Sunday, July 17, 2016

महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ एवं सूरदास का तुलनात्‍मक अध्‍ययन



इति‍हास के हर दौर में जनभाषा के प्रति अनुराग मनुष्‍य के मानवीय और सांस्‍कृति‍क सरोकार का सूचक होता आया है। भारतीय साहि‍त्‍य के दो महाकवि--विद्यापति एवं सूरदास--के जनभाषा-प्रेम को इस दृष्‍टि‍ से देखने का वि‍शेष प्रयोजन है। इन दोनो महाकवि‍यों ने अपने रचना-सन्‍धान से 'देसि‍ल वयना सब जन मि‍ट्ठा' का सन्‍देश पूर्ण कर दि‍खाया। दोनो में से कि‍सी ने कोई महाकाव्य नहीं लिखा, पर जन-जन के होठों पर ये 'महाकवि' सम्‍बोधन से समादृत होते रहे। दोनो ऐसे कालदर्शी रचनाकार हैं जि‍नकी लोकप्रि‍यता का आधार जनभाषा में रचि‍त उनके वे पद हैं, जो खेतों-खलि‍हानों से वि‍श्‍ववि‍द्यालयों एवं शोध-संस्‍थानों तक समान रूप से समादृत हैं। भाषा, वस्‍तु एवं शैली की सहजता के कारण ही उनकी रचनाओं का प्रभाव कई-कई महाकाव्यों पर भारी पड़ता रहा है, अपने रचनात्‍मक सरोकारों से वे जन-जन के महाकवि बने रहे हैं। यहाँ दोनों के रचनात्मक अवदान पर एक साथ विचार करना अभीष्ट है।    
पर्याप्त तर्क-वितर्क के बाद सुनिश्चित हुआ है कि महाकवि विद्यापति का जन्म मिथिला के बिस्फीगाँव में हुआ। सन् 1350-1360 के बीच उनका जन्म और सन् 1438-1448 के बीच निधन माना जाता है। उनके पिता का नाम गणपति ठाकुर तथा माँ का नाम गंगा देवी था। इसी तरह अनुमान किया जाता है कि महाकवि सूरदास का जन्म सन् 1478 तथा निधन सन् 1563 के आस-पास हुआ। यूँ भक्तमाल और चौरासी वैष्णवन की वार्ता, आईने अकबरी एवं मुंशियात अब्बुल फजल आदि के सहारे और जनुश्रुतियों के आधार पर सूरदास से सम्बद्ध जानकारी बटोरने में बेशुमार दिमागी कसरत करनी पड़ती है।
जाहिर है कि उम्र और रचना काल के आधार पर दोनों महाकवियों का कोई आमना-सामना नहीं हुआ। पर आज दोनों की साथ-साथ चर्चा का आधार उनकी रचनाओं का वि‍षय एवं शि‍ल्‍प-संस्‍कार ही है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जिन बारह पुस्तकों को आधार मानकर हिन्दी साहित्य के प्रारम्भिक काल को वीरगाथा कालकहा, उनमें सर्वाधि‍क प्रमाणिक और शुक्ल जी के तर्क को पुष्ट करने वाली पुस्तकें वि‍द्यापति‍ रचि‍त कीर्तिलता और कीर्तिपताका ही थीं, पर वि‍द्यापति‍ के लि‍ए वे एक अवतरण की जगह भी सुवि‍धा से नहीं बना पाए। तथ्‍य है कि‍ केवल पदावली के बूते अकेले विद्यापति हिन्दी के आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल के पूरे सन्‍दर्भ पर भारी पड़ते हैं; विचार के स्तर पर कुछ समय तक आधुनिक काल तक पर। वीर-काव्य, गाथा काव्य, शृंगार काव्य, भक्ति काव्य (शक्ति वन्दना, शिव वन्दना, गंगा स्तुति, विष्णु वन्दना आदि) सबकी उपस्थिति विद्यापति के रचना-संसार में मौजूद है। बावजूद इसके, इतिहासकारों के यहाँ विद्यापति फुटकल खाते में नजर आते हैं। बहरहाल...  
विश्वनाथ त्रिपाठी की राय में जयदेव का गीत गोविन्द, विद्यापति की पदावली और सूरदास का सूरसागर एक ही कोटि की रचनाएँ हैं, जिनमें भक्ति का आधार शृंगार है।सचाई भी है कि‍ ब्रजभाषा में लिखे जाने के बावजूद, विद्यापति पदावली के सौ-सवा सौ वर्ष बाद सूर के पद, उस परम्परा के विकसित और परिवर्द्धित रूप हैं। कुछ स्थानों पर तो परम्परा में कुछ नई कोपलें भी जुड़ी हैं। प्रेम और भक्ति--ये दो तत्त्‍व इन दोनों महाकवियों की इन रचनाओं के प्राण-तत्त्‍व हैं।
सूरदास ब्रजभाषा के पहले प्रतिष्ठित कवि हैं। विद्यापति पदावली की भाँति उनके पद भी गेय हैं और वे मुक्तक हैं। पर उनमें प्रबन्धात्मकता का रस इतना प्रबल है कि उसे लीलापद भी कहा जाता है। विश्वनाथ त्रिपाठी का कहना है, ‘‘उनकी भाषा में साहित्यिकता के साथ चलतापन एवं प्रवाह भी है। कहीं-कहीं वे गीत गोविन्द के वर्णनानुप्रास की शैली भी अपना लेते हैं। उनकी कविता में लोक-साहित्य की सरलता ही नहीं, काव्य की परम्परा से सुपरिचित रूढ़ियों का उपयोग भी है। सूर की एक अन्य विशेषता नवीन प्रसंगों की उद्भावना है। उन्होंने कृष्ण-कथा, विशेषतः बाल-लीला और प्रेम-लीला के अंशों को नवीन मनोरंजन वृत्तों से भर दिया है, जैसे दानलीला, मान लीला, चीरहरण आदि (हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास/पृ. 42)’’ विद्यापति पदावली के गीतों की गेयधर्मिता, उसके मुक्तक होने के बावजूद उसमें मौजूद प्रबन्धात्मकता, गीतों में सुपरिचित और रूढ़ उपमानों के उपयोग, लोक-साहित्य की सरलता और सहजता, विरह वर्णन में दैनन्दिन जीवन-प्रसंगों के चित्रण, मार्मिकता के आधार तत्त्‍व, विरहावस्था में हृदय की नानावृत्तियों के चित्रण...जिस तरह घनीभूत हैं, सूर के यहाँ ये सारे तत्त्‍व इसी रूप में मौजूद दिखते हैं। दोनों के यहाँ विरह-वर्णन की जीवन्तता देखते ही बनती है। गोपियों की व्याकुलता, निरीहता, विवशता, धीरज के बावजूद बेचैनी, मिलन की उत्कण्ठा...अपनी प्रखर छवियों में व्यक्त हुई है।
विद्यापति की राधा अपने प्रिय के सुमिरन में अपना ही स्वभाव भूल जाती है--
अनुखन माधव माधव सुमिरइत सुन्दरि भेलि मधाई
ओ निज भाव सुभावहि बिसरल अपने गुन लुबधाई।
...
दुहुँ दिसि दारुदहन जइसे दगधइ आकुल कीट परान
ऐसन बल्लभ हेरि सुधामुखि कबि विद्यापति भान।
कृष्ण का स्मरण करते-करते राधा, कृष्ण रूप में हो जाती है और विरह में राधा-राधा रटने लगती है। फिर होश में आते ही कृष्ण-कृष्ण रटने लगती है। विरह की आग में झुलसती इस नायिका को कवि ने ऐसे अंकित किया है, जैसे लकड़ी के भीतर लगी हुई घुन का कीड़ा हो और लकड़ी की दोनों शिराओं में आग लगा दी गई हो।
सूरदास के श्याम की नायिका जब विरह व्यथा में होती है, तो वह भी ठीक इसी वजन पर विचलित होती हैं--  
जब राधे, तब ही मुख माधौ-माधौरटति रहै
जब माधौ ह्वै जाति सकल तनु राधा बिरह दहै।।
उभय अग्र दव दारुकीट ज्यों सीतलताहि चहै
सूरदास अति विकल बिरहनी कैसेहु सुखन लहै।।
शृंगारिक पदों के अलावा भी विद्यापति और सूर के यहाँ ऐसे साम्य हैं।...किम्बदन्ती है कि‍ सूरदास जन्मान्ध थे। ऐसा भी कहा जाता है कि उन्‍होंने कृष्णभक्ति‍ में तीव्र अन्‍तर्द्वन्‍द्व के किसी क्षण में...अपनी आँखें फोड़ ली थीं। स्वयं भी उन्होंने खुद को जन्म को आन्धरकहा। किन्तु शब्दार्थ से किसी बड़े कवि की व्यंजना स्पष्ट नहीं होती। जन्म को आन्धरकहने का अभिप्राय खुद को अज्ञानी रूप में प्रस्तुत करना है। उनके काव्य में चित्रि‍त जीवन और प्रकृति की छवि‍यों के विश्लेषण से कोई अल्पबुद्धि भी कहेगा कि वे जन्मान्ध नहीं रहे होंगे। वे भक्ति, वात्सल्य और शृंगार के कवि हैं। जो विद्यापति भी हैं। विषय विस्तार यद्यपि सूर के यहाँ विद्यापति की तरह फैला नहीं है। पर विद्यापति-साहित्य की कई बातें सूर के यहाँ स्पष्टतः दिखती हैं। दोनों महाकवियों के वैचारिक वैशिष्ट्य का केन्द्र लोकसत्तामें, ‘जन-जनमें समाहित है। दोनों की रचनाओं में लोकहितऔर लोक-मन रंजनकी भावना प्रबल हैं। विषय में कहीं-कुछ जो भिन्नता दिखती है, उसका कारण दोनों कवियों में सौ-सवा सौ वर्षों का अन्तराल, दोनों के ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक, पारिवारिक परिवेश; और दायित्वजन्य स्थितियों के अन्तर भी हो सकते हैं। पर समानता की स्थिति तलाशने पर स्पष्ट दिखता है कि दोनों कवि लोकके प्रति एक जैसे अनुरक्त थे। विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार सूरदास के पहले ब्रजभाषा में काव्य-रचना की परम्परा तो मिल जाती है, किन्तु भाषा की यह प्रौढ़ता, चलतापन और काव्य का यह उत्कर्ष नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि सूर ब्रजाभाषा काव्य के प्रवर्तक न हों, किसी परम्परा के चरमोत्कर्ष हों। शुक्ल जी ने सूर को एक ओर जयदेव, चण्डीदास और विद्यापति की परम्परा से जोड़ा है, दूसरी ओर लोकगीतों की परम्परा से। विद्यापति और सूरदास में जो निरीहता, तन्मयता मिलती है, अनुभूतियों को जिस प्रकार बाह्य प्रकृति के ताने-बाने में बुना गया है, वह लोक गीतों की विशेषता है। लोकगीतों में अभिव्यक्ति इतनी निश्छल होती है कि वह शास्‍त्रीयता और सामाजिक विधि-निषेध की मर्यादा का निर्वाह नहीं कर सकती (हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास/पृ. 39)
दोनों के यहाँ ऐसी समानता लोकसत्ता में कवि की आस्था का परिचायक है। कबीर और तुलसी जैसे महान मध्यकालीन कवियों की सामाजिक चेतना अत्यन्त प्रखर थी। किन्तु उनके स्‍त्री सम्बन्धी विचारों पर, प्रतीक अर्थों में ही सही, पर उस युग की स्पष्ट छाप है। कबीर स्‍त्री को बुराइयों और अवगुणों की जड़ समझते हैं, उसे नरक का कुण्ड समझते हैं। तुलसी स्‍त्री की पराधीनता को असह्य मानते हुए भी उसकी स्वतन्‍त्रता पसन्द नहीं करते, उसे पुरुष सत्ता के अधीन रखना पसन्द करते हैं। जबकि उन दोनों प्रखर चेतना वाले कवियों से बहुत पहले विद्यापति के यहाँ स्‍त्री सम्बन्धी धारणाओं का खुलासा हुआ है। स्‍त्री जीवन की पीड़ा के चित्रण से स्‍पष्‍ट है कि विद्यापति स्‍त्री स्वातन्त्र्य के हिमायती थे। उल्लेखनीय है कि प्रेम सारे बन्धनों से परे होता है। प्रेम करने, और प्रेम का साहित्य रचने, दोनो ही स्‍थि‍ति‍यों में बन्धन स्वीकार्य नहीं होता, वहाँ प्राणी निर्बन्ध होता है, वर्जनाओं का विरोधी होता है, स्वतन्‍त्रता और उन्मुक्तता का हिमायती होता है। प्रेम ऐसा मनोव्यापार है जो स्वयं प्रेमी-प्रेमिका तक को मुक्त करता है। यह प्राणी को मुक्त और पूर्ण करता है। सूर और विद्यापति के सारे प्रेमपरक पद इसके प्रमाण हैं। जिसे कबीर ने कहा ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पण्डित होई’, उसे सूर और विद्यापति के पद के हवाले से कहा जा सकता है कि प्रेम जब हो जाता है, तो प्राणी, तर्क, बुद्धि, साहस, पराक्रमसारे उनक्रमों से अपने बन्धनों को उतार फेंकता है।  
काव्य-शास्त्र के हवाले से प्रो. मैनेजर पाण्डेय सूर-काव्य में दस विरह-दशाओं--अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, गुण कथन, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता और मूर्छाकी उपस्‍थि‍ति‍ का उल्लेख करते हैं। विद्यापति पदावली में भी इन सभी स्थितियों का अत्‍यन्‍त मार्मिक चित्र दिखता है। विद्यापति की गोपियों की आँखें पूरे जन्म तक रूप निहारती हुई भी तृप्त नहीं होतीं, गोपियाँ तरह-तरह के मिलन के सपने देखतीं, ऊधो को मध्यस्थ कर भावनाओं का आदान-प्रदान करतीं; उधर सूर की गोपियाँ भी ऐसे ही करती हैं। उनके यहाँ तो आँखों को पूरा का पूरा व्यक्तित्व भी मिल जाता है। गोपियों के नेत्र रसलम्पट हैं, कृष्ण के रूप रस पान से अतृप्त हैं, सौन्दर्य लोलुप हैं, लालची हैं और कृष्ण के अभाव में व्याकुल और दीन हैं। गोपियों के नेत्र कृष्ण के वियोग में दुखी, बेचैन और व्यथित हैं। गोपियों के मन की सारी विकलता, विह्वलता, उद्विग्नता, चिन्ता, आशा-निराशा इन नेत्रों के माध्यम से ही व्यक्त हुई है (भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य/पृ. 198)विद्यापति एवं सूर के यहाँ आँखों की अद्भुत छटा है। विद्यापति की नायिका की आँखें हैं--लोचन जुगल भृंग अकारे/मधुक मातल उड़ए न पारे। सूर के यहाँ भी आँखों की ऐसी छवियाँ कई जगह हैं। विद्यापति के यहाँ ये आँखें नायिका की हैं,पर  सूर के यहाँ नायक की
मनहुँ कंज ऊपर बैठे अलि/उड़ि न सकत मकरन्द लोभाने
या फिर
मनहुँ कमल सम्पुट नहँ बीधे/उड़ि न सकत चंचल अलिबारे
विद्यापति की नायिका की आँखें काफी चंचल हैं--चकित चकोर जोर विधि बाँधल/केवल काजर पासा
सूर कहते हैं--अंजन गुन अटके नातरु अबही उड़ जाते।
साथ-साथ चर्चा करने पर, विद्यापति और सूरदास में कई बार तो रस, शब्द, भाव, अलंकार के साथ-साथ पंक्ति तक समतुल्य लगने लगते हैं।
विद्यापति कहते हैं--
चंचल लोचन, बाँक निहारए, अंजन शोभा पाय
जनि इन्दीवर, पवने पेलल, अलि भरे उलटाय।
इसी बात को सूर कहते हैं:
चंचल लोचन, बंक निहारनि, खंजन शोभा ताय
जनु इन्दीवर, पवने ठेलल, अलि भरे उलटाय।
चि‍त्रण का ऐसा साम्‍य दोनों महाकवियों की सम्वेदनशीलता एवं जीवन-दृष्टि के ऐक्‍य के द्योतक हैं। दोनों के यहाँ चित्रांकन-कौशल समान और श्रेष्ठ हैं। सूरदास ने भी विद्यापति की भाँति स्वप्न-दर्शन में गोपियों के विरह की व्यंजना की है। विरहाकुल गोपियों के मन में बसी कृष्ण की प्रेममूर्ति है, स्वप्न में आ जाती है। नीन्द टूट जाने के कारण संयोग-कामना से पुलकित हो रही सूर की गोपियों के स्वप्न की वह प्रेममूर्ति खण्डित हो जाती है; फिर विरह-व्यथा और बढ़ जाती है। ऐसा विद्यापति के यहाँ भ्‍ज्ञी हुआ है--  
सुतलि छलहुँ हम घरबा रे, गरबा मोतिहार
राति जखन भिनसबा रे पिया आएल हमार
केहेन अभागलि बैरिनी रे भाँगलि मोहि नीन्द
भल कए देखि नहिं पाओल रे पिय मुख अरविन्द
विद्यापति और सूरदास के पदों के साम्य पर अनेक उदाहरणों से लम्बी बातचीत की जा सकती है। दोनों के पदों की गीतात्मकता, लयात्मकता भाव के लिए मनोहारी है। आत्मानुभूति, भाव-घनत्व, भाव-ऐक्य, वैयक्तिकता, अनुभूति और अभिव्यक्ति की संक्षिप्तता, संगीतात्मकता--शब्द, स्वर और भाव का संगीत, कलात्मकता, अकृत्रिमता और रूप वैविध्य--गीतिकाव्य के सुविचारित और तर्क-सम्‍पोषि‍त प्रमुख तत्त्‍व माने गए हैं। इन दोनों कवियों के पदों में ये सारे तत्त्‍व अपनी पूरी अर्थवत्ता के साथ मौजूद हैं। सूर की रचनाशीलता पर आलोचकों को विद्यापति का स्‍पष्‍ट प्रभाव दिखता है, वहीं प्रो. मैनेजर पाण्डेय के अनुसार ‘‘सूरसागर के लीला विषयक पद गीतकाव्य के एक नवीन स्वरूप का उद्घाटन करते हैं। लीला के पदों में कथा-तत्त्‍व भी विद्यमान हैं और सघन अनुभूति भी। वास्तव में सूरदास को लीलागान की जो परम्परा जयदेव और विद्यापति से उपलब्ध हुई थी, उसकी मुख्य विशेषताएँ हैं: तीव्र भावानुभूति, मनोरागों के अनुकूल संगीत की राग-रागिनियों का प्रयोग, कृष्ण की ललित-लीलाओं की रसात्मक व्यंजना, भक्ति और शृंगार का समन्वय और कोमलकान्त पदावली (पृ. 266)’’
प्रो. पाण्डेय तो भ्रमरगीत को नारी की आकुल अन्तरात्मा और तीव्र सम्वेदनशीलता की शाश्वत कहानी मानते हैं (पृ. 200)। इन दोनो के पदों से स्‍पष्‍ट लक्षि‍त होता है कि वस्तुतः हमारे समाज में सामन्ती संस्कार की जड़ें इतनी गहराई तक जमी हुई हैं कि यहाँ प्रेम में भी पुरुष-सामन्तवाद घुसा नजर आता है। प्रेम का अर्थ सामान्य स्थितियों में नारियों और पुरुषों के लिए भिन्न है। नारी के लिए प्रेम का अर्थ सम्पूर्ण समर्पण है तो पुरुष के लिए सम्पूर्ण ग्रहण। अर्थात् स्‍त्री की त्याग-वृत्ति प्रेम है और पुरुष की लोभ-वृत्ति। प्रो. पाण्डेय के शब्दों में पुरुष द्वारा निर्मित प्रेम की आचार-संहिता का प्रतिफलन पुरुष की रस-लोलुप मधुप-वृत्ति में हुई है। पुरुषों ने अपने लोभ को प्रेम का नाम दिया, अपनी स्वार्थी मनोवृत्ति के सहारे नारी की समर्पण भावना और भावुकता का शोषण किया है। नारी की सुकुमारता, सौन्दर्य और यौवन-रस का उपयोग कर अन्त में उसे निरस समझकर त्याग देना पुरुष के लिए आम बात है। नित्य नवीन रस के आस्वादन में प्रवृत्त रसिक पुरुष नई मुग्धाओं को अपने सामान्योन्मुख लोभ का साधन बनाता है। पुरुष द्वारा भुक्त, परित्‍यक्त, रसरिक्त नारी के सामने रुदन और शिकायत के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है (पृ. 200)’’
विद्यापति और सूर के पदों में पुरुष की यही भ्रमर और स्वार्थी वृत्ति का प्रतिफलन तथा स्‍त्री की इसी व्याकुलता का चित्र अंकित है। राधा-कृष्ण लीला विषयक पदों में विद्यापति के यहाँ कृष्ण के मथुरागमन, गोपी विरह, कुब्जा के प्रति कृष्ण की अनुरक्ति, गोपियों की व्याकुलता, पुरुष की भ्रमर-वृत्ति इत्यादि के जो चित्र अंकित हुए, ब्रजभाषा में वे पहली बार सूरदास के यहाँ संगठित और सुगठित रूप में हैं। सूर से पहले ब्रजभाषा में भ्रमरगीत काव्य की ऐसी सुगठित छवि नहीं दिखती। दौत्य वृत्ति का जो स्वरूप विद्यापति के प्रेम पदों में दिखता है, वह सूर के यहाँ भी है। मजे की बात यह है कि इस वृत्ति में जो उद्धव उनके यहाँ हैं, वही उद्धव इनके यहाँ भी है। गुण-गायन और व्यथा-सन्देश--प्रेम के दौत्य कर्म में ये ही प्रमुख हैं। और ये दोनों तत्त्‍व दौत्य वृत्ति वाले पदों में विद्यापति और सूर--दोनों के यहाँ बहुत प्रखर रूप में हैं। सामान्यतया आज भी होता है कि प्रेमी का सखा या प्रेमिका की सखी द्वारा इस पुण्य-कर्म का निर्वाह होता है। दोनों पक्षों के रहस्यों को मात्र इन दोनों तक ही सीमित रखने वाले सखा को ही देवर और साली का आदर्श माना जा सकता है, जो दोनों में मिलन की उत्कण्ठा बढ़ाए, दोनों के प्रेम को और घना करे तथा विरह-सन्देश देकर इस अन्तराल को नष्ट करे। सूर और विद्यापति के काव्य इसके प्रबल उदाहरण हैं।
राधा-कृष्ण प्रेम वि‍षयक विद्यापति के पदों में संयोगावस्था की स्मृति, विरहावस्था की व्याकुलता व्यक्त करते समय नायक-नायिका की कई-कई छवियाँ अंकित हुई हैं। उनकी राधा कभी अनुरागवती किशोरी हैं, कभी प्रेममय युवती, असाधारण सुन्दरी, स्वकीया, कामिनी, मानिनी, वियोगिनी, प्रौढ़ा, अभिसार के लिए जुगत बैठाती चतुर सयानी, लाज और पारिवारिक बन्धन को तोड़ने के लिए व्यग्र विलासिनी, विरह में विक्षिप्त-व्यथित और नायक को हर तरह से समर्पित पुष्पांजलि, नायक को उपालम्भ और उलहना तथा उसकी स्वार्थी एवं रसिक वृत्ति पर उन्हें धिक्कारती हुई मान-मुग्धा, प्रेमरस दीवानी, और क्या-क्या हैं...इसी तरह भावानुभूतियों और स्थितियों की भी कई-कई मनोदशाएँ व्यक्त हुई हैं। वियोग की वेदना और प्रिय-प्रवास के दुखादि के चित्रण यहाँ भरे पड़े हैं। ये सारे तत्त्‍व मिलकर विद्यापति के पदों में कथात्मकता, पद-लालित्य और रागात्मकता कूट-कूट कर भरते हैं, जिससे उन पदों में वे सारे दृश्य जीवन्त और मूर्तिमान हो उठते हैं। सूर के सारे लीला-पद इन दशाओं से युक्तियुक्त हैं। नायिका के विरह वर्णन, नख शिख वर्णन, मनोदशा विवरण...सबमें सूरदास ने इन स्थितियों को लोकानुरंजकता से इस कदर भरा है कि वे विद्यापति के पदों के वजन पर ही लोक मनोहारी हैं। नायिका के देह-वर्णन में जहाँ विद्यापति कहते हैं--
पल्लवराज चरणयुग शोभित/गति गजराजक भाने
कनक कदलि पर सिंह सँवारल/तापर मेरु समाने
इसे सूरदास कहते हैं--
अद्भुत एक अनुपम बाग
जुगल कमल पर गजवर क्रीड़त/तापर सिंह करत अनुराग
नारी-देह को बगीचे के रूप में देखने की और स्‍त्री-अंगों के लिए सौन्दर्य के जो प्रतिमान जंगल के पशु-पक्षियों, ग्रह-नक्षत्रों, पेड़-पौधों, चाँद तारों से लेने की जो परम्परा विद्यापति ने शुरू की, सूर के यहाँ वे सब मूर्तिमान लग रहे हैं।
विद्यापति की नायिका के नाभि विवर से निकली हुई नागिन(रोमावली) उसके सुवासित साँसों की प्यास में ऊपर चलती है। पर नायिका की नाक को देखने पर उसे गरुड़ की चोंच समझकर डर के मारे पर्वतों(स्तनों) के सन्धिस्थल में छुप जाती है--
नाभि-विवर सँय लोभ लतावली/भुजग निसास पियासा
नासा खगपति चंचु भरम भय/कुच गिरि सन्धि निवासा
सूरदास की नायिका की शारीरिक दशा भी लगभग यही है--
नाभि परस लौं रस रोमावली, कुच-जुग बीच चली
मनहुँ विवर तें उरग रिंग्यो, तकि गिर की सन्धि-थली
विद्यापति की सद्यःस्नाता अपने स्तनों को भुजपाश में बाँध लेती है ताकि वह उड़ न सके--
ते संका भुज पासे/बाँधि धएल उड़ि जाएत अकासे
और सूरदास की नायिका आँचल से ढककर, दबाकर रखती है--
राखति ओटकोटि जतनन करि झाँपति आँचल झारि/खंजन मनहुँ उड़न को आतुर सकत न पंख पसारि
विद्यापति की राधा के बालों को देखकर चामरि पर्वत-कन्दरा में समा गई, मुँह देखकर शर्म से चाँद, आकाश भाग गया, आँख देखकर हरिण, स्वर सुनकर कोयल, चाल देखकर हथिनी जंगल चली गई। इधर सूरदास के नायक के शरीर को देखकर
कोऊ जल कोऊ वन में रहे, दुरि कोऊ गगन समाने
मुख निरखत ससि गयो अम्बर को तड़ित दसन छवि हेरो
विद्यापति की नायिका का नीबीबन्ध कृष्ण खोलते हैं--
नीबीबन्ध हरि किए कर दूर
और सूर के नायक यह काम धीरे-धीरे करते हैं--
नीबी खोलत धीरे जुदराई
विद्यापति के कृष्ण भी विहार करते हैं--
बिहरए, बिहरए नवल किशोर
सूर की राधा और कृष्ण दोनों--
नवल गोपाल नवेली राधा, नए प्रेम रस पागे
नव तरुवर बिहारि दोउ क्रीड़त, आपु-आपु अनुरागे
कामदंश की वेदना से व्याकुल विद्यापति की नायिका का सन्देश दूती द्वारा कृष्ण को पहुँचाया जाता है--
मदन भुजंग डस बालहि तोरी
और सूरदास की नायिका की दूती कहती है--
जो कारण तुम यह वन सोयव, सौतिन मदन भुअंगम खाई।
यहाँ तक कि विद्यापति के वजन पर सूर ने दृष्टिकूट वाले पद भी लिखे हैं--
सारंग नयन वयन पुनि सारंग सारंग तसु समधाने
सारंग उपर उगल दस सारंग केलि करथि मधुपाने    --विद्यापति
और,
सारंग सारंग धरहि मिलावहु
सारंग विनय करत सारंग सों, सारंग दुख बिसरावहु
सारंग समय दहत अति सारंग सारंग तिनहि दिखावहु
सारंग पति सारंग घर जैहें, सारंग जाइ मनावहुँ
सारंग चरन सुभगकर सारंग, सारंग नाम बुलाबहु     --सूरदास
श्लेष, यमक, उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास, उपमा आदि अलंकारों की समानता तो दोनों की रचनाओं में है ही। बहुअर्थी शब्दों के सद्दोहन में और इस शैली के उपयोग में दोनों महाकवि समान रूप से उद्यमशील दिखते हैं।
सूरदास की रचनाधर्मिता की चर्चा जिस तरह विद्यापति की चर्चा के बिना पूरी नहीं हो सकती, उसी तरह विद्यापति की चर्चा भी सूरदास के बिना पूरी नहीं हो सकती। सूरदास ऐसे अकेले परवर्ती रचनाकार हैं जहाँ विद्यापति का प्रभाव सबसे ज्यादा और पूरे विश्वास के साथ मौजूद है। कई बार तो केवल भाषा का अन्तर दिखता है। ठीक इसी तरह विद्यापति भी ऐसे लगभग अकेले पूर्ववर्ती रचनाकार हैं जहाँ सूरदास की रचनाधर्मिता के स्रोत अधिकतम दिखते हैं। विषय बोध, भावबोध, लयबोध, ताल बोध, अनुभूति, संगीतात्मकता, छन्द, अलंकार, रूप रस आदि से इतना अधिक साम्य किन्हीं अन्य रचनाकारों के यहाँ दिखना दुर्लभ है।
गीतिमयता, सहज बोधता, शब्द सरलता, कथात्मकता, पदलालित्य और लोकजीवन की तात्त्‍वि‍कता इन दोनों के यहाँ इतना घनीभूत है कि यह कहने की मजबूरी आ जाती है कि इन पदों की रचना लोकजीवन के मार्मिक तन्तुओं को ध्यान में रखकर की गई है।
मजे की बात है कि दोनों भक्त कवि हैं, पर उनके लीला-पदों की संरचना में राधा-कृष्ण का चरित्र सामान्यतया अलौकिक रूप में नहीं दिखाया गया है। शुद्ध रूप से दोनों के नायक और नायिका गृहस्थ लगते हैं, सामाजिक और आस-पास के लगते हैं, इनके प्रेम, इनके संयोग, वियोग, मान, अभिसार, रूपासक्ति, प्रथम मिलन, रति विलास...सबके सब परम सामाजिक और परम पारिवारिक लगते हैं। विद्यापति के नायक-नायिका को प्रेम दुहु मुख हेरइत दुहु भेल भोरसे हुआ तो सूर के नायक-नायिका को राजपथ पर यात्रा करते हुए चलल राजपथ दुहु उद्झाईं। दोनों के यहाँ नायिका की लाज, संकोच, लुका छिपी...सब इहलौकिक हैं। यही कारण है कि आज भाषा और क्षेत्र की सीमा तोड़कर विद्यापति और सूरदास अपने लीला-पदों के साथ जन-जन के मस्तिष्क पर बसे हुए हैं। बुद्धिजीवियों के शोधग्रन्थों से लेकर टोले-मुहल्ले के लोकाचारों और सांस्कृतिक-सामाजिक अनुष्ठानों में, शिक्षित से अनपढ़ महिलाओं के कण्ठ में इनके पद बसे हुए हैं--संस्कार गीत के रूप में, लोकगीत के रूप में, भजन कीर्तन के रूप में, लोकोक्ति-मुहावरों के रूप में और अन्ततः जीवन-प्रक्रिया के रूप में। कह सकते हैं कि विद्यापति और सूरदास के लीला-पदों में लोक-जीवन की एक-एक धड़कन मौजूद है।

भक्ति-आन्दोलन के प्रेरणास्रोत



हिन्दी साहित्य का भक्तिकाल साहित्य-सृजन के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक सक्रियता, और कलात्मक अभिव्यक्ति की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। इस दौरा पूरे देश के युगनिर्माता कवियों की रचनात्‍मक भाव-धारा आन्दोलित हो उठी थी। ग्रियर्सन ने माना कि इस युग में धर्म, ज्ञान का ही नहीं, भावावेश का विषय हो गया (साहित्यकोश, भाग-2/पृ. 442) कुछ लोगों ने इसे प्रारम्भिक काल में ही पश्चिमी समुद्र पर आ बसे अरब नागरिकों के कारण फैले इस्लामी प्रभाव की देन माना; या फिर मुसलिम आक्रमणकारियों के अत्याचारों से उत्पन्न सामाजिक दुर्व्‍यवस्था से आंतकित भारतीय नागरिक के मन में उमड़ी हीनताबोधक भावनाओं की प्रतिच्छवि। प्रो. सतीशचन्द्र के अनुसार देश में ईसा-पूर्व छठी और ईसा के बाद दूसरी सदियों के मध्य बौद्ध-धर्म के उदय और विकास के बाद, मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन भारत का सर्वाधिक व्यापक, बड़ा, और बहुआयामी आन्दोलन था। भक्ति-आन्दोलन ने समय-समय पर लगभग पूरे देश को प्रभावित किया और उसका धार्मिक सिद्धान्तों, धार्मिक अनुष्ठानों, नैतिक मूल्यों और लोकप्रिय विश्वासों पर ही नहीं, बल्कि कलाओं और संस्कृति पर भी निर्णायक प्रभाव पड़ा (मध्यकालीन भारत में इतिहासलेखन, धर्म और राज्य का स्वरूप/पृ. 83) इसके बावजूद उन्‍होंने इस आन्दोलन को मुक्त कण्ठ से जन-आन्दोलन स्वीकार नहीं किया।
जिन दिनों ब्राह्मण ग्रन्थों के हिंसाप्रधान यज्ञों की प्रतिक्रिया में बौद्ध-जैन सुधार आन्दोलन चल रहे थे, उससे भी पहले ईसा-पूर्व 600 के आसपास एक उपासना प्रधान सम्प्रदाय विकसित हो रहा था। प्रारम्भ में यह उपासना वृष्णि-वंशीय क्षत्रियों की खास जाति तक सीमित थी, जो शूरसेन, अर्थात आधुनिक ब्रज में बसने वाले सात्त्वत जाति के थे। सात्त्वतों के भ्रमण और स्थानान्तरण के परिणामस्वरूप यह धारा पश्चिम की ओर भी फैली। इस सम्प्रदाय ने वैदिक परम्परा का विरोध नहीं किया, बल्कि अपने अहिंसात्मक धार्मिक रवैये को वेदसम्मत बताया। जाहिर है कि इनकी प्रवृत्ति बौद्धों और जैनों के सुधार-आन्दोलन की तरह खण्डनात्मक और प्रचारात्मक नहीं थी, इसकी कोई वैसी धूम भी नहीं मचाई जा रही थी। ईसा-पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनि की अष्टाध्यायी में वासुदेवोपासक के होने के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। ईसा-पूर्व तीसरी-चौथी शताब्दी से लेकर पहली शताब्दी तक प्राचीन साहित्य और पुरातत्त्व सूचना के आधार पर इसके उल्लेख मिलते हैं। वासुदेव और बलदेव तो जैनों के शलाका-पुरुष माने गए हैं, प्राचीन जैन-बौद्ध साहित्यों में भी इनका उल्लेख है। प्राचीन तमिल साहित्य में वासुदेव के अनेक सन्दर्भ मिलते हैं। एतरेय ब्राह्मण में उल्लेख है कि दक्षिण के सात्त्वतों ने इन्द्र का अभिषेक किया। स्पष्ट है कि सात्त्वतों का दक्षिण में आगमन उससे पूर्व ही हो चुका था और वे अपनी धार्मिक परम्पराओं के साथ ही वहाँ पहुँचे होंगे; इस तथ्य को सहजता से स्वीकार करने में तो कतई कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए।
भागवत धर्म को ही वैष्णव धर्म अथवा वैष्णव सम्प्रदाय कहते हैं। जिसके उपास्य-देव वासुदेव हैं। ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, ऐश्वर्य और तेज--इन छह गुणों से सम्पन्न होने के कारण उन्हें भगवान, या भगवत् कहा गया और भगवत के उपासक भागवत हुए। इस भागवत धर्म का प्रारम्भ भी क्षत्रियों द्वारा ही हुआ। एक अब्राह्मण उपासना मार्ग के रूप में शुरू हुआ यह सम्प्रदाय, अवैदिक मतों की नई धूम को देखकर ब्राह्मणों द्वारा अपना लिया गया, फलस्वरूप वैष्णव और नारायणीय धर्म के रूप में उसका विधिवत संघटन हुआ। महाभारत के शान्तिपर्व के नारायणीय उपाख्यान में इस नवीन धर्म का उल्लेख वैष्णव यज्ञ के रूप में हुआ और इसे यज्ञ प्रधान वैदिक कर्मकाण्ड के प्रवृत्ति मार्ग के विपरीत निवृत्ति मार्ग का बताया गया। इस वैष्णव यज्ञ में स्पष्टतः पशुवध का निषेध तथा तप, सत्य, अहिंसा और इन्द्रियनिग्रह का विधान किया गया। महाभारत में वासुदेव को वैदिक देवता विष्णु से अभिन्न और कृष्ण को द्वितीय वासुदेव के रूप में उनका अवतार माना गया। हरिवंश तथा अनेक पुराणों में भी कृष्ण को द्वितीय वासुदेव के रूप में स्वीकारा गया है। इस तरह स्पष्ट संकेत है कि सात्त्वतों के कुलधर्म को महाभारत और पुराणों में व्यापक लोकधर्म की स्वीकृति मिल गई थी। चौथी पाँचवीं शताब्दी में गुप्तवंश के राज्यकाल में वैष्णव धर्म को पर्याप्त प्रोत्साहन मिला। पर गुप्तवंश की उदार धार्मिक नीति के कारण शैव और बौद्धधर्म को भी उन्नत होने का पर्याप्त अवसर मिला। इस तरह ईसा-पूर्व 600 से लेकर सन् 500 तक के अन्तराल में भागवत धर्म का पर्याप्त साहित्य तैयार हुआ।
छठी से चौदहवीं शताब्दी की लगभग समाप्ति तक उत्तर भारत में भागवत धर्म का उस तरह विकास नहीं हो सका। लोक रुचि के मद्देनजर कहा जा सकता है कि वैदिक धर्म और बौद्ध-धर्म में एक प्रतिस्पर्द्धा-सी थी। इसी प्रतिस्पर्द्धा में इधर बौद्ध-धर्म ने वैष्णव धर्म की अनेक बातें अपना लीं, उधर लोक-विश्वासों और लोक-प्रथाओं को अपनाते हुए उसकी मौलिकता शेष होने लगीं। पौराणिक धर्म और शंकराचार्य के उद्यमों से भी बौद्ध-धर्म आहत होता गया। इसी दौरान दक्षिण भारत में भागवत-धर्म का उत्कर्ष होता रहा। नौवीं शताब्दी तक दक्षिण में जिस आलवार भक्तों की धारा अविच्छिन्न रही, उसमें अण्डाल नाम की एक प्रसिद्ध भक्तिन हुईं। इन्हीं भक्तों ने विष्णु के अवतार राम और कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का भाव दिखाया और दास्य, वात्सल्य और माधुर्य भक्ति का स्वरूप स्पष्ट किया।
इस वैष्णव सम्प्रदाय में रामानुजाचार्य(सन् 1016-1137) को सर्वाधिक प्रसिद्ध माना जाता है। बल्कि उनके द्वारा प्रवर्तित भक्ति धर्म को श्रीवैष्णव कहा जाता है। उनके उपास्य लक्ष्मी-नारायण हैं और ऐसा विश्वास किया जाता है कि वस्तुतः इसका प्रवर्तन स्वयं लक्ष्मी जी ने किया। रामानुजाचार्य ने ब्रह्मसूत्र का श्रीभाष्य भी लिखा। रामानुज की मृत्यु के सौ वर्षों के भीतर ही दक्षिण में एक आचार्य हुए मध्व। माध्व मत उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मध्वाचार्य ने भक्ति के प्रचारार्थ ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना की। मायावाद, अद्वैतवाद का खण्डन करते हुए उन्होंने भक्ति का जो मार्ग प्रशस्त किया, उससे दक्षिण में, खासकर कर्नाटक और दक्षिण महाराष्ट्र में कृष्ण भक्ति का व्यापक प्रचार हुआ। बंगाल का गौड़ीय सम्प्रदाय भी माध्व मत की एक शाखा माना जाता है। उसी काल के आसपास दक्षिण के एक और आचार्य निम्बार्क हैं। बहरहाल...दसवीं से तेरहवीं शताब्दी तक की यह वेगवती भक्ति-धारा एक शास्‍त्रीय रूप धारण कर उत्तर की ओर आई और महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, मध्य प्रदेश, मगध, उत्कल, असम और बंगाल के विस्तृत भूभाग में फैलकर लोकधर्म की व्यापकता हासिल कर ली।
उत्तर भारत में इसके नवल रूप के प्रथम और सर्वाधिक प्रभावशाली भक्त स्वामी रामानन्द माने जाते हैं। उनकी मान्यता दाक्षिणात्य वैष्णवों की तरह कठोर नहीं थी। उन्होंने लक्ष्मी-नारायण की जगह सीता-राम को अपना उपास्य माना। उनकी दो शिष्य परम्पराएँ थीं--एक में निम्न जाति के लोग थे तो दूसरी में सवर्ण लोग (साहित्य कोश भाग-2/पृष्ठ 451-52)
भारत के सांस्कृतिक सन्दर्भों में इस बात के पर्याप्त प्रमाण दिखते हैं कि यहाँ किसी खास विचारधारा को सुसंस्थापित करने के लिए देश के विभिन्न भूभागों की यात्रा करते हुए शास्त्रार्थ किया जाता था। दक्षिण उत्तर के सम्बन्धों की निकटता का यह एक साक्ष्य भी माना जा सकता है। इस सन्‍दर्भ में प्रो. सतीश चन्द्र का संशय वाजि‍ब है कि‍ भक्ति-आन्दोलन के दक्षिण से उत्तर तक आने में लगभग पाँच सौ वर्ष क्‍यों लगा। वस्‍तुत: छठी से दसवीं शताब्दी तक के अन्तराल में उत्तर भारत में भक्ति आन्दोलन की लोकप्रियता की असफलता का सूत्र उस क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों में ढूँढा जाना चाहिए न कि आन्दोलन की कमतर लोकप्रि‍यता में। प्रो. आर.एस. शर्मा (इंडियन फ्यूडलिज्म, 300-1200, कलकत्ता, 1965 पृ. 263-273) के हवाले से उल्लेख मि‍लता है कि उत्तर भारत में, राज्य कमजोरी, स्थानीय जमीन्दारों की उग्रता, नगरों के पतन, लम्बी दूरी के व्यापार में गतिरोधादि‍ सातवीं से बारहवीं सदियों के बीच की प्रमुख वृत्ति‍याँ रहीं। यही समय राजपूतों के उदय का भी है। यह वर्ग क्रमश: सबल होता गया, भूमि और क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक सत्ता पर नियन्‍त्रण पाता गया। फलस्‍वरूप सत्ता के भागीदार होने में विफल हुए लोग, इस वर्ग-श्रेणी में बिल्कुल नीचे आ गए। डॉ. ताराचन्द के अनुसार भारत के सामाजिक जीवन में ब्राह्मणों का उत्थान गुप्तकाल में आरम्भ हुआ और उस समय पूर्ण हुआ जब विदेशी आप्रावासियों को हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में शामिल कर लिया गया...राजपूतों को बर्बरता से सभ्यता में अपने उत्थान की कीमत, ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के दावों को स्वीकार करके और उसकी पुष्टि करके चुकानी पड़ी...(इन्फ्लूएन्स ऑफ इस्लाम ऑन इण्डियन कल्चर, इलाहाबाद, 1946, पृ.131)स्‍पष्‍टत: वह ऐसा समय था जब भूमि और राजनीतिक सत्ता पर अधिकार होने के बावजूद, ब्राह्मणों के समर्थन के बि‍ना सामाजिक दृष्टि से उच्चतर हैसियत सम्भव नहीं था। अर्थात् उत्तर भारत में राजपूतों का उदय उस मौन गठजोर का प्रतिफल था, जिसमें राजनीतिक शक्ति के हर आचरण को ब्राह्मण-वर्ग न्यायसंगत ठहराते हुए मान्यता देते थे। ब्राह्मण उन शासकों को क्षत्रिय की मान्यता देते थे और वे ब्राह्मणों को भरण-पोषण, मन्दिर-निर्माणादि‍ के लिए अनुदान देते थे। इस अर्थ में देखें तो इस अन्तराल के वैभवशाली मन्दिरों के निर्माण के पीछे इस गठजोर की कई कई बारीकियाँ छिपी हुई हैं। ब्राह्मण ही राजपुरोहित के प्रतिष्ठित पद पर सुशोभित होते थे। वर्णवादी वर्चस्व की यह परम्परा मुगल काल तक जारी रही। वैसे यह बहुत नई भी नहीं थी, पूर्व के समय में भी ब्राह्मणों की सुरक्षा, धर्मशास्त्रों का अनुपालन, और वर्ण व्यवस्था का समर्थन, हिन्दू शासकों का कर्त्तव्य माना जाता था।
धर्म, धार्मिक मान्यताओं का संघर्ष, और शक्ति तथा मान्यतादात्री अभिकरणों के इस चक्रव्यूह का तिलिस्म रोमांचक था। वर्ण-श्रेणी से फिसले हुए आहत लोग सामाजिक व्यवस्था के उस तिलिस्म के शि‍कार थे। वर्ण व्यवस्था, कर्मकाण्ड, और ब्राह्मण समुदाय से उनकी असन्तुष्टि‍ सहज थी। पर इस असन्तोष और ब्राह्मण-विरोध के कारण उन्‍हें राजनीतिक शक्तियों के दमनकारी आचरण झेलने पड़ते थे।
इरफान हबीब के अनुसार ईसा के जन्म से पहले पाँच सौ वर्षों...में जाति-व्यवस्था की बुनियादी रूप-रेखाओं का निर्धारण हुआ होगा। किसान वर्ग अनन्त सगोत्रीय समुदायों में विभक्त होता गया तथा वह कारीगरों और टहलुआ श्रमिकों से पूरी कठोरता के साथ अलग होता गया। यह सामाजिक संरचना अपने आप नहीं बनी होगी। इसके निर्माण के लिए नए ढंग के विचारों और आस्थाओं के समग्र तन्‍त्र की दिशा और पुश्तपनाही की आवश्यकता थी (भारतीय इतिहास में मध्यकाल/पृ.81)जाहिर है कि इस सामाजिक प्रक्रिया का सीधा सम्बन्ध ब्राह्मणों द्वारा किए जाने वाले यज्ञादि में पशुबलि के प्रबल विरोध में खड़े बौद्ध-धर्म की मान्यताओं से था। समकालीन जनजीवन की धार्मिक मान्यताएँ इस नई सामाजिक स्थितियों से पूरी तरह प्रभावित हुईं। स्थानीय रीति-रिवाजों और प्रचलित अन्धविश्वासों के साथ समकालीन समाज की संरचना में जनजीवन की सहजता के मद्देनजर अनेक रद्दोबदल हुई। जनजातीय आधार ध्वस्त हो गया और किसान वर्ग नए-नए समाज के रूप में मान्यता पा गया। अब इस वर्ग को अपने लिए जिस तरह की धार्मिक व्यवस्था की आवश्यकता हुई, वैसी व्यवस्था के लिए ब्राह्मणों के पवित्र कर्मकाण्ड और बौद्धों के अभिजात संघ में कोई जगह नहीं दिखती थी। कालान्तर में बौद्ध मतावलम्बियों के बीच ही बोधिसत्‍व की धारणा विकसित हुई, उसमें इतनी उदारता अवश्य थी कि कोई भी व्यक्ति, जाति-वर्ण-कर्म-हैसियत की संरचना से परे कोई भी व्यक्ति सहज पूजा-वन्दना की प्रक्रिया के साथ इसमें शामिल हो सकता था। गौरतलब है कि महायान और पीछे से चली आ रही वैष्णव-परम्परा के मुखर होने का अन्तराल भी यही था।
ऐतिहासिक तथ्य है कि इसवी सन् के प्राथमिक एक हजार वर्षों के भीतर कृषि-कर्म में तरह-तरह के प्रयोग और मानवीय उद्यम का जोर लगाया गया। मनुष्य-बल की जगह पशु-बल के प्रयोग से कृषि-कार्य में परिवर्तन आता गया। इस प्रक्रिया में सामाजिक रूप से कुछ खास वर्गवादी स्थितियाँ स्पष्ट हुईं। किसान वर्ग और खेतिहर मजदूर वर्ग का स्पष्ट विभाजन दिखने लगा। इस क्रम में किसान तथा उनसे उच्च वर्ग-स्तर के लोगों की नजर में, भोजन संग्रह में तल्लीन और जंगलीय संसाधनों पर जीवन-बसर करने वाले लोग उपस्कर की तरह दिखने लगे। इससे ग्रामीण-समाज में दलित सर्वहारा वर्ग कायम हुआ। इस वर्ग के लोगों को कृषि-जीवन की प्रचलित पद्धति में खुद को शामिल करने में आसानी दिखी होगी। कदाचित उनलोगों ने सोचा हो कि सहज विकास की प्रक्रिया में हम कभी न कभी खुद को खेतिहर मजदूर से किसान वर्ग में तब्दील कर पाएँ। पर इतिहास सूचित करता है कि सन् 200 से 600 तक और फिर सन् 600 से सन् 1200 तक के दो चरणों में उस काल के अछूतों के वर्ग में नई-नई जातियाँ शामिल होने लगीं और उनकी संख्या लगातार बढ़ती गई। अछूत वर्ण के लोगों की बसावट चूँकि गाँव के बाहरी छोर पर होती थी। उनके पास भूमि होती नहीं थी, इसलिए वे किसान हो नहीं सकते थे, वे किसानों के खेतिहर मजदूर होते थे। जीविका चलाने के लिए समृद्ध किसानों की मजदूरी करना, सेवा-टहल करना उसकी मजबूरी होती थी। इस क्रम में उसका भरपूर दमन होता था। भारतीय समाज की यह विकट त्रासदी दयनीय थी। किसानों के बीच आपस में भी कई स्तर थे। औरों की भूमि में कृषि कार्य करते हुए गुजर-बसर करने वाले बटाईदारों की भी बड़ी तादाद थी।
उत्तर भारत की सामाजिक व्यवस्था में इस तरह के मानवीय सम्बन्धों के बीच यह अनुमान करना सहज है कि ऐसे दलित, अछूत और सर्वहारा के लिए स्पष्टतः कुलीन ब्राह्मणों की धर्म व्यवस्था में कोई स्पष्ट जगह नहीं थी। गौरतलब है कि भारत के पूर्वी भागों में प्रचलित तन्‍त्र-पूजा और शक्ति-उपासना को अत्यधिक लोकप्रियता हासिल थी। इस क्षेत्र में लम्बे समय तक बौद्ध-धर्म का वर्चस्व भी बना रहा। जाहिर है कि इस क्षेत्र में ब्राह्मणवाद और जाति-व्यवस्था की मजबूत पकड़ नहीं थी। नेपाल और बिहार के तटवर्ती पूर्वी उत्तर-प्रदेश में नाथपन्थ की उत्पत्ति हुई, जिसे किसी तरह तन्‍त्रवाद की एक शाखा के रूप में भी गिना जाता रहा। धीरे-धीरे यह धारा भारत के उत्तरी और पश्चिमी भागों में फैल गई। उल्लेखनीय है कि तन्‍त्रवाद और नाथपन्थ के विचारों का प्रचार-प्रसार जिन उपदेशकों द्वारा किया जाता था, वे सामान्यतया इतर-ब्राह्मण समुदाय के लोग होते थे, उनका सीधा सम्बन्‍ध निम्न वर्ग से होता था। इस पन्थ में प्रवेश पाने के लिए जाति, मत, लिंग की कोई वर्जना नहीं थी। इस व्यवस्था में दीक्षित होने के लिए किसी भी व्यक्ति को लिंग अथवा जाति के आधार पर रोका नहीं गया। बल्कि अछूतों की श्रेणी से ऐसी स्‍त्री का भी उल्लेख मिलता है, जिन्हें गुरु के रूप में स्वीकार किया गया। तन्‍त्रवाद की अत्यन्त गोपनीय पद्धति के कारण इसका प्रभाव तो सीमित रहा और सामाजिक राजनीतिक दमन से बचा रहा, पर शीघ्र ही उनके आचरणों के कारण ब्राह्मणों ने तन्‍त्रवाद की पूरी व्यवस्था को अनैतिक घोषित कर दिया, राजकीय व्यवस्था द्वारा भी इसे शक की निगाह से देखा जाने लगा।
पर तमाम विरोध बाधाओं के बावजूद गोरखनाथ के नेतृत्त्व में नाथपन्थ का विस्तार हुआ और भारत के उत्तर तथा पश्चिमी क्षेत्रों में विभिन्न स्थानों पर एवं दक्षिण भारत के कुछ भागों में उन्होंने अपने केन्द्र स्थापित किए। तथ्‍यत: सामाजिक संरचनाओं में रहन-सहन एवं आचार-विचार की जटिलता न होने की वजह से दक्षिण भारत में पूर्ववर्ती धार्मिक नीतियों के कठोर रीति-रिवाज त्यागकर नई धार्मिक नीति तय करने में कोई कठिनाई नहीं आई। नयनार और आलवार सन्तों की लोकप्रियता समाज में फैली। उत्तर भारत की स्थिति ऐसी नहीं थी। ब्राह्मण-क्षत्रिय गठजोड़ से जाति-प्रथा और वर्ण-व्यवस्था परवान चढ़ी थी। एक तरफ कट्टरता, दूसरी तरफ दयनीयता। पर बारहवीं शताब्दी के अन्त में तुर्कों के आगमन से भारत में नई परिस्थिति उत्‍पन्न हुई। तुर्को से राजपूतों के पछाड़ खाने के बाद आचानक वह वर्णाश्रम व्यवस्था निर्बल हो गई। ब्राह्मण-क्षत्रिय गठजोड़ का सैकड़ों वर्षों का वर्चस्व पिघल गया। पराजित क्षत्रिय और अपमानित ब्राह्मण का व्यवस्था-संचालन का तिलिस्म चकनाचूर हो गया। ब्राह्मण-वर्ग नागरिक परिदृश्य में धर्माचरण का मायाजाल फैलाते थे। अपने पास संरक्षित मूत्तियों को वे ईश्वर के प्रतीक की तरह नहीं, साक्षात ईश्वर की तरह प्रस्तुत करते थे। वे कहा करते कि वे मूर्तियाँ उनके कथनानुसार निष्ठावानों को फलीभूत, और उनके सामर्थ्‍य पर शंका करने वालों को दण्डित करती हैं। तुर्को के आक्रमण के दौरान वे मूर्तियाँ पैरों तले रौंद दी गईं; लोगों ने स्‍पष्‍ट देखा कि उन मूर्तियों रौंद डालने के बावजूद उन तुर्को का तो कुछ नहीं बिगड़ा। ब्राह्मण-क्षत्रिय गठजोड़ के वर्चस्व को इस कदर धूल-धूसरित होते देखकर जनता की सन्ततियों की आँखें खुलीं, वर्ण-व्यवस्था और कर्मकाण्ड के प्रति जनाक्रोश बढ़ा और भक्ति आन्दोलन की लोकप्रियता का मार्ग प्रशस्त हुआ।
उक्‍त परि‍स्‍थि‍ति‍यों के मद्देनजर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सन् 1318-1643 की अवधि को हिन्दी साहित्य का भक्तिकाल मानते हुए उ‍स दौर के मुस्लिम आक्रमण से उत्पन्न राजनीतिक पराभव और सांस्कृतिक विध्वंस को रेखांकित किया। समकालीन रचनात्‍मक उद्यम को पौरुष से हताश जाति का करुणोद्रेक कहा (हिन्दी साहित्य का इतिहास/पृ. 34)। वि‍डम्‍बना है कि‍ परवर्ती समय में भी यह धारणा बद्धमूल रही कि भक्ति-साहित्य अपने समय के आक्रमणों से आक्रान्त समाज की हताश वृत्तियों का चित्रण है। पर बाद के समय में हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे कुछ मनीषियों ने इस धारणा का खण्डन किया। सचाई है कि उक्त आक्रमण से हुए राजनीतिक पराभव और सांस्कृतिक विध्वंस का असर समाज के मनोभाव पर था, और कदाचित भक्ति-आन्दोलन के लिए उन परिस्थितियों ने ही पृष्ठभूमि तैयार की। पर यह भी सच है कि‍ वे परिस्थितियाँ हारे को हरिनामवाली नहीं थी, उसका उत्स हताशा और नकार भाव की जमीन पर नहीं था; उसकी भावभूमि प्रति-रक्षात्मक कदापि नहीं थी, वह पूरी तरह सकारात्मक, सृजनात्मक, और धनात्मक भाव से शुरू हुई थीं। हताशा से उठी हुई प्रति-रक्षात्मक धारणाएँ इतनी बलवती कभी नहीं हो सकती थी, इतना सुसम्बद्ध, उत्साहपूर्ण और सकारात्मक तो हो ही नहीं सकती थी। प्रति-रक्षा के प्रयाण में हर-हमेशा भयाकुल भाव समाया रहता है; जबकि भक्ति-आन्दोलन जीवनी-शक्ति के उल्लास और सुसम्बद्धता से भरा हुआ और सकारात्मक सोच से परिपूर्ण दिखता है।

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