Tuesday, October 27, 2020

सहत दुसह बन आतप बाता (मायानन्‍द मि‍श्र की स्‍मृति‍)

 

धर्म, वृत्ति एवं दायित्व से भी अधिक प्रेम मातृभाषा मैथिली से करनेवाले श्रेष्ठ कवि-कथाकार, प्रखर चिन्तक मायानन्द मिश्र का निकटवर्ती मैं कब और कैसे हुआ, मुझे याद नहीं आता। सन् 1976-78 में मैं सहरसा कॉलेज (मनोहर लाल टेकरीवाल कॉलेज, सहरसा का पुराना नाम) में आई.एस-सी का छात्र था। मातृभाषा मैथिली भी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती थी। सम्भवतः उसी दौरान उनके मोहक व्यक्तित्व, मन्त्रवत् ध्वनि और आकर्षक अध्यापन-शैली से मेरे मन में सम्मोहन बढ़ा होगा। यहाँ स्वीकार करूँ कि स्कूली जीवन में ही मैंने अपने लिए वृत्ति का चुनाव कर लिया था। आठवीं से ग्यारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई के दौरान कपिलेश्वर दिलमणि उच्च विद्यालय, धरहरा के प्रधानाध्यापक जगदीश झा और विज्ञान शिक्षक भोगेन्द्र सादा एवं रमानाथ राय के अध्यापन से मैं इतना मोहाविष्ट था कि उन्हीं दिनों शिक्षण पेशा में अपना जीवन बिताने का निर्णय ले लिया था। निर्णय यह भी लिया कि मैं सम्मोहक शिक्षण से शि‍क्षार्थी को मुग्ध रखनेवाला शिक्षक बनूँ, कोई शिक्षार्थी मेरे अध्यापन के समय हिले तक नहीं। मेरे पिता मध्य विद्यालय में शिक्षक थे। स्कूली जीवन में ही मैंने कनिष्ठ छात्रों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। मेरी पारिवारिक अभावग्रस्तता पर दयार्द्र होकर कुछ लोगों ने यत्किंचित पैसे भी देने की चेष्टा की; किन्तु मेरे पिताजी ने मना कर दिया। उन्होंने कहा था कि इसे पैसे का चस्का लग जाएगा तो स्वाध्याय प्रभावित होगा।

मैट्रिक (ग्यारहवीं) पास करने के बाद सहरसा कॉलेज में नामांकन हुआ। जब गणित के अध्यापक मो. ओजैर और मैथिली के अध्यापक मायानन्द मिश्र को पढ़ाते देखा-सुना, तो मैंने अपने निर्णय को तनिक दुरुस्त किया। अब तय किया कि मैं कॉलेज या विश्वविद्यालय में शिक्षण करूँगा, स्कूली शिक्षण में सम्भवतः मैं सफल न होऊँ। इसलिए कक्षा में बैठकर मैं सदैव यही तलाशता रहता था कि अध्यापक महोदय में क्या कम है कि मैं इनकी बातों से आकृष्ट नहीं हो रहा हूँ? ताकि एक सफल अध्यापक होने के लिए स्वयं से वे कमियाँ दूर करता जाऊँ। पद्धति मालूम नहीं, पर एक सफल अध्यापक के व्यक्तित्व में सम्मोहन की अनिवार्यता की समझ मुझे स्कूली जीवन में ही हो गई थी।...

तो मैथिली पढ़ाने के लिए मायानन्द मिश्र कक्षा में प्रकट हुए। धोती-कुर्ता पहने हुए वे ज्यों ही कक्षा में प्रविष्ट हुए, उनके भव्य व्यक्तित्व की मनोहरता देखता ही रह गया। हाजिरी लेने के बाद उन्होंने मनबोध रचित कृष्ण-जन्म महाकाव्य का एक अंश पढ़ाना शुरू किया। बाद के दिनों में कवीश्वर चन्दा झा रचित मिथिला भाषा रामायण के सुन्दर-काण्ड का एक अंश पढ़ाया। वह सुरमय ध्वनि, व्याख्या-विश्लेषण करते हुए गद्य का वह लालित्य, मन्त्रमय सम्मोहन से भरी वह भंगिमा...उनके मोहक व्यक्तित्व पर बहुत फब रही थी। उनकी पहली ही कक्षा में ऐसा मोहित हुआ कि जब-तब इच्छा करती रहती उनके साथ कुछेक कदम चलने की। पर ऐसा तब हो न सका। आई.एस-सी पास करने के बाद बी.एस-सी. में भाषा की पढ़ाई बन्द हो गई। इसलिए उनके निकटवर्ती होने के सम्भावित रास्ते ही बन्द हो गए।

मुख्यतः मैथिली में, कभी-कभी हिन्दी में भी, मैं तुकबन्दी और फिकरेबाजी छठी-सातवीं कक्षा से ही करता था; गाँव के हास्यजीवी लोगों की प्रशंसा भी पा लेता था। नौवीं-दसवीं तक आते-आते फिल्मी गीतों की पैरोडी में गाँव की कीर्तन-मण्डली के लिए भजन, गीत इत्यादि भी लिखने लगा। यद्यपि रामकथा, कृष्णकथा, पुराकथा की कई किताबें पढ़ चुका था। कालिदास, विद्यापति, सूरदास, कबीरदास, तुलसीदास, बंकिम, शरत्, रवीन्द्र, प्रेमचन्द, प्रसाद, पन्त, महादेवी, निराला से परिचय शुरू हो गया था। 'मिथिला मिहिर', सारिका, धर्मयुग, आजकल, दिनमान, रविवार जैसी कुछ पत्रिकाएँ भी पढ़ने लगा था। सहरसा कॉलेज पत्रिका में एक तुकबन्दी कविता छप गई थी। फिर दूसरी तुकबन्दी कविता 'मिथिला मिहिर' में छप गई।

सन् 1981 में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के अधीन संचालित सहरसा कॉलेज सहरसा में पाँच विषयों (मैथिली, हिन्दी, इतिहास, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र) में एम.ए. की पढ़ाई मंजूरी मिली थी। मैं तब तक बी.एस-सी. की परीक्षा दे आया था। मेरी इच्छा मैथिली से एम.ए. करने की हुई। पर वैधानिक अड़चन थी कि स्नातक स्तर पर मेरा विषय मैथिली नहीं था। विशेष परिस्थिति में स्नातकोत्तर केन्द्र के विभागाध्यक्ष की अनुमति से नामांकन सम्भव था। लेकिन मैथिली के विभागाध्यक्ष उमेश मिश्र से कौन कहे? बी.एस-सी. के दिनों से ही गणित के अध्यापक प्रो. हरिप्रसाद सिंह का मुझ पर स्नेह-भाव था। उन्हीं के कहने पर उमेश मिश्र जी ने नामांकन होने दिया; पर शर्त रखी गई कि उसी वर्ष मैं मैथिली, हिन्दी और अंग्रेजी विषय के साथ बी.ए. की परीक्षा पास कर लूँ, वर्ना एम.ए. की परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा। ये सारी औपचारिकताएँ पूरी कर ली गईं।

उन्हीं दिनों सहरसा में आयोजित विद्यापति स्मृति समारोह के अवसर पर मैथिली में निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था। 'मैथिली लोक साहित्य एवं ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म' विषय पर लिखा मेरा निबन्ध पुरस्कृत हुआ था; मुख्य अतिथि बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. अखलाक उर रहमान किदवई के हाथों मुझे पुरस्कार दिया गया था। मैथिली से सम्बद्ध सहरसा के विद्वानों की दृष्टि में मेरी पहचान दर्ज होने का दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण वही बना। पहला कारण था विद्यापति स्मृति समारोह के आयोजन में सक्रिय कार्यकर्ता होना। मेरी उस सक्रियता के कारण थे मैथिली के अध्यापक डॉ. मनोरंजन झा। वे अपने स्कूली जीवन में मेरे पिता के शिष्य रहे थे, फलस्वरूप उनका स्नेह-भाव मुझ पर बना रहता था। डॉ. महेन्द्र (मैथिली विभाग) से मैं पहले ही परिचित हो चुका था। इसी बीच एक दिन डॉ. महेन्द्र और डॉ. शिवशंकर झा कान्त ने मिलकर अनवरतनाम से एक अनौपचारिक संस्था गठित कर दी। अनौपचारिक इसलिए कि इसका कोई विधिवत् विधान नहीं बनाया गया। बस इतना तय किया गया कि संयोजक देवशंकर नवीन होंगे, अध्यक्ष उस दौर के प्रसिद्ध कवि-पत्रकार जयानन्द झा। महीने में दो गोष्ठियाँ आयोजित होंगी। संयोजक जिस किसी साहित्यसेवी के घर गोष्ठी का आयोजन तय कर दे, सबको मान्य होगा। सबको निमन्त्रण देने का दायित्व संयोजक का और आगत रचनाकारों को चाय पिलाने का दायित्व गृहस्वामी का होगा। आतिथ्य में कोई भी स्वागतिक अधिक खर्च न करें। सभी साहित्यसेवियों को ये बातें मान्य हुईं। सहरसा में अनवरतकी गोष्ठियाँ चल निकलीं। मायानन्द मिश्र सभी गोष्ठियों में आते थे। सम्भवतः इन्हीं गोष्ठियों के दौरान मैं उनका करीबी होने लगा। उनके घर आना-जाना, साथ बैठकर देर तक उनकी बातें सुनना मनभावन लगता था।

शाम को वे प्रायः घूमने निकलते थे, मैं ट्यूशन पढ़ाने की अपनी वृत्ति से फुरसत पाकर सड़क किनारे खड़ा रहता था। उनके आते ही साथ हो लेता था। कोई एक विषय छेड़ देता, वे शुरू हो जाते। उनका घूमना और मेरी पढ़ाई साथ-साथ होती रहती। ऐसी चतुराई मैं जब-तब डॉ. महेन्द्र के साथ भी करता था। बल्कि मेरी यह चतुराई सन् 1991 में जे.एन.यू. दिल्ली आने पर भी कायम रही। अन्तर बस इतना था कि जो आचरण सहरसा में मायानन्द मिश्र और महेन्द्र के साथ करता था, जे.एन.यू. परिसर में नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय के साथ करने लगा। रात्रि-भोजन के बाद ये लोग टहलने निकलते थे। उचित ठिकाने पर मैं समयानुसार प्रतीक्षा में खड़ा हो जाता, उनके आते ही साथ हो लेता। दो-एक पल इधर-उधर की बातें होतीं, फिर मैं अपना सवाल शुरू करता, एक ही सवाल के जवाब में सारा समय निकल जाता।...लोग इसे भावुक धारणा न समझें तो मैं कहना चाहूँगा कि विद्वानों के साथ कदम मिलाकर चलने से या उनके शरीर की हवा लगने से भी संस्कार परिमार्जित होता है। अकबर जैसे शहंशाह ने रहीम, तानसेन, टोडरमल जैसे विद्वानों को यूँ ही तो अपना सभासद नहीं बनाया होगा! मायानन्द, महेन्द्र, नामवर, मैनेजर पाण्डेय जैसे विद्वानों के साथ कदम मिलाकर चलने का जो सुख मुझे मिला, वह आज मेरे जीवन की पूँजी है।...हाल-चाल के सवालों से छिटककर मैं ज्यों ही मायानन्द मिश्र से भाषा, साहित्य, समाज, सामाजिक व्यवहार के प्रसंगों की जिज्ञासा करता, वे अपने शाश्वत निर्मल मुस्कान के साथ पल भर मेरे चेहरे की ओर देखते! वह मुस्कान मेरी अज्ञता पर होती या मेरी चतुराई समझ लेने के उद्योग पर, मालूम नहीं; पर जब शुरू होते, तो किस प्रसंग को किसके साथ जोड़कर पूरी बात मेरे मस्तिष्क में उतार देते, पता नहीं लगता। मैं गौर करता कि मेरे सवालों से वे प्रसन्न बहुत होते! बहरहाल...

व्यक्तित्व की मृदुलता एवं व्यवहार-कुशलता के कारण पूरा मैथिल समाज स्वयं को मायानन्द मिश्र का सर्वाधिक करीबी मानने का दम्भ पाले रहता था, किन्तु मेरी समझ जितनी बनी, उसमें डॉ. महेन्द्र से अधिक करीबी उनके जीवन में कोई नहीं थे। जिस दिन सड़क किनारे देर तक प्रतीक्षा करके भी मैं उन्हें आता हुआ नहीं देखता, मैं समझ जाता कि वे डॉ. महेन्द्र के घर बैठे हुए हैं। मैं वहीं पहुँच जाता। देर तक बातें होती रहतीं, साहित्य की, समाज की, शिक्षा की, संस्कृति की, अपसंस्कृति की, मैथिली की रचनाशीलता में नवता लाने की, नवागत लेखकों के लिए अध्यवसाय की जरूरत की...ढेरो बातें होतीं; इस अनौपचारिक गोष्ठी को भंग करने का मन तो किसी का नहीं होता, पर उठना ही पड़ता।

वैसे तो व्यस्तता, मायानन्द मिश्र के जीवन का अनुषंग बनकर जन्म के साथ ही आई थी; बालापन से ही दायित्व एवं समझ के ऐसे दवाब सहते आए कि दिनचर्या के किसी भी क्रम की प्रतिक्रिया उनके जीवन-व्यवहार में विसंगति प्रकट नहीं करती; पर बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दो दशक उनके जीवन का अति व्यस्त समय दिखता था। देवोत्थान तिथि के दो दिन बाद (कार्तिक धवल त्रयोदशी/महाकवि विद्यापति की अवसान तिथि) से लेकर रामनवमी (चैत्र शुक्ल नवमी) तक शृंखलाबद्ध रूप से देश के कोने-कोने में विद्यापति स्मृति समारोह के आयोजन का ताँता लगा रहता। बाकी के समय में भी होता था, किन्तु इन पाँच महीनों में गहमागहमी मची रहती थी। यह समारोह देश के किसी कोने में हो, आयोजकों को मायानन्द मिश्र का प्रयोजन विद्यापति के तस्वीर की तरह होती थी। उनकी उपस्थिति मात्र को आयोजक अपने कार्यक्रम की सफलता मानते थे। कोई दो आयोजन एक ही दिन न पड़े, अथवा मायानन्द मिश्र का स्वास्थ्य असुविधाजनक न हो, तो वे किसी भी आयोजक को मना नहीं करते थे। इन आयोजनों में अपनी भागीदारी को अपना कर्तव्य मानते थे।

उनके इस उदार आचरण के कुछेक निन्दक भी मैथिल-पट्टी में क्रियाशील थे, क्योंकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक मातृभाषा के लिए ऐसा सम्मान विद्यापति और वैद्यनाथ मिश्र यात्री के बाद मायानन्द मिश्र को ही दिया जा रहा था! फिर वे मैथिल, जिन्हें यह सब प्राप्त नहीं हो रहा था, क्योंकर निन्दक नहीं होते! अजात-शत्रु तो वे थे नहीं! शक्तिवानों का विरोध कर लोग अपना गौरव बढ़ाते ही रहते हैं, अशक्यों का विरोध कर कोई क्यों अपनी गरिमा घटाएगा?...उन निन्दकों को बाद में भी इस बात का इल्म कभी नहीं हुआ कि आयोजकों को सप्ताहान्त में आयोजन करने की सलाह मायानन्द इसलिए देते थे ताकि आयोजन के कारण उनकी मूल-वृत्ति अध्यापन के कार्य में व्यतिक्रम न हो! दायित्वों का निर्वाह करने के बाद ही वे इन आयोजनों में मैथिली-आन्दोलन का बीज बोने जाते थे। जन-जन में मैथिल-चेतना जागाने के लिए वे इन आयोजनों का उपयोग करते थे। इसलिए वे उन्हें एक सीमा तक अपना ही आयोजन मानते थे। अपने आन्दोलनात्मक सन्धान में वे इन आयोजनों का उपयोग लगभग उसी पद्धति से कर रहे थे जैसे कभी बाल गंगाधर तिलक ने स्वाधीनता संग्राम का संकेत देने के लिए गणेशोत्सव का किया था। दुर्भाग्यवश उनके निन्दकों को इस बात का बोध नहीं हुआ।

विदित है कि पेशवाओं की गृहस्थ गणपति-पूजा को धार्मिक कर्मकाण्ड की सीमा से मुक्त कर सन् 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने, छुआछूत दूर कर राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाने, स्वाधीनता संग्राम के लिए समाज को संगठित करने का माध्यम बनाया और महाराष्ट्र में गणपति-उत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देने का कृती प्रयास किया और सफल हुए। इससे पूर्व यह पेशवाओं की गृहस्थ-पूजा तक सीमित थी। कहते हैं कि सतरहवीं शताब्दी में शिवाजी महाराज की माँ जीजाबाई ने यह प्रथा शुरू की थी। फिर तो यह आन्दोलन का जरिया बन गया। कुछ अवान्तर प्रसंगों की आशंकाओं से यद्यपि उदारवादी खेमे के वर्चस्वशाली नेताओं--व्योमेशचन्द्र बैनर्जी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, बदरुद्दीन तैयबजी, सुब्रमण्यम अय्यर आदि ने असहमति जताई; पर दृढ़निश्चयी लोकमान्य तिलक ने इस गौरवशाली परम्परा की नींव रखी और अपनी योजना में सफल हुए। विद्यापति स्मृति समारोह में मायानन्द मिश्र की भागीदारी को उसी धारणा से देखा जाना चाहिए। सचमुच वे मैथिली भाषा, साहित्य और संस्कृति के लोकमान्य थे। उन समारोहों में दिए गए उनके भाषणों की अमियवाणी का ध्वन्यांकन हुआ होता, तो आज एक बड़ी धरोहर हमारे समक्ष होती, जो अब किसी की स्मृतियों में भी नहीं है।

मैथिली के किसी सुबुद्ध शोध पर्यवेक्षक ने कभी किसी श्रमशील शोधार्थी को भाषिक एवं सांस्कृतिक चेतना के प्रसार में विद्यापति स्मृति समारोहों की भूमिका विषय पर शोध-प्रबन्ध लिखने की प्रेरणा दी, और शोधार्थी ने नैष्ठिक श्रम से कार्य किया तो पूरे प्रबन्ध के सारे महत्त्वपूर्ण पृष्ठ मायानन्द मिश्र के अवदान से घिरे रहेंगे। पर ऐसा होगा कैसे? मैथिल-जन तो अपनी ही पीठ थपथपाने में लगे हैं, उन्हें पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ होने की कोई लालसा नहीं है।...पर सब के आमन्त्रण पर सभी समारोहों में वे कर्तव्य-भाव से पहुँचते थे। कुछेक समारोहों को छोड़कर उनके सर्वाधिक प्रिय कवि-चिन्तक डॉ. महेन्द्र साथ रहते थे। सहरसा एवं आसपास के आयोजनों में कविता पढ़ने के लिए किसी-किसी समारोह में मुझ जैसे नौसिखिए को भी ले जाया करते थे। आयोजक की तरफ से मिली मानदेय राशि के अलावा कनिष्ठतम कवियों में वे अपनी मानदेय राशि बाँट देते थे। कुछेक बार मुझे यह इनाम मिल चुका है।

विभिन्न कस्बों के इन समारोहों के आयोजकीय उद्देश्य की जानकारी जुटाना कठिन है, पर अनुमान किया जा सकता है कि अपने भाषिक क्षेत्र से दूर रहकर भी वहाँ के मैथिल इस बहाने अपनी भाषा और संस्कृति को स्मरण करने, उस क्षेत्र में अपनी भाषा का महत्त्व बताने और शहर एवं आसपास के मैथिलीभाषियों से सम्बन्ध बनाने की नीयत से ऐसा करते होंगे (उल्लेखनीय है कि ऐसे आयोजनों के श्रोता-दर्शक और प्रशंसक बहुतेरे मैथिलेतर समाज के लोग भी होते रहे हैं)। सम्भवतः ऐसा करते हुए वे अपनी अस्मिता का प्रमाण देने की भी चेष्टा करते थे, क्योंकि उनमें से अधिकांश मैथिल विद्यापति के सम्बन्ध में प्रचलित जनश्रुतियों से अधिक कुछ भी नहीं जानते थे। आज भी स्थिति कोई बेहतर नहीं है। अधिकांश मैथिलों का भाषानुराग बंगलाभाषियों जैसा आज भी नहीं है। वे गीतों और नृत्यों में अधिक रुचिशील रहते थे। मैथिली-मंच के गवैयों-नटुओं का अनुराग भी विद्यापति की रचनात्मक गरिमा से नहीं के बराबर था। अधिकांश गवैयों-नटुओं का प्रमुख उद्देश्य पतनशील जनरुचि को सहलाकर ताली लूटना हो गया था। मायानन्द मिश्र ने सुनियोजित पद्धति से इन आयोजनों की धारा बदल दी। अपने भाषणों एवं संचालकीय वक्तव्यों और कवि-गोष्ठियों के माध्यम से वे आयोजक समेत श्रोता-समूह की चेतना में मैथिली और मैथिलपन की संस्कार-सुधा भर रहे थे।

महाकवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री की प्रेरणा से बेशक सन् 1954 में पटना के मैथिलों द्वारा चेतना समितिकी स्थापना हुई; उससे पूर्व सन् 1943-45 के बीच रामकृष्ण झा किसुन के सौजन्य से संस्थापित श्री मैथिली समिति और श्री मिथिला पुस्तकालय के तत्त्वावधान में सुपौल में और उनके आत्मीय मित्र चन्द्रनाथ मिश्र अमर के उद्यम से दरभंगा में बेशक कवि-गोष्ठियों के आयोजन से जनमानस में मातृभाषा अनुराग के अलख जगाए गए; पर तथ्य है कि उन्हीं किसुनजी द्वारा संस्कारित-दीक्षित और अमरजी द्वारा उत्प्रेरित मायानन्द मिश्र की प्रेरणा से कश्मीर से कन्याकुमारी तक के विभिन्न नगरों-कस्बों में मैथिली समिति की स्थापना हुई और विद्यापति समृति समारोह मनाया जाने लगा; जहाँ वे जाते भी थे, और भाषा से अनुराग रखकर अपनी संस्कृति और निजता बचाए रखने का मर्म भी समझाते थे। मुझे स्मरण है कि मेरे आग्रह पर वे एक बार डॉ. महेन्द्र के साथ मैथिली समिति, डालटनगंज, पलामू के आयोजन में भी आए थे। उन दिनों पलामू बिहार का ही जिला था, झाड़खण्ड राज्य अलग नहीं हुआ था। डालटनगंज की इस मैथिली समिति के संस्थापन में मैथिली के प्रारम्भिक दौर के कथाकार प्रबोधनारायण चौधरी की अपूर्व भूमिका थी।

गत शताब्दी के नौवें दशक का पूर्वार्द्ध उनके इतिहासाख्यानपरक औपन्यासिक शृंखला की रचना-प्रक्रिया का निर्णायक दौर था। डॉ. महेन्द्र तो उनकी रचना-प्रक्रिया ही क्यों, उनकी चिन्तन-प्रक्रिया तक के सहयोगी थे; कोशी अंचल के अनेक विद्वान मायानन्द की उस साधना के साक्षी हैं, जो मिलने आते, तो देखते कि वे दिन में भी मच्छरदानी ताने (सहरसा में उन दिनों दिन में भी मच्छर तबाह करते थे, अभी भी करते हैं; इस बात पर सहरसा के व्यवस्थापतियों को कोई लज्जा नहीं आती, आएगी भी नहीं!) कुछ पढ़ने-लिखने में लगे हुए हैं। ऐसे अनेक अवसरों के प्रत्यक्षदर्शी होने का सौभाग्य मुझे भी मिला है। उनकी साहित्यिक गतिविधियों के क्षेत्र में डॉ. महेन्द्र के बाद दूसरे सर्वाधिक करीबी केदार कानन थे। हमारी पीढ़ी के सम्मानित रचनाकार केदार कानन, मायानन्द के ममेरे भाई भी हैं, अर्थात् विशिष्ट कवि, कथाकार, चिन्तक, भाषा-भक्त रामकृष्ण झा किसुन के कनिष्ठ पुत्र। मगर इन सबसे अधिक वे मायानन्द मिश्र के अनुप्रेरक, साहित्यिक सहायक, सलाकार, प्रबन्धक, अनुशासक ...सब कुछ थे। तथ्य है कि केदार कानन के एकनिष्ठ श्रम के कारण मायानन्द की ढेरो रचनाएँ संजोई जा सकीं, प्रकाशित हो सकीं।...

उन्हीं दिनों मैंने मायानन्द मिश्र से एक कौशल सीखा कि किसी काम में लगें, तो ऐसे लगें कि खाते-पीते, सोते-जागते हर किसी से उसी विषय पर बात करें, सामनेवाला बेशक रुचि न ले, पर बात वहीं करें। इसका दोतरफा लाभ था, ग्राही की चेतना ग्रहणशील हो, तो वह क्रमशः रुचि लेने लगेगा, एक समर्थक बढ़ेगा; रुचिशील न हो तो ऊबकर मिलना छोड़ देगा, निरर्थक आकर समय नष्ट नहीं करेगा।...यह बात उन्होंने उपदेश देकर नहीं सिखाई थी, मैंने उनकी युक्ति और उसकी परिणति से सीख ली थी। अपनी पहली पी-एच.डी. के दौरान इस युक्ति का उपयोग भी किया, और सफलता भी मिली।...

उल्लेख हो चुका है कि सम्मोहक व्यक्तित्व के कारण स्वयं को उनका करीबी माननेवालों की भरमार थी। जब-तब कोई न कोई मिलने आ जाते। अब घर आए व्यक्ति को वापस तो करते नहीं? और बैठाकर बात करते तो किस विषय पर करते? जिन दिनों वे इतिहासाख्यान में रमे हुए थे, वही पढ़ते, वही लिखते, वही सुनाते थे। इस बहाने सम्भवतः वे अपनी संरचना को संशोधित करने की तरकीब भी निकालते थे। दूसरे किसी प्रसंग में उनकी रुचि नहीं होती, इसलिए हर आगन्तुक को वही सुनाने लगते! अब धनार्जन-भण्डारण की चिन्ता में अहर्निश तल्लीन जिन लोगों को अपने पिता तक का मृत्यु-वर्ष याद न रहता हो, उन्हें पाषाण-युग और काँस्य-ताम्र-लौह-युग की विशेषता और सन् सुनने में कितनी रुचि होती? बेचैन होकर थोड़ी देर बाद चले जाते!...लोग चाहें, तो बेशक इसे मायानन्द की नीतिज्ञता मान लें, पर अपने आत्मीय लोगों के बीच इन स्थितियों के नाटकीय पुनर्कथन से खूब आनन्द लेते थे। उन ऊबे हुए श्रोताओं का जब वे वर्णन करते थे, हमलोग हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते थे। वे मैथिली में कहते थे--हे हौ! हम बुझिअइ, जे ई भागै लए छटपटा रहल अछि, मुदा हम खिस्सा बन्दे नइँ करिअइ (देखो! मैं समझता था कि यह आदमी भागने के लिए छटपटा रहा है, परन्तु मैं कथावाचन बन्द ही नहीं करता था)। इसमें छटपटा रहल अछिवाक्यांश वे ऐसी नाटकीय भंगिमा के साथ कहते थे कि ठहाकों का उत्सव मच जाता था। आज भी उनकी उस भंगिमा के स्मरण से मन में हास्य गूँज उठता है।

मायानन्द मिश्र की इतिहास-दृष्टि गजब की थी। मूल सन्दर्भ से तर्कसम्मत सम्पुष्टि और सम्पृक्ति के बिना वे तिनका भर आगे नहीं बढ़ते थे। सार्वत्रिकता के साथ-साथ स्थानीयता के सम्मान का वे विधिवत् ध्यान रखते थे। मैथिली साहित्य के काल-विभाजन में उनके दिए गए तर्क इस बात की पुष्टि के लिए सहायक हो सकती है। इतिहासाख्यानपरक औपन्यासिक शृंखला में भी उनकी इस प्रवृत्ति की पड़ताल की जा सकती है। अपने वक्तव्यों में जिस तरह वे तिथियों का क्रमवार उल्लेख करते थे, आम श्रोताओं को हैरानी होती थी। एक बार उनसे पूछा भी था कि आपको पहाड़े के अंकों की तरह तिथियाँ कैसे याद रहती हैं? उन्होंने बड़ी सहजता से जवाब दिया, जिसमें उनके इतिहास-अध्ययन एवं इतिहासाख्यान की सृजन-प्रक्रिया अनुगुम्फित थी। उन्होंने कहा कि इतिहास के हर अध्येता को सदैव पाठ के समानान्तर भूगोल का मानचित्र रखना चाहिए। काल और घटना की सूचना के साथ भूगोल के निर्दिष्ट बिन्दु पर मनतः चला जाना चाहिए, फिर उस दौर के सामाजिक सन्दर्भों पर विमर्श करना चाहिए। ऐसा करने से पूरे इतिहास का आख्यान वस्तुतः आख्यान की तरह याद रहेगा। पर किसी प्रसंग को याद रखने के लिए व्यक्ति का रुचिशील होना तो प्राथमिक योग्यता है!...

इतिहास-पाठ की इस विधि में उनके इतिहासाख्यान रचने की प्रक्रिया सहज ही रेखांकित है। मानव-सभ्यता और संस्कृति के मूल की ओर उनके इस आकर्षण की सूचना पहले मुझ जैसे अनेक लोगों को नहीं थी। डॉ. महेन्द्र और केदार कानन निश्चय ही कुछ न कुछ जानते होंगे। भारतीय स्वाधीनता के तीन दशक बीत जाने के बाद भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की मूल संवेदना स्पष्ट नहीं हो रही थी। शासकीय व्यवस्था के प्रभुत्व-सम्पन्न लोग अपना वर्चस्व और ऊँचा करने के लिए शासितों को निर्जीव पदार्थ की तरह कुचल रहे थे। भूख, अभाव, बेकारी...सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जा रही थी; आम नागरिक अकाल-दुर्भिक्ष एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं की भेंट चढ़ रहे थे; कर्ज के कारण जन-जन और राष्ट्र की अर्थिकता नष्ट हो रही थी; लोकहित की घोषणा तो हो रही थी, पर धरातल पर सब लोकाहित ही दिख रहा था; कला एवं साहित्य की पारम्परिक एवं नवांगीभूत पद्धतियाँ भी इनके स्वार्थ, क्रूरता, नृशंसता को विचलित नहीं कर पा रहे थे; द्वितीय विश्व युद्ध की परिणतियों के मद्देनजर समसामयिक भारत की परिस्थितियों पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर 'कुरुक्षेत्र' (1946), 'रश्मिरथी' (1952) जैसी कृतियों से युद्ध की परिणतियाँ दिखा चुके थे। युद्ध 'महाभारत' का हो या आधुनिक समाज के वैश्विक वर्चस्व का; परिणति अतिशय क्रूर होती है। इन दोनों युद्धों में किसके लिए कौन, किससे, क्यों लड़ा? परिणति क्या हुई? किसने क्या खोया, क्या पाया? भारत में क्या हो रहा है, क्या होनेवाला है...सारा लेखा-जोखा दिनकर 'महाभारत' के रूपक से दिखा चुके थे। इतिहास के पृष्ठों में लोग मुअन-जो-दड़ो के उत्खनन का तथ्यात्मक विवरण आसानी से देख लेते थे। किन्तु रांगेय राघव ने उसी विवरण से 'मुर्दों का टीला' (सन् 1948) उपन्यास में सिन्धु घाटी सभ्यता के समाज की धड़कन के सहारे समसामयिक भारत के जनजीवन को रेखांकित कर दिया था। ऐतिहासिक-पौराणिक विषयों पर हिन्दी में लिखे उपन्यासों में किशोरीलाल गोस्वामी, वृन्दानलाल वर्मा, जयशंकर प्रसाद, चतुरसेन शास्त्र, राहुल सांकृत्यायन, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर, रांगेय राघव जैसे शीर्षस्थ रचनाकारों ने एवं अन्य भाषाओं के रचनाकारों ने अपनी विलक्षण रचनात्मक दृष्टि से समकालीन भारत की वास्तविकता का रूपक प्रस्तुत कर दिया था। नई कहानी, साठोत्तर कहानी, नई कविता, अकविता के आघात को झेलकर भारतीय शासन व्यवस्था ढीठ हो चुकी थी। पर रचनाकार तो थकते नहीं! आपातकाल की दानवीयता के परिणामस्वरूप कांग्रेस की शर्मनाक पराजय, फिर मध्यावधि चुनाव, फिर शासकीय अनस्थिरता, अपराध का राजनीतिकरण, राजनीति का अपराधीकरण, भारतीय लोकतन्त्र की आड़ में जनविरोधी आचरण...समस्त परिस्थितियों ने मायानन्द मिश्र को उसी तरह बेचैन कर रखा था, जैसे कभी रांगेय राघव सामाजिक विडम्बनाओं का अनुशीलन करते-करते परेशान हुए होंगे। भारतीय इतिहास, पुराण और संस्कृति के मूल में जाकर रुग्ण वर्तमान के उपचार की पद्धति उन्हें यूँ ही नहीं मिली थी।...

'आगि मोम आ पाथर', 'चन्द्र-बिन्दु' (कथा संग्रह), 'बिहाड़ि पात आ पाथर', 'खोंता आ चिड़ै', ''माटी के लोग सोने की नैया'' (उपन्यास), ''दिशान्तर'' (कविता संग्रह) में तो वे अपनी नैष्ठिक प्रतिबद्धता, रचना-दृष्टि के मूल्यगत सरोकार और क्रूर यथार्थ के ईमानदार चित्रण का परिचय दे चुके थे। उनकी सृजन-प्रक्रिया के क्रमिक विकास पर गौर करनेवाले भावकों को स्पष्ट परिलक्षित होगा कि शैली के प्रति वे बेचैनी से बेशक न दौड़ें, पर अपने कहन में नूतनता लाने का प्रयास सदैव करते रहते थे। किन्तु सन् 1965 में 'मिथिला मिहिर' में 'खोंता आ चिड़ै' के धारावाहिक प्रकाशन के बाद मायानन्द जैसी तीक्षण दृष्टिवाले कथाकार का लगभग सोलह वर्षों तक मैथिली कथा से अनुपस्थित रहना सुधी पाठक-समाज के लिए विस्मयकर था! वैसे इस तीसरे उपन्यास की रचना भी पर्याप्त समय पहले हो गई थी। सन् 1957-58 के आसपास। पहला उपन्यास है 'बिहाड़ि‍ पात आ पाथर' (लेखन सन् 1954, प्रकाशन सन् 1960), दूसरा उपन्यास 'माटिक लोक' (लेखन सन् 1957, पाण्डुलिपि विनष्ट)। इस दीर्घ अवधि में सन् 1975 में 'नेपथ्यसँ हाक्रोश' शीर्षक कहानी के अलावा उनकी कोई कहानी प्रकाशित नहीं हुई। इतनी लम्बी साँस के बाद अचानक से मैथिली अकादेमी, पटना से सन् 1983 में 'चन्द्रबिन्दु' कथा-संग्रह प्रकाशित हुआ और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सन् 1983 में ही उनकी एक ताजा कहानी 'माध्यम,' सन् 1984 में तीन कहानियाँ 'भैरव', 'अभिनन्दन', 'भये प्रगट कृपाला', सन् 1985 में तीन कहानियाँ 'नमकहराम', 'दीनदयाला', 'हर्रे लागए न फिटकरी', सन् 1986 में एक कहानी 'कौशल्या हितकारी', सन् 1987 में एक कहानी 'झाँकी हिन्दुस्तान के' प्रकाशित हुईं। मैथिली कथा-साहित्य का कोष भरा और सुधी पाठकों के लिए हरषे लोचन भृंगजैसी स्थिति अवश्य हुई, पर कुछेक क्षुद्रात्माओं के वक्ष पर अजगर लोट गया। उनके लिए ऐसी उद्दाम ऊर्जा शेषावतार के फूत्कार-सी उत्तप्त एवं दुखदायी थी। उन्हें इस पूरे प्रसंग में कोई 'माया' दिखने लगी। उन्हें प्रतीति हुई कि मायानन्द मिश्र ने अपने कहानी-संग्रह 'चन्द्रबिन्दु' के लिए सन् 1987 का साहित्य अकादेमी सम्मान हथियाने की माया रची है, क्योंकि 'चन्द्रबिन्दु' उस वर्ष पुरस्कार के लिए नामित था। साहित्य की थोड़ी भी समझ रखनेवालों के मन में लगभग आश्वस्ति थी कि इस वर्ष निश्चय ही मैथिली का साहित्य अकादेमी सम्मान 'चन्द्रबिन्दु' कहानी-संग्रह के लिए मायानन्द मिश्र के नाम घोषित होगा! पर नहीं हुआ। पुरस्कारों के निर्णय की अपनी विधि होती है।...अब मायानन्द का नाम नहीं घोषित होने से उन कुछेक मैथिलों के मुँह में जीभ इतनी लम्बी हो गई, कि अनाप-शनाप बकने लगे! उन विकृत वक्तव्यों के स्मरण से आज भी चित्त उद्विग्न हो जाता है। वाकई मैथिल-सा विघ्न-सन्तोषी धरती पर अन्यत्र दुर्लभ है, किसी का नुकसान करने में ये अपने धन-खर्च तक की चिन्ता नहीं करते! एक विद्वान (?) ने ठहाकों के साथ सवाल किया था--अब माया की अगली माया क्या होगी?...अगले वर्ष 'चन्द्रबिन्दु' के प्रकाशन के पाँच वर्ष पूरे होने के कारण उस पर विचार सम्भव नहीं था, इसलिए क्षुद्रात्माओं को तोष मिला कि अब मायानन्द मिश्र निरर्थक हो गए। आज भी उनके ज्ञान पर दया आती है! उन्हें न तो मायानन्द की समझ हुई न 'चन्द्रबिन्दु' की, आगे भी कभी हुई या नहीं, कौन जाने? पर अगले वर्ष का साहित्य अकादेमी सम्मान 'मन्त्रपुत्र' उपन्यास के लिए मायानन्द के नाम घोषित हुआ। जबकि मायानन्द की अपनी ऊँचाई इन पुरस्कारों की ऊँचाई से बहुत ऊँची थी।

वस्तुतः मैथिली उच्चतर-शिक्षण में मायानन्द का दौर, अलभ्य-लाभ पाए मैथिलीजीवियों की प्राथमिक खेप का दौर था, जिनमें से अधिकांश को साहित्य-कला-संस्कृति से कोई अनुराग नहीं था। उन दिनों भी मैथिली की सही सेवा वे ही कर रहे थे, जिनकी रोजी-रोटी का माध्यम मैथिली नहीं था। मैथिलीभोगी तो बस मैथिली का सुख भोग रहे थे, मातृभाषा की गरिमा के लिए उन्हें कोई स्पृहा नहीं थी; श्रेष्ठ साहित्य की रचना और उसके उत्कर्ष के प्रसार से भाषा के भव्य होने की उन्हें समझ नहीं थी। वे अपनी अयोग्यता एवं आलस्य पर ही ऐंठे रहते थे। साहित्य के प्रभाव से शासन की नींव हिल जाने की उन्हें समझ नहीं थी, सम्भवतः उन्हें जानकारी नहीं थी कि भारतीय स्वाधीनता के दशक भर बाद स्वदेशी लोकतन्त्र की लोक-विमुख नीयत को साहिर लुधियानवी ने गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' (सन् 1957) के गीत में शासन-व्यवस्था की चूलें हिला दी थीं'ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया/ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया/ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया/ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...।' भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू को जब इस फिल्म की प्रमुख छवियाँ दिखाई गईं, तो वे इस फिल्म और इस गीत के माध्यम से उठाए गए ज्वलन्त सवालों को देखकर थर्रा गए थे।...इन मैथिलों को इस बात की न तो कोई समझ थी, न समझ बनाने की लालसा! वे ईर्ष्या के सागर में गोते लगा रहे थे! पर मायानन्द को इसकी समझ थी! इसीलिए वे रच रहे थे। वे आश्वस्त थे कि उनकी रचनाएँ इनकी हेंकड़ी पर कभी न कभी भारी पड़ेंगी। 'चन्द्रबिन्दु' संकलन की कहानियाँ आज भी अर्थवान हैं, वे अहमक आज जीवित होते और किसी समझदार आलोचक से व्याख्या करवाकर इन कहानियों को समझने की चेष्टा करते, तो सम्भवतः उनकी मूढ़ता दूर होती! बहरहाल...

मगर सवाल फिर भी वहीं है कि सन् 1970-80 के दो दशकों के विचित्र, विकृत राष्ट्रीय-क्षेत्रीय राजनीतिक परिस्थितियों पर वे चुप क्यों बैठे थे? अब मायानन्द मिश्र स्वयं तो जवाब देने के लिए रहे नहीं, रहते भी तो देते नहीं, क्योंकि अपनी बौद्धिक गतिविधियों का स्पष्टीकरण देना कभी उनके जीवन का स्वभाव नहीं रहा। असल में इस बात की जानकारी प्रो. महेन्द्र जैसे कुछेक लोगों को ही थी कि उस दीर्घ अन्तराल में मायानन्द भारत के इतिहास एवं संस्कृति की नींव पहचानने में लगे हुए थे। आम नागरिकों के सहज जीवन के लिए सन् 1960 के बाद के दो दशकों का समय, भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए दुर्वह था। दुनिया भर के रचनाकार अपनी-अपनी भाषाओं के साहित्य में क्रूर-दारुण दमनकारी शासकीय परिवेश के प्रतिपक्ष में अपनी बात रख रहे थे; मैथिली में भी सीताराम झा, कांचीनाथ झा किरण, वैद्यनाथ मिश्र यात्री, रामकृष्ण झा किसुन, ललित, राजकमल, सोमदेव, प्रभास, गुंजन, धूमकेतु...आदि अपनी-अपनी पद्धतियों से प्रतिपक्ष रख रहे थे। मायानन्द भी तो रखते ही आ रहे थे! पर प्रतीत होता है कि इस समय तक आते-आते सम्भवतः वे आधुनिकता, यथार्थ, अतियथार्थ, प्रकृत...जैसे मामलों से उधेड़बुन में पड़ गए थे और किसी नई पद्धति की तलाश करने लगे थे!

इस समय तक वे रचना में जीवन के क्रूर-कठोर यथार्थ को निर्ममता से अनावृत करनेवाले प्रकृतिवादी फ्रेंच उपन्यासकार, पत्रकार एमिल जोला (सन् 1840-1902) की धारणाओं से परिचित हो चुके थे। बीसवीं शताब्दी के प्राथमिक चरण आते-आते यथार्थवाद के विस्तृत आयामों का उपयोग करते हुए प्रकृतिवाद की सुगबुगाहट फ्रांस एवं दुनिया के अन्य भूभागों में साहित्य-सृजन का अंग बन चुकी थी। पात्र-प्रसंग-पर्यावरण की विश्वसनीयता, सहजता एवं जीवन के जैविक प्रयोजन पर इस धारणा में बल दिया जा रहा था। पर मायानन्द यहाँ यथास्थिति-सम्पोषक मैथिल पाठकों की पिछड़ी हुई मानसिकता से जूझ रहे थे। कछुए की तरह यथार्थ से मुँह छुपानेवाले पाठकों के समक्ष किसी नई ताकत से खड़े होने की प्रविधि तलाश रहे थे। उन्होंने राजकमल चौधरी की 'स्वरगन्धा' पर मैथिल विद्वानों का दुर्गन्धित बयान सुन लिया था। 'दिशान्तर' की भूमिका और 'अभिव्यंजना' की सम्पादकीय-दृष्टि में साहित्य सम्बन्धी अपनी धारणा व्यक्त कर दी थी; उन्हें स्पष्ट लगा कि ये मैथिल विद्वान पश्चिम के प्रकृतिवादी रचनाकार विक्टर मेरी ह्यूगो (सन् 1802-1885), चार्ल्स डिकेन्स (सन् 1812-1870), गुस्ताव फ्लौवेयर (सन् 1821-1880), एमिल जोला (सन् 1880-1902), अलफॉन्से दौदे (सन् 1840-1897), थॉमस हार्डी (सन् 1840-1928), जॉरिस कार्ल हाइस्मन्स (सन् 1848-1907), हेनरी रेने अलबर्ट गुइ दे मोपासाँ (सन् 1850-1893), अब्राहम काहन (सन् 1860-1951), एडिथ व्हार्टन (सन् 1862-1937), डैविड ग्राहम फिलिप्स (सन् 1867-1911), फ्रांक नॉरिस (सन् 1870-1902), स्टीफन क्रेन (सन् 1871-1900), थ्योडोर ड्रीजर (सन् 1871-1945), एलेन ग्लास्गो (सन् 1873-1945), जॅक लॉण्डन (सन् 1876-1916), थॉमस स्टीर्न्स इलिएट (सन् 1888-1965) जैसे रचनाकारों के उन्मुक्त चिन्तन को कैसे बर्दाश्त करेंगे? पर करना तो था! अब पाठकों पर वे लाठी तो चलाते नहीं! इसलिए किसी ताकतवर प्रविधि की तलाश में जुट गए। प्रविधि मिल गई, और लम्बे समय बाद 'मन्त्रपुत्र' (लेखन सन् 1985, प्रकाशन सन् 1986) के साथ पाठकों के सामने उपस्थित हुए। फिर तो 'प्रथमं शैल पुत्री च' (लेखन सन् 1987-88, प्रकाशन सन् 1990), 'पुरोहित' (लेखन सन् 1986-87, प्रकाशन सन् 1999) और 'स्त्रीधन' (लेखन सन् 2003, प्रकाशन सन् 2007) आया। साहित्य के सुधी पाठक जानते हैं कि कोई भी इतिवृत्तात्मक उपन्यास इतिहास नहीं, ऐतिहासिक रूपक में उसके वर्तमान की प्रस्तुति होता है। इसे कम लोग जान पाए कि मायानन्द के चारो इतिहासाख्यान भारत के आसन्न अतीत की रूपकात्मक प्रस्तुति है। अपने पाठकों को प्रभावी ढंग से कुछ कहने की विधि तलाशने में जिस मायानन्द ने अपने जीवन का सर्वाधिक ऊर्जावान समय लगा दिया, उनकी निष्ठा और ईमानदारी पर हतप्रभ होने के बजाय, ओछे लोगों ने अभद्र टिप्पणियाँ कीं! पर कोई बात नहीं, जिसके पास जो होता है, वही बाँटता है, नंगा नहा भी ले, तो क्या निचोड़े? इसलिए इतिहास एवं संस्कृति के ऐसे अध्येता-प्रवक्ता के सम्बन्ध में भ्रान्त होना भले लोगों के लिए भला नहीं है।

इतिहास एवं संस्कृति के गहन अध्ययन के दौरान उन्हें आश्वस्ति हुई कि समसामयिक भारत की राजनीतिक व्यवस्था और नागरिक जीवन का वास्तविक चित्र हमारे सभ्य होने के इतिहासाख्यान में है। पेड़ से उतरकर पशु या बन्दर की तरह हाथ-पैर दोनों के सहारे चलनेवाले मनुष्य, हाथ और माथ का सदुपयोग सीखनेवाले मनुष्य, आग और औजार का आविष्कार करनेवाले मनुष्य को उन्होंने अपने समय में जब फिर से नृशंस होते देखा, तो इतिहासाख्यान के रूपक में उन्हें सभ्यता का दम्भ भरनेवालों को आइना दिखाना बेहतर लगा। इस धारा के उनके चारो उपन्यास --'प्रथमं शैल पुत्री च', 'मन्त्रपुत्र', 'पुरोहित', 'स्त्रीधन' उनके इसी उद्यम के परिचायक हैं। इस धारा में उन जैसे अप्रतिम रचनाकार का पदार्पण वरेण्य है। यह दीगर बात है कि सन् 1986 में संकल्पलोक प्रकाशन, लहेरियासराय से 'मन्त्रपुत्र' (इतिहासाख्यान-क्रम का दूसरा खण्ड) उपन्यास का मैथिली संस्करण छपकर आया, तो मैथिली के कुछ सुविचारी विद्वानों ने अपनी टिप्पणी दी कि इस उपन्यास के पात्रों का नाम याद नहीं रहता। बड़ी हास्यास्पद टिप्पणी थी। बल्कि मैथिली पाठकीयता के लिए अपमानजनक था कि मैथिली के पाठकों को तत्सम उच्चारण के अपने ही पौराणिक नाम याद नहीं रहते, ये विश्व साहित्य के निकट कैसे जाएँगे? विदेशी लेखकों और उनके पात्रों के नाम कैसे याद रखेंगे?...इतिहासाख्यानपरक इस औपन्यासिक शृंखला में मैथिली आलोचकों ने देश-दशा की गम्भीर लेखकीय चिन्ता देखने की कोशिश नहीं की। या कहें कि इतिहासाख्यान की समकालीनता तलाशने का कौशल मैथिली में विकसित नहीं हुआ था, या फिर उपन्यास-लेखन के मूल उद्देश्य की जानकारी से वह मण्डली भटकी हुई थी। सम्भवतः वे नहीं जानते थे कि उपन्यास, साहित्य की सर्वाधिक गतिशील विधा होती है; जिसमें समकालीन समाज का सूक्ष्मतर स्वरूप समग्रता से उपस्थित होता है। कविता, कहानी या नाटक में इस समग्रता को समेटना सम्भव नहीं होता। यह काम उपन्यास से ही सम्भव होता है। 'माटी के लोग सोने की नैया' (प्रथमतः 'माटिक लोक' शीर्षक से मैथिली में रचित) की तरह मायानन्द मिश्र ने अपने इतिहासाख्यान के पहले दो खण्ड 'प्रथमं शैल पुत्री च' और 'मन्त्रपुत्र' मैथिली में ही लिखा था। मैथिली उपन्यास के इतिहास का यह दुर्भाग्य है कि 'माटिक लोक' तथा 'प्रथमं शैल पुत्री च' शीर्षक उपन्यास आज मैथिली की सम्पत्ति नहीं है।

'मन्त्रपुत्र' के प्रकाशन के बाद ही मैं मायानन्द मिश्र के इतिहासाख्यानपरक चिन्तन को जान पाया और अनुमान लगाया कि निश्चय ही इस विषय पर वे वर्षों से काम कर रहे होंगे। जनवरी 1985 से मैं सहरसा छोड़ चुका था, इसलिए छुट्टियों में गाँव आता था तो उनसे मिलना-जुलना होता था। उन दिनों उनसे मेरा पत्रचार नहीं होता था। ग्रीष्मावकाश, पूजावकाश और शीतावकाश में मिलना-जुलना खूब होता था, बैठकी का निर्धारित स्थान उनका या डॉ. महेन्द्र का आवास होता था। उनके पहले कविता-संग्रह 'दिशान्तर' की भूमिका में जिस किसी साहित्यानुरागी को उनके अध्यवसाय का ओर-छोर, साहित्य सम्बन्धी चिन्तन-प्रक्रिया, लेखकीय दायित्व और सामाजिक सरोकार का परिचय नहीं मिला, उन्हें ईश्वर (यदि कहीं होते हैं तो) भी परिचित नहीं करा सकता। साहित्य उनके लिए आत्म-स्थापन का तरुवर या निज-विज्ञप्ति का पर्चा नहीं था। समूह-चिन्ता और साहित्य-सृजन सम्भवतः उनके जीवन का कारण बन गया था। मुझे स्मरण नहीं आता कि मेरे साथ उनकी बातचीत कभी अपने या मेरे परिवार के भौतिक प्रसंगों पर हुई हो। ऐतिहासिक-पौराणिक विषयों में घुसने के बाद तो वे बाहर ही नहीं होते थे। किस इतिहासकार ने किस दौर की घटनाओं को कैसे देखा--सुन-सुनकर हैरान हो जाना स्वाभाविक था। सामान्य चर्चा में उनसे जितने इतिहासकारों का नाम सुन चुका हूँ कि इतिहास के सचेत शोधार्थी की नीन्द उड़ जाए -- राधाकुमुद मुखर्जी, रमेशचन्द्र मजुमदार, कवलम माधव पणिक्कर, आर्थर लेवेलिन बाशम, रामशरण शर्मा, राधाकृष्ण चौधरी, रणजीत गुहा, सतीश चन्द्र, बिपन चन्द्र, इरफान हबीब, रोमिला थापर, सुमित सरकार, द्विजेन्द्र नारायण झा, रामचन्द्र गुहा... किसी की स्थापना उनसे छूटी नहीं थी। सम्भवतः अपने इसी अध्यवसाय के कारण वे पुराण और मिथक को प्रामाणिक नहीं मानते थे।

सन् 1991 में मैं डालटनगंज छोड़कर दिल्ली आ गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फिर से पी-एच.डी. उपाधि के लिए नामांकन करा लिया। आकर्षण के केन्द्र थे भारतीय साहित्य एवं संस्कृति के विश्वकोष (इन्साइक्लोपीडिया) या कुतुबमीनार प्रो. नामवर सिंह। पहली ही भेंट में उनसे जैसा स्नेह मिला था, वह जीवन की पूँजी हो गया। जुलाई 1992 में यहीं से प्रभास कुमार चौधरी द्वारा आयोजित मैथिली कथा-गोष्ठी में भाग लेने के लिए बनारस गया था। लौटते समय मायानन्द मिश्र और मैथिलीपुत्र प्रदीप साथ-साथ दिल्ली आए। मैं कावेरी छात्रवास, जे.एन.यू. कमरा संख्या 231 में रहता था। दोनों लोग मेरे साथ ही रुके। प्रदीप जी अगले ही दिन चले गए, मायानन्द मिश्र को चारेक दिन रुकना था। कई काम साथ लेकर आए थे--राजकमल प्रकाशन, आई.सी.एच.आर. (भारतीय ऐतिहासिक अनुसन्धान परिषद), चतुरानन मिश्र, नामवर सिंह से भेंट, मैथिली आन्दोलन की गतिविधि...। क्रमशः सारे काम पूरे किए। सूई में धागे की तरह (यह मुहावरा उन्हीं का दिया हुआ है) हर जगह मैं साथ रहा। उन दिनों मैं जे.एन.यू. साहित्यिक सभा (लिट्रेरी क्लब) का संयोजक था। जे.एन.यू. में रात्रि-भोजन के बाद मेस में विशेष व्याख्यान आयोजित होता रहता था। अभी भी होता है, पर उन दिनों ऐसे व्याख्यानों का आयोजन औपचारिकता से नहीं, मिशन से होता था; ये आयोजन यहाँ के शैक्षिक वातावरण के महत्त्वपूर्ण अंश होते थे। अत्यन्त उत्साहवर्द्धक भागीदारी होती थी। शिक्षार्थी के साथ-साथ परिसर के नामचीन विद्वान शिक्षक भी श्रोता-दीर्घा में बैठकर ऐसी परिचर्चा को सार्थक बनाते थे; प्रश्नोत्तरी सत्र बहुत रोचक होता था। जे.एन.यू. लिट्रेरी क्लब के तत्त्वावधान में मैंने मायानन्द मिश्र के व्याख्यान की योजना बनाई। परिसर के मैथिल शिक्षार्थियों के अलावा अन्य बहुत सारे लोगों ने भी अपनी गहन दिलचस्पी दिखाई। उस व्याख्यान की अध्यक्षता मैंने नामवर सिंह से कराने की सोची। सुबह-सुबह जलपान के बाद नामवर जी से मायानन्द जी को मिलवाने के लिए ले जाना था। तभी अध्यक्षता के लिए स्वीकृति ले लेने की योजना बनाई। हम दोनों नामवर निवास (109, उत्तराखण्ड) पहुँचे। दरवाजा खोलते ही नामवर को मैं जब तक कहता कि मायानन्द जी आपसे मिलने आए हैं, तब तक नामवर जी स्वयं आह्लादपूर्वक बोल पड़े--अऽहाऽऽऽऽ, मायानन्द जी! आइए, आइए...! बड़े भाग हमारे!...फिर भीतर ले जाकर बैठाए और पहला वाक्य बोले--आपका दोनों उपन्यास आर-पार पढ़ गया। 'प्रथमं शैल पुत्री च' और 'मन्त्रपुत्र' दोनों। इतना हृद्य और इतना प्रामाणिक मैंने आज तक कोई दूसरा इतिहासाख्यान नहीं पढ़ा।...फिर दोनों विद्वानों की जुगलबन्दी देर तक हुई। कुछ जिज्ञासा, कुछ योजनाएँ, कुछ चिन्ताएँ, कुछ सलाह ...। बीच में नामवर जी ने एक हिदायत मुझे दी--जे.एन.यू. में मायनन्द जी की खातिरदारी में कोई कमी न रहे, इसका ध्यान रखना। विश्वविद्यालय परिसर की प्रतिष्ठा का सवाल है। इतने बड़े विद्वान परिसर में आए हैं, यह परिसर के लिए गौरव का विषय है। इनका व्याख्यान करवाओ!...अब क्या था, मैं फटाफट कह डाला--डॉक्टर साहब, आज ही कावेरी मेस में मैथिली भाषा एवं साहित्य पर शासकीय शतरंजविषय पर व्याख्यान कराने की योजना है, आपकी अध्यक्षता में! नामवर जी की त्योरी तनिक खिंच गई। फिर तत्काल सहज होते हुए बोले--देखो, बहुत समतल-सा विषय है यह। इस विषय पर बोलनेवाले लोग सहजता से मिल जाएँगे। चाहो, तो तुम खुद ही कभी बोल लेना। अभी मायानन्द जी जैसा गम्भीर विषय तय करो। 'ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखन में तथ्य और कथ्य का संघर्ष' विषय पर हिन्दी में बोलनेवाले मायानन्द जी से बेहतर कोई नहीं मिलेंगे। इस विषय पर व्याख्यान कराओ। अध्यक्षता किसी और से करा लो, मुझे छोड़ दो, मैं खाली रहा तो आ जाऊँगा।...

उनके घर से वापस होते हुए मायानन्द जी अत्यन्त प्रसन्न थे। उस रात मैनेजर पाण्डेय की अध्यक्षता एवं केदारनाथ सिंह समेत जे.एन.यू. के अन्य अध्यापकों के सान्निध्य तथा शोधार्थियों से खचाखच भरे हॉल में मायानन्द जी का दिव्य व्याख्यान हुआ। देर रात तक प्रश्नोत्तर संवाद चला। सभा समाप्ति के बाद वे अत्यन्त प्रसन्न दिख रहे थे।...

रात्रि-भोजन के बाद पान खाकर जे.एन.यू. की रवायत के अनुसार परिसर की सड़कों पर घूमना उन्हें भी अच्छा लगता था। साहित्य और समाज के विविध प्रसंगों बात करते हुए हम घूमते रहते थे। किसी प्रसंग में उन्होंने अचानक से कहा--नवीन! सही अर्थ में मेरे जीवन-संघर्ष, निष्ठा, साहित्यिक प्रतिबद्धता के वास्तविक उत्तराधिकारी महेन्द्र (डॉ. महेन्द्र, मैथिली विभाग, सहरसा, बिहार) और तुम ही हो!...

महेन्द्र जी तो वस्तुतः उनके उत्तराधिकारी होने की योग्यता रखते हैं! मायानन्द मिश्र के जीवन एवं सृजन से सरोकार रखनेवाले लोग यह बात जानते भी हैं। पर, अपना नाम सुनकर मैं अभिभूत हो उठा था। अपने प्रति उनकी इस उदार धारणा पर लगातार गम्भीरता से सोचता रहा। कभी-कभी संशय भी होता कि कहीं उनसे भूल तो नहीं हो गई! ...एक दिन उनका यह वक्तव्य मैंने उनके ज्येष्ठ सुपुत्र विद्यानन्द जी को सुनाया, उन्होंने कहा कि ऐसा वे घर में भी बोलते रहते हैं।...

चारेक दिन बाद मुझे अतिशय आशीष देते हुए वे सहरसा के लिए विदा हुए। डेढ़ेक माह बाद नवभारत टाइम्स (नई दिल्ली) के सितम्बर, 1992 के पहले रविवासरीय में छपी मेरी एक समीक्षा पर उनका शाबाशी भरा एक अन्तर्देशीय पत्र मिला (अत्यन्त खेद में हूँ कि अथक श्रम के बावजूद यह पत्र मिल नहीं सका); जिसमें उन्होंने मेरी निर्भीकता और तार्किकता की अतिशय प्रशंसा की थी। उस समीक्षा में सातवें दशक के एक हिन्दी कहानीकार के 'श्रमपूर्वक' लिखे कहानी-संग्रह की बखिया उधेड़ी थी। मायानन्द मिश्र की उस शाबाशी ने मुझे दायित्वबोध से इतना भर दिया कि सदैव के लिए मैं अपने समीक्षा-कर्म में सावधान हो गया। मार्च 07, 2003 के पत्र में उन्होंने 'स्त्रीधन' के लेखन की पूर्णता की सूचना के साथ मोतियाबिन्द एवं प्रोस्ट्रेट से ग्रस्त हाने की सूचना दी, जिसके इलाज के लिए वे एम्स, दिल्ली आना चाहते थे। नवम्बर 05, 2011 के उनके पत्र से ज्ञात हुआ कि अब वे अपनी लिखने की क्षमता को कमजोर पाने लगे हैं! बड़ी विकलता से उन्होंने लिखा कि अब लिख नहीं पाता हूँ, नामवरजी एक और कुछ लिखने के लिए कह रहे हैं...परन्तु सम्भवतः अब लिख नहीं पाऊँगा! थकान हो जाती है!यह बहुत ही विकलता भरी पंक्ति है, जो स्पष्ट करती है कि अभी लिखने के लिए उनके पास बहुत कुछ था, पर लिख नहीं पा रहे थे।

अगस्त 31, 1994 (बुधवार) उनके सेवाकाल का अन्तिम दिन था। जे.एन.यू. में मेरे कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। दरवाजा खोलते ही देखा कि अपने भव्य व्यक्तित्व और दिव्य मुस्कान के साथ हाथ में अटैची लिए मायानन्द मिश्र खड़े हैं। मेरे तो खुशी के ठिकाने न रहे। पाँव छूने के लिए मैं झुका। दोनों हाथों से मेरा कन्धा पकड़कर उठाते हुए बोले--आइ हमर नोकरीक अन्तिम दिन थिक (आज मेरी नौकरी का अन्तिम दिन है)। ऐसा कहते हुए उनके चेहरे की चमक देखने लायक थी, वह छवि आज भी जस के तस मेरी आँखों में बसी हुई है। उस यात्रा में वे दो ही दिन रुके। वापस जाने की तैयारी करने लगे। मैंने कहा--सर, रिटायर्ड आप हो चुके, रिटायरमेण्ट के बाद लोग सन्तान के पास जाते हैं। शिष्य भी तो सन्तान ही होता है। जाइएगा आराम से!...बातें मैथिली में हो रही थीं। उन्होंने तपाक से कहा--हेहौ, से भइए गेलै! देखहक ने! सेवानिवृत्तिक पहिल दिन तोरे संग रहिअने (हाँ, देखो न, वही तो हुआ, सेवानिवृत्ति का पहला दिन तुम्हारे साथ ही बिताया)...। बातें बहुत हैं कहने को, अभी तो इतना ही। मेरे पिता के देहान्त के लगभग डेढ़ बरस बाद जब मायानन्द मिश्र के देहावसान की सूचना मिली तो एक बार फिर से पितृशोक में चला गया।

मैथिली के ऐसे सुयोधन सेनानी, प्रबल मातृभाषा-भक्त, दूरगामी चिन्तक मायानन्द मिश्र कुल तिरासी बर्ष चौदह दिन की आयु जीकर, 31 अगस्त 2013 को ब्राह्म-मुहूर्त में प्रातः साढ़े चार बजे इस दुनिया से चल बसे, इस सूचना से पूरा भाषिक समुदाय हिल उठा था। मृत्यु तो सत्य और अवश्यम्भावी है, इसमें तो कोई सत्योत्तर (पोस्ट ट्रूथ) जैसा विमर्श काम करता नहीं; किन्तु सत्य है कि ऐहिक लोक से उनका यह प्रस्थान भारतीय साहित्य के लिए, खासकर मैथिली साहित्य के लिए एक सभ्यता और परम्परा का प्रस्थान है। उस सभ्यता और परम्परा का प्रस्थान, जिसकी आधारशिला मैथिल एवं मैथिली परिवेश में स्वातन्त्र्योत्तर भारत के पहले दशक में उनके पूर्ववर्तियों ने रखी और जिसकी सम्पुष्टि में वे अपने समवर्तियों के साथ कोई साठ बरस पूर्व से मनोयोगपूर्वक लगे रहे। सन् उन्नीस सौ साठ के दशक में स्थगन का शिकार हुई मैथिली-कथा को ललित और राजकमल के साथ उन्होंने न केवल अपूर्व समृद्धि दी, बल्कि एक नया क्षितिज भी दिया। हरिमोहन झा द्वारा बनाए गए मैथिली के विशाल पाठक समूह को उन्होंने अपने सहवर्ती कथाकारों के समर्थन द्वारा कथा-कौशल की नई-नई भंगिमाओं से परिचय कराया। मैथिली कथा अपनी सीमित परिधि से बाहर आई। हरिमोहन झा, वैद्यनाथ मिश्र यात्री (नागार्जुन), कांचीनाथ झा किरण और उपेन्द्र नाथ झा व्यास के बाद उन्होंने मैथिली उपन्यास लेखन को पूरे दम-खम से समृद्ध किया। अपनी विलक्षण जीवन-दृष्टि से सृजनशीलता के नए-नए रास्ते विकसित किए। इतिहास, समाज, भाषा (खासकर मातृभाषा), संस्कृति और आचरण के सहारे मानव-मन में प्रवेश--उनके चिन्तन-मनन का प्रिय क्षेत्र था। पार्थिव शरीर से अनुपस्थित रहकर भी वे आज अपने कृति-कीर्ति से अपने पाठकों को प्रेरित कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करते हुए मैथिली गीत को भी पुष्ट किया और मैथिली कविता में भी नव-चेतना, नई दृष्टि का प्रसार किया। नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, राजकमल चौधरी के साथ उनका नामोल्लेख उन गिने-चुने उपन्यासकारों में होता है, जिन्होंने अनुकरणीय साहस और कौशल से अपनी मातृभाषा की विभिन्न विधाओं में रचना करते हुए राष्ट्रभाषा हिन्दी के कोष को भी प्राणपण से पुष्ट किया। मुख्यतः गद्य-रचना करनेवाले मायानन्द मिश्र का सृजन-कर्म कविता से ही शुरू हुआ। सबसे पहले उन्होंने कविता ही लिखी, फिर कोमल संवेदनाओं के गीत रचे, फिर नए भाव-बोध की अभिव्यंजना करनेवाली कविताएँ। बाद के दिनों में वे कहानी, उपन्यास एवं आलोचनात्मक निबन्ध की ओर मुड़े, और गद्य में ही रमे रह गए। उन्होंने अपनी हर कृति से साहित्य में एक नया द्वार खोला।

उनके कृतिकर्मों का अनुशीलन कई दिशाओं में फैली उनकी समस्त गतिविधियों के सूक्ष्म विश्लेषण से ही सम्भव है; क्योंकि असाधारण तेज के स्वामी मायानन्द की नैष्ठिक सक्रियता अध्ययन, सृजन, अनुशीलन, शोध के अलावा आकाशवाणी के प्रसारण, संगठन, संयोजन, आन्दोलन, मंच, भाषण, भाषिक चेतना जगाने के उद्यम...सभी दिशाओं में नीति, विवेक, समर्पण से परिपूर्ण दिखती है। अपने समस्त अवधारित दायित्वों के निर्वहन में वे सदैव ईमानदारी से डटे रहे, किसी एक दायित्व के कारण कभी दूसरे की उपेक्षा नहीं की। इस बहुआयामी क्रियाशीलता का गहन प्रभाव उनकी रचनाशीलता पर भी पड़ा। पारिवारिक दायित्व एवं अध्यापन-वृत्ति के नैष्ठिक निर्वाह से बची उनकी ऊर्जा एवं समय का सम्पूर्ण निवेश यदि लेखन में ही हुआ होता तो उनकी रचनाओं का अजस्र भण्डार अब तक उपलब्ध भण्डार से कई गुणा अधिक होता। पर ध्यातव्य है कि इन गतिविधियों में वे किसी बाहरी शक्ति के दबाव या अन्यथा आसक्ति के कारण नहीं थे; सदियों पुरानी मैथिल संस्कृति एवं मैथिली भाषा की दुरवस्था के मद्देनजर ये गतिविधियाँ भी आवश्यक थीं, जो मायानन्द मिश्र ही कर सकते थे। क्योंकि अन्य किसी की रुचिशीलता इन उद्यमों में दिख नहीं रही थीं। संयोगवशवश इतिहासाख्यान एवं मिथिला के सांस्कृतिक विरासत के संज्ञान या अपनी रुचिशीलता के कारण वे उन विसंगतियों से परिचित थे, जिसमें मैथिली, मिथिला और मैथिल-जन के अस्तित्वमूलक प्रसंगों की अवहेलना आधुनिक भारत की राजनीति में चल रही थी।

अपनी मातृभाषा में वे विलक्षण रचना-कौशल और घनीभूत प्रतिभा के रचनाकार थे। उनकी सृजनशीलता में अपनी मिट्टी की सोंधी महक सुवासित थी। हिन्दी के पाठकों ने भी उनके समर्थ पदार्पण का सम्मान रेणु, नागार्जुन की तरह आत्मीयता से किया। सन् 1967 में प्रकाशित उनके 'माटी के लोग सोने की नैया' शीर्षक उपन्यास को आंचलिक उपन्यास के रूप में पाठकों ने सिर आँखों पर बिठाया। आज भी यह कृति हिन्दी साहित्य की धरोहर बनी हुई है। ध्यातव्य है कि इस समय तक फणीश्वरनाथ रेणु के पहले उपन्यास मैला आँचल (सन् 1954 में प्रकाशित) की ख्याति के कारण हिन्दी में आंचलिक उपन्यासपदबन्ध पर बहस छिड़ चुकी थी। इस उपन्यास के लोकप्रिय हो जाने के कारण पुस्तक की भूमिका में घोषित आंचलिक उपन्यासविशेषण पर हिन्दी के शोधवेत्ता सावधान होकर पहले आंचलिक उपन्यासकी खोज करने लगे थे। यह खोज पीछे जाते-जाते भुवनेश्वर मिश्र के घराउ घटना (सन् 1893), मन्नन द्विवेदी के रामलाल (सन् 1914 या 1917), शिवपूजन सहाय के 'देहाती दुनिया' (सन् 1926), नागार्जुन के 'बलचनमा' (सन् 1952) और 'वरुण के बेटे' (सन् 1957), उदयशंकर भट्ट के 'सागर लहरें और मनुष्य' (सन् 1955), रांगेय राघव के 'कब तक पुकारूँ' (सन् 1957) तक पहुँच गई थी। केशवप्रसाद मिश्र का 'कोहबर की शर्त' (सन् 1965) और राही मासूम रजा का 'आधा गाँव' (सन् 1966) तो बाद में प्रकाशित हुआ।

'माटी के लोग सोने की नैया' शीर्षक उपन्यास के बाद वे देर तक अपनी मातृभाषा में ही संलिप्त रहे। सन् 1990 में आकर इतिहासाख्यानपरक उनके दो उपन्यास 'प्रथमं शैल पुत्री च' और 'मन्त्रपुत्र' प्रकाशित हुए। यहाँ फिर से उल्लेखनीय है कि उनके ये तीनों उपन्यास--'माटी के लोग सोने की नैया', 'प्रथमं शैल पुत्री च' और 'मन्त्रपुत्र' प्राथमिक तौर पर मैथिली में ही लिखी गई थी। इन तीनों का हिन्दी संस्करण मैथिली में लिखी रचना का पुनर्लेखन है। मैथिली के सुचेता गौर करें कि ये तीनों कृतियाँ मैथिली की धरोहर नहीं बन पाई तो तो नुकसान किसका हुआ? स्मरणीय है कि 'प्रथमं शैल पुत्री च' और 'मन्त्रपुत्र' कोई अलग-अलग कृति नहीं है। एक ही इतिहासाख्यान का अलग-अलग कृति-क्रम है। इस शृंखला के दो और कृति-क्रम हैं--'पुरोहित' (सन् 1999) और 'स्त्रीधन' (सन् 2007)

अपने समय और समाज की मूल ध्वनि की वास्तविक पहचान रखनेवाले मायानन्द के कृतिकर्मों का अनुशीलन इन सभी को ध्यान में रखकर होना चाहिए, यह परवर्ती साहित्यसेवियों का दायित्व भी है। यह अनुशीलन दिवंगत मायानन्द के हित में नहीं, रह गए साहित्यसेवियों के सृजन-सरोकार के हित में होगा।

 

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