देवशंकर नवीन
1.अनुवाद परम्परा की पहचान
2.अनुवाद और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य.
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अनुवाद परम्परा की पहचान
अनुवाद कार्य तब से कर रहा हूँ जब से स्रोत-भाषा और लक्ष्य-भाषा जैसे पदबन्धों की जानकारी नहीं थी। पर यह जानता था कि एक विषय सामने है, जिसे मुझे फिर से कहना है, अर्थात उस बिम्ब या पाठ का अनुकथन करना है। अनुकथन का सीधा सम्बन्ध लक्षित श्रोता/पाठक/प्रेक्षक/भावक से होता है। गरज यह, कि लक्षित वर्ग के लिए भाषा/संकेत का जो प्रकार्य बोधगम्य हो, उसमें कहना है। अनुवादक का दायित्व यहीं आकर सामने खड़ा होता है कि वह कहो, जो वस्तुतः पहले से कहा जा चुका है। अर्थात् अनुवाद कार्य अनुकथन है, पहले से कही हुई बात को फिर से कहना है। इस अर्थ में देखें, तो प्रारम्भिक समय में गुरुकुल में गुरुजनों द्वारा जो मूल पाठ की व्याख्या होती थी, अन्वय होता था, या कण्ठस्थ कराने हेतु एक ही पाठ बार-बार रटाया जाता था, वह अनुकथन भी अनुवाद की कोटि में ही आएगा।
इधर आकर अनुवाद का अर्थ थोड़ा रूढ़-सा हुआ है। सामान्यतया एक भाषा के पाठ को दूसरी भाषा में कहने अथवा लिखने के कार्य को अनुवाद कहा जा रहा है। पर थोड़ा पीछे जाएँ, तो अनुवाद का एक विराट रूप हमारे सामने होता है। वास्तविक अर्थो में जब कभी हम कुछ कह या लिख रहे होते हैं, जिसे हम अपना मौलिक वक्तव्य या लेखन कहते हैं, वह भी अनुवाद ही है। वह हमारे अनुभव, विचार अथवा प्रेक्षण परिणति का अनुवाद होता है। किसी शिल्पी की मूर्तियाँ, चित्रकार के कैनवस, रचनाकार की कृतियाँ, फिल्मकार की फिल्में, रंगकर्मी का रंगकर्म...सब के सब अपने पूर्व के पाठ, विचार, या अनुभव की अनुकृतियाँ ही होती हैं, जिनमें कथ्य की विधा बदल दी जाती है, और अभिप्रेत को अधिक से अधिक प्रभावी बनाया जाता है। यहाँ तक कि जब कोई शिक्षक अपने शिष्यों को, अभिभावक अपने अनुवर्तियों को, अथवा अधिकारी अपने अधीनस्थों को कोई जटिल प्रकरण समझा रहा होता है, तब भी वह अनुवाद ही होता है।
अनुवाद कार्य के व्याख्याकारों ने बीसवीं सदी को अनुवाद का युग कहा है। तर्क प्रायः यह रहा हो कि उक्त अवधि में ज्ञान की विभिन्न शाखाओं की पुस्तकों का विपुल मात्रा में अनुवाद हुआ और व्यापक स्तर पर दुनिया की विभिन्न भाषा-संस्कृति-ज्ञान सम्पदा से परिचय के कारण दुनिया की कई भाषाओं में नई-नई विधाओं का सृजन-पुनर्सृजन हुआ। वैसे कुछ विद्वान ईसा पूर्व तीन हजार के प्राचीन मिस्र के द्विभाषी शिलालेखों, ईसा पूर्व तीन सौ में ग्रीक लोगों के सम्पर्क में रोमन लोगों के आने पर ग्रीक से लैटिन अनुवाद, बारहवीं शताब्दी में स्पेन में इस्लाम के सम्पर्क से अरबी से योरोपीय भाषाओं में अनुवाद का उदाहरण देते हुए अनुवाद की परम्परा ढूंढते हैं।
तथ्य है कि ईसा पूर्व तीन हजार के आस पास असीरिया के राजा सरगोन ने अपनी विजय घोषणा का अनुवाद विभिन्न भाषाओं में करवाया। ईसा पूर्व इक्कीस सौ के आसपास सम्राट हम्मूरावी सरकारी आदेशों का अनुवाद कई भाषाओं में करवाते थे। ईसा पूर्व चार-पाँच सौ के आसपास यहूदी लोग हिब्रू भाषा के प्रवचनों का अनुवाद द्विभाषिए के सहयोग से आर्मेइक भाषा में करवाते थे और फिर उस तथ्य को समझते थे।
तथ्य है कि यूनानी गौरव-ग्रन्थों का अनुवाद पुनर्जागरण काल में विपुल मात्रा में हुआ। फ्रांस में सोलहवीं सदी में ही एतीने दोले ;म्जपमददम क्वसमजद्ध जैसे अनुवाद चिन्तक ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया; नौवीं से सोलहवीं सदी के बीच इंग्लैण्ड में अनुवाद की व्यवस्थित परम्परा बन गई।
विद्वानों की राय में अनुवाद चिन्तन की प्राचीन परम्परा भारत में अनुपलब्ध बताई जाती है और कारण बताया जाता है कि ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भारत प्राचीन काल में संसार का सिरमौर था। ज्ञान की सभी शाखाओं में जो भी नई जानकारी दुनिया भर में थी, उसका अनुवाद करने के बजाय भारत के चिन्तक उन ज्ञान सम्पदाओं को आत्मसात कर उसे मौलिक पद्धति से भारतीय संस्कार के साथ प्रस्तुत करना बेहतर समझते थे।
तथ्य है कि भारत का ज्ञान-कोश और भारत की चिन्तन-परम्परा पर्याप्त समृद्ध थी। पर भ्रम फैला हुआ है कि भारत में अनुवाद की परम्परा प्राचीन काल में लुप्त थी। वास्तविक स्थिति यह है कि भारतीय चिन्तकों की जीवन पद्धति प्राचीन काल में आज की तरह नहीं थी, पाश्चात्य विद्वानों की तरह अपने करतबों के सैद्धान्तीकरण की व्यवस्थित परम्परा यहाँ नहीं थी।
जिस कोटि के उदाहरणों से पश्चिमी अनुवाद-चिन्तन की परम्परा को सुव्यवस्थित बनाया जा रहा है, वैसे अनुवाद हमारे यहाँ वेद की रचना के तत्काल बाद से हो रहा है। ब्राह्मण, आरण्यक जैसे ग्रन्थ इसके उदाहरण हैं। थोड़ा आगे आएँ तो निघण्टु और निरुक्त तो अनुवाद के उपस्कर ग्रन्थ हैं। सच है कि जिस तरह भारत के ग्रन्थों का अनुवाद अरब अथवा चीन अथवा अन्य जगह के लोगों ने किया, भारत के लोगों ने उस काल में दूसरे देशों के ग्रन्थों का अनुवाद नहीं किया, लेकिन यहाँ अपनी भाषा पद्धति में ही इतनी तब्दीली आती गई कि अपने ही ग्रन्थों के अनुवाद और व्याख्या की आवश्यकता होने लगी। निघण्टु और निरुक्त तो उसके उदाहरण हैं ही, बाद के दिनों में जब लौकिक संस्कृत का चलन हुआ, तब ऋषि मुनि अपने शिष्यों को शिक्षा देते समय प्राचीन ग्रन्थों की जिस तरह व्याख्या करते थे, उसे भी अनुवाद की दृष्टि से देखा जाना चाहिए, जिसमें एक तरफ तो पद्य की गद्यात्मक व्याख्या थी, दूसरी तरफ उसके सरलार्थ थे। ऐसा समझा जाना चाहिए कि आधुनिक काल में भाषा-टीका ग्रन्थ का सूत्र वहीं से मिला होगा।
संस्कृत नाटकों के पाठ पर गौर करें तो साफ दिखता है कि नायक का सम्वाद संस्कृत में होता था, जबकि स्त्री और सेवक का प्राकृत में। वार्तालाप और कथोपकथन के दौरान समझ की जमीन तो अनुवाद पर ही आधारित रहती होगी। गुणाढ्य की प्रसिद्ध कृति बड्डकहा के संस्कृत अनुवादों को भी इस कोटि में रखा जा सकता है। इन सबके बाद से तो फिर सारानुवाद, भावानुवाद, छायानुवाद, टीका, व्याख्या आदि की शृंखला चल पड़ी।
लोग कहते आ रहे हैं कि धर्म, दर्शन, साहित्य की कृतियों की समझ बनाने के लिए अनुवाद की मूल आवश्यकता हुई। आंशिक रूप से यह सच भी हो सकता है, लेकिन यह प्राथमिक आवश्यकता नहीं है। उत्तरवैदिक काल के आरम्भ में जब विभिन्न जनपदों का स्वरूप स्थिर होने लगा था, उन दिनों आर्यीकरण के माध्यम से राज्यों के सीमा विस्तार की प्रवृत्ति विकसित हुई। समाज कृषि-विकास से वाणिज्य-विकास की ओर बढ़ चला। जलमार्ग तथा थलमार्ग से श्रेष्ठियों के सार्थ कैकेय से श्रावस्ती होते हुए चम्पा और राजगृह तक वाणिज्य के लिए यात्रा करते थे। इस क्रम में हरेक पड़ाव पर उन्हें आदान-प्रदान के लिए दुभाषिए की आवश्यकता होती थी। उनके हर पड़ाव से कम से कम एक सहयोगी अगले पड़ाव तक जाते थे, जो उन्हें थोड़ी सी तब्दीली के साथ वहाँ के भाषा-व्यवहार का परिचय देते थे और श्रेष्ठि जन क्रमशः उनके भाषा-उपक्रम से परिचित होते जाते थे।
इन साक्ष्यों के साथ मेरा निवेदन है कि यदि हिब्रू के प्रवचनों के आर्मेइक में पुनर्कथन अथवा असीरीया के राजा सरगोन की विजय-घोषणा को अनुवाद की प्राचीन परम्परा कहना उचित है, तो भारत में हुए इन कार्यों को भी अनुवाद की प्राचीन परम्परा का सूत्र माना जाना चाहिए।
भारत में वेद को श्रुति भी कहा जाता है। श्रुति परम्परा का सीधा सम्बन्ध लोक कथा, लोकगाथा, लोकगीत और लोक-नृत्य से भी है। श्रुति परम्परा में अनुकथन पद्धति अपने सभी उपादानों के साथ शामिल है। जाहिर है कि वेद की ऋचाएँ जब कही या गाई जाती होंगीं, अथवा लोक-कथाएँ जब सुनाई जाती होंगी, तब श्रोताओं/भावकों के लिए सम्प्रेषण बाधा दूर करने हेतु टीकाएँ भी होती होंगी। वैदिक आचार्य निश्चय ही अपने शिष्यों को ऋचाएँ पढ़ाते समय उन्हें समझाने के लिए उसकी टीका करते होंगे। इस आधार पर यह मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि भारत में अनुवाद की परम्परा उतनी पुरानी तो अवश्य ही है, जितनी वैदिक परम्परा, लोक परम्परा और सम्वाद परम्परा। सम्प्रेषण की स्पष्टता सुनिश्चित करने के लिए एक बात का कई बार, कई तरीके से, विभिन्न शब्दावलियों में कहा जाना भी अनुकथन ही है।
विदित है कि भारत में टीका, व्याख्या, अनुवाद का नैरन्तर्य सदा बना रहा। भारत को जानने के लिए वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत आदि के अनुवाद दूसरे देशों के लोग तो कर ही रहे थे, यहाँ भारत में ही उनके अनुकथन कई रूपों में हो रहे थे। अकेले रामायण का अनुवाद भारत की कई भाषाओं में हुआ, और आज की तारीख में वे सब अपनी-अपनी भाषा के महान ग्रन्थ माने जाते हैं। पुराकथाओं को आधार बनाकर विभिन्न भारतीय भाषाओं में बेहिसाब रचनाएँ की गई हैं। मुगल शासन-काल के लम्बे अन्तराल में इस दिशा में पर्याप्त काम हुए। दाराशिकोह और उनके गुरु राजशेखर का इस दिशा में अप्रतिम योगदान है। निकट अतीत में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, प्रेमचन्द जैसे महान अनुवादक हुए। इन सब के बावजूद कभी किसी विद्वान ने भारत में अनुवाद सिद्धान्त की कोई परम्परा विकसित नहीं की। इस कार्य को मुक्त रहने दिया। कभी अनुवाद सम्बन्धी अपनी मान्यताओं को संस्थापित या आरोपित करने का काम नहीं किया। ... अच्छा किया। भारत जैसे ज्ञानाकुल जनपद में ऐसा ही होना चाहिए था। बाद के दिनों में तो अनुवाद की आवश्यकता बहुफलकीय हो गई। नई दुनिया की नई जरूरतों के मद्देनजर विराट भौगोलिक परिवेश और बहुभाषिक नागरिक जीवन के आपसी सम्वाद की अकूत आवश्यकता दिखने लगी। जीवन-यापन के मूल और महत्त्वपूर्ण कारण विस्तृत और विविध हो गए। पर अनुवाद की प्राथमिक आवश्यकता प्रारम्भिक समय में व्यापार में सम्वाद और सम्प्रेषणीयता को लेकर ही दिख रही थी। भारत में धार्मिक सहिष्णुता प्रारम्भ से रही है। दूसरे जनपद में जाकर बर्वरतापूर्ण लूटपाट करना, उन पर शासन करना, उन्हें अपमानित करना, हेय समझना... आदि वृत्ति यहाँ के नागरिकों का कभी लक्ष्य नहीं रहा; सम्भवतः यह कारण भी हो कि भारतीय नागरिक के अनुवाद का विमर्श प्रारम्भ में मुख्यतः व्यापार और सामान्य सम्प्रेषण तक ही सीमित रहा, पर शीघ्र ही यह, ज्ञान की शाखाओं में साहित्य एवं दर्शन की ओर आया, और तेजी से आगे बढ़ता गया।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद तो अनुवाद कार्य के राजनीतिक उद्देश्य भी अत्यन्त प्रमुख और प्रखर हो गए। वैचारिक आदान-प्रदान, राष्ट्रीय सीमा की सम्वेदनशीलता, वैश्विक मैत्री की सम्विदाओं के मामले इतने महत्त्वपूर्ण हो गए कि व्यापारिक सम्वाद-सम्प्रेषण और सामाजिक सौहार्द की सीमा पारकर अनुवाद कार्य की भूमिका अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को रेखांकित करने लगी। विश्वव्यापी सांस्कृतिक, राजनीतिक, व्यापारिक, शैक्षिक सम्बन्ध; पत्रकारिता, साहित्य, कला, विचार-विमर्श, दर्शन, धर्म, शिक्षा, विज्ञान एवं तकनीकी उपलब्धि आदि के क्षेत्र में अद्यतन होने के लिए अनुवाद का उपयोग महत्त्वपूर्ण हो गया।
इधर विश्वग्राम की अवधारणा में गतिकता आई है। इसके सर्वतोभावेन विकास पर बल दिया जा रहा है। भारतीय संस्कृति के मूल में यह अवधारणा तो नीति के स्तर पर प्रारम्भ से ही है, और भारत के नागरिक ऐसा मानते भी आए हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ कहने वाले भारतीयों के लिए ‘उदार चरितानान्तु‘ की विशेषता बताई जाती रही है। भारतीय नागरिकों का यह ‘उदार चरित‘ प्रारम्भ से है। तभी तो यहाँ के नागरिकों ने बाहर से आए भिन्न-भिन्न संस्कृति के लोगों को न केवल स्वीकार किया, बल्कि उनकी संस्कृतियों और उनके रहन-सहन से अपने सम्मिलन का रास्ता तक अख्तियार कर लिया। इतिहास का अन्वेषण अथवा समाज-शास्त्रीय पद्धति की कसौटी पर भारतीय जीवन-मूल्य का अनुशीलन किया जाए तो इस बात का प्रमाण आसानी से मिल जाएगा।
विश्वग्राम की अवधारणा का मूल सूत्र अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बन्ध में ही दिखता है; और विश्व फलक पर संस्कृति की यह समझ एक मात्रा अनुवाद के जरिए सम्भव है। इस बात को मानने में कतई कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि किसी व्यक्ति के एक कथन का किसी एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करने का अर्थ केवल उस कथन का अनुवाद नहीं है। उसमें वस्तुतः यह जानने की लगातार चेष्टा होती है कि उस कथन का पाठ क्या है, उस पाठ की व्यंजना क्या है, व्यंजना का उद्देश्य क्या है, कथन की शैली क्या है (शालीन, आक्रामक, निवेदन, सलाह, धमकी, सम्मान्य, अभद्र...आदि), कथन की शब्दावली कैसी है, वाचक किस देश-काल-पात्र की पर्यवस्थिति में है, वाचक की वैयक्तिक-वैचाारिक -मानसिक-पदेन हैसियत क्या है, कथन से वाचक और सम्बोध्य का सम्बन्ध क्या है... इन तमाम सवालों से जूझते हुए अनुवादक को अनुवाद करते समय सारी गुत्थियाँ सुलझानी पड़ती हैं। जब कभी हम अनुवाद करने बैठते हैं, केवल उस पाठ की भाषा नहीं बदलते, उस प्रसंग को दूसरी भाषा में देते हुए एक साथ कई बातों का ध्यान हमें रखना पड़ता है। शब्द-संस्कार, वाक्य संरचना, कथ्य का वातावरण, प्रसंग की संस्कृति, वाचक की सर्वांगीण पहचान से संचालित उसकी अभिव्यक्ति शैली... तमाम बातों के मद्देनजर लक्ष्य-भाषा से स्रोत-भाषा में किसी पाठ का भाषान्तर करते समय सचेत रहना पड़ता है।
इसी क्रम में इस बात की चर्चा भी समीचीन होगी कि अनुवाद को ज्ञान की किस शाखा में रखा जाए। लम्बे समय से विश्व भर के अनुवाद चिन्तकों के बीच इस बात पर बहस होती रही है, मतैक्य का अभाव होना जायज है। डा. भोलानाथ तिवारी, ई.ए.नाइडा, विल्स बेल्फ्रेम आदि ने अनुवाद को विज्ञान माना; डा. एन. ई. विश्वनाथ अय्यर, डा. कैलाश चन्द्र भाटिया, ड्राइडन, थ्योडोर सेवरी आदि ने इसे कला माना; डा. गोपाल शर्मा, शैटक रोजर, ऐरोस्मिथ आदि ने इसे शिल्प माना; डा. जी. गोपीनाथन जैसे कुछ चिन्तकों ने मध्यम मार्ग अपनाते हुए इसे ‘वैज्ञानिक कला‘ माना। वैसे तो डा. गोपीनाथन के तर्क से सहमत होने के पर्याप्त प्रमाण हैं, पर मेरी राय में यह चर्चा, बहस तक ही सीमित रहे तो बेहतर है, क्योंकि ‘अनुवाद कार्य‘ जैसे उद्यम पर आज जितना दायित्व आ गया है, उसे किसी सीमा में बाँधना दुस्कर है। ज्ञान की किसी भी एक शाखा की परिधि अनुवाद के दायित्व को पूरी तरह समेट पाने में विफल हो जाएगी। यदि अनुवाद को सिर्फ विज्ञान मानते हैं, तो जाहिर है कि वह उस अर्थ में विज्ञान नहीं होगा, जिस अर्थ में भौतिक विज्ञान का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त, अथवा रसायन शास्त्र की रसायनिक प्रतिक्रिया अथवा जीवविज्ञान की प्रजनन व्यवस्था है। वह विज्ञान है, भाषा विज्ञान की पद्धति में, जहाँ यह निर्धारित है कि अनुवाद के दौरान भाषा विज्ञान के नियमानुसार कोई अनुवादक सबसे पहले पाठ का विश्लेषण करता है, फिर उसका विकोडीकरण करता है, पुनर्सृजन के दौरान फिर उसका कोडीकरण करता है, और फिर लक्ष्य भाषा के पाठ को सजाता-सँवारता है। अनुवाद कार्य की इस बौद्धिक प्रक्रिया में बौद्धिक एवं विज्ञान सम्मत प्रयुक्तियों का भरपूर इस्तेमाल होता है। पर मात्रा इस कारण इसे सिर्फ विज्ञान के खाते में सीमित रखना उचित नहीं है। ऐसा करने से इसका कला पक्ष पीछे छूट जाएगा, जिसके अभाव में अनुवाद विश्वसनीय तो हो जा सकता है, पर उसके निष्प्राण होने की पूरी सम्भावना बनी रहेगी। विज्ञान को मोटे तौर पर परिभाषित करते हुए इसे विषय विशेष का व्यवस्थित और परिभाषित ज्ञान (Systematic and formulated knowledge)अथवा विषय विशेष के ज्ञानार्जन की सुगठित निकाय (organised body of the knowledge on subjest) कहा गया है। इस अर्थ में तो विज्ञान की परिभाषा इतनी उदार और विराट है कि ज्ञान की सभी व्यवस्थित शाखाएँ इसमें आ जाएँगी। इन अर्थों में हम चाहें तो अनुवाद को विज्ञान मान भी लें। पर ध्यान रखना होगा कि अनुवाद सिर्फ विज्ञान नहीं है। इस विवेचन में ई.ए.नाइडा से पूरी तरह सहमत हुआ जा सकता है कि Translation is far more than a science. It is also a skill, and the ultimate analysis fully satisfactory translation is always an art. इस सन्दर्भ में डा. नगीन चन्द्र सहगल का कहना समीचीन है कि ‘अनुवाद प्रक्रिया में विज्ञान, साधना में शिल्प तथा सिद्धि में कला है।’
सही है कि अनूदित पाठ की संरचना एक बौद्धिक प्रक्रिया से गुजरकर तैयार होती है, पर उसके अन्तिम स्वरूम तक पहुँचने में अनुवादक का कौशल कई स्तरों पर क्रियाशील रहता है। मूल पाठ और मूलवाचक की समग्र मौलिकता को ध्यान में रखते हुए लक्ष्य भाषा और लक्षित भावक की ग्राह्यता के मद्देनजर अनुवादक अपने विराट दायित्व के अधीन बहुत कुछ करता है। पूर्व में चर्चा हो चुकी है कि किसी एक व्यक्ति के किसी एक कथन का, किसी एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद का अर्थ केवल उस पाठ और पाठ के शब्दों का अनुवाद नहीं होता, बल्कि उस वाचक के पूरे वजूद का अनुवाद होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से उस कथन के भीतर अन्तःसलिला शक्ति के रूप में उपस्थित होता है। अनुवाद कर्म से जुड़े हर व्यक्ति जानते हैं कि बेहतर अनुवाद प्रस्तुत करने के क्रम में कई बार, मूल पाठ के अप्रत्यक्ष, और भौतिक रूप से अलक्ष्य दायित्वों के अनुपालन हेतु सांस्कृतिक अन्तरण में कुछ बातें लुप्त हो जाती हैं और कुछ नई बातें आ भी जाती हैं। लोप और आगम की इस क्रिया की गुणवत्ता और मात्रा, अनुवादक के कौशल और प्रतिभा पर निर्भर करती है। सम्भवतः इसी धारणा के तहत एतीने दोले (Etienne Dolet) ने अनुवादक के लिए शर्त रखी कि उसे मूल रचना के भाव और लेखक के प्रयोजन का पूर्ण ज्ञान तो होना ही चाहिए, स्रोत-भाषा और लक्ष्य-भाषा का पर्याप्त ज्ञान भी उसे होना चाहिए, अर्थ एवं अभिव्यंजना की रक्षा के लिए शब्दानुवाद से बचना चाहिए तथा मूल रचना के भाव एवं प्रभाव की समग्रता की रक्षा करनी चाहिए। ड्राइडन ने तो भावानुवाद को ही सर्वोत्तम अनुवाद माना है।
लेकिन भाषा-विज्ञान की इस पद्धति और बौद्धिक प्रक्रिया से तैयार हुई अनूदित संरचना को अनुवाद का अन्तिम और निर्णीत पाठ नहीं माना जा सकता। कई महान और कालजयी कृतियों का अनुवाद करते हुए बड़े-बड़े अनुवाद-चिन्तकों ने इस कर्म को पुनर्सृजन कहा है। जाहिर है कि पुनर्सृजन में भाषान्तर के दौरान अनुवादक को थोड़ी छूट मिल जाती है, पर यह भी सच है कि वह आजाद नहीं हो जाता। थोड़ी-सी छूट के साथ-साथ मूल पाठ और रचनाकार के साथ बँधे रहने की उसकी मजबूरी बढ़ जाती है। प्रो. जी गोपीनाथन इसी पद्धति के दौरान इस कर्म को वैज्ञानिक कला कहते हैं। उनका मानना है कि ‘सहज समतुल्यता‘ की खोज में अनुवादक को अक्सर पुनर्सृजन करना पड़ता है। उनका मानना है, और सही ही मानना है कि हर भाषा की अपनी प्रकृति एवं विशेषताएँ होती हैं और हर लेखन की अपनी अभिव्यक्ति शैली होती है। चूँकि अनुवाद केवल शाब्दिक भाषान्तर नहीं, एक पुनराभिव्यक्ति है, जो अनुवादक की कल्पना, भाव-प्रवणता, मूल से प्रभावित होने के उनके स्तर, लक्ष्य भाषा की प्रकृति, सहज-ज्ञान एवं कलाशीलता के अनुरूप होती है। जैसा कि पूर्व में कहा गया, जिस तरह हरेक मूल कथन में उसके वाचक/प्रस्तोता के व्यक्तित्व का कत्र्ता, करण, सम्प्रदान आदि शामिल होता है, उसी प्रकार अनूदित पाठ में भी, मूल पाठ के प्रति तमाम निष्ठा रखे रहने के बावजूद अनुवादक का व्यक्तित्व भी शामिल होता है। प्रो. गोपीनाथन का मानना तर्कसंगत है कि मूल कृति की आत्मा को और मूल कृति में प्रतिबिम्बित मूल लेखक के व्यक्ति के प्रभाव को भी अनुवाद में उतारना अभीष्ट होता है और इस शर्त की पूर्ति की क्रिया स्वयं में ही कला है। प्रो. गोपीनाथन कहते हैं कि कृतिकार के साथ पूर्ण रूप से तदाकार होकर उसकी आत्मा को पहचानने का काम वही कर सकता है जिसमें कलाकार जैसी सम्वेदना हो, सहानुभूति हो। यह कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है कि दुनिया के श्रेष्ठ अनुवादक, श्रेष्ठ मौलिक कृतिकार भी थे...। प्रो. गोपीनाथन की उक्ति को एन. महापात्रा के कथन से और बल मिलता है कि कलाकर की छठी इन्द्रिय अथवा सहज ज्ञान ही है जो कृति के सौन्दर्य बिन्दु को पहचानकर उसका सम्प्रेषण कर देता है।
अर्थात्, अनुवाद कार्य अपनी पूरी प्रक्रिया में विज्ञान भी है, कला भी है, शिल्प भी है। इन सभी तर्को के बावजूद यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अनुवाद कार्य की वृहत्तर आवश्यकता द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद महसूस की गई, जब दुनिया भर के लोगों में सम्पर्क सूत्र का विस्तार हुआ। विभिन्न राष्ट्रों के बीच राजनीतिक, आर्थिक समीकरण बनने/बढ़ने लगे। व्यापारिक सम्बन्ध बढ़े, सांस्कृतिक आदान-प्रदान होना आवश्यक हो गया। इन्हीं आवश्यकताओं के बीच अनुवाद कार्य की दक्षता और गम्भीरता महत्त्वपूर्ण हो उठी। शिक्षण पद्धति में ज्ञान की शाखाएँ इतनी बढ़ गईं, जानकारी अर्जन के सूत्र इतने बहुभाषिक हो गए कि अपने समय का सचेत नागरिक कहाने के लिए, और आत्म-स्थापत्य के आयुध जुटाने के लिए अनुवाद की ओर लोगों का रुझान उनकी मजबूरी हो गई। इस सन्दर्भ में ज्ञान की शाखा के रूप में अनुवाद अध्ययन एवं प्रशिक्षण, और ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में दक्षता प्राप्त करने के लिए अनुवाद अध्ययन एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता-- दोनों महत्त्वपूर्ण हो उठीं।
हिन्दी तो राजभाषा है, इसलिए भारत के हरेक सरकारी-गैरसरकारी दतरों में अंग्रेजी समेत अन्य भाषाओं के अभिलेखों का इसमें अनुवाद होना आवश्यक है, लेकिन इससे अलग भी नजर डालें, तो कई बातें सामने आती हैं। इस सत्य को स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि जिस तरह प्रकाशन व्यवसाय ने उच्च कुलोद्भव पण्डितों के वर्चस्व से शिक्षा को मुक्त कराकर आम नागरिक में ज्ञानालोक फैलाया, उसी तरह, अनुवाद वृत्ति ने भी उच्च शिक्षितों और बहुभाषाविदों के वर्चस्व से ज्ञान की शाखाओं को मुक्त किया। इतने बड़े संसार की बात तो दूर, अभी तक यह भी सम्भव नहीं हो पाया है कि लोग अपने देश की सभी भाषाओं में उपलब्ध सामग्री को पढ़ लिख सकें। भारत जैसे बहुभाषिक देश में तो यह दुस्कर ही लगता है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौर के कुछ बुद्धिजीवियों और उनके बाद की पीढ़ी के लोगों में तो थोड़ा बहुत बहुभाषिक ज्ञान था भी, पर बाद के लोगों ने तो त्रिभाषा फारमूला से ही काम चलाया। अपवाद स्वरूप कुछ लोग अवश्य होंगे। पर हैरत की बात अभी भी है कि कन्नड़ से असमिया, या मलयालम से ओड़िया आदि में सीधे अनुवाद करने वालों की अनुपलब्धता बनी हुई है। भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद कार्य के लिए अभी भी अधिकांश स्थितियों में अंग्रेजी, या हिन्दी को सेतुभाषा के रूप में उपयोग में लाया जाता है। इन परिस्थितियों में हिन्दीभाषी क्षेत्र की जनता आज शिवराम कारन्त, या अक्का महादेवी, या सन्त ज्ञानेश्वर, या तुकाराम, या यू. आर. अनन्तमूर्ति, या फकीर मोहन सेनापति, या ऐसे किसी भी महान रचनाकार की रचनाओं के जरिए उस जनपद की संस्कृति से परिचित हो पाता है; या फिर फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, अफ्रीका, जापान की कला, साहित्य, संस्कृति अथवा वैज्ञानिक-प्रौद्योगिक-राजनीतिक उपलब्धियों से परिचित हो पाता है, तो इसका श्रेय अनुवाद को ही जाता है। यहाँ तक कि परराष्ट्र अथवा प्रान्तेतर भाषा-क्षेत्र के विभिन्न संकायों में जो कुछ महत्त्वपूर्ण होता है, और वहाँ के संचार माध्यमों में इसकी चर्चा होती है, तो उन खबरों की जानकारी भी विश्व फलक पर अनुवाद के माध्यम से ही पहुँचती है। इस अर्थ में खबरों का अनुवाद, खुद अनुवाद कार्य के लिए महत्त्वपूर्ण हो उठती है और अन्य भाषा क्षेत्र के लोग उन कृतियों के अनुवाद की ओर उन्मुख होते हैं। ज्ञान के क्षेत्र में लोकतन्त्र की इस बहाली का श्रेय आज अनुवाद को ही जाता है कि कोई ऐसा नागरिक, जो रूसी या फ्रेंच या जर्मन नहीं जानता, यहाँ तक कि भली भाँति अंग्रेजी भी नहीं जानता, पर वह आज मैक्सिम गोर्की, दोस्तोयवस्की, सिमोन द’ बुआ, हावरमास, कामू, काका, ग्राम्सी, गुण्टर ग्रास, इलियट, गेटे की बात कर सकता है।
अनुवाद के जरिए ही हम अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बन्ध और राजनय को सुनिश्चित कर पाते हैं। हमारे राष्ट्र के हितैषी हमारे पक्ष में कहीं कुछ बोलते हैं, अथवा हमारे विपक्ष में कुछ योजना गढ़ते हैं, तो अनुवाद ही ऐसा साधन है कि हम उससे वाकिफ हो पाते हैं। वैसे तो प्रशासन, पत्राचार, न्यायालय, शिक्षा, धर्म, शोध, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, फिल्म एवं जन संचार, साहित्य-कला-संस्कृति एवं भाषा शिक्षण, राजनय, प्रतिरक्षा आदि में अनुवाद का महत्त्वपूर्ण योगदान है पर इस योगदान के साथ-साथ इसकी सम्वेदनलशीलता भी बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है। न केवल राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय सम्बन्धों एवं राजनय को लेकर, बल्कि भारतीय परिपे्रक्ष्य में आन्तरिक मामलों के लिए भी सम्वेदनशीलता बहुत बढ़ गई है। वैचारिक संघर्ष इतने सूक्ष्म हो गए हैं, और वक्तव्यों में विम्ब-प्रतीक के प्रयोग इतने प्रभावी हो गए हैं कि छोटे-छोटे कथन की व्यंजना विराट होने लगी है। इस परिस्थिति में इस दायित्वपूर्ण उपक्रम का दायित्व बड़ा जोखिम भरा हो गया है, इसलिए इसमें सावधानी की अपेक्षा भी अधिक की जाने लगी है।
अध्यापन कार्य में अनुवाद का वृहत् योगदान वेदकालीन संस्कृत से लेकर आज तक की विभिन्न भारतीय भाषाओं में, वस्तुतः दूसरे देशों की भाषाओं में भी रहा है। उसकी विधि अन्वय, व्युत्पत्तिपूलक व्याख्या, सरलार्थ, भावानुवाद, सम्पूर्ण अनुवाद, जो भी हो; ज्ञानार्जन में इसके विभिन्न रूपों का योगदान होता रहा है। बाहुभाषिकता अथवा मूल पाठ की अर्थ-जटिलता की विडम्बनाओं से उबरने के लिए अनुवाद और उसकी विधियाँ काम आती रही हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद और फिर भारतीय स्वाधीनता के बाद से दुनिया भर के देशों का जिस तरह आपसी सम्बन्ध बना, उसमें अनुवाद की महत्ता विराट हो गई। अनुवाद प्राचीन काल से अध्यापन कार्य में सहायक होता आ रहा है। मराठी के प्रख्यात उपन्यासकार गंगाधर गाडगिल ने भी अपने ऐतिहासिक उपन्यास प्रारम्भ में सबल साक्ष्यों के साथ इस बात ही जानकारी दी है। ब्रिटिश शासन के दौरान समाज के शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक विकास के लिए अनुवाद किस तरह अपरिहार्य घटक बन गया था, इसका प्रामाणिक विवरण वहाँ दिया गया है। हमारे गौरव-ग्रन्थों का जो अनुवाद फिरंगियों ने अपनी भाषा में किया, व्यापक अर्थो में उसका सम्बन्ध भी शिक्षा-शास्त्र से ही है। वस्तुतः वे हमारी सांस्कृतिक, धार्मिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि की जानकारी हासिल करना चाहते थे। अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर भारतीय नागरिकों के बारे में वे जितनी जानकारी हासिल कर उसके आधार पर उन्हें पूरी तरह विश्वास हो गया था कि ये भारतवासी अपनी विपन्नता में भी सम्पन्न ही दिखते रहेंगे। भूखे रहकर भी इनका सर नहीं झुकेगा। तब जाकर उन्होंने तय किया कि इसके सम्मान और मनोबल को ध्वस्त करना जरूरी है, और ऐसा करने के लिए उनकी सांस्कृतिक विरासत की सूक्ष्मताओं को जानना जरूरी है, उनके मनोबल को तोड़ने का सूत्र उनकी संस्कृति और रहन-सहन को जाने बगैर नहीं मिल सकता। उस हाल में उसने हमारे धार्मिक-पौराणिक ग्रन्थों का अनुवाद कर हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत पर आघात कर, अपने धर्म और अपनी संस्कृतियों के वर्चस्व की दुहाई दी, और हमारे यहाँ की जनता का मनोबल तोड़ना शुरू किया। गंगाधर गाडगिल के उपन्यास प्रारम्भ में इन बातों का जिक्र भी विस्तार से है। ध्यान रखने की बात है कि उपन्यास यथार्थ नहीं होता, पर हर ऐतिहासिक उपन्यास समकालीन और वर्णित देश-काल की चित्तवृत्ति की कथा अवश्य कहता है। समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार, वणिक् वृत्ति के विकास, सामाजिक उत्थान, प्रगति के प्रति आम नागरिक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, परम्परा के सम्पोषण और रूढ़ि से मुक्ति, संचार माध्यमों के सीमित संसाधनों से जनजागरण का अलख, स्त्री शिक्षा के प्रति जागरूकता और छूआछूत से छुटकारा... इन तमाम बातों की नींव उस दौर में पड़ी थी और अनुवाद कार्य ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी।
पर शिक्षा-शास्त्र के क्षेत्र में अनुवाद के महत्त्व का सर्वाधिक उछाल औद्योगिक क्रान्ति के बाद ही दिखता है। विश्व भर का मानचित्र वैज्ञानिक अवदान के कारण सिमट गया। ज्ञान-विज्ञान की कई शाखाओं का विकास हुआ। विषय विशेषज्ञता ही आवश्यकता महसूस होने लगी। ज्ञान सम्पदा का आदान-प्रदान वृहत् पैमाने पर होने लगा। परराष्ट्र की प्रतिभाओं का उपयोग शुरू हुआ। ज्ञानार्जन और अर्जित ज्ञान के उपयोग से अर्थोपार्जन की स्वाधीनता बढ़ गई। इन तमाम क्रिया-कलापों के विकास से अनुवाद का फलक बढ़ गया। और, अनुवाद परम्परा की हमारी प्राचीन पद्धति थोड़ी अक्षम दिखने लगी। ज्ञानलोक और चिन्तन-पद्धति के विकास के कारण विषय उपस्थान में सम्वेदनशीलता इतनी बढ़ गई कि अर्थ का अनर्थ होने की सम्भावना दिखने लगी। प्राचीन समय में अनुवाद के नाम पर जो टीका, व्याख्या, सारांश प्रस्तुत किया जाता था, उसमें मूल पाठ का बहुत कुछ खर्च हो जाता था। नई भाषा में आए हुए पाठ में कुछ आमदनी भी हो जाती थी। वैसे, आज भी अनुवाद क्रिया में इन सम्भावनाओं से बचा रह पाना मुश्किल है।
इसका सबसे बड़ा कारण होता है दोनों भाषाओं की अपनी सांस्कृतिक पहचान। हर क्षेत्र की भाषा और संस्कृति वहाँ के इतिहास भूगोल और विरासत से सम्पोषित होती है। उस क्षेत्र की आवोहवा, वहाँ की जलवायु, वहाँ का वातावरण...सब मिलकर ही वहाँ के मनुष्य का तन और मानस रचा होता है। आचरण, आदत में; आदत, रहन-सहन में; रहन-सहन, प्रथा में; प्रथा संस्कृति में...जिस लम्बी जीवन व्यवस्था में परिवर्तित होता है, वह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया होती है। दो भाषा क्षेत्रों की जटिल जीवन व्यवस्थाओं का तालमेल कराने में बड़े-से-बड़े महारथी कई बार विवश हो जाते हैं। अनुवाद कार्य के दौरान कुछ लोप और आगम (Loss and Gain)की स्थिति ऐसी ही विवशता में उत्पन्न होती है। वस्तुतः यह स्थिति किसी सिद्ध अनुवादक के लिए सबसे बड़ी चुनौती की स्थिति होती है।
पर आज के समय में, जब अनुवाद-कला का विराट महत्त्व प्रमाणित हो चुका है और विश्व फलक पर इसकी आवश्यकता दिख रही है, ज्ञान की शाखा के रूप में इसकी मान्यता बन चुकी है, इस पर कई दिशाओं से सोचने की आवश्यकता हो गई है।
बहुभाषिकता और विभिन्न राष्ट्रों के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक, सांस्कृतिक सम्बन्ध तथा सीमावर्ती स्वायत्तता से सम्बन्धित राजनय के मद्देनजर अनुवाद की महत्ता अनिवार्य और दायित्त्वपूर्ण हो गई है। इस रास्ते शिक्षण पद्धति में इसका प्रवेश गम्भीरता से हुआ है। शासन-व्यवस्था, संचार-माध्यम, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, राष्ट्रनिर्माण, मानवीय सौहार्द, वाणिज्य, उद्योग-धन्धा, प्रबन्धन-पद्धति, कला-साहित्य-सांस्कृति, विचार विनिमय आदि के क्षेत्र में आज अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर अनुवाद की उपयोगिता इतनी अधिक बढ़ गई है कि इसके बिना ये सारे तन्त्र अपंग साबित होने लगे हैं। इधर शिक्षा के क्षेत्र में विशेषज्ञता की माँग इतनी बढ़ गई है कि इन सभी दिशाओं में विभिन्न संस्थानों में उच्चतर शिक्षा दी जाने लगी है। जाहिर है कि अनुवाद के सूक्ष्मतर उपयोग के बिना ये सारे अपूर्ण होंगे। भारत जैसे बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक देश में तो इसकी महत्ता और भी विशिष्ट हो गई है।
नायडा, न्यूमार्क, बाथगेट जैसे अनुवाद चिन्तकों ने स्रोत-भाषा के पाठ से लक्ष्य-भाषा के पाठ तक की यात्रा में एक बेहतर अनुवाद के लिए विश्लेषण, बोधन, समन्वयन, संक्रमण, पुनर्गठऩ.... जितने भी पड़ाव तय किए हैं; उन सब में बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है। हर समय और हर विषय-प्रसंग का चिन्तक अपने अनभव प्रतिभा और जीवन-दृष्टि के आधार पर कोई सिद्धान्त तय करता है। जरूरी नहीं कि वह सिद्धान्त सब के लिए सभी परिस्थितियों में सफल साबित हो। कई बार तो सिद्धान्तकर्ता कुछ समय बाद अपने ही मत को खुद खण्डित कर नए मत प्रस्तावित कर देते हैं। हमारे यहाँ तत्सम शब्दों का अन्वय विश्लेषण और शब्दों की व्युत्पत्ति प्रक्रिया ढूँढने के क्रम में पाठ की समझ विकसित करने की मंशा ही शामिल रहती है। अध्यापन, विवेचन, विश्लेषण, शास्त्रार्थ, कथावाचन आदि समस्त शैक्षिक, बौद्धिक, शास्त्रीय, लौकिक आदि उपक्रमों में अथवा सामाजिक रूप से पंचायत व्यवस्था में, वैचारिक आदान-प्रदान में, इन प्रक्रियाओं का उपयोग भारतीय पद्धति में होता आया है।
संस्कृत समस्त आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी है, इसके बावजूद आज भारतवर्ष में शताधिक भाषाएँ/उपभाषाएँ वजूद में हैं। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में ही बाइस भाषाएँ स्वीकृत हैं। हर भाषा का अपना खास वातावरण और अपनी विलक्षण व्यवहार शैली एवं संस्कृति है। सभी भाषाओं के साहित्य उस जनपद के जनजीवन की चित्तवृत्तियों से सराबोर है। यह भी सच है कि भारतीय नागरिकों की जीवन-शैली सदा से ज्ञानाश्रित रही, ज्ञानोन्मुख विषयों पर यहाँ सदा विचार-विमर्श होता रहा। व्यापार की दिशा में इस राष्ट्र में कभी उग्रता नहीं रही, उसे यहाँ कभी प्रतिस्पद्र्धा की दृष्टि से नहीं देखा गया, यह उपक्रम जीवन की एक सामान्य क्रिया मात्रा रहा। इस राष्ट्र के बुद्धिजीवियों के चिन्तन का केन्द्रीय विषय मानवीयता ही बना रहा। धर्म, दर्शन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ज्यामिति, और रमल-शास्त्र यहाँ की चिन्तन परम्परा का मुख्य लक्ष्य रहा। और, इस दिशा में यहाँ पर्याप्त कार्य भी हुए। इस सम्पूर्ण विरासत में वैदिक संस्कृत से लेकर उत्तरवैदिक संस्कृत/ लौकिक संस्कृत, और फिर आधुनिक भारतीय भाषाओं की विकास प्रक्रिया तक में लगातार परिवर्तन होता रहा। विश्लेषण, अन्वय, टीका, व्याख्या की अनेक सरणियों से न केवल सर्जनात्मक साहित्य, बल्कि जीवन व्यवस्था के अधीन ज्ञान के सभी संकायों में अनुकथन, पुनर्कथन की दीर्घ परम्परा बनी रही। अकेले ब्रिटिश शासन काल की भारतीय जीवन पद्धतियों का सूक्ष्मता से अनुशीलन किया जाए तो इस प्रसंग में शोध और विश्लेषण की विराट सम्भावनाएँ उपस्थित हो जाएँगीं। इस पूरी व्यवस्था में, करते जाने के इतने बड़े-बड़े लक्ष्य, इस राष्ट्र के बुद्धिजीवियों के समक्ष आते गए कि उन्हें अपने किए हुए कार्यों का गीत गाने की सुविधा नहीं मिल सकी। इससे अलग यह भी कि यहाँ के चिन्तकों के लिए अनुकथन/पुनर्कथन/पुनप्र्रस्तुति के क्रम में बोधन, विश्लेषण, अन्वय, व्यख्या के जितने कार्य करने पड़े, उन सबको हमारे पूर्वजों ने अपनी दिनचर्या का एक अंश मानाए इतिहास की कोई घटना नहीं। अनुवाद अध्ययन के क्षेत्र में भारतीय चिन्तन परम्परा को यदि इस पद्धति से रेखांकित किया जाए, तो इसकी लम्बी परम्परा का सूत्र हमारे सामने होगा। कीर्ति-स्तम्भ स्थापित करने की परम्परा तो भारत में भी रही है। पर राजाओं के यहाँ; बुद्धिजीवियों/चिन्तकों की मण्डली में नहीं, इनके यहाँ तो ज्ञान-चर्चा ही सर्वाधिक महत्त्व का विषय बना रहा। देर तक तो शिक्षा व्यवस्था भी अभ्यास और मौखिक परम्परा से चलती रही। पर आज के समय में अनुवाद की स्थिति बदल गई है। भाषा और संस्कृतियों की विविधता के मद्देनजर विश्व फलक पर कई प्रसंग सामने हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के साथ मनुष्य की विचार-व्यवस्था में बड़ा परिवत्र्तन हो गया है। विज्ञान के अवदान और मनुष्य के ज्ञान की परिणतियाँ, विध्वंसक उपलब्धियों के इर्द-गिर्द घूमने में विश्वास करने लगी हैं। राजनय और कूटनीतिक स्थितियाँ बदल गई हैं। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को लेकर वैचारिक संघर्षों को लेकर, विचार-व्यवस्था पर्याप्त व्याख्येय और बहुअर्थी व्यंजना से परिपूर्ण हो गई है। जाहिर है कि अनुवाद जैसे कार्य आज अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो गए हैं।
अनुवादक अथवा अनुवाद चिन्तक के रूप में प्रशिक्षित होने के लिए वैश्विक फलक पर उक्त सारी बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। अनुवाद अध्यापन के क्रम में कक्षा-अध्यापन और पाठ्यक्रम का विकास करते हुए आज यह सोचना बहुत आवश्यक हो गया है कि जिन दो भाषाओं के बीच यह सम्बन्ध हो रहा है, उनके अपने अन्तस्सम्बन्ध भी अपनी-अपनी जगह रक्त-शिराओं की तरह फैले हुए हैं। मूल पाठ का बोधन, विश्लेषण करते हुए वाचक/प्रस्तोता की बौद्धिकता और विषय वस्तु के बारे में उसकी समझ से लेकर लक्ष्य-भाषा के भावक की ग्रहण-शक्ति तक की चिन्ता करना; दोनों पाठों में अन्तःसलिल धारा की तरह अलक्ष्य, किन्तु विद्यमान संस्कृति और परिवेश का आरोपण करना कितना मुश्किल, और कितना जरूरी है--पाठ्यक्रम विकास के क्रम में इस बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। इन सावधानियों से निरपेक्ष रहकर कोई भी व्यक्ति बेहतर तो क्या, सामान्य अनुवादक या अनुवाद चिन्तक भी नहीं हो सकता। अनुवाद का लापरवाह अर्थ लगाने वाले व्यक्ति के बारे में निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि वे अनुवाद के विभिन्न रूपों में से हर एक को समग्र मानने की भूल कर रहे हैं। आज की तारीख में विश्वसनीय अनुवाद और बात है, और बेहतर अनुवाद और। विश्वसनीय अनुवाद पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति ही ‘गिव द आनर गेट द आनर‘ का अर्थ ‘इज्जत दो, इज्जत लो‘ लगाते हैं, या ‘प्योर काउ मिल्क इज एवलेवल हेयर‘ का अर्थ ‘यहाँ शुद्ध गाय का दूध उपलब्ध है‘ लगाते हैं। इन पंक्तियों का अनुवाद कोशीय अर्थो में गलत नहीं है। लेकिन पाठ्यक्रम विकास के क्रम में यही उदाहरण सहायक साबित होता है कि अनुवाद कार्य अथवा अनुवाद चिन्तन के समय भाषा-विज्ञान, भाषा का सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य, वाचक/उद्घोषक का ध्वनि-प्रयोग, मुहावरा-लोकोक्ति, बिम्ब-प्रतीक किस तरह का चमत्कार उत्पन्न करता है। ये किसी पाठ के वैसे वैशिष्ट्य हैं, जिनकी जानकारी के अभाव में पाठ विरूपित हो जाता है।
इन दिनों मशीनी अनुवाद पर भी तल्लीनता से काम हुआ है। उस काम की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन पाठ्यक्रम में इसका उल्लेख होना भी आवश्यक है कि मशीनी अनुवाद की अपनी सीमा है। मशीनी अनुवाद उसी पाठ का सम्भव है, जिसके प्रस्तोता मूल पाठ ही इस धारणा से प्रस्तुत करें कि इसका मशीनी अनुवाद होना है। अमिधा शक्ति के अतिरिक्त किसी और भाषा-ध्वनि का प्रयोग उसमें न हो। वर्ना मशीनी अनुवाद का सम्पादन एक जंजाल बन जाता है। वैसे भी किसी भ्रष्ट अनुवाद को सुधारने से बेहतर कार्य फिर से अनुवाद करना होता है।
इसी तरह हर भाषा-क्षेत्र की संस्कृति और शब्द-संस्कार का ध्यान रखना आवश्यक है। मिथिलांचल के ब्राह्मण माँस-मछली खाते हैं, जबकि शाकद्वीपीय ब्राह्मण माँसाहार वर्जित रखते हैं। छोटानागपुर में नानी-नाती के बीच हास-परिहास का रिश्ता होता है, बिहार में आदर और लिहाज का। बिहार में जीजा-साली में परिहास चलता है, केरल में भाई-बहन की तरह लिहाज किया जाता है। दिसम्बर माह में दिल्ली में पुरजोर ठण्ड पड़ती है। कोचीन में एअर कण्डीशन चलाना पड़ता है। अब मैथिली के किसी पाठ का अनुवाद यदि हिन्दी में हो, नागपुरी का अनुवाद मैथिली में हो, हिन्दी का अनुवाद मलयालम में हो, मलयालम का पंजाबी में हो...तो इस तरह की सांस्कृतिक भिन्नता; खान-पान, रहन-सहन, पहनावे-ओढ़ावे की विविधता को अनुवाद करते समय किस तरह लिया जाना चाहिए, इसके संकेत अनुवाद के शिक्षण क्रम में होना चाहिए।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में तो खासकर शब्दावलियों की विराट अर्थ-ध्वनियाँ हैं। सर्वनामों और क्रियापदों की विशिष्ट प्रयुक्तियाँ हैं। अंग्रेजी का ‘एंगर‘, हिन्दुस्तानी में गुस्सा, क्रोध, कोप बनकर आता है। पर स्थिति यह है कि अंग्रेजी में परशुराम भले एंग्री हो जाएँ, हिन्दी मे वे गुस्सा नहीं होंगे, क्रोधित होंगें; अंग्रेजी में भगवान विष्णु भले एंग्री हो जाएँ, हिन्दी में गुस्सा नहीं होगें, कुपित होंगे। इस तरह के असंख्य उदाहरण विभिन्न भारतीय भाषाओं से लिए जा सकते हैं।
सारांशतः आज के जटिल और मिश्रित पर्यवस्थिति से भरे-पूरे सामाजिक परिदृश्य में हम ब्राह्मण, आरण्यक, निघण्टु, निरुक्त से अनुवाद की भारतीय परम्परा और सरगोन की विजय घोषणा से पश्चिमी अनुवाद परम्परा की माला भले जप लें; पर अनुवाद अध्ययन की शिक्षा-पद्धति विकसित करने हेतु यह ध्यान हर समय रखना होगा कि मूल पाठ के वाचक एवं विषय, वाचक और विषय के उद्देश्य, भाषा क्षेत्र, परिवेश, संस्कृति, भाषा विज्ञान, लोक-प्रयुक्ति, विषय की सम्वेदनशीलता के मद्देनजर ही कोई अनुवादक या अनुवादक-चिन्तक अपने को लक्ष्य भाषा के लिए तैयार करता है और अनुवाद की कोटि तय करता है कि इस पाठ के लिए टीका, व्याख्या, अन्वय-विश्लेषण, इण्टरप्रिटेशन, अनुवाद....क्या उचित है? और इसी पद्धति में लक्ष्य भाषा के भावक के मानसलोक और बौद्धिक स्तर, भाषा-क्षेत्र के परिवेश, संस्कृति, भाषा संरचना, लोक प्रयुक्तियाँ, विषय- निरूपण आदि तय करता है। जाहिर है कि इसमें किसी अनुवादक या अनुवाद चिन्तक को इस कार्य में उसके प्रशिक्षण का अनुभव और व्यावहारिक पद्धति के दौरान प्राप्त पटुता ही सहायक होगा। अतः अनुवाद से सम्बन्धित पाठ्य निर्मिति में इन बातों का संज्ञान रखा जाना अनिवार्य है।
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अनुवाद और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
अनुवाद] या अनुवचन] या अनुकथन की परम्परा भारत देश में बहुत प्राचीन है। विभन्न राष्ट्रों के लोग अपने यहाँ की अनुवाद परम्परा को प्राचीनतम साबित करने के लिए विभिन्न राजाओं के शासन काल के द्विभाषी-त्रिभाषी शिलालेखों का उल्लेख करते हैं। भारतीय अध्येताओं को इस दिशा में अधिक उद्यम करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। प्राक्वैदिक काल की लोक संस्कृति और लोकजीवन में] वैदिक काल के गुरुकुल के अध्यापन कौशल में] और फिर ऋग्वेद की ऋचाओं का सामवेद में सांगीतिक उपयोग] यजुर्वेद में यज्ञ विधानादिक उपयोग] तथा अथर्ववेद में विधागत परिवर्तनात्मक उपयोग में] उत्तरवैदिक काल के लोकजीवन के कृषि संस्कृति से वाणिज्य संस्कृति की ओर प्रवेश में] ब्राह्मण] आरण्यक] उपनिषदों के विवेचन में] निरुक्त] निघण्टु की रचना प्रक्रिया में] बौद्ध धर्म की अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति में] अश्वघोष की रचना वज्रसूची के प्रचार-प्रसार में] सिद्ध साहित्य के विवेचन में] रामायण] महाभारत] के विभिन्न अनुवादों में हम इस परम्परा को ढूँढते हुए आगे तक आ सकते हैं।
कहा जाता है कि अनुवाद की सबसे बड़ी आवश्यकता धर्म] दर्शन] साहित्य] कला के प्रचार हेतु हुई। बात सच भी है। पर इससे भी पहले अनुवाद की प्राथमिक आवश्यकता हुई] मनुष्यों और मानव समुदायों के बीच आपसी समझ बनाने में] ताकि वे एक दूसरे की भावनाओं और अपेक्षाओं को समझ सकें। एक दूसरे को जानने की यह पूरी प्रक्रिया थोड़ी जटिल है। यह कई सोपानों में तय हो पाता है। वस्तुतः एक दूसरे को जानने का अर्थ] उसका नाम] गाँव] वर्ण] मुखमण्डल जान लेना नहीं होता] इस उद्यम का तात्पर्य उस पूरे पैकेज से है] जो उस जनपद की पूरी संस्कृति को जानने से सम्पन्न होता है। यह संस्कृति किसी समाज का ऐसा घटक है] जो जनजीवन के आहार-व्यवहार] धर्म] दर्शन] साहित्य] कला...सब में समाहित रहता है।
जाहिर है कि किसी व्यक्ति को सम्पूर्णता में जानने की पूरी प्रक्रिया उस व्यक्ति को उसके जनपद और उसकी संस्कृति के साथ जानने से ही पूर्ण होगी। किसी मनुष्य की बोली-बानी] विभिन्न परिस्थितियों में प्रमुख उसके भाषा फलक] उसके द्वारा प्रयुक्त शब्दाविलयों] और किसी विषय-व्यक्ति-परिस्थिति पर उसकी दर्ज क्रिया-प्रतिक्रया से भी उसका आचार-विचार-संस्कार जाना जाता है। इस बात को सम्प्रेषण के कई फलक के उदाहरण द्वारा इस तरह स्पष्ट किया जा सकता है-
ओ ए केशव] एक गिलास पानी ले आओ!
केशव] एक गिलास पानी ले आना!
केशव जी एक गिलास पानी ले आएँगे!
केशव भाई] जरा एक गिलास पानी ले आएँगे!
भाई साहब] एक गिलास पानी की जरूरत है!
ये सारे वाक्य एक ही भाषा में कहे गए हैं। लेकिन हर वाक्य में सम्बोध्य और सम्बोधक के आपसी सम्बन्ध और सम्बोधक के संस्कार परिलक्षित हैं। पहले दोनों वाक्य में स्पष्ट है कि सम्बोधक और सम्बोध्य का रिश्ता नियोजक और मातहत का है। लेकिन पहले वाक्य के सम्बोधक की नजर में सम्बोध्य के प्रति मानवीय भाव नहीं है। जबकि दूसरे वाक्य में वह भाव भी है। तीसरे चौथे वाक्य का संस्कार ऐसा है कि सम्बोधक-सम्बोध्य का नियोक्ता भी हो सकता है] जो बहुत भला इनसान है] या फिर मित्र भी हो सकता है। पाँचवे वाक्य से साफ जाहिर होता है कि सम्बोधक और सम्बोध्य का रिश्ता यदि पुराना है] और सम्बोधक का ओहदा सम्बोध्य से बड़ा है] तो निश्चय ही वह व्यक्ति अत्यन्त सज्जन और सरल है] या सम्बोधक कोई गैर है] तो वह अनुनय कर रहा है।
यह स्थिति अलग अलग तरीकों से हर भाषा में उपस्थित हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में अनुवादक के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती खड़ी होती है। यहीं आकर हम मूल रचनाकार के उस मौलिक भाव और आचरण को भी समझ पाते हैं] जिससे निर्देशित होकर वह अपने द्वारा सृजित पात्रों को भाषा देता है] या फिर उन पात्रों के आचरण पर अपनी टिप्पणी करता है। यहाँ तक कि उन पात्रों के सृजन सन्धान में भी वह रचनाकार जिनका ब्रह्मा होता है] उसके नामकरण] चरित्र-चित्रण मनोदशा] सामाजिक-आर्थिक हैसियत] कथोपकथन...सब कुछ में हम उस रचनाकार का और रचनाकार द्वारा रचेे गए समाज के उद्भव-परिवेश का संस्कार ढूँढ लेते हैं।
बात सच है कि कोई रचनाकार समाज में जो देखता-सुनता-भोगता है] अपनी रचनाओं में उसे ही प्रभावी ढंग से अंकित करता है। जन-जन तक वस्तुस्थिति का असली रूप प्रस्तुत कर आम नागरिक की सुसुप्त चेतना को उदबुद्ध करने की चेष्टा करता है] स्थगन से भरे सामाजिक व्यवस्था में हलचल पैदा करता है। जीवन-यापन के शान्त तालाब में बुराइयों की] रूढ़ियों की] मानव विरोधी आचरणों की] मानव मूल्यों के अवमूल्यन की जो काई-कदाली जम गई होती है] उसमें खरोंच डालकर] कंकड़ी मारकर उसकी तहों को काटता है और सामाजिक परिदृश्य का परिष्कार करना चाहता है। इन तमाम बातों में भाषा-व्यवहार की जितनी भी परतें होती हैं] वह पूरी तरह समकालीन समाज की सांस्कृतिक संरचनाओं से लिपटी रहती हैं। पाठ चाहे साहित्य का हो] सामाजिक विज्ञान का हो या इतिहास भूगोल का...भाषा के सांस्कृतिक रचाव से वह पृथक नहीं हो सकती। इसलिए अनुवाद के समय संस्कृति एक अहम त्तव के रूप में सामने आती है। अनुवादक इसकी गरिमा-संरक्षण में अपनी समस्त ऊर्जा और कौशल झोंक देता है।
किसी पाठ का अनुवाद करना] केवल उनकी शब्दाविलयों] क्रियापदों] और सन्देशों का उल्था भर नहीं होता] बल्कि उस पूरी प्रक्रिया में भाषावैज्ञानिक] व्याकरणिक] और कोशीय उपस्करों के उपयोग के अलावा एक अकृश्य काम होता रहता है] वह है मूल पाठ की संस्कृति का अनुवाद।
उक्त उदाहरणों में] या ऐसे और भी कई उदाहरण जो सोचे जा सकते हैं] जिसमें शब्दों] पदों का केवल कोशीय अर्थ पर्याप्त नहीं होगा। कोशीय अर्थों में हिन्दी के शब्द--चाची] ताई] मौसी] मामी] बुआ सबके लिए अंग्रेजी का एक शब्द है आण्टी] पर इन सबके सांस्कृतिक सन्दर्भ एक नहीं हैं। भाषा के सन्दर्भ में संस्कृति बहुत बड़ा मसला है। भारतीय सन्दर्भ में सम्बन्धों को लेकर ही चलें] तो इसका व्याकरण इतने स्तरों का वैविध्य लिए हुए है] और उसका अन्वयार्थ इतना विराट है कि कोशीय अर्थ उस व्याख्या को ध्वनित नहीं कर सकता। परराष्ट्रीय भाषाओं की संस्कृति के साथ तुलना करके देखें तो साफ-साफ दिखाई देता है कि जिस जनपद में साली] सरहज] भाभी] बहू] चाचा] ताउ] मामा] मौसा फूफा जैसे सम्बन्ध ही नहीं हैं] वहाँ इन सम्बन्धों के साथ किए जाने वाले आचार-विचारों की क्या व्याख्या होगी! वैज्ञानिक] ज्ञानात्मक] वाणिज्यिक] ऐतिहासिक] भौगोलिक] सर्वेक्षणपरक] गणितीय पाठ अर्थात जिसका सम्बन्ध केवल भाषा और तथ्य से है] उनमें सांस्कृतिक सन्दर्भ की बातें तो केवल भाषा-व्यवहार और तथ्य के प्रति रचनाकार के रवैये से जानी जाती है] पर साहित्यिक] सांस्कृतिक] धार्मिक] राजनीतिक] सामाजिक पाठ] जिसका सीधा सम्बन्ध सामाजिक जीवन-यापन] आचार-विचार] राग-विराग] लोक-व्यवहार और आचरण-अस्मिता] बिम्ब-प्रतीक] अलंकार-मुहावरे] भाषा वैविध्य] उक्ति वैचित्र्य से है] वहाँ पाठ का सांस्कृतिक सन्दर्भ बड़ी व्याख्या की माँग करने लगता है।
पश्चिमी देशों में नाते रिश्तों की उतनी शाखाएँ नहीं हैं जितनी भारत में हैं। केवल भारत की ही बात करें तो मिथिलांचल की स्त्रियाँ अपने जेठ और मामा ससुर से उस हद तक परदा और परहेज करती हैं जैसे दोनों एक दूसरे के लिए अछूत हों] ऐसा देश के अन्य प्रान्तों में नहीं है। इसका सीधा सम्बन्ध वहाँ की दीर्घकालीन प्रथा से है। फिर पूरे बिहार का सन्दर्भ लें तो छोटे रिश्ते की बहुएँ घर परिवार या समाज के मर्दों के समक्ष सामान्य स्थिति में अपनी बात रखने के लिए भी मुँह नहीं खोलती] वे घर की बुजुर्ग स्त्रियों या बच्चों के माध्यम से अपनी बात पहुँचवाती हैं] ऐसा देश के और क्षेत्रों में नहीं है। बिहार] उत्तर प्रदेश में जीजा साली के रिश्तों में जितना खुलापन और रसपूर्ण परिहास भरा रहता है वह केरल में नहीं होता] वहाँ सालियाँ अपने बड़े बहनोई को बड़े भाई का दर्जा देती हैं! फिर से मिथिलांचल की तरफ चलें] वहाँ सालियों के भी दो दर्जे हैं--पत्नी की बड़ी बहन के साथ सास जैसा व्यवहार किया जाता है जबकि पत्नी की छोटी बहन के साथ पूरा खुलापन रहता है। बिहार के कुछ खण्डों में मामी-भान्जे के साथ भी परिहास के रिश्ते रहते हैं। छोटानागपुर के कुछ खण्डों में नानी-नाती के बीच परिहास होता हैं। उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों में 'दूध' का रूढ़ अर्थ 'स्तन' हो गया है] वहाँ पायस को 'दूध' माना जाता है] मिथिलांचल में स्त्रियों का श्मशान घाट जाना विर्जत है] इस्लाम में स्त्रियों का मजार-क्षेत्र में प्रवेश विर्जत है। पश्चिमी देशों की नागरिक-समझ इस बात से पूरी तरह अनुकूलित हो चुकी है कि दो में से किसी एक के] अथवा दोनों के विवाह-पूर्व विवाहेतर सम्बन्ध की आशंका से अपना वर्तमान नष्ट न किया जाए] पर ऐसा भारतीय स्त्री-पुरुष सामान्य स्थिति में नहीं सोच सकता।...
इन तमाम बातों से आज यदि वे लोग भी वाकिफ हैं] जो कभी इस क्षेत्र में नहीं गए] और उस क्षेत्र की भाषा भी नहीं जानते तो इसका श्रेय अनुवाद को ही जाता है। अलग से कहने की आवश्यकता नहीं] कि ये जानकारियाँ कोई रचनाकार अपने पाठ में सूक्ति की तरह नहीं देते] ये सारे तिय उस पाठ में समाहित होते हैं और अनुवादक को इन सबके संरक्षण और सम्वर्द्धन का ध्यान रखना होता है। ऐसा कहना चाहिए कि हर पाठ अनूदित भाषा के नए रूप में आकर भावक को यह सुअवसर प्रदान करता है कि वह लक्ष्य भाषा में विवेचित पाठ के सांस्कृति सन्दर्भ] सामाजिक आचार-विचार] जीवन-यापन] रहन-सहन] प्रेम-संघर्ष] द्वन्द्व-दुविधा के मूल स्वरूप से परिचय करे] उसे जाने] और अपने भौगोलिक परिवेश और सामाजिक सांस्कृतिक सन्दर्भों से उसका साक्षात्कार करते हुए] अपना तथा अपनी सांस्कृतिक समझ का विकास करे। दरअसल संस्कृति एक अमूर्त] सूक्ष्म और अपरिभाषेय बिम्ब है] इसे समझा तो जा सकता है] पर ऊँगली रखकर बताया जाना कठिन है कि संस्कृति यह है] एक जगह बता भी दें कि इस भूखण्ड] इस समुदाय के लोगों की संस्कृति यह है] तो अगले ही क्षण फिर दूसरी परिभाषा देनी पड़ जाएगी। मानव-सभ्यता के विकास-क्रम सदियों के आचार-विचार] आहार-व्यवहार] रहन-सहन] जीवन-यापन] सम्बन्ध-सरोकार की प्रथा-परम्परा की परिणति और प्रतिफल की एक शृंखला है जो मनुष्य के जीवन की तरह ही गतिशील और अग्रोन्मुख होती है और इनकी संचरण क्षमता इतनी तेज होती है कि किस रास्ते] किस क्षण इसमें नए किसलय खिल जाएँ] पता नहीं चलता। आज सम्पूर्ण भारतीय परिवेश के पहनाने-ओढावे] खान-पान] बोली-बानी] आहार-व्यवहार में आई सार्वत्रिकता के मद्देनजर इस बात तो रेखांकित करना बड़ा आसान होगा।
एक समय साहित्य अकादेमी के सम्मान समारोह में अपने अध्यक्षीय भाषण में यू.आर.अनन्तमूर्ति ने एक वक्तव्य दिया था कि 'आज हमारा भारतीय साहित्य बाइस भाषाओं में एक बात करता है(उन दिनों साहित्य अकादमी बाइस भाषाओं के रचनाकारों को सम्मानित करती थी)।' कहना न होगा कि उनके इस विचार-वक्तव्य का प्राथमिक आधार अनुवाद ही रहा होगा। भारतीय मनीषा में ऐसे कई पुरोधा हुए हैं जिन्हें कई भाषाओं का ज्ञान रहा है] पर अधिकांश लोग ऐसे ही रहे हैं जिन्हें सभी क्षेत्र की भाषाओं का ज्ञान भले न हो] अनुवाद अथवा अन्य स्रोतों से वहाँ की जानकारी हासिल करते रहते हैं।
विश्व फलक पर जब से अनुवाद कार्य और प्रकाशन व्यवस्था का चलन हुआ है] संसार के कोने-कोने से विचार की यात्रा तेजी से होने लगी है। संचार-माध्यम के अपरिमेय संचरण के कारण जिस तीव्रता से विचार का प्रसार हुआ] उसमें वहाँ की संस्कृति का भी प्रभावित हो जाना लाजिमी था। सामान्य जन की चित्त-वृत्ति] जीवन-वृत्ति और समकालीन शासन-व्यवस्था के दस्तावेज के रूप में साहित्य] समाज विज्ञान] अथवा इतिहास के पृष्ठों में आज तक जो कुछ भी दर्ज हुआ है] और होता चला जा रहा है उन सबका सीधा सम्बन्ध समाज और संस्कृति से है। नागरिक परिवेश की वर्चस्वगत नीतियों] संस्कृति और समाजशास्त्र से साहित्य के अन्तर्संबन्धों] वर्चस्व और प्रतिरोध के नागरिक संघर्षों को लेकर रेमण्ड विलियम्स] अन्तोनियो ग्राम्शी] ई-पी-थामसन] रिचर्ड होगार्ड ने पर्याप्त विचार किया है] वह यहाँ विचार का विषय नहीं है। यहाँ केवल उन प्रसंगों का सहयोग भर लेना है। अन्तोनियो ग्राम्शी की राय में कोई भाषा] जनपद की संस्कृति का ही रूप होती है। उन्होंने समान भाषा-भाषी लोगों की अभिव्यक्ति में ऐतिहासिक और सामाजिक रहने वाले भाषाई अन्तर को मुक्त कण्ठ से स्वीकारा है। यह अन्तर व्यक्ति की सामाजिक हैसियत] ऐतिहासिक सूत्र पारम्परिक सम्बन्ध पद्धति] वर्ग-भेद के कारण भाषा प्रयोग की विधियाँ] आर्थिक-शैक्षिक हैसियत के कारण उसके बोध का स्तर आदि पर निर्भर करता है। इसके साथ-साथ संचार-माध्यमों के फैलाव और अनुवाद-कार्य द्वारा जो विचारों का विनिमय स्थानान्तरण होता है] और आगत विचारों का उस सामाजिक परिवेश में अधिग्रहण होता है] उससे वहाँ की संस्कृति] वहाँ के नागरिक जीवन की प्रक्रिया प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाती है। नागरिक परिदृश्य का रहन-सहन] वेश-भूषा] खान-पान] आहार-व्यवहार] तीज-त्यौहार...सब के सब उससे प्रभावित होता है। यह बात सच है कि हर जनपद के साहित्य का सीधा सम्बन्ध वहाँ की भाषा में अनुगुम्फित होता है] किन्तु इसके साथ सचाई यह भी है कि वह भाषा खुद ही वहाँ के नागरिक जीवन की उपज होती है। हर क्षेत्र् की भाषा के सुस्थिर स्वरूप में वहाँ के नागरिक जीवन का अतीत मौजूद रहता है] जो जनपदीय संस्कृति से रससिक्त रहती है। इस रास्ते चलकर यह कहा जाना चाहिए कि अनुवाद के रास्ते चलकर जो वैचारिक और सांस्कृतिक सम्वर्द्धन समाज में होता है] उसका असर पुनर्सन्धान के रूप में बाद के मौलिक लेखन पर भी पड़ने लगता है।
सामाजिक जीवन-यापन के दौर में यह देखा गया है कि चाहे नागरिक जीवन के संघर्ष के उत्पाद के रूप में हो] 'विचारों' के समागत स्वरूप की सार्वजनिक स्वीकृति के रूप में] हर समय वर्चस्ववादी परम्परा के समानान्तर एक प्रतिरोधी शक्ति खड़ी होती है] जो स्थापित परम्परा की मजबूत और जड़ीभूत ताकत से जूझती हुई अपने नए मूल्य की परम्परा कायम करने लगती है। फलस्वरूप नागरिक जीवन एक नए भाव-बोध के साथ अपना जीवन संघर्ष शुरू करता है।
अधिक पीछे न जाएँ] भक्ति-आन्दोलन पर ही नजर डालें तो वहाँ सांस्कृतिक उत्थान और नागरिक जीवन के संघर्ष की छवियाँ अनेक रूपों में सामने आती हैं। अपने विराट और विस्तृत चिन्तन के साथ मैनेजर पाण्डेय ने गौर किया कि भारतेन्दु युग के बालकृष्ण भट्ट भक्तिकाल के साहित्य को 'जनसमूह के हृदय-विकास' की रचना स्वीकरते हुए उसे अपने युग का श्रेष्ठ साहित्य माना है। उनकी नजर में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी भक्ति-काव्य का अनुशीलन करते हुए वैसा साहित्य विवेक विकसित किया जिस कारण वे रीतिवादी और जनविरोधी साहित्य का डटकर मुकाबला कर सके। प्रो- मैनेजर पाण्डेय ने स्पष्टतः स्वीकार किया कि सामान्य जनता की संस्कृति से उन भक्त कवियों की कविता निर्मित हुई थी...सन्त-काव्य में पुरोहितवाद] धार्मिक आडम्बर] जातिभेद] सामाजिक विषमता और ऊँच-नीच के भेद-भाव का जो खण्डन तथा विरोध है] वह सामन्ती समाज-व्यवस्था और उसकी विचारधारा के विरुद्ध विद्रोह की अभिव्यक्ति है...।
भारतीय परिदृश्य में वस्तुतः भक्ति आन्दोलन ऐसी घटना है जिससे न केवल भारतीय साहित्य को बल्कि भारतीय संस्कृति और भारत के नागरिक जीवन को भी एक नई दिशा दी। जाति] सम्प्रदाय] ओहदा] सामाजिक हैसियत] आचार-विचार] रहन-सहन आदि की हदबन्दी के अलावा बाकी भी कई सीमाओं] दीवारों को तोड़कर इस आन्दोलन ने एक कर दिया। कई धर्मों] जातियों] कर्मों के कवियों द्वारा इस समय का साहित्य लिखा गया। कबीर] तुकाराम] नामदेव] रैदास] आखो] दादू] रहीम] रसखान] मीरा] अक्का महादेवी आदि बहुभाषिक तो थे ही] इसके अलावा ये सब के सब विभिन्न जाति और सम्प्रदाय के थे। बुनकर] दर्जी] सोनार] चर्मकार] धोबी] शिकारी आदि कई वर्गों से आए ये लोग एक तरफ से पण्डितवाद और पुराणवाद की वैचारिक पृष्ठभूमि के निषेध के साथ आगे बढ़े। जाहिर है कि एक समन्वित भारत और समग्र मानवीय अवधारणा के साथ इन सबकी सांस्कृतिक दृष्टि आगे बढ़ रही थी। ध्यातव्य है कि इसी दौर में रामायण और महाभारत का अनुवाद अथवा पुनर्सृजन विभिन्न आधुनिक भारतीय भाषाओं में हुआ] जिनमें से अधिकांश आज अपनी-अपनी भाषा का मौलिक और आधार ग्रन्थ माना जाता है। गुरु नानक ने 'गुरु ग्रन्थ साहिब' में विभिन्न धर्म ग्रन्थों से पद लेकर संकलित किया] दक्षिण में बासवेश्वर] निन्गैय्या कम्बन] एचुत्तायन] उत्तर में तुलसीदास] शंकरदेव] कृतिवास] चण्डीदास] पश्चिम में मीरा] तुकाराम] ज्ञानेश्वर] नामदेव आदि इस धारा के पुरोधा माने गए। हिन्दू मुसलमान का भेद समाप्त हुआ। लोक नाट्य के माध्यम से भक्ति सन्देश का फैलाव होने लगा। भेद-भाव मिटाने में इस पद्धति का असर भी कम नहीं हुआ। आगे चलकर सती-प्रथा] छुआछूत] वर्ण-विभेद आदि सामाजिक कुरीतियों पर भी सांस्कृतिक आन्दोलन की शृंखला का सीधा प्रभाव पड़ा।
गरज कि अनुवाद के जरिए जब कोई साहित्य किसी दूसरी भाषा में जाता है तो स्रोत-भाषा का पाठ] लक्ष्य-भाषा में अपने साथ पूरे जनपद के अतीत] परम्परा] रहन-सहन] खान-पान] वेश-भूषा] आहार-व्यवहार] सम्बन्ध-सरोकार] बिम्ब-प्रतीक] मिथक-यथार्थ] शब्द-संस्कार] पात्रों के वर्ग-संघर्ष] जीवन-संघर्ष] तमाम बातों के साथ ही जाता है। और इतना तो तय है कि हर जनपद का सांस्कृतिक] वैचारिक और व्यावहारिक पहल इन्हीं बातों पर निर्भर करता है। एक बात यह भी है कि अनुवाद के जरिए जब कोई संस्कृति किसी दूसरे परिवेश में पहुँचती है तो वहाँ वह वैसी की वैसी नहींे रह जाती। या तो वह वहाँ की मौजूदा संस्कृति में प्रविष्ट होकर अपने लिए जगह बना लेती है] या वहाँ के नागरिक जीवन की सुविधा के मद्देनजर अपने को पुनर्गठित कर लेती है] या फिर वहाँ की संस्कृति के साथ मिलकर एक अलग ही संस्कृति निर्मित कर देती है। यह स्थिति वाचिक-परम्परा के पाठ के साथ तो कई बार हो जाती है। कभी-कभी सामान्य पाठ के साथ भी होता है। भक्ति-आन्दोलन की कई रचनाएँ इसके उदाहरण हो सकते हैं। प्रचार-प्रसार के दौरान नेपाल] चीन] तिब्बत] खोतानी] ब्रह्मदेश] इण्डोनेशिया] मध्य जावा] बाली द्वीप] मलय द्वीप] सिंहल देश] अरब-इरान] यूरोप आदि में रामकथा का स्वरूप परिवर्तित होते-होते जैसा हो गया है] उसमें यही पद्धति कारगर रही होगी। यदि विश्व फलक पर लोक-साहित्य का अनुशीलन करें तो यह बात और साफ-साफ दिखेगी। कई अफ्रीकी लोक-कथाएँ ऐसी हैं] जो बिहार में या भारत के कई भूखण्डों में अपने स्थूल रूप में एक-से हैं] पर हर भाषा में जाकर वह वहाँ के नागरिक जीवन के साथ रचने-बसने के क्रम में स्थानीय आवरण और वेशभूषा की हो गई हैं। ठीक यही बात भारत के भीतर ही विविध राज्यों-क्षेत्रों की लोक-कथाओं के बारे में कही जा सकती है। यहाँ तक कि रामायण] महाभारत तक का जो अनुवाद विविध भाषाओं में हुआ है] उसमें भी स्थानीय व्यवहार होते गए हैं। और] जब एक ही देश में सांस्कृतिक संचरण का यह वैविध्य हो जाए तो फिर विदेशी भाषाओं के साथ क्यों न हो।
शोधपरक तथ्य है कि प्राचीन काल में रामकथा के सम्पोषकों ने भारत के पड़ोसी देशों में जहाँ-जहाँ अपना व्यापारिक अथवा औपनिवेशिक सम्बन्ध बनाया] वहाँ-वहाँ अपने धर्म-प्रचारक भेजकर रामकथा का प्रचार-प्रसार किया। उत्तर में नेपाल] तिब्बत] चीन और खोतान] पूरब में ब्रह्मदेश] स्याम और चीन] दक्षिणपूर्व में मलय] यव द्वीप] बाली और लंबक आदि के जनजीवन में रामकथा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह दीगर बात है कि उन स्थानों की रामकथा अब वाल्मीकि अथवा तुलसी की रामकथा जैसी नहीं रहीं। वैसे रहे भी क्यों। जब वाल्मीकि की रामकथा से तुलसी की रामकथा भिन्न है] और तुलसी की रामकथा से कृतिवास और कम्बन की रामकथा भिन्न है तो फिर चीन की रामकथा भारत से भिन्न क्यों न हो। अनुवाद और इतिहास की सरणियाँ पार करने के बाद तो इतनी तब्दीलियाँ आ जाती हैं कि कभी-कभी सच] झूठ जैसा लगने लगता है। इस्वी सन के प्रारम्भ के समय कुषाण वंश का राज्य काशी से खोतान तक फैला हुआ था। दूसरी शताब्दी के आते-आते बौद्ध धर्म] बौद्ध साहित्य और बौद्ध संस्कृति का प्रचार मध्य एशिया से चीन तक सब जगह होने लगा था। आगे के वर्षों में नेपाल] और तिब्बत होते हुए भारत के साथ चीन का सम्बन्ध और बढ़ा। तीसरी सदी के आते-आते बौद्ध साहित्य 'अनामक जातकम' का चीनी अनुवाद हुआ जिसमें रामकथा के सूत्र मिलते हैं। आठवीं-नौवीं शताब्दी की उपलब्ध तिब्बती रामायण] नौंवी शताब्दी की खोतानी रामायण से रामकथा के सूत्र मिलते हैं। शोध सूत्रों के आधार पर इसी तरह ब्रह्मदेश] इण्डोनेशिया] मध्य जावा] बाली द्वीप] सिंहल देश] अरब ईरान] यूरोप आदि में रामकथा की मौजूदगी और लोकप्रियता की जानकारी परशुराम चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक 'भारतीय संस्कृति विश्व मंच पर' में विस्तार से दी है। इसी तरह उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रचार-प्रसार की सूचनाएँ भी एकत्र्ा की हैं और उनके प्रचार-प्रसार एवं लोकप्रियताओं की व्याख्या दी है। तय है कि पहली-दूसरी शताब्दी के आते-आते बौद्ध-धर्म का प्रचार-प्रसार और तेजी पकड़ चुका था] इसलिए वाजिब ही है कि पहले से संचरित रामकथाओं पर पीछे से आई हुई जातककथाओं के विषय वस्तु आदि का प्रभाव पड़ा हो] या फिर वहीं के कल्पनाशील नागरिकों का रचना-कौशल रहा हो] जिस कारण उन कथाओं में तब्दीली आती गई हो।
प्राक् उपनिवेशकालीन] उपनिवेशकालीन और उत्तर उपनिवेशकालीन भारतीय साहित्य के मद्देनजर भारतीय बौद्धिक मानस का अनुशीलन विस्तृत फलक पर करें तब भी सांस्कृतिक संचरण का विस्तार बड़ी स्पष्टता से दिखता है। वैसे अनुवाद कार्य के उद्देश्य के सम्बन्ध में प्राच्य-पाश्चात्य पुराने नजरियों की तुलना करने पर रोकच सन्दर्भ सामने आता है। इस सन्दर्भ में स्वर्ग-बहिष्कृति की बाइबिल की कथा का उल्लेख करते हुए जेकृ हिल्स मिलर ने अनुवाद को 'सतत निर्वासन की भटकती अवस्था' कही है। भारतीय चिन्तकों के मन में ऐसी चिन्ता कतई] कभी नहीं हुई। कहें कि इस अवधारणा की ओर कभी नजर ही नहीं गई। बहुभाषिकता] बहुसांस्कृतिकता और अनुवाद की समझ भारत के आम नागरिकों के लिए सदा से सहचरी बनी हुई है। अनुकथन] अनुवचन] व्याख्या] विश्लेषण] अन्वय] अर्थ] सार] टीका] भावानुवाद] अनुवाद...कई पदबन्ध यहाँ की मान्यताओं में बसे रहे हैं। भारत में सबसे बड़ी बात यह दिखती रही है कि लोक-कण्ठों में बसे गीतों] कथाओं] गाथाओं] सन्दर्भों का संचार जहाँ-जहाँ हुआ] वहाँ-वहाँ एक नए रूप की संरचना भी हुई। इन अर्थों में हमें सहज स्वीकार्य होना चाहिए कि दो संस्कृतियों] दो पाठों की भाषिक समझ के अन्तर के कारण ही अनुवाद की जरूरत होती है] अर्थात अनुवाद दो संस्कृतियों] दो पाठों के भाषिक] व्यावहारिक अन्तर की मूक स्वीकृति है और सांस्कृतिक सख्य के विस्तारण का प्रयाण है। स्वाधीनता पूर्व के समय की स्थितियों को देखने से तो साफ-साफ तय होता है कि फिरंगियों ने भारतीय मनीषा के धार्मिक] पौराणिक] सांस्कृतिक ग्रन्थों का अनुवाद करवाया ही इसलिए था कि वे यहाँ की संस्कृति को समझ सकें। 'पालिटिक्स आफ ट्रान्सलेशन' का यह बहुत शानदार नमूना है कि किसी भी क्षेत्र विशेष के सामान्य नागरिक की सांस्कृतिक अस्मिता को जाने बगैर वहाँ शासन कर पाना असम्भव है। किसी व्यक्ति के साथ महीनों रहकर आप केवल उस व्यक्ति के उतने दिनों के व्यवहार को जान सकते हैं] लेकिन उस क्षेत्र की संस्कृति को जान लें तो वहाँ की पूरी जनता को जान जाएँगे। कहने की आवश्यकता नहीं कि भारतीय विद्वान सदा से कर्मों में विश्वास करते रहे हैं] कर्मों को परिभाषित और महिमामण्डित करने में नहीं। यहाँ अनुवाद कार्य हो अथवा मूल वाचन-लेखन] उन्हें सिर्फ सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति समझा गया। शायद यही कारण हो कि प्रस्तुत कथन के पुनर्कथन में यहाँ पर्याप्त छूट ली जाती रही है। आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्येतिहास पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि कई नई विधाओं का विकास-विस्तार वहाँ पौराणिक सामग्रियों के पुनकर्थन से ही हुआ है। अकेले रामायण की बात करें तो हमारे यहाँ तुलसीदास] कृतिवास] कम्बन] एचुत्तायन आदि द्वारा रचित रामायण अपनी भाषाओं के मूल ग्रन्थ माने जाते हैं। बहुत बाद में आकर यह कार्य मैथिली भाषा में भी हुआ] जो चन्दा झा] लालदास जैसे विलक्षण कवि ने किया। तथ्य है कि फ्रंास के महान अनुवाद चिन्तक एतीन दोलेत को अनुवाद में छूट लेने की वजह से फाँसी चढ़ा दिया गया था] वैसी परम्परा भारत में अपनाई गई होती] तो भक्तिकाल के सारे रचनाकार फाँसी चढ़ गए होते। सन्त ज्ञानेश्वर के अर्जुन अपने उपदेशक कृष्ण से कहते हैं कि तुम्हारी बात देववाणी में मेरी समझ में नहीं आती] तुम शुद्ध मराठी में अपनी बात समझाओ। गुरु नानक ने 'गुरु ग्रन्थ साहिब' में न जाने कितने सन्तों की बानियों को अपनी भाषा में संकलित किया। महाकवि विद्यापति ने जाने कितने सन्दर्भों को अवहट्ट और मैथिली में तराशा] चन्दवरदायी ने पृथ्वीराज रासो में अपने नायक के लिए अपने राष्ट्रीय सन्दर्भ का उल्लेख किया। अनुवाद के जरिए सांस्कृतिक संचरण की इस विराट शृंखला को ध्यान में रखते हुए हमें थोड़ा और पीछे जाकर देखने की आवश्यकता पड़ेगी] जब बौद्ध साहित्य का प्रचार-प्रसार शुरू हुआ। सर्वास्तिवादी और थेरवादी परम्परा के प्रचार-प्रसार के दौर में चीनी सहित कई भाषाओं में बुद्ध वचनों का अनुवाद हुआ] और कई ग्रन्थ वहाँ से पुनः अनूदित होकर] वहाँ की संस्कृतियों के संस्पर्श के साथ भारत आ गई। भारतीय सन्दर्भ में अनुवाद कार्य के दौरान इस छूट और सांस्कृतिक विस्तार का सदा स्वागत हुआ है। भारत का भाषा-शास्त्र् और केन्द्रीय विषय की प्रमाणिकता के नियन्ता लोग कभी इस चिन्ता में दुबले नहीं हुए कि हमारा मूल कहीं खो जाएगा] यहाँ सदा इन अभिकर्मों को सांस्कृतिक अस्मिता के सन्धान और अनुवाद कार्य की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में देखा गया।
आज इस बात को लेकर सावधान होने की जरूरत है। इस क्रम में इस चिन्ता की भी कोई खास आवश्यकता नहीं कि स्वातन्त्र्योत्तर काल के ब्रिटिशों ने अपनी सत्ता के अहंकार में हमें इतिहासहीन घोषित करने की असफल चेष्टा की। इतिहास गवाह है कि क्रूर और बर्बर शासक अपने शासितों को इतिहासहीन] छिन्नमूल] असभ्य] कुसंस्कृत कहता है। अंग्रेजों ने भी उसे दुहराया। अपने फतबे से उन्होंने भारत की साहित्यिक] सांस्कृतिक भव्यता को अमान्य किया] उसे पिछड़ा और अर्थहीन बताया। ब्रिटिश शासन काल में अपनी भौतिक सुविधाओं के लालच में आए कुछ भारतीय भी तो अंग्रेजीदाँ हो ही गए थे। वे उन्हीं की रुचियों] मन्तव्यों के अनुरक्षक] सम्पोषक हो गए थे। वैसे ही भारतीय बुद्धिवादियों के साथ मिलकर अंग्रेजों ने अनुवाद कार्य की पहरेदारी की] और अपनी रुचि के हिसाब से ऐसे अनुवाद कार्य करवाए और उसे प्रोत्साहन दिया] पुरस्कृत किया] जिनमें भारतीय साहित्य और संस्कृति की गरिमा आहत होती रही। 'द एरेन्जमेण्ट्स आफ एन एलाइन्स' शीर्षक अपने लेख में सूजी थारू ने और अपने विश्लेषण में रोमिला थापर ने इन प्रसंगों का विस्तार से उल्लेख किया है।
हमें इन चिन्ताओं में सिर खपाने के बजाय अपनी शक्ति का सकारात्मक उपयोग करना है। यह तो उनके लिए ही शर्म की बात होनी चाहिए कि जिस अनुवाद को उनके चिन्तक] 'निर्वासन की भटकती अवस्था' कहा करते थे] उसी अनुवाद ने उन्हें भारतीय संस्कृति को समझने का हुनर और सुविधा दी और फिर उसी अनुवाद-कार्य में लोमड़ीगिरी करने लगे। हमें यह देखना है कि इन तमाम विडम्बनाओं के बावजूद] इतने-इतने झंझावातों को सहते रहने के बावजूद] भारतीय साहित्य और संस्कृति का वैविध्य और उसकी गरिमा निरन्तर ऊँचाई पाती गई है। और] ऊँचाई देने वाला यह घटक है अनुवाद-कार्य] जो स्वयं अपनी सम्पूर्ण निष्ठा और उज्ज्वलता के साथ आगे बढ़ा जा रहा है। प्राक़ उपनिवेशकालीन सृजन और अनुवाद की उदारता और उपनिवेशकालीन वैचारिक संकीर्णता के संघर्ष के परिणामस्वरूप भी हमारे साहित्य और संस्कृति को कम लाभ नहीं हुआ। इसका श्रेय हमारे यहाँ के बुद्धिजीवियों] रचनाकारों और अनुवादकर्मियों के सकारात्मक सोच को जाता है कि भाषिक और सांस्कृतिक तौर पर पूर्णतया और स्पष्टतया इतनी भिन्नता बने रहने के बावजूद दुनिया के सबसे बड़े गणतन्त्रात्मक राष्ट्र भारत के नागरिकों के मन में अपनी सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान भाव बना हुआ है। फणीश्वरनाथ रेणु के 'मैला आँचल' यू-आर- अनन्तमूर्ति के 'संस्कार’' मोहन राकेश के 'अन्धेरे बन्द कमरे' तकषी शिवशंकर पिल्लै के 'क्वैर' श्री लाल शुक्ल के 'रागदरबारी' भालचन्द्र नेमाडे के 'कोसाला' कृष्णा सोबती के 'जिन्दगीनामा' राजकमल चैधरी के 'मछली मरी हुई' ललित के 'पृथ्वीपुत्र' गोपीनाथ मोहन्ती के 'परजा' सोहन सिंह शीतल के 'तूताँ वाला खूँह' महाश्वेता देवी के 'अग्निगर्भ' जैसे उपन्यासों और भारतीय साहित्य के अनगिनत कथाकारों] नाटककारों] कवि-चिन्तकों के लेखन में उत्तर उपनिवेशकालीन जिन सांस्कृतिक विरासत की महक और उन्मुक्तता हम सब देख रहे हैं] उसका असली संस्पर्श इतने बड़े बहुभाषी देश के नागरिकों को अनुवाद के सहारे ही मिल रहा हैं। और] हर जनपद की संस्कृतियाँ एक दूसरे को निरन्तर सम्पुष्ट करती जा रही हैं। आसाम अथवा बिहार के नागरिक 'ओणम' की महत्ता] केरल] कर्णाटक के नागरिक 'बिहू' और 'छठ' की महत्ता को समझने लगे हैं, तो अधिकांश श्रेय अनुवाद को ही जाता है।
उल्लेखनीय है कि हर जनपद की भाषा अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के साथ ही महत्त्वपूर्ण होती है। और हर जनपद की सांस्कृतिक धारा मूल पाठ में कई स्तरों तक रची बसी होती है। इस पूरी प्रक्रिया में जब स्रोत-भाषा का सन्देश लक्ष्य-भाषा में पहुँचता है] तब अनुवादक के लाख प्रयास के बावजूद उसकी मौलिकता अपने मूल सन्दर्भ से गहरे जुड़ाव के कारण बची ही रहती है। भाषान्तरण की इसी प्रक्रिया में एक जनपद की संस्कृति का दूसरी भाषा की संस्कृति में कायान्तरण होता है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक] बहुभाषिक देश में दो भाषा-भाषी क्षेत्रों की संस्कृतियों का सम्वर्द्धन और संचरण इसी रास्ते होता है।
इन अर्थों में अनुवाद के जरिए न केवल एक भाषा का सन्देश दूसरी भाषा के पाठक तक पहुँचता है] बल्कि सबसे पहले दो संस्कृतियों का आपस में परिचय होता है] फिर संघर्ष होता है] और] उसके बाद फिर विकास होता है। यह कहने में काई हिचक नहीं होनी चाहिए कि अनुवाद संस्कृतियों और विचारों की सुदूर यात्रा की सरणि भी है] और इस तरह राष्ट्रीय एकीकरण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अधिक पीछे न जाकर सन् 1857 से सन् 1947 तक के नब्बे वर्षों के अनूदित साहित्य पर ही विचार करें] बाते बहुत सफाई से सामने आती हैं। या फिर भारतीय साहित्य के केवल स्वातन्त्र्योत्तरकालीन अनुवाद में बंकिम] शरत] रवीन्द्र] प्रेमचन्द] निराला] नागार्जुन] महाश्वेता] वैकम मुहम्मद बसीर] शिवराम कारन्त] यू आर अनन्तमूर्ति] केसव रेड्डी] पन्नालाल पटेल] समुत्तिरम] भालचन्द्र नेमाडे] कर्तार सिंह दुग्गल] आदि की रचनाओं के विभिन्न भारतीय भाषाओं में हुए अनुवाद को देखकर] राष्ट्रीय फलक पर सांस्कृतिक सौहर्द की जितनी स्पष्ट छवि बनती है] उसका सारा श्रेय अनुवाद कार्य को ही जाता है। आशा की जाती है कि आने वाले कुछ वर्षों में अनुवाद से जुड़े तमाम अभिकरण निश्चय ही बहुत अच्छी तस्वीर पेश करेंगे।

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