Tuesday, May 22, 2018

गागर में सागर/राजकमल चौधरी की मैथि‍ली कहनि‍याँ






राजकमल चौधरी ने हिन्दी के अलावा मैथिली में भी कविता, कहानी, निबन्ध, नाटक, आलोचना, पत्र-डायरी... सब कुछ लिखा, और बेहतरीन लिखा। तथ्य है कि स्वातन्त्र्योत्तर भारत की शासकीय व्यवस्था और लोकतन्त्र के रहनुमाओं ने जिस पेचीदगी से जनसामान्य को नारकीय जीवन-दशा में पहुँचाया, उन वर्जित विषय प्रसंगों से ही उन्होंने अपनी रचनाओं को खरोंचदार बनाया। उनकी रचना-शैली भी पाठकों को कहीं रेशम के नर्म स्पर्श से सहलाती नहीं, भाषा के खरोंच से उन्हें जगाती है, उद्बुद्ध करती है। अब इन प्रसंगों को खरोंचदार बनाकर राजकमल ने जिनकी बदनीयती को उजागर किया, वे तो उनके निन्दक होंगे ही! राजकमल-साहित्य का मूल्यांकन करते हुए इन बातों का ध्यान रखना उल्लेखनीय होगा। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार मैथिली में राजकमल के तीन उपन्यास (आन्दोलन’, ‘आदिकथाऔर पाथर-फूल’), एक प्रहसन (हफीम), एक एकांकी (महाकवि विद्यापति), एक रेडियो नाटक (बसात’), चार आलोचनात्मक निबन्ध, अड़तीस कहानियाँ तथा इक्यानबे कविताएँ उपलब्ध हैंैं।
विषय-वस्तु और शिल्प-संरचना--दोनों ही दृष्टियों से राजकमल चौधरी ने मैथिली कहानी को एक उत्कर्ष दिया। स्थानीय घटनाओं, तीर्थ-व्रत, गंगा-स्नान, विवाह-मुण्डन, दान-दहेज, हास-परिहास की सीमा से बाहर लाकर उन्होंने मैथिली कहानी को एकाएक सार्वदेशिक बना दिया। फलस्वरूप मिथिला के ग्रामाँचलीय जीवन के कटु-सत्य उनमें उभरे।
दुःख में भी हँसकर जी लेना, मैथिलों ने विरासत में सीखा है। अर्थ-तन्त्र की दृष्टि से मिथिला के ग्रामाँचल की मर्दनशुमारी की जाए, तो यहाँ की निरीह जनता के जीवन-यापन की पद्धति समझ में आएगी। सच है कि इसी परिवेश में कुछ उच्च-मध्यमवर्गीय भी हैं, जो अपने वैभव की बदौलत निम्न-मघ्यमवर्गीय जनता को चूसते आ रहे हैं। राजकमल चौधरी का साहित्य इसी चूसने और चूसे जाने की आख्यायिका है। कथा-शीर्षक एकटा चम्पाकली: एकटा विषधरमें दशरथ झा के डीह पर शशि बाबू की शनि-दृष्टि है, और दशरथ झा की पत्नी रामगंजवाली अपनी पुत्री चम्पा को नाना की उम्र से भी अधिक उम्र के शशिबाबू के हाथों ब्याहने को आतुर है--ये दोनों ही स्थितियाँ घोर त्रासद हैं। रामगंजवाली माँ होकर भी विषधर है; दशरथ झा पिता होकर भी कसाई है, पुरुष होकर भी नपुंसक है, मनुष्य होकर भी गीदड़ है; शशि बाबू विचित्र तरह से व्याख्येय हैं। तमाम दुष्टताओं के बावजूद कोई मानवीय कमजोरी उन्हें अपने लक्ष्य से नहीं हिला सकती। रामगंजवाली अपनी बेटी अर्पित करने को तैयार है, पर उनको स्त्री-देह नहीं, जमीन चाहिए, वे जमीन के लिए डटे हुए हैं। मिथिलांचल के जनपरिदृश्य में इस तरह के दांव-पेंच कई स्तरों पर खेले जाते रहे हैं।
असल में मनुष्य विचित्र जीव होता है, अपने अहं को सहलाते रहने के लिए न जाने कैसी-कैसी हरकतें करता रहता है, अपने को प्रसन्न करता रहता है; मनुष्य न जाने किस बात से किस परिस्थिति में प्रसन्न होता है, वस्तुतः वह खुद को ठगता रहता है। किस परिस्थिति में वह मनुष्य से लोमड़ी, भेड़िया, साँप, केचुआ... हो जाता है, उसे खुद समझ नहीं आता। राजकमल चौधरी का साहित्य मनुष्य के इसी योनि-परिवर्तन, लिंग-परिवर्तन, जाति-परिवर्तन का दस्तावेज है; देश, काल, पात्र के साथ जीवन्त तथा सचेतन सम्बन्धों के व्याकरण का उदाहरण है। इसमें परम्परा का शोधन, युग-बोध, जीवन के वैविध्य की स्पृहा, पर्यावरण के माध्यम से आत्मसिद्धि, विवेकयुक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण, रूढ़ियों के प्रति विद्रोह, नवजीवन के विकास के लिए प्रयोग के प्रति आग्रह, परिवेश के प्रति गहरी जागरूकता, सामाजिक यथार्थ, मूल्यगत विकृति की पहचान, जीवन की विसंगतियों की अभिव्यक्ति, व्यंग्य-विपर्यय कूट-कूटकर भरा हुआ है। अर्थाभाव में मिथिलांचल की निरीह जनता जीने के लिए मानवता की किस निम्नतर सीढ़ी तक उतर जाती है; कुछ सम्पन्न लोग अपनी मामूली स्वार्थसिद्धि हेतु किस कदर मानवता के विराट प्रासाद से निकलकर हैवानी की खोह में घुसकर जीवन-जगत् के सारे सम्बन्धों, सारे नियमों को भूलकर क्षणमें जीने लग जाते हैं--ये रचनाएँ इस मर्मान्तक पीड़ा का बखान करती हैं। किन्तु सामाजिक नियमों के ठेकेदारों को उनके इस आचरण में अश्लीलता दिख जाती है। दरअसल आधुनिक जीवन के भुक्तभोगियों के लिए अश्लीलता का परिचय जानना बेहद जरूरी है। ननदि-भाउजकथा की नायिका पदुमाको दो रुपए पाने के लिए, अन्धेरी रात में बंगट की तलाश में भटकना पड़ता है; ‘वैष्णवकी कमलपुरवाली को अपना हृष्ट-पुष्ट, आकर्षक, वैधव्य भरा यौवन अपने श्वशुर श्रीमन्त बाबू को सौंपना पड़ता है--इन घटनाओं का चित्रण अश्लील कदापि नहीं हो सकता। यदि यह चित्रण अश्लील है, तो इसकी सत्यता क्या होगी? राजकमल का साहित्य इसी यथार्थबोध, युगबोध, और परिवेश के सत्य से उद्भूत अनुभूति की व्यंजना है।
चन्नरदासकहानी में भिखारन नायिका किरतनियाँका टीसन बाबू के साथ सिनेमा देखने जाने का प्रस्ताव सुनकर उसके भिखारी प्रेमी चन्नरदास का हृदय व्यथित हो उठता है, उसके भीतर बसी हुई काहिली भाग खड़ी होती है। चन्नरदास, किरतनियाँ को साथ लेकर झरिया-धनबाद कमाने चला जाता है। यह कथा मनुष्य की जीवनी शक्ति की ओर इशारा करती है; प्रेम-पाश की डोर को कमजोर होता देखकर, अथवा आर्थिक बदहाली का अनुमान कर किसी काहिल पुरुष का पुंसत्व कैसे जाग उठता है--इसकी स्पष्ट छवि यहाँ अंकित हुई है। इसी तरह की कई छवियाँ राजकमल की कहानियों में व्यक्त हुई हैं। गौरतलब है कि ये छवियाँ कभी इतिहास नहीं हो सकतीं, यह सिर्फ कहानी है और कहानी की गरिमा और सीमा बरकरार रखने में सक्षम हैं, समर्थ हैं। स्थिति-चित्र उकेरने में उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रतीकों का आश्रय अत्यन्त कौशल और कलात्मकता से लिया है। किरणमयीकहानी में चन्नर भाई के मृतमस्तक को गोद में लिए कान्ति दीदी का प्रतीकों में सम्भाषण इसका उदाहरण है।
इसके अलावा वे स्त्रियाँ हैं जो आर्थिक रूप से विपन्न नहीं हैं, सम्पन्न हैं, कुछ और सम्पन्न होना चाहती हैं, उनके जीवन की सारी नैतिकता उस सम्पन्नता में प्रवेश कर जाती है। कुछ अपनी आत्मकेन्द्रिकता में, निस्सहाय विधवा ननद की परवरिश से मुकरना चाहती हैं और इस वृत्ति के लिए अपने पतियों को तैयार करने का चातुर्य दिखा रही हैं। तमाम विपन्नता के बावजूद अपनी देह को पूँजी नहीं बनानेवाली स्त्रियाँ, श्रम से जीवनयापन करनेवाली स्त्रियाँ, अपने समाज के वहशी पुरुष से परेशान हैं। एकनिष्ठ चरित्र की स्त्री जहाँ भी थोड़ा आधुनिक होने की कोशिश करती है, चरित्रहीन घोषित हो जाती है। मगर दशरथ झा की पत्नी अपनी किशोर वय की बेटी का विवाह अपने ससुर की उम्र के व्यक्ति से करने का प्रस्ताव देती हुई शर्मिन्दा नहीं होती (एक चम्पाकली: एक विषधर’)। मंचीय और सार्वजनिक व्यक्तित्व की छवि अर्जित करने हेतु जो स्त्री आगे आती है, वह कथित समाजसेवियों के छलावे और चारित्रिक दोहरेपन का शिकार होती है। पर ऐसी स्त्रियाँ उनकी मैथिली कहानियों में कम हैं, हिन्दी में ज्यादा हैं। देह को सीधे तौर पर निजी सम्पत्ति मानने वाली स्त्रियों के तो कई रूप हैं, उसका उपयोग वे अर्थोपार्जन के लिए करें, या उन्माद की शान्ति के लिए--वे अपने को स्वतन्त्र मानती हैं, किसी का कोई हस्तक्षेप उन्हें पसन्द नहीं। ऐसी स्त्रियों की बोल्डनेस भी हिन्दी कहानी में ही अधिक है, मैथिली में कम। मैथिली में ज्यादातर इस तरह की स्त्रियाँ भयभीत रहती हैं और गोपनीयता में विश्वास रखती हैं।
अपनी कहानियों में स्त्रियों के विविध रूपों को उकेरते हुए राजकमल ने पुरुष वर्चस्व की भी चीड़-फाड़ की है। आधुनिक आलोचनात्मक कसौटी पर आज के आलोचक, और जनोपयोगी कसौटी के आधार पर आज के प्रबुद्ध पाठक, जिस तरह की कहानियों को उम्दा और अधुनातन कहते हैं--राजकमल चौधरी की कहानियाँ उस पर एकदम खरा साबित होती हैं और समकालीन दिखती हैं। यह विस्मयकर है कि आज भी भारतीय नागरिक वही जीवन बिता रहा है--जो उनकी कहानियों का नागरिक उन दिनों बिता रहा था।
यह विशेषता राजकमल के कथा-संसार को कालजयी बनाती है। उनके शिल्प में समय से आगे की बात स्पष्ट दिखती है। उनकी कहानियों में कथानक और घटनाक्रम जैसे प्राचीन कथा-तत्त्वों से अलग हटकर पाठकों के लिए एक भिन्न उपक्रम प्रस्तुत होता है, जहाँ एक ही कहानी में कई-कई परतें मिली होती हैं और उभरती रहती हैं।
सामाजिक सुरक्षा, दैहिक रक्षा, दैहिक आवेग, सन्तान, परिवार...कई स्तरों पर स्त्रियों का जीवन पुरुषों पर आश्रित रहा है। इनमें से किसी भी स्थिति के वशीभूत स्त्री, अपने को एक पुरुष को सौंपकर सुरक्षित महसूस करती है। जिस स्त्री के साथ यह सुरक्षा नहीं है, वह लुटती-बिकती रहती है। पर इससे अलग किस्म की स्त्रियाँ भी हैं, जिनके पास ये सारी सुरक्षाएँ हैं, पर उनके जीवन में स्थिरता नहीं है। जिन स्त्रियों के लिए देहसे बड़ा साधन कुछ भी न हो, आधुनिक समाज की अति आधुनिकता के यथार्थ का वह भी अकाट्य पहलू है।
अपराजिताऔर हाथीक दाँतके अतिरिक्त राजकमल चौधरी की शेष सारी मैथिल कहानियों के केन्द्र में नारी है। अपराजिता,’ बाढ़ में डूबे मिथिला क्षेत्र के नागरिक-जीवन के चित्र, सरकारी उद्यमों के नाटक, पुलिस की बदमाशी, टुटपुँजिए नेताओं की कवायद आदि को रेखांकित करती है, तथा हाथीक दाँतमें एक समाजवादी नेता के खाने केऔर दिखाने केअलग-अलग दाँतों का असली चरित्र उजागर किया गया है। वस्तुतः उनकी कहानियों का प्रधान तत्त्व कथानक नहीं होता, हर पंक्ति, हर शब्द, यहाँ तक कि यति-विराम और पाॅज तक में कहानी रहती है। यही कारण है कि कहानियों के अवान्तर पात्र और अवान्तर प्रसंग द्वारा भी बड़ी-बड़ी बातें सूत्र, संकेत और मुहावरों में कह दी गई हैं। ननद-भाउजकहानी में ननद, पदुमा और भौजाई रामगंजवाली--दोनों विधवा हैं, जीवन-यापन के लिए उनके पास देह के सिवा आमदनी का कोई स्रोत नहीं है, ‘पदुमा का गाँव, बनगाँव बहुत विशाल है। गाँव में ही हाई स्कूल, थाना, पोस्ट ऑफिस, अस्पताल और हाट-बाजार है। इसलिए, इन दो विधवा ब्राह्मणियों का जीवन-निर्वाह कोई कठिन नहीं। दो हजार घरों की इस बस्ती में दो सौ बंगट(वैसे रसिक युवक, जो घरेलू महिलाओं का बाजारू उपयोग करते हैं) अवश्य हैं।इस छोटे से अंश में कथाकार ने सिर्फ कथा नहीं कही है, कथा के बीच कई कथाओं का सृजन किया है। हाई स्कूल, थाना, पोस्ट ऑफिस, अस्पताल और हाट-बाजारवाले इस गाँव की विशालता भर दिखाना कथाकार का उद्देश्य नहीं, बल्कि इस तरह की संस्थाओं की विकृतियों की ओर संकेत करना है। बातों-बातों में अपने लक्ष्य की इस तरह की पूर्ति के लिए भाषा-शिल्प-शैली ही कारगर हथियार हो सकती है।
राजकमल चौधरी की कहानियाँ वस्तुतः हमें साहित्य पढ़ने कि तमीज सिखाती है। वे हमें अन्तश्चेतना देती हैं कि कहानियाँ क्षणिक आनन्दित होने के लिए पढ़ी जाएँ या उद्बुद्ध होने के लिए! तथ्यतः राजकमल चौधरी की कोई कहानी, पाठक को चैन से नहीं बैठने देती; उद्वेग से भर देती है; कहानी के शुरू होते ही भावक, कथा-नायक के साथ हो लेते हैं। उनके पात्र यथार्थ के धरातल से इस तरह जुड़े होते हैं कि उसका सहयात्री हुए बिना रह पाना असम्भव है! कथ्य इतने छोटे और व्यंजना इतनी विराट होती हैं कि पाठक कहीं खो-से जाते हैं; पाठकों के मन में चिन्तन की नई-नई दिशाएँ अविष्कृत हो जाती हैं। पनडुब्बीकहानी की नायक-नायिका को स्टीमर से उतरने भी नहीं देते, और कहानी समाप्त हो जाती है। अत्यन्त छोटे-से  घटना-प्रसंग के बावजूद कहानी की परिणति बड़ी लम्बी हो जाती है। इसका मूल कारण उनका कथा-शिल्प है। शिल्प की मौलिकता और परिपक्वता ही साहित्य में कुछ नया कहने का मार्ग प्रशस्त करती है। कथ्य का उद्गम-स्थल तो सबका एक ही होता है। इस सम्बन्ध में राजकमल चौधरी ने अपने मित्र योगिराज को पत्र में लिखा था--कथा में मूल वस्तु क्या होती है, जानते हो? मूल वस्तु होती है शिल्प। कथ्य तो सबों का एक ही होता है। या कि ऐसे समझो कि कौन-सा ऐसा कथ्य है, जिस पर किसी-न-किसी लेखक ने कथा या कि उपन्यास नहीं लिखा। अस्तु हमें...जो अब लिखना चाहते हैं ...शिल्प को ही प्रधान बनाकर, आगे बढ़ना पड़ेगा। शिल्प की नवीनता ही हमारा निजत्व होगा।
अर्थात, शिल्प और संरचना के कारण एक ही विषय पर लिखी गई कई कहानियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। शिल्प-संरचना के इस गठन में रचनाकार के दृष्टिकोण की अहम् भूमिका होती है। जीवन को देखने-परखने का दृष्टिकोण, रचनाशीलता को दिशा देता है। इस दिशा में राजकमल चौधरी को महारत हासिल थी।
स्वातन्त्र्योत्तर काल के प्रारम्भिक कुछ वर्षों तक, जमीन्दारी खत्म हो जाने के बावजूद, मिथिलांचल में वह मनःस्थिति बरकरार थी। स्त्री, जमीन और सम्पत्ति...तीनों को वस्तु समझा जाता था। पुरुष इसके स्वामी होते थे। साठ वर्ष के विधुर या निःसन्तान या निपुत्र व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी पाने हेतु, अथवा आँगन का राजकाज सँभालने हेतु, अथवा बिस्तर पर मन बहलाने हेतु किसी निर्धन की कुंआरी बेटी को उठा लाते थे। उस कुंआरी के पिता पंजीबद्ध और सम्पत्तिशाली सद्पुरुष का कुटुम्ब होकर अपने को उद्धार हुआमानते थे। अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत की गरिमा को लेकर मैथिलगण लिप्त-तृप्त रहते थे, पर धार्मिक पाखण्ड, सामाजिक रूढ़ि, कौटुम्बिक नाटक, मान-मर्यादा की पद्धति की ओट में कितनी-कितनी विकृतियाँ, पल-बढ़ रही थीं--इसकी गिनती नहीं थी। और, मैथिली साहित्य में इसका संकेत दिख नहीं रहा था। कांचीनाथ झा किरण,’ तन्त्रनाथ झा और हरिमोहन झा के अलावा कहीं नई दृष्टि दिख नहीं रही थी। वैसे ही समय में महाकवि यात्री की कविता और उपन्यास से; ललित की कहानी से; राजकमल चौधरी, सोमदेव और मायानन्द मिश्र की कविता, कहानी, उपन्यास से; तथा रामकृष्ण झा किसुनकी कविता एवं संगठनात्मक एप्रोच से अचानक मैथिली साहित्य अद्यतन हुआ।
मिथिलांचल में हाल-हाल तक स्त्रियों की स्थिति पालित-पोषित की ही रही है। चाहे वह वृद्धा माँ, दादी, नानी, मामी, मौसी, काकी हो, जवान-प्रौढ़ा पत्नी, भौजाई, बहन, अनुज वधू हो, परिवार की अकाल-दुष्काल विधवा हो, दाई, नौकरानी हो, या रखैल, प्रेमिका हो...सब के प्रतिपालक पुरुष रहे हैं, जो उन्हें अन्न-वस्त्र, सुरक्षा देकर इनके तन-मन, स्वाभिमान पर राज करते रहे हैं। निष्ठा, सुरक्षा, प्रतिपाल और सामाजिकता के इस घोषित आवरण के तले कितने अघोषित अनाचारों को मान्यता मिली हुई थी--इसका सर्वेक्षण करना लेखकों का ही दायित्व था, राजकमल चौधरी ने इस दायित्व का निर्वाह बड़ी निष्ठा से किया।
फुलपरासवालीका कथानायक, संस्कृतनिष्ठ दरिद्र ब्राह्मण-पुत्र बिलट झा रिक्शा चलाकर जीवन-यापन करता है, देशी शराब पीकर नशेे में धुत्त रहता है। उस नशेेड़ी के साथ सिनेमा जाने से जब उसकी पत्नी मुकरती है, तो वह चीखता है--मेरी बात टालोगी!
यह क्रोध, मात्र तीन शब्दों में ब्राह्मणवादी अहंकार की दीर्घ परम्परा का परिचय देता है। पुरुषवादी मनोवृत्ति के मिथ्या दंभ का परिचय देता है। राजकमल चौधरी के पूरे मैथिली कथा-लेखन में नारी-पात्र के प्रति लेखकीय दृष्टि बहुत विश्लेषणात्मक है। अपने नारी-पात्र के अनाचार तक में लेखक ने समाज की भूमिका खोज निकाली है। यह दीगर बात है कि आवागमनमें सरस्वती की माँ, और एकटा चम्पाकली : एकटा विषधरमें चम्पा की माँ, विषधर के रूप में सामने आती है।
नारी जीवन के जितने रूप राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियों में दर्ज हैं, उतने मैथिली तो क्या, किसी भी आधुनिक भारतीय भाषा में दिखना कठिन है। वस्तुतः हमारा समाज जिस तरह की व्यवस्था में जीता आ रहा है, वह किसी हिसाब से मानवोचित नहीं है। नेता, अफसर, पुलिस, पत्रकार तो शहर के वासी हैं, निरन्तर गाँव में बसनेवाले लोग, सामाजिक नियम कायदे के रखवाले माने जाते हैं, कई बार कायदा स्वयं उन पर ही भारी पड़ जाता है। सबसे पहले विधवाओं के जीवन से बात शुरू करें। मिथिलांचल की वर्ण-व्यवस्था की तरह विधवा की भी एक विचित्र किस्म है, जो न जीने के लिए स्वतन्त्र है, न मरने के लिए। स्त्री का भी क्या जीवन है, जब तक सधवा रहेगी, पति उसका शासक रहेगा; और ज्यों ही वह विधवा होगी, पूरा परिवार, पूरा समाज उसका शासक हो जाता है। पूरे गाँव की नजर उसकी जवानी पर और जवान देह पर रहती है। सफेदपोशों की यौन-लिप्सा पूरा करने को राजी नहीं हुई, तो परिवार से लेकर समाज तक उसे वेश्या घोषित कर देगा और जवानी ढलान पर आ जाए तो वह डाइन हो जाएगी, जैसे सहस्र मेनकाकी निर्मला वेश्या हुईं, जैसे कादम्बरी उपकथाकी कादम डाइन हुईं। इस तरह के लांछन से स्त्री को कोई भी योग्यता नहीं बचा सकती। निर्मला निर्धन हैं, इसलिए समाज कलंकिनी कहता है; कादम सम्पत्तिशालिनी हैं, तो उन्हें देवरानी ही बाँझ कहती हैं और समाज डाइन कहता है। पातकी पतिया, विधवा होने के बाद वृक्ष से टूटकर गिरे सूखे पत्ते की तरह लुढ़कती रहती है, कभी कूड़े में, कभी नाली में, कभी सड़क पर, जो पाता है वही उसका दैहिक दुरुपयोग कर लेता है, प्रलोभन देकर घर ले जाता है और वहाँ उसके साथ अनाचार करता है, पतिया यह सब सहने को विवश है। बहिनदाइ, अस्पताल, बनगामकी बहिनदाई (अर्थात दीदी) अपनी भौजाइयों द्वारा तिरस्कृत होती हैं और समाज उन्हें भूखे शेेर का सुलभ आहार समझ लेता है। दमयन्ती हरणकी दमयन्ती और उसकी विधवा माँ की स्थिति ठीक वैसी नहीं है, पर शरीर को ही जीवन-रक्षा की पूँजी मान लेने वाली इस असहाय माँ-बेटी का जीवन समाज भली-भाँति नहीं चलने देता। वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता रामबाबू, दमयन्ती के घर रात का भोजन-शयन क्यों करते हैं, मन्दिर के पीछे पकड़ी गई दमयन्ती के साथ पुरुष कौन था--यह जबाव ढूँढना समाज को निरर्थक लगता है, केवल सार्थक लगता है, इन दोनों असहाय स्त्रियों को लांछित नजर से देखना।
आकाश गंगाकी विधवा अन्नपूर्णा, बहुत बड़े जमीन्दार विवेकानन्द चौधरी की बेटी है, पर यहाँ कथाकार ने, शिक्षा के प्रवेश से स्त्री और विधवा स्त्री के जीवन में उत्साह, स्वाभिमान और आत्मबल का अदम्य रूप दिखाया है। अन्नपूर्णा ऐसी ही साहसी स्त्री हैं, जिस पर पिता इसलिए कुपित हैं, कि उन्होंने पिता के सामन्ती अहं के रक्षार्थ अपने प्रेम की बलि नहीं दी। हरिद्वारवासकी विधवा, ‘ननदि भाउजिकी विधवा, ‘सुरमा सगुन बिचारै नाकी विधवा, ‘अन्धकारकी विधवा, ‘वैष्णवकी विधवा, ‘मलाहक टोल: एक चित्रकी विधवा के विविध रूप इन कहानियों में व्यक्त हुए हैं। ये सारी विधवाएँ यौवन की उत्तप्त दोपहरी में जीवन के आयाम को जिन मजबूरियों में नाप रही हैं, उनका विश्लेषण सूक्ष्मता से किया गया है। किसी को देह और मन की माँगें मजबूर कर रही हैं, तो किसी को जीवन रक्षा के साधन या इच्छा-अभिलाषा की पूर्ति हेतु तन को पूँजी बनाना पड़ता है। जीवन की अपरिहार्य शर्तों की पूर्ति हेतु अन्धेरी सड़क पर किसी मनचले पुरुष की तलाश में कोई खड़ी हो जाती है, तो किसी को विधुर श्वसुर की सारी उचित-अनुचित कामनाओं की पूर्ति करनी पड़ती है। यौवनोन्माद की उत्तप्त ज्वाला, उम्र के वसन्त और मन के झूले में झुलसती, बिहुँसती और झूलती ये विधवाएँ, मिथिला के नारी-परिदृश्य का ऐसा आँकड़ा इन कहानियों के माध्यम से उपस्थित कर रही हैं, जिनमें समाज और सामाजिक आचार संहिता के तार-तार अलग हो गए हैं।
राजकमल चौधरी के यहाँ केवल विधवा ही नहीं, पूरे स्त्री चरित्र का एक विस्मयकर पाठ प्रस्तुत है। सती धनुकाइनकी सत्ती, ‘समुद्रकी दयामयी, ‘कोपड़की चमेला, ‘घड़ीकी जहूरनी अथवा चन्द्रमुखी, ‘खरीद बिक्रीकी शरणार्थिनी, ‘माहुरकी शकुन, ‘ललका पागकी तिरू, ‘कमलमुखी कनियाँकी कमलमुखी, ‘पनडुब्बीकी कादम...विधवा नहीं है, परन्तु इनके जीवन का तीक्ष्ण दंश कितना क्लेशकर है--यह अनुमान करना असम्भव है। किसी स्त्री के लिए जीवन जीना एक दुष्कर सबक हो जाता है। सतीत्व बचाने, सुरक्षित सतीत्व का प्रमाण देने, अपने को पुष्पवती-फलवती साबित करने, अपने जीवन साथी का चुनाव अपनी सुविधा और पसन्द से करने, एक जून रोटी और एक प्याली चाय की प्राप्ति हेतु किसी भी पराए मर्द के साथ हमबिस्तर होने, बेराजगार पति की पत्नी होने के कारण जीवन के गान-मुस्कान से च्युत रहने, अनाहूत अपराध के दण्ड को चुपचाप शिरोधार्य करने और कौलिक मर्यादा की रक्षा में खुद को मिटा देने, परम्परा के निर्वाह में अपना अस्तित्व भूल जाने का कौशल जिस मिथिला, या जिस भारत की स्त्रियाँ अपने पूरे जीवन मंे सीखती रही हैं और यह सीख लेने में अपने को धन्य मानती रही हैं; राजकमल चौधरी की कहानियों का कथ्य-शिल्प उसी ज्वालामुखी के गर्भ से बाहर आया है। कायदे से देखें, तो आज इक्कीसवीं शताब्दी की गौरवमय घोषणाओं के बावजूद, देश की स्त्रियों की दशा, इससे बहुत आगे नहीं आई है।
इन कहानियों में स्त्रियों के इन नाना रूपों को प्रस्तुत करते हुए राजकमल ने समाज की पुरुष मनोवृत्ति का भली-भाँति विश्लेषण किया है। कथानक, घटनाक्रम जैसे प्राचीन कथा-तत्त्वों से अलग हटकर उनकी कहानियों का स्वरूप पाठकों के लिए एक भिन्न उपक्रम प्रस्तुत करता है, जहाँ एक ही कहानी में कई-कई बातें कही गई हैं। चन्नरदासऔर किरतनियाँभिखमंगों के जीवन पर केन्द्रित कहानियाँ हैं। इनमें पेशेवर भिखारियों के जीवन के राग-द्वेष, अनुराग-विराग, प्रेम-संघर्ष, भीख माँगने, भीख पाने की तकनीकों और उचित अवसरों की समझ, यौन-प्रसंग, भिखमंगों के संगठनात्मक अनुशासन आदि-आदि तत्त्वों की तथ्यपरक प्रस्तुति विस्मयकर है।
साँझक गाछराजकमल चौधरी की वैसी कहानी है, जिसके साथ तरह-तरह की समस्याएँ बेवजह चिपक गईं। ननदि-भाउजि,’ ‘सुरमा सगुन बिचारै नाऔर माहुरकहानियों को तो मैथिली के विद्वान व्याख्याकारों ने इतना विवादास्पद बना दिया कि बाद के पाठकों के मस्तिष्क पर कहानी के मूल-पाठ का प्रभाव कम और लोगों की चर्चाओं का पूर्वाग्रह ज्यादा छाया रहा। और तो और, ‘सुरमा सगुन बिचारै नाके समर्थन और व्याख्या में जब राजकमल ने एक लेख लिख दिया, तब से उस कहानी के साथ और भी अत्याचार हो गया। वस्तुतः उस लेख में अपनी इस कहानी की चर्चा कर राजकमल चौधरी ने वही भूल की है, जिस भूल के लिए उन्होंने नई कहानी आन्दोलन के वणिक्बुद्धि कथाकारों की खिंचाई की है। इन विवादास्पद कहानियों पर क्रमशः यह आरोप लगा कि किसी मृत पुरुष के साथ, स्त्री के समागम का चित्रण, जैववैज्ञानिक भूल(बायोलाॅजिकल मिस्टेक) है, विधवा बहन और विधुर भाई की परस्पर अनुरक्ति अवैधानिक है, और अनुजवधू के प्रति जेठ की अनुरक्ति अनैतिक है--जबकि बात यह नहीं है। दरअसल, इन कहानियों को ग्रहण करने में सबसे बड़ी समस्या यहाँ से शुरू हुई कि पाठकों या समीक्षकों ने इसे सदाचार के सिद्धान्तों के साथ पढ़ना शुरू किया। यदि इसे मानव-जीवन की अनुभूतियों और अपेक्षाओं के साथ पढ़ा गया होता, तो कुछ सही परिणाम सामने आता। लेकिन इससे भी बड़ी विडम्बना यह है कि जब कभी पाठ्यक्रम में राजकमल चौधरी को सम्मिलित करना जरूरी होता है, तो अध्यापन पेशे से जुड़े लोग उनकी कहानी ललका पागचुन लेते हैं, जो राजकमल का मुख्य स्वर ध्वनित नहीं करती, उनके रचना-कौशल की कोई एक छवि प्रस्तुत करती है; और जब लेखक वर्ग उनकी प्रतिनिधि कहानी ढूँढने चलते हैं, तो वे साँझक गाछचुनते हैं, जो अस्तित्वरक्षा हेतु दिशाहारा, अन्धे कुत्तों की तरह भटकते तथा अस्मिता की इमारत खड़ी करने में रत मनुष्य के जीवन-दर्शन का उदाहरण है। एक आलोचक ने राजकमल चौधरी की रचना साँझक गाछऔर मुक्ति प्रसंगको पश्चाताप से भरी रचना कह दिया।यह उनकी राय हो सकती है! उन्हें शायद अनुमान न हो कि मुक्ति प्रसंगदो दशक की रुग्ण भारतीय स्वाधीनता की जीवन्त पेण्टिंग है, जिसे राजकमल चौधरी ने दुर्गन्ध, पीले मवाद और रक्त मिश्रित पेशाब के रूप में देखा। साँझक गाछके कथानायक, और उसकी भौजी के जीवन का स्वांगहैरत उत्पन्न करता है। हर रचना में रचनाकार को अपने नायक से सहानुभूति होती है, नायक के विचार और हरकतों के माध्यम से रचनाकार अपनी ही बात कह और कर रहा होता है, पर वह नायक, स्वयं लेखक नहीं होता। समाज की जिन परिस्थितियों में रचनाकार स्वयं झुककर समझौता कर लेता है और जिन परिस्थितियों में दृढ़ रहता है, सारी आपदाओं को झेलकर अपना भविष्य कंटकमय कर लेता है, यह जरूरी नहीं कि उसका नायक भी वैसा ही हो। उसका नायक समाज के नागरिकों का प्रतिनिधि भी होता है, इसलिए मैंशैली की हर रचना का नायक लेखक नहीं होता। इसलिए मुक्ति प्रसंगऔर साँझक गाछऔर कवि परिचयजैसी रचनाओं का नायक पूरा-पूरा स्वयं लेखक ही नहीं, समकालीन समाज का नागरिक भी है। और साँझक गाछका नायक उसमें पश्चाताप नहीं कर रहा है, वह विस्मित है। वह अपनी मजबूरियों, अपनी भौजी की मजबूरियों और अपने भतीजों की मजबूरियों की तुलना कर रहा है। वह उस लालसा को तौल रहा है, कि इस विधवा स्त्री ने अपनी सन्तानों के भावी जीवन सुधारने हेतु उचित शिक्षा-दीक्षा की सुविधा पाने के लिए किसी सम्पन्न जमीन्दार की बाँह पकड़ी है या अपनी इच्छा-आकांक्षा-वासना की पूर्ति हेतु अपनी सन्तानों के भावी जीवन का आत्म-सम्मान छीना है। बिडम्बनाओं से व्यथित होना पश्चाताप नहीं है। देश, समाज और व्यवस्था की विकृतियों पर चीखना पश्चाताप नहीं है, मानवता है, शौर्य और पराक्रम का उद्घोष है। राजकमल चौधरी ने पूरे जीवन और पूरे लेखन में अपनी मानवता और पराक्रम का ही संकेत दिया है। उन्होंने ऐसा कोई भी साहित्यिक या गैरसाहित्यिक काम नहीं किया, जिसके कारण उन्हें पश्चाताप करना पड़े। ईमानदार लेखक, संवेदनशील नागरिक, नैष्ठिक गृहस्थ और बेहतरीन पिता-पति-दोस्त के रूप में राजकमल चौधरी से बेहतर उदाहरण शायद ही कोई बन सके। दोष केवल उन पर इस दृष्टि से मढ़ा जा सकता है कि उन्होंने अपने स्वास्थ्य के प्रति सदा अत्याचार ही किया।
आज भी हमारे समाज की स्त्रियों को किसी पुरुष के आश्रय के बिना अपना जीवन पहाड़ लगता है। नीयत केवल सन्तानोत्पत्ति नहीं रहती। वासनात्मक मनोवेग, जीवन-यापन के साधन की प्राप्ति और सामाजिक-भौतिक प्रकोप से अपनी सुरक्षा--ये तीन स्थितियाँ अधिकांश स्त्रियों को किसी पुरुष के प्रति आकर्षित करती हैं। अपवाद हरेक सिद्धान्त के होते हैं। और इनमें से किसी भी स्थिति के वशीभूत स्त्री, अपने को एक पुरुष को सौंपकर सुरक्षित महसूस करने लगती हैं। जिस स्त्री के साथ यह सुरक्षा नहीं है, वह या तो लुटती रहती है, या बिकती रहती है। पर इससे अलग किस्म की स्त्रियाँ भी हैं, जिनके पास ये सारी सुरक्षाएँ हैं, फिर भी उनके जीवन में थिरता नहीं हैं। हरिद्वासवासकी मालती, ‘अन्धकारके अधिनायक की पत्नी जैसी स्त्रियों के लिए देहसे बड़ी उपलब्धि कुछ भी नहीं है और मानव-जीवन के यथार्थ का यह अकाट्य पहलू है।
बेटी, बहन, बीवी के अलावा दुनिया की हर जवान स्त्री को कामान्ध और क्षुधाकुल शेेर की नजर से देखनेवाले पुरुष आज भी समाज के नीति-रक्षक हैं। कोपड़की चमेला वर्षों से जवान तन और जवान मन का बोझ ढोती रह गई, उसकी विधवा माँ उसकी शादी नहीं करवा पाई, समाज कुछ नहीं करवा पाया, पर जब उसने स्वयं किसी कमाऊ सद्पुरुष को अपना देवता बना लिया, तो नीति के रक्षक उस पर पंचायत करने बैठ गए। सती धनुकाइनकी सत्ती गाँव की बेटी है, फिर भी रात भर उसका दरवाजा गाँव के युवक पीटते रहते हैं और सत्ती अपने शील की रक्षा हेतु काँपती रहती है।
राजकमल चौधरी की कहानियों में पुरुष का चारित्रिक वैविध्य भी विवेच्य है। एक तरफ वैष्णवमें विधवा पुत्रवधू के बिस्तर पर खेलते हुए विधुर श्रीमन्त हैं, जो वैष्णव हैं, अर्थात् माँस-मछली नहीं खाते, पर कसाई के हाथों वृद्ध गाय बेच लेते हैं, दूसरी तरफ मलाहक टोल: एक चित्रके तिरपति मिसर हैं, जो साग-सब्जी की तरह विभिन्न जाति, विभिन्न उम्र की स्त्रियों का भोग करना अपने जीवन का परम कत्र्तव्य मानते हैं। ऐसे चरित्रवाले पुरुष पात्रों से उनकी कहानियाँ भरी पड़ी हैं।
परम प्रिय निरमोही बालम...और किछु अलिखित पत्र’--ये दो कहानियाँ मिथिलांचल की स्त्रियों के जीवन के अन्यतम रहस्य को, उनके भीतर की निश्छलता, पवित्रता और समर्पण को इस कारीगरी से प्रस्तुत करती हैं कि पाठकों की समस्त संवेदना जाग्रत हो उठती है। सहानुभूति का अम्बार लग जाता है। दरअसल कथा लेखन का औचित्य और उसकी सार्थकता मोटे तौर पर यही है कि उसके माध्यम से एक महत्त्वपूर्ण बात महत्त्वपूर्ण ढंग से कही जाए, और उससे एक अधिमान्य उद्देश्य की पूर्ति हो। कहानी की यही विशेेषता उसे शाश्वतता प्रदान करती है। जिस रचना में रचनाकार अपने द्वारा समर्थित पात्र को पाठकों की सहानुभूति नहीं दिला पाता, वह उसकी असफल रचना होती है। राजकमल चौधरी की हर रचना को पाठकों से समर्थन, सहानुभूति और स्वीकृति मिली है। और, इसका एक मात्र कारण है कि उनकी तमाम रचनाओं के पात्र, वस्तु, शिल्प, भाषा...नागरिक जीवन क्षेत्र से उद्भूत हैं।
उनकी भाषा-शैली पाठकों को बाँध लेती है। घटनाओं की विविधता और उसके क्षिप्र परिवर्तन के बावजूद, पाठक के मन पर कोई तनाव नहीं आता, अतीत बनता परिवेश पाठक के मन में ऊब पैदा नहीं करता। रचना में प्रवेश करते ही पाठक एक-लय हो जाते हैं। भाषा-शैली का यह विलक्षण रूप, निश्चित रूप से राजकमल की जिन्दगी और उनके लेखन पर पड़े महानगरीय परिवेश की विविधता और वहाँ की व्यस्तता के प्रभाव को रेखांकित करता है। उनके जीवन और लेखन का ताल-मेल यहाँ भी दिखाता है। उनके जीवन का असन्तोष, पीड़ा, कुंठा, विद्रोह, क्लिष्टता...कुछ भी उनकी रचनाओं से अलग नहीं है, और इसी कारण उनके पात्र अक्सर टूटे हुए, दिग्भ्रमित और विरूप पाए जाते हैं। हाँ, एक बात जरूर है, उनके स्त्री-पात्र अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली, व्यवस्थित तथा प्रामाणिक हैं। पर-पुरुष-रता स्त्री पात्र कामुक और व्यभिचारिणी रहने के बावजूद, अपने अन्तस् में नारीत्व की गरिमा और करुणा को अक्षुण्ण रखती है। इन चरित्रों में भी पत्नीत्व और मातृत्व के प्रति, एक शिष्ट सामाजिक जीवन के प्रति लालसा रहती है।
चरित्रों का ऐसा चयन उनकी मार्मिक दृष्टि का प्रतिफल है। इससे यह प्रतिपादित होता है कि उन्होंने जीवन को, खासतौर से नारी-जीवन को अन्तरंगता और सहृदयता से देखा और जाना है। उसमें डूबकर उसे अपने अनुभव का अंग बनाया है। बगैर इसके नारी-जीवन का इतना तलस्पर्शी चित्रण कदापि सम्भव न था।
जलते हुए मकान में कुछ लोगअथवा ननदि-भाउजजैसी कहानियों को समाजोचित नहीं माननेवाले शुचितावादी पाठकों को रचनाओं का पाठ धर्म-शास्त्र की कसौटी पर नहीं, समाज-शास्त्र का कसौटी पर करना चाहिए। राजकमल की रचनाओं में मनुष्य की तीन आदम प्रवृत्तियों--रोटी, सेक्स, सुरक्षा--का उचित सत्कार हुआ है। सेक्स सृष्टि का कारण है, इसलिए रचनाओं में इसकी चर्चा से परहेज, कोई सात्त्विक प्रवृत्ति नहीं, ढोंग होगा। राजकमल को ऐसा ढोंग पसन्द नहीं था।
उन्होंने मैथिली के वरिष्ठ कथाकार ललित की कहानी मुक्तिकी कथा-नायिका शेफालीके दरबान के साथ भाग जाने की घटना को अस्वीकार कर; अपनी कहानी में फुलपरासवालीको खड़ा किया। देह-व्यापार या देह-उत्सव के पीछे एक मात्र कारण, अर्थ ही नहीं होतार्। आर्थिक-सम्पन्नता ही स्त्री के लिए सब कुछ नहीं होती। कई बार सुखी-सम्पन्न घर की स्त्रियाँ भी, और नहीं कुछ, तो अपने नौकरों, दरबानों, ड्राइवरों के साथ अपना देह-सम्पर्क बना लेती हैं। अत्यन्त खूबसूरत औरतों के पति वेश्यागामी हो जाते हैं। सेक्स के प्रति यह झुकाव, हमारे समाज में उत्पन्र्न आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों के परिणाम हैं। देह की भूख का अपना आवेश और आवेग होता है, जिसमें आचार-शास्त्र के सारे नियम उलट-पुलट जाते हैं। नई समाज-व्यवस्था में इसका आधिक्य ही हुआ है। इस समाज में यदि फुलपरासवालीबहुत हैं, तो शेफालीभी असंख्य हैं। यहाँ राजकमल की दृष्टि एकपक्षीय है। यदि कृष्ण भक्त कथाके गणेशराधा-कृष्ण की जगह मन्दिर में रेशमीके साथ खुद खड़ा हो जाना चाहते हैं; अथवा मन्दिर की मूर्तियों को कोशी की धारा में बहाकर रेशमी की प्रतीक्षा में पान-बीड़ी की दुकान खोल लेते हैं, ‘हरिद्वारवासकी मालती, मोहनजी के लिए अपने महाकान्त का और पुनः करिया बाबू के लिए मोहनजी का खून कर सकती है, तो यह बात एकदम सम्भव है कि मलाहक टोल: एक चित्रकहानी में अपंग पति तुरन्ता मलाहको समर्पित देह को दूसरों से बचाने हेतु केतकीतिरपित मिसर का खून कर दे। जीवन जीने की बुनियादी सुविधाएँ जुटाने के लिए किसी स्त्री का देह-व्यापार चरम विवशता और अटल मानसिक यातना का भोग है। इस वृत्ति के कत्र्ताओं को इस व्यसन में कोई शर्म नहीं आती, पर वे यौन-शुचिता के हिमायती बने फिरते हैं। कामुकतावश किसी असहाय स्त्री का यौन-शोषण करना; किसी पागल स्त्री के साथ समागम करना; प्राण और इज्जत-आबरू बचाने के लिए उजाड़ आसमान में बाँहें फैलाकर सहायता की भीख माँगती स्त्रियों के साथ बलात्कार करना कोई मामूली अनाचार नहीं है, एक मानसिक विकृति है। समाज के इस यथार्थ से जन-जन को जाग्रत करना हर सजग लेखक का धर्म होना चाहिए। राजकमल की कहानी इसी क्रूर यथार्थ की अनुकृति है।
मनुष्य के अचेतन में रहने वाली प्रेरणाएँ दुर्दमनीय होती हैं, स्वार्थपरायण, तृप्तिकामी, असभ्य, अनगढ़ और क्रूर होती हैं; और चेतन में रहने वाली पे्ररणाएँ सभ्य, उदार, सुसंस्कृत तथा उदात्त। अचेतन की प्रेरणाओं को सभ्यता की विद्रोहिणी समझकर चेतन की प्रेरणाएँ उसे दमित करने का असफल प्रयास करती हैं। इन्हीं प्रेणाओं को राजकमल की कहानियों में मनोविश्लेषणात्मक स्तर पर प्रस्तुत किया गया है। चेतन और अचेतन के इस संघर्ष में कभी चेतन की प्रेरणाओं को विजय मिलती है, तो कभी अचेतन की प्रेरणाओं को। मुग्धा-विमुग्धाकहानी में अलबरवालीकी हस्तरेखा देखने के बहाने कमल बाबू द्वारा उसका हाथ पकड़ना और दोनों के मन में इस अवस्था पर अनेक शंकाएँ उत्पन्न होना और अलबरवाली के पुत्र मधुकान्त का, उन्हें इस अवस्था में देखकर धमकी देना...सब इन्हीं चेतन-अचेतन की प्रेरणाओं को चित्रित करने में हुआ है। इन रचनाओं में नारी मनोविज्ञान की गम्भीर परख की जरूरत है। खरीद-बिक्रीकी शरणार्थिणी का वक्तव्य, पुलिस बाॅगी में संरक्षण हेतु चढ़नेवाली नवोढ़ा सदृश सती धनुकाइनकी दशा, ‘दमयन्ती-हरणकी नायिका दम्मो की दशा, ‘सहस्र-मेनकाकी निरमला दीदी की विवशता पर समाज का कटाक्ष, समाज के लोगों की मिथ्या लांक्षणाएँ...सारी बातें हमारे समाज की घृणित प्रवृत्तियों और अमानवीय कुकर्मों का चित्रण ही तो है। गो कि राजकमल की कहानियाँ क्षण में घटने वाला एक दुःस्वप्न है। अन्धकारकहानी के नायक डाॅक्टर उपेन्द्र इतने विवेकशील हैं, जो वासना से कोसों दूर हैं, आमन्त्रण के बावजूद उस स्त्री के घर नहीं पहुँचते, पर कत्र्तव्य बोध उन्हें वेश्या के रुग्ण पति के इलाज हेतु खींच लाता है; ‘मलाहक टोल: एक चित्रकहानी की नायिका कमली इतनी उदार है, कि अपनी देह के सौदे से प्राप्त जेवर, ‘सुन्दर मलाहको उसके बेटे के इलाज हेतु दे देती है। ललका पागअति चर्चित कहानी है, मिथिलांचल के वैवाहिक जीवन का, मैथिलानी के चरित्र का, उसके शील-स्वभाव, सहनशीलता का सफलतम चित्र यहाँ उकेरा गया है। तीरुका चरित्र प्रखर रूप से खुलकर सामने आया है, उसके सहजात भावों को प्रदर्शित करने में लेखक ने किसी तरह की कोई कंजूसी नहीं की है।
यथार्थ-चित्रण में लेखक ने माक्र्स, एंगेल्स और फ्रायड की अवधारणाओं का विवेकसम्मत उपयोग किया है। जीवन के यथार्थ-मूलक चित्र उपस्थित करने में कत्र्तव्य-बोध के प्रति लेखकीय सावधानी, आत्मचिन्तन की गहनता, क्रूर यथार्थ के विश्लेषण के प्रति आग्रह विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। न्यूनतम शब्दों में अधिकतम बात कहने की कला में उन्हें महारत हासिल थी। शब्द-ब्रह्मा की तरह थोड़े-से उलट-फेर से सर्वथा नए शब्दों का निर्माण वे करते रहे हैं। उनकी इन्हीं कलात्मकता, विषय-चयन तथा स्थिति-उपस्थापन की नवता के कारण रचनाएँ सदा प्रभाव का उत्कर्ष पाती रही हैं। मैथिली में प्रकाशित उनकी पहली कहानी अपराजितामें कोशी और बागमती नदी के ताण्डव से भयाक्रान्त जनता की स्थिति का मार्मिक चित्र खींचा गया है। वेद में नदी को मनुष्य की सेविका, मनुष्य की पत्नी कहा गया है, किन्तु राजकमल की व्यंग्य-पंक्ति है--बहुओ भकोशी आ बागमती अपराजिता अछि (बीवी होकर भी कोशी और बागमती अपराजिता ही है)।एक ही कहानी में मिथकीय मान्यता पर आक्षेप, समाज की दुर्दशा, सरकारी निष्क्रियता, पुलिसिया उत्पात, वैयक्तिक दुर्दशा का यथेष्ट चित्र उपस्थित है, कहानी का प्रभाव चमत्कारपूर्ण और बहुआयामी है। अन्य कहानियाँ भी इसका अपवाद नहीं। गलित और खण्डित मानवता, घृणित सामाजिक दृश्य, कुत्सित पारस्परिकता इन कृतियों में खुलकर सामने आती हैं। पेशा और सामाजिक मान्यता से किरतनियाँऔर चन्नरदास का एक ही स्तर और धरातल है, ‘किरतनियाँपर चन्नरदास की कामुक दृष्टि अटकी रहती है, वह प्रयास करता है कि कब उसकी नानी मरे, और खुलेआम चौराहे पर उसकी गदराई जवानी का उपभोग वह करे। एकटा चम्पाकली: एकटा विषधरकहानी के दशरथ झा, चम्पाकली-सी कोमल अपनी तरुणी बेटी चम्पा को सत्तर वर्षीय वृद्ध शशिबाबू के हाथ किस कारण सौंपना चाहते हैं; चम्पा से विवाह करने का प्रस्ताव शशिबाबू के समक्ष रखकर दशरथ झा की पत्नी जब शशिबाबू के सामने खड़ी होती है, तो उस स्त्री में उन्हें किसी भयावह विषधर का बोध क्यों होता है; चाय लाते समय चम्पा का हाथ क्यों थरथराने लगता है; ललाट से पसीना क्यों चलने लगता है; अपने माँ-बाप को शशिबाबू की अर्चना में भक्ति-भाव से तत्पर देखकर चम्पा के मन में किस कारण हजारों सवाल उठते हैं?--ये सारे सवाल, सारी प्रक्रियाएँ मनोवैज्ञानिक सत्य और सामाजिक विसंगतियों की ही उपज हैं। राजकमल की रचनाओं में चरित-नायक का मनोविश्लेषण उनके कौशल की मूलभूत विशेषता है।
ननदि-भाउजमें पदुमा सर्प-दंश से मृत बंगट के साथ रति-प्रसंग करने के कारण आक्रान्त है, पर रामगंजवाली बंगट के नहीं मिल पाने की आशंका से चिन्तित। शहरी चटक-मटक में रंगी युवती अस्पताल की नर्स बरमा को देखकर बाबू साहब, भोग की लिप्सा में उसके साथ शादी करने को लालायित हो उठते हैं, और अपने सारे संस्कार गर्त में डाल देते हैं। उस युवती के कहने पर मृग-मरीचिका में अपनी टीक कटवा लेते हैं; और, जब कामुकता की खुमारी टूटती है, तो अपनी कटी टीक की गाँठ खोजने घाट की तरफ दौड़ते हैं। ये सारी मानसिक अभिक्रियाएँ समाज के विविधमुखी जीवन-चक्र से उद्भूत हैं। हमारे इसी समाज में कली-सी बेटी चम्पा को बेच डालने को आतुर रामगंजवाली है, अपने पवित्र आचरण पर निराधार लांछन सहती सहस्रमेनकाकी बहन है; श्वसुर के क्रोध और उसके वैष्णव होने की घोषणा का प्रतिकार करती, ज्वालामुखी की तरह फूटती वैष्णवकथा की विधवा वधू भी है। इन वैविध्यों से परिपूर्ण राजकमल की कहानियाँ सर्वत्र वस्तु, शिल्प, विद्रोहात्मक स्वर और दोटूकपन के कारण अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं।
इन्हीं स्थितियों के साथ राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ गागर में सागर भरती हुई अपनी शाश्वतता प्रमाणित करती हैं और विमर्श की नई व्याख्या को आमन्त्रण देती हैं। आज विश्व-साहित्य में नारी लेखन और नारी जीवन पर जितनी भी बहसें हो रही हैं, उसके सारे संकेत राजकमल के कथा लेखन में मौजूद हैं। पर, हम भारतीयों को तो अपनी उपलब्धियों पर गौरवान्वित होने भी नहीं आता। पुरुष मनोवृत्ति के बरक्स स्त्री जीवन के इतने सूक्ष्म विश्लेषण की आवश्यकता हमें पर्याप्त समय पूर्व ही महसूस करनी चाहिए थी। पाठकों की सहानुभूति तो उनकी रचनाओं को तब भी मिली थी, विचार और विश्लेषण के ठेकेदारों को, तब शायद गुटबाजी और राजनीति से फुर्सत नहीं मिलती थी, कदाचित अब मिले।
इतना कुछ कह जाने के बाद भी यह कहने की आवश्यकता रह ही जाती है कि राजकमल चौधरी के साहित्य की वृहत् व्याख्या की अपेक्षा अभी बची हुई है।


लेखक विकल्प नहीं ढूँढता, संकल्‍प करता है/राजकमल चौधरी का कथा संसार






बहुविधावादी रचनाकारों के साथ एक संकट सदैव लगा रहता है। उनकी किसी खास विधा की रचना को अधिक प्रभावी देखकर लोग अक्सर उन्हें उसी विधा के रचनाकार मानने लगते हैं। धीरे-धीरे वह रचनाकार भी अपने को उसी विधा में केन्द्रित कर लेता है और अन्तिम रूप से एक विधा का होकर रह जाता है। किन्तु स्वातन्त्र्योत्तर भारत के प्रखर रचनाकार राजकमल चौधरी के साथ ऐसा नहीं हुआ। कुछ ने उनके कवि रूप को श्रेष्ठ माना, कुछ ने कथाकार रूप को। कुछ ने उन्हें मैथिली का बड़ा लेखक माना, कुछ ने हिन्दी का। पर निर्णयात्मक रूप से कहना कठिन है कि वे कथाकार बड़े हैं या कवि, उपन्यासकार, अनुवादक, निबन्धकार, समीक्षक।...यहाँ तक कि उनके पत्रों और डायरियों तक में समाजशास्त्रीय अध्ययन के गम्भीर चिह्न दिखाई देते हैं। बात तो यहाँ तक कही जा सकती है कि उनकी ही कृतियों में किसी एक विधा की भिन्न-भिन्न रचनाओं की तुलना करके किसी को कम या अधिक महत्त्वपूर्ण साबित करना असम्भव है। एक सीमा तक उनकी कविताओं में से कुछेक को छाँटकर कहा जा सकता है कि अन्य की तुलना में ये कविताएँ कमजोर हैं। पर अन्य किसी भी विधा में ऐसा नहीं कहा जा सकता।
सामाजिक कुरीतियों, राजनीतिक षड्यन्त्रों एवं जनसाधारण जन के साथ किए जा रहे फरेब पर उनकी हिन्दी एवं मैथिली--दोनों भाषाओं की रचनाओं की गुर्राती नजर छठे दशक के प्रारम्भिक वर्षों से ही दिख रही थी। हिन्दी में उनकी पहली कविता (बरसात रात प्रभात) सितम्बर 1956 में नई धारामें, पहली कहानी (सती धनुकाइन) मार्च 1958 में कहानीमें और पहला निबन्ध (भारतीय कला में सौन्दर्य-भावना) जून 1959 में ज्ञानोदय में प्रकाशित हुआ। मैथिली में सन् 1954 से ही उनकी रचनाएँ छपने लगी थीं। सन् 1958 आते-आते तो वे ख्यात हो चुके थे और मैथिली की रुग्ण, जर्जर एवं रूढ़िग्रस्त रचनाशीलता के पोषकों-प्रतिस्थापकों के लिए आतंक बन चुके थे। लेकिन, सन् 1949-50 के आसपास रचित उनकी रचनाओं से साबित होता है कि प्रकाश में आने से पूर्व उन्होंने अपनी रचनाशीलता को पूरी तरह सँवार लिया था। अर्थात् नई कविताको विधिवत मान्यता मिलने के दौरान ही राजकमल की कविताएँ प्रकाश में आने लगी थीं।
भारतीय समाज का वह ऐसा दौर था कि जनता अपने को ठगी हुई-सी महसूस कर रही थी। डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे चिन्तक की धारणा थी कि हर एक व्यक्ति को एक हद तक अपने जीवन को अपने मन के मुताबिक चलाने का अधिकार होना चाहिए।पर यहाँ सामाजिक, प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की नाक इतनी बढ़ गई थी कि वह जनता के स्वातन्त्र्य को खण्डित करना अपना प्राथमिक कत्र्तव्य समझती थी। भारतीय गणतन्त्र में उदार और सुसंगत परम्परा स्थापित करने हेतु, डॉ. लोहिया द्वारा कांग्रेस पार्टी और जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के निरन्तर विरोध की प्रक्रिया से आज के समाजवादी कार्यकत्र्ता भी परिचित होंगे। आचार्य नरेन्द्र देव और जयप्रकाश नारायण जैसे सामाजिक हित के चिन्तक और राष्ट्रवाद के सूक्ष्म व्याख्याकार के चिन्तन-मनन से देश के बुद्धिजीवी एवं रचनाधर्मी परिचित थे। वैज्ञानिक विकास और औद्योगिक क्रान्ति की दुहाई तो दी जा रही थी, सामाजिक जीवन प्रक्रिया को सुविधा सम्पन्न बनाने की बात तो की जा रही थी, पर निर्णीत और परिलक्षित सामाजिक सत्य वही था जो आचार्य नरेन्द्र देव का अभिप्राय था। सामन्ती व्यवस्था चरमराई तो थी पर औद्योगिक क्रान्ति से उत्पन्न वातावरण पुरानी व्यवस्था का ही पर्याय व्याप्त बन गया था। उत्पादनधर्मी व्यवस्था की बागडोर पूँजीपतियों के हाथ चली गई थी। कृषि-कर्म की जीवनी-शक्ति से अनुप्राणित अधिसंख्य जनता मजदूर बन गई। जनता का उपयोग उत्पादन, विपणन, वितरण के औजार के रूप में होने लगा था। उसकी श्रमशक्ति बिकने लगी थी, बल्कि श्रमशक्ति बेचने को वह मजबूर हो गई थी और मुट्ठी भर पूँजीपति उसके नियन्ता बन गए थे। आर्थिक वैषम्य की इस विशाल खाई से समाजवाद का रास्ता अवरुद्ध हुआ। वर्गहीन समाज की संकल्पना आहत हुई। अर्थात्, भारत की स्वाधीनता का अर्थ, जनता के सपनों के लिए कहीं से अर्थवान नहीं हुआ।
जनजीवन की दशा तो यही थी; पर यहाँ बात राजकमल चौधरी की कहानियों से शुरू करनी है। आठ खण्डों की रचनावली में उनकी लगभग रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं, यद्यपि अभी भी उनकी कोई-कोई रचना हाथ लग जाती है, उनमें से कई अपूर्ण भी रहती हैं। उनके शब्द-प्रयोग, वाक्य-संरचना और विषय-उपस्थान की कला इतनी श्रेष्ठ थी कि जहाँ भी पंक्ति पूरी हो जाए, चाहें तो वहीं रचना-समाप्ति की घोषणा कर सकते हैं। कई ख्यात रचनाकारों की रचनाओं में अक्सर दिखता है कि वे अपने विषय नियन्त्रण नहीं रख पाते, वे खुद विषय के नियन्त्रण में चले जाते हैं; विषय की माँग पूरी करने में रचना और रचनाकार दम तोड़ने लगते हैं। राजकमल चौधरी के यहाँ ऐसा कभी नहीं दिखता। उनकी हर रचना अपने शब्द-शब्द में, यहाँ तक कि यति-विराम में भी रचनाकार के नियन्त्रण में रहती है। यही कारण है कि उनकी कई कहानियाँ अपूर्ण रहने के बावजूद पाठकों के लिए असम्प्रेषणीय नहीं हैं। आदमी अब नहींऔर स्थान काल पात्र’-- ये दो ऐसी कहानियाँ हैं जिसे उन्होंने उपन्यास की परिणति के रूप में प्रारम्भ किया था, पर अन्ततः वह एक ही कथा के दो आरम्भहोकर रह गईं, उपन्यास पूरा नहीं हो पाया, राजकमल दुनिया छोड़ गए।
राजकमल चौधरी के कहानी-लेखन का दौर, हिन्दी में नई कहानी का दौर है। पर उन्होंने कभी खुद को नई कहानी आन्दोलन का अनुगामी नहीं माना।  उनकी राय में कहानी लिखने और अच्छी कहानी लिखने से बेहतर व्यापार और कुछ नहीं था। सम्भवतः यही कारण हो कि आज दशकों बाद भी उनकी कहानियाँ पाठकों के समक्ष ताजा स्वाद रही हैं।
राजकमल चौधरी की कहानियाँ परमाणु में पर्वतमाला के समावेश की कहानियाँ हैं, जो मानव-जीवन के अनछुए प्रसंगों से उठाकर लाई गई हैं, जिनमें राजकमल की सारी की सारी कहानी-कला मौजूद है और ऐसा लगता है कि इनमें अलग से कोई कला नहीं दिखाई गई है। जन-जीवन का सत्य ज्यों का त्यों रख दिया गया है। जस की तस रख दीन्ही चदरियाकी तरह। सच्ची घटनाएँ तो अखबारी रिपोर्टों में बयान होती हैं, कहानी में घटनाएँ सच की तरह आती हैं। घटनाएँ सच हों, इससे ज्यादा जरूरी है कि वे सच लगें भी। राजकमल की कहानियों की यह खास विशेषता है कि वे सारी घटनाएँ सच हों या न हों, सच लगती अवश्य हैं। अपने समकालीन कहानीकारो की तुलना में वे इस मामले में सबसे अलग हैं कि उनकी कहानियों के आधार पर फार्मूले बनाए जा सकते हैं जबकि उनके कई समकालीन क्रान्तिदर्शी, क्रान्तिधर्मी गढ़े हुए फार्मूलों पर कहानियाँ लिखते थे। जाहिर है कि वे फार्मूले उनके आलोचकों और मान्यतादाताओं द्वारा गढ़े जाते थे।
धर्म, साहित्य, नौकरी, व्यापार, फिल्म, सामाजिक जीवन-यापन...तमाम क्षेत्रों की विकृतियों को यहाँ इतनी सूक्ष्मता से उजागर किया गया है कि वे अचानक तार-तार हो जाती हैं। छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति, क्षणिक मनोवेगों की पुष्टि के लिए मनुष्य किस सीमा तक गिर सकता है; संन्यासी और सिद्ध योगी, यहाँ तक कि देवता की छवि रखनेवाला भी पल-भर में कैसे जानवर हो जाते हैं; खूंखार जानवर, कैसा गऊ हो जाता है; शेर की दहाड़ और आतंक का मालिक पल-भर में कैसे गीदड़, चूहा, केंचुआ, चींटी हो जाता है और रेंगने लगता है--मानव-जीवन की इसी उठा-पटक का एलबम हैं राजकमल की कहानियाँ।
नामवर सिंह ने कहा कि कहानी का यह दुर्भाग्य है कि वह मनोरंजन के रूप में पढ़ी जाती है और शिल्प के रूप में आलोचित होती है।हिन्दी में नई कहानीआन्दोलन पर बहुत कुछ लिखा गया। इसका समय मोटे तौर पर सन् 1950-1965 माना गया, फिर भैरव प्रसाद गुप्त के सम्पादन में प्रकाशित कहानीके नववर्षांक से इसका प्रारम्भ सन् 1956 में कहा गया, फिर से यह भी कहा गया कि सन् 1950 से ही नई कहानीका प्रयाण शुरू हो गया था, विचार और रचनाशीलता के स्तर पर यह नयापन पलता-बढ़ता रहा और 1955-56 तक आते-आते वैसे सोच और वैसी रचनाशीलता के साथ सृजनरत लेखकों ने अपना परिचय कायम कर लिया और कहानी’ (पत्रिका) के नववर्षांक(1956) में नई कहानी को पूर्ण प्रतिष्ठा दे दी गई। देवीशंकर अवस्थी के शब्दों में ‘1962 में हुआ यह विवाद नई कहानी को स्टेब्लिश ही नहीं करता स्टेब्लिशमेंट का हिस्सा बना देता है(नई कहानी: सन्दर्भ और प्रकृति/पृ.16)इसके बावजूद सन् 1962-65 के समय को नई कहानी की ढलान का समय कहा गया, यद्यपि कमलेश्वर जैसे कुछ लोगों ने सन् 1965 के बाद कहानियों में आए बदलाव को नई कहानी का ही विस्तार कहा। वैसे भारत में 1962-65 के अन्तराल में राजनीतिक-सामाजिक हलचल, पराजय के नैराश्य और विजय के उत्साह से एक नया जोश अवश्य आया और रचनाकर्मी, नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़े, नई कहानी के विरोध में अकहानीआन्दोलन सबसे पहले आगे आया, पर आलोचकों ने जल्दी ही इसे फ्रांस की एण्टी स्टोरीका अनुकरण घोषित कर दिया। फिर सचेतन कहानी,’ ‘सहज कहानी,’ ‘समान्तर कहानी,’ ‘सक्रिय कहानी,’ ‘समकालीन कहानीजैसे कई आन्दोलनों की घोषणा हुई, अर्थात् नई कहानीसे अपने को अलग साबित करने का प्रयास समय-समय पर हिन्दी के कथाकारों ने तत्परता और तन्मयता से किया। पर काफी लोगों को यह बात समझ में नहीं आई कि इन रचनाधर्मियों में यह वणिक् वृत्ति क्यों आ गई, सृजनकार्य को प्रमुखता देने के बजाए ये लोग विज्ञापन में क्यों लिप्त हो गए।
नई कहानियाँ’ (वर्षगाँठ विशेषांक, मई 1961) में राजेन्द्र यादव का लेख छपा था आज की कहानी: परिभाषा के नए सूत्रलहर’ (नई कहानी विशेषांक) अगस्त-सितम्बर-1961 में इस लेख पर खीझकर राजकमल चौधरी ने एक लम्बा लेख लिखा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘‘मैं जीवन और समाज को साहित्य, विशेषतः कथा-साहित्य के विषय (सब्जेक्ट मैटर) से अधिक कुछ नहीं मानता। यह नहीं मानता कि किसी मतवाद का प्रचार, किसी सिद्धान्त का प्रचार, किसी नैतिकता या किसी जीवनशैली का प्रचार कथा-साहित्य का उद्देश्य है। आज के कथाकार अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए, यह शिकायत करते हैं कि पिछली पीढ़ी के कथाकारों से उन्हें विरासत में कोई चीज़ नहीं मिली है। राजेन्द्र यादव (का)...यह कथन बड़ी ही कृतघ्नता है, बड़ी ही निर्लज्जता है।...फतवेबाजी से धन्धा (सो भी थोड़े दिनों तक) चल सकता है, साहित्य-सृजन और साहित्यालोचन नहीं चलता है।...अच्छी कहानियाँ लिखना ही कहानीकार के लिए पर्याप्त उपलब्धि है, ‘परिभाषा के नए सूत्रोंके ताने-बाने में लिपटकर वह ज्यादा दूर तक आगे नहीं जा सकती है।’’
उक्त आलेख लम्बा है और पूरे आलेख में राजकमल चौधरी ने न केवल राजेन्द्र यादव द्वारा दी गई स्थापनाओं को खण्डित किया है, बल्कि अपने समय के कथा लेखन की पृष्ठभूमि को आदरपूर्वक स्मरण किया है और कहानी के क्षेत्र में पूर्ववर्ती पीढ़ियों के योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है। पर तथ्य है कि स्वातन्त्र्योत्तर काल के कथा-लेखन में जितने मुँह, उतनी बातें (अर्थात् उतने कथा-आन्दोलन) आने का मूल कारण मात्र इतना रहा कि लघु उद्योगपतियों की तरह कहानीकारों में अपना उत्पाद ऊँची कीमत पर, शीघ्रता से, और बहुसंख्य के हाथों बेचने की होड़ लग गई; वे सर्वसाधारण के मन-मिजाज पर अपने उत्पादों को स्थायी रूप से चस्पाँ करने; अपने को दिग्गज, कालदर्शी और युगपुरुष साबित करने पर आमादा थे। आम पाठकों से उनका विश्वास उठ गया, वे प्रबुद्ध नागरिक के समक्ष चुनावी मेनीफेस्टो की तरह कहानी की पहचान के सूत्र बाँटने लगे; गो कि कहानी कोई रासायनिक पदार्थ हो, जाँचें, और ये गुण उनमंे नहीं पाए गए, तो उन्हें निरस्त करें। राजकमल चौधरी का ध्यान कभी इस  विज्ञापनबाजी की ओर नहीं गया। अवान्तर अभिप्राय से लुभावने और भ्रामक विज्ञापन के साथ बाजार में कूद आए आत्मगुग्ध कथा-चिन्तकों की उन्होंने भली-भाँति फजीहत की। उन्होंने कहा कि युद्ध, अकाल, राजतन्त्र, बेकारी, मँहगाई, दूसरे देशों से सम्बन्ध, गृह-कलह, आम चुनाव...इन सभी बातों का असर कथा-साहित्य पर पड़ता है, सामान्यतः कथा के विषय और स्वरूप पर पड़ता है। मगर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि कथा-साहित्य को जीवन और संस्कृति की कलात्मक अभिव्यक्तियों के क्षेत्र से हटाकर, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के क्षेत्र में डाल दिया जाए(शवयात्रा के बाद देहशुद्धि/पृ.150)
अपने पूरे लेखन कर्म में इसी नैतिकता, निष्ठा और ईमानदारी से वे सृजनरत रहे। उनकी रचनाओं को पाठकों का प्यार और स्वीकार मिला, उन्हें अपनी कृतियों की वकालत नहीं करनी पड़ी, आलोचकों और अपने समकालीन रचनाकारों की उपेक्षा और ईष्र्या भी भरपूर मिली। असल में आजादी के बाद से खासकर नई कविताकी स्वीकृति और नई कहानीके घोषणा-काल से हिन्दी-साहित्य की राजनीतिक गन्दगी और गलीज हरकतें इतनी बेशर्म हो गईं कि ज्यादातर रचनाधर्मी आत्मप्रचार में तल्लीन और बुनियादी जिम्मेदारियों से विमुख हो गए।...
उल्लेखनीय है कि अगस्त 1962 तक राजकमल चौधरी की लगभग तीस कहानियाँ हिन्दी में तथा चौबीस कहानियाँ मैथिली में, और दिसम्बर 1965 तक लगभग साठ कहानियाँ हिन्दी में तथा तीस कहानियाँ मैथिली में प्रकाशित हो चुकी थीं। इन कहानियों में व्यक्त जनसरोकार में लेखकीय प्रतिबद्धता के सू़त्र की तलाश होनी चाहिए। एक ईमानदार रचनाकार के लिए, साहित्य सृजन का मूल उद्देश्य, आम नागरिक को उनकी स्थितियों की जानकारी देना होता है।
गौरतलब है कि राजकमल चौधरी की कोई रुचि नई कहानी आन्दोलनका कत्र्ता-धर्ता होने में नहीं थी। तथ्यतः कोई रचनाकार यदि अपना अभिप्रेत अपनी रचना में व्यक्त न कर पाए, अपनी ही रचना के लिए उसे वक्तव्य देना पड़े, तो एक रचनाकार की इससे बड़ी विफलता और कुछ नहीं हो सकती! राजकमल की कहानियाँ, अपने समय, और अपने समय की रचनाधारा से आगे की बात कह गईं।
राजकमल चौधरी की रचनाओं का समाज, और पात्रों का परिवेश; समकालीन राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों की परिणतियों से भरा हुआ है। उनका रचना-संसार मानवीय नैतिकता के साथ राजनीति और अर्थनीति द्वारा किए गए मजाक को तार-तार करता है। वहाँ पुरुष पात्र या तो स्त्री अंगों को चबा जाने वाला राक्षस नजर आता है, या मोल-भाव कर खरीद लेनेवाला व्यापारी; स्त्रियाँ, या तो अपने को बेच-लुटा देने वाली निरीहा नजर आती हैं या उदारतापूर्वक अपने को वितरित करनेवाली आत्मुग्ध गर्वोन्नता...। ऐसे विकृत परिवेश को उजागर करनेवाले कहानीकार राजकमल चौधरी की कहानियों पर हिन्दी के समालोचकों का ध्यान जाना अभी बाकी है। 
मनुष्य के जीने का और उसके जीवन की तमाम हरकतों का मूल कारण होता है मन और शरीर। इन्हीं दोनों की जरूरतों की पूर्ति हेतु मनुष्य पाप करता है, पुण्य करता है, सही-गलत करता है, वांछित-अवांछित सब कुछ करता है। यहाँ तक, कि किसी लेखक के सृजन का कारण भी प्रकारान्तर से ये दो ही होते हैं। शेष सारे कारण इन्हीं दोनों से पैदा होते हैं।
बीसवीं शताब्दी के छठे दशक का मध्यान्तर आते-आते हिन्दी कहानी आम नागरिक के मन में गम्भीरता से झाँकने लगी थी। भिखारी से दाता तक, रंक से राजा तक, क्रेता से विक्रेता तक, वेश्या से गृहस्थिन तक, संन्यासी से किसान तक उसके पात्र होते थे और उस समय की कहानी उन सबके मन के उद्वेलन को उनकी हरकतों से जोड़ने लगी थी। उनकी शारीरिक क्रियाओं को दर्ज करने लगी थी। राजकमल चौधरी की कहानी जलते हुए मकान में कुछ लोगमें एक वेश्यालय में छापा मारा जाता है, अपने ग्राहकों के साथ सारी वेश्याएँ नंग-धडं़ग तहखाने में चली जाती हैं। एक वेश्या अपने एक व्यापारी ग्राहक के बारे में बताती है, ‘यह बाबू हमारी जात का है। हम चमड़ा बेचते हैं, यह भी चमड़े से बने खेल-कूद का समान बेचता है...।फिर किसी ग्राहक से वेश्या कहती है, ‘तुम जरा भी शर्म मत करो। समझ लो, अन्धेरे में हर औरत हर मर्द की बीवी होती है। अन्धेरे में शर्म मिट जाती है। रंग, धर्म, जात, बिरादरी, मुहब्बत, ईमान, अन्धेरे में सब कुछ मिट जाता। सिर्फ कमर के नीचे बैठी हुई औरत याद रहती है।मैथिली की कहानी सहस्र मेनकामें निर्मला जैसी असहाय विधवा को पूरे गाँव के लोगों ने जाति बाहर कर दुश्चरित्रा, वेश्या घोषित कर दिया है, पर कथावाचक की पत्नी की राय है कि यदि निर्मला दीदी अनाचारिणी रहतीं, वेश्या रहतीं, तो उनकी आज यह दशा नहीं रहती। पापिष्ठा रहतीं तो आज शरीर पर फटी साड़ी नहीं, रेशमी साड़ी रहती।कहानी को मानव जीवन की इन बुनियादी हरकतों से जोड़ने में सक्षम, अस्तित्व के अविचल यथार्थ को इस तरह आँकने में समर्थ, राजकमल चौधरी के लिए यह कहीं से आवश्यक नहीं था कि वे अपने को किसी झण्डे, पार्टी या कथित साहित्यिक आन्दोलन से जोड़ते। उनके लिए कहानी का मतलब सिर्फ कहानी होता था।    
गत शताब्दी के छठे दशक के उत्तरार्ध में हिन्दी में राजकमल चौधरी की रचनाएँ प्रकाश में आते ही चकाचैंध पैदा करने लगी थीं। सन् 1967 से पूर्व लिखी होने के बावजूद उनकी सारी कहानियाँ आज भी अपनी प्रासंगिकता प्रमाणित करती हैं, और विमर्श की नई व्याख्याएँ आमन्त्रित करती हैं। नारी लेखन और नारी जीवन पर विश्व-साहित्य में आज जितनी भी बहसें हो रही हैं, उनके बहुत सारे संकेत राजकमल चौधरी के कथा लेखन में छह दशक पूर्व से मौजूद हैं। पुरुष मनोवृत्ति के बरक्स, स्त्री-जीवन के इतने सूक्ष्म विश्लेषण की आवश्यकता हमें उन्हीं दिनों महसूस करनी चाहिए थी। उनका सम्पूर्ण लेखन (कहानी, कविता, उपन्यास, निबन्ध, नाटक, पत्र, डायरी) मानव जीवन की बुनियादी शर्त पर टिका है।
रोटी, सेक्स, सुरक्षा की तीन जैविक जरूरतों की पूर्ति में मनुष्य मर्यादा तोड़ता है, असभ्य और जंगली हो जाता है। इसके पलट एक बिन्दु और है कि मनुष्य शक्तिचाहता है--पावर’! भारतीय स्वाधीनता के गत सत्तर वर्षों में इस पावरकी व्याख्या मनुष्य को भ्रमित करती रही। मनुष्य का पावरक्या है--पैसा, पद, स्त्री, बंगला, गाड़ी, गद्दी...क्या है मनुष्य का पावर? एक से एक तानाशाह पल भर का उन्माद मिटाने के लिए अपने मातहत स्त्री के सामने घुटने टेक देता है, नंगा हो जाता है; पैसे कमाने के लिए ईमान और इज्जत बेच आता है। फिर पैसा कमाकर इज्जतदार बनना चाहता है। राजकमल चौधरी का जीवन-दर्शन इस सूत्र में भी झलकता है कि मनुष्य सब कुछ बेचकर पैसा खरीदता है और पैसे से सब कुछ खरीद लेना चाहता है। उनका नायक सारा कुछ खरीद पाता है या नहीं--यह और बात है। इच्छा पूरी हो या न हो, मूल बात है कि वह इच्छा पूरी करने की कोशिश करता है। ऐसे ही नायकों, उपनायकों की रचना उनके साहित्य का अहम् हिस्सा है, और सम्भवतः इसी कारण ऐसे नायक के सर्जक को स्वेच्छाचारी कहा जाने लगा। वस्तुतः यह स्वेच्छाचार नहीं है। मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि मनुष्य योनि की पहली अभिलाषा जिजीविषा है, अर्थात् जीने की इच्छा। और जीवन जीने की पहली शर्त है रोटी। यह बात मान लेने की है कि भूख में निर्णय लेने की बड़ी ताकत होती है। भूखा व्यक्ति पाप-पुण्य की परिभाषा जानने की इच्छा नहीं रखता, उसके जीवन की प्रथम और परम नैतिकता रोटी होती है। स्वाधीनता के बाद के उन बीस वर्षों की वह कैसी नैतिकता रही होगी, जब किसी स्त्री को अपनी या अपने बाल-बच्चों की भूख मिटाने, तन ढकने के लिए किसी अनचाहे मर्द के सामने अपना तन उघाड़ने को मजबूर होना पड़ता होगा! इसके ठीक विपरीत, वैसी स्त्री की मनोदशा भी याद रखने की है, जिसका मर्द पैसा बनाने के कार्यक्रमों में व्यस्त, अपनी जवान पत्नी, बहन, बेटी, के मनोभावों और उत्तेजनाओं से निरपेक्ष रहता होगा, खुद किराए के बिस्तरों की तलाश में लिप्त रहता होगा, और उसके घर की स्त्रियाँ पड़ोस में गिगोलो की तलाश करती होंगी। देह से अर्थोपार्जन और अर्थ-बल से देह के सौदे का यह गोरखधन्धा स्वाधीनता के बाद जिस चरम पर था, आज उससे कहीं ज्यादा है। उस सामाजिक संरचना में उन्होंने जीवन की इस विदू्रप परिस्थिति को सूक्ष्मता से पकड़ा।
भारत की जिस आजादी में सामान्य नागरिक का अस्तित्व संकटग्रस्त रहे, जिजीविषा खतरे में रहे; मान-स्वाभिमान, लालसा-अभिलाषा तो दूर, जीवन-रक्षा की पहली जरूरत रोटी तक ठीक से उपलब्ध नहीं हो, उसके लिए कौन-सी नैतिकता कामयाब होती? अपनी कहानियों, कविताओं में राजकमल चौधरी ने जीवन के इसी मर्म को पकड़ने की सफलतम कोशिश की है। यहाँ एक बात गम्भीरता से देखने की है कि मानव जीवन की महत्त्वपूर्ण क्रिया यौनाचार, सृष्टि का कारण है, मगर उनकी कहानियों में इस घटना का उल्लेख हर जगह शुद्ध व्यापार के रूप में हुआ है। इस क्रिया में लिप्त वैसे व्यक्ति भी हैं, जो कामगार की भूमिका में हैं, असल में फैक्ट्री में जूता बनाता हुआ कारीगर, जूता नहीं बनाता है, जूता बनाते वक्त वह पैसा कमा रहा होता है, क्योंकि उसे पता है कि एक जोड़ी जूते तैयार करने के कितने पैसे मिलेंगे। और, उन पैसों से वह क्या-क्या कर सकता है? अपनी यौन-चर्या पर वह कितने रुपए खर्च कर सकता है?...इन दिनों एक शब्द प्रचलन में आया है यौनकर्मी (सेक्स-वर्कर)। यह शब्द अपने कोशीय अर्थ की पूरी दुनिया के साथ राजकमल चौधरी की कहानियों में है। यौनकर्म में लिप्त उनकी कहानियों के पात्र एक ही क्षण, एक ही कर्म में अलग-अलग जीवन जीते हैं। जिस देश का लोकतन्त्र, नागरिक-जीवन में भूख मिटाने के लिए टुकड़ा भर सूखी रोटी और सो जाने के लिए बित्ते भर बिस्तर भी उपलब्ध न करा पाए, उस देश की आजादी किस काम की? राजकमल चौधरी की कहानियाँ, अपनी तमाम समकालीन कहानियों के साथ इसी विडम्बना का चार्ट बना रही थीं। कागज पर लिखी हुई आजादी या नारेबाजी की आजादी में उस समय के अनेक कथाकारों की कोई दिलचस्पी नहीं थी।
आजादी के बाद भारतीय समाज में पनपी कुछ दुरवस्थाओं, सियासी तिकड़मों, ठगे हुए नागरिकों की निराशाओं, आजादी के जश्न में मसरूफ राजनेताओं, राजनीतिक मोहभंग, सीमा संघर्ष और पड़ोसी राष्ट्र की धोखेबाजी का चित्रण हिन्दी के रचनाकारों के लिए ज्वलन्त विषय रहे हैं। भारत का नागरिक-जीवन बेतरह परेशान था। जीवन की बुनियादी सुविधा जुटाने में बदहवास नागरिक को, मुश्किल से जुटाई हुई सुविधा भोग पाने की स्थिति नहीं दी जा रही थी। जीवन का यही त्रासद क्षण उसे नकार से भर रहा था, वह समाज-व्यवस्था द्वारा निर्मित आचार-संहिता को क्रूरता से कुचल डालना चाहता था। आजादी के बाद का अभाव, उपेक्षा, दमन, शोषण, पराजय, अपमान, अवमूल्यन से प्रताड़ित नायक हिन्दी कहानी में कभी प्रतिक्रियावादी की तरह, कभी आन्दोलनकारी की तरह, कभी व्यथित-पराजित समझौतावादी की तरह, कभी नकार-भाव से परे स्वेच्छाचारी की तरह उपस्थित होता रहा।
उनकी रचनाएँ समाज और व्यक्ति के जीवन में आ रहे ऐसे परिवत्र्तनों, मशीन और मशीनीकरण, पश्चिमी देशों और पश्चिमी व्यवसायों, संस्कृतियों से प्रभावित-संचालित आधुनिक भारतीय समाज और सभ्यता के जीवन-संग्राम की अन्दरूनी कथा कहती हैं। सुखानुभूति, जुगुप्सा और क्रोध---तमाम रचनाओं में ये तीन परिणतियाँ पाठकों के सामने बार-बार आती हैं। स्वातन्त्र्योत्तर काल के भारत की जनता, सत्ता और जनतन्त्र की कई गुत्थियाँ इनके यहाँ खोली गई हैं। भाषा में खिन्न और नाराज तेवरों के बावजूद सामाजिक अवसाद के सारे पहलुओं पर अत्यन्त सावधान आयास यहाँ प्राप्य हैं। आजादी से मोहभंग भारतीय समाज की बड़ी और ऐतिहासिक घटना है। समतामूलक समाज का स्वरूप पूरा न होने से बेकारी-बेरोजगारी, भूख-अभाव के सृजन का एक विशाल तन्त्र बढ़ रहा था।
निःसंकोच कहा जाना चाहिए कि राजकमल चौधरी उस दौर के सर्वाधिक पढ़े-लिखे, और विस्तृत फलक के रचनाकर्मी थे। ज्ञान की सभी शाखाओं, अनुशासनों--कला, साहित्य, संस्कृति, रंगकर्म, सिनेमा, इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र से उनका परिचय था; दुनिया भर के साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आन्दोलनों, उपलब्धियों, विप्लवों की गम्भीर समझ थी। इसी समझ ने उस इंसान को बेचैन कर रखा था, अपनी उसी बेचैनी के कारण वे उम्र भर स्वाधीनता और और आजादी का सही अर्थ ढूँढते रहे। जीवन के अन्तिम वर्षों में आपरेशन टेबल पर उनकी व्याकुलता इन पंक्तियों में व्यक्त हुई--
मैं कुछ नहीं जानता हूँ
स्त्रियों नदियों बीमारियों भूख जन्म अपराधों ईश्वर मृत्यु दास्तोवस्की
हिरोशिमा विधान-सभाओं के विषय में कुछ नहीं
आदमी क्यों प्यार करता है युद्ध क्यों परिवार-नियोजन
क्यों बर्लिन की दीवार क्यों
देशप्रेम क्यों अफीम की गोलियाँ क्यों चैप्लिन की फिल्में
क्यों ताशकन्द-सम्मेलन क्यों रीढ़ की हड्डियों में गैंग्रीन
मादाम नू क्यों दास कैपिटल
क्यों सुकरात क्यों सेगाँव की बौद्ध भिक्षुणियाँ जल मरती हैं
क्यों गार्गातुआँ की कहानियाँ क्यों कश्मीर के लिए
सेनाएँ क्यों अजन्ता
क्यों एक ही युद्ध मेरी कमर की हड्डियों में कभी वियतनाम में...
उनकी चीख और व्याकुलता से बड़बड़ाती हुई शैली में दुनिया भर की समस्याओं की सूची तैयार हो जाती है। भारतीय स्वाधीनता उन्हें पागल, काली, मरी हुई स्त्रीदिखती है। उन्हें दुनिया भर में अपने कमर की हड्डियों का बेबर्दाश्त दर्द महसूस होता है और पूरे भारतवर्ष में मवाद और गन्दे पनाले की गन्ध दिखती है --
मैं इतिहास पुस्तक की तरह खुला पड़ा हूँ
लेकिन मेरा देश मेरा पेट मेरा ब्लाडर मेरी अँतड़ियाँ खुलने से पहले
सर्जनों को यह जान लेना होगा
हर जगह नहीं है जल अथवा रक्त अथवा माँस
अथवा मिट्टी
केवल हवा कीड़े जख्म और गन्दे पनाले हैं अधिक स्थानों पर इस देश में...
आजादी के सम्बन्ध में अपनी धारणा आगे और खोलते हैं--
ग्यारह बजकर उनसठ मिनट पर हर रात शहीद-स्मारक के नीचे नंगी होती है
पागल काली एक मरी हुई स्त्री
उजाड़ आसमान में दोनों बाँहें फैला कर रोने के लिए
रोते हुए सो जाने के लिए
पानी और अनाज के देवताओं से भीख माँगती है
तिरंगा फहराने के अपराध में मार डाले गए
1942 के छात्रों के नाम पर...
देश-दशा का ऐसा विद्रूप चेहरा और भी है--
देह की राजनीति से विकट सन्निकट और कोई राजनीति नहीं है संजय
अन्न और अफीम की राजनीति यहीं शुरू होती है
जन्म लेता है मृग-मारीच
लोक सभा में अन्न मन्त्री कहते हैं
बसते हैं कोई पाँच अरब चूहे इस में...
           
स्वाधीनता के उन्नीस वर्ष बाद की समाज-व्यवस्था को अपनी कविता मुक्ति प्रसंगमें राजकमल चौधरी ने देश को जख्मी और मवाद की दुर्गन्धियों से भरा हुआ देखा, जनप्रतिनिधियों की नजरों में जनता के लिए तिरस्कार देखा, देह की राजनीति का त्रासद खेल देखा, जनता को चूहा समझे जाने की दानवता देखी, उन्हें स्पष्ट तौर पर घोषणा करनी पड़ी --
इस ऊष्णगर्भा धरती को मरघट स्वेच्छानुसार हमने ही बनाया है
मनु शतरूपा आँगन में सत्ता का विषवृक्ष
हमने ही लगाया है।
आओ इस राजभवन में इस कारागृह में अतएव चिन्तामुक्त हो जाएँ
उतार डालें अपने चेहरे अपनी नकाब...(मुक्तिप्रसंग)
राजकमल की जिस भीड़को चूहा समझा जा रहा था, उस--
प्रजाजनों के शब्दकोश में नहीं रह गए हैं दूसरे शब्द दूसरे वाक्य
दूसरी चिन्ताएँ नहीं रह गई हैं (गेहूँ के अलावा)
किन्तु भीड़ से विच्छिन्न असम्पृक्त रहकर भी भीड़ से मुक्त मैं हो नहीं पाता हूँ
मुक्त हो जाना कविता से पहले और मृत्यु से पहले
मुक्त हो जाना असम्भव है...
आजादी के बाद लगभग बीस बरस राजकमल चौधरी जीवित रह पाए। सन् 1947 से 1967 की उस अवधि को प्रसिद्ध आलोचक शिवप्रसाद सिंह ने शर्मनाक भिक्षाकालके नाम से स्मरण किया है। राजकमल चौधरी का यह पूरा अन्तराल उक्त भीड़की जिजीविषा के लिए बुनियादी शर्तों की सूची बनाते, और स्वाधीनतापूर्वक उसके उपभोग की गुंजाइश बनाते हुए बीता। मुक्त और आजाद होने की सारी कामनाएँ, अनाज और पानी के देवताओं तथा भारत भाग्य विधाताओं के कारण धरी रह गईं।
सपनों और कामनाओं का टूट जाना, प्रतिबद्ध लोगों के लिए बड़ी घटना होती है। उस शर्मनाक भिक्षाकाल में राजकमल चौधरी यह देख रहे थे कि भारतीय लोकतन्त्र की रक्षा की जिम्मेदारी लिए हुए लोग पश्चिमी देशों के आगे हाथ फैलाए खड़े हैं, पड़ोसी राष्ट्रों से मैत्री कर धोखा खा रहे हैं, अपने देश में आई प्राकृतिक आपदाओं की ओट में अकाल, भूख, महामारी, बेकारी की फसल उगा रहे हैं, राजनीतिक दृष्टिहीनता, प्रशासकीय अक्षमता और जनविरोधी आचरण के कारण देश के सामान्य नागरिक को मूलभूत सुविधाएँ देने में अक्षम हैं, और भारतीय लोकतन्त्र का मजाक उड़ा रहे हैं; देश की धरती के नाम पर शहीद हुए सिपाहियों की कुर्बानी पर कलंक का टीका लगा रहे हैं। ऐसे समय में रचनाकार का दायित्व बनता था कि वह अपने समय की जनता को उसकी अवस्थिति की सही जानकारी दे, उसे राष्ट्रीय अस्मिता के रक्षार्थ और अपने मौलिक अधिकारों के प्राप्यर्थ प्रतिपक्ष में खड़ा कर सके। जनविरोध के अलावा उस दौर के अंकुशविहीन राजनीतिज्ञों, व्यापारियों और उपदेशकों से मुक्ति पाने का और कोई रास्ता नहीं था। बहुविधावादी रचनाकार राजकमल चौधरी की कथा, कविता, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, रिपोर्ताज सबमें देश-दशा की प्रस्तुति हो रही थी, पर हर विधा की अपनी सीमा होती है, हर विषय और प्रसंग की भी खास माँग होती है।
सन् 1960 के बाद का दौर अकविताऔर नई कहानीका दौर था। उपेन्द्रनाथ अश्क, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती आदि प्रेमचन्द, यशपाल, जैनेन्द्र कुमार की परम्परा को और उर्दू के सआदत हसन मण्टो, राजेन्द्र सिंह बेदी, कृष्ण चन्दर आदि की परम्परा को आगे बढ़ा रहे थे। उन्हीं दिनों राजेन्द्र यादव कहानी कला के लिए परिभाषा के नए सूत्र गढ़ रहे थे। थोड़े ही दिनों बाद कमलेश्वर ने अलग कथाधारा की घोषणा कर दी, जो अपनी परिणति में नई कहानीसे किसी भी तरह अलग नहीं थी। उस दौर के अन्य रचनाकार भी किसी न किसी तरह कुछ-कुछ अलग कर रहे थे। राजकमल चौधरी ने उस दौर में बगैर किसी घोषणा और वक्तव्य के, बगैर गुटबाजी के, जमकर कहानियाँ लिखीं। इन कथेतर आचरणों पर उन्होंने खीजकर कहा--कहानी के बारे में तरह-तरह की परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं। नामवर जैसे नवोदित आलोचकों ने आज की कहानी को एकबारगी ही नई कहानीबना दिया है।...आज की कहानी में (जिसे मैं नई कहानीकी संज्ञा नहीं देना चाहता हूँ) हम साहित्य की अन्य विधाओं की तरह ही परम्परागत तौर तरीकों और रीति को छोड़कर आगे आ रहे हैं। पहले कहानी की निश्चित सीमाएँ थीं; घटना की सीमा, चरित्र की सीमा, कथानक की सीमा, क्लाइमेक्स की सीमा। तरह-तरह की सीमाएँ। आज हम इन सीमाओं में बन्धे रहना जरूरी नहीं समझते हैं।...इस युग में आकर कविता और कहानी बहुत हद तक चित्रकला और संगीत के निकट आ गई है(शवयात्रा के बाद देहशुद्धि/पृ. 150-51)
राजकमल चौधरी की कहानियाँ शिल्प के स्तर पर भी उनके इस कथन को पुष्ट करती हैं और कथा लेखन की नवता, ताजगी, चित्रात्मकता, काव्यात्मकता, लयात्मकता, विविधता इत्यादि को प्रमाणित करती हैं। उनकी कहानियाँ भावकों को उतनी देर के लिए दुनिया से काट देती हैं, यहाँ तक कि उसे साहित्य की विधा तय करने के अभिज्ञान से भी निरपेक्ष रखती हैं। भावक को सिर्फ वह पाठ याद रहता है, जिसे वह पढ़ रहा होता है। राजकमल की कहानियों में दर्ज कथ्य में इस सम्मोहन का मूल कारण कथाकार का जनसरोकार और कथ्य के साथ भाषा और शिल्प का व्यवहार ही है। अचानक कहीं से कथा का शुरू हो जाना, अचानक कहीं खत्म कर देना। कभी आँख मूँदकर सुनें तो नाटक या चलचित्र का आभास हो, कभी बोलकर पढ़ें, तो कविता की ध्वनियाँ और लय गूँजे, कभी तेजी से भागती दृश्यावली लगे। शिल्प की इतनी विविधताएँ उनकी कहानियों में हैं कि कोई एक, दूसरे से मेल नहीं खाता। सबसे रोचक यह है कि सारी मनमानियाँ करने के बावजूद उनकी कहानियों का कहानीपन आहत नहीं होता, निरन्तर भावकों पर कथा और कथाकार का नियन्त्रण बना रहता है। शिल्प का यह जादुई सम्मोहन भारतीय भाषाओं के उस दौर के कथाकारों के यहाँ मुश्किल से मिलता था। बीसवीं शताब्दी के पश्चिमी साहित्य में आधुनिकताको लेकर शिल्प, शैली सम्बन्धी जितने भी प्रयोग हुए हैं, उसके सारे संकेत यहाँ दिखते हैं।
उनकी मान्यता थी कि समकालीन होने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप अपने जीवन और व्यवहारों को ढाले। मगर चारित्रिक द्वैध उस काल के मानव का विशेष गुण था। प्रतिबद्धता की दुहाई दी तो जा रही थी, मगर वास्तविकता थी कि--कोई भी प्राध्यापक-लेखक अकाल के बारे में तो वक्तव्य दे सकता है, लेकिन अपने काॅलेज, अपनी युनिवर्सिटी-सर्विस कमीशन में फैली हुई नफासत, धान्धली और लाल फीताशाही के खिलाफ खुली चिट्ठी नहीं लिख सकता है। कोई भी पत्रकार-लेखक अथवा सम्पादक-लेखक अमरीकी साम्राज्यवाद और वियतनामी गुण्डागर्दी के खिलाफ जिहाद तो बोल सकता है, लेकिन देशी पूँजीपतियों के काले और सफेद कारनामों के विरोध में कोई नारा वह बुलन्द नहीं करेगा। हमारी इन नई पीढ़ी का लेखक जहाँ से पैसा पाता है, जहाँ से अनाज, सुरक्षा, यश-प्रतिष्ठा, स्त्री और आत्मकालीनबने रहने का सुख पाता है--उसके खिलाफ उसकी बोलती बन्द हो जाती है।...अगर हम वाकई लेखक हैं, और सचमुच किसी बड़ी बात के लिए यह पेशा, यह रचनात्मक (क्रिएटिव) चरित्र अपनाए हुए हैं, तो किसी भी आार्थिक-राजनीतिक जीवन-दर्शन के प्रति प्रतिबद्ध होने से पहले हमें साहसी, और विकल्पहीन होना चाहिए। हम संकल्प में जिएँ। विकल्पों में जीने की गाँधीवादी-नेहरूवादी विचार-परम्परा और जीवन-परम्परा को अब हमें हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर देना चाहिए(बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल/पृ. 110-111)
आज के भारत का नागरिक-जीवन संवेदना के स्तर पर बड़ी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ नैतिकता, मानवीयता, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक मूल्यों के परिरक्षण, और सभ्य-सामाजिकता की दुहाई दी जा रही है; दूसरी तरफ बाजार के साम्राज्य में झूठ, तस्करी, फरेब, बलात्कार, गबन, घोटाले, घूसखोरी, स्त्री-अंगों की दलाली, राष्ट्र और मातृभाषा से विमुखता का धन्धा चल रहा है। इस विद्रूप परिस्थिति में हर कोई अपनी-अपनी समाज-व्यवस्थाओं या कि समान्तर व्यवस्थाओं के निर्माण में लिप्त है, और उन्हें अपने-अपने तर्क से उचित ठहरा रहा है। पाप-पुण्य, ईमान-धरम, उचित-अनुचित, सम्बन्ध-बन्ध, श्लील-अश्लील, नीति-अनीति...सबकी परिभाषाएँ बदल और उलट गई हैं। पुरानी समाज-व्यवस्था और आचार-पद्धति खण्ड-खण्ड हो रही है। नई-नई (कु)व्यवस्थाओं को नई प्रतिष्ठा मिली है। राजकमल चौधरी की कहानियों में पुराने मूल्यों के टूटने और नई व्यवस्थाओं के बनने की आहटें सुनी जा सकती हैंै। उनमें एक साथ व्यवस्था विखण्डन, और नव-व्यवस्था के स्थापन की प्रक्रियाएँ हैं। शायद इसीलिए राजकमल चौधरी की कहानियाँ समय के साथ पुरानी नहीं पड़ी हैं। अपने विचार, वक्तव्य और जीवन पद्धति में सदैव एकसूत्रता रखनेवाले राजकमल चौधरी की कहानियाँ निश्चय ही आज के समाज में नई दृष्टि का संचार करेगा। इस पर विचार होना चाहिए।




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