Sunday, July 12, 2009

मानव जीवन में समाज की भूमिका


मानव जीवन में समाज की भूमिका को लेकर लम्बी-लम्बी बातें की जाती रही हैं, पर ज्यादातर बातें किताबी होती हैं। धरातल का सच, किताबों के अनुसार नहीं चलता। आज हम जिस समाज में जी रहे हैं, वह सर्वमान्य, सुगठित और लोकोपयोगी व्यवस्था द्वारा भली भाँति निर्देशित समाज नहीं है। कह सकते हैं कि आज हम खण्डित मूल्यों और खण्डित मान्यताओं की पक्षधरता में अग्रसर, विखण्डित समाज के नागरिक हैं। समाज कहा करता था कि जो मनुष्य पैदा हो गया, उसका मुँह किसी बढ़ई ने नहीं गढ़ा है कि उसे आहार न मिले; परमात्मा ने भेजा है, उसकी सारी व्यवस्था परमात्मा करेगा। ईश्वर पर ऐसी अकूत श्रद्धा और ऐसा अटूट विश्वास व्यक्ति का भी था और समाज का भी। कहा जाता था यत्रा नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्रा देवता’, अर्थात् स्त्रिायों का मान-सम्मान था, वह अपने परिवार की इज्जत हुआ करती थी, उसे परदे में रखा जाता था, इज्जत की तरह! कहा जाता था अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्, उदार चरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम्’, अर्थात् समाज में मैत्राीभाव था, स्नेह-प्रेम था, निजी लाभ, लोभ, लिप्सा के कारण व्यक्ति, दूसरे का अहित नहीं करता था, अहित नहीं सोचता था । लोगों में ईश्वर का भय था, पाप-भय और पुण्य-मोह था। विद्वान लोग पाप-पुण्य की परिभाषा जो समझा देते थे, लोग समझ जाते थे, और लोग सहजता से जिए जा रहे थे। कम से कम हजारों वर्षों के संघर्ष के बाद, समाज का नीतिशास्त्रा इतना तो विकसित होने लगा था कि खूँखार पशु की तरह, मनुष्य की जान दुश्मन दूसरा मनुष्य नहीं होता था। आज सारा मामला उलट गया। विज्ञान का प्रवेश हुआ, शिक्षा बढ़ी, प्रगति हुआ और समाज की व्यवस्था ने सरकार का रूप धारण कर लिया। सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति पर शासन होता था, धार्मिक आचार संहिता के आधार पर, पाप-पुण्य और नीति-अनीति के आधार पर, किन्तु बाद में शासन होने लगा पुलिस, न्यायालय और प्रशासन के जरिए, अर्थात् डण्डे के जरिए। उस समय न्याय करते थे मुखिया, सरपंच और गाँव के गणमान्य पंच। वादी-प्रतिवादी की फरियाद सुनकर उचित फैसला सुनाना पंचों का नैतिक कर्तव्य होता था, चूँकि वह पंच उस समाज का हिस्सा होता था, इसलिए उस पंचायत में निर्णय लेना आसान होता था। पर आज फैसला सुनाने वाले को वादी-प्रतिवादी से किसी भी तरह का नैतिक-अनैतिक सम्बन्ध नहीं रहता, किराए के टट्टुओं (वकीलों) द्वारा किए गए बहस के आधार पर वे फैसला सुनाते हैं। फैसला सुनाने वाले अपनी तर्क शक्ति से नहीं, नियम-कानून के शिकंजे से निर्देशित होते हैं। वादी-प्रतिवादी की फरियाद, स्थानीय समस्या, व्यक्ति विशेष के रेपुटेशन आदि को देखे सुने बगैर, जिस पक्ष के वकील ज्यादा होशियार हैं, फैसला उसके पक्ष में जाने लगा है। कर्तव्य जब व्यापार हो जाए, तो सारे कुकर्मों की बुनियाद पक्की हो जाती है, सारे पाप वहीं पनपते हैं। सामाजिक व्यवस्था के सारे विभागों में व्यापार का यही प्रवेश सामाजिक विखण्डन का आधार है। मन्दिरों में पण्डे, गाँवों में पुरोहित, न्यायालय में वकील, अस्पताल में डाक्टर, विद्यालय-महाविद्यालय में शिक्षक...हर जगह के कत्र्ता-धत्र्ताओं ने अपने कर्तव्य को पेशा बना लिया, सारे-के-सारे काम व्यापार में तब्दील हो गए। अब, ऐसी स्थिति में सामाजिक व्यवस्था और मानवीय सम्बन्धों का बेमानी हो जाना लाजिमीहै। मानव सभ्यता के विकास की लम्बी दूरी तय होने के बाद, भारत के सुगठित स्वरूप बनने के बाद, अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाने के बाद, जब देश में लोकतन्त्र बहाल हुआ, तो वह एक तिलिस्म की तरह सामने आया, जिसे राजकमल चौधरी ने इस तरह देखा--
आदमी को तोड़ती नहीं है लोकतान्त्रिक पद्धतियाँ केवल पेट
के बल उसे झुका देती है,
धीरे-धीरे अपाहिज, धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए उसे
शिष्ट राजभक्त, देश प्रेमी नागरिक बना लेती है आदमी को
(मुक्तिप्रसंग/पृ.-32)
जिस ईश्वर पर लोगों की इतनी आस्था थी कि वह अपने आहार की व्यवस्था तक के लिए ईश्वर के बूते पर निश्चिन्त था, वहाँ की स्थिति इस तरह हुई कि:
आदमी खुद बिके या बेच ही डाले अपनी आँखें अपना देश
मगर भीड़ अब खाने के लिए गेहूँ और
सो जाने के लिए किसी भी गन्दे बिस्तरे के सिवा कोई बात
नहीं कहती है...
(मुक्तिप्रसंग/पृ.-13)
जिन मन्दिरों में जाकर लोग अपने को मोहमुक्त, चिन्तामुक्त करते थे, थोड़ी देर के लिए शान्ति का अनुभव करते थे, जहाँ लोग भिखारियों को भीख देकर पुण्य कमाते थे, वहाँ पूजा भी और भीख भी, एक धन्धे की तरह पनप उठी। कुछ अनुसन्धान कर्मियों ने भीख को एक उद्योग की तरह चलाया, भिखमंगों की बहाली होने लगी, अपाहिज जैसा मेकअप कराकर मन्दिरों के आगे भीख मँगवाया जाने लगा। भिखमंगे अपने नियोक्ता के लिए भीख माँगने लगे और तनखाह पाने लगे। पुजारियों और भक्तों की ईश्वर-आस्था इस तरह हिली कि वे न आस्तिक रहे न नास्तिक:
कालीघाट मन्दिर के सामने पाँवों में चिथड़े लपेटकर
फैलाए हुए अपने दोनों नन्हें हाथ
अथवा प्रेमचन्द बोराल स्ट्रीट में
अपनी जाँघों का कच्चा माँस बेचती हुई
अथवा रोती रोती सो गई हुई हमारी बाँहों में लिपटकर चुपचाप
वह अनाथ कन्या...
(मुक्ति के विषय में आसक्ति की एक परिकल्पना)
ये सारे चित्रा समाज से उठाए गए हैं। ऐसे दृश्यों के बीच मानवों का जीवन-निर्वाह हो रहा है, यह सामान्य बात नहीं है।
मानव जीवन में समाज की भूमिकापर बात करते हुए मानव जीवन और समाज की परिभाषा आदि खोजने की कोई आवश्यकता नहीं है। असल बात यह है कि पेड़ से उतरकर जमीन पर आए हुए, दोनों हाथों और दोनों घुटनों के बल चले हुए, कुश्ती करके हिंस्र और सामान्य पशुओं को मारकर उसके कच्चे गोश्त से भूख मिटाए हुए मनुष्य अब क्लोनिंग करने लगे--इतनी प्रगति करने के बाद खुद मनुष्य की अन्तश्चेतना ने कितनी प्रगति की, यह सर्वेक्षण और एक सीमा तक बहस का विषय हो गया है । पशुओं के अंदाज में सदा नंगे घूमने वाले मनुष्यों ने पोशाकों और परदों की इतनी उन्नति कर ली कि इन्हें अपने सारे कुकर्मों पर भी परदा डालने आ गया है। इन परदों में आकर्षण और चमक-दमक इतना भरा हुआ है कि सामान्य आँखें किसी भी समय धोखा खा जाती हैं। जंगली, और जानवरों की तरह का जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्यों ने उस दौरान यदि झुण्ड में रहने की आदत पकड़ी होगी तो उसका मूल लक्ष्य आत्म-सुरक्षा ही रहा होगा, अर्थात् शक्ति का संचय और शक्ति के गठजोड़ का महत्त्‍व इन्हें उन्हीं दिनों समझ में आ गया होगा। प्रकृति, पशु आदि से लड़ाई लड़ते-लड़ते मनुष्य आज जिस स्थिति में आ पाया है, उसकी बुनियाद उसी झुण्ड में रहने की परम्परा में है।
झुण्डों में रहते-रहते उनकी जिजीविषा को सन्तुष्ट करने में आत्म-सुरक्षा, आत्म-बुभुक्षा और यौन पिपासा की तृप्ति होने लगी। धीरे-धीरे समझ विकसित हुई तो आचार संहिता का निर्धारण भी हो गया। विवाह संस्था और धन संचय की प्रवृत्ति का प्रवेश जब मनुष्य के जीवन में हुआ, तब जाकर उसके संसार के आयाम सिमटने लगे, दायरे छोटे होने लगे, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्की सूक्ति उलट गई और कुटुम्बेव वसुधाका अर्थ प्रोन्नत होने लगा।
मानव सभ्यता के विकास का इतिहास साक्षी है कि हर समय में कुछ-कुछ निष्ठावान लोगों का अभ्युदय होता आया है। अग्नि और औजार की उपलब्धि ने मनुष्य को ताकतवर बनाया। हाथऔर माथके उपयोग की पद्धति ने मनुष्य को विकासशील बनाया। और, इन्हीं उपलब्धियों के बीच संचय की प्रवृत्ति ने मनुष्य में समृद्धि की भावना पुख्ता कर दी। विवाह संस्था की शुरुआत के पीछे निश्चित रूप से यौनात्मक और हिंसात्मक अनाचार को रोकने की धारणा रही होगी। पर, जैसा कि होता आया है कि जब कोई विधान एक अराजकता को रोकने के लिए तैयार हुआ है, उसकी प्रयुक्ति के बाद वह हजार तरह की अराजकताओं का जनक होता आया है। जब कभी हम समाजशब्द की चर्चा करते हैं तो हमारे सामने एक सुरक्षाबोध और प्रेम भावना की तस्वीर सामने आती है। सोचने लगते हैं कि समाजसंज्ञा से अभिहित यह अमूर्त शब्द हमारी हर समस्याओं का निराकरण करेगा। हमें अपने कलुष से मुक्ति और अनिष्ट से छुटकारा दिलाने की राह प्रशस्त करेगा। वस्तुतः समाज की आदर्श परिकल्पना भी यही है। व्यक्ति-व्यक्ति के संचय और संगठन से बने समाज के मुँह से निकली बातों में सिर्फ और सिर्फ निष्ठा और ईमानदारी और नैतिकता और न्याय की भावनाएँ होंगी..., पर हकीकत में ऐसा कभी हुआ नहीं।
सभ्यता के विकास के दौर में समाज के दो रूप सामने आए--लोकसत्ता और राजसत्ता।समाजने जब सत्ताका रूप लिया, तब उसमें कई कुरीतियाँ भर गईं। लोकसत्ता लोक जीवन के संचालन की भावना लेकर चल रही थी, जबकि राजसत्ता राज-काज के संचालन की। राजसत्ता के पास दमन-तन्त्र था जबकि लोकसत्ता के पास शमन-तन्त्र। लोकसत्ता जब-जब अपने अधिकार क्षेत्रा में सामाजिक समस्याओं का निदान ढूँढने में असफल हुई, पीड़ित व्यक्ति राजसत्ता की शरण में जाने लगे। यह वही राजसत्ता है, जिसे चन्दा झा ने कहा --
न्यायक घर कचहरी नाम, सब अन्याय बनल तहि ठाम...
समाज सत्तासे अनुशासित जनता फिर से लोकसत्ताऔर राजसत्तामें दो पाटन के बीचआ गई। ध्यातव्य है कि हर व्यवस्था सामान्य नागरिक-हितकी धारणा से कायम हुई और हर व्यवस्था नागरिकेतर भावनाओं का शिकार हो गई। कालान्तर में जब देश में लोकतन्त्रबहाल हुआ, अर्थात् सत्ताकी संरचनात्मकता जनता के हाथ में आई, जनता स्वयं अपना प्रतिनिधि चुनकर उनके हाथ में अपने समाज के सुचारु संचालन का कार्य सौंपने लगी, तब स्थिति और बेघर हो गई। अब यहलोकतन्त्रऔर राजसत्ताकई दुर्गुणों से लैस तो रही ही, ‘लोकसत्ताको भी अपनी दुष्टताओं की सहकारिणी बनाने लगी। संयोग से या दुर्योग से आज हमारी शासन व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था यही है। मानव जीवन की सभ्यता से शुरू कर आज तक के विकास को सामाजिक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में आँकना इतना आसान भी नहीं है कि इसे दस पंक्तियों में समेट लिया जाए। पर यह मोटे तौर पर कहने का दुस्साहस किया गया है कि समाजकी पारम्परिक व्यवस्था का मौलिक रूप कहीं ढूँढने का प्रयास किया जाए तो वह बुनियाद झुण्ड में रहकर, ‘सर्वाइवल फॉर द फिटेस्टकी स्थिति में जीने वाले लोगों के रहन-सहन में मिलेगा, जहाँ से मातृसत्तात्मक प्रथा चली आ रही थी, जहाँ बच्चों की माँ, किसी पुरुष विशेष की पत्नी (बीवी) नहीं होती थी, उसे जो पुरुष भा जाता था, वह उसी से सन्तान उत्पन्न करती थी ।
पर आज, जब हम आधुनिकता, वैज्ञानिकता, विकास, सभ्यता आदि के इतने ऊँचे-ऊँचे शिखर पर पहुँच गए हैं, वहाँ जब मानव जीवन के सौविध्य में समाज की भूमिका तलाशना शुरू करते हैं, तो चकित होना पड़ता है। व्यवस्था के बुनियादी गुण-सूत्रों को जब टटोलते हैं, तो फिर से हमारी नजर हजारों-हजार वर्ष पीछे चली जाती है, जहाँ सर्वाइवल फाॅर द फिटेस्टकी स्थिति थी। आज दिखाई पड़ता है कि एक से एक बेहतरीन पोशाक से ढँके हुए लोग, आदिम युग के उस नंगे लोगों से कहीं ज्यादा नंगे हैं, क्योंकि उनके नंगेपन में कोई पाखण्ड नहीं था। कच्चे गोश्त के टुकड़े खाने में तृप्त वे लोग कहीं ज्यादा सभ्य दिखने लगते हैं, आज के इन माँसाहार विरोधियों से, क्योंकि वहाँ ताकत का संघर्ष था और यहाँ संघर्ष है ही नहीं, सिर्फ छद्म और फरेब है, सब के सब आस्तिन के साँप हैं। राजकमल ने सही लिखा:
आदमी को इस लोकतन्त्री संसार से अलग हो जाना चाहिए
चले जाना चाहिए कस्साबों गाँजाखोर साधुओं
भिखमंगों अफीमची रण्डियों की काली अन्धी दुनियाँ में मसानों में
अधजली लाशें नोचकर
खाते रहना श्रेयस्कर है जीवित पड़ोसियों को खा जाने से
(मुक्ति प्रसंग/प्रसंग आठ)
समाजशब्द की व्यापक व्याख्या और बेहतरीन परिभाषा हमारे दुर्धर्ष विद्वान सब करते आए हैं, करते रहेंगे, पर मेरी समझ से एक परिष्कृत समाज वही हो सकता है, जो समाज के दायरे में बसे समस्त परिवारों की इच्छा, आकांक्षा, सुख-सौविध्य को विवेकपूर्ण संरक्षण दे और सबकी दुख-दुविधा का तर्कपूर्ण निवारण करे। अर्थात् मानवीय सम्वेदनाओं, विवेकपूर्ण तटस्थताओं और तर्कपूर्ण अनुशासनों को धारण करने वाले कई परिवारों के संागठनिक जीवन यापन को ही सही ढंग से समाज कहा जा सकता है। जबकि आज समाज की स्थिति एकदम उलट है, आज, समाज के संचालन की बागडोर सामथ्र्यवान, संवेदनहीन, विवेकशून्य, तर्कविहीन लोगों के हाथ में है, जहाँ एकैकमप्यनर्थाय किमि यत्रा चतुष्टयम्।
इससमाजशब्द के उच्चारण भर से व्यक्ति के मन में सुरक्षा भाव और न्याय संहिता का जो टावर बनता आया है, उसके अनुसार समाज के किसी भी व्यक्ति के जीवन में किसी भी तरह की पीड़ा नहीं आनी चाहिए। व्यक्ति-व्यक्ति का काम सिर्फ समाज की आचार संहिता का पालन करना और उस संहिता के दायरे में उसका जो भी कर्म है, उसे श्रम और निष्ठापूर्वक निष्पादित करना है।
वस्तुतः समाज का एक आदर्श स्वरूप है भी यही। हर नागरिक अपने श्रम से अर्जित धन के बूते जीवन-यापन करता है, अपने परिवार के सदस्यों के साथ जीवन व्यतीत करता है। दैनिक दिनचर्या में तो समाज की कोई भूमिका रहती नहीं। पर, इससे अलग भी मानव जीवन की कई आवश्यकताएँ होती हैं, जहाँ समाज की भूमिका प्रबल हो उठती है। हरेक हर्षोल्लास में, विपत्ति में, स्थानीय समस्याओं, पारिवारिक विसंगतियों, आन्तरिक कलहों, बाहरी आपदाओं के जिस स्वरूप का निदान व्यक्ति, अपने और अपने परिवार-कुटुम्ब के स्तर पर नहीं कर पाता है, समाज में उसके अधिकार का हनन और कर्तव्य का दुरुपयोग होने लगता है, जब कभी उसके दौर्बल्य का लाभ लेकर सबल और सामथ्र्यशाली व्यक्ति उस पर अनैतिक रूप से अनाचार करता है, अत्याचार करता है, ऐसे समय में समाजउसके लिए संकटमोचनकी तरह खड़ा होता है। पर, आज का समय ऐसा है नहीं। व्यावहारिक रूप से समाज में ऐसा देखा नहीं जाता। दोष खोजना यदि आवश्यक हो, तो कहा जा सकता है कि अपने-अपने कर्तव्य से व्यक्ति और समाज--दोनों ही च्युत हो गया है।
असल में, समाज की लघुत्तम इकाई तो व्यक्ति ही है। और, जब व्यक्ति ही कर्तव्य च्युत हो जाए तो ऐसे व्यक्ति से किस किस्म का समाज बनेगा! सारे जीव जन्तुओं का अपना-अपना समाज होता है। यहाँ तक कि अपने समाज के इण्डिविजुअलकी अस्‍तित्व रक्षा हेतु जानवर तक उन्मुख और उग्र रहते हैं। कुछ दिनों पूर्व दूरदर्शन पर एक दृश्य दिखाया गया--किसी भैंस के बच्चे को एक बाघ ने मार दिया। वहाँ चर रही भैंसों की टीम ने जिस आक्रामकता, जिस उग्रता और जिस साहस के साथ उस बाघ पर आक्रमण किया, आज के मनुष्यों के लिए वह एक प्रेरणास्पद दृश्य था। और, अन्त में, जब बाघ उन भैंसों के कब्जे में नहीं आया, तो लौटते समय बाघ का एक छोटा-सा शावक दिखा, जिसे उन भैंसों ने मारकर उसके चीथड़े कर दिए। इसी तरह की एक घटना पिछले दिनों गाँव में एक चरागाह पर देखी गई। झुण्ड से थोड़ी अलग दूरी पर चर रही एक बछिया पर एक साहसी कुत्ता भौंकने लगा। बछिया वहाँ से रँभाती हुई झुण्ड की ओर भागी। झुण्ड में चर रही सारी गायों ने चरना छोड़कर इधर देखा और सारी की सारी गायें एक साथ उस कुत्ते पर टूट पड़ी। बेचारे कुत्ते को जान बचाना मुश्किल हो गया। इस तरह की सैकड़ों-हजारों घटनाओं का उदाहरण दिया जा सकता है। चींटियों का, पक्षियों का, कौवों का, बगुलों का सारे जीव जन्तुओं का उदाहरण ढूँढा जा सकता है। एक मनुष्य ही ऐसा जीव है, जो आज समाज में रहने को विवश है, समाज पर आस्था रखने को विवश है, सामाजिक शिष्टाचार के नाम पर वहाँ की सारी विसंगतियाँ, विकृतियाँ ढोए जा रहा है। उन विसंगतियों और पाखण्डों के निर्वहन हेतु उसके पास कोई तर्क नहीं है। थोड़े से प्रगतिशील विचार के लोगों ने यदि इन विसंगतियों से निजात पा ली है, तो उसे समाज से या तो बहिष्कृत कर दिया गया है, या जान से मार दिया गया है। यदि उसके साथ ऐसा नहीं कुछ हुआ है, तो निश्चित रूप से वह धन-वैभव से इतना समृद्ध है कि उन पर समाज के ये हथकण्डे विफल हो जा रहे हैं।
ज्यादा पीछे न जाकर हम स्वातन्त्र्योत्तर काल से ही समाज की हरकतों को देखना शुरू करें, तो हैरत अंगेज बात सामने आती है। हर मनुष्य के भीतर एक शैतान का निवास है, एक भेड़िया, एक लोमड़ी बसा हुआ है। धूर्तता, फरेब, ठगी, पाखण्ड इतना बढ़ गया है कि अब सामाजिक प्रेम के लिए कहीं कोई जगह नहीं बची। प्रेम में अक्सर धोखा होता है, यह दीगर बात है कि कभी-कभी धोखे से प्रेम भी हो जाता है। धर्म, नैतिकता, सम्बन्ध निर्वाह, मैत्राी, सौहार्द, सामाजिक आचार विचार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, देश प्रेम, देश भक्ति, समाज प्रेम, ईश्वर-भय, समाज-भय, लोक-भय, अनुशासन पालन...सबके सब रस्मअदायगी के तौर पर होने लगे। देश में शिक्षा के प्रोन्नयन को प्रारम्भ से ही लँगड़ी व्यवस्था का शिकार बनाया गया। अंग्रेजों ने और उससे पहले आए आक्रमणकारियों ने देश को इतनी बार लूटा कि आर्थिक रूप से देश जर्जर हो चुका था। महात्मा गाँधी, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह समेत उनके अन्य देशभक्त साथियों ने अशिक्षा और निर्धनता के बावजूद देश के नागरिकों में देशभक्ति की जो भावना फूँकी थी, वह सन् उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद सत्ता पर काबिज हुए पाखण्डी और स्वार्थी राजनीतिज्ञों के आचरण से खण्डित होने लगी। सामान्य नागरिक के मन में स्वाधीन भारत में जीवन-यापन की जो परिकल्पना बसी थी, उसकी अनापूर्ति और उसके विपरीत आचरणों को देखकर जनता व्यथित हुई। सत्ता पक्ष ने अंग्रेजों से उधार ली हुई प्रशासनिक व्यवस्था से राजपाट चलाना शुरू किया और जनता से वे पारम्परिक देशभक्ति की उम्मीद करने लगे। व्यवस्था के इस द्वैध ने जनमानस की आकांक्षा, अभिलाषा पर जिस तरह कुठाराघात किया, उससे आम नागरिक हिल उठा।
भारत में स्वाधीनता तो आई, पर इस स्वाधीनता ने आम नागरिक के किसी भी सपनों को साकार नहीं किया। बेकारी, अभाव, अकाल, अशिक्षा का प्र्याप्त प्रोन्नयन हुआ। त्रास्त जनता अपने तईं अपने प्रतिनिधियों के चुनाव में सावधानी बरतती रही, पर बार-बार जनता बेल से गिरकर बबूल पर अटकती रही। अशिक्षा और अभाव से जर्जर जनता को राजनीतिक रूप से कभी जाग्रत करने का प्रयास नहीं किया गया। उसे शिष्ट राजभक्त बनने का पाठ पढ़ाया जाता रहा, अपेक्षाकृत कुछ सजग लोगों को लाभ-लोभ की जादुई छड़ी सुँघाकर सत्ता के तिलिस्म में फँसाया जाता रहा। इन तमाम स्थितियों ने समाज के आदर्श स्वरूप को खण्डित किया। और, जिस सामाजिक व्यवस्था से शासन के दो अँखुए फूटे थे, एक सत्ता सँभालकर दमन-तन्त्रमें लिप्त हुआ और दूसरा समाज के अन्दर ही शमन-तन्त्रकी पद्धति चला रहा था -- बड़ी चालाकी से दोनों फिर एक दूसरे के पूरक होने लगे। राजसत्ताकी हैवानी और मानवेतर नीतियों में लोकसत्ताका योगदान होने लगा। मनमौजीपन बढ़ चला। समाज से आस्था उठ गई, लोग अपने को असुरक्षित महसूस करने लगे। उन्हें न्याय और नैतिकता की चिनगारी कहीं दिखाई नहीं पड़ती, फिर वे अपनी निष्ठा और नैतिकता को किसके सहारे निभाते। सामाजिक न्याय के नाम पर केवल दण्ड विधान रह गया। वह विधान भी किसी तार्किकता से परे था। समय, स्थान, परिवेश और व्यक्ति का विचार किए बगैर पाखण्डी विधान ने जनता का मोहभंग किया। इस मोहभंग के समय अनिर्णय और असमंजस में पड़े नागरिक को कोई राह दिखाने वाला तक नहीं रहा। लोगों ने देखा कि समरथ को नहि दोष गुसाईं।अब ऐसी दशा में, जहाँ मनुष्य को अपने जीवन यापन के क्रम में कोई आदर्श नहीं दिख रहा था, कोई राजनीतिज्ञ, कोई बुद्धिजीवी, पुलिस, पत्राकार, प्रशासक, शिक्षक आदि अपने चरित्रा के माध्यम से जनता की जीवन-प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर रहा था, राष्ट्र, समाज, परिवार, व्यक्ति सब के सब स्वार्थ में लीन थे, साहित्यकार सृजन कला के साथ सामने आए और उन्होंने जनता के दुख दर्द को पहचाना। भारत की जनता को लगने लगा कि, सारी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लोगों का एक छोटा-सा समूह ऐसा भी है, जहाँ हमारे दुख-सुख की चिन्ता दिखाई देती है।
मनुष्य की अन्तश्चेतना की भाषात्मक अभिव्यक्ति ही साहित्य है। भाषा मनुष्य का अविभाज्य अंग है और अन्तश्चेतना प्राणिमात्रा का सहज गुण। किन्तु अन्तश्चेतना की भाषिक अभिव्यक्ति यदि दूसरे को प्रभावित न कर पाए, तो वह साहित्य नहीं हो सकता। अन्तश्चेतना की प्रभावकारी अभिव्यक्ति जिस शक्ति के कारण होती है, वह कत्र्ता के अनुभव की मौलिकता, चेतना के उत्कर्ष, शब्द प्रयोग की सामाजिकता और शिल्प संस्कार पर निर्भर करती है। यह सारा का सारा संस्कार मनुष्य अपने परिवेश में ही निर्मित करता है। स्वातन्त्र्योत्तर काल का समाज समकालीन साहित्यकारों को संस्कार निर्मिति के लिए ऐसा ही अवसर प्रदान कर रहा था। देश में अन्नाभाव पराकाष्ठा पर हो और देश की उपज को बाहर भेजने की हरकतें बन्द न हों, तो इन स्थितियों से वाकिफ लोगों की खीझ तीक्ष्ण व्यंग्य के साथ निकलना वाजिब हो जाता है। राजकमल चौधरी ने ऐसी विसंगति को तीखे व्यंग्य में चित्रित किया है। स्वयं को उनमें शामिल कर यथार्थ को इन पंक्तियों में व्यक्त किया है:
राशन की दुकानों में अनाज नहीं है तो क्या हुआ...
हम तुम जब चाहें अपने बन्द गोदामों का सारा अनाज...
पटना से विराटनगर और विराटनगर से तिब्बत और तिब्बत...
हम जो चाहते हैं, अब भी वही होता है
क्योंकि तुम सुनहली चम्पा हो
तुम कच्ची शराब के नशे की तरह लोगों के दिमाग में
चढ़ जाती हो...
(कई नागरिक चित्र: पटना)
देश के अर्थनेता, राजनेता, व्यापारनेता (जिसके लिए राजकमल ने हमका उपयोग किया है) की हरकतों का यह चित्राण, उनके क्रूर और जनता के प्रति निरपेक्ष भाव की कलई खोलता है। तुमयहाँ अर्थ सम्मोहनके लिए आया है, जो सुनहली चम्पा है, मादक गन्ध से युक्त है और कच्ची शराब के नशे की तरह शोषकों के दिलो-दिमाग पर छाई रहती है, वे उन्माद में हिण्डोले झूलते हैं, इधर जनता का कुछ हो, समाज में कुछ भी हो जाए, उन्हें कोई फिक्र क्यों होगी!
प्रशासन और राजनीति में संलग्न इन सृजित समस्याओं, इन अनैतिक हरकतों की व्याख्या केवल राजनीतिक विडम्बना के लिए ही नहीं, सामाजिक विखण्डन और जनता की दुर्गति के लिए भी होनी चाहिए। व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज बनता है। भारत के राजनीतिक रहनुमाओं और प्रशासनिक चौकीदारों की इन हरकतों का सीधा असर समाज की हर प्रकिया पर पड़ता है। जीवन जीने के अदम्य उत्साह से भरे हर मनुष्य के लिए रोटी से बड़ी चीज और कुछ नहीं होती। इस सत्य से परिचित हमारे प्रतिनिधियों की प्रतिभा की यही पहचान है कि वे जनता के बीच अन्नाभाव बनाए रखें और समय-समय पर उन्हें टुकड़े-टुकड़े में रोटी देकर उनका उपयोग अपनी लाठी, अपने बम, अपने पिस्तौल, अपने नारे के रूप में करें। समाज में भूख और बेकारी की यह फैक्ट्री राजनेताओं ने चलाना शुरू कर दिया। सर्वाइवल फाॅर द फिटेस्टका जमाना चल पड़ा। राजसत्ता से उठी आँधी ने लोकसत्ता की बुनियाद इस कदर हिलाई कि अब इस छप्पर के नीचे बैठे हर व्यक्ति, हर पल अपने को असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं। शिक्षाविहीन, तिकड़महीन जनता अब हर पल इस बात से आशंकित रहती है कि शरीरबल, धनबल के बिना अस्‍तित्व रक्षा असम्भव है। वह हर पल प्रश्नाकुल रहती है कि बल-वैभव वालों की तरफ से आई आपदाओं से हमें मुक्ति कौन दिलाएगा? समाज के पंच नैतिकता से न्याय नहीं करेंगे, जिनके पास वैभव है, उसके पक्ष में बोलेंगे। न्यायालय जाकर जनता, बड़े-बड़े वकीलों और न्यायविद्ध न्यायविदों के कारण, न्याय हम खरीद नहीं पाएगी। पुलिस, वकील और जमीन्दार--इस देश में सारे कुकर्मों की बैक्टीरिया हैं। सारे के सारे जम्र्स, वायरस इन्हीं तीनों से पनपते हैं। प्रेमचन्द का सारा साहित्य उलट जाएँ, इन तीन जातियों के प्रति बड़ी विकृत घृणा उत्पन्न होती है। समाज के कोढ़ के इन तीनों किस्मों को प्रेमचन्द ने बड़ी सूक्ष्मता से पहचाना और अपने लेखन में दर्ज किया। जिस समाज के नागरिक इस तरह अपने अस्‍तित्व का संकट झेले, मानव जीवन में उस समाज की भूमिका क्या हो सकती है? यह ऐसा देश है जहाँ बाघ, साँप, बन्दर, भालू, कुत्ते, बिल्ली ... सारे जन्तुओं के संरक्षण के लिए परियोजना बना दी गई है, सिर्फ मनुष्य ही यहाँ इतना फालतू जीव है, जिसे जब जो चाहे, जिस तरह चाहे, परलोक पहुँचा दे। मानवाधिकार आयोग इस देश में है, मौलिक अधिकार भी संविधान में दर्ज है, पर मानवों के मौलिक अधिकार की बात करने चन्द्रशेखर नामक युवक गोपालगंज (बिहार) जाता है, उसे राजनीतिक गुण्डे गोली से मछली-मुर्गे की तरह भून देते हैं। उसी गोपालगंज जिले में आनन्द पाण्डेय नामक युवक गरीब और अन्नहीन, क्रियाहीन जनता के हित में कुछ काम करता है, पुलिस उसे बकरे की तरह उठाकर गाँव से बाहर लाती है और कसाई की तरह जिबह कर डालती है। सारे आयोग, सारे संविधान अपनी जगह आराम फरमाते रहते हैं। पुलिस कहती है काउण्टर में मारा गया, मुख्य मन्त्राी घोषणा करते हैं कि आश्रित को नौकरी और पाँच लाख रुपए प्रदान किए जाएँ।... इस देश ने आज की जनता को ऐसे समाज में रहने का आदेश दे रखा है। पूरे परिदृश्य को देखकर महसूस किया जा सकता है कि जिस जंगल में शेर, चीते, बाघ, भेड़िए जैसे खूँखार जानवर निर्भय घूम रहे हों, उस जंगल के हिरणों और खरगोशों और गायों-बैलों से कहीं ज्यादा असुरक्षित आज हमारे समाज के इनसान हैं। जंगल के खूँखार जानवरों से इतनी आशा तो रहती है कि क्षुधा की तृप्ति के बाद वह हत्या की तरफ उन्मुख नहीं होता। पर इन दो पैरों के जानवरों की क्षुधा तो तृप्त होती ही नहीं!
तो, देश की राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासनिक चमत्कार से हमारे आज के समाज को इसी तरह की सौगात मिली है। सामाजिक सम्बन्ध, पारम्परिक सम्बन्ध, खून के सम्बन्ध, प्रेम सम्बन्ध, वात्सल्य प्रेम, श्रेष्ठों का आदर, छोटों से प्यार... इस तरह लुप्त हुआ है कि पूरे समाज से हर मनुष्य का बहेलिया और पक्षी का सम्बन्ध बन गया है। अभाव की विकट स्थिति ने और पश्चिम से आए नारीवाद के नारे ने दाम्पत्य जीवन के रहे सहे प्रेम और समर्पण और निष्ठा को अधिकार की तलाश और सन्देह की लपटों में तब्दील कर दिया। अभाव और बेकारी ने पारिवारिक सम्बन्धों से अनुशासन को जड़ से मिटा दिया और हमारे समाज ने शिकारियों का जीवन व्यतीत करना प्रारम्भ कर दिया।
फिर से शिकार युग की विकृति को अपनाए इस नए समाज की भूमिका मानव जीवन में क्या हो सकेगी! मगर व्यक्ति तो ऐसे विकृत समाज में जीवन बिताने को अभिशप्त है, बिताए जा रहा है। सुखद है कि ऐसे विकृत परिवेश में भी थोड़े से संवेदनशील लोग बचे हैं, जिनके मन कुछ निरीह लोगों के लिए व्यथाभाव पनप उठता है। वे हैं रचनाकार; जो रचता है। इतिहास गवाह है कि सभ्य समाज की स्थापना के समय से ही, क्रान्ति की अगुवाई, विरोध का प्रारम्भ साहित्यकारों ने किया है। कबीर, भारतेन्दु, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, राजकमल... के रचना-संसार में जनता यह देख चुकी है। तमाम विपत्तियों के बावजूद यदि जनता अपनी सही तस्वीर कहीं देख पाती है, अपने प्रति संवेदन भाव कहीं ढूँढ पाती है, तो वह जगह साहित्यकारों का लेखन ही है। स्वातन्त्र्योत्तर काल के समाज की दशा देखकर, आम जनता की किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति देखकर, कई रचनाकारों ने समाज के खण्डित आदर्श और जनता की विखण्डित आस्था पर साहित्य सृजन करना ही सबसे अधिक मुनासिब समझा था। राजकमल चौधरी ने समाज के पाखण्डी बुद्धिजीवियों के आडम्बर को यूँ देखा कि:
बोतल में भरी हुई शराब
अलमीरे में सजी हुई किताबें इतिहास-दर्शन
दीवारों पर मार्क्‍स और गाँधी और टैगोर
हमारी बातचीत हमेशा राजनीति से सम्बन्धित होगी
और हमारी भंगिमाएँ
मुद्राएँ टेबुल के किनारे कोयले के
कीमती लाइसेंस जैसी दीखती हुई उस कुरूप स्त्राी से सम्बन्धित
वह स्त्री जनता नहीं है,
केवल है जनता की अपनी विकृत मनःस्थिति
(कई नागरिक चित्र : पटना)

जिस देश के राजनीतिज्ञों के लिए गाँधी और माक्र्स की तस्वीर महज एक प्रदर्शन हो, प्रेरणास्पद कहीं से नहीं, जिनके लिए वाकई जनता और जनता की मनःस्थिति और कोयले के लाइसेंस और विकृति और कुरूप स्त्राी में कोई फर्क नहीं हो, वहाँ का समाज और समाज का व्यक्ति किस हाल में होगा? बेशक गाँधी और मार्क्‍स, कबीर और मीरा, विद्यापति और सूर-तुलसी आदि अपने समय के आदर्श हुए हैं, पर जिस स्वातन्त्र्योत्तर काल की जनता को आदर्श के नाम पर ऐसे कुटिल कीट दिखे, वहाँ समाज के किस सुगठित स्वरूप की परिकल्पना की जा सकेगी? जिस देश में कहा जाता है कि
अन्त में राजनीति को मैंने अपने जीने का कारण बनाया था
लेकिन उससे पहले मैं बीमा कम्पनी का एजेण्ट हुआ करता था
और फिर राजनीति में प्रवेश पा जाने के बाद, उसे अपने जीने का साधन और कारण बना लेने के बाद कहा जाता है कि
इतना लम्बा है राजनीति का राजमार्ग कि रंगशाला के
अन्तरंग में पहुँच जाने पर
अपने सुख, अपने व्यक्त्तिव अपने राग-विराग
अपने संगीत के सिवा
और कोई बात याद नहीं रह जाती है
(कई नागरिक चित्र: पटना)
स्वार्थ में इस कदर लिप्त लोगों के चमत्कार को देखकर समाज की भोली जनता क्या करे! यूँ यह स्थिति केवल राजनीति की ही नहीं है। राजनीति के बाजीगर और प्रशासन के जादूगर--दोनों एक ही खूँटे पर खड़े साँढ़ हैं। शेर की तरह दहाड़ मारकर सारे जीव जन्तुओं को आतंकित करना और जीवन रक्षा के निमित्त भागते हुए जीव-जन्तुओं को झपटकर भूख मिटाना यदि राजनेताओं का काम है तो बाघ की तरह दौड़-धूप कर चुनिन्दा जन्तुओं का शिकार करना प्रशासनिक अधिकारियों का। दोनों का अजीब रिश्ता है। शिकारी तो दोनों हैं, पर ज्यादातर समय में अघिकारीगण राजनेताओं के लिए शिकार की गुंजाईश बैठाते रहते हैं। जमीन्दार तो भेड़िये की तरह बेरहम और खौफनाक हैं ही; लोमड़ी की भाँति पुलिस इन शिकारियों के जूठन चाटने पर आमादा रहते हैं। फिर भी कुछ बच जाए तो वकील, पत्राकार और कुछ अन्य नीति निर्धारक गिद्ध, कौवे, चील, कुत्ते की तरह राई-रत्ती चाट डालते हैं। विकास के प्रमुख घटक विज्ञान के पुराधाओं की दशा भी कुछ कम नहीं। उनके पास प्रतिभा है, सबको अपने सामने झुकाने के बजाय ये खुद इन बाजीगरों और व्यापारियों के आगे नतमस्तक रहते हैं और अपनी प्रतिभा को नर्तकियों की अदा की तरह बेचने को तत्पर रहते हैं। अपनी प्रतिभा का सकारात्मक और सृजनात्मक उपयोग करने के बजाय इनके इशारे पर विधवंसात्मक उपयोग में भी नहीं हिचकते। और, व्यापारियों का तो कहना ही क्या? राजनीति, अर्थ और विज्ञान--किसी भी देश की गतिशीलता में यह तीन तन्त्र अहम् भूमिका निभाता है। भारत देश की स्थिति के सम्बन्ध में राजकमल का कहना है--
वैज्ञानिक, राजनेता और स्त्राी अंगों के व्यापारी
कुल तीन ही जातियाँ रह गई हैं अब स्वयंभू अस्तु
मैं क्रीत दास हूँ...
(मुक्ति प्रसंग/पृष्ठ-13)
वाकई, आज के समाज का आम नागरिक क्रीत दासही है। शेर, बाघ, भेड़िया, लोमड़ी, कुत्ता, गिद्ध, चील, कौवा से भरा यह समाज; राजनेता, अफसर, जमीन्दार, पुलिस, पत्राकार, वकील, पण्डा-पुरोहित, सरपंच, मुखिया का बोझ और आतंक ढोता यह समाज; निश्चित रूप से नरभक्षी राक्षस की माँद है। दहशत और खौफ से भरे इस नागरिक जीवन में समाज की क्या भूमिका हो सकती है? आज का समाज शिकार युग की संज्ञा पाने की सारी अनिवार्य योग्यताएँ प्राप्त कर चुका है, इसकी शीघ्र घोषणा होनी चाहिए।

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