Monday, September 14, 2026

भाषा और संस्कृति का विरूपक : बाजार The Market : A Distorter of Language and Culture


 भाषा और संस्कृति का विरूपक : बाजार

The Market : A Distorter of Language and Culture 

अंग्रेजीदाँ लोगों की शोहबत में आए लोग, आजकल ‘किताबों की हिन्दी’ या ‘शुद्ध हिन्दी’ जैसे पदबन्ध से हिन्दी मजाक उड़ाने को बेताब हैं। वे चाहें, तो आसानी से जान लेंगे कि हिन्दी की विकास-यात्रा के साथ एक ओर अपने प्राचीन गौरव-ग्रन्थों की विरासत का पाथेय था, तो दूसरी ओर ज्ञान-समृद्धि का लोक-चैतन्य और तीसरी ओर विदेशी आक्रान्ताओं की शासकीय नीति का उपेक्षा-भाव!...शताब्दियों तक आक्रान्ताओं द्वारा दमित, उपेक्षित होकर भी इसकी भव्यता और ज्ञानाकुलता बची रही, तो इसका एक मात्र श्रेय किताबी हिन्दी को ही जाता है।

आधुनिक काल में किताबी हिन्दी के उदाहरण-स्वरूप हमारे समक्ष एक ओर हजारीप्रसाद द्विवेदी और कुबेरनाथ राय जैसे महान-महान सृजेताओं का निबन्ध-लेखन है; तो दूसरी ओर प्रेमचन्द और शिवपूजन सहाय जैसे भाषासेवियों साहित्य-साधना।...इन मनीषियों के कोई भी पाठक कह सकेंगे कि हजारीप्रसाद और कुबेरनाथ को पढ़कर वे भाषिक रूप से समृद्ध नहीं हुए है?...

यदि कहेंगे, तो उन्होंने निश्चय ही एस.एम.एस. की भाषा या बाजार की भाषा को अपना आचरण बना लिया होगा; अपनी राष्ट्रीयता और पहचान से उनका कोई सरोकार नहीं रहा होगा। सभ्यता के विकास-क्रम में वे भाषा का मूल मर्म नहीं समझ पाए होंगे! अपना भाषिक संस्कार सुधारने के बजाय, वे भाषा पर ही फतबा जारी करने लगे होंगे! ऐसे बेताब लोगों के जीवन में भाषा का मूल्य, सम्प्रेषण का माध्यम भर रहा होगा; राष्ट्रीय पहचान नहीं, संस्कृति की सरणि नहीं!

वे नहीं जानते होंगे कि भाषा कोई भी हो -- हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी, तमिल, कन्नड़, मलयालम, अंग्रेजी...कोई भी; वह केवल शब्दों का समुच्चय या संवाद और सम्प्रेषण का माध्यम नहीं है! एक दूसरे को अपनी बात कह-सुन सकने का माध्यम भर नहीं है!...भाषा, हर समय मनुष्य के सोच-विचार का आधार होती है। सामुदायिक जीवन की सांस्कृतिकता और राष्ट्रीयता को रंखांकित करती आई है। संवाद या सम्प्रेषण तो लोग इशारे में भी कर ही लेते हैं; इशारे में सोच-विचार नहीं कर सकते!...भाषा न हो तो संवाद करने के लिए जो बातें हमारे मस्तिष्क में आती हैं, हम सोच ही नहीं सकेंगे! क्योंकि मनुष्य का हर चिन्तन किसी न किसी भाषा में होता है। 

भाषा का दूसरा काम है, सामुदायिक संस्कृति और आचार-विचार-व्यवहार की भव्यता विकसित करना।...हम सब जानते हैं कि भाषा का निर्माण समाज में काम करते कामगारों के बीच होता है, जिसे व्यवस्थाओं के स्वामी सार्वजनिक जीवन में मान्यता दे देते हैं।...इसके बाद वही भाषा, समाज पर, समाज की संस्कृति पर और मनुष्य के आचार-विचार पर शासन करने लगती है; वही भाषा, समाज को अनुशासित करने लगती है; क्योंकि हर भाषा में उसके सामुदायिक जीवन की संस्कृति बसी रहती है।

बिहार, उत्तर-प्रदेश में बड़ों के लिए ‘आप’ और छोटों के लिए ‘तुम’ सवर्नाम का उपयोग होता है; ऐसा भेद हरियाणा या हिमाचल में या कुछ अन्य क्षेत्रों मे भी नहीं है। ऐसा प्रान्तीय संस्कृतियों की जरूरत से होता है। हमें याद रखना चाहिए कि भाषा हमें अनुशासित करती है। भाषा हमें सोच-विचार-चिन्तन पद्धति का आधार देती है। इसके बाद ही हम भाषा का उपयोग संवाद या सम्प्रेषण के लिए कर पाते हैं। 

हिन्दी तो हिन्दी होती है, उसमें ‘बोलचाल की’ या ‘घर की’ या ‘बाजार की’ या ‘किताबों की’ जैसे विशेषण की क्या जरूरत है? प्रमाणित सत्य है कि ‘बाजार की हिन्दी’ से आजकल की ‘बोलचाल की हिन्दी’ या ‘घर की हिन्दी’ प्रदूषित हो रही है। ‘किताबों की हिन्दी’ से दूर रहनेवाला समुदाय, या तो स्थगित हो जाएगा या उसके विकास की गति शिथिल हो जाएगी। वे क्रमशः ‘भाषाविहीनता’ की ओर बढ़ चलेंगे। फिर वे सही सवाल का सोच-विचार नहीं कर सकेंगे।

तत्सम शब्दों की भरमार वाली भाषा से मुक्त होने के लिए विद्वानों ने कार्यालयी प्रयुक्तियों में ‘प्रयोजनमूलक हिन्दी’ का नया विधान लागू किया; अब हिन्दी को निगल लेने के षड्यन्त्र में क्रियाशील अंग्रेजी-भक्त जनमत बनाकर हिन्दी का अपमान करने में लगे हुए हैं; प्रान्तीय भाषाभाषियों को हिन्दीभाषियों से लड़ा रहे रहे हैं; जटिलता का तोहमत थोपकर, ‘किताबों की हिन्दी’ या ‘शुद्ध हिन्दी’ जैसे पदबन्धों से व्यंग्य कर रहे हैं; हिन्दी के विरुद्ध जनमत बना रहे हैं। बदकिस्मती से हिन्दी-पट्टी के आम जन उनकी बात मान भी रहे हैं; क्योंकि बाजार के प्रदूषित भाषा-संस्कार में उन्हें लपेटकर, उनकी घर की भाषा प्रदूषित कर दी गई है! हमें इस षड्यन्त्र के मूल को जानना होगा!

विदित है कि व्याकरणिक विधान ही, दुनिया की हर भाषा का अनुशासक होता है, जो पाठ के प्रभाव को नियन्त्रित करता है और उसकी शब्दावली लोक-क्षेत्र के कामगारों के बीच विकसित होती है। पर, भारत के जिस नकलची ‘लोक’ के घर की भाषा, बाजार से उठाकर लाई गई भाषा से प्रदूषित हो गई है, वही उनका आचरण हो गया है, हमें अपनी राष्ट्रीयता सुदृढ़ करने के लिए उन्हें ‘किताबों की हिन्दी’ के निकट लाना अनिवार्य होगा। उनका भाषिक संस्कार सुधारकर, फतबेबाजी से बरजना होगा।

डिजिटलाइजेशन और ए आई की चपेट में आया हमारा समाज; जो इन उपलब्धियों का बेहतरीन उपयोग कर सकता था, ढेर सारे रचनात्मक कार्य कर सकता है; भाषिक नासमझी के कारण सब के सब इस सुअवसर का उपयोग गलत कामों में करने लगे। अपनी पतनशील रुचियों को सहलाते हुए, सुविधागामी समाज ने इसे ऐसे अपनाया, जिसमें न तो सामुदायिक हित दिखता है, न सांस्कृतिक, और न ही राष्ट्रीय। उन्होंने न तो ए.आई. का सही उपयोग सीखा, न ही डिजिटलाइजेशन के किसी अन्य उपकरण का !

इन उपकरणों का उपयोग वे घृणा फैलाने, द्रोह उपजाने, उपद्रवी आचरण करने, ए.आई. के उपयोग से कक्षा का सबक बनाने की धूर्तता करने...जैसे वाहियात कामों में किया। तोप से मच्छड़ मारा।

स्मरणीय हो कि मनुष्य की मेधा से निर्मित ये सारे उपकरण मनुष्य के हित के लिए बनाए गए। इन उपकरणों में संवेदना नहीं होती, और मनुष्य का जीवन संवेदना के बिना चल नहीं सकता। जीवन की संवेदनशील सुविधा और इन उपकरणों के उपयोग में अनिवार्य सन्तुलन हमारा समाज भूल गया है। वह भूल गया है कि मनुष्य के इन आविष्कारों के उपयोग का विवेक हमें ही अपनाना था। विवेकशील उपयोग न करने के कारण ही हमारे सामुदायिक आचरण में बाजार की भाषा सिर चढ़कर बोलने लगी है।

‘घर की भाषा’ और ‘किताबों की भाषा’ में भेद करते समय हमें इन प्रसंगों को सावधानी देखने की चेष्टा करनी होगी। हिन्दी भी इसका अपवाद नहीं है। अब हमारे घर की हिन्दी, घर की नहीं, बाजार की हो गई है; जहाँ भाषा का उद्देश्य केवल क्रेता-विक्रेता संवाद भर है। हिन्दी ही नहीं, घर में हम जिस किसी भाषा का उपयोग करते हैं, उसमें हम सभी, परिवार के सदस्यों की पारिवारिक-सामुदायिक संस्कृति की भी रचना करते हैं। बाजार से उठकर आई हुई हिन्दी, किताब की हिन्दी तक तो क्या जाएगी, वह हमारे घर की संस्कृति तक को बिगाड़ बैठी है! 

कुछ बुद्धिवादियों के उत्पात से जटिल हो गई हिन्दी, हमारी हिन्दी का पैमाना नहीं हो सकता। हमारे पूर्वज कहते आए हैं ‘भाषा बहता नीर’। इस ‘बहते हुए नीर’ को जटिल बनाने की प्रक्रिया में कुछ पण्डितों ने अपना पाण्डित्य जरूर घुसाया है; मगर, एक सीमा तक उस पाण्डित्य को स्वीकार कर लेने से कोई असुविधा नहीं हो सकती। इस क्रिया में कम से कम पारिवरिक सदस्यों की भाषिक समझ तो बढ़ेगी! बाजार के प्रभाव से भ्रष्ट हुई हमारी हिन्दी तो सुधरेगी! क्योंकि ‘किताबों की हिन्दी’ के निकट जाने से निश्चय ही हमारे ‘घर की हिन्दी’ विवेकशील और संस्कृति-सम्मत, और राष्ट्रीयता की रक्षा की ओर अग्रसर होगी। और, ऐसे प्रयास से जो युवा पीढ़ी तैयार होगी, उसकी सामूहिकता बहुमत में होगी, लिहाजा हमारा समाज और हमारा राष्ट्र वर्द्धिष्णु होगा।

सहूलियत के चक्कर में हम अपने ‘घर की हिन्दी’ को भ्रष्ट होते देख रहे हैं; सन्ततियों और पीढ़ियों का भाषा-संस्कार बिगाड़ रहे हैं, हमें उससे परहेज करने की जरूरत है। 

भारत देश में आज सर्वाधिक संख्या, हिन्दी बोलने, समझने और संवाद करनेवालों की है। इस भाषा में राष्ट्रीय संस्कृति को वहन करने की क्षमता है। पर इसी हिन्दीपट्टी में कुछ लोग ऐसे हैं जो हिन्दी की कमाई से जीवित रहकर भी हिन्दी का मजाक उड़ाने में नहीं हिचकते। उन्हें ऐसा कहने में तनिक भी शर्म नहीं आती कि ‘उनकी हिन्दी कमजोर है’। असंख्य हिन्दी-अधिकारी, हिन्दी-अनुवादक, वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी...बड़े गुमान से कहते पाए जाते हैं कि ‘उनकी हिन्दी अच्छी नहीं है’, ‘उन्हें हिन्दी में लिखने में दिक्कत होती है’।...असल में वे ‘अंग्रेजी न आने की झेंप मिटाने के लिए’, स्वयं को अति सुबोध साबित करने के लिए ये सब करते हैं। 

जो लोग ‘घर की हिन्दी’ को ‘किताबों की हिन्दी’ से अलग करके देखने में विश्वास रखते हैं; उन्हें यह समझना होगा कि भाषा, व्याकरण से अनुशासित होती है। ‘भाषा’ घर की हो, दफ्तर की हो, किताब की हो; व्याकरण के अनुशासन के बिना वह कुमार्गी हो जाती है। कुमार्ग हर क्षेत्र में ‘कु’ ही लाएगा, अर्थात्, अनिष्ट ही करेगा। एक उदाहरण याद आया – ‘सोच’ शब्द का व्यवहार 99 प्रतिशत लोग स्त्रीलिंग में करते हैं, जबकि यह पुलिंग है, स्त्रीलिंग नहीं।

परिवार में बोली जाने वाली भाषा, सामाजिक व्यवहार से परिवर्तित होती रहती है और समय के दबाव से परिवर्तित इस सामुदायिक भाषा का असर किताबों की भाषा पर भी होता है; स्वभावतः यह असर हिन्दी पर भी होगा। मगर जो लोग बाजार की भाषा के प्रभाव में अपने घर की भाषा दूषित करने लगे हैं; उन्हें अपने कृत्य पर विवेकसम्मत विचार करना होगा।

अक्सर लोग भ्रान्ति में ही नकल करते हैं -- लोग बोलते हैं ‘अब तो हम क्या ही जाएँगे’। इसमें ‘ही’ कहाँ से आया? लोगों की मूढ़ता से; इसका न तो कोई औचित्य है, न प्रयोजन, और न ही इससे कोई सहूलियत। सिर्फ मूढ़तापूर्ण नकल के प्रभाव में ही लोगों ने ऐसे उत्पात किए और अपने घर के साथ-साथ समुदाय का भाषा संस्कार बिगाड़ बैठे। लोग बोलते हैं ‘राम, श्याम व रानी’। इसमें लोग सोचें कि उन्होंने ‘और’, ‘एवं’, ‘अथवा’, ‘या’ के बदले इस ‘व’ का प्रयोग किसी मूढ़ प्रयोक्ता की नकल में क्यों करने लगे। शब्द का अर्थ और मूल जाने बिना उसका उपयोग भाषा के प्रति असावधानी है, इसलिए यह राष्ट्रीय अपराध है। भारतीय मनीषा में ‘व’ कोई शब्द नहीं है। जिस किसी ने इसका प्रयोग पहली बार किया, वे निश्चय ही मूढ़ होंगे, या उनकी ध्वनि-तन्त्रिका में कोई गतिरोध रहा होगा। भले लोगों ने उसी मूढ़ता या विवशता की नकल की नकल करते हुए, पूरे समुदाय में फैला दिया। कुछेक नाम हैं, खासकर बेटियों के, इस समाज के लोग बेटों के नामकरण के लिए पण्डित बुलाते हैं, बेटियों का अतरंगी नाम रखने के फेर में ऐसी कुमार्गी संज्ञा धर देते हैं, जिसका अर्थ वीभत्स होता है। यहाँ ‘नाम’ का उल्लेख न करने की वजह केवल इतनी है कि मैं सोशल मीडिया पर अपनी फजीहत सहने से बचना चाहता हूँ! वे मेरे भाच को समझे बिना सामाजिक चबूतरे पर उत्पात शुरू कर देंगे। परिवेश में ऐसे ढेरो नाम हैं, जिनके अर्थ निकृष्ट हैं, पर लोगों ने रखा है! सारे फसादों की वजह है, बाजार की प्रदूषित भाषा घर लाकर, घर की व्यवस्था बिगाड़ने की चेष्टा! 

बेहतर तो यह होगा कि घर की हिन्दी भी सुधारी जाए! किताबी हिन्दी से दूर रहने या मुँह छुपाने के बजाय उसके निकट जाने की चेष्टा की जाए। इससे घर-परिवार की भाषा भव्य होगी। भाषा भव्य होगी तो सांस्कृतिक भव्यता आएगी; फिर आचार-विचार भव्य होगा। इस आधार की भव्यता से सोच और चिन्तन भी भव्य होगा। कीचड़ में कमल जरूर खिलते हैं, पर बंजर भूमि पर फसल नहीं लहराती। प्रदूषित भाषा-परिवेश में प्रदूषित विचार ही आएँगे! सांस्कृतिकता और आचार तो प्रदूषित होंगे ही। 

मेरी राय में किताबों की हिन्दी में भी ऐसी सहज और प्रवाहपूर्ण अवश्य हो कि लोग उससे सहज सम्बन्ध बनाएँ! जनसामान्य को उससे सम्मोहन हो; उसके निकट आकर लोग स्वयं को भव्य-सभ्य-सुसंस्कृत बनाए; सामाजिक और राष्ट्रीय बनाए!

जहाँ तक ‘घर की हिन्दी’ का प्रश्न है, भाषा में आविष्कार की क्षमता, केवल भाषाविज्ञानियों में ही नहीं होती, घर-परिवार की सहज प्रयुक्तियों में भी आती है; उसके लिए लोगों को किसी भाषाविज्ञानी से अनुमति लेने जरूरत नहीं होती! घर-परिवार में लोग अक्सर ‘कोई बात नहीं’ को ‘कोइनीं’ कहकर अभिप्राय प्रकट कर देते हैं! गौर करने का है कि ऐसी ही प्रयुक्तियों के कारण हमारी भाषा के सारे मुहावरे और लोकोक्तियों की रचना हुई है। घरेलू प्रयुक्तियों में कई बार आंगिक चेष्टा से, कई बार अपने पारिवारिक रूपक से भाषिक प्रयुक्तियाँ रच देते हैं। एक उदाहरण से इसे स्पष्ट करूँ कि पति-पत्नी संवाद में कोई एक अपने खानदान की प्रशंसा में कुछ कहने लगे, और दूसरा बोले ‘एक सौ तिरसठ’; इसका अभिप्राय हुआ कि यह बात 162 बार पहले सुनाई जा चुकी है; ऐसे संवाद अक्सर दाम्पत्य जीवन के विनोद की तरह होते हैं; पर इस भाषिक संकेत का अभिप्राय हर परिवार में समान हो, यह जरूरी नहीं!...ऐसी युक्ति घर-परिवार तक ही सीमित रहती है। इसे किताबों की भाषा में शामिल करने पर लेखक को अपनी रचना में रूपक का उपयोग करना होगा। किसी घर का भाषिक रूपक इतना बड़ा हो जाए कि वह साहित्यिक किताबों में आने लगे तो क्या कहने! 

‘घर की हिन्दी’ मनुष्य की तरह ही सुविधा-मूलक होती है, वह कभी किताबी हिन्दी नहीं हो सकती! क्योंकि घर-परिवार में जीवन-बसर करता मनुष्य आजाद-ख्याल होता है। वह ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ होने के चक्कर में पारिवारिक स्वच्छन्दता नष्ट नहीं करना चाहता; पर स्वच्छन्दता और अराजकता में फर्क होता है; घर के सदस्यों को ध्यान रखना होता है कि इस स्वच्छन्दता के फेर में हमारी पारिवारिक मर्यादा भंग न हो, बची रहे। बाजार से लाई हुई प्रदूषित भाषा में कोई बच्चा अपनी माँ से यह न कह दे कि ‘देखो मम्मी, पापा कैसी बेवकूफी वाली बात कर रहे हैं!’

घर में उपयोग करनेवाली हिन्दी या कोई अन्य भाषा, लोगों को थोड़ी सुविधा अवश्य देती है; पर किताबों की भाषा से परहेज करना नहीं सिखाती। किताबों की भाषा के निकट जाने से भाषा की, और अन्ततः परिवार की भव्यता बढ़ेगी।

जो लोग अपने पाण्डित्य से भाषा को जटिल बनाने की चेष्टा करते हैं; उन्हें भी सावधान होने की जरूरत है। हिन्दी को तो बहुत जरूरत है। क्योंकि हिन्दी वैसे ही तरह-तरह के आघात की शिकार होती आई है। पहले तो अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए द्रोह की शिकार हुई। स्वाधीनता के बाद सत्ता पर काबिज हुई शासन-पद्धति की शिकार हुई; फिर देश में फैलाए गए भाषाई द्रोह की शिकार हुई; हिन्दी अधिकारियों की शिकार हुई; फिर अंग्रेजीदाँ मूढ़ों के अहंकार की शिकार हुई; फिर हिन्दी का दोहन करनेवाले हिन्दीभोगियों की शिकार हुई!...इतने सारे शिकारियों से बचती हुई, अभी भी हमारी हिन्दी है कि हम हैं!

हिन्दी हमारी राजभाषा है और इस भाषा में लिखते हुए इस भाषा के आविष्कारक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने स्वाधीनता संग्राम के दौरन नारा बुलन्द किया कि ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’। यह कोई मामूली बात नहीं थी। इसमें ‘निज भाषा’ को इतना महत्त्व दिया गया था कि इसी सूत्र पर सारे भाषाप्रेमी एक सूत्र में बँध गए।

इस भाषा ने हमें ताकत दी है कि हम कश्मीर से कन्याकुमारी तक की जनता से संवाद कर सकते हैं। लोगों को अपनी मातृभाषा बेशक प्यारी होती है, पर पूरे राष्ट्र में सांस्कृतिक संवाद के लिए सम्पर्क-भाषा की जरूरत हिन्दी से ही पूरी होगी। मातृभाषाप्रेम में बेताब हुए लोगों की मण्डली को कुछ फरेबी लोग हिन्दी के विरुद्ध उकसाने में क्रियाशील हैं; अब फरेबियों का तो कुछ नहीं किया जा सकता पर मातृभाषाप्रेमियों को सलाह दी जा सकती है कि वे सावधान रहें; हिन्दी से वैर पालना छोड़ें, मूल वैरी ‘अंग्रेजी’ की पहचान करें, अंग्रेजी अवश्य सीखें, पर अंग्रेजियत से अलग रहें।

अपने घर की हिन्दी सही रखते हुए, हमें किताबों की हिन्दी के निकट आने की जरूरत है; बाजार की हिन्दी के निकट नहीं। क्योंकि बाजार की कोई भाषा नहीं होती। कुल मिलकर उनकी भाषिक क्षमता पाँच सौ शब्दों की होती है। ठेले पर सब्जी बेचनेवाले से लेकर हवाई जहाज बेचनेवाले व्यापारियों का काम इन्हीं पाँच सौ शब्दों से चल जाता है। जबकि किताब पढ़ने वालों की न्यूनतम शब्द-क्षमता दस हजार से कम नहीं होती। अब निर्णय तो हमें करना है कि हम पाँच सौ शब्दों के स्वामियों से अपने घर की भाषा निर्मित/पुष्पित करेंगे या दस हजार शब्दों के स्वामियों से। जिस बाजार का अस्तित्व हमीं से है, हमारी भाषा वह सुधरेगा; या उसकी भाषा हम सुधारेंगे; तय हमें करना है।

Friday, September 11, 2026

बी.आर. दीपक का अनुवाद-चेतना Translation sense of B.R. Deepak

 

 

बी.आर. दीपक की अनुवाद-चेतना

Translation sense of B.R. Deepak

सन् 2009 में प्रो. बी.आर. दीपक ने ‘चीनी कविता’ (ई.पू. 11वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी तक) का चयन और अनुवाद प्रस्तुत कर एक विशिष्ट कार्य किया, इसके अगले खण्ड में आगे के समय को रेखांकित करनेवाली चुनी हुई कविताओं का संग्रह अनूदित होकर आ जाता, तो हिन्दी-चीनी कविताओं के तुलनात्मक अध्ययन को बड़ा बल मिलता। सम्भवतः वे ऐसा कर पाएँ!

सन् 1987 में प्रकाशित होते ही, चाङ वेई के जिस पहले उपन्यास ने उपन्यासकार को चीनी भाषा के पीड़ित समुदाय की जीवन-दशा के चिन्तनशील लेखक सिद्ध कर दिया; जिसके बीस से अधिक संस्करण अब तक छपे; बी.आर. दीपक ने ‘पुराना जहाज’ शीर्षक से इसका हिन्दी अनुवाद किया, जो सन् 2021 में प्रकाशन संस्थान से छपा। यह उपन्यास सन् 1949 में चीनी गणराज्य की स्थापना के बाद के चालीस वर्षों का इतिहास है, जो भूत-वर्तमान-भविष्य को एक साथ जोड़ता है। इसमें सामाजिक आत्यचार, क्रूरता और भ्रष्टाचार पर चोट करते हुए; मनुष्य की सहनशक्ति, जिजीविषा, सपने और सपनों को यथार्थ में बदलने की इच्छाशक्ति के साथ-साथ मनुष्यता बचाने की वकालत की गई है। चीन के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और साहित्य में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह उपन्यास अनिवार्य सामग्री है। यह अनुवाद प्रो. दीपक की अनुवाद चेतना को रेखांकित करता है।

सन् 2017 में प्रो. दीपक द्वारा हिन्दी में अनूदित कृति ‘मेनशियस’ शीर्षक से प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित हुई। यह कृति 'द मेनशियस' का हिन्दी अनुवाद है, जो ई.पू. चौथी-तीसरी (ई.पू.372-289) शताब्दी के चीन के महान दार्शनिक, विचारक, शिक्षक और कन्फ्यूशियस के सर्वश्रेष्ठ अनुयायी ‘मेनशियस’ के विचारों, उपदेशों और राजाओं के साथ उनके संवादों का संकलन है। इस कृति की गणना कन्फ्यूशियस की वैचारिकता का विकास करनेवाली चार श्रेण्य साहित्य (क्लासिक्स) में होती है। चीनी इतिहास में मेनशियस की गणना कन्फ्यूशियस परम्परा के 'दूसरे ऋषि' की तरह होती है। मेनशियस का सर्वप्रसिद्ध सिद्धान्त था कि मनुष्य, जन्मजात अच्छे और दयालु होते हैं। वातावरण के प्रभावों से ही कोई अवान्तर मार्ग अपनाता है। सही शिक्षा और वातावरण मिले, तो हर व्यक्ति सदाचारी होगा। उनकी राय थी कि शासकीय व्यवस्था में जनता ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है, उसके बाद ही देश आता है, और अन्त में राजा।...इसीलिए उन्होंने शासकों को कल्याणकारी शासन चलाने की सलाह दी। उनकी स्पष्ट राय थी कि राजा क्रूर हो, जनता का ध्यान न रखे, तो जनता को विद्रोह का पूर्ण अधिकार है। चीनी ज्ञान-परम्परा की इस शृंखला का हिन्दी अनुवाद कर, प्रो. दीपक ने यहाँ अपनी क्रियाशील अनुवाद चेतना का परिचय दिया है।

भारत-चीन सांस्कृतिक सम्बन्ध और प्राचीन चीनी विद्वानों की भारत-यात्रा के वृत्तान्तों का अतुल्य विवरण भारतीय इतिहास-लेखन में सहजता से मिल जाता है। फिर भी, हिमालय के उस पार का यह देश हमारे लिए एक पहेली की तरह है। इसकी उपलब्धियों से सम्मोहित होकर भी भारतीय अध्येताओं को इसकी पृष्ठभूमि ठीक-ठीक समझ नहीं आती। ऐसे में, प्रो. दीपक द्वारा मूल चीनी से हिन्दी में अनूदित चीनी भाषा-संस्कृति के प्रख्यात विद्वान, छन लाए की पुस्तक ‘चीनी सभ्यता के बुनियादी मूल्य’, चीन की आधुनिक सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सन् 2018 में हिन्दी में प्रकाशित यह कृति विदेशी अध्येताओं के समक्ष चीनी में दिए गए व्याख्यानों पर आधारित है। यह कृति महान चिन्तक कन्फ्यूशियस की परम्परा के विकास और समकालीन चीन के बौद्धिक विमर्शों को जानने-समझने की सूक्ष्म दृष्टि देती है। मूल चीनी में इसका प्रकाशन सन् 2015 में हुआ।

‘चीन और भारत : सभ्यताओं का संवाद’, सतरह खण्डों में प्रकाशित, य्वी लूङय्वी और ल्यु चाओह्वा की पुस्तक चीन-विदेश साहित्यिक आदान-प्रदान के इतिहास शृंखला का एक खण्ड है। प्रो. दीपक ने इस खण्ड का हिन्दी अनुवाद कर और प्रकाशन संस्थान ने सन् 2024 में इसे प्रकाशित कर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। भारत-चीन सम्बन्धों की पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए, इसमें चीन में बौद्ध-मत के प्रसार से लेकर आज तक के दौर के एशियाई साहित्यिक संवाद का गहन अध्ययन है। साठ से अधिक पृष्ठों की भूमिका सहित, लेखक द्वय ने सोलह अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक में भारत-चीन सम्बन्ध का लम्बा काल-क्रम दिया है।

इसके पहले तीन अध्यायों में बौद्ध-मत की छत्र-छाया में होने वाले साहित्यिक आदान-प्रदान पर चर्चा की गई है। इनमें सूत्र अनुवाद, चीनी साहित्य पर बौद्ध साहित्य का प्रभाव, चीनी अनुवाद-अध्ययन की शुरुआत...आदि के बारे में उल्लेख है। अगले तीन अध्यायों में भारतीय गाथाओं, मिथकों और नाट्य-वृत्तियों का चीन में प्रवेश; रामायण और महाभारत का प्रसार तथा इन महाकाव्यों के दृष्टान्तों के चीनी साहित्य में समावेश पर चर्चा है। आगे के पाँच अध्यायों में चीन के अग्रणी भारतविदों और भारतीय प्राचीन ग्रन्थों एवं आधुनिक साहित्यिक रचनाओं पर उनके द्वारा किए गए शोधों का उल्लेख है; जिसकी शुररुआत चीन में टैगोर के अनुवाद से हुई। बारहवें और तेरहवें अध्यायों में, भारत में चीनी अध्ययन के प्रसंगों की सम्यक् जानकारी है। चौदहवें अध्याय में भारत में ताओ-मत की लोकप्रियता, पन्द्रहवें में चीन पर राजा राव के लेखन और अन्तिम अध्याय में चीनविदों और भारतविदों की वर्तमान पीढ़ी द्वारा किए गए भारत-चीन अध्ययन का ब्योरा है।

यकीनन, प्रो. दीपक का यह पूरा अनुवाद उद्यम, दुनिया की सबसे समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से महत्त्वपूर्ण ‘एशियाई अनुवाद परम्परा’ के नवीनतम सोपानों में से एक है।  अपनी अनुवाद-निष्ठा के दम पर उन्होंने  स्वयं को हिन्द-चीन साहित्यिक-सांस्कृतिक सेतु के प्रतीक रूप में स्थापित किया है।
 
प्रो. बी.आर. दीपक का जन्म हिमाचल प्रदेश में कुल्लू जिला के टील गाँव में 14 अक्तूबर, 1966 को हुआ। उनकी आरम्भिक शिक्षा तो गाँव में हुई, पर चीनी भाषा में एम.ए, पी-एच.डी. की उपाधि जे.एन.यू से लेकर, इसी विश्वविद्यालय में चीनी भाषा और दक्षिण-पूर्व एशियाई अध्ययन केन्द्र में आध्यापक नियुक्त हुए, अभी वे यहीं प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने चीन के पेइचिङ विश्वविद्यालय, चीनी सामाजिक विज्ञान अकादेमी, ग्रेट ब्रिटेन के लैकेस्टर और एडिनबरा विश्वविद्यालय में भी अध्ययन एवं अध्यापन किया।

चारेक दर्जन से अधिक लिखित-अनूदित चीनी-अंग्रेजी-हिन्दी की पुस्तकों में से गत 25 वर्षों में हिन्दी में अनूदित उनके प्रमुख ग्रन्थ हैं -- 

1.        'चीनी साहित्य का इतिहास' (2001)

2.       'भारत-चीन सम्बन्ध : बीसवीं सदी के पहले 50 वर्ष' (2001),

3.       'भारत और चीन 1904-2004 : एक सदी की शान्ति और संघर्ष' (2005),

4.   ‘चीनी कविता’  : ई.पू. 11वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी तक (2009),

5.       'चीन : कृषि, किसान और गाँव' (2010),

6.    'चीनी कविता : ई.पू. 11वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी तक' (2011),

7.       'भारत-चीन सम्बन्ध : सभ्यता परिप्रेक्ष्य' (2012),

8.       'कन्फ्यूशियस सूक्ति-संग्रह' (2016),

9.       'हिन्दी-चीनी-अंग्रेजी वार्तालाप' (2016),

10.     ‘कन्फ्यूशियस सूक्ति संग्रह’ (2016)

11.      'दीवार के उस पार : समय रेत पर हमारे पदचिह्न' (2017)

12.     ‘मेनशियस’  (2017)

13.     ‘कन्फ्यूशियसवाद के चार ग्रन्थ’ (2018)

14.     ‘चीनी सभ्यता के बुनियादी मूल्य’ (2018)

15.     ‘पुराना जहाज’ (2021)

16.       चीन और भारत : सभ्यताओं का संवाद (2024)

17.       ‘तुनह्वाङ बौद्ध कला : इतिहास, रेशम मार्ग, चीन और पश्चिमी क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संवाद’ (2025)

18.       ‘बौद्ध धर्म : भारत-चीन सांस्कृतिक संवाद’ (2025)