Tuesday, May 22, 2018

लेखक विकल्प नहीं ढूँढता, संकल्‍प करता है/राजकमल चौधरी का कथा संसार






बहुविधावादी रचनाकारों के साथ एक संकट सदैव लगा रहता है। उनकी किसी खास विधा की रचना को अधिक प्रभावी देखकर लोग अक्सर उन्हें उसी विधा के रचनाकार मानने लगते हैं। धीरे-धीरे वह रचनाकार भी अपने को उसी विधा में केन्द्रित कर लेता है और अन्तिम रूप से एक विधा का होकर रह जाता है। किन्तु स्वातन्त्र्योत्तर भारत के प्रखर रचनाकार राजकमल चौधरी के साथ ऐसा नहीं हुआ। कुछ ने उनके कवि रूप को श्रेष्ठ माना, कुछ ने कथाकार रूप को। कुछ ने उन्हें मैथिली का बड़ा लेखक माना, कुछ ने हिन्दी का। पर निर्णयात्मक रूप से कहना कठिन है कि वे कथाकार बड़े हैं या कवि, उपन्यासकार, अनुवादक, निबन्धकार, समीक्षक।...यहाँ तक कि उनके पत्रों और डायरियों तक में समाजशास्त्रीय अध्ययन के गम्भीर चिह्न दिखाई देते हैं। बात तो यहाँ तक कही जा सकती है कि उनकी ही कृतियों में किसी एक विधा की भिन्न-भिन्न रचनाओं की तुलना करके किसी को कम या अधिक महत्त्वपूर्ण साबित करना असम्भव है। एक सीमा तक उनकी कविताओं में से कुछेक को छाँटकर कहा जा सकता है कि अन्य की तुलना में ये कविताएँ कमजोर हैं। पर अन्य किसी भी विधा में ऐसा नहीं कहा जा सकता।
सामाजिक कुरीतियों, राजनीतिक षड्यन्त्रों एवं जनसाधारण जन के साथ किए जा रहे फरेब पर उनकी हिन्दी एवं मैथिली--दोनों भाषाओं की रचनाओं की गुर्राती नजर छठे दशक के प्रारम्भिक वर्षों से ही दिख रही थी। हिन्दी में उनकी पहली कविता (बरसात रात प्रभात) सितम्बर 1956 में नई धारामें, पहली कहानी (सती धनुकाइन) मार्च 1958 में कहानीमें और पहला निबन्ध (भारतीय कला में सौन्दर्य-भावना) जून 1959 में ज्ञानोदय में प्रकाशित हुआ। मैथिली में सन् 1954 से ही उनकी रचनाएँ छपने लगी थीं। सन् 1958 आते-आते तो वे ख्यात हो चुके थे और मैथिली की रुग्ण, जर्जर एवं रूढ़िग्रस्त रचनाशीलता के पोषकों-प्रतिस्थापकों के लिए आतंक बन चुके थे। लेकिन, सन् 1949-50 के आसपास रचित उनकी रचनाओं से साबित होता है कि प्रकाश में आने से पूर्व उन्होंने अपनी रचनाशीलता को पूरी तरह सँवार लिया था। अर्थात् नई कविताको विधिवत मान्यता मिलने के दौरान ही राजकमल की कविताएँ प्रकाश में आने लगी थीं।
भारतीय समाज का वह ऐसा दौर था कि जनता अपने को ठगी हुई-सी महसूस कर रही थी। डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे चिन्तक की धारणा थी कि हर एक व्यक्ति को एक हद तक अपने जीवन को अपने मन के मुताबिक चलाने का अधिकार होना चाहिए।पर यहाँ सामाजिक, प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की नाक इतनी बढ़ गई थी कि वह जनता के स्वातन्त्र्य को खण्डित करना अपना प्राथमिक कत्र्तव्य समझती थी। भारतीय गणतन्त्र में उदार और सुसंगत परम्परा स्थापित करने हेतु, डॉ. लोहिया द्वारा कांग्रेस पार्टी और जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के निरन्तर विरोध की प्रक्रिया से आज के समाजवादी कार्यकत्र्ता भी परिचित होंगे। आचार्य नरेन्द्र देव और जयप्रकाश नारायण जैसे सामाजिक हित के चिन्तक और राष्ट्रवाद के सूक्ष्म व्याख्याकार के चिन्तन-मनन से देश के बुद्धिजीवी एवं रचनाधर्मी परिचित थे। वैज्ञानिक विकास और औद्योगिक क्रान्ति की दुहाई तो दी जा रही थी, सामाजिक जीवन प्रक्रिया को सुविधा सम्पन्न बनाने की बात तो की जा रही थी, पर निर्णीत और परिलक्षित सामाजिक सत्य वही था जो आचार्य नरेन्द्र देव का अभिप्राय था। सामन्ती व्यवस्था चरमराई तो थी पर औद्योगिक क्रान्ति से उत्पन्न वातावरण पुरानी व्यवस्था का ही पर्याय व्याप्त बन गया था। उत्पादनधर्मी व्यवस्था की बागडोर पूँजीपतियों के हाथ चली गई थी। कृषि-कर्म की जीवनी-शक्ति से अनुप्राणित अधिसंख्य जनता मजदूर बन गई। जनता का उपयोग उत्पादन, विपणन, वितरण के औजार के रूप में होने लगा था। उसकी श्रमशक्ति बिकने लगी थी, बल्कि श्रमशक्ति बेचने को वह मजबूर हो गई थी और मुट्ठी भर पूँजीपति उसके नियन्ता बन गए थे। आर्थिक वैषम्य की इस विशाल खाई से समाजवाद का रास्ता अवरुद्ध हुआ। वर्गहीन समाज की संकल्पना आहत हुई। अर्थात्, भारत की स्वाधीनता का अर्थ, जनता के सपनों के लिए कहीं से अर्थवान नहीं हुआ।
जनजीवन की दशा तो यही थी; पर यहाँ बात राजकमल चौधरी की कहानियों से शुरू करनी है। आठ खण्डों की रचनावली में उनकी लगभग रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं, यद्यपि अभी भी उनकी कोई-कोई रचना हाथ लग जाती है, उनमें से कई अपूर्ण भी रहती हैं। उनके शब्द-प्रयोग, वाक्य-संरचना और विषय-उपस्थान की कला इतनी श्रेष्ठ थी कि जहाँ भी पंक्ति पूरी हो जाए, चाहें तो वहीं रचना-समाप्ति की घोषणा कर सकते हैं। कई ख्यात रचनाकारों की रचनाओं में अक्सर दिखता है कि वे अपने विषय नियन्त्रण नहीं रख पाते, वे खुद विषय के नियन्त्रण में चले जाते हैं; विषय की माँग पूरी करने में रचना और रचनाकार दम तोड़ने लगते हैं। राजकमल चौधरी के यहाँ ऐसा कभी नहीं दिखता। उनकी हर रचना अपने शब्द-शब्द में, यहाँ तक कि यति-विराम में भी रचनाकार के नियन्त्रण में रहती है। यही कारण है कि उनकी कई कहानियाँ अपूर्ण रहने के बावजूद पाठकों के लिए असम्प्रेषणीय नहीं हैं। आदमी अब नहींऔर स्थान काल पात्र’-- ये दो ऐसी कहानियाँ हैं जिसे उन्होंने उपन्यास की परिणति के रूप में प्रारम्भ किया था, पर अन्ततः वह एक ही कथा के दो आरम्भहोकर रह गईं, उपन्यास पूरा नहीं हो पाया, राजकमल दुनिया छोड़ गए।
राजकमल चौधरी के कहानी-लेखन का दौर, हिन्दी में नई कहानी का दौर है। पर उन्होंने कभी खुद को नई कहानी आन्दोलन का अनुगामी नहीं माना।  उनकी राय में कहानी लिखने और अच्छी कहानी लिखने से बेहतर व्यापार और कुछ नहीं था। सम्भवतः यही कारण हो कि आज दशकों बाद भी उनकी कहानियाँ पाठकों के समक्ष ताजा स्वाद रही हैं।
राजकमल चौधरी की कहानियाँ परमाणु में पर्वतमाला के समावेश की कहानियाँ हैं, जो मानव-जीवन के अनछुए प्रसंगों से उठाकर लाई गई हैं, जिनमें राजकमल की सारी की सारी कहानी-कला मौजूद है और ऐसा लगता है कि इनमें अलग से कोई कला नहीं दिखाई गई है। जन-जीवन का सत्य ज्यों का त्यों रख दिया गया है। जस की तस रख दीन्ही चदरियाकी तरह। सच्ची घटनाएँ तो अखबारी रिपोर्टों में बयान होती हैं, कहानी में घटनाएँ सच की तरह आती हैं। घटनाएँ सच हों, इससे ज्यादा जरूरी है कि वे सच लगें भी। राजकमल की कहानियों की यह खास विशेषता है कि वे सारी घटनाएँ सच हों या न हों, सच लगती अवश्य हैं। अपने समकालीन कहानीकारो की तुलना में वे इस मामले में सबसे अलग हैं कि उनकी कहानियों के आधार पर फार्मूले बनाए जा सकते हैं जबकि उनके कई समकालीन क्रान्तिदर्शी, क्रान्तिधर्मी गढ़े हुए फार्मूलों पर कहानियाँ लिखते थे। जाहिर है कि वे फार्मूले उनके आलोचकों और मान्यतादाताओं द्वारा गढ़े जाते थे।
धर्म, साहित्य, नौकरी, व्यापार, फिल्म, सामाजिक जीवन-यापन...तमाम क्षेत्रों की विकृतियों को यहाँ इतनी सूक्ष्मता से उजागर किया गया है कि वे अचानक तार-तार हो जाती हैं। छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति, क्षणिक मनोवेगों की पुष्टि के लिए मनुष्य किस सीमा तक गिर सकता है; संन्यासी और सिद्ध योगी, यहाँ तक कि देवता की छवि रखनेवाला भी पल-भर में कैसे जानवर हो जाते हैं; खूंखार जानवर, कैसा गऊ हो जाता है; शेर की दहाड़ और आतंक का मालिक पल-भर में कैसे गीदड़, चूहा, केंचुआ, चींटी हो जाता है और रेंगने लगता है--मानव-जीवन की इसी उठा-पटक का एलबम हैं राजकमल की कहानियाँ।
नामवर सिंह ने कहा कि कहानी का यह दुर्भाग्य है कि वह मनोरंजन के रूप में पढ़ी जाती है और शिल्प के रूप में आलोचित होती है।हिन्दी में नई कहानीआन्दोलन पर बहुत कुछ लिखा गया। इसका समय मोटे तौर पर सन् 1950-1965 माना गया, फिर भैरव प्रसाद गुप्त के सम्पादन में प्रकाशित कहानीके नववर्षांक से इसका प्रारम्भ सन् 1956 में कहा गया, फिर से यह भी कहा गया कि सन् 1950 से ही नई कहानीका प्रयाण शुरू हो गया था, विचार और रचनाशीलता के स्तर पर यह नयापन पलता-बढ़ता रहा और 1955-56 तक आते-आते वैसे सोच और वैसी रचनाशीलता के साथ सृजनरत लेखकों ने अपना परिचय कायम कर लिया और कहानी’ (पत्रिका) के नववर्षांक(1956) में नई कहानी को पूर्ण प्रतिष्ठा दे दी गई। देवीशंकर अवस्थी के शब्दों में ‘1962 में हुआ यह विवाद नई कहानी को स्टेब्लिश ही नहीं करता स्टेब्लिशमेंट का हिस्सा बना देता है(नई कहानी: सन्दर्भ और प्रकृति/पृ.16)इसके बावजूद सन् 1962-65 के समय को नई कहानी की ढलान का समय कहा गया, यद्यपि कमलेश्वर जैसे कुछ लोगों ने सन् 1965 के बाद कहानियों में आए बदलाव को नई कहानी का ही विस्तार कहा। वैसे भारत में 1962-65 के अन्तराल में राजनीतिक-सामाजिक हलचल, पराजय के नैराश्य और विजय के उत्साह से एक नया जोश अवश्य आया और रचनाकर्मी, नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़े, नई कहानी के विरोध में अकहानीआन्दोलन सबसे पहले आगे आया, पर आलोचकों ने जल्दी ही इसे फ्रांस की एण्टी स्टोरीका अनुकरण घोषित कर दिया। फिर सचेतन कहानी,’ ‘सहज कहानी,’ ‘समान्तर कहानी,’ ‘सक्रिय कहानी,’ ‘समकालीन कहानीजैसे कई आन्दोलनों की घोषणा हुई, अर्थात् नई कहानीसे अपने को अलग साबित करने का प्रयास समय-समय पर हिन्दी के कथाकारों ने तत्परता और तन्मयता से किया। पर काफी लोगों को यह बात समझ में नहीं आई कि इन रचनाधर्मियों में यह वणिक् वृत्ति क्यों आ गई, सृजनकार्य को प्रमुखता देने के बजाए ये लोग विज्ञापन में क्यों लिप्त हो गए।
नई कहानियाँ’ (वर्षगाँठ विशेषांक, मई 1961) में राजेन्द्र यादव का लेख छपा था आज की कहानी: परिभाषा के नए सूत्रलहर’ (नई कहानी विशेषांक) अगस्त-सितम्बर-1961 में इस लेख पर खीझकर राजकमल चौधरी ने एक लम्बा लेख लिखा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘‘मैं जीवन और समाज को साहित्य, विशेषतः कथा-साहित्य के विषय (सब्जेक्ट मैटर) से अधिक कुछ नहीं मानता। यह नहीं मानता कि किसी मतवाद का प्रचार, किसी सिद्धान्त का प्रचार, किसी नैतिकता या किसी जीवनशैली का प्रचार कथा-साहित्य का उद्देश्य है। आज के कथाकार अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए, यह शिकायत करते हैं कि पिछली पीढ़ी के कथाकारों से उन्हें विरासत में कोई चीज़ नहीं मिली है। राजेन्द्र यादव (का)...यह कथन बड़ी ही कृतघ्नता है, बड़ी ही निर्लज्जता है।...फतवेबाजी से धन्धा (सो भी थोड़े दिनों तक) चल सकता है, साहित्य-सृजन और साहित्यालोचन नहीं चलता है।...अच्छी कहानियाँ लिखना ही कहानीकार के लिए पर्याप्त उपलब्धि है, ‘परिभाषा के नए सूत्रोंके ताने-बाने में लिपटकर वह ज्यादा दूर तक आगे नहीं जा सकती है।’’
उक्त आलेख लम्बा है और पूरे आलेख में राजकमल चौधरी ने न केवल राजेन्द्र यादव द्वारा दी गई स्थापनाओं को खण्डित किया है, बल्कि अपने समय के कथा लेखन की पृष्ठभूमि को आदरपूर्वक स्मरण किया है और कहानी के क्षेत्र में पूर्ववर्ती पीढ़ियों के योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है। पर तथ्य है कि स्वातन्त्र्योत्तर काल के कथा-लेखन में जितने मुँह, उतनी बातें (अर्थात् उतने कथा-आन्दोलन) आने का मूल कारण मात्र इतना रहा कि लघु उद्योगपतियों की तरह कहानीकारों में अपना उत्पाद ऊँची कीमत पर, शीघ्रता से, और बहुसंख्य के हाथों बेचने की होड़ लग गई; वे सर्वसाधारण के मन-मिजाज पर अपने उत्पादों को स्थायी रूप से चस्पाँ करने; अपने को दिग्गज, कालदर्शी और युगपुरुष साबित करने पर आमादा थे। आम पाठकों से उनका विश्वास उठ गया, वे प्रबुद्ध नागरिक के समक्ष चुनावी मेनीफेस्टो की तरह कहानी की पहचान के सूत्र बाँटने लगे; गो कि कहानी कोई रासायनिक पदार्थ हो, जाँचें, और ये गुण उनमंे नहीं पाए गए, तो उन्हें निरस्त करें। राजकमल चौधरी का ध्यान कभी इस  विज्ञापनबाजी की ओर नहीं गया। अवान्तर अभिप्राय से लुभावने और भ्रामक विज्ञापन के साथ बाजार में कूद आए आत्मगुग्ध कथा-चिन्तकों की उन्होंने भली-भाँति फजीहत की। उन्होंने कहा कि युद्ध, अकाल, राजतन्त्र, बेकारी, मँहगाई, दूसरे देशों से सम्बन्ध, गृह-कलह, आम चुनाव...इन सभी बातों का असर कथा-साहित्य पर पड़ता है, सामान्यतः कथा के विषय और स्वरूप पर पड़ता है। मगर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि कथा-साहित्य को जीवन और संस्कृति की कलात्मक अभिव्यक्तियों के क्षेत्र से हटाकर, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के क्षेत्र में डाल दिया जाए(शवयात्रा के बाद देहशुद्धि/पृ.150)
अपने पूरे लेखन कर्म में इसी नैतिकता, निष्ठा और ईमानदारी से वे सृजनरत रहे। उनकी रचनाओं को पाठकों का प्यार और स्वीकार मिला, उन्हें अपनी कृतियों की वकालत नहीं करनी पड़ी, आलोचकों और अपने समकालीन रचनाकारों की उपेक्षा और ईष्र्या भी भरपूर मिली। असल में आजादी के बाद से खासकर नई कविताकी स्वीकृति और नई कहानीके घोषणा-काल से हिन्दी-साहित्य की राजनीतिक गन्दगी और गलीज हरकतें इतनी बेशर्म हो गईं कि ज्यादातर रचनाधर्मी आत्मप्रचार में तल्लीन और बुनियादी जिम्मेदारियों से विमुख हो गए।...
उल्लेखनीय है कि अगस्त 1962 तक राजकमल चौधरी की लगभग तीस कहानियाँ हिन्दी में तथा चौबीस कहानियाँ मैथिली में, और दिसम्बर 1965 तक लगभग साठ कहानियाँ हिन्दी में तथा तीस कहानियाँ मैथिली में प्रकाशित हो चुकी थीं। इन कहानियों में व्यक्त जनसरोकार में लेखकीय प्रतिबद्धता के सू़त्र की तलाश होनी चाहिए। एक ईमानदार रचनाकार के लिए, साहित्य सृजन का मूल उद्देश्य, आम नागरिक को उनकी स्थितियों की जानकारी देना होता है।
गौरतलब है कि राजकमल चौधरी की कोई रुचि नई कहानी आन्दोलनका कत्र्ता-धर्ता होने में नहीं थी। तथ्यतः कोई रचनाकार यदि अपना अभिप्रेत अपनी रचना में व्यक्त न कर पाए, अपनी ही रचना के लिए उसे वक्तव्य देना पड़े, तो एक रचनाकार की इससे बड़ी विफलता और कुछ नहीं हो सकती! राजकमल की कहानियाँ, अपने समय, और अपने समय की रचनाधारा से आगे की बात कह गईं।
राजकमल चौधरी की रचनाओं का समाज, और पात्रों का परिवेश; समकालीन राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों की परिणतियों से भरा हुआ है। उनका रचना-संसार मानवीय नैतिकता के साथ राजनीति और अर्थनीति द्वारा किए गए मजाक को तार-तार करता है। वहाँ पुरुष पात्र या तो स्त्री अंगों को चबा जाने वाला राक्षस नजर आता है, या मोल-भाव कर खरीद लेनेवाला व्यापारी; स्त्रियाँ, या तो अपने को बेच-लुटा देने वाली निरीहा नजर आती हैं या उदारतापूर्वक अपने को वितरित करनेवाली आत्मुग्ध गर्वोन्नता...। ऐसे विकृत परिवेश को उजागर करनेवाले कहानीकार राजकमल चौधरी की कहानियों पर हिन्दी के समालोचकों का ध्यान जाना अभी बाकी है। 
मनुष्य के जीने का और उसके जीवन की तमाम हरकतों का मूल कारण होता है मन और शरीर। इन्हीं दोनों की जरूरतों की पूर्ति हेतु मनुष्य पाप करता है, पुण्य करता है, सही-गलत करता है, वांछित-अवांछित सब कुछ करता है। यहाँ तक, कि किसी लेखक के सृजन का कारण भी प्रकारान्तर से ये दो ही होते हैं। शेष सारे कारण इन्हीं दोनों से पैदा होते हैं।
बीसवीं शताब्दी के छठे दशक का मध्यान्तर आते-आते हिन्दी कहानी आम नागरिक के मन में गम्भीरता से झाँकने लगी थी। भिखारी से दाता तक, रंक से राजा तक, क्रेता से विक्रेता तक, वेश्या से गृहस्थिन तक, संन्यासी से किसान तक उसके पात्र होते थे और उस समय की कहानी उन सबके मन के उद्वेलन को उनकी हरकतों से जोड़ने लगी थी। उनकी शारीरिक क्रियाओं को दर्ज करने लगी थी। राजकमल चौधरी की कहानी जलते हुए मकान में कुछ लोगमें एक वेश्यालय में छापा मारा जाता है, अपने ग्राहकों के साथ सारी वेश्याएँ नंग-धडं़ग तहखाने में चली जाती हैं। एक वेश्या अपने एक व्यापारी ग्राहक के बारे में बताती है, ‘यह बाबू हमारी जात का है। हम चमड़ा बेचते हैं, यह भी चमड़े से बने खेल-कूद का समान बेचता है...।फिर किसी ग्राहक से वेश्या कहती है, ‘तुम जरा भी शर्म मत करो। समझ लो, अन्धेरे में हर औरत हर मर्द की बीवी होती है। अन्धेरे में शर्म मिट जाती है। रंग, धर्म, जात, बिरादरी, मुहब्बत, ईमान, अन्धेरे में सब कुछ मिट जाता। सिर्फ कमर के नीचे बैठी हुई औरत याद रहती है।मैथिली की कहानी सहस्र मेनकामें निर्मला जैसी असहाय विधवा को पूरे गाँव के लोगों ने जाति बाहर कर दुश्चरित्रा, वेश्या घोषित कर दिया है, पर कथावाचक की पत्नी की राय है कि यदि निर्मला दीदी अनाचारिणी रहतीं, वेश्या रहतीं, तो उनकी आज यह दशा नहीं रहती। पापिष्ठा रहतीं तो आज शरीर पर फटी साड़ी नहीं, रेशमी साड़ी रहती।कहानी को मानव जीवन की इन बुनियादी हरकतों से जोड़ने में सक्षम, अस्तित्व के अविचल यथार्थ को इस तरह आँकने में समर्थ, राजकमल चौधरी के लिए यह कहीं से आवश्यक नहीं था कि वे अपने को किसी झण्डे, पार्टी या कथित साहित्यिक आन्दोलन से जोड़ते। उनके लिए कहानी का मतलब सिर्फ कहानी होता था।    
गत शताब्दी के छठे दशक के उत्तरार्ध में हिन्दी में राजकमल चौधरी की रचनाएँ प्रकाश में आते ही चकाचैंध पैदा करने लगी थीं। सन् 1967 से पूर्व लिखी होने के बावजूद उनकी सारी कहानियाँ आज भी अपनी प्रासंगिकता प्रमाणित करती हैं, और विमर्श की नई व्याख्याएँ आमन्त्रित करती हैं। नारी लेखन और नारी जीवन पर विश्व-साहित्य में आज जितनी भी बहसें हो रही हैं, उनके बहुत सारे संकेत राजकमल चौधरी के कथा लेखन में छह दशक पूर्व से मौजूद हैं। पुरुष मनोवृत्ति के बरक्स, स्त्री-जीवन के इतने सूक्ष्म विश्लेषण की आवश्यकता हमें उन्हीं दिनों महसूस करनी चाहिए थी। उनका सम्पूर्ण लेखन (कहानी, कविता, उपन्यास, निबन्ध, नाटक, पत्र, डायरी) मानव जीवन की बुनियादी शर्त पर टिका है।
रोटी, सेक्स, सुरक्षा की तीन जैविक जरूरतों की पूर्ति में मनुष्य मर्यादा तोड़ता है, असभ्य और जंगली हो जाता है। इसके पलट एक बिन्दु और है कि मनुष्य शक्तिचाहता है--पावर’! भारतीय स्वाधीनता के गत सत्तर वर्षों में इस पावरकी व्याख्या मनुष्य को भ्रमित करती रही। मनुष्य का पावरक्या है--पैसा, पद, स्त्री, बंगला, गाड़ी, गद्दी...क्या है मनुष्य का पावर? एक से एक तानाशाह पल भर का उन्माद मिटाने के लिए अपने मातहत स्त्री के सामने घुटने टेक देता है, नंगा हो जाता है; पैसे कमाने के लिए ईमान और इज्जत बेच आता है। फिर पैसा कमाकर इज्जतदार बनना चाहता है। राजकमल चौधरी का जीवन-दर्शन इस सूत्र में भी झलकता है कि मनुष्य सब कुछ बेचकर पैसा खरीदता है और पैसे से सब कुछ खरीद लेना चाहता है। उनका नायक सारा कुछ खरीद पाता है या नहीं--यह और बात है। इच्छा पूरी हो या न हो, मूल बात है कि वह इच्छा पूरी करने की कोशिश करता है। ऐसे ही नायकों, उपनायकों की रचना उनके साहित्य का अहम् हिस्सा है, और सम्भवतः इसी कारण ऐसे नायक के सर्जक को स्वेच्छाचारी कहा जाने लगा। वस्तुतः यह स्वेच्छाचार नहीं है। मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि मनुष्य योनि की पहली अभिलाषा जिजीविषा है, अर्थात् जीने की इच्छा। और जीवन जीने की पहली शर्त है रोटी। यह बात मान लेने की है कि भूख में निर्णय लेने की बड़ी ताकत होती है। भूखा व्यक्ति पाप-पुण्य की परिभाषा जानने की इच्छा नहीं रखता, उसके जीवन की प्रथम और परम नैतिकता रोटी होती है। स्वाधीनता के बाद के उन बीस वर्षों की वह कैसी नैतिकता रही होगी, जब किसी स्त्री को अपनी या अपने बाल-बच्चों की भूख मिटाने, तन ढकने के लिए किसी अनचाहे मर्द के सामने अपना तन उघाड़ने को मजबूर होना पड़ता होगा! इसके ठीक विपरीत, वैसी स्त्री की मनोदशा भी याद रखने की है, जिसका मर्द पैसा बनाने के कार्यक्रमों में व्यस्त, अपनी जवान पत्नी, बहन, बेटी, के मनोभावों और उत्तेजनाओं से निरपेक्ष रहता होगा, खुद किराए के बिस्तरों की तलाश में लिप्त रहता होगा, और उसके घर की स्त्रियाँ पड़ोस में गिगोलो की तलाश करती होंगी। देह से अर्थोपार्जन और अर्थ-बल से देह के सौदे का यह गोरखधन्धा स्वाधीनता के बाद जिस चरम पर था, आज उससे कहीं ज्यादा है। उस सामाजिक संरचना में उन्होंने जीवन की इस विदू्रप परिस्थिति को सूक्ष्मता से पकड़ा।
भारत की जिस आजादी में सामान्य नागरिक का अस्तित्व संकटग्रस्त रहे, जिजीविषा खतरे में रहे; मान-स्वाभिमान, लालसा-अभिलाषा तो दूर, जीवन-रक्षा की पहली जरूरत रोटी तक ठीक से उपलब्ध नहीं हो, उसके लिए कौन-सी नैतिकता कामयाब होती? अपनी कहानियों, कविताओं में राजकमल चौधरी ने जीवन के इसी मर्म को पकड़ने की सफलतम कोशिश की है। यहाँ एक बात गम्भीरता से देखने की है कि मानव जीवन की महत्त्वपूर्ण क्रिया यौनाचार, सृष्टि का कारण है, मगर उनकी कहानियों में इस घटना का उल्लेख हर जगह शुद्ध व्यापार के रूप में हुआ है। इस क्रिया में लिप्त वैसे व्यक्ति भी हैं, जो कामगार की भूमिका में हैं, असल में फैक्ट्री में जूता बनाता हुआ कारीगर, जूता नहीं बनाता है, जूता बनाते वक्त वह पैसा कमा रहा होता है, क्योंकि उसे पता है कि एक जोड़ी जूते तैयार करने के कितने पैसे मिलेंगे। और, उन पैसों से वह क्या-क्या कर सकता है? अपनी यौन-चर्या पर वह कितने रुपए खर्च कर सकता है?...इन दिनों एक शब्द प्रचलन में आया है यौनकर्मी (सेक्स-वर्कर)। यह शब्द अपने कोशीय अर्थ की पूरी दुनिया के साथ राजकमल चौधरी की कहानियों में है। यौनकर्म में लिप्त उनकी कहानियों के पात्र एक ही क्षण, एक ही कर्म में अलग-अलग जीवन जीते हैं। जिस देश का लोकतन्त्र, नागरिक-जीवन में भूख मिटाने के लिए टुकड़ा भर सूखी रोटी और सो जाने के लिए बित्ते भर बिस्तर भी उपलब्ध न करा पाए, उस देश की आजादी किस काम की? राजकमल चौधरी की कहानियाँ, अपनी तमाम समकालीन कहानियों के साथ इसी विडम्बना का चार्ट बना रही थीं। कागज पर लिखी हुई आजादी या नारेबाजी की आजादी में उस समय के अनेक कथाकारों की कोई दिलचस्पी नहीं थी।
आजादी के बाद भारतीय समाज में पनपी कुछ दुरवस्थाओं, सियासी तिकड़मों, ठगे हुए नागरिकों की निराशाओं, आजादी के जश्न में मसरूफ राजनेताओं, राजनीतिक मोहभंग, सीमा संघर्ष और पड़ोसी राष्ट्र की धोखेबाजी का चित्रण हिन्दी के रचनाकारों के लिए ज्वलन्त विषय रहे हैं। भारत का नागरिक-जीवन बेतरह परेशान था। जीवन की बुनियादी सुविधा जुटाने में बदहवास नागरिक को, मुश्किल से जुटाई हुई सुविधा भोग पाने की स्थिति नहीं दी जा रही थी। जीवन का यही त्रासद क्षण उसे नकार से भर रहा था, वह समाज-व्यवस्था द्वारा निर्मित आचार-संहिता को क्रूरता से कुचल डालना चाहता था। आजादी के बाद का अभाव, उपेक्षा, दमन, शोषण, पराजय, अपमान, अवमूल्यन से प्रताड़ित नायक हिन्दी कहानी में कभी प्रतिक्रियावादी की तरह, कभी आन्दोलनकारी की तरह, कभी व्यथित-पराजित समझौतावादी की तरह, कभी नकार-भाव से परे स्वेच्छाचारी की तरह उपस्थित होता रहा।
उनकी रचनाएँ समाज और व्यक्ति के जीवन में आ रहे ऐसे परिवत्र्तनों, मशीन और मशीनीकरण, पश्चिमी देशों और पश्चिमी व्यवसायों, संस्कृतियों से प्रभावित-संचालित आधुनिक भारतीय समाज और सभ्यता के जीवन-संग्राम की अन्दरूनी कथा कहती हैं। सुखानुभूति, जुगुप्सा और क्रोध---तमाम रचनाओं में ये तीन परिणतियाँ पाठकों के सामने बार-बार आती हैं। स्वातन्त्र्योत्तर काल के भारत की जनता, सत्ता और जनतन्त्र की कई गुत्थियाँ इनके यहाँ खोली गई हैं। भाषा में खिन्न और नाराज तेवरों के बावजूद सामाजिक अवसाद के सारे पहलुओं पर अत्यन्त सावधान आयास यहाँ प्राप्य हैं। आजादी से मोहभंग भारतीय समाज की बड़ी और ऐतिहासिक घटना है। समतामूलक समाज का स्वरूप पूरा न होने से बेकारी-बेरोजगारी, भूख-अभाव के सृजन का एक विशाल तन्त्र बढ़ रहा था।
निःसंकोच कहा जाना चाहिए कि राजकमल चौधरी उस दौर के सर्वाधिक पढ़े-लिखे, और विस्तृत फलक के रचनाकर्मी थे। ज्ञान की सभी शाखाओं, अनुशासनों--कला, साहित्य, संस्कृति, रंगकर्म, सिनेमा, इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र से उनका परिचय था; दुनिया भर के साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आन्दोलनों, उपलब्धियों, विप्लवों की गम्भीर समझ थी। इसी समझ ने उस इंसान को बेचैन कर रखा था, अपनी उसी बेचैनी के कारण वे उम्र भर स्वाधीनता और और आजादी का सही अर्थ ढूँढते रहे। जीवन के अन्तिम वर्षों में आपरेशन टेबल पर उनकी व्याकुलता इन पंक्तियों में व्यक्त हुई--
मैं कुछ नहीं जानता हूँ
स्त्रियों नदियों बीमारियों भूख जन्म अपराधों ईश्वर मृत्यु दास्तोवस्की
हिरोशिमा विधान-सभाओं के विषय में कुछ नहीं
आदमी क्यों प्यार करता है युद्ध क्यों परिवार-नियोजन
क्यों बर्लिन की दीवार क्यों
देशप्रेम क्यों अफीम की गोलियाँ क्यों चैप्लिन की फिल्में
क्यों ताशकन्द-सम्मेलन क्यों रीढ़ की हड्डियों में गैंग्रीन
मादाम नू क्यों दास कैपिटल
क्यों सुकरात क्यों सेगाँव की बौद्ध भिक्षुणियाँ जल मरती हैं
क्यों गार्गातुआँ की कहानियाँ क्यों कश्मीर के लिए
सेनाएँ क्यों अजन्ता
क्यों एक ही युद्ध मेरी कमर की हड्डियों में कभी वियतनाम में...
उनकी चीख और व्याकुलता से बड़बड़ाती हुई शैली में दुनिया भर की समस्याओं की सूची तैयार हो जाती है। भारतीय स्वाधीनता उन्हें पागल, काली, मरी हुई स्त्रीदिखती है। उन्हें दुनिया भर में अपने कमर की हड्डियों का बेबर्दाश्त दर्द महसूस होता है और पूरे भारतवर्ष में मवाद और गन्दे पनाले की गन्ध दिखती है --
मैं इतिहास पुस्तक की तरह खुला पड़ा हूँ
लेकिन मेरा देश मेरा पेट मेरा ब्लाडर मेरी अँतड़ियाँ खुलने से पहले
सर्जनों को यह जान लेना होगा
हर जगह नहीं है जल अथवा रक्त अथवा माँस
अथवा मिट्टी
केवल हवा कीड़े जख्म और गन्दे पनाले हैं अधिक स्थानों पर इस देश में...
आजादी के सम्बन्ध में अपनी धारणा आगे और खोलते हैं--
ग्यारह बजकर उनसठ मिनट पर हर रात शहीद-स्मारक के नीचे नंगी होती है
पागल काली एक मरी हुई स्त्री
उजाड़ आसमान में दोनों बाँहें फैला कर रोने के लिए
रोते हुए सो जाने के लिए
पानी और अनाज के देवताओं से भीख माँगती है
तिरंगा फहराने के अपराध में मार डाले गए
1942 के छात्रों के नाम पर...
देश-दशा का ऐसा विद्रूप चेहरा और भी है--
देह की राजनीति से विकट सन्निकट और कोई राजनीति नहीं है संजय
अन्न और अफीम की राजनीति यहीं शुरू होती है
जन्म लेता है मृग-मारीच
लोक सभा में अन्न मन्त्री कहते हैं
बसते हैं कोई पाँच अरब चूहे इस में...
           
स्वाधीनता के उन्नीस वर्ष बाद की समाज-व्यवस्था को अपनी कविता मुक्ति प्रसंगमें राजकमल चौधरी ने देश को जख्मी और मवाद की दुर्गन्धियों से भरा हुआ देखा, जनप्रतिनिधियों की नजरों में जनता के लिए तिरस्कार देखा, देह की राजनीति का त्रासद खेल देखा, जनता को चूहा समझे जाने की दानवता देखी, उन्हें स्पष्ट तौर पर घोषणा करनी पड़ी --
इस ऊष्णगर्भा धरती को मरघट स्वेच्छानुसार हमने ही बनाया है
मनु शतरूपा आँगन में सत्ता का विषवृक्ष
हमने ही लगाया है।
आओ इस राजभवन में इस कारागृह में अतएव चिन्तामुक्त हो जाएँ
उतार डालें अपने चेहरे अपनी नकाब...(मुक्तिप्रसंग)
राजकमल की जिस भीड़को चूहा समझा जा रहा था, उस--
प्रजाजनों के शब्दकोश में नहीं रह गए हैं दूसरे शब्द दूसरे वाक्य
दूसरी चिन्ताएँ नहीं रह गई हैं (गेहूँ के अलावा)
किन्तु भीड़ से विच्छिन्न असम्पृक्त रहकर भी भीड़ से मुक्त मैं हो नहीं पाता हूँ
मुक्त हो जाना कविता से पहले और मृत्यु से पहले
मुक्त हो जाना असम्भव है...
आजादी के बाद लगभग बीस बरस राजकमल चौधरी जीवित रह पाए। सन् 1947 से 1967 की उस अवधि को प्रसिद्ध आलोचक शिवप्रसाद सिंह ने शर्मनाक भिक्षाकालके नाम से स्मरण किया है। राजकमल चौधरी का यह पूरा अन्तराल उक्त भीड़की जिजीविषा के लिए बुनियादी शर्तों की सूची बनाते, और स्वाधीनतापूर्वक उसके उपभोग की गुंजाइश बनाते हुए बीता। मुक्त और आजाद होने की सारी कामनाएँ, अनाज और पानी के देवताओं तथा भारत भाग्य विधाताओं के कारण धरी रह गईं।
सपनों और कामनाओं का टूट जाना, प्रतिबद्ध लोगों के लिए बड़ी घटना होती है। उस शर्मनाक भिक्षाकाल में राजकमल चौधरी यह देख रहे थे कि भारतीय लोकतन्त्र की रक्षा की जिम्मेदारी लिए हुए लोग पश्चिमी देशों के आगे हाथ फैलाए खड़े हैं, पड़ोसी राष्ट्रों से मैत्री कर धोखा खा रहे हैं, अपने देश में आई प्राकृतिक आपदाओं की ओट में अकाल, भूख, महामारी, बेकारी की फसल उगा रहे हैं, राजनीतिक दृष्टिहीनता, प्रशासकीय अक्षमता और जनविरोधी आचरण के कारण देश के सामान्य नागरिक को मूलभूत सुविधाएँ देने में अक्षम हैं, और भारतीय लोकतन्त्र का मजाक उड़ा रहे हैं; देश की धरती के नाम पर शहीद हुए सिपाहियों की कुर्बानी पर कलंक का टीका लगा रहे हैं। ऐसे समय में रचनाकार का दायित्व बनता था कि वह अपने समय की जनता को उसकी अवस्थिति की सही जानकारी दे, उसे राष्ट्रीय अस्मिता के रक्षार्थ और अपने मौलिक अधिकारों के प्राप्यर्थ प्रतिपक्ष में खड़ा कर सके। जनविरोध के अलावा उस दौर के अंकुशविहीन राजनीतिज्ञों, व्यापारियों और उपदेशकों से मुक्ति पाने का और कोई रास्ता नहीं था। बहुविधावादी रचनाकार राजकमल चौधरी की कथा, कविता, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, रिपोर्ताज सबमें देश-दशा की प्रस्तुति हो रही थी, पर हर विधा की अपनी सीमा होती है, हर विषय और प्रसंग की भी खास माँग होती है।
सन् 1960 के बाद का दौर अकविताऔर नई कहानीका दौर था। उपेन्द्रनाथ अश्क, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती आदि प्रेमचन्द, यशपाल, जैनेन्द्र कुमार की परम्परा को और उर्दू के सआदत हसन मण्टो, राजेन्द्र सिंह बेदी, कृष्ण चन्दर आदि की परम्परा को आगे बढ़ा रहे थे। उन्हीं दिनों राजेन्द्र यादव कहानी कला के लिए परिभाषा के नए सूत्र गढ़ रहे थे। थोड़े ही दिनों बाद कमलेश्वर ने अलग कथाधारा की घोषणा कर दी, जो अपनी परिणति में नई कहानीसे किसी भी तरह अलग नहीं थी। उस दौर के अन्य रचनाकार भी किसी न किसी तरह कुछ-कुछ अलग कर रहे थे। राजकमल चौधरी ने उस दौर में बगैर किसी घोषणा और वक्तव्य के, बगैर गुटबाजी के, जमकर कहानियाँ लिखीं। इन कथेतर आचरणों पर उन्होंने खीजकर कहा--कहानी के बारे में तरह-तरह की परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं। नामवर जैसे नवोदित आलोचकों ने आज की कहानी को एकबारगी ही नई कहानीबना दिया है।...आज की कहानी में (जिसे मैं नई कहानीकी संज्ञा नहीं देना चाहता हूँ) हम साहित्य की अन्य विधाओं की तरह ही परम्परागत तौर तरीकों और रीति को छोड़कर आगे आ रहे हैं। पहले कहानी की निश्चित सीमाएँ थीं; घटना की सीमा, चरित्र की सीमा, कथानक की सीमा, क्लाइमेक्स की सीमा। तरह-तरह की सीमाएँ। आज हम इन सीमाओं में बन्धे रहना जरूरी नहीं समझते हैं।...इस युग में आकर कविता और कहानी बहुत हद तक चित्रकला और संगीत के निकट आ गई है(शवयात्रा के बाद देहशुद्धि/पृ. 150-51)
राजकमल चौधरी की कहानियाँ शिल्प के स्तर पर भी उनके इस कथन को पुष्ट करती हैं और कथा लेखन की नवता, ताजगी, चित्रात्मकता, काव्यात्मकता, लयात्मकता, विविधता इत्यादि को प्रमाणित करती हैं। उनकी कहानियाँ भावकों को उतनी देर के लिए दुनिया से काट देती हैं, यहाँ तक कि उसे साहित्य की विधा तय करने के अभिज्ञान से भी निरपेक्ष रखती हैं। भावक को सिर्फ वह पाठ याद रहता है, जिसे वह पढ़ रहा होता है। राजकमल की कहानियों में दर्ज कथ्य में इस सम्मोहन का मूल कारण कथाकार का जनसरोकार और कथ्य के साथ भाषा और शिल्प का व्यवहार ही है। अचानक कहीं से कथा का शुरू हो जाना, अचानक कहीं खत्म कर देना। कभी आँख मूँदकर सुनें तो नाटक या चलचित्र का आभास हो, कभी बोलकर पढ़ें, तो कविता की ध्वनियाँ और लय गूँजे, कभी तेजी से भागती दृश्यावली लगे। शिल्प की इतनी विविधताएँ उनकी कहानियों में हैं कि कोई एक, दूसरे से मेल नहीं खाता। सबसे रोचक यह है कि सारी मनमानियाँ करने के बावजूद उनकी कहानियों का कहानीपन आहत नहीं होता, निरन्तर भावकों पर कथा और कथाकार का नियन्त्रण बना रहता है। शिल्प का यह जादुई सम्मोहन भारतीय भाषाओं के उस दौर के कथाकारों के यहाँ मुश्किल से मिलता था। बीसवीं शताब्दी के पश्चिमी साहित्य में आधुनिकताको लेकर शिल्प, शैली सम्बन्धी जितने भी प्रयोग हुए हैं, उसके सारे संकेत यहाँ दिखते हैं।
उनकी मान्यता थी कि समकालीन होने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप अपने जीवन और व्यवहारों को ढाले। मगर चारित्रिक द्वैध उस काल के मानव का विशेष गुण था। प्रतिबद्धता की दुहाई दी तो जा रही थी, मगर वास्तविकता थी कि--कोई भी प्राध्यापक-लेखक अकाल के बारे में तो वक्तव्य दे सकता है, लेकिन अपने काॅलेज, अपनी युनिवर्सिटी-सर्विस कमीशन में फैली हुई नफासत, धान्धली और लाल फीताशाही के खिलाफ खुली चिट्ठी नहीं लिख सकता है। कोई भी पत्रकार-लेखक अथवा सम्पादक-लेखक अमरीकी साम्राज्यवाद और वियतनामी गुण्डागर्दी के खिलाफ जिहाद तो बोल सकता है, लेकिन देशी पूँजीपतियों के काले और सफेद कारनामों के विरोध में कोई नारा वह बुलन्द नहीं करेगा। हमारी इन नई पीढ़ी का लेखक जहाँ से पैसा पाता है, जहाँ से अनाज, सुरक्षा, यश-प्रतिष्ठा, स्त्री और आत्मकालीनबने रहने का सुख पाता है--उसके खिलाफ उसकी बोलती बन्द हो जाती है।...अगर हम वाकई लेखक हैं, और सचमुच किसी बड़ी बात के लिए यह पेशा, यह रचनात्मक (क्रिएटिव) चरित्र अपनाए हुए हैं, तो किसी भी आार्थिक-राजनीतिक जीवन-दर्शन के प्रति प्रतिबद्ध होने से पहले हमें साहसी, और विकल्पहीन होना चाहिए। हम संकल्प में जिएँ। विकल्पों में जीने की गाँधीवादी-नेहरूवादी विचार-परम्परा और जीवन-परम्परा को अब हमें हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर देना चाहिए(बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल/पृ. 110-111)
आज के भारत का नागरिक-जीवन संवेदना के स्तर पर बड़ी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ नैतिकता, मानवीयता, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक मूल्यों के परिरक्षण, और सभ्य-सामाजिकता की दुहाई दी जा रही है; दूसरी तरफ बाजार के साम्राज्य में झूठ, तस्करी, फरेब, बलात्कार, गबन, घोटाले, घूसखोरी, स्त्री-अंगों की दलाली, राष्ट्र और मातृभाषा से विमुखता का धन्धा चल रहा है। इस विद्रूप परिस्थिति में हर कोई अपनी-अपनी समाज-व्यवस्थाओं या कि समान्तर व्यवस्थाओं के निर्माण में लिप्त है, और उन्हें अपने-अपने तर्क से उचित ठहरा रहा है। पाप-पुण्य, ईमान-धरम, उचित-अनुचित, सम्बन्ध-बन्ध, श्लील-अश्लील, नीति-अनीति...सबकी परिभाषाएँ बदल और उलट गई हैं। पुरानी समाज-व्यवस्था और आचार-पद्धति खण्ड-खण्ड हो रही है। नई-नई (कु)व्यवस्थाओं को नई प्रतिष्ठा मिली है। राजकमल चौधरी की कहानियों में पुराने मूल्यों के टूटने और नई व्यवस्थाओं के बनने की आहटें सुनी जा सकती हैंै। उनमें एक साथ व्यवस्था विखण्डन, और नव-व्यवस्था के स्थापन की प्रक्रियाएँ हैं। शायद इसीलिए राजकमल चौधरी की कहानियाँ समय के साथ पुरानी नहीं पड़ी हैं। अपने विचार, वक्तव्य और जीवन पद्धति में सदैव एकसूत्रता रखनेवाले राजकमल चौधरी की कहानियाँ निश्चय ही आज के समाज में नई दृष्टि का संचार करेगा। इस पर विचार होना चाहिए।




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