वीकारी है। इन सबके धर्म-सुधारक, समाज-सुधारक रूप प्रखर हैं। इनके यहाँ आचरण की शुद्धता का विशेष महत्त्व है। बाह्याडम्बर, रूढ़ि, अन्धविश्वास का निषेध है। मनुष्य की क्षमता का उद्घोष है, वंचित समुदाय में आत्मगौरव का भाव जगाने की प्रेरणा है।

ज्ञानमार्गी सन्तों की वाणी जहाँ मुक्तक रूप में है, वहीं प्रेममार्गी की प्रेमभावना लोकप्रचलित आख्यानों के प्रबन्धात्मक रूप में है। ये रचनाएँ प्रेमसमर्पित कथाकाव्य की श्रेष्ठ कृतियाँ हैं; उदाहरण के लिए मलिक मुहम्मद जायसी की कृति पद्मावत देखी जा सकती है।

इसी तरह कन्नड़ भक्ति साहित्य में लिंगायत परम्पराके प्रवर्तक सन्त--बसवन्ना, अक्का महादेवी, अल्लामा एवं अन्य अनुयायियों द्वारा रचित कन्नड़ वचन साहित्य शिवार्चन केन्द्रित प्रार्थना है। ये रचनाएँ सामाजिक मुद्दों और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को सम्बोधित हैं। ये अनुष्ठानों का समर्थन और जातिगत भेदभाव की आलोचना करते हैं। इनमें शिव को एक सार्वभौमिक भगवान के रूप में देखा गया है।

अब सवाल उठता है कि यहाँ भारत में भक्ति आन्दोलन के सन्दर्भ में सांस्कृतिक राजनीति और अनुवादका रिश्ता क्या है?... रिश्ता है! दरअसल पूरे का पूरा भक्ति साहित्य भारत के प्राचीन बौद्धिक धरोहर और लौकिक व्यवहार का अनुवाद ही है। लोगों को बेशक पसन्द न आए, पर सचाई है कि भारतीय समाज में संस्कृति भी एक संघर्ष का क्षेत्र है। यहाँ के सामाजिक ढाँचे को लाख समावेशी बताया जाए, पर वर्चस्ववादी धारणा यहाँ तथ्यतः जड़ीभूत है, शायद रहेगी भी। वैसे, मैं न तो समाजशास्त्री हूँ, न राजनीतिक विश्लेषक, न धार्मिक उद्घोषक, न कोई भविष्यवक्ता या दार्शनिक...इसलिए दृढ़ता से न सही, प्रतीति से अवश्य कह सकता हूँ कि यहाँ वर्चस्ववादी धारणा बनी ही रहेगी।

सांस्कृतिक राजनीतिइसी प्रतीति की कोख से पैदा होती है। क्योंकि भारतीय समाज में संस्कृति, यकीनन एक संघर्ष का क्षेत्र है। यह सांस्कृतिक राजनीतिएक विश्लेषणात्मक ढाँचा है। इसकी अर्थवत्ता ही संस्कृतियों के संघर्ष को रेखांकित करती है; यहाँ समाज के विभिन्न सामुदायिक समूह अपनी पहचान, सम्बद्धता, समावेश और बहिष्कार के प्रश्नों पर विचार करते हैं। इस सांस्कृतिक राजनीतिका गहन जुड़ाव राजनीतिक अर्थनीतिसे है। इसे वैधानिक पद की मान्यता मिली हुई है। दोनों की अन्ततरानुशासनात्मककता और ऐतिहासिकता व्यापक है। इस कारण प्रयोजनवश ये दोनों (सांस्कृतिक राजनीतिऔर राजनीतिक अर्थनीति’) सांस्कृतिक भूगोल की सीमा भी लाँघ देते हैं। और, फिर इनमें सांस्कृतिक अध्ययन, नृविज्ञान, सभ्यता विकास आदि समा जाते हैं।

भूगोलवेत्ता आमतौर पर, ‘सांस्कृतिक राजनीतिको स्थानिक राजनीतिके रूप में देखते हैं; सही ही देखते हैं; क्योंकि इसके सारे गुणसूत्र स्थानीय सुविधाओं-दुविधाओं से ही स्पष्ट होते हैं। अर्थात् पहचानसम्बन्धी संघर्ष कैसे होता है? ऐसे क्षेत्र का निर्माण किस होता प्रकार है? सब जानते हैं कि गाँवों में, नगरों-महानगरों में किस प्रकार जाति-बोधक, सम्प्रदाय-बोधक, व्यवसाय-बोधक मुहल्ले बनते हैं। ये संघर्ष और क्षेत्र-निर्माण की ये हदबन्दी एक सुनिश्चित अभिकरणों (एजेंसियों) के तन्त्रजाल (नेटवर्क) द्वारा संचालित होती हैं। इसकी पद्धति जिन स्थापित प्रथाओं के अधीन निर्धारित होती है, उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका राजनीतिक दाँव-पेंच रचने में होती है।

इसे सन् 2010 में लिखी मदन कश्यप की एक कविता से स्पष्ट समझा जा सकता है--

उद्धारक

हम तुम्हारा उद्धार करेंगे

जिन्दा रखा तो जूठन खिला कर

पाँव धुलवा कर तुम्हारा उद्धार करेंगे

मार दिया तो बैकुण्ठ भिजवा कर

तुम्हारे वंशजों को अपना भक्त बना कर तुम्हारा उद्धार करेंगे

और किसी आफत बिपत, बेला-कुबेला, ठौर-कुठौर में

तुम्हारे जूठे बेर खाकर भी तुम्हारा उद्धार करेंगे!

अर्थात्, ‘सांस्कृतिक राजनीतिका गलियारा वाकई घनघोर संघर्ष का क्षेत्र है। इसे झेलते हुए ज्यादातर मजबूर लोग पस्त होकर या तो अंगीकार कर लेते हैं; या थक कर किनारे हो जाते हैं! जिन्हें वर्चस्वशाली लोग अपनी विजय मानते हैं। वे सोचने की चेष्टा तक नहीं करते कि--अपने तिकड़मों में उन्होंने जन-द्रोह, और इसलिए, राष्ट्र-द्रोह किया है।

संघर्षशील समुदाय, सांस्कृतिक संघर्ष के इस पूरे खेल में इस वर्चस्वावादी धारणा को सहजता से स्वीकार नहीं करते; वे इन्हें उच्चया अन्य को हीनसंस्कृति भी नहीं मानते। उनकी राय में वही संस्कृति मूल है, जिसमें सामुदायिक जीवन-सन्धान को अर्थवत्ता प्रदान करनेवाली सामाजिकता हो, जो उनके भौतिक अनुभवों से प्रसूत हो और जो उनके अस्तित्व को अर्थ दे।

दुनिया भर के विशिष्ट इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने समाज के सभी वर्गों (अभिजात, अधीनस्त, श्रमिक, सवर्णेतर) की संस्कृति के जीवन्त आयाम और जीवन की अर्थवत्ता तराशने की सक्रिय प्रक्रिया का अध्ययन किया है। रेमण्ड विलियम्स ने तो जीवन जीने की सम्पूार्ण पद्धतिको ही संस्कृति की धारणामाना। अर्थात्, भिन्न-भिन्न वर्गों के लोग जिस तरह सोचते हैं, समझते हैं, अनुभव करते हैं, क्रियाशील रहते हैं, जीवन-यापन करते हैं, उत्सव-उल्लास में हिस्सा लेते हैं...क्योंकि भिन्न-भिन्न सामाजिक सम्बन्धों के कारण, विचारों में निर्णायक भेद उपस्थित होते हैं। इसी भेद की स्थिति देखकर रेमण्ड विलियम्स की राय में वर्ग आधारित अध्ययन महत्त्वपूर्ण बना रहा।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ग-संघर्ष की कोई एक श्रेणी नहीं होती। इसके अनेक आधार होते हैं--लिंग, वंश, जातीयता, कामुकता (सेक्सुअलिटी), आयु...। सांस्कृतिक राजनीतिकी अवधारणा का मूल वस्तुतः वर्चस्वया आधिपत्यकी ही धारणा है। अर्थात्, ठीक है कि सारे मनुष्य हैं, पर हम उन सबसे श्रेष्ठ हैं! श्रेष्ठ हैं ज्ञान में, समृद्धि में, क्षमता में, प्रभुत्व में...किसी न किसी तरह हम औरों से श्रेष्ठ हैं! सबके सब मेरे सामने छोटे हैं, इसलिए इन्हें मेरे सामने अदब से पेश होना चाहिए। नहीं होंगे तो इन्हें भौतिक रूप से दण्डित किया जाना चाहिए। आधिपत्य की धारणा’ (नोशन आॅफ हेजेमनी, इटली के प्रसिद्ध मार्क्‍सवादी दार्शनिक एण्टोनियो ग्राम्शी’, सन् 1891-1937) इसी समझ पर आधारित है। ध्यातव्य है कि आधिपत्यकेवल उत्पीड़न और दमन से ही नहीं, उत्पीड़ितों की मौन सहभागिता या समायोजन से भी छा जाता है।

उत्पीड़ितों की यह मौन सहभागिता या समायोजन उनकी मूढ़ता भी नहीं है। असल में वर्चस्वशाली विचारों के आधिपत्य की जटिल संस्कृति इन उत्पीड़ित समूहों के समक्ष, इस आडम्बर के साथ खड़ी ही होती है, कि वे इन्हें सहजता से बड़े पैमाने पर स्वीकार कर लेते हैं, अपना लेते हैं।

इस बात से सहमति ग्राम्शी की भी है कि प्रतिपक्षी ताकत कभी भी, आधिपत्य के वर्चस्वशाली विचारों की मूल संरचना को चुनौती देने के लिए संघर्ष कर सकता है। इसलिए वर्चस्वया आधिपत्यके लिए निरन्तर संघर्ष करना ही पड़ता है, फिर भी यह, पूरी तरह कभी प्राप्त नहीं होता।

सांस्कृतिक राजनीतिका मूल लक्ष्य अधिपतियों द्वारा दुर्बलों को अधीनस्त बनाना होता है। ग्राम्शी ने इसी धारणा का उपयोग उन सामाजिक समूहों की पहचान करने में किया जिन्हें अधिपतियों के समूह से बाहर रखे जाते हैं। इस बहिस्कृति के कारण उस वंचित समाज में खुद को अभिव्यक्त करने के साधनों की कमी होती है। यही सांस्कृतिक राजनीतिहै और यही राजनीतिक अर्थनीतिहै। इन प्रसंगों पर विचार करते समय अस्मिता और क्षमता का प्रश्न महत्त्वपूर्ण होता है। छठी से तेरहवीं शताब्दी के बीच रचे गए भारतीय भाषाओं के भक्ति साहित्य में इसका विलक्षण सदुपयोग हुआ है। इन रचनाओं ने भक्ति आन्दोलन के सहारे देशव्यापी सांकृतिक आन्दोलन का वातावरण बनाया। उस दौर के वर्चस्ववादी आचरण का प्रतिपक्ष रचा। वर्चस्वशाली समुदाय के नीतिगत पाखण्ड को उजागर किया। उनके द्वारा प्रचारित अद्वैत-सिद्धान्त के खोखलेपन को स्पष्ट किया। इस उद्यम की सफलता का सर्वाधिक प्रशस्त मार्ग उन्हें प्राचीन ग्रन्थों में दर्ज भारतीय समाज की थाती का आत्मसातीकरण ही लगा। अनुवाद ही लगा। जिसने अनुवाद के उपयोग से भारत के वंचित समुदाय की क्षमता और चेतना की सच्ची छवि निरूपित की। भारत में भक्ति आन्दोलन के सन्दर्भ में सांस्कृतिक राजनीतिको इसी सन्दर्भ में देखे जाने की जरूरत है। इसलिए अनुवाद इस सांस्कृतिक आन्दोलन का विशिष्ट पक्ष है।

पाठ में दर्ज अस्मिता (जाति, धर्म, वंश, लिंग, वर्ग, प्रतिभा, पौरुष, विकलतादि) का अनुवाद करते समय ज्ञान-शाखाओं के विविध रूपों का उपयोग महत्त्वपूर्ण होता है इसमें मानव विज्ञान, दर्शन, इतिहास, मनोविज्ञान, साहित्यिक सिद्धान्त एवं आलोचना...सबका उपयोग होता है। इस प्रक्रिया पर समाज की सत्ता-संरचना का प्रभाव अवश्य ही पड़ता है।

पाठ में जनपदीय प्रयुक्तियों के बूते भाषा की ताकत बढती है, सम्प्रेषण में निखार आता है, स्थानीय अस्मिता का प्रभावशाली निरूपण होता है; इसलिए अस्मितामूलक संस्कृतियों का समावेश बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। अनुवाद करते समय ये प्रयुक्तियाँ अनुवादकों के समक्ष बड़ी चुनौती खड़ी करती है। अनूदित पाठ में इन प्रयुक्तियों का सही निरूपण न हो तो, अनूदित पाठ घटनाओं का संकेत भर रह जाएगा। फिर ऐसे अनुवाद का क्या प्रयोजन होगा?

प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक विल्हेम वॉन हम्बोल्ट (फ्रेडरिक विल्हेम क्रिश्चियन कार्ल फर्डिनान्द वॉन हम्बोल्ट, सन् 1767-1835) अनुवाद को असम्भव जैसा कार्य मानते थे। वे माने, मानने से किसको कौन रोकेगा। मैं नहीं मानता। मैं मानता हूँ कि अनुवाद सम्भव है, इसे असम्भव माननेवाले लोग, मेहनत से बचने के अपने आलस्य को इस कर्म के सिर थोपना चाहते हैं। उन्होंने ए. डब्ल्यू. श्लेगल (अगस्त विल्हेम श्लेगल) को जुलाई 23, 1796 को एक पत्र में लिखा कि अनुवादक दो में से किसी एक बाधा का शिकार अवश्य होगा--

  • या तो वह अपने देश की भाषा की कीमत पर मूल के करीब रहेगा,
  • या मूल की कीमत पर अपने वैशिष्ट्यों से जुड़ा रहेगा। ...

दो में से कुछ भी हो तो बुरा क्या है? अनुवाद तो हो!

क्योंकि अनुवाद होगा तो संवाद होगा! ज्ञान का आदान-प्रदान होगा! अनुभवों के बीच, संस्कृतियों के बीच, सभ्यताओं के बीच संवाद तो होगा! संवाद के लिए अनुवाद होना जरूरी है।

 

Search This Blog